2009-03-16

कितनी नफ़ीस बुनावट थी....... इंसान ने उधेड़ दी दुनिया.

बनारस के उस रस्ते पे शुरुआत में सीधे हाथ पर में एक गुरुद्वारा है...थोडा आगे चलने पर चर्च .....सबके जुदा जुदा भगवान् है ..मै अपने वालो की राह पर हूँ...रास्ते में नंगे पैर चलते कई लोग दिखते है ....मालाओं ओर पूजा का सामान बेचती ढेरो दुकानों को नजर अंदाज करते हुए ..कोई साउथ इंडियन परिवार है ...कुछ बुदबुदाता हुआ ..लकडी के फ्रेम में बनी उस चौरस मशीन में मुझसे आगे ....एक पीठ पर लगभग बारह साल की लड़की है ...शायद उसका पिता है....तकलीफ को किसी अनुवाद की आवश्यकता नहीं होती .... उस लड़की के चेहरे से पढ़ी जा सकती है ...... मशीन की वही जानी पहचानी सी आवाज .... सीने में जमा दर्द मगर डिटेक्ट नहीं करती ....कतार में लोग है...यंत्रवत चलते हुए ...अजीब बात है मेरा मन भगवान् में नहीं है ....पांच या दस सेकंड में उसकी मूर्ति के सामने लगभग धेकेला गया हूँ... बंदूको के साये में हिफाजत से घिरे भगवान् से मै क्या मांगू ?फिर धकेल कर आगे कर दिया हूँ ...आगे .कोई पंडा एक सौ एक का दान मांगता है... एक रुपया नहीं है ...सौ के नोट को वो मुट्ठी में दबा लेता है...दाये बाये लोग झुके हुए है ....अजीब बात है अपने ही देश में अपने ही भगवान् को बंदूको के साये की जरुरत है .हम कहाँ जा रहे है ?
बाहर सूरज की रोशनी में घाट बेतरतीब सा नजर आता है नाव में एक ओर परिवार है...तीन साल की उनकी बिटिया को मेनिंगो -मायलोसिल की एक बीमारी है ..अपनी उम्र से ज्यादा अब तक उसके ओपरेशन हो चुके है ...उसकी दादी गंगा का पानी उसके मुंह में डाल रही है.. ...मै गंगा का पानी देखता हूँ......मटमैला सा.....नाव का माझी बताता है रविदास घाट का पुनः - निर्माण हुआ है इस सरकार के आने से ...वो क्या चीज है जो इन लोगो कों
बी एच .यू के मेडिकल से जुदा इस मंदिर ओर इस नदी की ओर खींच लाती है ....आस्था ....श्रद्धा ...या हालात की बेबसी में कोई उम्मीद की चाह? तुम कहाँ हो ईश्वर ????




उन्नीस साल की उम्र जाने की नहीं होती है ,इस तरह जाने की तो ...कोई उम्र नहीं होती है....हम ओर आप पैसो से बच्चो को मेडिकल ओर इंजीनियरिंग में दाखिला तो करवा सकते है पर इंसानी जज्बे ओर इंसानी जान की कीमत क्या होती है ये नहीं सिखा सकते....टेक्नीकल भाषा में कुछ लोग इसे रेगिंग कहे पर आम भाषा में पीट पीट कर मारे जाने को मर्डर कहते है ..ओर ये एक कच्ची उम्र का कत्ल ही है .....वैसे भी मै उन लोगो को इस पेशे के लायक नहीं समझता जिनमे इंसानी सवेदना नहीं है...मै शर्मसार हूँ की मै भी उस समाज का हिस्सा हूँ जहाँ एक निरीह निर्दोष बच्चा अपनी जान बचाने की गुहार लगातार लगाता है ओर हम इसे प्रोफेशनल कालेजो में होने वाली एक स्वाभाविक प्रक्रिया मान कर नजर अंदाज करते है....


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अमन कचरू १९ सल् डॉ राजेंद्र प्रसाद मेडिकाल कॉलेज , टांडा , काँगड़ा हिमाचल जिसकी उसके सीनियरों ने शराब पीकर कई दिनों तक इतनी पिटाई की जिससे होली वाले दिन उसको असमय काल के ग्रास में जाना पड़ा .



73 टिप्‍पणियां:

  1. अमन के बारे में सुन कर बहुत दुःख हुआ था अगले ही दिन फिर से आंध्र प्रदेश की एक लड़की ने खुद को रेगिंग से तंग आ कर मारने की कोशिश की .. पर यह सिलसिला थमता कहाँ है ?
    भगवान तो अब बंदूकों के साए में ही मिलते हैं हर जगह ..उनको भी अब इस की आदत हो गयी होगी .

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  2. हमारे सीनियर बहुत ही नेक और सज्जन इंसान थे ....ऐसा कभी नहीं हुआ कि उन्होंने किसी पर हाँथ भी उठाया हो .......लेकिन जब तब में अन्य दूसरे इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज की बातें सुनता हूँ तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं ........

    जहाँ तक भगवान का सवाल है ...लोग अपने अपने स्तर पर उसे मानते हैं ...हाँ लेकिन में लोगों में उनके प्रति सच्ची श्रद्धा नहीं देखता .... मैं तो आज तक असमंजस में रहता हूँ कि भगवान हैं भी या नहीं ........

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  3. सच कहा आपने इन संवेदनहीन लोगों को डाक्टर बनने का कोई अधिकार नहीं होना चाहिए,जो जान की कीमत नहीं जानते...इतने नियम कानून बन गए,पर पता नहीं यह रैगिंग की काली छाया शैक्षणिक संस्थानों पर से कब हटेगी....
    बहुत ही अफसोसनाक स्थिति है. .

