2009-10-01

जिंदगी !तेरे कुछ दिनों को रिवाइंड करना है...



"एयर पोर्ट पे जो सबसे बोर सी शक्ल वाला आदमी नजर आये समझो वो मेरा ड्राइवर है...हिन्दुस्तान में ही  आदमी  बिना  कोमन सेंस  के ठाठ  से गुजारा  कर सकता है  ओर वो  ठेठ हिन्दुतानी   है .... ओर हां  गाडी की  खिड़की खोलकर सिगरेट पीना .. वरना मेरी  बीवी  मेरी ऐसी-तेसी फेर देगी.".गाडी बीवी की है .... .प्रशांत ने फोन पर कहा था..बॉम्बे की  उस दो दिन  की वर्कशॉप  की  मेरी राते पहले से शेड्यूल्ड  हो गयी थी...... "मूर्खों से एक खास दूरी बनाये रखने की विधा का नाम शिष्टाचार है ."..प्रशांत अक्सर ऐसे  दार्शनिक जुमले वाजिब समयों पर आपके फोनों में ठेला करता है... .गैर वाजिब समय मतलब....रात  के तीन बजे ..ढाई बजे ........ ओर्थोपेडिक वाले एमेर्जेंसियो में रात भर भटकते है मालूम   है ...पर वो आज इमरजेंसी में है ये   पूरे  देश भर में फैले उनके दोस्तों को पता लग जाता था ...

