2009-10-06

हमारी पहली गर्लफ्रेंड ...नीलू भाई...ओर एक क्रिकेट मैच !!!!


उन दिनों सपने बहुत छोटे होते थे यूं  कहिये बलिश्त भर के ..ओर लगभग एक जैसे ..ट्विन्स .का भ्रम देते ...पर गुजरे वक़्त के साथ एक बात  हमने जानी है की लड़कियों में कुछ  हुनर  शायद पैदाईशी  होते है . मसलन वे  किताबे कापियों पे साफ सुथरे कवर चढा कर रखती है ..उनपे सुन्दर- सुन्दर चिटे  ...वे बड़ी गौर से आगे की लाइन में बैठकर टीचर की एक एक बात सुनती है ...ओर फिर उन्हें  सिलेवार   अपनी   कोपी   में  साफ़ सुथरी  राइटिंग  में  लिखती है ...मै कितनी भी कोशिश कर लूं आज तक एक भी फूल पत्ती सीधी भी बना नहीं पाता ..  नये स्कूल में एडजस्ट  करना बड़ा मुश्किल काम होता है .. पापा का ट्रांसफर  जब देहरादून  हुआ...हमारी सबसे बड़ी परेशानी यही थी.....कई रोज तक  आप  अंडर ओब्सर्वेशन  रहते है ..आपके चाल चलन   को देख परख    फिर   आपकी  एंट्री  किसी खेमे   में  होती   है ..ओर फिर को -एड स्कूल ...  हमें जोग्राफी पसंद नहीं थी....मैथ्स से हमें डर लगता था ....आर्ट हमें आती नहीं थी ...तो नये स्कूल   में इम्प्रेशन   बनेगा कैसे ......कुल जमा उन दिनों हमें दो तीन चीजो में महारत   हासिल थी....कंचे खेलने  पतंग  उडाने .में या क्रिकेट खेलने में  ........

उन दिनों देहरादून आज सा नहीं था .खूब घने पेड़ ....पंखे भी न के बराबर घरो में होते थे ...हमारे घर के पीछे लीची का एक बागः था ...सामने के घर में दो बड़ी लड़किया   रंजू  दी ओर पूनम दी ….ओर एक उनका लफंगा भाई....नीलू ...जो छुप छुप के लीची के बाग में सिगरेट पीता...उनके घर  का  एक  नियम था .....उसका बाप  रोज  काम पे जाने से  पहले  नीलू  भैय्या  को  कई गलिया देता ..वो एक किताब   हाथ में  लिए सर झुकाये सुनते ..   ....बाप के दुकान  पे जाने  के  बाद  वो  किताब  खोलकर धूप में   पढने   बैठते  ...ओर .उनकी  मां रोज  घी चुपड़े आलू के परांठे  खिलाती ...परांठे   खाने    के करीब  दस  मिनट  बाद  नीलू  भैय्या   अपनी साइकिल   निकालते ..ओर फिर   दिन ढलने से थोडा पहले लौटते ... .. पिछले  तीन सालो से वो  दसवी   के  एक्साम   की तैयारी   में लगे हुए थे ....नीलू भैय्या का संक्षिप्त परिचय अगर देना हो तो ...तब रिचर्ड अटेनबरो  की  "गांधी "रिलीज़ हुई ..मां ने नीलू भैय्या के हाथ में पैसे रख के मुझे ओर छोटे को गांधी दिखा लाने को कहा ...नीलू भैय्या हमें "तकदीर" देखा लाये ....हेरोइन ओर दूसरा हीरो याद नहीं पर उसमे एक हीरो शत्रुघ्न सिन्हा थे वो याद है..
.उनकी छोटी लड़की पूनम दी  किसी ब्यूटी  पार्लर का कोर्स  कर रही थी उन दिनों.....तो अक्सर शाम को हमारे पैरो हाथो पे तरह तरह के उबटन मेल जाते फिर धोये जाते ...बदले में हमें चम्पक ...नंदन   या इंद्रजाल   कोमिक्स   पढने  को मिलती ... पर मै चेहरे पे कुछ नहीं करने देता ..... एक रोज उन्होंने एक लेप निकला जिसकी  अजीब  सी   शक्ल  थी ...मुझे डील ऑफर हुई इसे चेहरे पे लगवायोगे तो दो तुम्हारी मर्जी की कोमिक्स ...तुम्हे खरीद कर दी जायेगी ...हमने मन कडा किया पर  जैसे ही लेप नजदीक  आया  हमने  विद्रोह  कर दिया ....ओर भाग   निकले!
गली के  कोने पे  किसी सरकारी  आदमी  का  मकान था ....उन्हें घर के बाहर अक्सर एक सरकारी जीप खड़ी रहती ओर उसमे ऊँघता एक ड्राइवर ...  रोज सुबह  उसमे  एक लड़की बैठती ...पतली दुबली . गोरी ....उसकी आंख पे एक चश्मा टिका  रहता .. ...जो उसे पढने वालियों जैसा लुक  देता था ...गली में वो कम दिखती .... मेरे क्लास में ही पढ़ती थी....कभी कभी  नजर उठाकर  मुझे देखती...मन करता तो मुस्करा देती ..उनके घर वाले गली के बाकी लोगो से थोडा  कम मेल जोल रखते ...
एक महीना बीत गया .मै सेकंड लास्ट बेंच पे एक तेल चिपुडे लड़के के साथ  बैठता ...जो अक्सर पीरियड में टोफी निकाल कर खाता...दिन भर वो इतनी टोफी खाता की मुझे डर लगता  की कभी इसको हाथ भी मारा तो इसके मुंह से टाफिया ही निकलेगी...स्कूल से पैदल का रास्ता करीब आधे घंटे का था ...ओर मै रोज पैदल जाता .सच कहूं तो बड़ा मजा आता .लौटते  वक़्त  जरूर  सड़क  की चढाई   थकान  देती .... एक रोज स्कूल से लौटते वक़्त जीप मेरे बगल में रुकी ....वही थी ...एक दो बार की न नुकर के बाद मै जीप में बैठ गया ..पूरा रास्ता हम दोनों में कोई बात नहीं हुई...तीन रोज तक यही होता ..मै बिना थैंक्यू  कहे  घर के सामने उतरता ....
तुम कोमिक्स पढ़ते हो ..पांचवे दिन उसने पूछा
हां
मेरे पास बहुत सारी है  ....पढोगे .. मैंने देखा उसके गोरे चेहरे पे होठो के उपर भूरे से बाल है ....मै सिर्फ उतने ही सवालों का जवाब देता जितने वो पूछती ....
धीरे धीरे हम दोनों में जमने लगी ...वो हमारी ड्राइंग की किताब भरती ...उसके दादा दादी अक्सर  शाम को  आंगन  में चेस खेलते रहते ओर साइड  में बने झूले  पे हम दोनों खेलते ..... तब हमें डायरी रखने ओर  उसमे  जो अच्छा   लगा उसे  लिखने का नया नया शौक़ हुआ था ..ओर वो  हमारा   सीक्रेट   था ...पर जाने  क्यों   हमने उससे   शेयर   किया ...हमारी डायरी की पहली पाठक वही थी ..
हमने एक महीने में उसकी सारी कोमिक्स पढ़ डाली .फिर हमें गिल्टी फील   हुई  के  अब तक हमने उसे कोई कोमिक्स नहीं दी ...हमने सोचा उसे कोमिक्स खरीद के ही गिफ्ट दे देंगे
समस्या ये थी की पैसे आयेगे कहां से ???
. मै..वो  लेप लगवाने पूनम दी के सामने पहुंच गया ..
आधे पौन पौन  घंटे के उस एक्सपेरिमेंट के बाद  पूनम दी ने नीलू भैय्या को पैसे थमाए ओर हमारे लिए कोमिक्स लाने को कहा...दिन भर गली के मुहाने पर बनी एक छोटी सी दीवार पे बैठे नीलू  भैय्या की राह तकते रहे ...शाम होने से कुछ पहले नीलू भैय्या अपनी उस ऐतिहासिक साइकिल पे अवतरित हुए ..पर उनके हाथ में कोई कोमिक्स न देखकर हमारा दिल धड़का ....
नीलू भैय्या ....कोमिक्स
कल ले आयूंगा ....आज दुकान बंद थी ....नीलू भैय्या थके थके से बोले ......
झूठ बोलते हो .दुकान तो खुली थी ......मै देख के आया था .बात सच थी....मै रुआंसा हो गया ....
नीलू भैय्या ने मुझे हड़का दिया .....आंखू में आंसू  ओर गुस्सा होके हम कई देर वही बैठे रहे ...थोडी देर में उनके पिता जी का स्कूटर आता दिखाई दिया ....इससे पहले के वे मफलर उतार के स्टेंड पे लगा कर गेट खोले ....हम दिल में प्रतिशोध  की ज्वाला लिए उनके पास पहुंचे ....अंकल नीलू भैय्या बाग में सिगरेट पीते  है "ओर भाग  लिये.....
उस शाम नीलू भाई की जबरदस्त सुतायी  हुई!!!!!!

तो पढने  लिखने की बाबत  तमीज  हमें वही  से आई ....उसी की सोहबत  में हम कोर्स की किताबो में थोडा ध्यान रमाने लगे ...फिर एक घटना हुई ..... हमारी क्लास के दो दादा थे एक था  रस्तोगी दूसरा कुलदीप ..दोनों के बापों की अगल बगल दुकाने थी .. फ्रायड ओर मंटो से पहले  कुलदीप   की मेरी जिंदगी में  एंट्री है ..औरत मर्द के रिश्तो के बारे में उसकी मालूमात कुछ ज्यादा है ..इंटरवल में लड़को का समूह उसके इर्द गिर्द इकठ्ठा होता है ...उसके बाप की स्टेशनरी की दूकान है ...साथ में किताबो की भी...कुलदीप के बस्ते में कई किताबे पीछे रखी  होती है ... पिछले दो दिनों से कुलदीप हमें रोज  लंच   में  बुलाता .पर हम नहीं जाते ...हालांकि  हमारा मन का एक कोना जरूर वहां जाने को मचलता  ...
तुझे उसके पास नहीं जाना  वो मुझसे कहती है
क्यों ?
वो अच्छा लड़का नहीं है
क्यों ?
वो जवाब नहीं देती.....
दो रोज बाद कुलदीप छुट्टी के वक़्त मुझे पकड़ लेता है ...".क्यों बे "दो दिन से बुला रहा हूँ .आता क्यों नहीं ....
मै बेग छुडाने की कोशिश  करता हूँ  ....वो दूर से देख रही है ...
जा लड़कियों के साथ लंगडी टांग खेल....कुलदीप धक्का देता है ....
मै गिर गया हूँ....कुहनी छिल गयी है ...
क्या कह रहा था ?वो पूछती है .
कुछ नहीं......
तीन दिन   बाद  स्पोर्ट्स  के पीरियड  में  वो कुलदीप के पास बैठी है .. कोई जवाब देने कुलदीप उठा है .बैठते ही चीखा है .उसने पेन्सिल सीधी करके रखी है........
 बाद में दूसरे  लड़को ने  हमें  बताया  की सरदार ने कसम खायी.. है .वो हमें माफ़ नहीं करेगा... दिन गुजरते रहे पर   शायद मेघा के ड्राइवर  का डर था जिसने कुलदीप को रोके रखा ......
तभी  स्पोर्ट्स वीक हुआ .. कुलदीप हमारी टीम का  क्रिकेट कप्तान था ...मुझे मालूम था वो खुंदक  में मुझे टीम में शामिल नहीं करेगा ..हमारी क्लास का  क्रिकेट  मेच सीनियर क्लास से था ठीक मेच से एक रोज  पहले ग्यारहवे  खिलाडी को दस्त लग गये ....दिन भर उसके दस्तो के रुकने का इंतज़ार किया गया ..फिर. हमें  ग्यारहवे खिलाडी के तौर पे   टीम   में शामिल किया  गया .क्यूंकि पूरी क्लास में सिर्फ पंद्रह  लड़के थे ....बाकी बचे तीन में एक वही तेल चिपुडा ओर दो उसके भाई बंद थे ..तभी   इंडिया  नया नया  पहली बार  वर्ल्ड कप जीता था ...इसलिए क्रिकेट पे बड़ा जोर था ..
इससे पहले हमने जितने भी मैच खेले थे  अपने मोहल्ले में खेले थे ..हर टीम  एक नयी बीस रुपये  की लेदर  बाल लेकर आती थी .जिसे दो दो रुपये  इकट्ठे करके  हर खिलाडी लाता था ....    जीतने वाली टीम को  दोनों  लेदर  बाल मिलती थी .हमारी जिंदगी की फाइल में यूं तो कई मैच दर्ज है .पर इतने दर्शको में जिसमे लड़किया भी शामिल हो..हमारा पहला मैच था ....आखिरी दो  गेंदों  में दो  रन चाहिये थे ....हमें नाइन डाउन भेजा गया ...सरदार हमारी टीम का कैप्टन था ...हमें इस बात की ताकीद  मिली  की गेंद के बोलर के हाथ से छूटते  ही आंख बंद करके भाग लेना है ...जबकि हमें अपनी क्रिकेट काबिलियत पे भरोसा था ....इधर बोलर चला उधर रस्तोगी ने चिलाना शुरू किया भाग ....पर हम भागे नहीं .धड़कते   दिल  से .बल्ला  घुमा दिया  ....खुदा का शुक्र है गेंद बल्ले पे आ गयी .. ओर..सरदार ने हमें माफ़ कर दिया ....

अगले साल हमारा ट्रांसफर वापस अपने शहर हो गया .... एक बैग में ढेर सारी कोमिक्स भर के मुझे दे  गयी....एसट्रिक्स की कोमिक्स ...अब सुना है नीलू भैय्या  दूकान पे बैठते है ....दोनों बड़ी बहनों की   शादी   हो गयी है .छोटी ने लुधियाना   में कोई  पार्लर  खोल  रखा है ...सुनते है हमारे जाने के दो साल बाद उनका भी ट्रांसफर हो गया था..... मेघा पता नहीं कहां है....मेरे कलेशन में आज भी वो कोमिक्स पड़ी है .जिनमे से एक दो के ऊपर उसका नाम लिखा है .....

कहते है ये वक़्त तकनीक का है पर तकनीक की  दुनिया की अपनी पेचीदगिया है .....बाजार   की  अंगुली थाम के   बढे होते बच्चे   है ..चौबीस साल के घनघोर कैरियरिस्ट है....ज्यादा   फ्लेक्सेबल  रीड की हड्डिया है ....ख्वाहिशे   डबल   अंडर लाइन करे भागता  युवा  है    ...   अपने अपने  इगो की  बड़ी  बड़ी  आलीशान  ड्योढी में  बैठकर इतराने वाले कुछ अधेड़   दुनियादार   लोग है ...  ...   इत्ते  बड़े  बड़े  रंग बिरंगे  ग्लो साइन बोर्ड   है जो रात  को  चमककर सच ओर झूठ  को  गडमड कर देते है .. .   ..ओर हर   ख्वाहिश पे  अलादीन  का चिराग न सही ...एक अदद  इ एम  आई   जरूर  है ...काश चेप्टर होते जिंदगी के भी .....किसी स्कूल में सिखाया जाता ...कैसे   खामोशी   से   मुमकिन है .......इत्ते  मुखोटो  में  रोज आवाजाही .....कैसे पकड़ना जमीर का इक कोना ...जब दुनियादारी का बुलडोज़र बढा आये

79 टिप्‍पणियां:

  1. कामिक्स ,यादे और यादे इनका सच में कोई गहरा सा रिश्ता है हर बीते हुए पल से ..आपके लेखन का ही कमाल है की कई यादे खुद बा खुद मुझे भी याद आगई .दीवाना .चंदा मामा और न जाने क्या क्या :)

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  2. डा साहब जबरदस्त तरीके से आपने अपनी इन यादो को शब्द दिया है . रोचल लगी आपकी ये यादें

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  3. आपने हमें भी हमारा बचपन याद करा दिया
    ऐसे ही कुछ किस्से हमारी यादों में कैद हैं
    अच्छा लगा पढ़कर

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  4. उफ़ एक एक बात याद है आपको.
    ये नहीं बताया की वो बुला क्यों रहा था और वो क्यों मना कर रही थी.
    वैसे एक नीलू जैसा केरेक्टर हमारे पड़ोस में भी रहता था.

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  5. सबके पड़ोस में एक नीलू भैया रहते हैं क्या ? :) आपकी यादों में गोता लगाए हम अपने बचपन से तालमेल बिठाते रहे. गोल्डन डेस !

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  6. यादें

    कहां पहुंचा दिया था आपने हमें, चलचित्र की भांति कभी आपका बचपन दिख रहा था और कभी अपना

    प्रणाम स्वीकार करें

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  7. आपको मैथ्स अच्छा नहीं लगता था , आप तो कुछ और ही सहेज रहे थे , अपनी यादों की पिटारी से खनन खनन कर एक एक कंचा निकलते हैं आप , साथ साथ हम लोग भी हँस गा लेते हैं | डबल अंडर लाइन की हुई ख्वाहिशें हैं , ये बात आप ही लिख सकते हैं |

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  8. अमूमन आप ऐसा नहीं करते की एक ही हफ्ते में दूसरे पोस्ट की आमद हो जाये... इन दिनों फुर्सत ठीक नहीं नहीं मिलती ब्लॉग्गिंग करने की कल रात न्यूज़ रूम में फुर्सत निकल कर आपकी पिछली पोस्ट पढ़ी 'जिंदगी ... करना है" लेकिन कुछ लिख नहीं पाया. अभी शूट से आते ही देखा तो दूसरा पोस्ट नुमाया था... तो देर से आने के लिए मुआफी बॉस... आप अबकी वहां लेकर गए, जहाँ रेत के बहुत गहरे में नमी होती है... कॉमिक्स मुझे कभी पसंद नहीं आये, हाँ अपने दोस्तों के क्रेज देखकर सुपर कमांडो ध्रुव का 'विनाश का वृक्ष' और परमाणु का हाहाकार पैसे दे कर जरूर पढ़ा था... अलबत्ता चाचा चौधरी और साबू की जोड़ी पसंद थी... और एक बार ऐसी कॉमिक्स हाथ लग जाये तो फिर खाना-पीना छुट जाता...

    क्रिकेट मैच से जुदा मेरी भी जिंदगी में एक नहीं कई रोचक किस्से हैं... कभी अपने पोस्ट में जिक्र करूँगा... रही पहली गर्लफ्रेंड की बात तो याद नहीं आता कौन कैसे बनी थी... अब हमने को कईयों को माना लेकिन मुआमला एक तरफा ही रहा... कभी उनको शर्म आई, तो कभी 'सूरत देखि है तुमने अपनी' जैसी कॉमन भाषा सुनने को मिली... फिर भी तब एक साफगोई थी, सच्चाई थी. अभी यह कोई नहीं कहता की 'सूरत देखि है तुमने अपनी' लेकिन बहलाने के कई नुस्खे और भी हैं... खुद अब अपनी जिंदगी में भी कई ग़म और भी हैं...

    एक गीत याद आ गया इज्ज़त फिल्म का (धरमेंदर और हेमामालिन वाला)

    "दिलों को बोझ लगते हैं कभी जुल्फों के साए भी.. "

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  9. inko padh ke mai bhi apne comics wale dino aur muhale ki yado ko taza kar gay

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  10. अनुराग जी!

    कितनी अनुभूतियाँ संजोकर रखी हुई हैं आपने। कभी कभी तो शक़ होता है सिलसिलेवार इतनी यादें कैसे कोई याद रख सकता है। फ़िर लगता है कि यह बचपन चीज ही ऐसी है। तब समझ में आता है कि बड़े से बड़े संजीदा लोग भी क्यों ‘ये दौलत भी ले लो ये शोहरत भी ले लो’ सुनकर पिघल उठते हैं...

    कॉमिक्स तो मेरे जीवन में विलेन की हैसियत रखती है। मुझे याद है कि जब आठ साल की उम्र में आस पड़ोस के बीस-तीस गाँवों के बगीचे उजाड़ चुका था, चिड़ियों और मछलियों का शिकार कर चुका था और कम से कम हर दूसरा आदमी मेरे अनपढ़ रहने की भविष्यवाणी कर चुका था... पिता मुझे शहर भेजने का हर यत्न कर के हार चुके थे, तब भैया का एक दाँव काम आया था--- वह था शहर चलने पर कॉमिक्स का भंडार दिलाने का वादा... और मैं चला आया था। सारी कॉमिक्सें महीने भर में ख़तम होने के बाद मुझे पता चला कि कितने बड़े षडयंत्र का शिकार हो गया हूँ।

    तबसे कॉमिक्सें मुझे कभी पसंद नहीं आईं....

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  11. यूँ तो हमारे पास भी कई किस्से कहानी है। बस अफसोस की हमारे पास आप जैसे शब्द नही है उन्हें बयान करने के लिए। वो घड़ी की सुईयो से दिल की धडकनें गिनना..... वो बस्ते में जानबूझकर किताबें ना लाना... पता नही क्या क्या। पर आपकी दिल की बात हम दिल लगाकर पढते है। आज भी पढकर आनंद आ गया। और हाँ चलते चलते आपकी नजरें बडी तेज है ..... ना जाने क्या क्या देख लेती है?

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  12. ..... मेघा पता नहीं कहां है....मेरे कलेक्शन में आज भी वो कोमिक्स पड़ी है .जिनमे से एक दो के ऊपर उसका नाम लिखा है .....
    सही है पहली गर्लफ्रेंड को कौन भूल सकता है

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  13. तुम कहाँ हो मेघा? आपकी मेघा के बारे में पढ़ते हुए मुझे स्कूल के दिनों की सहपाठी नीतू याद आ गई. कमाल की छवियाँ उकेरी हैं आपने. आपका लिखा पढ़ना मानो पानी पीना है. कभी हिम्मत कर सका तो नीतू को कागज पर उतारूंगा.

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  14. bachpan ki yaadein taza ho gyee...mujhe etne achhe se likhna nahi aataa warna comment me hi likh jati....post padh ke muskurahat aa gyee ..bachpan aksar sabke ik jaise hote hai...

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  15. आपके अतीत का पन्ना बहुत खूबसूरत है और आपने पाठकोँ के साथ इसे शेयर किया हम आपके इस अन्दाज के कायल है । हर कोई अपनी यादो को आपकी तरह खूबसूरत अन्दाज मे नही रख पाता है ।

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  16. लड़कियों में कुछ हुनर शायद पैदाईशी होते है . मसलन वे किताबे कापियों पे साफ सुथरे कवर चढा कर रखती है ..उनपे सुन्दर- सुन्दर चिटे ...वे बड़ी गौर से आगे की लाइन में बैठकर टीचर की एक एक बात सुनती है ...ओर फिर उन्हें सिलेवार अपनी कोपी में साफ़ सुथरी राइटिंग में लिखती है .. jee ekdum sahi kaha aapne.....

    yeh padh kar ...bachpan ki yaaden taaza ho gayin..........

    thnx for sharing.

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  17. डॉक्‌ साब आपकी ज्यादातर पोस्ट्स पर कोई टिप्पणी लिखने बहुत पहाड़ सा हो जाता है..एक साइक्लोन सा आता है और उड़ा के ले जाता है किसी दश्त मे..या कोई ढीठ लहर पीछे से धक्का मार कर दिरा देती है किसी गहरे समंदर मे..तर-बतर..अब देखिये आपकी इस पोस्ट की जादू भरी रवानी मे बहता चला गया कम-स-कम बीस साल पीछे..जहाँ से वापसी का रस्ते मे न जाने कितनी कॉमिक्स, कितनी लेदर बॉल्स कितनी वर्टिकल पेन्सिल्स, सीक्रेट डायरीज्‌ और कुछ जोड़ी शफ़्फ़ाक कंचों सी पारदर्शी आँखें उगी हुई हैं..अगर वापस आ पाया तो शायद कुछ कह पाँऊ..मगर प्रोब्लम है कि कौन कम्बख़्त वापस आना चाहता है..और फिर यह जिंदगी का जुँआ.
    ultimate!!!!!

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  18. बहुत रोचक संस्मरण हैं। अक्सर हमारा बचपन ऐसी ही यादों से सराबोर रहता है।

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  19. क्या लहजा है डाक्टर साहिब क्या तरीका है बात को कहने का अपने चरमोत्कर्ष पे रहते हैं आप जब ऐसी बात लिखते हैं तो , क्या करीने आपने सारी बातों को सजाया है शब्द कम पड़ रहे है तारीफ करने के लिए ... कमाल की बात की है आपने मुझे लग रहा था मैं किसी पुरानी फिल्म को देख रहा हूँ जहां हर चीज होती है आपके लिए और आप अपने पुरे परिवार के साथ बैठ के सुकून से देखते है जो सुकून मिलता है वही आज की लिखी यह कहानी दे रही है ... भाव का मिश्रण देखते ही बन रहा है ..... पहला ग्राफ पढ़ के संका में था के अगर ठीक से फूल पट्टी नहीं आयी बनाने तो डाक्टरी पढ़ते वक्त प्रक्टिकल में कैसे फोटो बनाते होंगे आप...??? हा हा हा


    अर्श

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  20. जबरदस्त; कितनी बार ठहाका लगाके हंसा मै,,,, गजब लिखते हैं आप और वास्तव में कितनी यादें संजो लेते हैं आप...कॉमिक्स्स का तो मुझे भी बड़ा शौक था...बचपन में ....कुलदीप जैसे लोग तो हमारे क्लास में खूब होते थे..उन्हें कुछ खास जानकारियों का घमंड भी खूब होता था...और हाँ, आपका चेहरा ब्लॉग में खूब रौशन दिखता है,,,,दीदी जी लोगों के हाथों का कमाल ही है....:)...एक बार फिरसे जिंदादिल पोस्ट के लिए बधाइयाँ.....

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  21. आपकी मेघा हमें भी एक नन्हीं परी की याद दिला गयी, जिसने एक बार कभी मेरे सारे कामिक्स पढ़ लेने के बाद और माँगा था...लेकिन और तो उस वक्त थे नहीं। उस एक मांग ने कामिक्स की ऐसी दीवानगी पैदा की कि आज भी कहां-कहां से ढूंढ़ कर कामिक्स खरीदता रहता हूं और फिर वार्षिक सदस्य बन गया हूं विगत दस सालों से अमेरिका से आने वाली डीसी और मार्वल का...क्या पता फिर कभी वो आये और इस बार तो जखीरा थमा दूं उसे अबकि जो वो कामिक्स मांगे तो...

    और ये ख्वाहिशे डबल अंडर लाइन करना.....हास्पिटल के इस बेड पर लेटा सोच रहा हूं कि काश कुछ ख्वाहिशों को पहले ही ऐसा कुछ कर लेता।

    ...सोचा आपको याद दिला दूं कि अक्टूबर का महीना शुरू हो चुका है।

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  22. kya anurag sir.. wapas bachpan mein pahuncha diya.. comics ka shauk mere chote bhai ko bhi bahut tha.. uske paas nagraj, super commando dhruv ka poora collection tha jo usne kuch to bachat ke .. aur kuch chutaye hue rupyon se ek ek karke jama kiya tha.. aaj bhi ghar ki duchhatti par wo corton band rakha hai.. sahi mein.. wo din kya din the..

    aur anurag sir.. ye girlfriend wali baat ma'am ko batayiye.. tab pata chalega.. ;)

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  23. बहुत खूब याद है। शायद पहली लड़की दोस्त रही होगी। आस पास को भी खूबी से लिखा है।

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  24. बचपन के दिन भी क्या दिन थे........
    कोई लौटा दे मेरे बिते हुए दिन...........

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  25. बहुत बढ़िया संस्मरण प्रस्तुत किया आपने..बचपन और उससे थोड़े उपर के दिनों की बातें जिंदगी भर यादों के झरोखों में आते और जाते रहते है..मैने भी अपने बहुत ज़्यादा पल कहानी और कॉमिक्स की किताब पढ़ कर बिताया है..कभी कॉमिक्स का भी अपना नशा हुआ करता था..

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  26. कितनी भी कोशिश कर लूं आज तक एक भी फूल पत्ती सीधी भी बना नहीं पाता ..

    हा ...हा ...हा ....ओप्रशन करते वक़्त तो हाथ सीधे चलते हैं न ....???

    ......कुल जमा उन दिनों हमें दो तीन चीजो में महारत हासिल थी....कंचे खेलने पतंग उडाने .में या क्रिकेट खेलने में ........

    हूँ....हूँ.....!!

    पर मै चेहरे पे कुछ नहीं करने देता ...

    तभी तो इत ....................हैं !!

    जो उसे पढने वालियों जैसा लुक देता था ...
    तेल चिपुडे लड़के ...
    मैंने देखा उसके गोरे चेहरे पे होठो के उपर भूरे से बाल है ....( आपको इतनी पुरानी बातें कैसे याद रह जाती हैं ...?)

    आंखू में आंसू ओर गुस्सा होके हम कई देर वही बैठे रहे ......ओये होए .....तो ये रोग बचपन से ही था .....???

    लुधियाना में ......??
    अरे मुफलिस जी की पत्नी ने भी पार्लर खोल रखा है वही तो नहीं ......???

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  27. अनुराग जी कुछ बातें मजाक में लिख गयी अन्यथा न लें प्ल्ज़ .....!!

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  28. बचपन की यादों को बड़ी बारीकियों से समेटा है. पढ़कर पता नहीं कितने लोग अपने बचपन की गलियों में घूम आये और जाने कितनी मेघा, नीलू, रंजू, पूनम को हिचकियाँ आयीं होंगी ..:)

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  29. बहुत बढ़िया लिखा है आपने, कुछ यादे हमारी भी ताजा हो गयी !

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  30. डाक्टर साहब,
    सच्ची-सच्ची कह रहा हूँ, पूरी पोस्ट पढ़कर कमेन्ट करने का मन ही नहीं रहा.... वो भी वहीँ चला गया है... उसी पहली गर्लफ्रेंड और उसी क्रिकेट की तरफ... हर बचपन में होता है न ये सब कुछ...

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  31. ऐसे कहीं कोई किसी को याद करता है क्या कि पढ़ने वाला सोचे ओह!! क्या याद किया है...

    :)


    बेहतरीन लेखन!

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  32. यार डाक्टर साहब ..अपने मरीजों को ये किस्से सुनाते हो आप..सुनाना भी मत..सब के सब बिना दवाई ही ठीक होकर चलते बनेंगे...ये तो आप हमारे लिये रख लो...बडे ही छुपे रुस्तम निकले आप...मगर रुस्तम को पढना हमेशा ही अच्छा लगता रहा है मुझे ...

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  33. बचपन सारा ही सामने आ गया। टिप्‍पणी भेजते समय रील घूम रही है। बहुत ही अच्‍छा संस्‍मरण। बधाई।

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  34. 'काश चेप्टर होते जिंदगी के भी .....किसी स्कूल में सिखाया जाता ...कैसे खामोशी से मुमकिन है .......इत्ते मुखोटो में रोज आवाजाही .....कैसे पकड़ना जमीर का इक कोना ...जब दुनियादारी का बुलडोज़र बढा आये '

    -अद्भुत !
    -----------------------------
    -आप के अतीत का यह हिस्सा भी बेहद खूबसूरत है.
    कमाल है आप ने अभी तक वे कोमिक्स sambhal कर रखे हैं!
    शायद कहीं megha भी आप का लिखा यह sansmaran पढ़ रही हो??

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  35. वाह डाक्साब,गज़ब का रिवाईंड किया है।उम्र और समय उल्टा चल कर्……सारी दौड कर जाने कितने पीछे चली गई।आनंद आ गया डाक्साब,आनंद,निर्मल आनंद्।मौका और समय मिला तो मै भी डुबकी लगाऊंगा अपने स्कूल के दिनो की खूबसूरत झील मे।

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  36. सोच रहा हूँ क्या हर इंसान का बचपन एक सा होता है.. ? क्या आर्यन भी कोमिक्स क्रिकेट पर कुछ लिखेगा ? या फिर पी एस टू गेम्स उसकी जगह ले लेंगे
    अपूर्व से सहमत हूँ टिपण्णी लिखना पहाड़ सा लगता है.. मेजर के कमेन्ट पर यही कहूँगा कि डॉक्टर को सितम्बर याद नहीं रहा तो दिसम्बर क्या याद रहेगा..

    लगता है पंगा ज्यादा हो गया इसलिए कट लेता हूँ

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  37. हम्म्म्म्म्म ..लड़कियाँ होती तो हैं थोड़ी अलग और क्या पता जो लड़की अचानक जीप रोक देती थी आपके लिये उसके मन का कोई कोन आज भी कहीं रुका सा ही हो आपके लिये...! और अनुराग जैसे मेघा को ढूँढ़ रहे हैं, मेघा ने अनुराग के किसी रोज अचानक मिल जाने की ख्वाहिश को डबल अंडरलाइन कर रखा हो...!!!!

    अब समझी त्रिवेणी में अक्सर मुए बादल क्यों आते हैं और दूसरों की छत पर बरस के निकल जाते हैं........!!!!

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  38. कभी कभी सोचती हूं के जब आप सीरियस होते है तो गजब के सीरियस होते है ओर जब लाईट मूड में होते है तो अपने साथ कई मुस्काने लेकर चलते है .आई तो पिछली पोस्ट पे टिप्पणिया पढने थी पर एक नयी पोस्ट देखकर सागर की तरह मै भी चौंक गयी .जिस नफासत ओर दिलकश तरीके से आपने पोस्ट को परोसा है उससे मेघा से ज्यादा हमें नीलू भाई क्यूट लगे .
    लेकिन इस पोस्ट की जो सबसे बड़ी खासियत है वो आखिरी लाइने है

    बाजार की अंगुली थाम के बढे होते बच्चे
    फ्लेक्सेबल रीड की हड्डिया है ...
    डबल अंडर लाइन ख्वाहिशे
    इगो की बड़ी बड़ी ड्योढी

    ओर ये पंक्तिया किसी कविता की तरह लगती है
    .काश चेप्टर होते जिंदगी के भी /किसी स्कूल में सिखाया जाता ./कैसे खामोशी से मुमकिन है /.इत्ते मुखोटो में रोज आवाजाही /कैसे पकड़ना जमीर का इक कोना /जब दुनियादारी का बुलडोज़र बढा आये

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  39. वाह ,लाजवाब संस्मरण....बहुत ही आनंददायी लगा पढना...

    सच कहा आपने...लड़कियां ऐसी ही होती हैं...

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  40. डाक्टर अनुराग, पहली बार एक शक हुआ है...कहीं यह 'लपू झन्ना' आपका ही ब्लॉग तो नहीं? आप, लाफ्तू और जानवर डाक्टर की बेटी से पहला प्यार?? खैर, कोमिक्स की कहानियाँ सबकी सांझी हैं... !! जिंदगी के उन कुछ दिनों की यादों को 'रिवाइंड' कराने के लिए धन्यवाद. चाचा चौधरी और फेंटम की कुछ कोमिक्स अभी भी संभाल कर रखी हैं...कहें तो भिजवा दूं?

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  41. बहुत अच्छा लगा पढ़कर ये संस्मरण !

    उत्तर देंहटाएं
  42. जैसे कोई बगिया से खिले फूल चुनता है, उसी तरह बचपन की यादों को गुंथा है
    यादों की माला.. वादी की खुशबु... सात समुन्दर फांदती ...

    उत्तर देंहटाएं
  43. पोस्ट जैसे देहरादून की ढलान वाली सड़क पर मस्ती से साइकल पर सवारी का रोमांच भरा आनंद देती है. बचपन के चुस्ती भरे दिन.सब कुछ ताजगी से भरा.
    कॉमिक्स की तरह संजोये रखने लायक दिन.

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  44. Doctor Sahab.

    आपकी पूरी पोस्ट पढ़ी
    And after this line, i couldn't resist clapping.

    मेरे कलेशन में आज भी वो कोमिक्स पड़ी है .जिनमे से एक दो के ऊपर उसका नाम लिखा है .....

    WOW !!! आपके पास, उसकी कोई निशानी तो है, हमारे पास तो उसकी कोई निशानी भी नहीं सिवाये उसकी यादों के, और एक कहानी के !!

    उत्तर देंहटाएं
  45. 'लड़कियों में कुछ हुनर शायद पैदाईशी होते है . मसलन वे किताबे कापियों पे साफ सुथरे कवर चढा कर रखती है ..उनपे सुन्दर- सुन्दर चिटे ...वे बड़ी गौर से आगे की लाइन में बैठकर टीचर की एक एक बात सुनती है'

    Waise mujhe 'IIT wale Chetan Bhagat' zayada prabhavit nahi kar paaiye apni lekhni se par jo kuch bhi accha tha unki kitab main usse apki ye post relate kar pa raha hoon...

    कई रोज तक आप अंडर ओब्सर्वेशन रहते है ..आपके चाल चलन को देख परख फिर आपकी एंट्री किसी खेमे में होती है
    poorntya sehmat...
    ...vice versa is also true. You also observe things very promptly!

    . मै..वो लेप लगवाने पूनम दी के सामने पहुंच गया ..
    ye bold main hi hona tha....
    ...MP3 (Mera pehla pehla pyaar)

    ....खुदा का शुक्र है गेंद बल्ले पे आ गयी .. ओर..सरदार ने हमें माफ़ कर दिया ....

    ...wow kahani poori Filmi hai !!
    Par zindagi bhi kay koi dabba band film se kum hai?
    Sansmaran bahut hi adbhoot tha....


    aur ye.....
    कहते है ये वक़्त तकनीक का है पर तकनीक की दुनिया की अपनी पेचीदगिया है .....बाजार की अंगुली थाम के बढे होते बच्चे है ..चौबीस साल के घनघोर कैरियरिस्ट है....ज्यादा फ्लेक्सेबल रीड की हड्डिया है ....ख्वाहिशे डबल अंडर लाइन करे भागता युवा है ... अपने अपने इगो की बड़ी बड़ी आलीशान ड्योढी में बैठकर इतराने वाले कुछ अधेड़ दुनियादार लोग है ... ... इत्ते बड़े बड़े रंग बिरंगे ग्लो साइन बोर्ड है जो रात को चमककर सच ओर झूठ को गडमड कर देते है .. . ..ओर हर ख्वाहिश पे अलादीन का चिराग न सही ...एक अदद इ एम आई जरूर है ...काश चेप्टर होते जिंदगी के भी .....किसी स्कूल में सिखाया जाता ...कैसे खामोशी से मुमकिन है .......इत्ते मुखोटो में रोज आवाजाही .....कैसे पकड़ना जमीर का इक कोना ...जब दुनियादारी का बुलडोज़र बढा आये

    Behterin....
    Shayad jahan tak yaad hai mujhe pehli baar aaya hoon aapke blog main....
    ...par har ek lafz ne prabhavit kiya .
    Khaskaar "..चौबीस साल के घनघोर कैरियरिस्ट है."