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  4. तकलीफ को किसी अनुवाद की आवश्यकता नहीं होती .... यदि पेटेन्ट न करवाया हो, तो गाहे बगाहे मैं भी इस्तेमाल कर लिया करूँ ?



    तुम कहाँ हो ईश्वर ?
    मैं यहाँ हूँ बेटा.. तुम्हारे मन में बैठे डर में..
    परिस्थितियों से न लड़ पाने की अवशता में..

    संप्रति सजा हुआ हूँ, इस डर और असहायता को दूर करने के महन्तों की सजी बजी दुकानों में..
    कबीरवा नम्बर एक बेवक़ूफ़ था.. कहता है, "मोकों कहाँ ढूँढ़े रे बंदे.. "

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  5. हमेशा की तरह शानदार! सवाल का जवाब खुद ही खोजना पड़ेगा. वो इसलिए कि भगवान इतने नज़दीक हैं कि उन्हें सवाल सुनाई दिया ही होगा.

    अमन कचरू के साथ जो हुआ, उसपर क्या कहें? जिन्होंने उसे मारा वे बेचारे डॉक्टर बनने वाले हैं. पढ़े-लिखे लोग हैं. लेकिन शायद पढाई-लिखाई इंसानियत पर भारी पड़ गई.

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  6. और हाँ, अमन कचरू के लिये बड़ा ही अफ़सोस है, क्रोध भी है । रैगिंग बहुत ज़रूरी है.. नये माहौल में अनौपचारिकता उत्पन्न हो सके, ऎसा इसीलिये होता है .. पर मार-कुटाई ? हद्द है, भई !

    पर, एक बात बताऊँ.. अमन जी यदि सकुशल फ़ाइनल निकाल भी लेते, तो नर्सिंग होम \ क्लिनिक \ अस्पताल में बलवा होने पर यही करते !
    डाक्टर बनने वह निज की महत्वाकाँक्षा के चलते नहीं पहुँचते थे, तिस पर रैगिंग के नाम पर यह अनर्थ !!

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  7. उन्नीस साल की उम्र जाने की नहीं होती है ,इस तरह जाने की तो ...कोई उम्र नहीं होती है....हम ओर आप पैसो से बच्चो को मेडिकल ओर इंजीनियरिंग में दाखिला तो करवा सकते है पर इंसानी जज्बे ओर इंसानी जान की कीमत क्या होती है ये नहीं सिखा सकते....टेक्नीकल भाषा में कुछ लोग इसे रेगिंग कहे पर आम भाषा में पीट पीट कर मारे जाने को मर्डर कहते है ..ओर ये एक कच्ची उम्र का कत्ल ही है .....वैसे भी मै उन लोगो को इस पेशे के लायक नहीं समझता जिनमे इंसानी सवेदना नहीं है...मै शर्मसार हूँ की मै भी उस समाज का हिस्सा हूँ जहाँ एक निरीह निर्दोष बच्चा अपनी जान बचाने की गुहार लगातार लगाता है ओर हम इसे प्रोफेशनल कालेजो में होने वाली एक स्वाभाविक प्रक्रिया मान कर नजर अंदाज करते है....********
    ********मेनिंगो -मायलोसिल की एक बीमारी है ..अपनी उम्र से ज्यादा अब तक उसके ओपरेशन हो चुके है*********
    *****यह बीमारी किसको है। बिटिया को या रैग्ंिाग करने वाले नान-इंसानों को ? मित्र उदयप्रकाश की कहानी ‘‘मैंगोसिल’’ याद आती है।********
    !!!!!!??????तुम कहाँ हो ईश्वर ????!!!!!!

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  8. ye ragging ka rakshas na jane aur kitne masoom logo ki jaan lega,bahut sharamnak baat hai,kaise kisi ki jaan le sakte hai,sahi kaha jinhe bhawana nahi unhe doc banane ka koi hak nahi,vaise banduk ke hifazat mein baithe bhagwan kya murade puri kar sakenge,unke mann bhi kitni dehshat hogi.dinvaisehi udaas tha,ab khamosh ho gaya.

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  9. "अजीब बात है अपने ही देश में अपने ही भगवान् को बंदूको के साये की जरुरत है .हम कहाँ जा रहे है ?"


    आपने बहुत सही कहा अनुराग जी,आज भगवन बंदूकों के साए में हैं और मनुज संवेदना से कोसो दूर हो गया है ...एक उन्नीस साल के छात्र की रैग्गिंग से मौत और एक लड़की का रैग्गिंग से तंग आकर खुदकुशी करने का प्रयास...न जाने हम किस और जा रहे हैं !!!आपकी पोस्ट ने फिर भावुक कर दिया !!!!

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  10. क्या कहूं अनुराग जी, कुछ कहते नहीं बनता।

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  11. अनुराग जी अमन के बारे में बड़े ही बेबाकी ढंग से कहा आपने बात .. सच में हम सभी शर्मशार है इस तरीके के घिनोने कार्य से ...

    अर्श

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  12. हम सभी शर्मशार है इस तरीके के घिनोने कार्य से ... आपकी पोस्ट ने फिर भावुक कर दिया.....

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  13. मानवीय संवेदना को जैसे आप ग्रहण करते हैं उस से भी अधिक तीव्रता से औरों तक पहुँचा देते हैं।
    अमन की मृत्यु केवल हमारे शिक्षण संस्थानों, विद्यार्थी जगत पर ही धब्बा नहीं है वह पूरे समाज पर एक कालिख की तरह चिपका है। जिन्हों ने उस का कत्ल किया उन के माँ-बाप अब उन्हें बचाने की फिक्र और जुगाड़ में होंगे। लेकिन उन का क्या जिन का एक होनहार दीपक उन के होनहारों के खेल में बुझ गया। क्योर एक संस्था है जो रेगिंग की समाप्ति के लिए काम कर रही है। आएं और उस से जुड़ जाएँ। अनवरत पर उस की जानकारी देता हूँ।

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  14. जाने की कोई उम्र नहीं होती अनुराग जी, आप तो मेडिकल प्रोफेसन से जुड़े हैं. जाने क्या-क्या देखना होता होगा. हाँ असमय मृत्यु दुःख देती है. कल मेरे मोहल्ले में एक नव प्रेम-विवाहिता कर एक्सीडेंट में मर गयी. क्या करें, किसको दोष दें.