 दिन भर की वर्कशॉप के बाद  हम तीनो दोस्तों  ने मिलना था ....तीसरा राजीव था  .....उसे  सलेक्टिव  एग्रोफोबिया था ...यानी भीड़ से डर .....भीड़ भाड़ वाली जगह  वो स्कूटर या बाइक पर अनकम्फर्टेबल  हो जाता ..ऐसी जगह  अवोइड  करता...  एक ही जींस को कई दिनों तक पहनकर घूमता... ..पूछते  तो  कहता .लकी जींस है.... अपने एक सत्तर के मोडल पुराने स्कूटर पे घूमता .....उसको याद करते ही छवि मिश्रा याद आती है ...  .जूनियर .सीनियर  कई लोग उसके लिए कतार में थे ......ओर .छवि उसके पीछे पागल थी ... छवि के मामी पापा यू एस में थे ...इंडिया में वो अपने दादा दादी के साथ रहकर पढ़ रही थी... पर जाने क्या हुआ उस रोज जब हम लोकर रूम में क्रिकेट खेल रहे थे ...छवि उससे कुछ बात करने आयी थी......जिसके बाद  वो गुस्से में थी ....."कावर्ड्स" ...तुम्हारे दोस्त में गट्स नहीं है ...हाउ ही फेस  दिस वर्ल्ड  आउट साइड दिस केम्पस  ....मुझसे बोली थी...मुझे बड़ा अजीब लगा था ..हम दोस्त जानते थे उसे छवि पसंद है.फिर क्या हुआ ? अगले तीन महीने में वो यू एस चली गयी.......
.. कहते है जो आदमी बीस की उम्र में भला होता है वो तीस की उम्र में भी भला ही रहता है ओर चालीस की उम्र में भी .. राजीव शायद जन्म से भला था ...अपने ठेठ भलेपन के बावजूद    उसने  हमें  कई अजीब सी आदते सिखाई जिन्हें शरीफ लोग शरीफाना नहीं कहते .मसलन ..कोल्ड ड्रिंक में एक एक्स्ट्रा आइस क्यूब ओर नमक डालकर पीना ....अंडो की हाफ  फ्राई में कुछ इनोवेशन कर टोमेटो फ्राई बनाना ..हेंग ओवर के लिए दही खाना ... अब  सोचता हूं प्यार केवल कैम्पस  की  उस चाहरदीवारी  में ही सरवाइव कर सकता है ..  .…बाहर की  दुनिया की जद्दोजेहद  में  साले बड़े बड़े गम है .
प्रशांत ने मेरी सहूलियत के लिए गाडी रख छोडी थी ..चूंकि मेरी कांफ्रेंस होटल रेनिसेंस में थी .तो ये तय हुआ की दिन भर वे अपना कामकाज करेगे ओर मै कांफ्रेंस अटेंड करूंगा ...रात को सब इकठ्ठा होगे .
पर दोपहर  बाद वर्क शॉप   के  तीनो   टोपिक  में  कुछ नया नहीं था सोचा शायद राजीव यहां से नजदीक हो... अगला अच्छा टोपिक डेड घंटे बाद था .... ..  राजीव को फोन मिलाता हूं…"
.आधा  घंटे  का  रास्ता  है   अगर  ट्रेफिक    ठीक   रहा  तो …तू पहुँच जायेगा वो  कहता है ......… तकरीबन पैंतालिस  मिनट ....  बाद  उसे  किसी  हॉस्पिटल   के  नीचे  खडा  पाया "..दो  पेशंट  है ... राउंड   लेना   है ...दूसरा  दूसरे हॉस्पिटल में है  …तू  साथ   चलेगा मुश्किल से  ……पांच  मिनट   लगेगे …तब तक मै इसको देख आता हूँ मै वही ड्राइवर के साथ रुकता हूँ ..हॉस्पिटल किसी पुरानी इमारत  सरीखा सा है बाहर  से देखकर लगता नहीं की हॉस्पिटल  भी है ...बाहर  केवल एक बोर्ड लगा हुआ है ....इंग्लिश  के बाद  मराठी में ऊपर से  कुछ लिखा हुआ . .में ..शायद राज ठाकरे के डर से …पांच मिनट बाद वो नीचे उतर के आता है ..प्रशांत के ड्राइवर को वही छोड़ हमें  दूसरे हॉस्पिटल जाना है ...रास्ता सिर्फ कुछ फीट चौडा है एक तंग गली जैसा ...दोनों ओर बनी दुकाने .इतनी तंग की सामने से अगर कोई फॉर व्हीलर आ जाए तो रास्ता ब्लोक हो जायेगा .." वही साली गरीबी ....एप्लास्टिक अनीमिया ...मियां बीवी दोनों मजदूर .....खून तक चढाने के पैसे नहीं .....वो गाडी में बैठते ही  कहता है....वो मेडिकल कॉलेज में किसी से बात कर रहा है .उस पेशेंट को एडमिट करवाने के वास्ते ......मै हैरान हूँ के इन तंग गलियों में वो कैसे इतनी तसल्ली से गाडी चला रहा है .....
पर हम खाना नहीं खा पाये ...दूसरे पेशेंट   को देखते  वक़्त  उसकी एक ओर इमरजेंसी  कॉल आ गयी..इसलिए  मै  वापस अपनी कांफ्रेंस  वाले  होटल  आ गया .... ..
रात ९ बजे प्रशांत के घर.....
"..साला बड़े दिनों बाद अपने स्टाइल में पियेंगे ..जग्गू दा  के साथ ..यहाँ तो पिछले आठ सालो से बुढढो  के साथ पी पी कर बोर हो  रहा हूँ ....
राज नहीं  आया अब तक "वो पूछता है ....फोन मिला उसको .....
कोई पेशेंट सीरियस है उसका ...मै कहता हूं.....
वो फोन मिलाता है...कहता है आधे घंटे में पहुंचेगा ....तू फ्रेश हो ले .. तकरीबन आधे घंटे हम पाकिस्तान ओर न्यूजीलेंड का मैच देखते है.... करीब एक घंटे बाद वो घर में घुसा है.........  'साले कहाँ था अब तक .....तेरे चक्कर में भूखे बैठे है ....
...खाने का  क्या है ..बहुत भूख लगी है ....प्रशांत उसके लिए  एक गिलास में वाइन  भर रहा  है
"मेरा मत बनाना ....कॉल आ सकती है" ..राज मना करता है ...एक पेशेंट सीरियस है ...
राज  प्लेट में रखकर खाने लगा है..... प्रशांत के मोबाइल पर  नीरव का फोन है....वो  राजकोट में है ..बहुत बड़ा सेट अप  है ..अकेला मेनेज नहीं कर पा रहा हूँ... राजीव को बुला रहा हूं.....आता नहीं.साला नखरे दिखा रहा है ....उससे .कुछ देर इधर उधर की बाते होती है ......
जाता क्यों नहीं....... अच्छा ऑप्शन है तो ........फोन  रखने के बाद मै  राजीव से   कहता हूँ
वो सिर्फ मुस्कराता है ...
"क्यों साला एगो बीच   में आ रहा  है ... प्रशांत  उससे  कहता  है ... ...... तू  ओर नीरव तो  सबसे ज्यादा क्लोज़  थे ..इतना अच्छा पैकेज ओफर  कर रहा है ...
... वो चुप है...चुपचाप एक दो कौर मुंह में डालता है ....फिर कहता है
 याद है ...६०   -७०   के  आदर्शवादी  सिनेमा  का भाई  होता था  … बलराज  साहनी टाइप  ……भाई ऐसा  ही है .……पूरी  जिंदगी  हम में  खप  गया ...एक घूंट पानी ...
"उसकी तब नयी नयी शादी हुई थी….. तब ..पापा  को पेरालेसिस का अटेक हुआ था...उससे रिकवर नहीं नहीं कर पाये   प्राइवेट  जॉब.....लिमिटिड आमदनी…. एक  पूरा घर अचानक अपनी जिम्मेदारी लिए भाई के सामने आ गया ... स्लम एरिया का बी एम् एस डोक्टर कितना कमा लेगा .वो भी  ..जिसमे दया कूट कूट के भरी हो  .....   पर वो खीचता रहा दिनों को...हमें अपने आप को .भाभी को.... …… वो  स्कूटर  ..वो हँसता है ....  . सत्तर का मॉडल.... ....भाई  का था  .....  एक  बार  कॉलेज  आया था .बोला तू इतना पैदल चलता है .तेरे सब दोस्तों के पास बाइक है....अगले दिन  भिजवा दिया ... एक ठंडी सांस ......साली कोई जींस मेरे लिए लकी नहीं रही... एक्चुली मेरे पास तब   कुल तीन जींस थी ......फिर ...कुछ देर की खामोशी ...प्रशांत   घूरकर  वाइन  में  पिघलती   आइस को  देखता    है  ….एक  घूँट   में  सारी     पीकर  …..  उठकर बेवजह की चहलकदमी  करता है ...उसकी आदत बदली नहीं अभी ...कोलेज टाइम  में भी  बैचेनी   में  पूरे कमरे में घूम जाता था ..
. भाभी की आंखे  चुभती  थी  उन दिनों ..वो कुछ कहती नहीं थी पर उनकी आंखे जैसे तहरीर करती थी  अब भाई ..४५ की उम्र में पहला अटेक....हार्ट के पेशेंट बन गए है .... थक गये है बोझा ढो के हम सब का...इत्ते सालो से ....अब मेरा टर्न है... यार…."
हम तीनो   के बीच   खामोशी    फिर   पसर  गयी  है .. प्रशांत ने मेरे सिगरेट के पेकेट से सिगरेट जलायी है ... सिर्फ सिर्फ जग्गू दा अकेले गा रहे है...."अपनी आग को जिंदा रखना कितना मुश्किल है "
"तेरी  एक  बेटी  है  न तीन  साल  की …क्या  नाम  है  उसका "? ……मै माहोल को चेंज करने की कवायद में हूँ....
"ये ....वो मोबाइल में फोटो दिखाता है ...".छवि "!



