2009-03-24

कोई सिलवट नहीं ... इस चेहरे पे


वो चेहरा बिना मुस्कान का चेहरा है .. ...रिकंसट्रक्ट चेहरे ऐसे हो होते है बिना मुस्कान ओर गम के ...
९८ में श्रीनगर में किसी माइन पे उसकी बटालाइन में से किसी का पैर पड़ा था ...वो भी हवा में उडा नीचे आया तो एक पैर ,हाथ की दो अंगुलिया ओर अपना चेहरा खो चूका था ....कजिन का दोस्त है ..आपकी आवाज में जरा सी नरमी उसे चौकन्ना कर देती है ...आँखे एक्स रे की तरह आहिस्ता आहिस्ता आपकी चमड़ी के भीतर कही उतर कर जैसे तलाश करती है की सहानुभूति का कोई अंश तो नहीं..... एक कोने पे दो शराबी रेस्तरा वाले से लड़ रहे है ..उसकी निगाह उधर उठी है मेरी भी...क्या सोचता होगा ये ?....एक काफी पीकर वो विदा लेना चाहता है विदा लेते समय समय कुर्सी से उठना चाहता हूँ पर उस आवाज में अजीब सी ठंडक है की मै उठता नहीं ...........
धातु के छोटे छोटे टुकड़े इंसान की जिंदगी में कितना खलल डालते है ... इंसान को ख़त्म करने के नए नये नुस्खे ....उसको गये करीब दो घंटा हुआ है...पर मन में अभी भी धातु के टुकड़े फंसे हुए है ...अचानक दिल में ख़याल आता है उस आदमी का .. ..जिसने ६ अगस्त १९४५ हिरोशिमा पर बम गिराया ... क्या सात अगस्त से उसकी दुनिया में सूरज उसी तरह उगा होगा ...किसी नन्हे बच्चे को खिलखिलाते देख क्या उसके दिमाग में कुछ सवाल उठे होगे ... ...कम्पूटर पर अंगुली दबती है ......
छह अगस्त १९४५ को वारफील्ड तिब्बेट्स जूनियर .की उम्र महज़ ३० साल थी .. . .उस वक़्त ..उनका कहना था ..उन्हें अपने किये का कोई रिग्रेट्स नहीं है....६२ साल तक वे उसी बेफिक्री की नींद लेकर सोये ....

"there are no Marquess of Queensberry rules in war."
९२ साल की उम्र में उनकी मौत हुई .....क्या उनकी सोच उनकी ट्रेनिंग का नतीजा है ..... युद्ध में .सिपाही पूछता नहीं है....उसकी ट्रेनिंग का मकसद शायद उसके सवालो को ख़त्म करना है ... पर युद्ध के बाद .?क्या हर सिपाही के सवाल ख़त्म हो जाते है पर कुछ सवालो के जवाब कम्पूटर नहीं देता ...





चौबीस मार्च के लिए

किसी सफ्हे पे किसी नज़्म की जानिब ढूंढो
वक़्त की गलियों में आवारागी के निशान मिलेगे

कुछ सालो पे हमारा इख़्तियार आज भी नहीं


या यूँ कहिये (रिवर्स त्रिवेणी )

ज़िंदगी क़ी क्रिकेट यूँ चली

खुदा मेडन ओवर फेकता रहा
किस्मत क्लीन बोल्ड करती रही



इस उम्मीद में के अगले कुछ ओवर टी ट्वेंटी की माफिक साबित होगे ..

70 टिप्‍पणियां:

  1. जिंदगी भी कहां हर सवाल का जवाब देती है.कई सवालों को हम यूं ही दफन कर जाते हैं कि...... यही जिंदगी है.

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  2. वाह डाँ साहब झकझोर कर रख दिया आपके लेख ने

    आँखे एक्स रे की तरह आहिस्ता आहिस्ता आपकी चमड़ी के भीतर कही उतर कर जैसे तलाश करती है की सहानुभूति का कोई अंश तो नहीं.....


    ये पंक्तियाँ तो किसी मुकम्मल कविता से कम नहीं कई जगह पर रोमांचित हुआ हूँ।

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  3. कुछ सवालों के जवाब हम जानते हुए भी नहीं सुनना चाहते हैं ..क्यों की ज़िन्दगी को हमने इसी अंदाज़ से जीना सीखा है ..कुछ पल आक्रोश और फिर वही हालात ....कुछ सालो पे हमारा इख़्तियार आज भी नहीं...यही सच है ..

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  4. बम गिराने वालो में से एक ने शायद आत्महत्या की थी . ख़ैर खुदा के फेके ओवर मे बल्ला जरुर घुमाऊंगा शायद तुक्का लग जाए किस्मत मेहरवान हो ही जाए .

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  5. aap ki post ki laast line hee padh lae tee hun aur khush hotee hun ki aap kitni badhiyaa kvita kartey haen

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  6. कहने को आधुनिक शिक्षित विश्व व्यापी समाज के हिस्से हैं हम। विभीषिकाओं से परिचित होते हुये, आज भी कहाँ चेते है - और भी असंख्य गुना तैयारियाँ और असंख्य अति उन्मादी धातु कणों का निर्माण, संग्रह। काश! इनके प्रयोग कभी न हों पायें। पूरी मानवता के चेहरे कहाँ खोजेंगे सहानुभूति?

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  7. जर्र-जर्र लम्हों को उजागर करता लेख
    मुस्कुराहट बिखेरता आपका फेंका मेडन ओवर...

