2009-07-28

अपने अपने कैनवस पर


शुक्रवार .....रात नौ बजे ....
वे हमेशा की तरह किताबो में धंसे हुए है ...अपने चश्मे को ठीक करके मुझे देख मुस्कराते है ... वे पिता के उन मित्रो में से है जो मुझे बेहद पसंद हूँ...उसका एक कारण उनकी लाइब्रेरी का कलेक्शन भी है ..यूँ भी जब आप बचपन ओर किशोरावस्था की उस नाजुक सी बॉर्डरलाइन पे कन्फ्युस से खड़े होते हो....सवालो का एक बड़ा पुलंदा जेब में लिए .... ओर दूसरी ओर जैसे हर कोई पादरी का लिबास पहने होता है ...आपका आपका एक एक कन्फेशन सुनने को तैयार ..... किताबे आपके कई सवालों के जवाब देती है ....बिना कोई कन्फेशन सुने ...किताबे तबसे मेरे साथ है ....... उनकी लाइब्रेरी में खड़े होकर मुझे लगता है जैसे वक़्त दबे पाँव गुजर गया है बिना कोई आहट किये ... अपनी लाइब्रेरी के लिए वे खासे पोजेससिव है ..इसलिए शुरू के कुछ साल मेरी पहुँच उस लाइब्रेरी के दरवाजे तक रही.....कभी कभी आंटी की मदद से बेकडोर एंट्री मारी..ओफिसियल एंट्री तब मिली जब उन्हें लगा मै एक सीरियस रीडर हूँ ओर किताबे लौटाने में ईमानदार .....उसके छह महीने बाद ही मेरा एडमिशन मेडिकल में हो गया .....पर .कुछ पते ......कुछ गलिया ....उम्र के एक दौर में बड़े महत्वपूर्ण होते है ...छुट्टियों में .घर लौटने पर मेरे कुछ मकाम तय होते .उनमे से एक उनके घर का वो कोना था .....एक बार ऐसे ही एक छुट्टी में उनके घर के लॉन में बैठे कई लोगो की ऊँची ऊँची आवाजे सुनी थी...आधे घंटे बाद जब वहां से गुजरा तो वे अकेले थे ...हंसते हुए बोले थे " क्यों डॉ इगो मापने का भी कोई थर्मामीटर होना चाहिए ....नहीं ...
पिछले दो सालो से .उम्र के तकाजे से उनका मूवमेंट कम हो गया है ...इसलिए मुझसे ही अपने पसंद की किताबे मंगवा लेते है ....उनसे उनकी किसी पसंदीदा किताब का जिक्र करो तो उनकी आँखों में वैसी ही चमक उभरती है जैसे किसी बाप से उसके बेटे की तारीफ करने पर उभरती है ....उनकी बेटी विदेस में है ...बड़े बेटे की दस साल पहले एक्सीडेंट में म्रत्यु हुई है ....बहू की दूसरी शादी वे करवा चुके है ....अब सुना है ..बहू ओर भतीजे दोनों जायदाद में हिस्सा चाहते है....कोर्ट से नोटिस आया हुआ है .... ये वही भतीजे है ..जो अपने शराबी पिता से परेशान होकर गाँव से सर झुकाए उनके पास आये थे ....
उनकी किसी किताब को लेकर पहुंचा हूँ "अपने अंकल से कहो कुछ सामजिक भी हो जाये" .आंटी चाय का प्याला थमाते शिकायत करती है ..कोई मुसीबत आन पड़ी तो कोई खैर खबर लेने वाला तो हो.....आंटी की कई शिकायते मेरे बहाने जारी है .नयी भी ... पुरानी भी... जिसमे उनके कई पुराने फैसले भी. है...
वे खामोशी से सुनते है...फिर मुस्करा कर कहते है ..."जिंदगी एडिट नहीं होती डॉ ..यही मुश्किल है .. ...
बाहर निकलते वक़्त सोचता हूँ...की भगवान् ने अपनी एक बेहतरीन क्रियटीविटी गलत वक़्त में तो नहीं ......

