2008-12-02

मुंबई स्प्रिट ???

उसे उसी रस्ते से उसे वापस आना है... .....उसी दफ्तर में ....उसी रेल से ...उसका मन पर ...दफ्तर जाने का नही है. उसका मन करता है की उड़कर बंगलौर चला जाये ... २९ साल के उस नौजवान के पिता से लिपट कर एक बार रोये ..सबके सामने ...जोर से उस बूढे नेता को गाली दे ...उसका मन करता है उस रेलवे स्टेशन में कुछ देर रुके ..जहाँ एक गरीब आदमी ने अपने परिवार के ६ आदमियों को खोया है ..जिनके कफ़न के पैसे पडोसियों ने जुटाये है........वो नही जानता की हवलदार गजेंद्र सिंह दिखने में कैसा था .....वो कभी ताज नही गया .उसकी हैसियत नही थी पर उसे वो इमारत बहुत अच्छी लगती है .....वो मुंबई की उस रैली में भी नही जा पाया ....किसी शहीद की अन्तिम यात्रा में शामिल नही हो पाया ......... उसके मन में बहुत कुछ है ..बहुत कुछ......स्टेशन आ रहा है...उसका दफ्तर भी...... २ साल के उस नन्हे बच्चे की .तस्वीर उसे अपने बेटे सी लगती है ...अखबार को मोड़कर वो अपने हाथ के ब्रीफकेस में फंसाता है अपनी आँखों को टटोलता है... भीड़ में उतरने की कवायद शुरू हो गयी है ...उसके ब्रीफकेस से .अखबार की हेडलाइन चमकती है " मुंबई स्प्रिट"





जब अकेले सोयोगे बिस्तर पर,
नींद में ढूंढोगे तुम हाथ माँ का
ओर नन्हे कदमो से
तलाशोगे घर का एक एक कोना,
हर आहट पर मुड़कर देखोगे
छूओगे तस्वीर को माँ की
ओर बुलाओगे अपनी तोतली भाषा में ...
नन्हे मोशे ....
शिकायतों के उस रजिस्टर मे
तब मै भी शिकायत दर्ज करायूँगा ...
तू कहाँ था खुदा !!!


२ साल के नन्हे मोशे को जिसने अपने जन्मदिन पर अपने माता पिता को खोया


70 टिप्‍पणियां:

  1. dr anurag
    people here in india will never learn from th past mistakes
    our memory is very very short
    we believe in only politisizing the issues

    but this post is one of the best ones on your blog
    regds

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  2. main bhi nanhe moshe kee photo dekhkar bahut royi thee. baar baar meri aankoh main apne bete kee tasveer aa rahi thee. bahut dardnaak tha sab kuch

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  3. ham sab to kalpana bhi nahi kar sakte Dr. sahab, ki ab Moshe kin kin manahsthitiyo.n se do char hoga....!

    kavita ke labz man bhigone vale the aa ja fir...!

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  4. यह दर्द वह है जो जब तब याद आता रहेगा ..मोशे की यह तस्वीर कभी न भुलाई जा सकेगी ...

    तब मै भी शिकायत दर्ज करूँगा ...
    तू कहाँ था खुदा !!!

    यही सवाल बहुत बड़ा है ..

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  5. मुझे भी शिकायत है उस खुदा से
    इस नन्हे मासूम मोशे का क्या कसूर था जो उसे बचपन मैं ही माता पिता का साथ और प्यार खोना पड़ा .
    खुदा ही जाने उस नन्हे को आगे कितनी परेशानिया झेलने पड़ेगी . खुदा उसे खुश रखे .

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  6. ये सब किसी आदिम समय की देन है ..

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  7. तब मै भी शिकायत दर्ज करूँगा ...
    तू कहाँ था खुदा !!!
    यह शिकायत और भी न जाने कितने बच्चों की और कितने परिचितजनों की होगी जिन्होंने अपने करीबी
    परिजन इस हादसे में और ऐसे पहले हुए आतंकवादी हादसों हुए खोये हैं .
    अब तो हमें भी जवाब चाहिये ही कि कहाँ है खुदा?