रोज  उचककर  देखता था जो  इस जानिब
वक़्त को फलांगने की   बेजा कोशिश में .....
आज सुबह उसी लम्हे ने दम तोडा है


पुनश्च: कायदे में  तो इसे यूं लिखा जाना चाहिए था ..जिंदगी तेरे कुछ दिनों की रिवाइंड करना है ताकि मै उन्हें तरतीब से लगा सकूं.आपके तो मालूम  नहीं  पर वाकई मेरे पास कई ऐसे दिन पड़े है जिन्हें रिपेयर की जरुरत है !



61 टिप्‍पणियां:

  1. "मूर्खों से एक खास दूरी बनाये रखने की विधा का नाम शिष्टाचार है .".
    kya baat hai

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  2. @ ..कोल्ड ड्रिंक में एक एक्स्ट्रा आइस क्यूब ओर नमक डालकर पीना ....अंडो की हाफ फ्राई में कुछ इनोवेशन कर टोमेटो फ्राई बनाना ..हेंग ओवर के लिए दही खाना ...

    हमने भी कई आदतें पाल रखी हैं....चाय में डुबोकर रोटी खाना और केले को रोटी से लपेटकर फ्रैंकी समझ चुपुड चुपुड चबाना :)


    बहुत संजीदा पोस्ट। यादों को करीने से सहेजा गया है।

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  3. आपकी पोस्ट पढ़ते हुए लगता है सामने खुद मानव की जटिल जिन्दगी आ कर फुसफुसाहट भरे स्वरों में आपबीती सुनाती जा रही हो -जिन्दगी को इतनी करीब से महसूस कर पाना आपाधपी की इस जिन्दगी में बहुत कम ही हो पाता है -जिन्दगी से इन मुलाकातों के लिए बहुत शुक्रिया !

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  4. बहुत ही खूबसूरती से अपने को कह जाते हैं आप। यकीनन बहुत खूबसूरत अंदाज में।

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  5. वाह! एक नहीं कई सारी छवियाँ उतरी हैं आँखों में... दिल के करीब से गुजरती संवेदनशील पोस्ट से..