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  8. कुछ सवालों के जवाब शायद ही मिले क्योंकि जवाब के बाद फिर से एक सवाल खड़ा हो जाऐगा। पर कुछ सवालों के जवाब जिदंगी खुद ही दे देती है। सच आप शब्दों के जादूगर हैं। जो दिलों को छूते है। आपकी त्रिवेणी हमेशा की तरह बेहतरीन हैं। जिदंगी की क्रिकेट वाली .... ये तो हमें भा गई कल ही हमारी अलमारी पर लग जाऐगी। और हाँ ये नया टेम्पलेट भी सुन्दर लग रहा है। और चलते चलते हमने तो दो बार बधाई दी और आपने एक चाकलेट भेजी, बड़ी नाइंसाफी ....

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  9. इस पोस्ट पर टिप्पणी करने लायक ज्ञान मेरे पास नही है ।

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  10. कभी जिंदगी खुद सवाल करती है ....तो कभी जिंदगी खुद जवाब बनती है ....यही तो है जिंदगी ...पर फिर भी कुछ सवाल अपनी पलके बंद किये ही रह जाते हैं

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  11. बहुत गम्भीर लेख पर हिरोशिमा का वर्ष२००१? इस गम्भीरता को हलका करते हैं--
    *"कुछ सालो पे हमारा इख़्तियार आज भी नहीं" कुछ क्या डॊक्टर साहब किसी भी साले पर अपना इख्तियार नहीं:)

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  12. Kuchh sawalo ke jawab to shayad zindgi ke paas bhi nahi hote...

    humesha ki tarah kuchh sochne ki liye majbur kar dene wali behtreen post...

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  13. fir se ek baar aapne jhakjhora hai Anurag Jee.
    aur haan,
    कुछ सालो पे हमारा इख़्तियार आज भी नहीं
    :)
    janmadin ki dheron shubhkaamnayen !!!! aage ke har over T20 ke hi honge... chakke pe chakke lagaane hain abhi to !!!

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  14. aur haan!! kripya Hiroshima ke bomb waali date ko sudhaar len... shayad mistype ho gaya hai...

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  15. hmmm...taajgi bhara layout hai. dekh kar dil khush ho gaya...fir ek ek shabd jaise us khushi ko khurach khurach kar utaarta chala gaya. kasaila sa swad ho aaya...ajeeb rango se saabka padta rahta hai aapka aur kaise chehre hote hain ki padh kar hi jehan me jee uthte hain aur kitte sawal poochne lagte hain.
    ufff

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  16. कभी कभी मौत भी
    जब एक किताब लिखती है
    तो जिंदगी से
    एक भूमिका लिखवाने के लिए आती है

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  17. किसी सफ्हे पे किसी नज़्म की जानिब ढूंढो
    वक़्त की गलियों में आवारागी के निशान मिलेगे

    कुछ सालो पे हमारा इख़्तियार आज भी नहीं

    कसम से जान निकाल दी आपने, हमें भी उन कुछ सालों की याद आ गयी जिनका हिसाब केवल हमारे जेहन में है।

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  18. 'अगले कुछ ओवर टी ट्वेंटी की माफिक साबित होगे' आमीन !

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  19. इअतनी समझ मुझे नही कि इस जिन्दगी को समझ सकूं, जितना भी समझने कई कोशिश की, उतना ही ओर उलझ गया......
    आप के लेख ने तो ओर भी उलझा दिया.
    धन्यवाद

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  20. *'तलाश करती है की सहानुभूति का कोई अंश तो नहीं.-'
    -हर असहाय इंसान कुछ ऐसे ही देखता है. जब परिस्थिति भीतर तक तोड़ देती है.

    *धातु के छोटे छोटे टुकड़े इंसान की जिंदगी में कितना खलल डालते है ... इंसान को ख़त्म करने के नए नये नुस्खे ..
    -अब तो धातु के टुकड़े भी जरुरी नहीं... सूक्ष्म तरीके ईज़ाद हो गए हैं बडे पैमाने पर इंसानों को ख़तम करने के लिए.कैसा इत्तफाक है -खुद बारूद के ढेर पर बैठ कर इंसान दियासलाई जला रहा है!

    .**अपने किये का कोई रिग्रेट्स नहीं है-
    -संवेदनहीन/पत्थरदिल इंसान से आप और क्या आशा रख सकते हैं?
    -
    **सिपाही पूछता नहीं है....-बिलकुल सही --हर फौजी को ट्रेनिंग में यही सिखाया जाता -do and die-dont ask why!

    ***-इख़्तियार--कुछ सालों पर???शायद किसी पल पर नहीं है!

    ***-टी ट्वेंटी -------टेस्ट मैच से ज्यादा रोमांचक होता है..२०-२० !
    ------------ज़िन्दगी छोटी सही मगर भरपूर जीनी चाहिये!

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  21. haan kahna bhul gayi---
    naya layout sober hai.

    header mein picture bhi bahut achchee hai.soothing!

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  22. कर्तव्य कचोट सकता है, अपराधबोध तो नहीं पैदा करता। कम से कम सिपाही और चिकित्सक के संदर्भ में तो यही सच है...ऐसा लगता है... अलबत्ता पत्रकार और वकील के संदर्भ में कई बार यह स्थिति अपराधबोध की आती है...
    हो सके तो इस टिप्पणी का जवाब ज़रूर दें...

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  23. WAAH SABSE PAHALE TO IS LAYOUT KE LIYE BAHOT BAHOT BADHAAEE.
    AAPKE LEKHAN SAMAGRI KI KYA KAHUN.. AISE LEKHAN KE LIYE KUCH SHABD HI NAHI HOTE HAI.. YE SENTANCE.. APNE AAP ME BAHOT KUCHH KAH JAATI HAI.
    धातु के छोटे छोटे टुकड़े इंसान की जिंदगी में कितना खलल डालते है ... इंसान को ख़त्म करने के नए नये नुस्खे ..
    -अब तो धातु के टुकड़े भी जरुरी नहीं... सूक्ष्म तरीके ईज़ाद हो गए हैं बडे पैमाने पर इंसानों को ख़तम करने के लिए.कैसा इत्तफाक है -खुद बारूद के ढेर पर बैठ कर इंसान दियासलाई जला रहा है!
    ... ..AUR AAKHIRI LINE KE KUCHH SAWAALON KE JAWAB COMPUTER NAHI DETA...KYA KHUB LIKHA HAI AAPNE...


