2009-08-07

"मेरी तामीर में ही मुज्बिर है इक सूरत खराबी की "


हमारे घर के ठीक सामने रहने वाले प्रोफेसर साहब कहा करते थे ...आज के ज़माने में पैसा उड़ रहा है .बस उसे पकड़ने की तरकीब आनी चाहिए .....हर आदमी ने अपनी अपनी तरकीब निकाल रखी है ..रोज नयी नयी निकल रही है ...जिंदगी इसी तरकीब में गुजर रही है... आपकी जिंदगी का कुल निचोड़ एक टोटल है ...करके देखिये ... सारी पास बुक , पोलिसिया ऍफ़ डी ,सोना . जमीन के कागजात ...हम सबके पास एक आंकडा है ....किसी का ज्यादा तो किसी का कम ..... सारी भाग - दौड़ ...सारी .कवायद...इतने झूठ ...इसी आंकडे की खातिर ...पीछे क्या क्या छूटा. है .. कभी हिसाब किया है.....अंगुलियों पे गिनने की कोशिश करिये कितने इंसानों की जिंदगी में आपके किसी कदम से..सपोर्ट से ...सकरात्मक बदलाव आया है .....कभी आँख बंद कर दिल पर हाथ रख कर एक सवाल खुद से पूछिए ... आपके मरने के बाद कितने लोग आपको याद करेगे ..आपकी बीवी ...बेटा .ओर शायद एक आध दोस्त......कब तक ?आपकी जिंदगी में एक टोटल ये भी तो है.........
कभी यू ही सोचा है की ये ज्ञानी मुनि बड़े बूढे इतने सालो से आत्मा आत्मा चिल्ला रहे है ..आखिर है क्या बला ?ऐसी कौन सी चीज है जिसके शरीर से निकल जाने पर इस शरीर की कोई वक़्त नहीं रह जाती.......
हम डार्विन-लेमार्क को महान वैजानिक घोषित करते नहीं थकते ...पर अपनी आत्मा का इस्तेमाल कम उम्र से ही करना बंद कर देते है ... आत्मा की एट्रोपी भी तो होती होगी ....कोई तो सिस्टम होगा जो उसे भी डीटोक्सीफाई करता होगा ...
ऐसे सवाल बहुत डराते है .....पर ये भी सच है भरे पेट ही ऐसे सवाल उठते है ....ओर इनकी उम्र भी ज्यादा नहीं होती ....
दो साल पहले पुणे जाते वक़्त मै फ्लाईट में ..छत्तीस साल की उम्र के एक सॉफ्टवेयर इंजिनियर से मिला था जो लाखो रुपये महीना कमा रहा था ..पर पिछले दो सालो से सो नहीं पा रहा था ..काम की भाग दौड़ में उसे इन्सोमिनिया हो गया था ......
सड़क के बीच एक रेलवे क्रॉसिंग पर फाटक बंद है..आप पहले से खड़ी गाडी के ठीक पीछे लाइन में खड़े हो जाते है .पीछे से एक बड़ी गाडी आपके आगे से गुजर कर टेडी होकर खड़ी हो जाती है..उसके पीछे कई ओर ...फाटक खुलने में कुछ देर की मशक्कत के बाद वे आपसे पहले निकल जाती है ....आप सोचते है क्या फायदा मेरा डिसिप्लिन में रहने का ...जिंदगी भी एक फाटक है .. फर्क सिर्फ इतना है ...वक़्त के साथ आपकी गाड़ी की पोजीशन भी बदलती जाती है ..... ..वो कौन से कारण है की पहली क्लास से सच बोलना चाहिए पढ़ते पढ़ते आठवी क्लास तक पहुँचते पहुँचते हम जान जाते है की ये सेंटेंस सिर्फ पढने के लिए है....वक़्त को अगर फ्रेम में बंद करके लगाया जा सकता तो हर फ्रेम अलग अलग तस्वीर बयान करता ..
तो क्या सचमुच पैसा इतना बुरा है ...पर जिंदगी में बड़ा घालमेल है ....
२००६ का सर्दियों का कोई महीना -
लोयंस क्लब की ओर से एक हेल्थ केम्प है .मेरा एक दोस्त एक्टिव मेंबर है इसलिए विशेषगो की जमात में बतोर विशेषग मै भी वहां मौजूद हूँ....पास के गाँव के बच्चे है स्कूली ड्रेस में .नंगे पाँव ...डी एम् मुख्या अतिथि है .उनकी पत्नी भी साथ है .केम्प के बाद उन्हें कुछ कपडे दिए जा रहे है ,मैडम के हाथो ..मैडम मुस्करा कर एक दो बच्चो से सवाल भी पूछ लेती है ...क्या बनोगे बड़े होकर...डॉ ,इंजीनियर ..ऐसे जवाब इस पूरी प्रक्रिया के फोर्मेट को फिनिशिंग टच दे रहे है ...मै भी अपने मोबाइल से खेल रहा हूँ... "मै पैसे वाला बनूगा "उस लाइन के आखरी बच्चे का जवाब है .. ..निगाह उठाकर देखता हूँ... पतला दुबला सात साल का लगभग कुपोषित सा बच्चा है... समय ने .मैडम को भी पोलिश्ड कर दिया है .. वे उसके बालो को सहला कर आगे बढ़ गयी है ...पूरी भीड़ में शायद उसने ही सच बोला है......

साल २००५ महीना याद नहीं -
तीन दिन से एक एडमिट केस देख रहा हूँ ...एडमिट फिजिशियन दोस्त के अंडर है ..पेम्फिगस है ...तीस साल की जवान औरत ...एक इन्वेस्टिगेशन है .जो बाहर होना है ...शाम तक नहीं हुआ है ...अस्पताल वाले कहते है ..पति मना कर रहा है ...वो सामने पड़ता है...क्यों ?मै पूछता हूँ.....अभी ऍफ़ .डी तुड़वाई है साहब .पोस्ट ऑफिस वाले कहते है कल मिलेगे ...उसका छोटा बच्चा अपने बाप की अंगुली थामे मुझे देख रहा है....मेरी सारी अकड़ ढीली हो गयी है ....