मंगलवार सुबह ....साडे नौ बजे .......
एक रेफेरेंस देखकर लौटते वक़्त हॉस्पिटल के कोरिडोर में एक जानी पहचानी आवाज सुनकर मुड़ता हूँ ..जो डॉ अग्रवाल से जिरह कर रही . है .."अडसठ साल का आदमी खून नहीं दे सकता.... ये कहाँ का नियम है ...देखिये बिलकुल फिट हूँ .."वही है ...मै उन्हें एक कोने में ले जाता हूँ...वे हांफने लगे है ..नियम समझा कर उन्हें शांत करता हूँ.....आंटी ठीक है ....पहले तसल्ली करता हूँ .....फिर कौन है जिसके लिए वे खून देना चाहते है ....अन्दर कमरे में झांकता हूँ.....उनका छोटा भतीजा है....एक्सीडेंट हुआ है ...अगले कुछ पल खामोशी तय करती है.....
...कुछ देर ठहर कर उनसे विदा लेता हूँ....वे पीछे से आवाज देते है....चलकर नजदीक आये है ...."सुनो अपनी आंटी से कुछ मत कहना "....मै सिर्फ सर हिलाता हूँ.......".ओर अपने बाप से.भी ...."
सीडिया उतरते वक़्त बादल गरजे है .....बाहर बारिश है ......

71 टिप्‍पणियां:

  1. ये शख्स मुझे मेरी माँ के स्वभाव का लगा...जिसे दुनिया बहुत परेशान करती है...पर वे यूँ ही अपनी जिंदगी जीते रहते हैं

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  2. स्केचिंग करने में आप माहिर है, शब्दचित्रों को उकरने में आपका कौशल अब उस मकाम पर है, जहां मौलिकताएं वास करती है। कमाल के एंगल सर्च करते हो डा. साब, पर मुझे कभी-कभी ऐसा क्यों लगता है जैसे व्यापकताओं की थोड़ी और जरूरत है, आपको लगा कभी।

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  3. सच कभी कभी ऐसे लोगों से सामना हो जाता है जो जिंदगी का बेहतरीन संस्करण लगते हैं। मेरे पिताजी भी कुछ ऐसे ही थे। 70 साल की उम्र में भी खून देने गए थे। जिंदगी को लेकर उनका फलसफा औरों से कुछ अलग था। हो सकता है कि आज की कथित व्यवहारिक सोसाइटी में वो तर्कसंगत नहीं साबित होते लेकिन वे ईश्वर की बेहतरीन स्क्रिप्ट का वो पन्ना थे जो कई लोगों की स्मृतियों में जिंदा रहेगा। आपका आलेख पढ़कर उनकी याद आई और आंख भर आई।

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  4. sir ji...zindagi ke kayin pehlu ek chhote se lekh mein bayan kar diye...tajurba aap se bahot kam hai isliye zyada kuchh nahi kahung...bas itna hi ki...ek baar fir...aap ke andaze bayan ne dil chhu liya...

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  5. बहुत ही उम्दा भावपूर्ण अभिव्यक्ति आभार.

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  6. "सुनो अपनी आंटी से कुछ मत कहना "....मै सिर्फ सर हिलाता हूँ.......".ओर अपने बाप से.भी ...."


    छोटा लेख लिखा किंतु बिल्‍कुल सटीक और सही लिखा बिल्‍कुल दिल को छू जाने वाली पोस्‍ट है

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  7. " क्यों डॉ इगो मापने का भी कोई थर्मामीटर होना चाहिए ....नहीं ...
    वे खामोशी से सुनते है...फिर मुस्करा कर कहते है ..."जिंदगी एडिट नहीं होती डॉ ..यही मुश्किल है .. ...

    KYA KAHUN ! bina EDIT kiye, ya EDITING ke baad, donoN hi tarah se, kahne ko is-se zyaadaa kuchh bachta bhi to nahiN..

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  8. खूबसूरत अंदाज को हज़ार सलाम

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  9. आज आप ने एक ऐसे व्यक्ति/या कहिये व्यक्तित्व से परिचय करवाया जो अपने आप में बेहद अनूठा है ,आप का सोचना दुरस्त है की 'भगवान् ने अपनी एक बेहतरीन क्रियटीविटी गलत वक़्त में तो नहीं .....'.
    ------------------------
    कुछ पंक्तियाँ is lekh ki highlight hain- -
    -इगो मापने का भी कोई थर्मामीटर होना चाहिए-
    -..."जिंदगी एडिट नहीं होती
    -------------------------------------------------
    "अपने अंकल से कहो कुछ सामजिक भी हो जाये" ----और---सुनो अपनी आंटी से कुछ मत कहना '
    यह दो वाक्यों में ही उनके व्यक्तित्व के पहलू नज़र आते हैं..
    'कितना समर्पित है वह व्यक्ति अपने परिवार के लिए ,मगर उनकी अपनी पत्नी ही उन्हें समझ नहीं पायी!