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  6. क्या बात है अनुराग....आज तुम्हारी तरह मेरी भी लाइफ रिवाइंड मोड में ही चल रही है!रोज़ की आपाधापी में भले ही कुछ याद न रहे लेकिन जब याद आता है तो एक एक पल सामने आकर दोबारा गुजरने लगता है!

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  7. रोज उचककर देखता था जो इस जानिब

    वक़्त को फलांगने की बेजा कोशिश में .....



    आज सुबह उसी लम्हे ने दम तोडा है




    इस रीवाइंड का ये हिस्सा बहुत शानदार रहा ........

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  8. नमस्कार डाक्टर साहिब,
    कैसे हैं ? पूछना वाजिब है क्युनके अरसे बाद मिलना हो रहा है आपसे हलाकि गलती मेरी ही है , मगर क्या कहूँ अजीब से ब्यास्ताता हो गयी थी... इसके लिए मुआफी ... बहुत ही खतरनाक टाईप का लेख पढ़ने को मिला इस बारी तो गज़ब की बात कही है आपने.. ऐसा रिवाईंड उफ्फ्फ्फ़ डर ही गया था मैं तो ... मगर लास्ट में त्रिवेणी ने जाकर साँस लेने पे मजबूर कर दिया मगर बधाई तो जरुर दूंगा आपको...

    अर्श

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  9. "मूर्खों से एक खास दूरी बनाये रखने की विधा का नाम शिष्टाचार है .".
    ये बात जंच गई और नोट करके रख ली. इजाजत हो तो अपनें ब्लॉग पर टांक लूँ.


    त्रिवेणी एकदम गहरी.

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  10. Triveni was good...
    But samajh me zara kam aai..shayad merii grammar aur literature abhi utni achhi nahi ho paai..

    Thori madad karenge samajhne me?

    Overall post was worth reading..

    परन्तू 3 पात्र होने के कारण थोड़ा कन्फ्यूज़न रहा मुझे तो पढ़ते वक्त, कौन किसके घर गया, वगैरा वगैरा

    पिछली पोस्ट्स के मुकाबले में ज़्यादा complex.

    मैं तो यही कहूँगा।

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  11. OH...

    ab meri term hai, use pata hai, thank's bolna usko, meri taraf se.


    aaj lag raha hai ki main bada ho gaya hoon, kyon? pata nahin.

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  12. इस बार पोस्ट कुछ मेरे ही मूड की है
    त्रिवेणी भी
    बहुत खूब और दिल खोल के लिखा हुआ है, किसी कि याद आती है पर कहने से क्या फायदा आपको पढ़ लिया अब सो जाते हैं !

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  13. शानदार तरीके से नॉस्टैल्ज़िक मोड में ले जाती है, यह पोस्ट ।
    बहलाते फुसलाते धीरे धीरे फिर उसी मोड़ पर ला पटकती है, जहाँ हम तन्हा मडराया करते हैं ।
    पूरे समय एक जानदार शब्द-चित्र बनता बिगड़ता सा लगता रहा !

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  14. WASHINGTON – The story of humankind is reaching back another million years as scientists learn more about "Ardi," a hominid who lived 4.4 million years ago in what is now Ethiopia. The 110-pound, 4-foot female roamed forests a million years before the famous Lucy, long studied as the earliest skeleton of a human ancestor.

    Read this & then this post ...

    I am learning new things every second of this day Anurag bhai ..You write so well ...touches the heart ...
    warm rgds,
    - Lavanya

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  15. डियर डॉक्टर,
    इतना सुंदर और भावनात्मक लिखा है कि प्रशंसा के लिए शब्द नही हें.
    ग़ज़ब का फ़लसफ़ा है "मूर्खों से एक खास दूरी बनाये रखने की विधा का नाम शिष्टाचार है."
    आपके अलावा डॉक्टर प्रशांत भी प्रशंसा के पात्र हें.
    साधुवाद !

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  16. निर्मल वर्मा को पढ़ने में जो मज़ा आता है वही इस फिक्शन को पढ़ने मे आ रहा है । मै फिर कह रहा हूँ आप उपन्यास लिखिये डॉक्टर ।

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  17. Sharad jee se sahamat laga ki koee kahanee padh rahee hoon, apne men duba lene walee. Triweni to khas hai.

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  18. भौत जटिल कर दिया गया मामला।

    हिन्दुस्तान में ही आदमी बिना कोमन सेंस के ठाठ से गुजारा कर सकता है - से असहमत। दुनिया भर में तमाम लोग बिना कामनसेंस के जी रहे हैं। कामन आदमी को छोड़कर कामनसेंस बचा किधर है?