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  8. अच्छी पोस्ट है। कुछ सीख देती कुछ सोचने पर मजबूर करती। धन्यवाद।

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  9. बेहद मार्मिक--क्या टिप्पणी करें..हो सके तो मेरा दर्द महसूस लेना..मैं जनता हूँ तुम्हें अपने दर्द का सा ही लगेगा.

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  10. हर आहट पर मुड़कर देखोगे
    छूओगे तस्वीर को माँ की
    ओर बुलाओगे अपनी तोतली भाषा में ...
    नन्हे मोशे ....
    शिकायतों के उस रजिस्टर मे
    तब मै भी शिकायत दर्ज करायूँगा ...
    तू कहाँ था खुदा !!!
    अनुराग जी, बहुत अच्छा लिखा है। दिल भारी हो गया।

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  11. किस किस की शिकायत दर्ज कराएंगे, खुदा के पास। नन्हे मोशे की, सालस्कर की बेटी दिव्या की जो उस रात अपने पापा से ठीक से बात भी नहीं कर पाई थी। उस 29 साल की लड़के की मां की जो अपने बेटे का सेहरा देखने की हसरत अब कभी पूरी नहीं कर पाएगी। या फिर देरादूर में रहने वाले उन दो नन्हे बहादुरों की , जिनके पापा गजेन्द्र ने उन्हें अच्छा इंसान बनने की सीख दी है, लेकिन अब पापा कभी ये सीख दोहरा नहीं पाएंगे.

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  12. Khuda se ab aur kitni shikayat karein???

    Ab sirf prarthana hai ki kisi aur Moshe ko aisa din na dekhna pade.

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  13. मुंबई में ज्यादातर वही रहते हैं जिन्हें रोज रोटी दाल की फ़िक्र होती हैं... हर दिन की कमाई शाम को खानी होती है. अब इसे 'मुंबई स्प्रिट' ही कहा जाय तो भी ठीक ही है.
    बाकी और क्या कहें... !

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  14. ऐसा ही दर्द अपने अंदर लिए सभी जी रहे है..

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  15. इस बार भी अखबारों ने मुम्बई स्पिरिट बुलन्द की? लोगों की दिहाड़ी कमाने की मजबूरी का भद्र शब्द में चित्रण है यह।
    मैं तो एक को जानता हूं - वह मुम्बई से वापस लौटने की सोच रहा है। पहले पूरबिया-मराठी विवाद और अब यह आतंक।

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  16. pata nahi kis dharm ka khuda yah kahta hai ki doosre dharm ke logon ko rahne hi n do

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  17. मोशे का चेहरा जिस दिन से अखबारों में देखा है तब से बेहद घुटन हो रही है ! इस काले अध्याय में सबसे मार्मिक और दिल को काचोटती हुई घटना ! काश इन दरिंदो को इन मासूमो का चेहरा दिखा होता !

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  18. जब अकेले सोयेगे बिस्तर पर
    नींद में ढूंढोगे तुम हाथ माँ का

    हर आहट पर मुड़कर देखोगे
    छूओगे तस्वीर को माँ की
    ओर बुलाओगे अपनी तोतली भाषा में ...


    मन को छू लेने वाली कविता
    बहुत ही मार्मिक चित्रण

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  19. अनुराग जी मोशे का चेहरा देखकर मैं सिरह जाता हूँ यह सोच कर कि जब यह माँ को बुलाता होगा तब माँ को ना पाकर कैसे रहता होगा।

    तब मै भी शिकायत दर्ज करूँगा ...
    तू कहाँ था खुदा !!!

    बिल्कुल सही ।

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  20. aapki kavita ne rula diya. kuch nahin kahungi aaj. dard ham sabke dilo me hai.