    एक अजीब सी त्रासदी सी लगती है.

    दिल को छू गया यह संस्मरण .

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  10. जिंदगी एडिट नहीं होती डॉ ..यही मुश्किल है .. ...
    very touching post.......mousam udas hai ya post ka asar ya ankho ki jagah paimane hai tute hue......

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  11. दिल भर आया पढ़कर ...सही माएनए मे इसे कहते हैं रिश्ता ....इन रिश्तों मे कोई कैसे गाँठ लगा सकता है ...ऐसे रिश्तों से कोई कैसे रूठ सकता है ....जायदाद ,
    पैसे से बढ़कर हैं ये रिश्ते , इन्हे संभाल कर रखिए,
    खूबसूरत सौगात हैं ये रिश्ते , सीने से लगा कर रखिए
    रूठ जाए गर अपने कोई , मनाते रहिए
    मुश्किल है जिंदगी दुबारा मिले, इनको गले लगते रहिए

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  12. छोटे छोटे जुमलों से आप ऐसा साहित्य रच देते हैं जो सीधा दिल में उतर जाता है...अनुराग जी अगर आप सफल डाक्टर न होते तो बहुत सफल साहित्यकार होते...इतना कलात्मक लेखन ब्लॉग जगत तो क्या साहित्य में भी बहुत मुश्किल से मिलता है...आपके इस आलेख पर क्या कहूँ सिवाय इसके के की ये शानदार जुमले बाजी आपने सीखी कहाँ से?

    नीरज

    पुनश्च:आपसे पूछा था की आपने अपने ब्लॉग की काया पलट कैसे की लेकिन कोई जवाब आया नहीं इसलिए दुबारा पूछ रहा हूँ...दुबारा भी नहीं बताएँगे तो तिबारा पूछूँगा..."रसरी आवत जात से सिल पर परत निसान..."सिद्ध जो करना है.

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  13. बेहद सुन्दर व्यक्तित्व के धनी से मिलवाया। आभार।
    घुघूती बासूती

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  14. ये सज्जन पसंद आये। इनका आदर भी करूंगा भरपूर। पर किसी को इन्हे बतौर रोल माड़ल सिफारिश नहीं करूंगा कभी भी!

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  15. जिंदगी एडिट नहीं होती ..बहुत सही कहा ...इस तरह के लोगों के बारे में जब पढ़ते हैं तो एहसास होता है कि कहीं तो कुछ बचा हुआ है अभी भी ..बेहतरीन तरीके से आप इस तरह की बातों को लिखते हैं अनुराग जी ..जो कई दिन तक दिलो-दिमाग पर छाई रहती हैं

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  16. आपनें लिखा बहुत ही बेहतरीन है ,ऐसे लोग समाज में कम रह गये है जो बचे भी है वे हालात देख कर सकते में है .जिस समाज की बात हम कहतें हैं वह शायद ऐसे ही लोंगो के चलते अभी भी गुलज़ार है.

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  17. Ped kitnaa bhi boodhaa ho jaaye, usaki kitni bhi tahaniyaan kaat di jaaye, wo hameshaa Chaaya hi degaa..

    bahut hi sundar aur adbhud post !!!
    bilkul dil se nikli huyee dil ki baat !!

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  18. इगो मापने का भी कोई थर्मामीटर होना चाहिए ......."जिंदगी एडिट नहीं होती ...very lively and colourful canvas of life......

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  19. हमेशा की तरह दिल को छूती हुई पोस्ट। कुछ बातें सोचने को कहती है। कुछ बाते दिल को छूती है। कुछ बाते दिल को तसल्ली देती है। मैं आजतक नही समझ पाया कि समाजिक होना क्या होता है? कुछ इंसान अभी भी जिंदा है यह देखकर दिल को तसल्ली मिलती है। और यह बात कि "जिंदगी एडिट नहीं होती डॉ ..यही मुश्किल है" सच्ची बात। यह लाईन दिलो दिमाग पर छा गई। सच आप कुछ शब्दों इस प्रकार से ग़ढते है कि दिल से बस वाह और आह निकलती है।

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  20. इस तरह के चरित्र हम सभी की जिन्दगी में कहीं न कहीं होते हैं, जो प्रभावित करते हैं. कभी नमन करने को जी चाहता है, कभी इतनी सहृदयता पर गुस्सा..