जावेद अख्तर साहब ने एक बार कही लिखा था ...मुश्किल हालात में जीना भी एक आर्ट है ...वक़्त ने अच्छे समय के लिए भी ये डेफिनेशन मुक़र्रर कर दी है .. ...एंड लाइफ इज नौट फॉर बेड एक्टर्स यू नो !
खवाहिशे लाइन लगा कर खड़ी है ..इस जीवन को मै भरपूर जीना चाहता हूँ....ओर दुःख से मुझे घबराहट होती है ..तो क्या पैसा ही सुख है ....सुरक्षा है..... जमीर भी अपनी स्पेस चाहता है ..मै फिर कंफ्युस हूँ....पर आज की दुनिया में ...जब वारेन बुफेट नाम का आदमी अपनी कुल संपत्ति का ८३ प्रतिशत हिस्सा दान कर देता है तो हैरानी होती है ..ओर ये हैरानी ओर भी बढ़ जाती है जब हमें उस हिस्से की .कीमत मालूम पड़ती है ......... जानते है वो हिस्सा कितना है ...३७ अरब डालर ..यानी १६६६ ० अरब रुपये .....
आप ओर मै तीन जन्मो में भी इतना पैसा नहीं कमा सकते ...कम से कम मै तो नहीं ...क्या कारण रहे होगे उस इन्सान को इस निर्णय तक पहुचने के.......पर क्या हम उम्र के किसी मोड़ पर पहुंचकर कोई भी छोटा दान कर सकते है ?
यूँ भी इस दौर में भावनाये डिसपोजेबिल है.... ओर हर सुबह एक डस्ट बिन की माफिक ....






"मेरी तामीर में ही मुज्बिर है इक सूरत खराबी की "
मजाज़ की इस लाइन का मतलब है ....मेरे बनने में ही बिगड़ने की एक सूरत छिपी हुई है

60 टिप्‍पणियां:

  1. "मै पैसे वाला बनूगा "
    सच तो बस यही है डॉ साब..! बाकि तो रटे रटाये जवाब हैं।

    पैसा आ जाये तो बस फिर सारे दान, पुण्य, ईमानदारी, कट्सी सब दिखाने को आ ही जाते हैं। ज़रा सा आवेश दिलाओ तो रंग उतरता भी बहुत तेजी से है।

    इस दौर में भावनाये डिसपोजेबिल है....

    दूसरा सच ये है...! आपने कहा मैने सुना..सुनने में अच्छा लगा कह दे रही हूँ..." बहुत सही बात...!"
    यहाँ से निकलते ही सड़क पर जाने कितने कुपोषण के शिकार बच्चों को देखूँगी। और घर जाने की जल्दी में सब अवॉईड करती हुई गाड़ी तेज कर दूँगी..!

    उत्तर देंहटाएं
  2. एक आंकडा तो अपने पास भी है.. लोग बाग़ जमीन जायदाद क्यों जमा करते है.. जमा तो सिर्फ चार आदमी करने चाहिए.. जो लास्ट मोमेंट पर कन्धा दे सके.. लेकिन जमीन जायदाद छोड़ने पर लास्ट मोमेंट पर कंधे देने वाले चार नहीं चार सौ आ जाते है.. शायद कुछ ऐसा ही सोचकर विशाल भारद्वाज फिल्म कमीने बना रहे है.. बकौल विशाल "फिल्म का हर पात्र कमीना है.." सिर्फ फिल्म का....????

    सोचता हूँ सुबह शाम दो वक़्त की रोटी के इन्तजाम में पिसते आदमी के पास क्या ये सोचने का वक़्त होता होगा कि कौनसा धर्म अच्छा है या बुरा.. या फिर पेट भरने के बाद ये ख्याल आता होगा.. एट्रोपी और डीटोक्सीफाई से पाला नहीं पढ़ा कभी.. क्या बला है वैसे ये?

    वैसे एक बात और है.. दुनिया में कुछ लोगपर सिर्फ हंसा जा सकता है.. जो सबसे पहले ट्रैफिक लाइट पर स्टाप लाईन के ठीक पीछे खड़े होते है.. और देखते ही देखते उनके आगे गाडिया कड़ी हो जाती है.. उनके पीछे जो बैठी है वो उन्हें चार बात सुना देती है.. वो चुपचाप सुन भी लेते है.. पर अगली बार फिर वही स्टाप लाईन से ठीक पीछे.. ऐसे लोगो पर भगवान भी हँसता होगा.. कि क्या बना दिया मैंने.. पर शायद कोई ना कोई तो उन्हें हीरो कहता होगा..

    एक और उम्दा पोस्ट.. बिलकुल चमचमाती हुई..

    उत्तर देंहटाएं
  3. amazing post anuraag ji
    dil ko chooti hui aur aankho ko bharti hui ,hamesha ki tarah .. lajaawab aur ek soch kojanm deti hui bhi hai


    regards

    vijay
    please read my new poem " झील" on www.poemsofvijay.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  4. is post par tippni karne ka man nahiN ho raha.
    chup rahna chahta huN.

    उत्तर देंहटाएं
  5. पैसे का गणित कुछ ऐसा ही है. हम लोग दिखावे में उस्ताद हैं, नैतिकता का ढकोसला करते रहते हैं, लेकिन जो नैतिक हैं उन्हें दिखावे की जरूरत नहीं पड़ती. जिन्दगी का शिड्यूल गर आदमी के हाथ में होता तो हंगामा बरप चुका होता. अच्छा ही है कि इसकी कमान कहीं और है.

    उत्तर देंहटाएं
  6. हमारे घर के ठीक सामने रहने वाले प्रोफेसर साहब कहा करते थे ...आज के ज़माने में पैसा उड़ रहा है .बस उसे पकड़ने की तरकीब आनी चाहिए .....

    ---- दिल्ली में कहते है सड़क पर फेका हुआ है बस चुनने वाला चाहिए... अलबत्ता हम सब्जी की जगह अभी सुबह-शाम सोयाबीन खा रहे है... अब वो ज़माने भी गए जब लोग दाल पीकर रह जाते थे....

    हर आदमी ने अपनी अपनी तरकीब निकाल रखी है .. ------- एक टोटल ये भी तो है.........

    यहाँ से पढ़कर लगा कोई पुराना अहा! जिंदगी हाथ लग रहा है और में यशवंत व्यास की एडिटोरिअल तो नहीं पढने लगा... वोही कतरा-कतरा जिंदगी...

    दो साल पहले पुणे...

    यहाँ से लगा कि अनुराग जी को पढ़ रहा हूँ.... फिर तो इतना कुछ सोचने को दे दिया कि सर पकड़ कर बैठा हूँ... मूड वैसे भी शाम तक ही बनता है और शाम से पहले ही... क्लास ले ली आपने...