    ARSH

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  24. अजीत जी से सहमत हूं,पत्रकार होने के नाते मै ये तो कह सकता हूं एक नही कई बार सोचने पर मज़बूर होना पड़ता है। वैसे एक बात तो मै बिना पछ्ताय कह सकता हूं कि आप जितने अच्छे डाक्टर हैं उससे कई हज़ार गुना अच्छे इंसान है। आपकी कलम आपके अच्छे होने का ठोस दावा करती है।आपका लिखा एक-एक शब्द सोचने पर मज़बूर कर देता है।

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  25. एक दिन लेट हूँ पर सबसे पहले जन्मदिन की बधाई .हमारा केक या चोकलेट जो भी आप मुनासिब समझे भेज दीजियेगा .जो भी सामान्य दुनिया से थोड़ा सा अलग होता है उसके स्वाभिमान का पैमाना थोड़ा ओर उंच हो जाता है ओर सेल ज्यादा सेंसिटिव .इसलिए आपकी हर बात को वो संदेह की दृष्टि से देखता है .हिन्दुस्तान में तो नही पर हाँ विदेशो में सिपाही की मनो स्थिति पर अनेको मूवी बनी है ओर उनमे उस ट्रोमा को भी दिखाया गया है जिससे वे युद्ध के बाद गुजरते है ,एक मूवी तो मैडल मिलने वाले एक सिपाही के बारे में थी जो अपनी टांग खो बैठा है शायद ४ जुलाई मूवी का नाम है ओर टॉम क्रुज ने मैन एक्टर का रोल निभाया है .कुछ सवालो का जवाब किसी के पास नही है कम्पूटर भी तो वही देगा न जो इंसान भरेगा .

    ओर अब त्रिवेणी पर
    किसी सफ्हे पे किसी नज़्म की जानिब ढूंढो
    वक़्त की गलियों में आवारागी के निशान मिलेगे
    कुछ सालो पे हमारा इख़्तियार आज भी नहीं
    अपने जन्मदिन पर आप ऐसा ही कुछ लिखेगे इसका मुझे यकीन था .जिंदगी के गुजरे कुछ सालो पर कभी किसी का इख्तियार नही होता ,गर होता तो जिंदगी कितनी नीरस हो जाती .बेरंग .बिना थ्रिल की .
    again happy b"day.

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  26. pahala salaam is 24 march ko...jisne hame pahale ek achchha shayar fir ek sachcha mitra diya...!

    kal raat ke 11.30 baje ham bhi kuchh aisi hi baat kar rahe the....! discovery par dikhaya gaya tha shayad din me vo shakhsa jis ne ek nasla ko khatam karne ke liye 8 lacs logo ko maar diya hoga...! saam ko mere dono nephews usi par serious the..! "8 lac logo ko maarne ki kya saza deta hoga khuda ???? aur jab sab us ke hath me hai to us ne kyo hone diya aisa... aap astrology me believe karti ho na...!kya unme se kisi ka bhi Moon,Mars,venus, Jupitor, saturn, sun kuch bhi strong nahi tha...!" Mai shant ho kar sun rahi thi unke prashna aur vahi prashna man me apane Ishwar se poonchh rahi thi 8 lac logo ko maarne ki kya saza di hogi tumne....

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  27. बहुत सुंदर लेख...
    खोया-खोया सा...
    ब्लॉग का ये नया रूप अच्छा लगा...
    मीत

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  28. happy birthday....jindgi ko samajgne ka bejod nuskha hai aapke paas.

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  29. अपने जन्मदिन पर शायद गंभीर पोस्ट नहीं लिखनी चाहिए थी ....गुलज़ार की नज़मो से गुजरते हुए जब जी टी करनाल रोड के उस रेस्टोरेंट तक पहुंचा था तो बेख्याली थी ...उसके बारे में सुना था .सिर्फ सुना .अपने कजिन के साथ पहली बार मिला .तो रेस्टोरेंट में हंगामा करते उन शराबी को देख मुझे भी लगा था की क्या ये नहीं सोचता होगा ऐसे देशवासियों के लिए उसने शरीर कुर्बान किया है अपनी पूरी जिंदगी ...पर शायद वो किसी ओर मिटटी का बना है...तभी तो मिलेट्री इंजीयरिंग की पढाई कर रहा है.....कुछ लोग शायद अपने दिल में ढेरो मुआफी रख के आते है....सब को माफ़ करने का जज्बा.अल्बाता ये बात ओर है की उसने जिस लडाई में अपना शरीर का अंग खोया उसे अपने देश के लोग ही बाहर वालो के साथ मिल कर कर रहे है ...पर यकीन मानिये अटम बम्ब गिराने वाले उस पाइलट को तलाशने में सिर्फ दो मिनट लगे मुझे ....शायद कई ओर लोग उस ख्याल से गुजरे होगे जो मैंने महसूस किया .तभी तो वहां ढेरो पन्ने दर्ज है .बहस ओर तर्कों से भरे हुए ....हिटलर ओर क्या इराक को तबाह करने वाले अमेरिकी राष्टपति कभी इस अंतद्वंद से गुजरे होगे सोचता हूँ ...