    आप शब्दों के माध्यम से जो जिंदा बखानी करते हैं..नजर के सामने वो चरित्र आ खड़ा होता है..कमाल है.

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  21. इसे ही चरित्रवान कहते हैं जो अपना चरित्र शत्रु के लिए भी नहीं बदलते।

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  22. कहीं कहीं पर ही लगता है कि कविता नहीं पढ़ रहा हूँ.
    सुन्दर अति सुन्दर !

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  23. पिछले कई दिनों से अपने मोबाइल पर आपका ब्लॉग खोलती ओर कुछ न पाकर झुंझलाहट हो जाती आज केन्टीन में बैठे बैठे यूँ ही opera mini खोला तो नयी तस्वीर नजर आयी
    पिता के सब मित्र पसंद नहीं होते ये सच है ओर कुछ से पसंदगी का दौर सिमित रहता है
    एक )
    बचपन ओर किशोरावस्था की उस नाजुक सी बॉर्डरलाइन पे कन्फ्युस से खड़े होते हो....सवालो का एक बड़ा पुलंदा जेब में लिए ..
    हमारी भी जेब में था ओर कहते है लड़कियों की जेब में ज्यादा सवाल रहते है

    दो )आपका आपका एक एक कन्फेशन सुनने को तैयार .....
    कन्फेशन????
    इंतज़ार रहेगा आप शुरू तो करिए
    तीन ).कुछ पते ......कुछ गलिया ....उम्र के एक दौर में बड़े महत्वपूर्ण होते है .
    आज भी है डॉ साहब ,आज भी
    ओर आपकी पञ्च लाइन
    एगो मापने का थर्मामीटर ,जिंदगी कभी एडिट नहीं होती .कसम से होती तो बस क्या क्या बदल डालते .
    आखिरी छह लाइने [पूरी पोस्ट का निचोड़ है ,उसी भतीजे को छिप कर खून देने आना जो जायदाद के लिए मुकदमा कर रहा है .आपके अंकल वाकई गलत वक़्त की बेहतरीन क्रियटीविटी है .
    ऐसे लोगो से ही ये दुनिया सांस ले रही है .
    त्रिवेणी ??????????????????????

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  24. अभी रिश्तों के बारे मे छोटी सी बात पढ़ी, अच्छा लगी..पढ़कर कर आपकी नयी पोस्ट "अपने अपने कॅनवस पर " याद आ गयी ...सोचा क्यूँ न आपके साथ इस बात को भी शेयर कर लिया जाए ....." जिंदगी मे कभी रिश्तों को बनाए रखने की कोशिश मत कीजिए | बस रिश्तों मे जिंदगी बनाए रखिए"....जैसा कि आपके पिता के मित्र ने किया बिल्कुल वही...

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  25. anuraag ji,
    tahedil se salam karata hoon aise shaks ko
    umr ke is padav par bhi aisi josh aur aisi vichar jo use apana nahi samjhate the unake liye ye bhavna..sach me great..

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  26. परतें खुल रही हैं,पता मिल रहा है की आपके संवेदनशीलता को प्रखर बनाने में कैसे व्यक्तित्व अवयवों या परिस्थतियों का सहयोग मिला है.......

    उस व्यक्तित्व के प्रति नतमस्तक होते हुए आपके प्रति भी नतमस्तक हूँ..... उर्वर जमीन में ही बीज पनपा करते हैं न....सो आपके ह्रदय और संवेदनशीलता की तो प्रशंशा करनी ही होगी.......


    आप के दिल की गहराइयों से निकले ये शब्द समूह एक ऐसा सुखद अनुभूति कराया करते हैं,जिसे शब्दों में बाँध अभिव्यक्त कर पाना असंभव है......

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  27. अगर जिन्दगी एडिट हो सकती तो हर जिन्दगी ब्लाकवस्टर होती

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  28. नमस्कार डाक्टर साहिब ,
    कितने संजीदा और गंभीर इंसान से आपने मिलवाया दर्द और गम को जिस तरह से उन्होंने सहेज लिया उफ्फ्फ्फ़.. सच में ये जिन्दगी है जिसमे हम कभी कभी जीने की कोशिश मात्र ही कर पाते हैं... मगर आपने जिस तरह से छोटी छोटी बातें लिखते है कमाल की बात होती है बहोत ही सरलता और तरलता से जहन तक उतर जाती है ....

    अर्श

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  29. ऐसे चरित्र आज बहुत मोहक नहीं लगते पर इन्हीं के दम पर आज दुनिया इकसार और समरूप होने से बची है....
    शुक्रिया इनसे मुखातिब करवाने के लिए.

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  30. अच्छा लगा इन अंकल से मिल कर !

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  31. किसी मोड़ पर इन सज्जन से मुलाकात हुई तो है !

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  32. सही है- ज़िन्दगी एडिट नहीं होती! अपना लहू लहू की पुकार सुन ही लेता है।

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  33. अगले कुछ पल खामोशी तय करती है..... aisi hi khaamoshi mere aas-pass es post ka marm aur khoobsurti taul rahi hai...

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  34. एक अच्छे रीडर की खासियत होती है कि वो किताबे लौटाने के मामले में इमानदार होना चाहिए। वो आप थे तो उसी तरह वो शख्स भी अपने लिए इमानदार था और साथ ही अपनों के लिए भी चाहे वो उनका शत्रु भतीजा ही क्यों ना हो क्योंकि वो ईमानदार के साथ-साथ इंसान भी थे, जो होना आज की तारीख में थोड़ा मुश्किल है।

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  35. बहुत इंतजार के बाद आपने फिर दिल को छु लेने वाली बात कह दी डॉ. साब...
    जिंदगी एडिट नहीं होती... काश हो जाती... :-(

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  36. "कुछ पते ......कुछ गलिया ....उम्र के एक दौर में बड़े महत्वपूर्ण होते है"

    कई बार सोचता हूँ आपके शब्द-चित्रों में उलझा कि मेरी जिंदगी के ये छोटे-छोटे सच आपके शब्दों में ढ़ल कर इतनी खूबसूरती से कैसे उतर आते हैं....पूरी पोस्ट एक दिलकश नज़्म का अहसास दिलाती है...कमबख्त ये अँग्रेजी के शब्द भी साँचे में ढ़ले लगते हैं, जब आप लिखते हो डाक्टर साब।

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  37. ४० दिनों की लम्बी अवधि........अस्वस्थ होने के कारण...कहीं कुछ छूट गया.......नहीं तो ,आज आपको पढ़ा ,फिर आँख भर आई......ये किस्सा नहीं हकीकत है ,आपकी और मेरी भी........एक प्रश्न ----आप इतना मार्मिक क्यों लिखते हैं ............मैं सच में रो रही हूँ .........

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  38. अपने भाग्य सराहिये... जो हमें ऐसे-ऐसे नगीने मिले है... गालिबन मैं ऐसा होते हुए भी इनके प्रति सख्त रवैया अख्तियार करने का विचार रखता हूँ... यह है ही इसी लायक...
    एक फांक है अनुराग जी, जिसे दोनों तरफ से बेतरतीब खीचा जा रहा है... और यह शगाफ़ दिन-ब-दिन बढ़ता ही जा रहा है... कुदरतन मेरे पिता जी भी आपके अंकल जैसे ही है... संभवतः ता-उम्र वो संघर्ष की परिभाषा गढ़ते रहे है...

    मैं खाई की बात कर रहा था... कुछ लोग भावुकता को अपने परिवार तक ही सिमित रखते है... कुछ विश्व्यापी होते है... कहने की ज़रूरत नहीं इनसे हुमिनिटी बची हुई है...

    लेकिन, कहाँ तक संवाद करूँ निराश हो जाता हूँ...

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  39. ये वाकई ज़िन्दगी का कैनवास ही है.. ऐसे कई किरदार है जो हमें अपने इर्द गिर्द कही ना कही नज़र आ ही जाते है.. एक ब्लॉग पर टिपण्णी में यही लिखा था कि उपरवाला हिंदी फिल्मो का राइटर लगता है.. साडी कहानिया एक सी बस किरदार बदल जाते है.. पर अगर ऐसा है तो हैपी एंडिंग भी ज़रूर होगी...

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  40. In sabhee ke baad aur kya kaha jaa sakta hai?

    http://kshama-bikharesitare.blogspot.com

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  41. anurag ji dayri vidha me aapne kamal ki samvdna k sath likha hai..........