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  15. शायद इस बेबसी को आस्था का नाम देना ही उचित होगा-जब कुछ बच नहीं रह जाता तो यही मार्ग बच रहता है.

    अमन कचरु के बारे में जब से समाचार पत्र में पढ़ा तभी से मन कुछ ठीक नहीं-जब जब भी याद करता हूँ.

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  16. बहुत ही शर्मनाक घटना है क्या कहे. कुछ कहते नहीं बनता . रेगिंग के कारण कई छात्र आत्महत्या कर रहे है . घटनाए नित प्रतिदिन बढ़ती जा रही है.

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  17. डॉ. साहब आपके लेख पर मैं निशब्द : हूँ .

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  18. afsos hota haen jab bhi easa kuch ghataa haen kuch din baad phir sab normal hota haen ham sab imune hogaye haen bhavnashunay

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  19. उस दौर से गुजरे हैं हम भी और उस प्रथा को कभी समर्थन नहीं देता हूं मैं।

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  20. आँखें नाम हो आयीं...मौत की विभीषिका को बहुत करीब से देखा है मैंने भी...फिर से मन अशांत हो गया.

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  21. संवेदना का आद्यन्त देख लिया । धन्यवाद ।

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  22. समझ नही आता आदमी की सवेंदनाएं कहाँ दफन हो रही है। रोज कई घटनाएं मिल जाती है देखने के लिए...
    तकलीफ को किसी अनुवाद की आवश्यकता नहीं होती।
    सच्ची बात कह दी।
    तीन साल की उनकी बिटिया को मेनिंगो -मायलोसिल की एक बीमारी है ..अपनी उम्र से ज्यादा अब तक उसके ओपरेशन हो चुके है
    कुछ सवालों के जवाब नही होते है शायद? जब ही तो पूरी जिदंगी बीत जाती है पर जवाब नही मिलतें।

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  23. रैगिग ऐसी समस्या नहीं जिसे कोई कॉलेज का प्रशासन चाहे तो रुकवा नहीं सकता। मेरे कॉलेज में रैगिंह कठोर अनुशासन की वजह से बीस वर्ष पूर्व ही नाममात्र रह गई थी। पर इतने दिनों के बाद ऍसी घटना को देखता पाता हूँ तो कॉलेज प्रशासन को भी उतना ही गुनाहगार पाता हूँ।

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  24. पांच या दस सेकंड में उसकी मूर्ति के सामने लगभग धेकेला गया हूँ... बंदूको के साये में हिफाजत से घिरे भगवान् से मै क्या मांगू ?फिर धकेल कर आगे कर दिया हूँ ... यहाँ कामाख्या में भी यही हाल हैं ....पांडो
    की लंबी कतारें ....लगभग 50 छोटे बड़े मंदिर और हर मंदिर पर पांडे हाथ फैलाए खड़े हैं.....मुख्या मंदिर तक जाने की लंबी कतार ...अगर आपको जल्दी जाना हो तो पंडा 100 रुपये में भीतर से ले
    जाएगा...सयद अब 200 हो गये हों...!!

    हाँ अमन कचरू की निउज़ हमने भी सुनी थी ....रेगिंग के कई हादसे सुनने को मिलते हैं
    ये भी देखा गया है जो छात्र प्रथम वर्ष मे रेगिंग से भयभीत थे वही सीनियर होने परजूनियर
    के साथ वही वार्ताव करते हैं ...क्या कहेगें इसे....??

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  25. आपके शब्दों में उतरता हूँ...एक-एक कर सारी टिप्पणियां पढ़ता हूँ....फिर खुद कुछ कहने के लिये टिप्पणी के बक्से को खोलता हूँ....कुछ लिख नहीं पाता बड़ी देर तक...वापस आलेख को दुबारा पढ़ता हूँ......एक अजीब सा दर्द सीने में कहीं अंदर उठता महसूस करके जो फिर से टिप्पणी करने आता हूँ तो वही.....उलझन, शब्द सारे शब्द कितने निर्बल कितने असहाय..

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  26. अमन तो एक घृणित परिपाटी के लिए अर्पित हो गया. अब तो हमें हर युवा में एक तालिबानी दिखने लगा है. समझ में नहीं आता की ये कैसे सुधरेंगे. हमारी मान्यता है की अब संस्कार गलत पड़ रहे हैं. माँ बाप निश्चित ही दोषी हैं.
    आस्था तो आस्था ही है. इसके लिए कोई लॉजिक नहीं होती. आभार.

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  27. ओहो! बस क्या कहूं दर्द से अभिभूत शब्द और शर्मनाक हादसे के बारे में!

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  28. आये दिन ऐसी खबरें पढने को मिलती हैं! पढने वाले बेबस.....घर वाले बेबस...प्रशासन बेबस...पुलिस बेबस ! कब तक अपनी निष्क्रियता को बेबसी का नाम देते रहेंगे?