    रही बात जावेद अख्तर की... तो तरकश कि यह मिसाल

    "गिन-गिन कर मेरा हाथ खुरदुरा हुआ
    जाते रहे लम्स भी हाथों की

    ... मुआफी अधूरी सी लाइन याद है...

    पर क्या हम उम्र के किसी मोड़ पर पहुंचकर कोई भी छोटा दान कर सकते है ?

    आपका आशय जिस दान से है वो समझ सकता हूँ... पर मुआमला क्या है न, ज़रा सा डीप्लोमटिक हो जाता है, यह नैतिकता, वचन सभी डायनासोर की जैसे लुप्त हो जायेंगे...

    गर तरक्की हटा दीजिये तो क्या हम माधो और घीसू नहीं बन जायेंगे?

    चलते-चलते...

    मजाज रोमांटिक ही अच्छे थे... उनको वोहीं रखते तो...

    "मैं जिस दुनिया में रहता हूँ वो उस दुनिया की औरत है"

    उत्तर देंहटाएं
  7. पैसा ही तो सत्य है ,ब्रह्म है बाकी मिथ्या है तृष्णा है . न जाने कितने कुपोषित बच्चे रोज़ आँखों के सामने से गुजरते है हाथ फैलाते है लेकिन हमारे हाथ अपनी जेबों तक नहीं पहुचते . क्योकि आत्मा खो गई है . डाक्टर साहब या बड़े आदमी के घर जाते है तो बढ़िया महंगी वाली चोकलेट हमारे हाथो में होती है . क्योकि आत्मा खो गई है .

    उत्तर देंहटाएं
  8. ज्ञान जी तो केवल विज्ञापन करते रहे हैं असली दिमागी हलचल का नमूना तो बस यहीं है यहीं है ! हे भगवान !

    उत्तर देंहटाएं
  9. पता नहीं कहाँ उड़ रहे हैं पैसे...अपने ऑफिस में लोगों को देखती हूँ...रोज रात १२ बजे घर जाते हुए...किसी के एक साल की बेटी है और उसे अफ़सोस है की उसने देखा ही नहीं कब वो घुड़कना छोड़ कर चलने लगी...लगता है भागते भागते हम कहाँ आ गए हैं और क्यों...दोस्ती, प्यार, रिश्ते ये सब भी निभाने के लिए थोड़ा वक़्त चाहिए...थोड़ा ही सही.

    बेहतरीन पोस्ट...फिर से जिंदगी को करीब से देखती हुयी. सवाल करती हुयी , जवाब तलाशती हुयी. शुक्रिया.

    उत्तर देंहटाएं
  10. नोट उड़ रहे हैं। पकड़ने की कोशिश करते करते हाथ, पैर पूरा शरीर थक चुका है। लोगों ने तो जाल बना लिए हैं, वैसे ही जैसे मक्खी मारने के लिए होते हैं। उसी से पकड़ लेते हैं। तीस बरस में एक जाल तक बुनना नहीं आया। अब मुश्किल वक्त में जीना सीख रहे हैं। लोग हैं कि सामने चारा लटका कर घोड़ा दौड़ा रहे हैं। घोड़ा है कि जानता है इस चारे का कोई भरोसा नहीं फिर भी दौड़े जा रहा है।

    उत्तर देंहटाएं
  11. जिदंगी रुपी स्वेटर को जिस तरह आपने उधेडा है। सच आदमी बैठा बैठा सोचने लगता है। पर फिर चंद समय बाद आदमी उसी आडी तिरक्षी राहों पर चलने लगता है। और इन्हीं राहों पर चलते चलते कभी आदमी गिरता है उठता है और एक नया सबक लेकर आगे बढ जाता है। पर कोई एक फार्मूला कभी भी लागू नही होता है। कभी पैसा अच्छा लगता है और कभी शांति अच्छी लगती है। पर सुकून कही नही मिलता है और आदमी मर जाता है। कभी सोचता हूँ कि आदमी पैसा और शांति के बीच एक संतुलन नही बना पाता है जिससे वह तड़फता रहता है। संतुलन के फार्मूले पर ही तो यह सृष्टि चल रही है। अरे मैं तो भाषण देने लगा। खैर पोस्ट का जवाब नही हमेशा की तरह। पोस्ट पर फोटो बडे जबरद्स्त लगाते है आप।

    उत्तर देंहटाएं
  12. बहुत डूब के लिखा यह भरपूर दर्शन.

    अथाह पैसा आने तक पैसा ही सबकुछ है, जो इसे नहीं मानते वो अपने न कमा पाने को जस्टिफाई करते है-ऐसा कहीं पढ़ा था.

    मेरे बनने में ही बिगड़ने की एक सूरत छिपी हुई है - ये एक सूत्र के समान है हजार अर्थों वाले.

    उम्दा लेखन!!

    उत्तर देंहटाएं
  13. paisa bilkul jaruri nahi jeene ke liye..yeh baat aap tab kahte ha jab aapke pass boht paisa ho ,,koee greeb kabhi nahi kah sakta ki paisa jaruri nahi jeene ke liye..boht sach kaha aapne swaal bhi bhare pet hi uthte hai...life is really not for bad actors...

    उत्तर देंहटाएं
  14. हम सबके पास एक आंकडा है
    कभी आँख बंद कर दिल पर हाथ रख कर एक सवाल खुद से पूछिए ... आपके मरने के बाद कितने लोग आपको याद करेगे ..आपकी बीवी ...बेटा .ओर शायद एक आध दोस्त......कब तक ?आपकी जिंदगी में एक टोटल ये भी तो है.

    sooooooooooooo very true Anuraag ji !!!