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  42. देखा हर व्यक्ति को लगा ना कि इस व्यक्ति से कहीं ,मिले हैं हम। सच ऐसा ही लगा मुझे भी...! कितनी बार उससे कहा होगा कि पागलपन है ये। मगर मन में सोचा, ठीक तो है। अपना "मैं" इस कदर अलग रख के निर्णय लेना कितना अद्भुत है।

    कल पढ़ा था, मगर टिप्पणी देने को शब्द नही तलाश पाई। रात में जितनी बार नींद खुली ये अंकल एक रूम के सामने बहस करते दिखे। सुबह सुबह मेरठ वाले नाना जी की याद आई। क्या मेरठ के सारे बुजुर्ग अच्छे थे...??? सुबह से उन्हे फोन लगा रही हूँ, लगा नही।

    और सुनिये डॉ० साहब ऐसा लिखना छोड़ दीजिये जिससे हुई बेचैनी की दवा के लिये आपका ही मरीज बनना पड़े।

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  43. किसी महान चरित्र का वर्णन करना बहुत कठिन होता है अक्सर ऐसे चरित्र को हर किताब मे एक जैसे ही शब्द मिलते हैं मगर आप्की शब्द-शिल्प को तो सलाम है ऐसे चरित्रों के कारण ही आज समाज खडा है बहुत लाजवाब रचना है आपको बहुत बहुत बधाई

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  44. डाक्टर साहब ये तो नही पता समाजिक होना क्या होता है पर वाकई हमेशा की तरह बेहतरीन प्रस्तुती
    एक सवाल इस बार त्रिवेणी गुम हो गई......

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  45. आपके लेखन से नये नये सामाजिक चरित्रो से मुलाकात हो जाती है आभार

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  46. किताबो के साथ सबसे अच्छी बात यही है की आप इन्हें कभी भी अपनी जिंदगी में शामिल कर सकते है....बिना किसी शर्त के ...वे भी किसी किताब के चरित्र की तरह है ....कभी नौकरों पर भी गुस्सा नहीं होते ...एक बार अपने ड्राइवर को नौकरी से निकालने के इरादा लेकर लॉन में बैठे थे....बाद में उसे अडवांस के पन्दरह सौ रुपये देकर छुट्टी देकर उठे .

    .इतने दुखो के बाद भी वे अपनी उदासी को जैसे पाइप में समेट देते थे ...अब तो कम पीते है पर एक समय में चिमनी थे ...बाद के दिनों में जब मैंने सिगरेट पीना शुरू किया ....उस धुंए की गंध से कंट्रोल कर पाना मुश्किल होता था ........सिंहअंकल जैसे चरित्र एक पोस्ट में समेटे नहीं जा सकते ...मुश्किल है उन्हे समेटना भी बदलना भी.....
    शायद उस वक़्त की मिटटी में ही कुछ ऐसे तत्व मिले थे जो एक बहुतायत में उस दौर की पीड़ी में ये सामान्य "अवगुण "पाया जाता था .एक रोज ऐसी ही एक बारिश की रात लेम्प की रौशनी में उन्होंने अपनी लाइब्रेरी में अपनी एक पसंदीदा किताब पढ़ते पढ़ते मुझे मुझे एक बात कही थी ... . जानते हो ...कितने लोग बिना कोई किताब पढ़े पूरी उम्र गुजार देते है ...बुरी बात नहीं है ..पर कभी कभी सोचता हूँ ..वे जानते भी नहीं वे .क्या मिस कर रहे है ..उस वक़्त उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी .वे जैसे उस किताब को सबको बांटना चाहते थे .

    some people said they are finding difficulty in reading my blog...i request them to download mozilla firefox from google.

    अक्सर मेरी पोस्ट पढने वाली @राखी इन दिनों मुझे सिर्फ मेल करती है ...अलबत्ता उनके मेल लाजावाब होते है ओर आँख खोलने वाले भी .आज सुबह ऐसा ही एक मेल मुझे मिला जिसकी आखिरी की कुछ लाइने ज्यू की त्यु दे रहा हो ....


    The HAPPIEST people do not necessarily have the BEST of all. They simply APPRECIATE what they find on their way”.

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  47. ऐसे ही लोगो को देखकर लगता है दुनिया अभी भी बहुत खूबसूरत है, ये लोग दुनिया बनाते है॥ मै उनके क्रित्यो मे किताबो के रोल को भी मानूगा जहा वो उन चरित्रो को देख पाते होगे..

    हो सकता है हमे वो अज़ीब लगे, लेकिन वो भी उन कुछ किताबी पात्रो कि तरह है, जिन्हे हम अपने सबसे करीब पाते है और अपने आप मे जिन्हे खोजते है लेकिन असलियत मे बन नही पाते...

    .... हमेशा की तरह एक और लाज़वाब पोस्ट। आप अपना एक ’short stories' का सन्ग्रह क्यू नही निकालते? विश्वास करे, मै पन्क्ति मे सबसे आगे हूगा, उसे अपने पास रखने के लिये॥ :)हिन्दी किताबे मैने ज्यादा नही पढी, लेकिन ’शेखर एक जीवनी’ मेरी फ़ेवरेट है। नही पढी है, तो पढे...

    धन्यवाद..

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  48. इस तरह के लोगों से सामना बहुत कम हुआ है जो अपना नुकसान करने वाले पर भी प्रेमभाव रखते हैं। ज्ञान जी से सहमत हूँ कि मैं ऐसे लोगों का आदर तो करूंगा लेकिन रोल माडल बनने की संस्तुति नहीं करूंगा।

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  49. बहुत दिनों बाद....शायद तीन महीने गुजर गए...पहले आंखों का ऑपरेश, फिर बहन की शादी की मुफलिसी, उसके बाद परदेसी होना। न्यूजीलैंड में नई जिंदगी की शुरूआत करने के लिए मकान को घर बनाने की इस बीच नेट से दूरियाँ रहीं...अभी दो दिन पहले ही नेट लगा है। आज आपके ब्लॉग पर आकर दुनियादारी को शब्दों की जुगलबंदी में देख लिया...मेरा एक काम करेंगे। उन अंकल को मेरा प्रणाम कहिएगा और कहना कभी न बदले...इनके जैसे चंद पूजनीय लोग ही इंसानियत को जिंदा रखते हैं और समय के गुजरने के साथ देवता हो जाते हैं....मेरे पापा कहते थे भगवान पत्थर को नहीं आपके अंकल जैसे लोगों की रूहों में रहते हैं......

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  50. अपने अपने ढँग से लगभग सभी के साथ होता यही है, जो खुद को नहीं दिखता.. पर देखने वालों को दिखता है !
    वह है.. अपने अपने फ़लसफ़े ! अपनी सोच के मुताबिक सबों ने कुछ फ़लसफ़े गढ़ रखे होते हैं, और इन्हें जीना ही जैसे उनकी ज़िन्दगी का मकसद बन जाता है !
    इसी को तुम इस कैनवास पर बखूबी उतार सके हो ! बेहतरीन !

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  51. आपके सिंह अंकल कितने अच्छे हैं ये जान गए हम भी :-) ईश्वर ने सारे सद`गुण उन्हें देकर भेजा है सब का भला करने
    आपका लिखा हमेशा पसंद आता है अनुराग भाई , इसी तरह लिखते रहीये
    - लावण्या

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  52. कि‍ताबें आईना हैं और हमने इसमें अपना गुजरा हुआ कल देखा है और आनेवाला भवि‍ष्‍य भी।

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  53. सही कहा आपने डाक्टर अनुराग. 'हादसे भी जिंदगी में तकदीर बदलते हैं'

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  54. बचपन ओर किशोरावस्था की उस नाजुक सी बॉर्डरलाइन पे कन्फ्युस से खड़े होते हो....सवालो का एक बड़ा पुलंदा जेब में लिए .... ओर दूसरी ओर जैसे हर कोई पादरी का लिबास पहने होता है ...आपका आपका एक एक कन्फेशन सुनने को तैयार

    ... किताबे आपके कई सवालों के जवाब देती है ....

    किताबों को तो हमने भी ऐसे ही जिया है एक दोस्त , गाइड और फिलोस्फर की तरह।

    ....उनसे उनकी किसी पसंदीदा किताब का जिक्र करो तो उनकी आँखों में वैसी ही चमक उभरती है जैसे किसी बाप से उसके बेटे की तारीफ करने पर उभरती है ....
    पर शायद कुछ लोग ऐसे ही होते हैं जो भरपूर जीते हैं फिर भी कहीं कोई शिकवा नहीं होता।

    .....फिर कौन है जिसके लिए वे खून देना चाहते है ....अन्दर कमरे में झांकता हूँ.....उनका छोटा भतीजा है....एक्सीडेंट हुआ है ...
    वही जिसने उनपर प्रोपर्टी के लिए केस किया हुआ है।

    कहना हो गा कि राइट मैन इन द रान्ग टाइम्स
    ..."जिंदगी एडिट नहीं होती डॉ ..यही मुश्किल है .. ...
    डाक्टर साहब वाकई जिन्दगी एडिट नहीं होती रोज खबरें एडिट होती हैं लिखा हुआ भी एडिट होता है पर जिन्दगी जो कर जाती है वो कभी एड़िट नहीं होता।

    लेकिन त्रिवेणी कहां है?