    ;"....ख्वाहिशे डबल अंडर लाइन करे भागता युवा है";
    "अलादीन का चिराग न सही ...एक अदद इ एम आई जरूर है ...";
    aur ".....कैसे पकड़ना जमीर का इक कोना ...जब दुनियादारी का बुलडोज़र बढा आये"
    to apne aap main "Quote" hain koi.

    Thanks ki aap mere blog main aaiye comment dene...
    ...isliye nahi ki bahut pasand hain wo mujhe (500 ke note ki tarah bikhre pade hain pehchnna mushkil hai unhein)

    balki isliye ki aapke pad chinh mile wahan se jo is nostalgia tak pahoonche...

    One Question: kya sabhi ladkiyaan ek hi school se padhi hoti hain?
    :)

    उत्तर देंहटाएं
  46. aur ye kya ? dermitologist ?

    kisi blog pe hindi blogger aur unki education ke uppar vivad chal raha tha (infact hai)....

    ...pehle aapki post padhi hoti to wahan pe aapka udharan zarror quote karta aur batata ki hindi se MA karna zarrori nahi.

    Hartley Congratulations.

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  47. कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उस संवाद के रास्ते को खोलती है ,जिन्हें लेखक शायद देख नही पाया ...

    ye to pata nahi ki ye tippaniya post se behteri hain ya nahi par post ke barabar hi acchi lagi:

    ".जहाँ से वापसी का रस्ते मे न जाने कितनी कॉमिक्स, कितनी लेदर बॉल्स कितनी वर्टिकल पेन्सिल्स, सीक्रेट डायरीज्‌ और कुछ जोड़ी शफ़्फ़ाक कंचों सी पारदर्शी आँखें उगी हुई हैं..अगर वापस आ पाया तो शायद कुछ कह पाँऊ..मगर प्रोब्लम है कि कौन कम्बख़्त वापस आना चाहता है..और फिर यह जिंदगी का जुँआ."

    "जैसे कोई बगिया से खिले फूल चुनता है, उसी तरह बचपन की यादों को गुंथा है
    यादों की माला.. वादी की खुशबु... सात समुन्दर फांदती ...
    "

    " मेघा ने अनुराग के किसी रोज अचानक मिल जाने की ख्वाहिश को डबल अंडरलाइन कर रखा हो...!!!!"
    aur kya keh rahi hai kancha ji aap treveni bhi likhte ho....

    ...dekhoon koi link mile !!

    "ओर ये पंक्तिया किसी कविता की तरह लगती है
    .काश चेप्टर होते जिंदगी के भी /किसी स्कूल में सिखाया जाता ./कैसे खामोशी से मुमकिन है /.इत्ते मुखोटो में रोज आवाजाही /कैसे पकड़ना जमीर का इक कोना /जब दुनियादारी का बुलडोज़र बढा आये

    "

    sahi 100%(maybe hahaha)

    aur nimn sabse behterin:
    "Rx,

    Nostalgiamycin 1000 mg"

    Oh No !!0251 HRS Time to go.
    (Not to bed !! To find Trevenies....)

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  48. बचपन की यादें कॉमिक्स के साथ ...किस किस की कैसी कैसी यादें ताजा हो गयी आपके खुबसूरत लफ्जों में ढले
    इस संस्मरण से ...!!

    उत्तर देंहटाएं
  49. डॉ. साहब ! सबसे पहले शुक्रिया... :)
    आप चाहे कुछ भी लिखें, कितना भी लिखें या किन्ही भी वजहों के साथ लिखें वो बात सब अपनी जगह है, पर हाँ... आपका लिखा कुछ भी देखकर आपसे सिर्फ कलम उठाने भर को ही शुक्रिया कह देने का मन करता है... पिछले काफी दिनों से आपके ब्लॉग पर दिन में एक-दो बार झाँक ही लेता हूँ.. आपकी विस्मृत कर देने वाले विचार दिल को यकीन नहीं करने देते कि ये मांसपेशियों की जटिल दुनिया की समझ रख सकने वाले मस्तिष्क की सोच है..
    आपको पढ़ के जो महसूस होता है वो शब्दों में लिखकर जाया नहीं करना चाहता.. लिहाजा सिर्फ इतना ही कहूँगा कि लिखते रहिएगा , आपसे काफी कुछ सीखने को मिलता है...
    आज की पोस्ट भी आपके बाकी नगीनों की तरह निसंदेह सहेजने योग्य है.. "बाप" शब्द का प्रयोग परिहार्य हो सकता था.. थोड़ा झिझक हुयी वहां पर पढ़ते हुए.. पर हो सकता है उसके अपने कारण हों..

    अंत में एक और सुन्दर रचना के लिए फिर से धन्यवाद..

    उत्तर देंहटाएं
  50. इस बार लाइन और लेंथ परफेक्ट है, मैं आपकी गेंद पर फर्स्ट स्लिप में मेघा के हाथों कैच हो चुका हूँ,
    शत्रुघ्न सिन्हा, सिनेमा, राजनीति और ज़िन्दगी का एक विद्रोही नायक.. हाय उस टेढी नज़र पर मर जाएँ. नीलू भी कहीं से वैसा ही दीखता होगा. कामिक्स कभी नहीं पढ़ पाया इसलिए व्यक्तित्व के विकास में कुछ कमी सी है शायद. वर्ल्ड कप जीतने के दिनों में स्कूल के आखिरी पायदान पर था और लेदर बाल की कीमत में कोई चार रुपये का अंतर बैठता है, हमारे हिस्से में एक रूपया पचास पैसे आते थे यानि कीमत थी सोलह रुपये. तो डॉक्टर साहब अभी बूढे हुए बिना ही दुनियादारी की बड़ी बातें किया करते हैं.
    मेघा मिले तो कहना कि कुलदीप के पास जाने देती तो मैं भी तुमसे कुछ कहने लायक शब्द सीख लेता.

    उत्तर देंहटाएं
  51. Laga jaise koi movie dekh rahi hu... ishwar karein aapki Megha bhi ye lekh padhe aur aapki dost aapko fir se mil jaye...

    उत्तर देंहटाएं
  52. कल से फिल्म का नाम नही याद आ रहा था...आज अभी विजू से पूँछा.. आपकी कहानी पढ़ कर हालिया रिलीज़ फिल्म सिकंदर की याद पता नही क्यो आ रही है... इसी उम्र के मनोवोज्ञान को समझ कर खेले गये भयानक खेल पर बनी फिल्म के निर्देशन में कुछ कमी रह गई, वर्ना विषय और प्लॉट अच्छा था...!

    फिर से कहने का मन हो रहा है कुछ

    एक समय अब का है जब हम प्यार तलाशते हैं। ९ वीं १० वीं में पहुँचते ही इस बात का कॉम्प्लेक्स कि अब तक अपने पास कोई गर्लफ्रैंड/ब्वायफ्रैंड नही है और हर चेहरे में हर शख्स पर आज़माईश..! थोड़े दिन बाद नही यार मैं समझ नही पाया वो असल में वो था/थी ही नही जिसे मैं ढूँढ़ रहा/ढूँढ़ रही थी, जो सिर्फ मेरे लिये बना/बनी हो और फिर नेकस्ट..जैसे बाज़ार से मोबाईल खरीदा जा रहा हो...!!!

    एक समय वो होता है, जब प्यार बिना खोजे तलाश किये आ जाता है, हम समझ भी नही पाते कि ये कौन सी शै है जो अपने पर काबिज़ है। जो नित नये, अजूबे काम करवा दे रहा है। कोई नॉर्म नही, कोई रूल नही...सब कुछ अपने आप बिना सोचे समझे होता जाता है...! उस समय तो वो शख्स, वो खुमार इतनी फुर्सत भी नही देता कि हम इन सब चीजों का नाम तलाश सकें...!

    ये तो तब होता है, जब सब बीत जाता है...हम रीते हाथों समीक्षा करते हैं... ये सब क्या था, ये सब क्या हुआ और लगता है कि शायद इसे ही आदि अनादि काल से प्यार कहा जाता है।

    ऐसा तभी होता है, जब उम्र अनुराग और मेघा को छू रही होती है....!