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  29. अमन के सभी सीनियरों को जो उस के इस कॄत्य मै थे पकड के वेसे ही मारा जाये जब तक साले मर ना जाये, ओर फ़िर उन की लाशो को भारत से बाहर फ़ेका जाये, लानत है इन के मां बाप पर .
    ओर कुछ कहने के लिये अब मेरे पास कुछ बचा नही , इस अमन के दुख से मन व्यथित हो गया.
    धन्यवाद

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  30. कुछ कहते नहीं बनता
    संगीनों के साए में भगवान्
    नन्ही सी जान और आपरेशनों का सिलसिला
    रैगिंग का विकृत रूप मन अशांत सा हो उठता है

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  31. जँगली लोग हैँ जो ऐसे रेगीँग करते हैँ - भीड और आबादी बढने के दुरुपयोग मेँ मँदिरोँ की बिगडती हालत भी एक नमूना है
    शिस्त पालन तो करना ही नहीँ आता ना जब तक बँदूकेँ ना तन जायेँ ..दुखद है !
    - लावण्या

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  32. ....अजीब बात है अपने ही देश में अपने ही भगवान् को बंदूको के साये की जरुरत है .हम कहाँ जा रहे है ?
    सही है ... आगे या पीछे ... समझ में नहीं आ रहा ?

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  33. दु:ख कतरा कतरा कदम कदम पर बिखरा है, इस सब के बीच मानव की सम्वेदना जाने कितनी दारुण होती जा रही है, हो चुकी है।
    सम्वेदना और कातरता बची न हो ऐसा नहीं है, बस ये सिकुड़ सिकुड़ कर अपने ही पेट में आ छिपे हैं।

    ...तकलीफ को किसी अनुवाद की आवश्यकता नहीं होती ....

    सूत्र।

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  34. ये तो बच्चों की लापरवाही व अतिउत्साह का परिणाम है किंतु बहुत-से सीनियर प्रेक्टीशनर डाक्टरों के कारनामेतो इससे भी ज्यादा निर्दयी व निन्दनीय हैं कि ......... उफ, उफ !!!!

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  35. रैगिंग के नाम पर ये धिनौना कृत्‍य कभी सर्म‍थनीय नही है।

    आज दोष हमारी व्‍यवस्‍था का है कि सॉंपो को हम दूध पिला रहे है।

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  36. ऐसा ही देश है भारत जहां जो जैसाभी जैसे भी है के साथ लोग परम संतोष के साथ जिए जा रहे हैं !

    रैगिंग का यह भयानक दानव सचमुच कितना न्रिशंश हो चुका है !

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  37. कई बार शब्द नहीं होते....अपनी भावनाओं और संवेदनाओं को व्यक्त करने के लिए.....

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  38. भगवान के मंदिरो में क्लोज़ सर्किट केमरे भी आ चुके है.. जो सबकी निगरानी रखता है उसकी भी निगरानी रखी जाने लगी.. धकेला जाने का रिवाज़ तो बहुत पुराना है..

    रॅगिंग के नाम पर जो हो रहा है वो वाकई निंदनीय है.. शिक्षण संस्थान अपराधो का अड्डा बनते जा रहे है.. कुछ दिन पहले ही एक इंजीनियरिंग के छात्र ने प्राचीन मूर्ति चुराकर बेचने की कोशिश कि हालाँकि बाद में उसे पकड़ लिया गया..

    आपका ओब्सर्वेशन कमाल का है..

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  39. आयी तो आपको तहलका में छपे आपके लेख को पढ़कर बधाई देने थी पर आपका लेख पढ़कर खामोश हो गई .
    काशी विश्वनाथ के उस मन्दिर में मै भी गई हूँ ,आतंकवाद का साया अब हमारे भगवानो पर भी पड़ने लगा है खास तौर से जब से कचहरी के पास से विस्फोट हुआ तब से भगवान् की सुअक्षा ओर बढ़ गई है वाकई आतंकवाद हमें हमारे शहरो में भी डर डर कर रहन को मजूर कर रहा है ,पाकिस्तान ,बांग्लादेश ,श्रीलंका ,नेपाल हमारे सब पड़ोसी आत्महत्या की ओर जा रहे है ओर भारत इनकी आग में झुलस रहा है
    १.सबके जुदा जुदा भगवान् है ..मै अपने वालो की राह पर हूँ..."
    २.लकडी के फ्रेम में बनी उस चौरस मशीन में मुझसे आगे ....एक पीठ पर लगभग बारह साल की लड़की है ...शायद उसका पिता है....तकलीफ को किसी अनुवाद की आवश्यकता नहीं होती .... उस लड़की के चेहरे से पढ़ी जा सकती है ...... मशीन की वही जानी पहचानी सी आवाज .... सीने में जमा दर्द मगर डिटेक्ट नहीं करती .....

    मेटल डिटेक्टर को इस अंदाज से देखना !!!!!!!!!
    ३.बंदूको के साये में हिफाजत से घिरे भगवान् से मै क्या मांगू ....
    डॉ अमर कुमार की बात पर गौर कीजिये वे बड़ी काम की बात कह गए है !!!!!!!!!
    ४....सौ के नोट को वो मुट्ठी में दबा लेता है...

    आप को रोज के कशी विश्नाथ के टार्न ओवर के बारे में जानकर हैरानी होगी श श श !!!!!!!ऐसी बातें सरेआम नही की जाती !!!!!!!!
    ५.रही अमन की बात तो संजय जी ने ठीक कहा है बीमार तो वे लोग है जो क़त्ल कर रहे है ओर इश्वर मासूमो की परीक्षा ले रहा है .अमर जी कहते है इश्वर हमारे भीतर है ,मुझे तो इश्वर कही भी नजर नही आ रहा ओर इन्सान तो जैसे पशुता की ओर बढ़ रहा है .कुछ दिनों शोर माचकर ये लड़के डॉ बनकर किसी शहर में शान से घूमेगे .उसका चेहरा देख यकीन नही आता आप जानते है उसने अपनी डायरी में अपने फ्रस्टेशन के बारे में लिखा था ,ओर लगातार कॉलेज मेनेजमेंट को लिखा था .उसका शरीर भी उन्होंने किसी कमरे में बिना किसी सुविधा ,बर्फ या ऐ सी के बगैर रखा था ,सबसे दुखद बात तो ये की पोस्त्मर्तम तक की सुविधा उस हस्पताल में नही थी ,डोनेशन वाले ये कैसे अस्पताल है ओर कैसे ये लोग ?मेडिकल कौंसिल क्या कुछ नही करती ????/

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  40. अमन कचरू के साथ जो कुछ हुआ, वह हमारे लिए शर्मसार करने वाला है।

    सुप्रिमकोर्ट इस दिशा में सक्रिय है, इसलिए उम्‍मीद की जानी चाहिए कि इसमें कुछ सुधार होगा।

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  41. आज के इस दौर में इतनी संवेदनाएं दिल में पालेंगे तो जीना बोझिल हो जायेगा...कहाँ आप कीकर(बबूल) के पेड़ से आम की उम्मीद लगाये हुए हैं...अब तो इंसान के पास सिर्फ शरीर ही बचा है आत्मा और उसमें रची बसी संवेदनाएं तो कब की मर चुकी हैं..."राख के ढेर में शोला है न चिंगारी है....."
    आप ने हमेशा की तरह बहुत अच्छा लिखा है...बिचारा भगवान्...और हारा थका इंसान...एक से हो गए हैं सिर्फ शैतान ही बचा है अब हर जगह हर और....
    नीरज

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  42. रैगिंग तो अब एक जरिया बन गया है छात्रों को मारने-पीटने का ।
    गए वो जमाने जब रैगिंग सिर्फ़ जूनियर का परिचय लेने के लिए की जाती थी । आजकल रैगिंग का इतना गिरा और घिनौना रूप देखने को मिलता है ।

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  43. बनारस घुमते हुए एक साथ कई विचार आये ..शाम की आरती में भावरहित यंत्र्ता पूर्वक करते लोग ओर उन्हें अपने अपने कैमरों में कैद करते विदेशी ...भावः विभोर मैंने भी कई चित्र अपने डिजिटल कैमरे में लिए ....गंगा रात को दिखी नहीं पर प्र्दशन भव्य था ओर एक अनुभव भी....नंग धड़ंग बाबा देखे ओर कैमरे के प्रति उनका मोह भी ....बहार सजी दुकाने ओर गंगा किनारे कई घाट ....शायद तब तक मन में बहुत सारी बाते नहीं थी....अगले दिन सुबह गंगा घात पर काशी विश्नाथ के दर्शन पर गया .लगा जैसे जम्मू की सीमा में घुस रहा हूँ.....बहार घाट पर मांझी ने दिलचस्प बात बताई की उसके एक बेटे का एडमिशन एक जर्मन महिला ने स्कुल में करा दिया है ओर उसकी पढाई का खर्चा हर साल भेज देती है....मन उस बच्ची को लेकर उदास था ,.दिन भर घूमने के बाद रात को अमन की खबर ने ओर विचलित कर दिया..उदासी पसर गयी...लोग कहते है की उदास लिखता हूँ नहीं लिखनी चाहिए.....मुझे लगा मेरी उदासी अगर कागज पे बहार नहीं आये तो कहाँ आये ?फिर अभिव्यक्ति कैसी ? शिक्षा का व्यवसायीकरण ओर कुकरमुत्तों की तरह उगे मेडिकल ओर इंजीनियरिंग कालेग देखकर देखकर वैसे ही मन में विचार उठते थे की ये लोग बाहर कैसे बनकर निकलेगे ....हम तो पहले भी अपने कॉलेज के या दुसरे कॉलेज के गोल्ड मेडलइस्तो के भयंकर बाजारीकरण होने से हैरान थे ओर इस बात के पक्ष में सोचने लगे थे की क्या प्रोफेशनल कालेजो में भी नैतिक शिक्षा का एक क्रेश कोर्स इंटर्नशिप में अनिवार्य कर दिया जाए...अमन की घटना ने मन दुखी कर दिया..उसकी माँ का interview देखकर उनके सब्र को देखकर हैरान हो गया .इकलौते जवान बेटे का जाने का दुःख जीते जी आदमी को मार देता है...लेकिन फिर भी उन्होंने कहा की कोई ओर बच्चा इन सब घटनाओं का शिकार न हो.मेरी यही कामना है...फिर सब सुनकर त्रिवेणी लिखने का मन कैसे होता ????
    पिछली पोस्ट पर दिलीप जी ने बेहद सार्थक टिप्पणी कही थी इस बार डॉ अमर जी ,कविता जी ने शायद ओर विस्तार दे दिया है..

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  44. सच ही तो लिखा है आपने हम भी तो इस समाज का हिस्सा हैं...
    जहाँ गलती करने वाले ज्यादा हैं और सुधरने वाले कम...
    मीत

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  45. sochati hun ki vo din kitana khaas rahaa hoga us maa ke liye jab uska beta medical entrance me pass hua hoga ...kitni badhaaiya...kitane aashirvaad...kitne prasaad...kitani mannate.n .....kab socha hoga usne ki beta yu jayega

    vo bachchhe jinhone Aman ke satha aisa bartaav kiya, medical line me jaa kar kya karenge...kidney bechane aur ankhe churaane vaale log kya yahi hote honge...???????

    bahut se prashna chal rahe hain man me.........! afsos usparivaar ke liye, jisne kya paya tha aur kya kho diya...!!