    उत्तर देंहटाएं
  15. " आपके मरने के बाद कितने लोग आपको याद करेगे ..आपकी बीवी ...बेटा .ओर शायद एक आध दोस्त"

    समय सब से बडा़ मरहम है...धीरे धीरे सब भूल जाते हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  16. बहुत दिन पीछे चले गए अनुराग जी ,जब आपका ब्लॉग पढना शुरू किया था तब आप ऐसे ही पोस्ट लिखा करते थे रौ में ,बिना किसी भरी भरकम शब्दों का इस्तेमाल किये हुए यूँ ही रोजमर्रा की जिंदगी से महसूस किये हुए फिर अचानक आपकी पोस्ट छोटी होने लगी ,गेप ज्यादा होने लगा ,विचार कम शब्दों में बड़ी बात कहने लगे ओर हम जैसे पाठक यही सोचने लगे की लिखने में इतनी कंजूसी क्यों ?बड़े दिनों बाद आप उसी अंदाज में नजर आये अच्छा लगा .
    इस पोस्ट में जो सवाल उठाये गए है शायद जिंदगी में सभी उन सवालों से गुजरते है , पैसे न होने की भी अहमियत जानते है ओर पैसे होने की भी .पर जो मेन सवाल है वो ये है की आपने अपनी जिंदगी में किसी दुसरे के लिए क्या किया ?कितनो के लिए किया .पैसा तो सभी कमाते है ,कमा रहे है पर आपका ये सवाल
    "पर क्या हम उम्र के किसी मोड़ पर पहुंचकर कोई भी छोटा दान कर सकते है ?"

    माना की आज कल की जिंदगी में खुद को एस्टेब्लिश होने में वक़्त लगता है पर जब सब कुछ सेटल हो जाए उस वक़्त दान करने की सोच सकते है .
    आखिरी लाइन पञ्च लाइन है
    भावनाये डिसपोजेबिल है.... ओर हर सुबह एक डस्ट बिन की माफिक ....

    उत्तर देंहटाएं
  17. The ART of Living is to SMILE even while you feel pain & raise another human being with your out stretched hand .
    Disillusionment is every where apparently but we need to put aside the cynicism & positively act to make not only our life better but touch a few more lives.
    I think the Billionaire Mr Warren Buffet thinks like this --
    Nice post, don't be cynical , life is a Rainbow inspite of the showers of sadness.
    warm rgds,
    - Lavanya
    from Cincinnati, OHIO, USA

    उत्तर देंहटाएं
  18. वाह क्या बात है डाक्टर साहिब कितनी खूबसूरती से आपने संजोया है जिन्दगी के हर पहलू को रचना के हर पैरा में ... हर पैरा में जिन्दगी की सच्चाई को आपने बयान किया है ... वही एक बच्चे ने सही जवाब दिया था मुझे पैसे वाला बनना है ... जहां तक वारेन बुफेट का सवाल है तो उनके बारे में तफसील से पढ़ी है मैंने ... अगर हर कोई उनके सोच का कुछ हिसा ही अपने जिन्दगी में इस्तेमाल करे तो ये मेरा भी दवा है के वो अपनी कमाई से दुगना कमाई करने लगेगा क्युनके वो कमाने से ज्यादा उसे खर्चने और उसकी सेविंग के बारे में ज्यादा बताते हैं... आज की पोस्ट भी कमाल की है हमेशा की तरह...बहोत बहोत बधाई हुजूर...


    अर्श

    उत्तर देंहटाएं
  19. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  20. Anurag saab, How many people are there who do things keeping end in mind...

    उत्तर देंहटाएं
  21. सही कहा डॉ साहेब आपने...
    जिंदगी भी एक फाटक है .. फर्क सिर्फ इतना है ...वक़्त के साथ आपकी गाड़ी की पोजीशन भी बदलती जाती है ... और कहे तो सारी चिजे रिलेटिव होती है.. वक्त और स्तिथि के अनुसार हम नफा नुकसान तय कर इमानदार और बेइमान होते है.. तर्कों को अपने हिसाब से आगे पिछे कर लेते है और दिलासा देते है कि हमने सही किया.. लेकिन अंतिम गणित भूल जाते है.. पिछले साल मेरे ८५ वर्षिय नाना का निधन हुआ उनको अंतिम यात्रा के लिये तैयार कर रहे थे.. मैं उनका लाड्ला था/हूँ..तो खुद उन्हे तैयार कर रहा था.. इतने में किसी की नजर उनके गले की चैन पर पड़ी.. और कहा इसे निकाल दो.. पता है नाना ने भरी बिमारी में भी कभी उस चैन को अपने से अलग नहीं होने दिया... मुझे बुरा लगा कि आज वो बोल नहीं सकते तो हिम्मत कर रहे है.. लेकिन कोई सुनने वाला नहीं था..

    उत्तर देंहटाएं
  22. काश हम सब आंकड़ो से बाहर और उससे ऊपर की दुनिया के बारे में सिर्फ सोच भर पाते........!!

    उत्तर देंहटाएं
  23. कमाल का लिखते हैं डॉकटर साहब! हर बार पढ़कर यही लगता है जैसे विचारों का एक भँवर नाच रहा है और मैं उसकी सतह पर एक तिनके की तरह गोल-गोल घूमता जा रहा हूँ। आखिर में इसके केन्द्र में समाकर भीतर चला जाता हूँ। फिर देर तक डूबने-उतराने का सिलसिला चलता रहता है। ...मन जीत लिया है आपने।

    उत्तर देंहटाएं
  24. सच कहा डाक्टर साहब ...मरने के बात आपको कितने लोग याद रखते हैं...यही तो माकूल प्रश्न है..कोशिश में रहता हूँ की ..मेरे साथ बीतने वाले हर पल को यदि कोई याद करे तो ..ऐसे याद करे की उसमें हमारी भी तस्वीर हो...अब ये तो मरने के बाद ही पता चलेगा की ..कितना सफल हो रहे हैं..हमेशा की तरह दिल को छूती पोस्ट ......

    उत्तर देंहटाएं
  25. कुछ दिन पहले एक विज्ञापन आता था ... शायद देखा हो ! बड़ा प्यारा जिंगल था - "मेरे देश में पैसा, सिर्फ पैसा नहीं है !"
    इस 'एड' ने यह तो जता ही दिया था कि हमारा 'सोशल स्ट्रक्चर" पैसे के इर्द-गिर्द ही घूमता है ! लेकिन लोग इसके बारे में बातें करते हुए बड़े 'हिप्पोक्रेटिक' हो जाते हैं .... दार्शनिक भाव से कह उठते हैं - "भैया रूपया तो हाथ का मैल है"

    सब जानते हैं कि पैसे के बगैर बुढापा ज्यादातर दुखदायी ही होता है ... उनकी 'इम्पोर्टेंस' कम से कमतर होती जाती है क्योंकि उनके पास बचता है महज 'एक्सपीरिएंस' ... जो कि अक्सर 'आउट डेटेड' हो जाते हैं ! 'मनी' तो 'एवरग्रीन' है ... तभी तो एक और 'एड' समझाता है - 'पापा गुम हो जाएँ .... डोंट वरी ... बस पैसा नहीं गुम होना चाहिए !