    @cmpershad ji
    वर्ष सुधार दिया है ..ध्यान दिलाने के लिए धन्यवाद ....
    @अजित जी
    कर्तव्य ओर मानवता के बीच की एक बहुत थिन लाइन है जो मुझे लगता है फौजियों के बीच ओर थिन हो जाती है ...कई सिपाहियों को अवसाद के दौर से गुजरना पड़ता है ओर कई सैनिक युद्ध के बाद डिप्रेशन में चले जाते है ....सैनिको की मनोदशा पर घंटो कई सेमीनार हो सकते है ..उस वक़्त की भोगोलिक स्थिति ..जनून ..देशभावना ओर मानवीयता कई चीजे जब मिल जाती है तो गडमड हो जाती है ...सच तो ये है हम जो 16की उम्र में होते है ,26 में नहीं होते ओर ३६ में तो बस उसका हिस्सा बचाए हुए मात्र ...इंसान किसी भी पेशे का हो उसकी फिलहाल लडाई सिर्फ इतनी है की अपने जमीर को बचाए रखते हुए गुजर बसर कर ले...कारोबारी दुनिया में सिर्फ नोर्मल रहना ही अब बड़ी बात है....कर्तव्य कई बार कचोट ता है.....मैंने कई सर्जन ओर दुसरे दोस्तों को मायूस ओर हताश होते देखा है अपराध बोध से की शायद वे किसी मरीज को बचा सकते थे .शायद.....कभी संसाधनों की कमी कभी....त्वरित निर्णय लेने की क्षमता पर अविश्वास .... शायद पत्रकार भी इस अंतर्द्वंद से गुजरते होगे ..
    @अनिल जी
    हम सब मानवीय गुण दोषों से भरे है ....

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  30. एक बार फ़िर सधी हुई लेखन शैली में सोचने को मजबूर करता आपका भावपूर्ण आलेख पसंद आया।

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  31. ek baar khud ko us sipahi ki jagah par rakhne ki koshish ki.. kuch mile jule se bhaav aa rahe hai.. par exactly kya hai ye samajh nahi paa raha hu.. par soch sakta hu..mujhe bahut ajeeb lag raha hai kis tarah ke logo ke liye sipahi apni jaan tak jokhim mein dal deta hai..

    do din pehle shaeed bhagat singh ki shahadat ka din tha.. kitne logo ne unhe yaad kiya???

    chaddiyo par vivad karke desh ki sanskriti ki baat karne waale logo ko desh ke liye jaan dene waale shaheedo ke baare mein likhne ki fursat nahi..

    baharhaal aapki triveniya dono hi kamaal hai..
    24 march ke liye ek aur baar badhai swikar kare..

    wo jo aladin ka chirag mujhe mila tha.. is baar dua karta hu aapko bhi mil jaye.. aur bhagwan is baarish mein khushiyo ka ek bora aapki chat par bhi gira de..

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  32. sabse pehle janmdin ki hardik shubkamnay
    likhte to aap bahoot achha h hi har bar bahoot achha sochte h . or trivani m ekhityar to kisi par bhi nahi , jindgi apne aap m hi sab jawab deti jati h hazaro naye sawalo k sath........or clear tab bhi kuch ni hota kuch line yad aa rahi h ki "uljhan suljhnae m uljhan or uljhi h" or madan over or kismat k bold par to ak song yad aaya h dhund movi ka uljhna suljhe n rasta sujhe na jaon to janon kahah ....................

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  33. आपका लेख पढ़कर जो कुछ बातें त्वरित मानस पटल पर उभरीं ,वे बहुत कुछ यही थी..........

    "कर्तव्य ओर मानवता के बीच की एक बहुत थिन लाइन है जो मुझे लगता है फौजियों के बीच ओर थिन हो जाती है ...कई सिपाहियों को अवसाद के दौर से गुजरना पड़ता है ओर कई सैनिक युद्ध के बाद डिप्रेशन में चले जाते है ....सैनिको की मनोदशा पर घंटो कई सेमीनार हो सकते है ..उस वक़्त की भोगोलिक स्थिति ..जनून ..देशभावना ओर मानवीयता कई चीजे जब मिल जाती है तो गडमड हो जाती है ...सच तो ये है हम जो 16की उम्र में होते है ,26 में नहीं होते ओर ३६ में तो बस उसका हिस्सा बचाए हुए मात्र ...इंसान किसी भी पेशे का हो उसकी फिलहाल लडाई सिर्फ इतनी है की अपने जमीर को बचाए रखते हुए गुजर बसर कर ले...कारोबारी दुनिया में सिर्फ नोर्मल रहना ही अब बड़ी बात है....कर्तव्य कई बार कचोट ता है.....मैंने कई सर्जन ओर दुसरे दोस्तों को मायूस ओर हताश होते देखा है अपराध बोध से की शायद वे किसी मरीज को बचा सकते थे .शायद.....कभी संसाधनों की कमी कभी....त्वरित निर्णय लेने की क्षमता पर अविश्वास "


    अपनी तरफ से कुछ और यही कह सकती हूँ कि..चाहे देश भक्ति की भावना के तहत या कर्तब्य निष्पादन के क्रम में...किसी निर्दोष की जान लेना....कभी न कभी कचोटती जरूर है...चाहे वह कितना भी पाषाण ह्रदय क्यों न हो....यह मेरा दावा है..

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  34. वाह अनुराग जी
    बहुत सही लिखा है......समय पर किसी का बस नहीं होता. और कोई भी चीज इंसान की सोच को नहीं रोक सकती...बस कुछ समय तक दबा सकती है.