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  46. भगवान को संगीनों के साये में रहने पर मजबूर भी तो हमने ही किया है। कुछ हैं जिनके कारण ऐसा हो रहा है और आगे ये ऐसे ही रहेंगे । पहले जब मैं वैष्णों देवी गया था तब माता के दर्शन कर ही नहीं पाया था धक्का दे दिया गया था पर अब ऐसा नहीं है। पिछली बार आराम से मैंने दर्शन किए बावजूद इसके कि उस समय रिकॉर्ड अभिलाषी दर्शन के लिए पहुंचे थे। जहां तक अमन की बात है, जिस बैच के लोगों ने इस को अंजाम दिया है, उनसे डॉक्टर बनने की डिग्री देनी ही नहीं चाहिए। आगे से कभी भी ऐसे हादसे नहीं होंगे। रैगिंग को जड़ से उखाड़ना है तो सख्त कदम तो उठाने हीं होंगे। कई बार गेंहूं के साथ घुन भी पिस जाएंगे, पर सफाई करनी है तो ये जरूरी है।

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  47. *बंदूको के साये में हिफाजत से घिरे भगवान की सिर्फ मूर्तियाँ है..भगवान हमारे दिल में हैं एक शक्ति के रूप में जो एक विश्वास भी है.मेरा manna है की उन के आगे sir jhukane और tirath aadi जाने से adheek puny किसी jaruratmand की madad कर के उस की duaa paane में है.
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    *मेनिंगो -मायलोसिल से पीड़ित बच्ची के parivarwale क्यों wahahn laye.. जो इन लोगो कों
    बी एच .यू के मेडिकल से जुदा इस मंदिर ओर इस नदी की ओर खींच layee है वह है--हालात की बेबसी में कोई उम्मीद की चाह!यह चाह श्रद्धा और आस्था बड़ा देती है.Meningomyelocele का survival rate कितना है..या complications further क्या हैं यह उस के परिवार वाले समझना कहाँ चाहेंगे ?.
    मेरा भी अपना अनुभव है पिछले साल जब मेरी मम्मी आई .सी.यू में थीं .तब मैं हर 'धरम के मंदिर'दरवाजे पर माथा टेकने पहुँच गयी थी..उनके NPO होने के बावजूद विभूति खिलायी थी.और जब वह डॉक्टरों की आशा के विपरीत एक दम ठीक हो गयीं तब यही लगा कि दवा से अधिक दुआ में असर होता है.मेरा मानना है..दुआ और दवा इंसान को दोनों चाहिये.पूजापाठ से अधिक ,सच्चे दिल से की गयी प्रार्थना में शक्ति है यह सच है.
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    इंसानी जान की कीमत तय कोई नहीं कर सकता.लेकिन किस तरह आज कल नेतिकता का ह्रास हो रहा है.उस का एक उदहारण अमन है.अमन की खबर सुन कर मन बहुत दुखी हुआ बस यही दुआ करते हैं किसी और के साथ इस तरह का हादसा न हो.डाक्टरी हो यह कोई भी व्यवसाय ,हर किसी को पहले इन्सान होना जरुरी है.मानव मूल्यों को समझना जरुरी है.
    रेगिंग 'किसी भी व्यवस्था में एक बदनुमा धब्बा है.परिचय करना और रेगिंग में अंतर नहीं समझते आज कल के संवेदनहीन लोग.
    बेहद दर्दनाक एक और वाकया सुना था..मद्रास में कॉलेज के डीन के अपने ही एकलौते बच्चे की रेगिंग के कारण असमय मृत्यु हुई थी. उन्हीं के कॉलेज के हॉस्टल में हत्या कर के बक्से में बंद कर के मृत शरीर को तालाब में फेंक दिया गया था.कितने दिन बाद मिली थी उसकी लाश.
    न जाने और कितने मासूमो को निगलेगा यह दानव| प्रशासन को भी इन मामलों में कठिनाई बरतनी चाहिये.बहुत से लोग बिना सख्त काएदे कानून के बातें नहीं समझते हैं .
    नैतिक शिक्षा का एक क्रेश कोर्स इंटर्नशिप में ही क्यूँ हर स्तर/व्यवसायिक कोर्स की शिक्षा में अनिवार्य कर दिया जाना चाहिये.

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  48. वास्तव में बहुत दुखदायी घटना है ये... मन बहुत आहत होता है, इस तरह की घटनाओं से... क्या दोष था उसका? जो जान से हाथ धोना पड़ा....

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  49. इंसान के अंदर का जानवर जब देखो सिर उठाता ही रहता है।

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  50. "अजीब बात है अपने ही देश में अपने ही भगवान् को बंदूको के साये की जरुरत है .हम कहाँ जा रहे है ?"

    aapne apne andaaz mai sab kuchh hi kah diya...

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  51. मैंने भी सुना है ऐसी ही कुछ रैगिंग के बारे में अपने कुछ दोस्तोसे ........और उस वक्त बहोत गुस्सा आता था...अब भी आता है.....और सब से बुरी बात है की कोई कुछ नहीं कर पाता .. मेरे कुछ दोस्त उनकी रेंगिंग के दरमिया ये कहते थे की वो कभी किसी की रेंगिंग नहीं करेंगे....पर साल ख़तम होते ही वो भी दुसरे लड़को के साथ अपने जूनियर्स की रेंगिंग में लग गए थे...और उस वक्त तो और भी गुस्सा आया था..... जब भी ये सुनती हु अब मुझे वो चूहे की कहानी याद आती है ... जिसमे एक चूहा गलती से अपनी पूंछ गवा देता है और फिर काफी सारे ओर चूहों से बाते बनाके उनकी पूंछ भी कटवाता है ताकि वो अकेला न रहे अपनी जमात में.......

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  52. phir kaanoon ka arth kya rah jaata hai, isse achcha hai ki court-kachhari khatm kar diye jaayen.