    यह 'सायिकोलोजिकल' डर और भावनाओं का 'काकटेल' समाज में पता नहीं कब से चला आ रहा है ! यकीनन पैसे की 'इम्पोर्टेंस' कई गुनी बढ़ गयी है, पर अक्सर सोचता हूँ कि बेइंतिहा पैसा कमा लेने के बावजूद भी इंसान को सुकून के लिए अध्यात्मिक गुरुओं की शरण में क्यों जाना पड़ता है ?

    पैसा अगर सब कुछ है तो घरों में रहने वाले बेघरों की संख्या बढ़ती क्यों जा रही है ? यह पैसा बढ़ते हुए तलाक की दर को घटा क्यों नहीं पा रहा है ? क्या कारण है कि बुजुर्ग लोग वृद्धाश्रम अथवा अकेले रहने में अधिक संतुष्टि का अनुभव करने लगे हैं ?

    उत्तर देंहटाएं
  26. झकझोर दिया हमेशा की तरह.

    क्यों बन गये आप डॊक्टर? इस दिल को लेकर कब तक आपकी पोझीशन बदलते रहेंगे? डिसिप्लीन की बैसाखी कब तक कांख में दबाते फ़िरते रहेंगे?

    मेरे पास जवाब नहीं है इसका.मैं सालों से बैसाखी को ढो रहा हूं और जवाब ढूढ रहा हूं . आपको मिल जाये तो बता देना.

    उत्तर देंहटाएं
  27. देर रात गये दर्शन के इन जटिल उलझे तंतुओं को आपके शब्दों के जरिये समझने की कोशिश करता हूँ...कर रहा हूँ...कुछ सवाल मेरे पास भी आ खड़े होते हैं...
    आप और शाय्द हम भी तो शुरू से बिगड़े हुये हैं डाक्टर साब{आपने ही कहा था मेरे एक पोस्ट पर और आपसे इत्तफ़ाक रखता हूँ} तो हमारी तामीर हमारे बिगड़ने में हुई,,,फिर ये सवाल किनके लिये?

    उत्तर देंहटाएं
  28. sir ji...film supari ka gaana yaad aa gaya aap ki ye post padh ke...

    ek saans aur ek saans kam, ek saans mein bite janam...

    उत्तर देंहटाएं
  29. अभी सोच ही रहा था कि अब आपकी पोस्ट की तलब हो रही है और देखने को मिल गयी.शायद एकाध दिन और पहले आ जाती तो मांगते ही मुराद पूरी हो जाने वाली बात हो जाती.
    हमारे यहाँ ज़्यादातर लोग तंत्र में खामी और असंतुलित विकास के कारण गरीब है.एक बड़ी आबादी यहाँ दिन भर खटती है तब जाकर वो बच्चों को अपने बचपन से बेहतर बचपन और शिक्षा दे पाती है.पैसा यहाँ एक बड़ा जटिल और ज़रूरी सवाल है.
    काफी झिंझोड़ दिया इस बार आपने.

    उत्तर देंहटाएं
  30. बनने में बिगड़ने वाली बात जमी. और पैसा तो ऐसा ही है ! बड़ी जालिम चीज है, अभी कुछ दिनों पहले पढ़ रहा था कि बस मीडियम ऑफ़ एक्सचेंज है... कोई वैल्यू नहीं होती, वगैरह वगैरह !
    सारी थियोरी क्यों लिखी पढ़ी जाती है !
    खैर एक बड़ा सीओ इन्सिडेन्स है... कई दिनों से कोई पोस्ट नहीं पढता और उसी दिन भटकते हुए आता हूँ जिस दिन आपकी कोई नयी पोस्ट आती है ! बहुत कुछ अजीब है दुनिया में.

    उत्तर देंहटाएं
  31. पैसे को डिस्पोजेबल भावनाओं की तरह देखने वाले कम ही हैं
    वारेन बफेट का जिक्र ही काफी है पैसे की बेवफा फितरत को समझने के लिए, जो ज़िन्दगी भर इसके पीछे भागा उसको न पैसा मिला ना चैन. दुनिया के अब तक के श्रेष्ठ निवेशक बफेट का कोई सानी मुझे आनेवाली कई सदियों में नहीं दिखता, महामंदी के दूसरे दौर में 1929 के दोहरा जाने से आशंकित अमेरिकी प्रशासन ने उनसे इस बार कुछ सुझाव मांगे तो उनका कहना था कि किसी मादक द्रव्य के इंजेक्शन से बचाया गया कुछ भी स्थायी नहीं होगा अतः निवेशकों को तय करने दीजिये बाज़ार का भविष्य. जो लोग आज का पैसा कल दुगना करना चाहते हैं वे जानते ही नहीं कि बफेट एक दीर्घ कालीन निवेशक थे वे आने वाले बीस साल के परिणामों को देख पाते थे. बाकी लगता है आप भी रोज़ के दो हज़ार की फीसछापने के स्थान पर दीर्घकालीन निवेशक बने हुए हैं कवि कृष्ण कल्पित जी जब पी कर संजीदा हो जाते थे तो हम नौसिखियों को ज़िन्दगी की असली कमाई के बारे में कहते थे कि लोगों ने पैसा कमाया है कल्पित आदमी कमाता है. आप भी लगे रहिये इसी कमाई में. शुभकामनाएं !

    उत्तर देंहटाएं
  32. छोटी सी जिंदगानी का बड़ा सा फसाना है रूपइया...पहले कहा जाता था सांई इतना दीजिए जामे कुटुंब समाए। मैं भी भूखा न रहूँ मेहमान भी भूखा न जाए। लेकिन अब ये भूख इस कदर बढ़ गई है कि इंसान की इंसानियत कब हजम हो जाती है पता नहीं चलता....यादों की जुगाली और शब्दों की जुगलबंधी में पिरी सुंदर पोस्ट।

    उत्तर देंहटाएं
  33. बस समय समय का फेर है ...

    फटे हुए जूते के साथ १२ किलोमीटर पैदल चलकर मन में ख्याल आ रहा है कि आज शाम खाना खाया तो कल जूते कैसे सही होंगे...खाली पेट बिस्तर पर बस एक ही बात चाहता हूँ कि मैं पैसा कमाऊँ....ढेर सारा पैसा....बाकी बातें बाद में....