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  21. यह दर्द हर भारतीय महसूस कर रहा है । हर बार आतंकी हमलों में कितने बच्चे अनाथ होते हैं और कितने ही माँ बाप अपने बच्चे खोते हैं । क्या हमारी सरकार यह सोचती है कि वह हमें खरच सकती है ?

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  22. बहुत ही मार्मिक चित्रण!शब्द ही खो गये वेदना में कहीं----!

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  23. kuch kaha nahi jaa raha,phirse ansoon dila diye doc saab,nanhi jaan ke liye aapke saath hamari bhi shikayat khuda se,ya khuda ye manzar dekh kya tu bhi rota hoga?sach tab kaha tha uparwala?

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  24. Chalanaa hamaaree vivastaa hai. Jeenaa hai jo. Hrudaya ko chhoo lene waalaa chtira aapane kheeinchaa hai. Krupayaa dhanyawaad sweekar karein.

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  25. मोशे के दर्द की गहराई का पता तो शायद ही किसी को चले... इस पे मुझे अपनी ही एक पंक्ति याद आती है के ....करता है फ़िर गुनाह क्यूँ रब भी कभी कभी......

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  26. तू कहाँ था खुदा !!!
    काश इस बात का जवाब खुदा दे पाता...हम जिस इश्वर की आराधना में रात दिन एक किए रहते हैं एक दूसरे का खून बहाते हैं वो ऐसे मौकों पर कहाँ छुप जाता है...क्यूँ उसे उन लोगों की चीखें नहीं सुनाई देती जो अपने सामने अपनी मौत को आते देख निकलती हैं...आख़िर खुदा है किस काम का?
    नीरज

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  27. जो सच्चा इन्सान है,
    वह हर नन्हे मुन्ने से
    ऐसे ही प्यार करता है
    सिवाय आतँकीयोँ के
    कि,
    जिनके दिल मेँ
    शैतान का घर हो चुका है :-((

    उत्तर देंहटाएं
  28. अनुराग जी मै किसी भी खुदा से शिकायत नही करुगां यह काम खुदा ने नही शेतानो ने किया है अब खुदा इस न्नहे से फ़रिशते की देख भाल करेगा,मुझे तो रोना आ जाता है, ओर दिमाग घुम जाता है ऎसी बाते पढ कर, सुन कर .... अब क्या होगा इस नन्हे से मोशे का कोन देग इसे मां बाप का प्यार, कहा से मिलेगे इसे अपने ???
    अगर हम सब इस के लिये पेसे भी इकठ्ठे कर के दे तो क्या पता इसे पालने वाला भी एक ..... मै तो भगवान से यही प्राथना करता हु, कि किसी के साथ भी ना हो ऎसा ....

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  29. डाक्टर साहब ब्लाग पर आप में कवि के दर्शन हो रहे हैं। यह बात कोई कवि ही कह सकता है।

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  30. Uf ! Kaash ye rachana maine is waqt nahee padhee hoti....ab aankh nahee lag payegi...
    Waisehi shaheedonke pariwaaronko mil abhihi Mumbaise lauti hun...behad qareebi the....kal Shok Amteke ghar jaana hai...
    Aur hame jo taqseem kar rahen hain, ham unhehi neta maan chal rahe hain...!
    "Aaankhen band honepe hain,Par khulee nahee hamaree..."
    Maine mere blogpe kuchh samayik likha hai, tatha ek khatronse bhara qadam nirbhaytase uthane jaa rahi hun...aap sabhiki shubhkamnayen chahti hun....saath chahti hun...janti hun, ummeedse adhik milega phirbhi guhaar lagane aayi hun...
    Kalse us imtehaanki ghadi shuru ho rahi(sare aam)....abtak to blogpe ya phonepe keh likh rahee thee....ab ekdam jange maidanme utarke kaam karna hai....ab irada hai kayiyonke naqab utaar deneka....maut aaye, par kaam poora honeke baad...

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  31. इस स्प्रिट के सम्मुख रखा गया प्रश्नचिन्ह, स्वयं ही कह रह रहा है, आम आदमी की दाल रोटी तलाशने निकलने की बेबसी !
    बाहर से असंवेदनशील दिखती जनता, अपनी संवेदनायें घोंट कर, एक भयभीत असहाय वर्तमान में जी रही है ।
    " कोई वांदा नहीं, कल किसने देखा है " जैसे फुसलाने वाले तर्क उनको परास्त कर देते हैं, और वह निकल पड़ते हैं अपने घरों से..

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  32. शिकायतों के उस रजिस्टर मे
    तब मै भी शिकायत दर्ज करायूँगा ...
    तू कहाँ था खुदा !!!


    Excellent!

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  33. काश सबके पास यह संवेदना होती..मोशे जैसे बच्‍चों को सभी इस निगाह से देखते..

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  34. सच ही तो है आम हिन्दुस्तानी के सीने में गुबार भरा है पर रोजी-रोटी की मुश्किलें भागती दौड़ती जिंदगी में उसके पास पल भर का वक़्त भी नही है की रो सके . नन्हे मोशे का पढ़कर देर तक रोती रही पढ़ा तो रात में था पर इतनी भावुक थी की नही लिख पायी

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  35. अनुराग जी, मोशे के गुनाहगार तो हम सब हैं. जिस देश ने उसके माँ-बाप को छीन लिया वह अब उसे दो आंसुओं के सिवा और क्या दे सकता है?

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  36. कुदरत का खेल....
    लेख अच्छा है...

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  37. खुदा की लाठी में आवाज़ नहीं होती। वह अपने समय पर अपना निर्णय देता है।

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  38. very touching approach to a genuine problem.Its really true that these activities must be eliminated.welcome
    dr.bhoopendra

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  39. कितना दर्द छिपा है कथन में.... एक एक शब्द अर्थपूर्ण है है डा. अनुराग।... धन्यवाद।

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  40. ये केवल मुंबई स्प्रिट नहीं है, जो दिखाया जाता है। इसके पहले बनारस की मस्ती, दिलवालों की दिल्ली, कारोबारियों का अहमदाबाद, गुलाबी नगर जयपुर, मजदूरों का शहर सूरत.... सब सामान्य हो जाते हैं। मरने वाले मर जाते हैं, सरकार कुछ मुआवजा दे देती है। निरीक्षण कार्य ऐसे होता है, जैसे लोग आए हों पिकनिक मनाने।
    अबकी बार हंगामा इसलिए बरपा कि ताज और ट्राइडेंट पर हमला हो गया। किसी को शायद ही मालूम हो कि इसी दिन मुंबई के एक रेलवे स्टेशन पर भी हमला हुआ था, जहां आम आदमी मारे गए थे।
    और हां, संसद पर भी हमला हुआ था, तब सेनाएं सीमा पर गई थीं।
    आम आदमी के मरने पर कुछ नही होता भाई, वे तो कीडे़ मकोड़े हैं। जापान का उद्योगपति मरा, भारत के एक बैंक का मालिक मरा... कई ऐसे ऐसे बड़े लोग साफ हुए, शायद तब हो गया इतना हंगामा। बाकी तो इनके साथ संख्या में ही गिन लिए जाते हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  41. Zindagi lene wale bus itni khata hai teri
    Tu samajh hi nahi sakta zindagi dena kya hai

    Keep posting such posts Anuraag ji, lets keep the flame burning.

    RC

    उत्तर देंहटाएं
  42. भई अब तो कुछ करने की नहीं सचमुच करने की बारी है इससे ज़्यादा और क्या हो सकता है जो हुआ वह क्या कम है!