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  53. डॉ .अनुराग said...
    कितनी उम्मीदें लगाकर आगईं फिर तितलियां
    काग़ज़ी फूलों से धोखा खा गईं फिर तितलियां


    क्या बात है .पहला शेर .हम चुराये ले जा रहे है .....

    March 17, 2009 2:14 PM


    sanjaygrover said...
    आप जैसे डाॅक्टरों पर तो कई-कई शेर कुर्बान हैं, अनुराग भाई।

    March 17, 2009 3:52 PM

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  54. डॉ साहब बहुत ही दुखद बात सुनाई है आपने
    भगवान अमन की आत्‍मा को शांति दे

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  55. तुम कहाँ हो ईश्वर ????


    " amen ke kisse ne bhut dukhi kr diya........bhut afsos or dukhad.."

    Regards

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  56. संगीनों के साए में है खुदा हमारे;
    चलो पहले अपने खुदा को बचाएं

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  57. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  58. आप इतना अच्छा लिखते हैं कि मन पंगु हो गया है , कुछ बोला नहीं जा रहा है जीवन के इस दर्द के सामने |

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  59. "तकलीफ को किसी अनुवाद की आवश्यकता नहीं होती"


    आपका दिल को छूता हुवा लेख पढ़ कर मन भर आया,
    अमन की बारे में पढ़ कर मान खराब सा है, और आपके लेख में छिपी पीड़ा आपके शब्दों में सॉफ नज़र आ रही है

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  60. बहुत वाजिब बातें की है आपने, आपकी प्रतिबद्धता भी आपके पेशे के अनुरूप दिखाई पड़ी मुझे. आप मेरे ब्लॉग तक आये और मेरे चंद शब्दों पर तवील निगाह डालने पर धन्यवाद.

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  61. डॉ. साहब, मैं भी इस हादसे से बहुत आह्त हूँ, उसका एक कारण ये है कि मैं उसी प्रदेश का वासी हूँ जहाँ वह हादसा हुआ है,एक नन्हें बच्चे को छीनकर देवभूमि कही जाने वाली हिमाचल की धरती कलंकित तो हुई ही है साथ- साथ एक काला दिन भी हिमाचल के इतिहास में जुड़ गया है। अमित कोह तो हम वापस नहीं ला सकते लेकिन फिलहाल संतोष की बात ये है कि हिमाचल प्रदेश सरका रैगिंग विरोघी पर एक अध्यादेश लाने की तैयारी कर चुकी है और 18 मार्च को सरकार की कैबिनैट बैठक हो रही है। अब कम से कम कोई और ऐसा हादसा न हो तो भी अच्छा है।

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  62. apne desh mein bhagwan bandoonk k saye mein qaid hain. kya kahen "Baat niklegi to bahut door talak jaygi" but ajkal baad niklane wale hi nikal jate hain....

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  63. अंतर बस इतना है कि अमन मर गया, बाक़ी ढेर सारे शिकार जी रहे हैं। इस देश में हजारों कॉलेज हैं, एक से बढ़कर एक। इंजीनियरिंग, मेडिकल और भी न जाने क्‍या-क्‍या... सब में रैगिंग होती है। हजारों लोग इस यातना से होकर गुजरते हैं, इसका कुछ नहीं? अमन मर गया तो हल्‍ला मच गया। रैगिंग के नाम पर जिस स्‍तर के जुल्‍म होते हैं वह सुनने में बड़े निंदनीय लगते हैं, परंतु उन्‍हें करने वाले कौन होते हैं? हमारे और आपके ही बच्‍चे, या शायद अमन भी (यदि नहीं मरता, और सेकंड ईयर पर पहुँच जाता)। सचाई तो यह है कि रैगिंग हो रही है। रैगिंग एक व्‍यक्तिगत अपराध नहीं है, जैसा उसे प्रोजेक्‍ट किया जा रहा है। इसे करने वाले हिस्‍ट्रीशीटर अपराधी नहीं होते। यह एक कुप्रथा है, जैसे दहेज लेना या कन्‍या भ्रूण हत्‍या जैसी। जो इससे एक बार गुजरता है, अगले साल उन्‍हीं की जमात में शामिल हो जाता है। इसमें शामिल होने वाले हम आप जैसे ही लोग हैं। ठीक उसी प्रकार जैसे दहेज लेने का विरोध तो करते हैं परंतु अपने बेटे के मामले में कुछ ढीले पड़ जाते हैं। लेकिन उस समय कौन जानता है कि इस कुप्रथा के कारण मौत भी हो सकती है। मेरा आशय यहाँ अपराध को माफी योग्‍य बताना नहीं है बल्कि यह बताना है कि इसके उन्‍मूलन की दिशा में समग्रता से विचार करना आवश्‍यक हो गया है।

    - आनंद

    उत्तर देंहटाएं
  64. आनंद जी की टिप्पणि की इन पंक्तियों को दुहराना चाहूंगा-
    रैगिंग के नाम पर जिस स्‍तर के जुल्‍म होते हैं वह सुनने में बड़े निंदनीय लगते हैं, परंतु उन्‍हें करने वाले कौन होते हैं? हमारे और आपके ही बच्‍चे, या शायद अमन भी (यदि नहीं मरता, और सेकंड ईयर पर पहुँच जाता)। सचाई तो यह है कि रैगिंग हो रही है। रैगिंग एक व्‍यक्तिगत अपराध नहीं है, जैसा उसे प्रोजेक्‍ट किया जा रहा है। इसे करने वाले हिस्‍ट्रीशीटर अपराधी नहीं होते। यह एक कुप्रथा है, जैसे दहेज लेना या कन्‍या भ्रूण हत्‍या जैसी। जो इससे एक बार गुजरता है, अगले साल उन्‍हीं की जमात में शामिल हो जाता है। इसमें शामिल होने वाले हम आप जैसे ही लोग हैं। ठीक उसी प्रकार जैसे दहेज लेने का विरोध तो करते हैं परंतु अपने बेटे के मामले में कुछ ढीले पड़ जाते हैं।
    समस्या का तुंरत समाधान खोजने की आवश्यकता है.
    इन पंक्तियों के लिए साधुवाद देना चाहूंगा-
    तकलीफ को किसी अनुवाद की आवश्यकता नहीं होती