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  53. वाह वाह ...हिंदी में कहे तो मज्जा ही आ गया वाह....आह आह बचपन की यादें :)

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  54. इन दिनों मेरी साडे पॉँच साल का बेटा मुझसे रोज एक कहानी सुनने की फरमाइश करता है ...जब मै अपने लिए कोई किताब खरीदता हूँ .उसी दुकान से वो भी अपनी कोई किताब लाकर मेरे सामने रख देता है ....पिछले दिनों अपनी पुरानी अलमारी खंगाल रहा था तो वही कामिक्स नज़र आयी ....
    आठवी क्लास की उम्र ऐसी होती है जब सबके पास एक गर्लफ्रेंड होती है ...ओर ऐसा होने के लिए कोई खास शर्त नहीं होती ....मासूम सी दोस्ती.....ईमानदारी से कहूं ओर आधिकारिक रूप से तो कोई कौर मेरी पहली गर्लफ्रेंड थी दूसरी क्लास में जो मुझे बेहद अच्छी लगती थी .पर मेघा ने थोडा सा सिंसियर बनाया था पढाई के प्रति ये सच है ...
    जिंदगी का कोलाज़ ऐसा ही होता है ..अलग अलग शेड्स लिए ...कही चमकीले .कही धुंधले .नीलू भाई का तिकोना सा शार्प चेहरा अभी ही याद है मुझे .आंटी तब ऐसी ही थी जैसी दो जवान लड़कियों की मां होती है हड़बड़ी में ..गली में घुसे .हर जवान लड़के को शक की निगाह से देखना ...छत पे हंसती लड़कियों को डांट पिलाना .उन दिनों एक कपल आया था हमारे बराबर में रहने जिसने लव मेरिज की थी...लड़कियों को उन भाभी से मिलने से मनाही थी ...की कही बुरी आदते न सिखा दे .अलबत्ता वो भाभी बहुत अच्छी थी ...मुझे पकोडे बना के खिलाती थी ......
    @गौतम जी
    जरूर अगर सब कुछ ठीक रहा तो २२ की रात आपके सामने रूबरू होगे ....फ्लाईट की टिकटे बुक है .....
    @केतन
    इस वाली से मैडम को शिकायत नहीं होगी.......
    @हरकीरत जी.....
    कुछ रोग आनुवंशिक होते है....इधर हमारे छोटे को भी यही है......ओर कुछ चेहरे इतनी बारीकी से याद रहते है .के ...
    बिंदास लिखिए .आपका बुरा हमारे दुश्मन भी नहीं मानेगे
    @डॉ रवि जी
    लापुझुन्ना मेरे फेवरेट ब्लोगों में से एक है .....उतना अच्छा लिखने की काबिलियत मुझमे नहीं है ....
    @पंकज बसलियाल जी
    आपने वाकई इसे बड़ी बारीकी से पढ़ा इसलिए आप उस शब्द पर ठहरे ....ऐसे पढने वाले ही किसी लिखने को सार्थक करते है ...हाँ बाप शब्द लिखने की एक वजह थी .बतोर लेखक मै उस करेक्टर की इमेजिनेशन देना चाहता था पढने वालो को की वो उसे इमेजिन करे ....यकीन मानिये मै भी दो बार वहां ठिठका ओर रुका था .....
    @दर्शन

    जिंदगी के कई सीन ऐसे लगता है जैसे कही किसी ने लिख तो नहीं रखे हो....अब देखिये न एक बच्चा रेल के टॉयलेट में पैदा होता है ओर कामोद से नीचे गिरके फिर भी जिंदा बच जाता है .......
    दो साल पहले इसी कम्पूटर की दुनिया में एक फौजी मिलता है जो मुआ शायर भी है.श्रीनगर में एक रोज उसी को गोली लग जाती है ....
    पांचवी क्लास में लिखी आपकी कविता ...को जब कोई आपका दोस्त फेस बुक में चिपका देता है....जिसे आपसे मिले पच्चीस साल हो गए है ....जो इत्तिफकान आपका ब्लॉग पढ़ते पढ़ते आपको टटोलता है की आप कही वही अनुराग तो नहीं ......
    सब असली है.....खालिस असली.....
    कहते है इसी महीने इंटरनेट का जन्मदिन है ...शायद चालिसवा ...या पता नहीं कौन सा .तकनीक की दुनिया को अपने नजरिये से देखने की कोशिश की है .....
    त्रिवेणी पढने के लिए नीचे स्क्रोल करोगे तो मिल जायेगी
    @कंचन

    जब पी एम् टी की तयारी कर रहे थे तब आमिर की क़यामत से रिलीज़ हुई थी .ओर लगभग उससे कुछ दिन पहले ...सलमान की मैंने प्यार किया ....
    यूँ भी उन दिनों मोहबत आसमान से टपका करती थी .ओर हर हसीं चेहरे से प्यार हो जाता था ..उस दौर के कई शर्मिन्दगी भरे किस्से भी है......

    आप सभी लोगो का शुक्रिया

    उत्तर देंहटाएं
  55. अनुराग जी
    जिस खूबसूरती से आपने अपनी बचपन की यादों को कोमिक्स के सहारे समेट है........सच मानिये अपने बचपन ,की याद ताजा हो गयीए...सब का एक जैसा हाल है वही कोमिक्स...वही घर-दरवाजे वही ट्रांसफर के साथ बदलते रिश्ते- जज़्बात....जो भी मज़ा आ गया.

    उत्तर देंहटाएं
  56. बहुत डूबकर पढ़ा आपको !
    इसी बहाने अपना बचपन को तलाशने का सिलसिला भी जारी रहा !
    सोचता हूँ मेरा बचपन तो बड़ा बेजार रहा ... वो कमियां अब पूरी करने की कोशिश करता हूँ !
    मैं कभी जान ही नहीं पाया ...कामिक्स...कंचे...पतंग.....और अब ये सब मुमकिन नहीं !
    बस बच्चों को ऐसा करते देखकर ही पुलकित हो जाता हूँ !

    अच्छा लगा आपके पास आकर !
    आभार

    उत्तर देंहटाएं
  57. हर ख्वाहिश पे अलादीन का चिराग न सही ...एक अदद इ एम आई जरूर है ...काश चेप्टर होते जिंदगी के भी .....किसी स्कूल में सिखाया जाता ...कैसे खामोशी से मुमकिन है .......इत्ते मुखोटो में रोज आवाजाही .....कैसे पकड़ना जमीर का इक कोना ...जब दुनियादारी का बुलडोज़र बढा आये

    Awesum post......loved every bit of it :)

    उत्तर देंहटाएं
  58. माफी चाहूँगा, आज आपकी रचना पर कोई कमेन्ट नहीं, सिर्फ एक निवेदन करने आया हूँ. आशा है, हालात को समझेंगे. ब्लागिंग को बचाने के लिए कृपया इस मुहिम में सहयोग दें.
    क्या ब्लागिंग को बचाने के लिए कानून का सहारा लेना होगा?

    उत्तर देंहटाएं
  59. बहुत दिन के बाद ब्लॉग पर आना हुआ ...क्या करे कभी वक़्त साथ नहीं देता तो कभी जिन्दगी शिकायत करने लगती है ....दुनियादारी भी निभानी है नाहक ही लोगों की नाराजगी झेलते फिरो ....अरे ,,शहर छोड़ दिया क्या ...या फिर तुम तो अमेरिका में रहने लगी हो ...जैसे जुमले सुनने को मिलते है ...खैर आपकी यादों में शामिल होना अच्छा लगा ....यादों की एक संदूकची सबकी अलमारी में बंद है ...और चाबी ...! वो शायद दाल रोटी की फ़िक्र में कहीं खो गयी है ....