    मूर्खों से एक खास दूरी बनाये रखने की विधा का नाम शिष्टाचार है . से भी असहमत। मूर्खों से साथ रहकर भी अलग रहने का विधा का नाम शिष्ठाचार होना चाहिये।
    प्यार केवल कैम्पस की उस चाहरदीवारी में ही सरवाइव कर सकता है .. .…बाहर की दुनिया की जद्दोजेहद में साले बड़े बड़े गम है .से असहमत। या तो इसे कालेज कैम्पस से बढ़ाकर दुनिया का कैम्पस किया जाये तब असहमति वापस हो सकती है।
    त्रिवेणी ठीकै लगी काहे से उसके बाद कोई जटिलता नहीं रही।

    बहुत दिन से वो छह फ़ुट वाली रोशनी वाला किस्सा खोज रहे हैं आपके ब्लाग पोस्ट के जंगल में। मिलकर नहीं दे रहा है। कहां छुपी है रोशनी?

    पोस्ट पढ़ने से ज्यादा मजा टिपियाने में आ रहा है। कित्ती दूरी रखी जायेगी? कित्ता शिष्टाचार निभाया जायेगा?

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  19. क्या कहें डाक्साब अभी कुछ रविवार को ही हम कुछ् पुराने दोस्त सपरिवार इकट्ठा हुये,हंसी मज़ाक के दौर मे खूब डुबकियां लगाई और कभी-कभी तो ऐसा लगे की बस डूबे ही रहें,बाहर निकले ही नही।बहुत बढिया पोस्ट।मै रविवार से सोच रहा था कि रिवाईंड करूं मगर………॥खैर अब ज़रुर रिवाईंड करूंगा,पिछली बार भी आपसे ही प्रेरणा लेकर पुरानी यादो को ताज़ा किया था,एक बार फ़िर वही करना है देखें कब तक़ कर पाता हूं रिवाईंड्।

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  20. नाम गुम नहीं होते, चेहरे भी नहीं बदलते...

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  21. कोई कहीं नहीं छुपता सब यादों में जीते हैं
    बगैर दोस्त के हम यूँ ही नहीं पीते हैं.

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  22. der se ayee comment karne..padh chuki hun pahle bhi..speechless ho jati hun hmesha ki tarah..ankhe dhokha de jati hai har baar,..keyboard dhundla ho jata hai...dil hai to dard to hoga hi..eska koee nahi hai hal shayd...

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  23. @yogesh
    जहाँ तक त्रिवेणी का सवाल है ...साल ७२/७३ में जब कमलेश्वर सारिका के संपादक थे ..(तब गुलज़ार साहब ने इस फार्म का इजाद किया था ...बड़ी दिलचस्प फार्म है.थोडी टेडी मेढ़ी भी....उन दिनों सारिका में खूब छपी........बकोल गुलज़ार .......
    "त्रिवेणी न तो मुस्सलस है ,न हाइकू ,न तीन मिस्रो में कही एक नज्म . इन तीनो फोरम्स में एक ख्याल ओर एक इमेज का तसलसुल मिलता है ,लेकिन त्रिवेणी का फर्क इसके मिजाज़ का फर्क है .तीसरा मिसरा पहले दो मिसरो के महफूम (मायने ) को कभी निखार देता है , कभी इजाफा करता है या उन पर कमेन्ट करता है .
    त्रिवेणी नाम इसलिए दिया गया था की संगम पर तीन नदिया मिलती है ,गंगा ,जमुना ,सरस्वती ,गंगा ओर जमुना के धरे सतह पर नजर आते है लेकिन सरस्वती तो तक्षिला के रस्ते से बह कर आती थी ,वह जमीन दोज हो चुकी है ,त्रिवेणी के तीसरे मिसरे का कम सरस्वती दिखाना है जो पहले दो मिसरो में छुपी है . "

    मिसाल के तौर पे उनकी लिखी त्रिवेणी देखिये......

    रोज उठके चाँद टांगा है फलक पे रात को
    रोज दिन की रौशनी में रात तक आया किये ....
    हाथ भर के फासले को उम्र भर चलना पड़ा


    वे अपनी तरह के शायर है कभी अहमद नदीम कासमी से प्रभावित होते है कभी अमृता से .... देखिये अगली त्रिवेणी में वो क्या कहते है .
    ये सुस्त धूप अभी नीचे भी नहीं उतरी
    ये सर्दियों में बहुत देर छत पे सोती है ...
    लिहाफ उम्मीद का कब से तार तार हुआ


    चार साल पहले २३ से ३० साल के कुछ लड़के लड़कियों ने उनकी इस फॉर्म को बड़ी शिद्दत से ...ऑरकुट पे आगे बढाया .वहां मेरा भी जाना नसीब हुआ ...ओर कई शानदार लोगो से मिलना भी हुआ.....ओर उससे एक बात ओर पुख्ता हुई..उम्र समझदारी का कोई पैमाना नहीं होती ...एक साल का वक़्त वहां बहुत खूब गुजरा ...खैर ....
    आखिर में गुलज़ार साहब की एक ओर त्रिवेणी

    "भीगा भीगा सा क्यों है ये अखबार
    अपने होकर को कल से चेंज करो ....

    पांच सौ गाँव बह गए इस साल

    आप गुलज़ार की "त्रिवेणी "नाम से किताब पढ़ सकते है जिनमे उनकी सारी त्रिवेनियों का कलेक्शन है ...किताब २००१ में पबिलिश हुई थी .प्रकाशक थे रूपा प्रकाशन नयी दिल्ली.....

    आपके सुझाव पे अमल किया है थोडा जल्दबाजी में पोस्ट की गयी पोस्ट है...इसपे चर्चा थोडी बाद में

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  24. गुलजार की कुछ् त्रिवेणी यहां देखिये

    http://hindini.com/fursatiya/archives/143

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  25. डाक्टर साहब ..आपको पढना ..ब्लोग जगत पर बिताये कुछ बेहद खूबसूरत और दिलचस्प पलों को जीने जैसा होता है...समझ ही नहीं आता कि किस बारे में..और किन शब्दों के लिये लिखूं कि वाह क्या खूब लिखा...सब कुछ नज़रों के सामने से घूमता चला जाता है..रिवाईंड का बटन मिले तो बताईयेगा....आज हरेक को किसी न किसी पल के लिये उसकी जरूरत है....

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  26. भीड्भाड से डरने वाला एक इन्सान मुंबई की गलियो से गुजरने का हौसला पा लेता है वक्त के ढ्लते....फ़िर उस वक्त अपने प्यार के लिये कयू पिछे हट गया था ?? जायज सी वजह रही होगी...पर समजौता क्या वहा पर भी जरुरी नहि था क्या ??

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  27. हर लम्हा परमानेंट मार्कर से दर्ज करा गया है खुद को.... चाहूँ भी तो मिटाया नहीं जा सकता , लम्हा है कागज़ नहीं , जलाया नहीं जा सकता , जिन्दगी रीवाईंड कर सके ऐसी तरक्रीब मिले तो बताना

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  28. कितना अच्छा होता न, अगर यादों को मैग्नेटिक टेप पर लपेटकर रख लिया जाता। साइड ए लगाई तो सारी बेहतरीन यादें छलक पड़ें और साइड बी में यादों के बोनस ट्रैक्स!!!

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  29. अनुराग जी, आपकी मोटी लाईने बहुत गहरी बातें कहती है। और हम उन गहराई में डूबते जाते है। सच जिंदगी के रंग कैसे कैसे होते है। सच आपकी पोस्ट को पढकर हम कुछ समय के लिए ना जाने कहाँ खो जाते है। ये बस आपकी लेखनी का कमाल है। ज्यादा कुछ कह नही पाऊँगा।

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  30. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  31. डाक्टर साहब सच बोला जाय तो पहली बार ये लेख पढ़ा तो लगा कुछ भाव व कुछ परिस्थितियाँ समझने में शायद मुझे गड़बड़ हो गई है मगर जब दुबारा पढा तो मेरा मन सुन्न सा हो गया ! समझ नहीं आ रहा था कि लेखक कि लेखनी के कमाल की प्रशंसा करुँ या फिर परिस्थितियों के चक्रव्यूह को समझने और महसूस भर करने में मशगूल हो जाऊं ! अंग्रेजी का शब्द है "Speechless" ,मैं करीब आधे घंटे के लिए तो speechless हो ही गया था :) इस लेख को समझने के पश्चात !! मैंने इस लेख को ही ३ बार पढ़ा और गहराई में डूबता सा चला गया, ! आपकी लेखनी और विषयवस्तु से मैं बहुत ही प्रभावित हुआ ! आपकी प्रशंसा भर करने से शायद इस लेख की निष्पक्ष समीक्षा हो पाना असंभव सा है !

    फिर भी यही कहूंगा कि आपकी लेखनी में चमत्कार करने की क्षमता है !!

    बहुत बहुत बधाईयाँ !!
    --
    Warm Regards
    Darshan Mehra

    "Happiness is a Decision !! "
    http://darshanmehra.blogspot.com

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  32. देर से आयी पर जानकर अच्छा लगा की इस दुनिया में अब भी बलराज सहनी जैसे भाई यदा कदा मौजूद है ओर उनके छोटे उनकी इस बात को समझते है .भीड़ से डरने वाले लड़को को रोज ही भीड़ में जीना सीख गया है वक़्त को .किस तरह से वो लड़का बहादुरी से को फेस करने लगा है काश छवि देख पाती .जहाँ तक मै समझी हूं छवि को इंडिया से बहार जाना था ओर उस वक़्त के हालातो को देखकर उसे घर परिवार को नहीं छोड़ना था .यही था न अनुराग जी .
    त्रिवेणी बहुत माकूल है .फ्रेश लगती है
    "वक़्त को फलांगने की कोशिश में फिर किसी लम्हे ने " ग्रेट इमेजिनेशन .

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  33. जाने क्या क्या कब कब दम तोड़ जाता है इन्सान के अन्दर , उसे जुबान देने का काम लेखकों के जिम्मे आ गया | आपकी लेखन शैली से प्रभावित हुई , हँस कर गहरी गहरी बातें लिख डालते हैं आप |

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  34. रोज उचककर देखता था जो इस जानिब
    वक़्त को फलांगने की बेजा कोशिश में .....
    आज सुबह उसी लम्हे ने दम तोडा है

    त्रिवेणी हर बार की तरह प्रभावशाली है..

    अस्पताल में हर रोज़ आप कई जिंदगियों को ज़िन्दगी से जूझते और ज़िन्दगी के कड़वी सच्चाई से रूबरू होते देखते होंगे.ऐसे अनुभव जीवन से प्यार करना भी सीख देते हैं..
    हाँ..ऊपरवाले ने जीवन की मशीन में 'rewind 'बटन नहीं बनाया है!

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  35. अपने अपने दायरों में बंधे लोग भी कितने गरिमा युक्त लगते है, राजीव की तरह.
    अच्छी तांक झाँक है बीते दिनों की इस गठरी में.

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  36. All characters are different bt i saw my reflection in all...i liked the post..

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  37. First visit here.Liked the way you write.Your words reflect the scene so well...that a reader can see through them.the picture and the feelings..together.
    :)
    TC.

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  38. ".जिंदगी तेरे कुछ दिनों की रिवाइंड करना है ताकि मै उन्हें तरतीब से लगा सकूं"
    अनवाइंड करने पर मन को छू गई:)

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  39. hamesha wo nahi hota jo hum chahe,kaash ye rewind button zindagi mein hota.
    मूर्खों से एक खास दूरी बनाये रखने की विधा का नाम शिष्टाचार है
    ye bahut sachhi baat keh di.
    umar ke harpadav ke saath yaad badh jaati hai aur kuch rishton ki chavi.

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  40. संवादों में अच्‍छी गति‍ है, पढ़ता ही चला गया। हमेशा की तरह सुंदर लेखन।

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  41. ज़िन्दगी को रिवाइन्ड करने वाले थाट पर एक बेहतरीन मूवी थी - the butterfly effect..देखे..

    और हर इन्सा एक पात्र है, जीता जागता, रोज़ जीता..लेखक की आखे चाहिये होती है उन्हे समझने के लिये..आप जैसा लेखक हो तब तो कहानी आखो के सामने नाच जाती है...अभी अभी जग्गू दा को अकेले गाते हुए सुन सकता हू और न जाने क्यू आज उनकी आवाज से आखे गीली हो रही है..

    अभी भी बोम्बे मे है? इस नाचीज़ को मौका दे आपके दर्शन करने का..

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  42. कई पंक्तियों ने दिल को छू लिया
    जिंदगी के रिवाइन्ड पर ऐसा होना लाज़मी है

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  43. @ अब सोचता हूं प्यार केवल कैम्पस की उस चाहरदीवारी में ही सरवाइव कर सकता है .. .…बाहर की दुनिया की जद्दोजेहद में साले बड़े बड़े गम है .

    नहीं अनुराग जी, अब यह प्यार कैम्पस के चार-पाँच साल भी नहीं सर्वाइव कर पाता... छठे सेमेस्टर के बाद तेजी से भागती दुनिया और घटते ज़ेबखर्च में ही समझदारों को इशारा मिल जाता है... प्लेसमेंट की टेंशन और ‘आगे क्या होगा’ की फ़िक्र साली ज़िन्दगी से सारी रूमानियत छीन ले जाती है

    ज़िन्दगी रिवाएंड का ऑप्शन तो देती है, लेकिन सिर्फ़ रीड ओनली मोड में.... एडिटिंग का ऑप्शन सबसे बड़ा प्रोग्रामर शायद कभी न दे..