    त्रिवेणी बहुत समय के बाद......पर बहुत ही सुन्दर, बहुत खूब

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  35. पता नहीं आज आपकी पोस्ट इमोशनल क्यों कर गई। धातु के कुछ टुकड़े आपकी पोस्ट से होते हुई मेरे दिलो-दिमाग में घुस आए हैं। आखिर कोई ऐसे क्यों डिसट्रक्शन को स्वीकार कर लेता है, सवाल ही सवाल हैं पर कोई जवाब नहीं

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  36. खुदा मेडन ओवर फेकता रहा
    किस्मत क्लीन बोल्ड करती रही

    सब को खुद के साथ ऐसा हे होता हुआ क्यों लगता है?????????????????

    चन्द्र मोहन गुप्त

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  37. इन हालात की क्या कहें - हमें तो अपनी जिन्दगी में अजब-गजब सवालात मिलते हैं।
    और बहुतों के उत्तर तलाशना व्यर्थ होता है!

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  38. आप कुछ कहने लायक छोड़ते हैं कहाँ हैं अपनी पोस्ट पर सिवाय "वाह" के...सो "वाह" किये दे रहे हैं....और आपकी इस अनूठी लेखन प्रतिभा को दिल ही दिल में नमन कर रहे हैं...
    नीरज

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  39. sir ji aapki त्रिवेणी ka fan huun, bahuth hi uumda hai thanks for such a nice post.

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  40. sabse pehle janamdin ki......BHOT SARI BDHAI...!!!

    is bar ki post kafi gamgeen hai ...post ki tippani karne fir aaungi...!!

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  41. जन्म-दिन की विलंबित शुभकामनायें डाक्टर साब....
    सोचा कुछ और लिखूं आपके आज के शब्दों पर। किंतु रोकता हूं खुद को, ये टिप्पणी नहीं तो एक पोस्ट बन जायेगी।
    वैसे रंजना जी का दावे का आधार क्या है, जानना चाहूँगा...
    देखिये न परसों ही अपनी इस "कर्मभूमि" पर पहुँचा और एक निकटतम दोस्त को खोया....आपरेशन चुँकि "ताज" या ’ओबेराय’ में नहीं था तो मिडिय़ा को भी ध्यान नहीं आया। कहाँ झाँक पायेंगे उनके कैमरों के लेंस इन पहाड़ों-जंगलों में।
    तो परसों ही दोस्त एक शहीद हुआ है मेरा और मैं यहाँ उस जगह से बस कुछ दूर बैठा आपके इस पोस्ट पर टिप्पणी कर रहा हूँ...
    है न अजीब...
    त्रिवेणी रगों में पैवस्त कर गयी है...

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  42. अनुराग जी,

    इस बार की पोस्ट काफ़ी गमगीन बना गयी....!!!


    मैं झड़ती रही सारी उमर दर्द के पत्ते
    दर्द मेरा फूटता रहा नयी कोंपलों में

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  43. किसी सफ्हे पे किसी नज़्म की जानिब ढूंढो
    वक़्त की गलियों में आवारागी के निशान मिलेगे

    कुछ सालो पे हमारा इख़्तियार आज भी नहीं

    kya likhun, alfaaz hi nahi hain mere paas. shayad triveni paddte paddte guzre hue waqt ki galiyon main pahunch gayi hoon...aur soch rahi hoon ke sach mein zindagi pe hamara ikhtiyaar nahi hai...aur phir bhi ye zindagi hamari hai????

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  44. लाजवाब, लेकिन कई सवालों के जवाब आत्मा के पास होतें हैं जिन्हें वक्तपर ही सुना और समझा जा सकता है ...मुझे मालुम नही था आपका जन्म दिन था /है ...बधाई...कुछ सालों पर हमारा सच अख्तियार नही होता,मोहन राकेश ने कहा है ...उम्र के साथ जैसे चेहरा बदलता है, वैसे ही शायद मन की दुनिया का बाहर की दुनिया के साथ सम्बन्ध भी बदल जाता है .

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  45. A lot of horrible things happen in war, to kill to save yourserlf, to kill to save others and to kill when ordered to.. but the worst ones are those which you are not ordered to do!!!

    Awesome post!!.. some parts of life.. are maybe best forgotten or maybe the best learning.. but always hard to get rid off!

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  46. Thanks for the comment ... read ur posts ... so nice... and very inspiring ...

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  47. BBC ki yeh Khas peshkash bhej raha hoon. umeed hai pasand aayegi. mujhse pehle jo 50 comments aaye; asha hai unki jaankari bhi badhegi.

    Saagar



    दो परमाणु हमलों में बचने वाले यामागुची


    यामागुची संभवत एकमात्र व्यक्ति हैं जो दोनों हमलों के दौरान मौजूद थे
    जापान में एक ऐसे व्यक्ति के बारे में पता चला है जो द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हिरोशिमा और नागासाकी में हुए दोनों परमाणु बम हमलों में बच गए थे.
    जापान ने प्रमाणित किया है कि 93 वर्षीय सुतोमु यामागुची इन दोनों हमलों के दौरान हिरोशिमा और नागासाकी में थे.

    अमरीकी विमानों ने छह अगस्त 1945 के दिन हिरोशिमा पर पहला परमाणु बम गिराया था और इस दौरान यामागुची अपने व्यवसाय के सिलसिले में हिरोशिमा में थे.

    बम हमले में यामागुची का शरीक कई स्थानों पर जल गया. उन्होंने एक रात हिरोशिमा में बिताई और फिर वो अपने शहर नागासाकी लौट आए जिस पर नौ अगस्त को दूसरा परमाणु बम गिराया गया.


    मैंने दो बार विकिरणों का प्रभाव झेला है और आने वाली पीढ़ियों के साथ मैं अपने अनुभव बांट सकूंगा


    यामागुची

    यामागुची नागासाकी के हमलों में बच गए थे इसके प्रमाण पहले ही थे लेकिन मंगलवार को जापान सरकार ने इस बात की भी पुष्टि कर दी है कि यामागुची हिरोशिमा में भी हमलों के दौरान मौजूद थे.