    उत्तर देंहटाएं
  60. कुछ आदतें पक जाती हैं जाती नहीं अपनी ब्लाग लिस्ट देखने की आदत अभी नहीं डाल सकी कई दिन से लग रहा था कि कुछ अच्छा नहीं पढा है आज ब्लाग लिस्ट पर नज़र डाली त्प आपकी पोस्त देखी चार दिन पेहले अपने आप को कोसा। आज से ये प्रन कर लिया कि सब से पकले अपनी ब्लाग लिस्ट ही खोला करूँगी। आपका संस्मरण जओसे कोई फिल्म देख रहे होँ । सच कहूँ तो आप और गौतम राज रिशी जी ब्लोग जगत मे सब से अच्छा लिखते हैं बहुत बहुत शुभकामनायें। पिछली पोस्ट भी पढ कर ही जाती हूँ

    उत्तर देंहटाएं
  61. आलीशान ड्योढी में बैठकर इतराने वाले कुछ अधेड़ दुनियादार लोग है .
    इस एक वाक्य ने आपकी पूरी परिपक्वता को रेखांकित kar दिया
    बहुत ही मीठा और असली संस्मरण |
    हमे भी अपनी गली के गुल्ली डंडा ,खो खो .और कपडेकूटने वाला डंडा (मोगरी )से क्रिकेट खेलने वाले वाले आठवी क्लास के लडके याद आ गये |
    बेहद रोचक पोस्ट |
    आभार

    उत्तर देंहटाएं
  62. क्या खूब यादें संजोईं हैं --
    अनुराग भाई आपने ...
    अब मेरी बारी है
    कहने की,
    चलिए 1 संस्मरणों की किताब लिखें --
    कुछ तुम कहो, कुछ हम कहें :)

    उत्तर देंहटाएं
  63. देहरादून का वह कौन सा इलाका था डाक्टर सहाब जहां कंचे खेले ?
    कभी टकराए नहीं, वरना तय जानिए आज तक याद करते कि एक कम्बख्त ने सारे जीत लिए थे। चलो बच गए।

    उत्तर देंहटाएं
  64. डॉक्‌ साब, दोबारा साहिल पे आया था इस उम्मीद से कि शायद कुछ नया माल रातों-रात जेट्टी पे उतर रहा हो, मगर अभी तो कमेंट्स का टाइड ही चल रहा है. सो लगे हांथ टोकेन मे यह लाइन लिये जा रहा हूँ

    "काश चेप्टर होते जिंदगी के भी"

    और हाँ कहना चाहता था कि यह विलक्षण सूक्ष्म-दृष्टि तो बस निर्मल वर्मा, उदयप्रकाश या प्रियंवद की कलम से उतरती थी पहले.

    "मैंने देखा उसके गोरे चेहरे पे होठो के उपर भूरे से बाल है"
    आपकी मेघा की बात पे याद आया कि हमारे साथ भी एक मेघा थी जिसे उदारतावश (?) हमने समर वैकेशन मे अपनी ढेर सारी कॉमिक्स पकड़ा दी थी, और उस वैकेशन के बाद कभी दोबारा वह स्कूल ही नही लौ्टी..अभी भी ढूंढ रहा हूँ उसको..मिल जाये तो पाँव पकड़ लूँ कि माँ कमसे कम वो कॉमिक्स तो वापस कर दो. ;-)
    और रस्तोगी वाली बात पे याद है कि क्लास मे सबसे छोटा और बेवकूफ़ होने के कारण कुछ सयाने किस्म के कुलदीपों ने मुझे आँख मारने की कला सिखा दी थी..और उनका इशारा मिलते ही मैं वो गजब की आँख मारता था कि स्कूल की तमाम विघ्नसंतोषी पब्लिक वो ताली बजा कर हँसती थी..और मेरा सीना चौड़ा हो जाता था..कि गुरू लगता है सिक्का जम गया. वो तो माट्‌ साब के डंडे ने समय पर सत्य का ज्ञान दे दिया..वरना कठोर और हृदयहीन सैंडल्स से मिलने वाला सत्यज्ञान ज्यादा तकलीफ़देह होता..और यह आपको इतना लास्ट मे इस लिये बता रहा हूँ कि ब्लॉग की विघ्नसंतोषी पब्लिक को ताली बजाने का मौका नही देना चाहता..मुझे शरम आती है ;-)

    "यूँ भी उन दिनों मोहबत आसमान से टपका करती थी"

    और हाय, कम्बख्त हम अपनी नयी खरीदी लाल छतरी के नशे मे धुत थे..
    ..O Me! O Life!

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  65. डियर डॉक्टर,
    भावनाओं की अभिव्यक्ति की दुर्लभ कला कूट कूट कर भरी है !
    ऐसे संस्मरण शायद अनगिनत लोगो की ज़िंदगी में होंगे, लेकिन इनको काग़ज़ पर या तकनीक की दुनिया में यूँ कहिए की लैप टॉप के स्क्रीन पर) उकेरना सबके लिए संभव नहीं होता.
    धन्य हो मित्र ! बहुत ही सुंदर लिखा है.
    अब इस निगोड़ी तकनीक को भी क्या कहूँ, जब अपना पुनः संपर्क भी इसी मध्यम से हुआ !
    हर पुरानी छोटी सी बात को भी याद रखने की क्षमता की दाद देता हूँ, लेकिन दूसरी क्लास की "कोई कौर" को "रविंदर कौर" ही कह देते तो वो भी खुश हो जाती (पर मेघा की तरह इसका भी पता नहीं कहाँ पर है).
    और 32 साल हो गये दूसरी क्लास से निकले, लेकिन तुम्हारे लेख से ऐसा लग रहा है की कोई 15 दिन पुरानी ही बात है.
    साधुवाद !!!

    उत्तर देंहटाएं
  66. शुक्रिया अनुपम......वाकई तुम्हारी याददाश्त काबिले तारीफ़ है...रविंदर कौर ......अब भी याद है तुम्हे .....क्यूट थी न

    उत्तर देंहटाएं
  67. डियर डॉक्टर,
    अब बात निकल ही गयी है तो है तो बहुत दूर तलक जाने ही दो....
    मेरे को यह भी याद है कि उसके रंग से प्रेरणा पाकर तुम पेन्सिल भी ब्राउन कलर कि यूज़ करते थे.
    आज सालों बाद बहुत पुराना फ्लैश बैक दिमाग में चला दिया.
    खैर, दीपावली कि सपरिवार बहुत बहुत शुभ कामनाएँ.

    उत्तर देंहटाएं
  68. आज पूरा लेख पढ़ ही डाला। इसके पहले दायें-बायें, ऊपर नीचे से देखते और टुकड़ा-टुकड़ा करके बांचते रहे। दिन की शुरुआत शानदार रही। बहुत मजेदार रहा यह किस्सा।

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  69. Wow!! Beautiful..
    Apne bhi first crush kii visit kar aaaye hum...

    उत्तर देंहटाएं
  70. makhmal jaisi hain ye yaaden ....parat dar parat ..kai saal peeche le gayeen ....han comics....main to raaj comics kke super heros ka deewana tha...7th me thaa... ek ladki thi ...use bhi shauq tha... hum set set ke sath me hi padh jate the... aur jab kuch nahi bachata...to main comics ke peeche aane wali comics ke ad dekh kar nayi kahaniaayn bana diya karta tha... mera pahal lekhan wahi hai .... :)

    sach much ...itna maza mujhe kuch bhi padhne me nahi aaya...

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  71. मेघा जैसी लड़की और आठवीं का प्यार .. खूब बढ़िया लिखा है आपने,

    कुछ हमें भी याद आ गया.. आपकी सारी पोस्ट्स नहीं पढ़ पाया हूँ. लगता है २-३ दिन और रात लगकर मेहनत करनी पड़ेगी वर्ना फिर शायद कभी नहीं पढ़ पाउँगा..

    मनोज

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  72. वो सीधी पेंसिल.....

    याद आ गई....

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  73. इस बहरूपिया ज़िन्दगी ने मुखोटा लगाना सिखा दिया,
    हम तो अच्छे थे बच्चे थे, पता नहीं ये क्या बना दिया,

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कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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