    वक़्त बदलता है तो ख्याल भी थोड़े नरम होते हैं ....

    सब वक़्त वक़्त की बात है

    उत्तर देंहटाएं
  34. स्‍टीफन आर कोवे को पढ़ा तब कई दिन तक मैं भी यह सोचता रहा था कि वास्‍तव में दिशा क्‍या होनी चाहिए। जवाब तो अब तक नहीं मिला है लेकिन इस बीच रॉबर्ट कियोस्‍की को पढ़ा रिच डैड पुअर डैड में। तब लगा कि पैसा भी एक खेल है। जो लोग पैसे के लिए जीते हैं उन्‍हें पैसा नाच नचाता है और जो लोग पैसे को अपना नौकर बना लेते हैं वे सचमुच अमीर बन जाते हैं। वारेन बफेट अमीर हैं। उन्‍हें अपने पैसे से काम कराना आता है।
    फिर अब मैं सोचता हूं कि देखते हैं जिंदगी धक्‍का दे उससे पहले मैं खुद दिशा तय कर लूं। कभी जिंदगी जीतती है तो कभी मैं जिंदगी को धक्‍का दे देता हूं। अंतत: धक्‍का जिंदगी को ही लगता है लेकिन एक संतोष होता है दिल में कि किसी और के धक्‍के से नहीं बल्कि अपने निर्णय के धक्‍के से इस मुकाम पर हूं। यह मुझे अधिक संजीदा और नियंत्रित बनाता है।

    पता नहीं पैसे वाला बनना चाहता हूं या नहीं लेकिन कतार में कई बार खड़ा हुआ हूं। अंत तक निर्णय नहीं कर पाया हूं कि क्‍या बनना चाहता हूं।

    उत्तर देंहटाएं
  35. पैसे की अहमियत से कौन इनकार कर सकता है लेकिन किस के लिए कितना काफी है यह व्यक्तिगत पैमाने पर तय होता है.
    आज की तेजी से भागती दुनिया में देखा जाये तो इन्सान confuse है..उसे खुद नहीं पता चल पा रहा की उस के लिए क्या अच्छा है क्या बुरा?

    उत्तर देंहटाएं
  36. यूँ भी इस दौर में भावनायें डिसपोजेबिल है.... ओर हर सुबह एक डस्ट बिन की माफ़िक .... बह्त सच बात है । हमेशा कि तरह इस बार की पोस्ट भी बहुत से सवाल छोड जाती है जिनके जवाब किसी के पास नही है ।

    उत्तर देंहटाएं
  37. पैसे में कुछ तो ताकत है. तभी तो हमारे देश में अभी भी २०% लोग बिलों पावर्ती लाइन की श्रेणी में आते हैं. अगर पैसे में ताकत न होती पेरिस हिल्टन के कुत्ते करोडों के महल में न रह रहे होते. लेकिन यह भी सच है की पैसे से सच्चा सुख और नींद नहीं खरीदी जा सकती. पैसा ज़रुरत है पर जिंदगी नहीं.

    उत्तर देंहटाएं
  38. kuch sawaal jo aksar mujhe paresaan kiya karte hain , aaj aapne bhi unka jikr kar hi diya ...jaise ki ..kabhhi socha hai ki marne ke baad kitne log aapko yaad karenge ...aapki beewi ..beta..ek aadh dost ...
    sach aaj aadmi ne paise ke aage insaniyat aur rishton ki kadr karni chod di hai to fir koi aur kyun yaad karega unhe ...unke paas paisa hai naa....aur ye aatma ...ye bhala hoti kaun hai mere maamle me taang adane wali ...bakwaas ...kyun kadr karoon mai in bhavnaon ki ...inhone bhala kisi ko aaj tak kuch diya hai bhala ...to bech dalo inhen raddi ke bhaav ...
    hame to waqt ki daud me aage nikalna hai bas ...wo chahe kaisi bhi ho ...paise ki daud ya ...raiway crossing par lagi caron ki daud ..kis ko fursat hai peeche mud kar dekhne ki ...wo hai naa ki uski car bhala meri car se aage kaise ...so DONT B EMOTIONAL ..PAR YE KAMBAKHAT AATMA HAI NAA MERI IS JAHAN KI NAHI HAI HAI ...KAHIN ITIHAAS SE BHATAK KAR YAHAAN AA GAYI HAI SHAYAD ...AB MILI HAI TO NIBHANA TO PADEGA HI ...

    उत्तर देंहटाएं
  39. कोई भी कमाई, अगर समाज के काम न आई
    तो किस काम की ?

    एक सीमा से ऊपर समृद्धि होती ही इसलिए है ताकि समाज का विकास हो सके। दुर्भाग्य से लोग इस पर अमल नहीं करते।

    उत्तर देंहटाएं
  40. मुझे पैसे वाला बनना है पहली बार नहीं सुना था ....इससे पहले भी तकरीबन १८ साल पहले ...बोलने वाला कोई नन्हा गरीब बच्चा नहीं था आई ए एस ऑफिसर की संतान था.खूब किताबे पढने वाला दर्शन साहित्य ...फिलोसफी ....उसका कहना था की वो बड़ा होकर आई ए एस ही बनेगा ओर करप्ट ही...सत्ता ओर ताकत का विजन उसे तबसे क्लियर था ...१६ की उम्र में .तब हम आदर्श वादी हुआ करते थे .ओर तमाम किताबे पढ़कर सोचते थे दुनिया बदल देगे ...दुनिया तो नहीं बदली अलबत्ता हमने अपनी कमियों को लफ्फाजी से बचाना सीख लिया .....न हमने कोई तीर मारा न आसमान में कोई बादल फटा ....
    मेरी इस पोस्ट को पढ़कर मेरे साथ पढने वाले मेरे कॉलेज के दोस्त ,सीनियर ...जो कभी मेरी पोस्ट पर टिपण्णी नहीं करते है पर दूर परदेस में रहकर भी इसे वक़्त निकलकर बांचते है .मुझे मेल पर कहते है
    इस पोस्ट से दो ही मतलब निकलते है या तो तुमने बहुत पैसा कमा लिया है या कुछ भी नहीं कमाया है ....कही तुम्हारी टांग तो नहीं टूटी है प्लास्टर लगाये बिस्तर पे लेटा आदमी भी आध्यात्म की बाते करता है ...