    उत्तर देंहटाएं
  65. हर साल रैगिंग होती है बच्चे छुपते फिरते हैं. वही बच्चे अगले साल रागिंग करते हैं ! अजीब सिलसिला चलता है. हर सीनियर बैच को ये लगता है की उनका बैच आखिरी था जब रैगिंग हुई थी. और अब तो कुछ होता है नहीं !

    ऐसी घटनाएं जारी है. ये साइक्लिक प्रक्रिया जारी है :(

    ऐसी घटनाओं के बाद तो ये एक भयंकर कुरीति के अलावा और कुछ नहीं लगता.

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  66. जिन्दगी बहुत कठिन होती जारही है. कहने को हम सभ्य हुए हैं लेकिन कहीं न कहीं जज़्बात मर रहे हैं. चीजों को हासिल करने के दौड़ मे निराश होकर अमानवीय होना दुखद है. अमन के हत्यारों पर गुस्से से ज्यादा दुःख होता है.
    बचपन मे रटी इशु कि वो पंक्तियाँ याद आती है कि "हे इश्वर उन्हें माफ़ करना .... वो नहीं जानते कि वो क्या कर रहे हैं"

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  67. पोस्ट मे कई चेहरे दिखाये है लेकिन सभी उदास है टिप्पणी देने वाले भी

    उत्तर देंहटाएं
  68. अनुराग जी, बड़ी ही मर्मस्पर्शी बात लिखी है.
    हब भी जब कॉलेज में फर्स्ट इयर में थे तो हमारी खूब रैगिंग होती थी. तो फर्स्ट इयर में ही हमने तय कर लिया था कि अगले साल जब हम सीनियर बन जायेंगे तो कभी रैगिंग नहीं लेंगे. और इसे हमने निभाया भी.
    लेकिन होते हैं कुछ सिरफिरे "सीनियर". तर्क देते हैं कि जब फर्स्ट इयर में हमारी रैगिंग हुई थी तो इस बार हम भी लेंगे.

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  69. अनुराग जी ,
    उदासी (त्रासदी) हमारे मनोभावों का परिष्कार करतीहै ,और जब उदासी "स्व "से परोन्मुखहोती है तभी अभिव्यक्ति सार्थक होती है .(आपकी टिप्पणी के संदर्भ में ).

    उत्तर देंहटाएं
  70. aapki post padhkar likna ko kuch nahi h bas etna ki antakwadi to khular war karte but asae antak ka kya hoga or eshawar to har aatma m h shyad par aatmayn mar gai h sabki.....

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  71. क्या कहुँ, स्तब्ध हुँ| आज के दौर मे माँ-बाप, शिक्षक सिर्फ बच्चो को एक डाक्टर/इंजीनियर बनाने की होड मे लगे है... काश इनकी तालीम मे कुछ अंश मानवता और नैतिकता के पाठ का भी होता| शायद एक अच्छा इंसान होना आज उतना जरुरी नही.. विश्वास नही होता कि आज का युवा वर्ग इतना असंवेदनशील है कि अपने मनोरंजन और झुठी रस्मो अदाई और मान के लिये किसी की जीन्दगी के साथ भी खेल सकता है| सरकार लाख कानुन ले आये, क्या फायदा? कानुन की हद तो १८ साल के बाद से शुरु होती है, पर ये बच्हे तो हमारी हदो मे रह कर ही हद से पार हो जाते है| बच्चो को मानविय मुल्यो को सीखाने की परंपरा तो outdated चीज है| स्कुलो मे नैतिकता के पाठ चाहे जो पहले राम,कृष्ण,विवेकानन्द,हरिषचन्द्र,के पाठ के रुप मे सीखने को मीलती थी, वो "धर्म-निरपेक्षता" की बली चढ्ते हुये जा चुके है, कोई जरूरत भी नही जानना शायद एक डाक्टर/इंजीनियर बनने के लिये| घर का परिवेश जैसा रहेगा, समाज जो असहिष्णुता बोयेगा, वही हम आप काटेंगे| देखीये कुछ गैर-जिम्मेदार माँ-बाप/शिक्षक के नामुरदो की करतुत ने एक शायद मासुम रहे अमन की जान ले ली... ईश्वर उसके आत्मा को शांती, उस्के परिवारजनो को इस आपदा से लड्ने की शक्ती और उन लोगो को सबक दे जो इस घटना के प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष गुनहगार है|

    अनुराग जी, आपके लेखनी के बारे मे कुछ कहना तो सुर्य को दीपक दिखाना है... दुआ है बस की ये कलम बस चलती रहे.. हमे अपने होने (या ना होने) का अहसास जरिया है ये दिल की बात....

    बहुत दिनो बाद इधर आने के लिये माफी चाहुंगा...

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  72. अमन पर की खबरें लिखीं और एडिट की, हर बार जब भी ये खबर सामने आती थी तो सबसे पहले दुख आता था। आखिर कैसे दुनिया की सेवा करने वाले लोग अपने ही साथियों के बीच रैगिंग के नाम पर इतने अमानवीय हो जाते हैं , दहला देने वाली घटना।

    उत्तर देंहटाएं

कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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