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  44. 'हाथ भर के फासले को
    उम्र भर चलना पड़ा .''
    ...........रिपेयर के लिए इधर भी बहुत कुछ है ......मकैनिक खोजना मुश्किल काम है.

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  45. Zindagi ko rewind kar repair karne ka nuskha mile to zara hume bhi bataiega.

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  46. "मूर्खों से एक खास दूरी बनाये रखने की विधा का नाम शिष्टाचार है ."

    सही कहा आपने..शायद इसी लिये यह सारा शिष्टाचार बस मूर्खों ने हाथों मे रह गया है..
    ..काफ़ी उलटबासियों, कॉम्प्लीकेशन्स और गहराई से डिटेल्स से भरी हुयी है यह कहानी/संस्मरण..गरिष्ठ कड़े गन्ने सी जो दो-एक दशक पहले खूब होता था खेतों मे..और दाँतों की वॉट लग जाती थी चूसने मे..फिर फिर पढ़ना पड़ेगा..गन्ने से जूस भी एक बार मे ही कहाँ निकल पाता है..
    हाँ गैर शरीफ़ाना आदतों का जिक्र दिल्फ़रेब लगा..शुक्रिया

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  47. करीबी दोस्तों से मिलने पर सबसे अच्छी बात यही होती है....बातों का सिरा बिलकुल वहीँ से शुरू होता है, जहाँ कभी वर्षों पहले छोडा था.....बीच के अंतराल ऐसे गायब हो जाते हैं....जैसे कभी थे ही नहीं....पोस्ट की शैली कुछ ऐसी लगी मानो पुरानी सारिका का कोई पन्ना खुला हो सामने

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  48. अरे बाबा रे यह पोस्ट कैसे रह गयी पढने से ..ज़िन्दगी रिवाइंड हो सकती तो कितना अच्छा होता न ..

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  49. तेरी एक बेटी है न तीन साल की …क्या नाम है उसका "? ……मै माहोल को चेंज करने की कवायद में हूँ....
    "ये ....वो मोबाइल में फोटो दिखाता है ...".छवि "!

    काश ज़िन्दगी के कुछ दिनों को रीवाइंड कर पाते

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  50. अनुराग जी बहुत सही कहा है काश! जिन्दगी को रिवाईंड कर पाते।मैं भी अक्सर यही सोचता था लेकिन क्या करें ये टेप् वक़्त के स्पूल पर कब तक और कैसे चलेगी इस का निर्धारण वो ऊपर वाला करता है और हम इस को एडिट नहीं कर सकते बस बिना रिवाईंड किये रिव्यू कर सकते हैं।मेरी भांजी नें यू एस से आपके ब्लॉग का पत्ता भेजा था हालांकि आपकी एक टिप्पणी के बाद मेने एक नज़र आपका ब्लॉग देखा भर था आज ठीक से देखने का अवसर मिला है। अब देख लीजिए आप की धाक कंहा तक है। आपकी रचनाएं जमीन से जुडी हैं और बहुत सार्थक...बधायी स्वीकार करें...

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  51. जिंदगी तेरे कुछ दिनों की रिवाइंड करना है ताकि मै उन्हें तरतीब से लगा सकूं.आपके तो मालूम नहीं पर वाकई मेरे पास कई ऐसे दिन पड़े है जिन्हें रिपेयर की जरुरत है !


    :)

    yun tou poori post achhi lagi, par end ki ye lines paddkar aisa laga jaise maine hi inhe likhha ho :)

    Rakhee

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  52. यादोंको सहेजना फिर उन की एक एक तह खोल कर उसका वर्णन शब्दों मे करना क्या महारत हासिल की है आपने बहुत सुन्दर अद्भुत ,शायद मेरे पास उप्युक्त शब्द नहीं हैं? शुभकामनायें

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  53. chaavio ko kabhi time mile tabhi to samjegi ki rajiv jaise log kiyo rukte hai..kah nahi paate ..

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  54. aaj aapki har post ko padne ka mann kar rha hai.
    aap Dr. Gyan chadurvedi ki vidha ki nai peedi hai.

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  55. Uski ladki ka Naam "CHAVI"
    really touching story.
    sir,i am following ur story but this one is best..
    seem like an autobiography
    hats off...

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कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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