    दूसरा दोस्त कहता है ...अपने गजल के शौंक को जिलाए रखो ....उलजलूल किताबे मत पढो .फ़िलहाल उन्हें दस साल के लिए मुल्तवी कर दो........
    जब मैंने प्रेक्टिस शुरू की थी सोचता था "इतना" एक दिन में बहुत रहेगा.....पर "इतना " बढ़ता गया ...कम नहीं हुआ..


    इत्तिफकान मेरे एक दोस्त ने एक एस एम् एस मुझे कल ही भेजा .उसका मजमून कुछ यूँ था...

    INTEREST IN DISEASE &DEATH IS ONLY ANOTHER EXPRESSION OF INTEREST IN LIFE .


    @सिद्दार्थ का ये कहना
    "पता नहीं पैसे वाला बनना चाहता हूं या नहीं लेकिन कतार में कई बार खड़ा हुआ हूं। अंत तक निर्णय नहीं कर पाया हूं कि क्‍या बनना चाहता हूं।"
    लगता है हम सब की आत्मकथा का हिस्सा है...
    आप सभी का शुक्रिया

    उत्तर देंहटाएं
  41. aap master hai anurag sir, aaj tak jitno ko bhi aapke blog ka link diya sab fan h o gaye hai aapke :) aur mai sabe bada, kyonki aap sach likhte hai, mere aas pas ki chizein likhte hai, jo mere sath hota hai ya hum sab ke sath hota hia ya hum auro ke sath karte hai woh likhte hai,

    कभी आँख बंद कर दिल पर हाथ रख कर एक सवाल खुद से पूछिए ... आपके मरने के बाद कितने लोग आपको याद करेगे ..आपकी बीवी ...बेटा .ओर शायद एक आध दोस्त......कब तक ?आपकी जिंदगी में एक टोटल ये भी तो है.........


    yeh shabd bahut mayne rakhte hai mere liye, bahut sochat hu is barein mein aur niskarsh aata hi ki kisi ko mere marne se fark nahi padega shayad, :) aapse jeevan mein ek baar miluga jarur, khwaish hai meri yeh :)

    उत्तर देंहटाएं
  42. anurag sir.. hamesha ki tarah ekdam dil ko chhoota hua.. aap hi ki ek triveni yaad aa gayi..

    कुछ बादल के टुकड़े,कुछ ख़ूबसूरत लम्हे जाया हुए
    जेब टटोली तो ढेर सारे सिक्के जमा हुए थे...

    लो एक ओर दिन ख़र्च हो गया ज़िंदगी का

    yahi hota hai hamare sath.. ham chand kagaz ke purze jama karne ke liye jane kitne haseen lamhe yun hi zaya kiye jate hain.. akhir mein sirf itna pata chalta haii ki zindgi ka ek din kharch kiya hai hamne.. kuch kamaya nahi.. behad touching post..

    उत्तर देंहटाएं
  43. मेरे पास एक ही शब्द है आपकी इस पोस्ट के लिए..."लाजवाब"...

    राजेश रेड्डी का एक बहुत पुराना शेर है...जी उसने मुझे सन इकहत्तर में सुनाया था...
    ज़िन्दगी का रास्ता क्या पूछते हैं आप भी
    बस उधर मत जाईये भागे जिधर जाते हैं लोग

    वो खुद शायद इस शेर को भूल गया हो लेकिन मैंने इसे उसी दिन से गाँठ बाँध लिया...इसलिए अपने पास अपना ना बेंक बैलेंस है, ना ज़मीन है ना मकान है और ना ही गाडी...याने टेंशन का कोई सामान ही नहीं है...सच.
    नीरज

    उत्तर देंहटाएं
  44. 2 दिन से ने्ट नहीं छल रहा था आपकी पोस्ट पहले पढ ली होती तो दिन अपनी आत्मा डिटाक्सीफाई त्प कर लेते जब से बलागिन्ग शुरू की है तब से तो अपने लिये समय ही नहीं मिलता मगर अब तो आपने याद दिला दिया बहुत विचारणीय पोस्ट हैदुनिया भर की बातें सोच लेते हैं मगर अपने अन्दर झाँकने का समय नहीं निकाल पाते कुछ अच्छा तो तभी सोच सकते हैं अगर खुद मे खुद को देखें गे और सोचेण्गे कि क्या सही है क्या गलत बहुत बडिया पोस्त है बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  45. देर से पढ़ी यह बेहतरीन पोस्ट ...पर सच तो यही है की पैसा आज कल सब कुछ हो गया है ..ज़िन्दगी सस्ती .उड़ती है रोज़ धुएँ सी और न जाने कहाँ से कहाँ लम्हों में बीतती जा रही है ...बाद में कौन याद करे यहाँ तो लगता है अपने चारों तरफ देख के माहौल के जीते जी ही सब कुछ कहीं गुम होता जा रहा है ..आज के युग का सच ही बोला उस बच्चे ने मैं पैसे वाला बनूँगा

    उत्तर देंहटाएं
  46. जब तक जिंदगी फर्राटे से दौड़ती है सारे लोग धन और वैभव की सीढ़ियाँ चढ़ने में अपनी काबिलियत और मनोवृति के हिसाब से कोशिश करते हैं। हम सब यही कर रहे हैं। जब जिंदगी की गाड़ी अंतिम स्टेशन के करीब पहुँचने लगती है तो फिर उन चीजों में वो मज़ा कहाँ रह जाता है जिन्हें दौलत खरीद सकती है तो फिर मकसद की याद आती है और कुछ दान पुण्य हो जाता है।

    हाँ एक बात और बहुत सारे सुदामा सरीखे लोग चुपचाप दान पुण्य में लगे होंगे पर हम लोग तो सिर्फ बिल गेट्स और वारेन बुफेट जैसे लोगों की बात करते हैं। असली त्याग तो उन्हीं का है जो धन से तब अपने को अलग करें जब उनकी उसे सख्त जरूरत हो।

    उत्तर देंहटाएं
  47. कुछ कहने को नहीं है सिवाय शानदार के। फ़िलहाल यही कह रहे हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  48. पीछे क्या क्या छूटा. है .. कभी हिसाब किया है....
    kise fursat hai yahan itne hisaab rakhne ki....zindagi aise sawaalon mein guzar jaati hai...

    awesum post anurag ji...aaj bahut din baad aapka blog padd rahi hoon...aur paddne ke baad bahut saare saawal hain mann mein :)

    उत्तर देंहटाएं
  49. अनुराग जी,आपने बहुत ही अच्छी बात कही.आत्मा का प्रयोग तो लोग बंद ही कर चुके है.परंतु जीवन की दौड़ मे इतना व्यस्त है की उन्हे बस खुद का ही ट्रैक दिखाई देता है.
    जैसा वो करे वही सही बाकी लोग तो उन्हे बेवकूफ़ सा दिखते है...