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  55. क्यों डॉ इगो मापने का भी कोई थर्मामीटर होना चाहिए ....नहीं ...

    बेहद ही बेमिसाल खयाल

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  56. bhut achha aalekh likha hai .darasal aise achhhe logo se hi sansar ki khubsurti brkrar hai .
    aise hi aalekh aur sachhe logo se mivate rhiye .
    shubhkamnaye

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  57. कुछ लोगों को ईश्‍वर सही समय पर सही जगह फिट करता है। वास्‍तव में ईश्‍वर को ऑप्टिमम यील्डिंग नहीं चाहिए होगी। क्‍योंकि उसकी रचना तो वह स्‍वयं कर सकता होगा। इसलिए कुछ विशिष्‍ट लोगों को विशिष्‍ट रचनाधर्मिता देकर बैलेंस बनाए रखने का प्रयास करता होगा।

    वैसे यह मैं सोचता हूं वह देखकर जो है। और आखिर में शंकराचार्य कह देते है यह सब मिथ्‍या है। यह विचार फिर हरैस कर देता है।

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  58. जिंदगी एडिट नहीं होती डॉ ..यही मुश्किल है .. ...
    speechless !!!
    अति भावुक कर दिया आपने अब इस पोस्ट के जरिये अनुराग जी ....:(
    ज़िन्दगी के खट्टे -मीठे अनुभव बखूबी बाँधे हैं ...

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  59. antarman ko sahlaati behtareen post.

    duniya kee asli khubsurati aise hi logon se hai.

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  60. ped jitna budha,uski chaya utani hi adhik,kuch log aise hi mann ki dhoop par chaya se rehte hai,bhavuk post.

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  61. ..."जिंदगी एडिट नहीं होती डॉ ..यही मुश्किल है ..

    आपने तो दिल जीत लिया मेरा । वाह क्या बात कही है........

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  62. तौबा .....!

    मन में कई भावनाएं उठीं ...सोचने पर मजबूर करती आपकी लेखनी हमें एक सीख दे जाती है ....मानवता का ...!!

    सभी रिश्तों से ऊपर ....सभी गिले-शिकवों से ऊपर इस धर्म को जो जी जाये वही तो इंसान कहलाता है ......मेरा नमन दीजियेगा उन्हें ......!!

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  63. जिन्दगी एडिट नहीं होती ...सच...और वक़्त रुकता नहीं ,शब्दों और भावों का जोड़ बेजोड़ होता है आपकी पोस्ट में. खोखले होते जाते रिश्तों में इंसानियत का रंग भरते सिंह अंकल को प्रणाम ...ये भी सच है की, कोई एक किताब पढ़े बिना कोई एक पूरी उम्र कैसे गुजार देतें हें ....इतनी बारीकी से सब कुछ सहेजना -लिखना आसान नहीं है आपको भी प्रणाम ..अब बहुत दिनों तक उमड़ती घुमड़ती रहेगी दिल में आपकी ये पोस्ट .

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  64. भाई अनुराग साहब,आपका ब्लॉग अद्भुत है, आप डॉक्टर होने के साथ शब्द प्रयोग करने के बेहतरीन तरीके से मुखातिब हो रहे हैं, पूरा ब्लॉग ही अच्छा है, किस किस की तारीफ करूँ, पोस्ट भी अच्छी हैं, मुद्दे भी नए हैं,, एक सम्पूर्ण क्रियाकलाप का लेखा जोखा आप संभालकर चल रहे हैं,,,,आपका ब्लॉग पढ़ा अच्छे से पढ़ा खूब पढ़ा,, हर पोस्ट पसंद आई..इसके लिए तारीफ वगैरह जैसे शब्द सही नहीं है..आप बेहतरीन है..बेहतरीन कार्य कर रहे हैं...धन्यवाद


    Nishant kaushik

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कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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