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  43. आपके विचार बहुत सुंदर है , आप हिन्दी ब्लॉग के माध्यम से समाज को एक नयी दिशा देने का पुनीत कार्य कर रहे हैं ....आपको साधुवाद !
    मैं भी आपके इस ब्लॉग जगत में अपनी नयी उपस्थिति दर्ज करा रही हूँ, आपकी उपस्थिति प्रार्थनीय है मेरे ब्लॉग पर ...!

    उत्तर देंहटाएं
  44. कंचन जी के ब्लॉग पर निः शक्तों से जुड़े आपके अच्छे विचार बहुत अच्छे लगे।

    शेष शुभ

    इति शुभदा

    उत्तर देंहटाएं
  45. भावुक कर देनेवाले वि‍चार।
    साथ ही सुंदर और सच्‍ची कवि‍ता-
    नन्हे कदमो से
    तलाशोगे घर का एक एक कोना,
    हर आहट पर मुड़कर देखोगे
    छूओगे तस्वीर को माँ की
    ओर बुलाओगे अपनी तोतली भाषा में ...

    उत्तर देंहटाएं
  46. नींद में ढूंढोगे तुम हाथ माँ का
    ओर नन्हे कदमो से
    तलाशोगे घर का एक एक कोना,
    "सारा देश इस हादसे से उबर नही पाया है, आज ही पढ़ी आपकी ये पोस्ट, और कुछ पंक्तियाँ बहुत भावुक कर गयी .."

    Regards

    उत्तर देंहटाएं
  47. आपने जो लिखा है दिल दहलानेवाला है । ताज होटेल की जिस घटनाओ का जिक्र आपने किया है वाकई दिल दललाने वाला है । २ साल के मासूम बच्चो के बारे में लिखकर आपने उस याद को एक बार फिर ताजा कर दिया है ।

    उत्तर देंहटाएं
  48. आँख भर आई पढ़ के उस नन्हे बच्चे के बारे में

    उत्तर देंहटाएं
  49. अत्यंत करुणा जनक !!क्या कहे

    उत्तर देंहटाएं
  50. इस पर कोई टिप्पणी नहीं...
    मोशे को प्यार... बस्स..!!

    उत्तर देंहटाएं
  51. कौन सुनायेगा चंदा मामा की बातें...
    वो परियों कथा, नाना-नानी की बातें...
    कुछ तो कहो मेरा बचपना लूटने वालो...
    मैं अनाथ हुआ क्‍यों...?
    क्‍या गुनाह था मेरा...???

    उत्तर देंहटाएं
  52. जब अकेले सोयेगे बिस्तर पर
    नींद में ढूंढोगे तुम हाथ माँ का

    हर आहट पर मुड़कर देखोगे
    छूओगे तस्वीर को माँ की
    ओर बुलाओगे अपनी तोतली भाषा में ...

    अब मैंने क्या कहना है....ये आपके दिल की ही बात नहीं सबके दिल की बात है.... मगर कित्ता रोएँ.....??

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  53. तब मै भी शिकायत दर्ज करूँगा ...
    तू कहाँ था खुदा !!!
    कुछ आप जैसा दर्द मुझे भी बेचैन किये रहता है.
    दुआ कीजिये फिर इस दर्द का सामना न हो

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  54. आगे की ज़िंदगी खुशहाल रहे उसकी ....
    बस यही एक दुआ

    उत्तर देंहटाएं
  55. क्या कहें बस पढ़ कर मन निःशब्द हो जाता है ऐसे कितनी ही जिंदगियाँ इस खूनी खेल में बर्बाद हो चुकी हैं और उनसे लड़कर मर रहें तो सिर्फ प्यादे ना कि उनके मसीहा !

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  56. आदरणीय डाक्टर साहब,
    बहुत दर्दीली शिकायत है जी,
    नन्हे मोशे और शहीद उन्नी के पिता की.
    बड़ी संजीदगी से पेश की आपने.

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  57. Mumbai me jo kuch hua usse puri manavta sharmshaar hui hai.Shabd asamarth hain vedna ko prakat karne me.

    guptasandhya.blogspot.com

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  58. मोशे की तस्वीर याद करके भी सिहरन होती है, ऐसा लगता है कि मानो हम सब इसके गुनहगार हैं।

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  59. anurag sir , mai ek baat kahana chahta hoon , ki marane walo ki reporting me bhee biasing ho rahee hai . sab log TAJ ka to rona ro rahe hain , but CST par jo log mare , unpar kuch baat nahee , why ?
    yanha bhee rich-poor ki biasing ?
    kya yeh elite class , tab bhee itna rota , jab sirf CST par hi kuch hua hota ?
    vaise bhee yahee elite class , vote dene ke din chuttiya enjoy karta hai , aur sirf america ki baten karta hai ?
    main bhee bahut dukhee hoon , but yeh kahana chahta tha , so likh diya . umeed hai aap anyatha nahee lenge aur ispar apna view likhenge.

    उत्तर देंहटाएं
  60. pahle to maaphi ,post nahi dekh paai,us aur is dard ko salaam

    उत्तर देंहटाएं
  61. v the ppl hv chosen this through vote...we r feeling sorry for our natiion and for ourselves bt this is nt going to help. we need a serious break frm al these trash called big leaders and big party.

    उत्तर देंहटाएं
  62. मुंबई की स्पिरिट ये है की हर बार धमाकों के बावजूद भी मुंबई के पागल लोग अगले दिन, नौकरी करने अपनी रोजी-रोटी जुटाने के लिए निकल जाते हैं. क्योंकि वो अभी तक जिंदा है, और जब तक जिंदा है तब तक तो पेट की खातिर कुछ करना ही पड़ेगा, कोई मुफ्त में आके तो नहीं खिलाने वाला. इसको मुंबई स्पिरिट कह दिया जाता है जबकि ये इस भागते-दौड़ते शह्र की मजबूरी है की आपको रुकने और सोचने का वक़्त नहीं आप बस भागते रहो जब तक कोई हादसा आपके साथ न हो जाये.

    जो असली मुंबई स्पिरिट है वो, जहाँ तक मैंने महसूस की है वो ये कि लोग अपने आप बिना जाने-पहचाने आप की मदद के लिए संकट की घडी में आगे आ जाते हैं. उस दिनकुछ सरफिरे लोगों की घिनौनी हरकत के बाद, आसमां भी बहुत रो रहा था मगर मदद के लिए इन सब की परवाह न करते हुए ना जाने कितने हाथ आगे बढ़ आये थे. अधिकतर फ़ोन लाइन या कहूं तो सभी जाम हो गयी थी, तो ट्विट्टर, फेसबुक पे सैकड़ों लोगों ने मदद के लिए हाथ आगे बड़ा दिए थे, चाहे वो ट्रेफिक के कारण अटके लोगों को उनके घर तक पहुंचाने के लिए अपनी गाडी का इस्तेमाल हो, घंटों कतारों में घर लौटने को बेसब्र लोगों को आस-पास लोगों द्वारा खाना देना हो, या किसी अजनबी को अपने घर में उस एक रात के लिए जगह देनी हो और न जाने क्या क्या................

    मगर हर बार सिर्फ इस स्पिरिट का बहाना देकर, हर साल दो साल में होने वाले धमाकों से इस जज़्बे को कब तक सम्हाला जा सकता है. अगर सरकार ये सब नहीं रोक सकती तो जितनी सुरक्षा वो कसाब को दे रही है उतनी इस शहर के लोगों को भी दे दे. उस दिन या उससे पहले कहीं भी हुए धमाकों में जिन भी लोगों ने अपनी जान खो दी है आखित उनका कसूर क्या है??? ये सवाल था और सवाल ही रह गया है और न जाने कब इसे इसका जवाब मिले.

    उत्तर देंहटाएं

कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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