    उत्तर देंहटाएं
  50. अभी ऍफ़.डी तुड़वाई है साहब.पोस्ट ऑफिस वाले कहते है कल मिलेगे"
    उस बदनसीब को पता है कि जिंदगी कल का इंतज़ार नहीं करती मगर डाकखाने को नहीं पता न, हमारे सिस्टम को नहीं पता - वह सिस्टम जो जीवन से बड़ा है, भगवान् से बड़ा है और काफी हद तक सड़ा है.

    उत्तर देंहटाएं
  51. Doctor sahab,

    आपका ये पोस्ट शायद अब तक का बेहतरीन पोस्ट होगा। मुझे बेहद पसन्द आया।
    ऐसा मेरे साथ बहुत बार हुआ, पर आपका लिखने का अन्दाज़ तो अलग ही होता है। मैं भी सोचता हू, के क्या फ़ायदा हुआ Discipline में रहने का, जब लोग बाद में आ कर पहले निकल जाते हैं फाटक पर

    बस आप से एक दर्खवास्त है, कि अंग्रेज़ी के शब्द लिखने के लिये अंग्रेज़ी का ही इस्तेमाल करें। अंग्रेज़ी शब्दों को हिन्दी में पढ़ने में बहुत कठिनाई होती है

    जैसे की
    कन्फ्युज़न
    confusion

    and many more...

    पोस्ट आपकी बहुत पसन्द आई, अगर इजाज़त हो तो अपने दोस्तों के साथ share करना चाहूँगा। अपने आफिस के internal blog पर्।

    उत्तर देंहटाएं
  52. डॉ. साब मुझे अच्छा लगा आपके विचार जानकर.... मुझे और भी अच्छा लगा लोगों की टिप्पणियाँ पढ़कर... मुझे तब बहुत ही अच्छा लगेगा जब आप सभी २४ घंटे में सिर्फ १ घंटा ऐसा कम करो.... जिससे रात को चैन के नींद सो सको....

    मैं पिछले १ साल से एक प्रोजेक्ट में काम कर रहा हूँ "RahatKosh" जैसा नाम से ही स्पष्ट है ये समाजसेवा का काम है. पर इसमें पैसा कही नहीं है. सिर्फ रात को चैन की नींद सोने के लिए एक प्रयास है... बहुत ही जल्द मैं आपके सामने इसे लेकर आऊंगा.. और आप सभी का साथ चाहूँगा.

    मैं ये सब बातें यहाँ नहीं करना चाहता था. पर डॉ. साब जी ने पोस्ट ही ऐसा कर दिया की मुझसे रहा नहीं गया...

    गलती के लिए माफ़ी चाहूँगा.

    उत्तर देंहटाएं
  53. कई दिनों बाद नेट पर आई हुई हूँ आपकी दोनों पोस्ट जिंदगी जीती और जिंदगी के करीब खींचती हुई पढ़ कर मुस्कुरा रही हूँ ...

    उत्तर देंहटाएं
  54. आशीष जी,

    समाज सेवा के काम से सुकून मिलता है। ऐसा मैने बहुत लोगो से सुना है। पर मुझे दान दे कर कुछ खास खुशी नहीं होती (और ना ही दुख होता है )
    जब भी लगता है, कि मैं किसी की मदद कर सकता हूँ, तो अपनी हैसियत और खुशी अनुसार मदद कर देता हूँ

    पर ऐसा तो कहना कि मुझे बहुत ज़्यादा सुकून मिल गया ये करने से तो, ये कहना शायद सच ना होगा

    उत्तर देंहटाएं
  55. @योगेश जी
    निसंकोच आप इसे शेयर करे ..एक बात ओर मै अंग्रेजी के ये शब्द जान बूझ कर चुनता हूँ...बस इसे शैली की एक बुरी आदत कहिये ...

    उत्तर देंहटाएं
  56. अनुराग जी,
    मुझे अंग्रेज़ी शब्दों से कोई दिक्कत नहीं, बस इतना चाहता था के अगर अंग्रेज़ी के शब्द आप English alphabets इस्तेमाल करें तो पढ़ने में आसानी रहेगी.
    यूँ कहिये ये तो आज कल आम भाषा हो गयी है, हिन्दी और बीच बीच में अंग्रेज़ी।

    वरेन बुफेट दान कर सकता है, यहाँ तो अगर एक घर बनाना हो, तो भी जाने कितने साल घिसना पड़ेगा, तब तो सपनो का एक आशियां तैयार हो पायेगा।

    पैसा तो बहुत ज़रूरी है, और जल्दी चाहिये हर किसी को। परन्तू अभी तक कोई shortcut मिला नहीं है।
    सोचा था शेयर बाज़ार एक ऐसा विकल्प हो सकता है पैसा कमाने का, मगर जल्द ही एहसास हुआ, कि शेयर बाज़ार में इंसान पैसा बनाता कम और गंवाता ज़्यादा है

    उत्तर देंहटाएं
  57. amazing.liked sm of your lines..alot.

    "ऐसे सवाल बहुत डराते है .....पर ये भी सच है भरे पेट ही ऐसे सवाल उठते है ....ओर इनकी उम्र भी ज्यादा नहीं होती .... "

    "वो कौन से कारण है की पहली क्लास से सच बोलना चाहिए पढ़ते पढ़ते आठवी क्लास तक पहुँचते पहुँचते हम जान जाते है की ये सेंटेंस सिर्फ पढने के लिए है....वक़्त को अगर फ्रेम में बंद करके लगाया जा सकता तो हर फ्रेम अलग अलग तस्वीर बयान करता .."

    and one last is
    "यूँ भी इस दौर में भावनाये डिसपोजेबिल है.... "

    TC.

    उत्तर देंहटाएं
  58. beautiful piece, makes you to sit and ponder over........

    उत्तर देंहटाएं

कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails