2009-02-27

"जरा नाखून तराशो इन अल्फाजो के "


बिट्टू की बुआ को गेट तक हम दोनों छोड़ने आये है ...उसका बेटा हाथ जोड़कर हमसे विदा लेता है ...हम बुआ को नमस्ते करते है ..उसके बेटे पर ऑफिस में कोई केस चल रहा है ,वो "छोटे" से उसकी सिफारिश करने आयी है ..
गेट के उस पार गुजरा वक़्त झाँक कर आँखों में देखता है ,उसका हाथ पकड़कर मै फलांग लगाकर .. कई साल पीछे चला जाता हूँ .......बचपन में... जब हमारे यहाँ टी वी नही होता था ...चार भाइयो के हमारे पिता के पास एक सरकारी नौकरी थी ..ओर आधी तन्खवाह गाँव भेजने के बाद ...घर चलाने का मध्यम वर्गीय साहस .. ओर उस पर दुस्हास था अपने घर का सपना ........उपरी कमाई के रास्ते में सरफिरे असूल अड़ जाते ..... न इतने बैंक थे ........ना लोन जैसा अलादीन का चिराग ....हमारी इच्छाओ को अक्सर माँ 'घर बनाना है ' की थपकियों में सुला देती ...
.टी.वी देखने हम अक्सर पड़ोस में .कभी कभी एक या दो दोस्तों के घर ..जाते ..मुझमे ओर छोटे में २ साल का अन्तर है इसलिए दोस्त भी एक थे....एक शाम खेल के बाद बिट्टू के घर कोई कार्टून देखने रुक गए ....२-३ मिनट ही हुए होगे ...उसकी बुआ ने कहा ..ए नीचे बैठो...नन्हे मन को कोई खरोंच लगी ....मै ओर छोटा खड़े हुए ..उसकी बुआ को देखा ओर उस घर से निकल गये ....घर में तीन दिन बाद टी.वी आ गया ...
वक़्त गुजरता रहा ...देहरादून पिता का प्रोमोशन ट्रांसफर...डिपार्टमेंट एक्साम .फिर प्रोमोशन .....वापस मेरठ ..अपना मकान ...पिता क्लास वन ऑफिसर की पोस्ट से रिटायर हुए ...छोटा छतीसगढ़ में जॉब पर लग गया ....फिर बंगलौर....हेड ऑफिस दिल्ली कुछ काम था .....इसलिए दो दिन के लिए घर आया हुआ है.....
वापस लौटता हूँ......छोटा उन्हें . जाते देख रहा है....... चाय का कप उसके हाथ में आ गया है....होठो पे लगाये कहता है ....."याद है भाई इसने हमें नीचे बैठने को कहा था "....पच्चीस साल.....मै उसको देखता हूँ
२५ साल से ये खरोंच उसको भी कभी -कभी चुभन देती है"



आज की त्रिवेणी

उठायो दोनों सिरे ओर कस के खींचो
ओर बाँध दो एक ओर गिरह .....

अब ये रिश्ता ओर कई साल चलेगा

72 टिप्‍पणियां:

  1. शब्दों की चुभन भुलाए नहीं भूलती है ...यह अक्सर दिल में यूँ ही चुभ जाती है ..पर रिश्ते तो चलते रहते हैं ..बहुत खूब लगी आज के किस्से पर यह आपकी त्रिवेणी

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  2. सच ही तो है..........कई बाते उम्र भर साथ चलती रहती हैं,
    कुछ फूल बन कर, कुछ खरोंच बन कर. अच्छा लिखा है

    आपकी त्रिवेणी हमेशा की तरह नया पन लिए, बहुत सुन्दर

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  3. बहुत अच्छा लिखा है अनुराग जी...मेरा ही एक शेर इसी बात से मिलता जुलता मुझे याद आ गया...लगे हाथ सुन लीजिये...

    जब कुरेदोगे उसे तुम, फिर हरा हो जाएगा
    ज़ख्म अपनों का दिया,मुमकिन नहीं भर पायेगा

    त्रिवेणी कमाल की है..