    जापान में उन लोगों को विशेष मुआवज़ा मिलता है जो परमाणु हमलों में बचे हैं.

    नागासाकी के अधिकारियों का कहना है कि दो स्थानों पर विकिरणों का प्रभाव झेलने का यह अर्थ नहीं है कि यामागुची को दोहरा मुआवज़ा दिया जाएगा.

    उधर यामागुची ने संवाददाताओं से कहा, '' मेरा विकिरणों का दो बार सामना करना अब आधिकारिक रिकार्ड हो गया है.''

    उनका कहना था, '' मैंने दो बार विकिरणों का प्रभाव झेला है और आने वाली पीढ़ियों के साथ मैं अपने अनुभव बांट सकूंगा.''

    हिरोशिमा में क़रीब एक लाख 40 हज़ार और नागासाकी में 70 हज़ार लोग परमाणु बम हमले में मारे गए थे.

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  48. yeh ek aur intresting news send kar raha hoon. ummed hai pasand karege. aap es article par kuch aacha likh bhi sakte hai.


    Regards,

    Saagar,
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    ये सवाल पहले भी उठाए जाते रहे हैं कि अगर दुनिया भर के सभी मुसलमान एक ही क़ौम का हिस्सा हैं तो फिर इतने अलग अलग मुस्लिम देश क्यों हैं?
    अगर इस्लामी 'उम्मा' सिर्फ़ एक ख़याल नहीं बल्कि यथार्थ है तो फिर इस्लामी देश राष्ट्र-राज्य की सीमाओं में क्यों बँधे हुए हैं? और क्यों दूसरे राष्ट्र-राज्यों की तरह मुस्लिम देश भी एक दूसरे से युद्ध करते हैं?

    अगर हिंदुओं और मुसलमानों को दो अलग अलग क़ौम मानकर पाकिस्तान बना तो फिर बांग्लादेश के बनने का क्या सिद्धांत और क्या आधार था?

    लेकिन अगर इस बात को ख़ारिज कर दिया जाए कि मुस्लिम उम्मा या एक समान इस्लामी पहचान जैसी कोई चीज़ नहीं है तो फिर ऐसा क्यों है कि फ़लस्तीनियों के संघर्ष के प्रति बांग्लादेश या सूडान का मुसलमान जितना संवेदनशील होता है, उतना तिब्बती लोगों के संघर्ष के प्रति नहीं?

    इन सवालों के जवाब अब उस बच्चे ने तलाश करने की कोशिश की है जिसे उसके पिता ने उसे डेढ़ साल की उम्र में ही त्याग दिया और फिर कभी पलट कर उसकी ओर नहीं देखा.

    इस बच्चे की माँ भारतीय थी और पिता पाकिस्तानी. अट्ठाईस साल पहले अपनी एक किताब के प्रकाशन के सिलसिले में दिल्ली आए इस शख़्स की मुलाक़ात एक नामी महिला पत्रकार से हुई.

    एक हफ़्ते तक दोनों के बीच नज़दीकियाँ गहराईं और नतीजे में जन्म हुआ आतिश तासीर का.

    पाकिस्तान से आए इस शख़्स का नाम है सलमान तासीर जो पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के बड़े नेताओं में से एक हैं और पंजाब सूबे के गवर्नर भी.

    तनावपूर्ण रिश्ते

    पिता के राजनीतिक करियर के कारण आतिश तासीर के जन्म की बात छिपाकर रखी गई. आतिश की परवरिश भारत में ही हुई लेकिन उनकी माँ ने उन्हें इस्लामी पहचान दी, हालाँकि वो ख़ुद सिख हैं.

    उनके माता पिता के बीच फिर कोई संपर्क नहीं रहा.


    ईरान पहुँचकर मुझे पता लगा और सीरिया में उसका हलका एहसास हुआ कि मज़हबी विश्वास को आधुनिक दुनिया के ख़िलाफ़ एक नकारात्मक विचार से जब एक सकारात्मक प्रयोग में बदला जाता है तो वो किस क़दर हिंसक और ख़ुद ही को ज़ख़्मी करने वाला बन जाता है


    आतिश तासीर

    आतिश को मज़हबी परवरिश से दूर रखा गया. और यही कारण था कि बड़े होने पर उनके सामने पहचान का भारी संकट पैदा हो गया.

    ये संकट सिर्फ़ भारतीय या पाकिस्तानी होने का ही नहीं था बल्कि एक मुसलमान पिता और सिख माँ की संतान होने का भी संकट था.

    आतिश के लिए उनके पिता, उनका मज़हब और राष्ट्रीयता इतने अज्ञात रहे कि बड़े होने पर उन्होंने एक सफ़र के ज़रिए इन सभी को पहचानने की कोशिश की.

    लेकिन निहायत ही निजता भरा ये सफ़र बड़े सवालों में उलझता चला गया और नतीजतन तैयार हुई एक किताब – स्ट्रेंजर टू हिस्ट्री: ए संस जर्नी थ्रू इस्लामिक लैंड्स.

    मुस्लिम पहचान

    अट्ठाइस साल के आतिश तासीर लिखते हैं कि वो मुसलमान होने के गहरे नहीं बल्कि एक हलके से एहसास के साथ बड़े हुए.

    छह साल की उम्र में अपने ममेरे और मौसेरे भाई-बहिनों के साथ खेलने के दौरान एक भाई ने चिल्ली कर कहा – आतिश का सूसू नंगा है.

    ये वाक्य आतिश की स्मृति से अभी तक नहीं मिटा है और शायद तब पहली बार उन्हें महसूस हुआ कि वो अपने दूसरे सिख भाइयों से अलग हैं.


    तासीर ने निजी अनुभव को विस्तार दिया है

    इसी अहसास ने उन्हें अपने मुसलमान पिता और उनके मुस्लिम देश पाकिस्तान को और जानने के लिए उकसाया.

    लेकिन आतिश ने पाया कि उनके पिता हालाँकि बहुत कट्टर अर्थों में मज़हबी नहीं हैं और शराब के शौकीन हैं – फिर भी वो ख़ुद को सांस्कृतिक अर्थों में मुसलमान मानते हैं.

    सांस्कृतिक मुसलमान होने का अर्थ तलाश करने के लिए आतिश ने सीरिया और सऊदी अरब से लेकर तुर्की, ईरान और पाकिस्तान तक की यात्रा करने का फ़ैसला किया ताकि मुसलमानों के मनोविज्ञान और इस मनोविज्ञान को तैयार करने में इस्लाम की भूमिका की पड़ताल कर सकें.

    पहचान की तलाश

    तासीर की किताब इसी सफ़र का दस्तावेज़ है.

    उन्होंने इन देशों में जाकर आम मुसलमानों से -- छात्र, दुकानदार, व्यापारी, पेंटर, टैक्सी वाले और ऐसे ही आम लोगों से मुलाक़ात की.

    उनकी किताब की सफलता इस बात में है कि वो इस सफ़र का ब्यौरा देते हुए काफ़ी गंभीर सवाल उठाते हैं.

    तुर्की में उनकी मुलाक़ात ऐसे इस्लाम परस्तों से हुई जो वहाँ के कट्टर धर्मनिरपेक्ष सत्ता-प्रतिष्ठान से लगभग घृणा करते हैं और उसे पहली फ़ुरसत में मटियामेट कर देना चाहते हैं.

    लेकिन तुर्की के इस्लाम परस्त जिस तरह की व्यवस्था का स्वप्न देखते हैं, वैसी व्यवस्था ईरान में आम लोगों को इस्लाम के क़रीब लाने की बजाए उससे दूर करती चली गई है.

    तेहरान में आतिश तासीर ऐसे लोगों से मिलते हैं जो मुसलमान होने के बावजूद गुप्त रूप से हरे रामा-हरे कृष्णा संप्रदाय को मानते हैं और कृष्ण भगवान की मूर्ति के सामने भजन-कीर्तन करते हैं.

    वहीं उनकी मुलाक़ात एक ऐसे पेंटर से होती है जो पहले इस्लाम में बेहत आस्था रखता है लेकिन एक दिन उसका एक दोस्त उसकी कार में रखी क़ुरआन शरीफ़ को उठाकर बाहर फेंक देता है और कहता है कि -- इसमें कुछ नहीं रखा.


    क्या इस्लाम एक जैसी सांस्कृतिक पहचान देता है?

    पेंटर के लिए ये इस्लाम से ज़्यादा उस सरकार के ख़िलाफ़ प्रतिकार था जो पुलिस के बल पर इस्लामी क़ानून लागू करती है.

    तासीर लिखते हैं, "ईरान पहुँचकर मुझे पता लगा और सीरिया में उसका हलका एहसास हुआ कि मज़हबी विश्वास को आधुनिक दुनिया के ख़िलाफ़ एक नकारात्मक विचार से जब एक सकारात्मक प्रयोग में बदला जाता है तो वो किस क़दर हिंसक और ख़ुद ही को ज़ख़्मी करने वाला बन जाता है."

    साज़िश?

    तुर्की के लोग उस ख़ालिस इस्लामी व्यवस्था की कल्पना करते हैं जो शायद इस्लाम के पैग़म्बर के ज़माने में रही हो.

    वो आधुनिक दुनिया को इस्लाम के ख़िलाफ़ एक साज़िश के तौर पर देखते हैं और उसे पूरी तरह ख़ारिज करते हैं.

    पर उसी स्वप्न या यूटोपिया को जब ईरान में स्थापित कर दिया जाता है तो वो स्वप्न चकनाचूर हो जाता है.

    किताब में मुस्लिम दुनिया की विसंगतियों को तो बहुत दिलचस्प तरीक़े से उठाया गया है लेकिन ये ध्यान में रखा जाना चाहिए कि आतिश तासीर की परवरिश जिस माहौल में हुई जहाँ आतिश के पिता के प्रति सिर्फ़ नाराज़गी और असंतोष था.

    आतिश ने इसी व्यक्तिगत रिश्तों में पैठ चुके तनाव और ग़ुस्से को व्यापक संदर्भों में समझने की कोशिश की है,

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  49. Dono Triveni .... awesssome !! Too good !!

    God bless!
    RC

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  50. are sir aapaki outline ne to mujhe sochne par majboor kar diya... kaaphi der tak sochta raha

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  51. अनुराग रिवर्स त्रिवेणी तो कमाल की है। जिस भाव पर पोस्ट की शुरूआत की है उसके लिये तो कोई विवाद हो ही नही सकता। लेकिन कई बार लगता है इसके लिये भी लोगों की सहानुभूति बँटी हुई होती हैं। भाव वही रहते हैं अफसोस करने वाले और उसके तरीके बदल जाते हैं।

    चूँकि बात निकली है इसलिये ये लिंक दे रहा हूँ, इन्हीं तरह के भावों के वशीभूत ये दो कवितायें लिखी थी - वक्त मिले तो देखियेगा -

    वो लाश अभी तक रोती है

    उजाला

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  52. Sabse pehle janam din ki dhero badhai.....aapki triveni ka to javaab nahi....mujhe hamesha hi pasand aati hai....
    agli ka intjaar rahega....

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  53. Aapka Janamdin nikal gaya mujhe pata nahi chal paya dr saheb :-( janmdin ki dhero badahiya :-) bahut hi gambhir post janm din ke din par dil jhakjor diya ekdum isne ....