    नीरज

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  4. २५ साल से ये खरोंच उसको भी कभी -कभी चुभन देती है"

    bas ye line ne sab bayan kar diya,bachpan ke mile ghav bhi hare ho jate hai kabhi,waqt waqt ki baat hai,paasa ka uska tha,aaj aapka,sawedanashil post,aur triveni lajawab,rishtey bandh jaye pake kaise chutenge.

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  5. shabdon dvara lage huye kharonch sharir ke kharonchon se juda hote hain.. aur kabhi bhi nahi mitate hain..
    aaj ki post badhiya lagi.. pichhle sabhi post se alag hat kar..

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  6. अनुराग जी,
    कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं जिनको आदमी भुलाए नहीं भूलता। वैसे ऐसी बुआएं और चाची-ताईयां हर जगह हर मोड़ पर मिलीं हैं; पात्र भले ही बदल जाएं लेकिन किरदार वही होता है।

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  7. ऐसी ही कितनी खरोंचे
    खिंची हैं, कितने ही दिलों पर...

    ख़ुशी तो यह है की अपना दिल भी इनमे से एक है...
    उम्दा रचना....
    मीत

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  8. वाकई कुछ शब्दों की खराशें जिंदगी भर चुभती हैं. कुछ ऐसे वाक़ये हम सब अपने दिल में छुपा के रखते हैं मरहमपट्टी करते रहते हैं, पर कई बार ऐसे ही टाँके टूट जाते हैं और जख्म रिसने लगते हैं.

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  9. इन शब्दों को पढ़ा तो खींची चली आयी ...
    घर चलाने का माध्यम वर्गीय साहस......उपरी कमाई के रास्ते में सरफिरे असूल ...घर बनाना है की थपकिया ऐसा हो नहीं सकता की आपकी बात में कोई अंदाज न हो .हमें याद है हमरे छोटे भाई को एक बार माकन मालिक ने भी कहा था की इसके पैर धुलवा के लाया करो हमने ६ दिन में कह के टी वी मंगाया था ,आज आपको पढ़के ऐसा लगा सबकी जिंदगी एक सी है.
    aap sanketo me kai saari baate kah jate hai .

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  10. खरोंचे ही तो मजबूत करती है ऐसी कई खरोंचे मेरे भी मन मे है .

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  11. अतिउत्तम त्रिवेणी में डुबकी लगाना भाने लगा है,
    बहाव रोकियेगा नहीं

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  12. उठायो दोनों सिरे ओर कस के खींचो
    ओर बाँध दो एक ओर गिरह .....

    अब ये रिश्ता ओर कई साल चलेगा
    saarthak triveni doctor sahab

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  13. wakat bahut taktwar hai Anurag ji .... khronch chubhti bhi hai .....wakt un par marham bhi laga deta hai...bahut pyaare lafjon se aapne post ko likha hai

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  14. भावपूर्ण प्रस्तुति। पढ़कर बचपन की बहुत सी यादें सामने आगई। आप संस्मरण बहुत अच्छा लिखते हैं। बधाई।

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  15. Sachmuch dil me chubhe kuchh kante hamesha jeete rahte hain....

    aapki post padhkar turant dimaag kahin aur lagana .....mushkil ho jata hai.

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  16. कितने ही माध्यम वर्गीय परिवार ऐसे हैं जिनके घरों में टीवी, फ्रिज ऐसे ही किसी घटनाक्रम के बाद आया है ....हमारे घर में भी टीवी ऐसा ही कुछ हो जाने पर आया था ..... लेकिन जो दिल को चुभ जाता है वो कभी कभी जीवन पर्यन्त दिल को याद रहता है

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  17. bahut achha likhte hain aap..
    pahle TV sabke gharo me ese he aata tha..
    triveni to gajab he hai..
    mai to pahle vahi padhta hun..

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  18. "karoge yaad to, her baat yaad aayegee...
    Gujarte waqt ki heena, yumhee,
    mahak jayegee "

    Bahut khoob yaad kiya,
    insaan , kitne aise
    phool aur kaante
    daman mei samaye,
    chalta rehta hai ...

    Fir bhee, asha hai ki us Bua ka beta , riha ho gaya hoga ...

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  19. "याद है भाई इसने हमें नीचे बैठने को कहा था " पढ़कर कुछ अजीब सा लगा!

    त्रिवेणी शानदार है!

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  20. aisi hi kahi par kuch chubhi hui baate hame likhne par majbur karti hai.....kai baar...hai na.....
    :
    kai baar aisa kyu lagta hai ki baatne se dard ghat-ta nahi......bas kuch sira aur fail jata hai....

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  21. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  22. फ़िर से आजाओ देहरादून। देखते हैं अब कौन करता है ट्रांसफर। प्रमोशन ? हां वो चलेगा।

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  23. वक्त की मार अच्छो को पछाड देती है, और शब्दों की चुभन मन में खंरोच छोड जाती है, जो बरसों बाद भी टीस देती रहती है.

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  24. अनुराग जी कुछ खरोंचे जिन्दगी भर नही भरती ! ओर पल पल उस समय की याद दिलाती है, बहुत कुछ याद दिला दिया आप ने.
    धन्यवाद

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  25. Anuraagji, aapki ye rachna aur iss per diye comments padh kar mere mann mein uthal-puthal mach gayi hai.
    shayad maine bhi aisi chubhan di hai kisi ko kya ?
    mujhe khud aisi kai baaten jo abhi tak chubhti hain yaad aa gayi.

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  26. अक्सर कई बातें सालों तक चुभती रहती हैं.
    इन्हें भूलना नामुमकिन होता है.
    लेकिन वक़्त कब करवट बदल ले पता नहीं -इस लिए ही तो कहते हैं न कभी गलती से भी किसी का दिल नहीं दुखाना चाहिये ..न ही किसी का अपमान अनजाने में भी करना चाहिये...
    वैसे ,उन पडोसी को भी यह बात कभी भूली तो नहीं होगी.

    त्रिवेणी हर बार की तरह अच्छी लगी..एक कसक लिए हुए है आज!

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  27. अनुराग जी ऐसी खरोंचे हर दिल में लगी होती है। और हमारा दिल तो ऐसी खरोंचो से ..... पर जिदंगी की जद्दोजहत में खरोंचो के जख्म हम भूल जाते है पर कुछ मोड़ो पर ये फिर से मिल जाते और कुछ मोड़ो पर ये हरे हो जाते है। कल आपकी पोस्ट आई तो मैंने ही सबसे पहले ही पढी थी पर एकदम ही इससे दूर भाग गया था यही सोचकर कि कही मैं भी पीछे गया तो ....... । और आज की त्रिवेणी सच बहुत ही सार्थक लग रही है। वैसे अनुराग जी ऐसी गिरह लगानी हमें भी सीखा दो। मैं भी त्रिवेणी लिखना चाहता हूँ।

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  28. दर्द जब सिवा हो तो दवा बन जाता है. ऐसी दवा दूसरों के काम भी आता है, जरा हल्का खर्च कीजिये, क्या पता कल हो न हो.
    बहुत शानदार लगी आपकी लेखनी. आभार.

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  29. ऐसी ही कितनी खरोचें अब भी जिस्म पर किसी ना किसी निशान के रूप में होगी..

    घर चलाने का मध्यम वर्गीय साहस
    उपरी कमाई के रास्ते में सरफिरे असूल
    घर बनाना है ' की थपकिया


    शब्द निहाल हो जाते होंगे.. आपकी पोस्ट में आकर... कमाल है..

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  30. २५ साल पुरानी अगर अभी भी चुभन दे रही है तो इसे खरोंच नही नासुर कहिये, आशा है अब इस पर मरहम लग गया होगा।

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  31. उठायो दोनों सिरे ओर कस के खींचो
    ओर बाँध दो एक ओर गिरह .....
    अब ये रिश्ता ओर कई साल चलेगा

    प्रतीकों के माध्‍यम से बढी गूढ बात कह दी है आपने।

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  32. अमूमन आपकी किसी पोस्ट पे दो चक्कर लगना आदत सी हो गई है ,टिप्पणिया पढ़ना भी जैसे इन आदतों में है ,दुबारा कमेन्ट अक्सर नही करती पर आज फ़िर इस पोस्ट को दुबारा पढा साथ लगाए चित्र को देखा ,ओर लोगो की टिप्पणिया पढ़ी ,कई लोगो ने इसे टी.वी आने से जोड़ा मै सोच में पड़ी आख़िर आप क्या कहना चाहते है ?
    क्या वक़्त की तरफ़ इशारा ?बचपन के बहाने व्यवहारिक ज्ञान की कोई सीख? ये भी इत्तेफाक था की अपने सोचा ओर भाई ने भी वही कहा? क्या आख़िर में त्रिवेणी का इस किस्से से कोई सम्बन्ध है ?यदि है तो लावण्या जी के सवाल का उत्तर मुझे मिल गया यदि नही तो जवाब शायद विस्तार से सुनना चाहूंगी .वैसे आपकी त्रिवेणी अपने साथ कई ओर दरवाजे खोल गई है .

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  33. अक्सर बचपन मे कही-सुनी बातें दिल और दिमाग पर गहरा असर छोड़ती है और ये बातें कभी भी नही भुलाई जाती है ।

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  34. ....."याद है भाई इसने हमें नीचे बैठने को कहा था "....पच्चीस साल.....मै उसको देखता हूँ
    २५ साल से ये खरोंच उसको भी कभी -कभी चुभन देती है"
    " bhavnatmk str pr dil ko barbas khinchti hui ye panktiayn jane bachpan ki kitni yado or ghatnao ko saamne lee aati hai.....or fir baat jb nanhe dil ki ho bachpan ki ho to us bhole se man pr ankit is trh shabdo ki chubhan shayad hi kabhi mit paye.."

    Regards

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  35. हमारी इच्छाओ को अक्सर माँ 'घर बनाना है ' की थपकियों में सुला देती ...

    Vakai mai Anurag ji kuchh baaten bhulaye nahi bhulti hai...

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  36. उम्मीद है त्रिवेणी छोटे ने भी पढ़ी होगी....
    बस्स.....

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  37. कुछ खरोंचें ऐसी छुप जाती हैं कि सालों तक उनके अस्तित्व का पता ही नही चलता पर सही वक्त पर ऐसे टीसती हैं मानों कल ही लगी हों ।
    त्रिवेणी का संदेश बहुत बढिया ।

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  38. ये टी वी के लिए नीचे बैठना तो हमने भी झेला है और अभी तक याद है तो चुभन भी है और शायद हमेशा रहेगी भी ।

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  39. अनुराग जी आपके लिए विशेष (आपकी की हुई टिप्पणी के के लिए ): -

    कोई न हमसे पूँछे
    कि गम हमें क्या है
    वरना हम पूंछ बैठेंगे
    कि इस गम की दवा क्या है

    जिस गली से हम हैं गुजरे
    उस गली का पता
    हम किसी को देते नहीं

    डरते हैं कि कोई आकर
    हमसे ना पूंछ बैठे
    कि बच्चू आखिर माज़रा क्या है

    उत्तर देंहटाएं
  40. iasi hi kisi ek ghatan ke baad hamare ghar me bhi T.V. ayaa tha...!

    triveni hamesha ki tarah samvedansheel

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  41. सही कह रहे हो अनुराग जी,
    कभी कभी कोई बात दिल में चुभ जाती है. लेकिन समय बीतने पर कभी तो चुभी रह जाती है, कभी कुंद भी पड़ जाती है; लेकिन मिटती नहीं.

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  42. दरअसल बाल मन बहुत संवेदनशील होता है -और आप लोग ज्यादा ही संवेदनशील हैं यह इस संस्मरण से साबित होता है!

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  43. १९८२ में दिल्ली का एशियाड देखने इसी तरह हम अपने पड़ोसी के घर जहाँ नया रंगीन टीवी आया था, जाया करते थे और चुपचाप पलंग के नीचे दरी पर बैठ जाते थे चाहे ऊपर की जगह खाली ही क्यूं ना हो । पर सारे बच्चों का वही स्थान था इसलिए उस स्थिति को स्वीकारने में किसी चुभन का अनुभव नहीं किया था। शायद सिर्फ मुझे सिंगल आउट किया जाता तो वो काँटा कहीं न कहीं जरूर चुभता रहता। टीस दब सक्ती हैं दफ़्न नहीं होतीं।

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  44. काश ! शब्दों को जादू मे बदलने का हुनर आपकी तरह मुझमे भी होता । मुझे जलन हो रही है । हमारी इच्छाओ को अक्सर माँ 'घर बनाना है ' की थपकियों में सुला देती . बहुत ही बढ़िया लगा

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  45. शब्दों की इस अज़ब जादूगरी पे नमन डाक्टर साब....
    त्रिवेणी क्लाईमेक्स तो बस उफ़्फ़्फ़्फ़्फ़्फ़

    हाँ इतनी सुंदर रचना में टंकण की गलती जरा एकदम से खटक जाती है

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  46. हमारी इच्छाओ को अक्सर माँ 'घर बनाना है ' की थपकियों में सुला देती ...

    वाह!

    what goes it comes around...superb!

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  47. bahoot achha likha apne sabdo ka sahi estamal jaruri h jindgi bahr sath rahte h achha ho to bhi or chubh jay to or jayda yad rahte h . rishte bandhne s chalte h...........उठायो दोनों सिरे ओर कस के खींचो
    ओर बाँध दो एक ओर गिरह .....

    अब ये रिश्ता ओर कई साल चलेगा

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  48. beautiful doctor....

    Yaden... yaad aati hain...

    yeh tees hai jo baar baar uthti hai.

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  49. सच कहा अनुराग जी कभी कभी शब्दों की चुभन बहुत सालती है और ये चुभन जिन्दगी भर सालती है. दिमाग कुछ भूलता नहीं . हमारे साथ भी बिलकुल ऐसा ही वाकया हो चुका है. आज भी याद आता है तो एक फांस सी चुभ जाती है ..घर बनाना है जैसी थपकियाँ आजकल हम मिया बीवी भी एक दूसरे को दे रहे हैं...

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  50. अपनी घटनाओं को आपने बेहद संवेदनशील तरीके से बयां किया है । जिन्दगी में वाकया कभी आ जाता है जब एक बाद चुभे तो उसका मलाल जिन्दगी भर रह जाती है । बढ़िया है । इस बार का मेरा पोस्ट भी पढ़े । आभार

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  51. उठायो दोनों सिरे ओर कस के खींचो
    ओर बाँध दो एक ओर गिरह .....

    अब ये रिश्ता ओर कई साल चलेगा

    too good :)

    zindagi mein kuch baatein aisi hoti hain jo hum chahkar bhi bhool nahi paate....jaise har chubhan apna ek nishaan chodd jaati ho. waqt ki lehrein us chubhan ko kum tou kar deti hain, par hamesha ke liye mita nahi paatin. rishte bhi kuch aise hi hote hain....toot bhi jaayen...tou bhi apna nishaan chhodd jaate hain hamare dilon par...aur apne paas koi delete button bhi nahi hai un yaadon ko mitaane ka.

    उत्तर देंहटाएं
  52. कभी कभी कुछ तल्खिया ....जेहन की हार्ड डिस्क में एक खास जगह स्टोर रहती है .उनमे डिलीट का आप्शन नहीं होता ...बिट्टू की ऐसी कई बुआये अलग अलग शक्लो में अलग अलग नामो से मौजूद है .शायद मध्यमवर्गीय चरित्र का ही एक चेहरा ये भी है ...जो तमाम विकास ओर टेक्नोलोजी के बावजूद अपनी इस इंसानी आदत को आज भी कायम रखे हुए है .हो सकता है किसी दुसरे के लिए इन्ही बिट्टू बुआ का संस्मरण सुखद हो.....क्यूंकि हर इंसान के कई शेड्स होते है ग्रे भी ...महत्वपूर्ण बात है इन तल्खियों को अपने ऊपर हावी न होने देना ...जो मैंने सोचा बस वही छोटे ने कहा ..सिर्फ कहा ..उसमे अहं नहीं पीडा थी ...ओर गुजरते वक़्त का फैसला भी.......इत्तिफकान उसी वक़्त इतने सालो बाद .जबकि इतने सालो हम दोनों के दरमिया इस बारे में कोई बात नहीं हुई....जाहिर था अल्फाज अपना असर रखते है
    बिट्टू की बुआ का काम हो गया ...वैसे भी आप कितने बख्तर बंद पहन ले वक़्त का नश्तर आपको चुभेगा ही...कभी कभी हम भी उस ओर खड़े होते है....बुआ के पाले की ओर...

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  53. कभी कभी कुछ तल्खिया ....जेहन की हार्ड डिस्क में एक खास जगह स्टोर रहती है .उनमे डिलीट का आप्शन नहीं होता ...बिट्टू की ऐसी कई बुआये अलग अलग शक्लो में अलग अलग नामो से मौजूद है .शायद मध्यमवर्गीय चरित्र का ही एक चेहरा ये भी है ...जो तमाम विकास ओर टेक्नोलोजी के बावजूद अपनी इस इंसानी आदत को आज भी कायम रखे हुए है .हो सकता है किसी दुसरे के लिए इन्ही बिट्टू बुआ का संस्मरण सुखद हो.....क्यूंकि हर इंसान के कई शेड्स होते है ग्रे भी ...महत्वपूर्ण बात है इन तल्खियों को अपने ऊपर हावी न होने देना ...जो मैंने सोचा बस वही छोटे ने कहा ..सिर्फ कहा ..उसमे अहं नहीं पीडा थी ...ओर गुजरते वक़्त का फैसला भी.......इत्तिफकान उसी वक़्त इतने सालो बाद .जबकि इतने सालो हम दोनों के दरमिया इस बारे में कोई बात नहीं हुई....जाहिर था अल्फाज अपना असर रखते है
    बिट्टू की बुआ का काम हो गया ...वैसे भी आप कितने बख्तर बंद पहन ले वक़्त का नश्तर आपको चुभेगा ही...कभी कभी हम भी उस ओर खड़े होते है....बुआ के पाले की ओर...


    yeh alfaz mere hai. aur haan akhiri paragraph imandaari se kubul karne ke liye salute.

    hum bhi doodh ke dhule nahi hai ki har dusre ke diye har zakhm par ohh-ohhh kar ke mahan ban jayen...

    Nida Fazli saheb ki ek nazm yaad aa rahi hai ki...

    TUMHEN JO DHAKEL KAR GAYA HAI USHE BURA NAA KAHO,

    yeh wohi sachachi hai ki agar aap doctor naa hote toh aapki jageh koi aur hota. hum bhi dharti par bojh hai kisi ke hisse ka aanaz kha rahe hai toh paani bhi pee rahe hai...

    yeh talkhiyan aaj pehli baar nikal raha hoon. woh bhi aapke sirf last paragraph ki imandaari par.

    kuch dino pehle aapne mere blog par ek comment diya tha. mujhe garv hua tha aur thora guman bhi ki ek behtarin blogger ne ushe saraha.

    aapka
    Saagar

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  54. डाक्‍टर साहब जी बहुत ही अच्‍छा लिखते हो इस बात के बहुत ही साक्षी हैं
    आपकी लेखनी के कायल हैं हम लेकिन आज घायल भी कर दिया आपने अच्‍छा लिखा है और साथ में जो इमेज लगाई है माशाअल्‍लाह बहुत खूब

    (देरी से आने के लिए माफी चाहता हूं)

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  55. अनुराग जी, मासूम मन पर लगे ये जख्म जरा सी नमी से हरे हो जाते हैं। यूं ही तो नहीं कहा गया होगा कि शब्दों के जख्म तीरों के जख्मों से ज्यादा खतरनाक होते हैं।

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  56. सच कहा आपने
    हम सभी को अपने बहुत से अल्फाजों के नाखून तराशने कि ज़रुरत है ताकि फिर किसी मन पर खरोंच न पड़े!
    -------------
    लेकिन एक बात है! आज आपकी त्रिवेणी सीधा दिल में उतर गयी बोले तो घायल कर दिया!
    कोई दवा भेजियेगा!

    उत्तर देंहटाएं
  57. aapka blog bahut hi badhiya hai. main iska link banaa lena chahti hoon. ek aur jankari aapse chahiye ki aap apni TRIVENI likhte hain to ye BOX kis tarah banata hai. kripya bataiyega.

    उत्तर देंहटाएं
  58. संवेदनापूर्ण लगा यह आलेख। अनूप जी की टिप्पणी भी!

    कुछ संवाद लम्बे अरसे तक अपना असर रखते हैं, कभी कभी ऐसे संवाद / घटनाएं चुभन बनी रहती हैं, तो कभी यही उन्नति व प्रगति की प्रेरणा-स्रोत भी बनती हैं और उसके लिये ऊर्जा भी प्रदान करती हैं। जैसे गाँधी जी को फर्स्ट क्लास में सफर न करने देना... (शायद)

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  59. चुभी हुई बातें बड़ी मुश्किल से निकलती हैं। त्रिवेणी बहुत सुंदर है, हमेशा की तरह।

    उत्तर देंहटाएं
  60. anurag sir.. bilkul sahi baat kahi.. kai baar faans aisi lagti hai ki waqt ka marham bhi wo ghav nahi bhar pata.. duniya yahi hai sahab.. ugte sooraj ko hi salaam kiya jata hai.. behad khoobsurat triveni..

    उत्तर देंहटाएं
  61. शरीर का घाव भर जाता है, पर बोली का घाव जिंदगी भर पीछा नहीं छोडता।

    उत्तर देंहटाएं
  62. अनुराग भाई, इस अजीब-ओ-गरीब उम्मीद के साथ, कि काश इस देश के सारे डाॅक्टर आपके जैसे हो जाएं, अपना एक शेर आपको भेंट करुंगाः-

    दर्द को इतना जिया कि दर्द मुझसे डर गया,
    और फिर हंस करके बोला, यार मैं तो मर गया।

    उत्तर देंहटाएं
  63. वाकई शब्दों के खरोचों से बिंधा हुआ जख्म ताउम्र नहीं भरता है।

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  64. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  65. ."याद है भाई इसने हमें नीचे बैठने को कहा था "....पच्चीस साल.....मै उसको देखता हूँ
    २५ साल से ये खरोंच उसको भी कभी -कभी चुभन देती है"....इस चुभन से हम सभी को सीख लेनी चाहिए की
    हम ऐसी चुभन किसी को न दें ....खास कर
    बच्चों का मन तो बहोत ही कोमल होता है
    मुझे याद है हम भी बुआ के घर जाया करते थे
    थे ...बुआ का बहोत बडा बंगला ...ढेरों
    नौकर चाकर ...आँगन में एक बडा सा
    झुला ...पर उसमे हमें बैठने की इजाज़त नहीं
    थी ...उनकी एकलौती बेटी उस पर झूलती ......!!

    Haan ab ye rista kai saal aur chlane ke liye shukriya....!!

    उत्तर देंहटाएं
  66. sir, sorry for late arrival, tour par tha..

    main kya likhun is post ke baare me.. main nishabd hoon , bachpan aur jawani ki kai ghatnaayen ,aankho ke saamne se kisi film ki tarah gujar rahi hai ..
    i am speechless. kuch nahi kahunga ..man bhaari kar diya aapne ,ye padhwa kar.

    meri nai poem padhiyenga .

    उत्तर देंहटाएं
  67. bahut achha likhaa hai aapne...
    yakeen nahi hota paDh kar ke ye aapki kalpana hai..

    Really too good...aap ka blog mujhe aapki lekhni ka addict banaata jaa rhaa hai..

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  68. "याद है भाई इसने हमें नीचे बैठने को कहा था"
    यह वक़्त है
    बदलते रहना इसकी फितरत है

    मुझे पता है की छोटा फिर भी बुआ का काम (अगर सही है तो) कर देगा

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कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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