    New Post - Memorable Moment - A Sweet Journey with an Unknown Girl

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  54. कुछ सवाल हमेशा सवाल ही बने रहते हैं ......
    बहुत ही मार्मिक प्रस्तुति ....
    त्रिवेणी हमेशा की तरह कुछ कहती हुई ...........

    उत्तर देंहटाएं
  55. एक साहित्यिक आलेख पर वैज्ञानिक सन्दर्भों वाली टिप्पणी करना सर्वथा अनुचित होगा फिर भी अनुराग जी, एक नवम्बर २००७ को ओहियो में हृदयाघात से अशेष हो जाने वाले Paul Warfield Tibbets, Jr. उम्र भर भीतर की कुंठाओं को अपनी युद्ध प्रदर्शनियों से बहलाने का जतन करते रहे किन्तु यह एक टूटा बिखरा आदमी था जो अपने आप से डरा हुआ, अपनी वसीयत में उन्होंने दफनाये जाने और अपनी कब्र पर पत्थर लगाये जाने से इंकार करते हुए हिन्दुओं की तरह अपनी पार्थिव देह को अग्नि को समर्पित करने और राख को ईंग्लिश चैनल में बहा देने का आग्रह किया था [ हिन्दू अपनी अस्थियों को पवित्र गंगा में कई कारणों से बहाते होंगे उनमे से एक सहज और सरल कारण है अपने पाप कर्मो की मुक्ति ], वह अपनी मृत्यु के बाद भी भयभीत था कि आण्विक हथियारों का विरोध करने वाले उसकी कब्रगाह को एक धर्म स्थल के रूप में तब्दील कर देंगे या फिर वसीयत की पंक्ति का अर्थ यह भी था कि इस इन्सान ने अपनी कोई भौतिक स्मृति को शेष नहीं रखना चाहा . यह तो सिर्फ इनकी बात है उनके कई साथी पायलट मानसिक रूप विक्षप्त हो गए थे, अमेरिकी प्रशासन ने अपनी इस महाभूल पर दंभ का पर्दा डाल कर उन सब का जीवन नजरबन्द कर दिया था, वैसे लिखने को बहुत कुछ है, त्रिवेणी के लिए आप बधाई के पात्र हैं.टिप्पणी को एक पाठक के मनोवेगों की अभिव्यक्ति की दृष्टि से देखें .

    उत्तर देंहटाएं
  56. कुनाल जी बस भोपाल के यूनियन कार्बाइड के मालिक से लेकर ,हिटलर ओर इस आदमी के बारे में मन में कुछ सवाल उठे सो कम्पूटर को दबा दिया ...
    .गूगल सर्च से जो मिला वो बांट रहा हूँ



    Man Who Dropped Atomic Bomb on Hiroshima Dies at 92

    Pilot who dropped atomic bomb on Hiroshima dies with no regrets


    Atomic bombings of Hiroshima and Nagasaki

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  57. marmsparshi lekh aur usse jyada wo waqt, wo lamha jab ye ghatit hua.kahne ko kuch bacha hi nhi.

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  58. अनुराग जी आपका कमेन्ट मेरी टिप्पणी पर है क्या ? अगर हाँ तो कम्प्यूटर [GOOGLE] कोई वेद वाक्य नहीं है, आपको पढ़ने वाले जड़ नहीं है फिर एक पाठक को छोड़ कर किसी ने इस और ध्यान आकृष्ट नहीं किया. मेरी टिप्पणी का उद्धेश्य कबड्डी खेलना कतई नहीं था, वरन मैं तो आपको उस विभ्रम से अवगत कराना चाह रहा था. आपने क्लाड ईथरली का नाम सुना है? आप संजीदा लेखक हैं कायदे की बात कहते हैं इस लिए लिखना पड़ा वरना इस फोकट के तंत्र में लोग दिन में चार पोस्ट लिखा करते हैं और पचास टिप्पणियां करते हैं जिनमे क्या होता है आप भली भांति जानते हैं, शुभकामनाएं.

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  59. uss ne door rehna ka mashwara bhi likha hai
    saath hi mohabbat ka wasta bhi likha hai
    आपको पढ़कर किसी का लिखा यद् आ गया ,अलबत्ता जो ढूंढ रहा था वो मिला नहीं .किसी ओर दिन आपसे शेयर करूँगा

    पहला कुछ यूँ है

    uss ne yeh bhi likha hai mere ghar nahe ana
    aur saaf lafzoon main raasta bhi likha hai
    kuch huroof likhen hain zabt ki nasihat main
    kuch huroof main uss ne hosla bhi likha hai
    shukriya bhi likha hai dil se yaad karne ka
    dil se dil ka hai kitna faasla bhi likha hai...:)


    aapne to kafi duvidha me dal diya...!!

    उत्तर देंहटाएं
  60. बढ़िया प्रस्तुति के लिये साधुवाद

    उत्तर देंहटाएं
  61. अदभुत त्रिवेणी। शानदार पोस्‍ट। हर बार की तरह। हम तो आपके लेखन के कायल हैं।...शेष सभी विद्वान अपने मत व्‍यक्‍त कर चुके हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  62. किंकर्त्‍वयविमूढ, क्‍या कहूं समझ में नहीं आता।

    -----------
    तस्‍लीम
    साइंस ब्‍लॉगर्स असोसिएशन

    उत्तर देंहटाएं
  63. सिलवट नहीं चेहरे पर

    करवट से नहीं सोया होगा

    उत्तर देंहटाएं
  64. कई प्रश्न उत्तर विहिन रह जाते हैँ -सालगिरह पर देर से शुभकामनाएँ दे रही हूँ - आलेख व त्रिवेणी दोनोँ बहुत पसँद आये
    - लावण्या

    उत्तर देंहटाएं

कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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