2009-10-14

शह ओर मात !

आज   उसका  जन्मदिन  है  …इत्तेफाक   से  देहली    में ही  हूं...विश   करने   के लिए कॉल   करता   हूं तो  मालूम चलता है वो …. घर   में  है …एक्सीडेंट   हुआ   है …
सब  ठीक   तो    है …ना ….मै   बेवकूफी  भरा  सवाल   पूछता  हूं ….
हाँ   सब  ठीक   ही   होगा  …बिस्तर   में  जो  हूं ….वो  हंसती   है  ..एक  आध   फ्रेक्चर   है  बस  वो  .फोन पे कहती है  
….
उसके पास चेस बोर्ड का एक बड़ा कलेक्शन है ...अपने जन्म दिन पर वो सामने से  हम दोस्तों   से  मांगती थी.."मुझे एक यूनिक  चेस बोर्ड गिफ्ट करो..."उसके मेरे बीच एक अजीब सी अंडरस्टेंडिंग है ..साल में एक दो बार ही फोन पे बात करते है .वो भी ज्यादातर पेशेवर ...होली दीवाली पे एक दो एस एम एस इधर उधर हो जाते है . वो ऐसी ही है ..अपनी मर्जी से आपकी जिंदगी में दाखिल हो जायेगी ...अपनी मर्जी से गायब ....  जब  दाखिल   होगी    तो     पूरी    बेतकल्लुफी    से …..
मेरे  पिता   के  अलावा    वो  दूसरी   ऐसी  शख्स  है   जिसे   मै   अब  तक  चेस   में  हरा  नहीं  पाया ...विश्नाथन  .आनंद की तगडी  वाली फेन  है......फिलहाल .वो डब्लू  एच  ओ  में किसी बड़े ओहदे पर है .....
.बीच में एक बार ली मेरिडियन में टकरा गयी....डब्लू एच ओ के किसी प्रोजेक्ट के तहत आयी थी ...
".चल इकठे लंच करते है.."...मुझे सी एम इ  से उठा कर ले गयी....
 "लिखने   पढने   का शौक अभी बाकी है या  सिर्फ    पैसे कमा  रहे   हो  ….....खाना खाते खाते वो पूछती है...
खाते खाते मै  अचानक   रुक जाता हूं ....".आज तो करवा चौथ है न....."
तो ....तुम तो ऐसे रुक गए हो जैसे अमेरिका में दूसरी   कोई   इमारत   उडी   हो  .. .तुम   भी  तो   खा  रहे  हो !
नहीं.....मै ....!!
मेरे मियां ने  तो   कभी इस दिन शराब नहीं छोडी ..!
मै   हक्का  बक्का   उसका  चेहरा   देखता   हूं …..
चिंता   मत   करो …… …..मेरा डाइवोर्स हो गया है....!
आई  ऍम  सॉरी  …!
वो   मुस्कराती   है …"लेप  टॉप  लेकर  घूमेगे …. जेब  में नया  लेटेस्ट   मोबाइल …पर   मन  में वही  करवा  चौथ …"
   हंस  कर  सच   बाते  कहना उसकी फितरत है
.जानता था उसकी शादी शुदा जिंदगी में पिछले  कुछ   सालो से कुछ उथल - पुथल है पर कुछ चीजे बेहद निजी होती है उनमे यूं  ही एंट्री नहीं ली जाती ....ओर कुछ सवाल पूछना उनके जवाब सा ही मुश्किल होता है
उसने  मेरी आँखों के सवाल  को शायद पढ़ लिया है .....…इसलिए वो दो वक़्त को एक साथ जोड़कर लाती है......
"ज्यादा पढ़े लिखे लोगो के नाखून अद्रश्य होते है . साथ रहकर ही दिखते है …....कभी  कभी .औरत अपने भीतर रुक जाती है....मै भी  कुछ साल रुकी रही...."...पर  फिजिकल वोइलेंस…के साथ    शराब …उसे   डाइजेस्ट   करना     मुश्किल    था ….सो  ...एक रोज …  मैंने  भी   दो  जोरदार पंच ....  गिर   पड़ा   …... हगामा मच गया....
"इन  शोर्ट ….बाहर " … वो हंसती है ....
सब   कुछ   उसकी  हंसी   जैसा  आसान  नहीं  था  …उन खरोंचो  से बाहर  निकलना ....  दोबारा   पी  एच  डी  करना  ..पढने  के  लिए  बाहर  जाना !
"अब ! .....मै पूछता  हूं.....
.हर   खाने   की  अपनी  मुश्किलें   है …नाते  रिश्तेदार   ..कभी कभी तो ऐसा लगा  जैसे  कन्फेशन बोक्स में खड़ी  हूं.....वो जिसे हम समाज कहते है ना... इसका  बड़ा  तंग जुगराफिया  है  यार .....एक तलाक़ के बाद औरत "सेकंड हेंड "हो जाती है....
उसे चाइनीज पसंद है ...ओर बीच बीच में ब्लेक कोल्ड ड्रिंक के घूंट भरना ....
औरतो  को  यूटीलाइज करने  के  लिए  कंडीशंड करने  वाले  समाज  के  फोर्मेट  हर तबके हर क्लास के अलग है ..जब भी सामने वाले को पता लगता है अकेली हूं... .डाईवोरसी ..उसका बिहेवियर  बदल जाता है . जैसे साला कोई नोटिस बोर्ड टंगा  हो "अवलेबल "....तुम अस्सी प्रतिशत मर्द एक सा सोचते है ...आँख की स्क्रीन पे लिखा आ जाता है...”पकड़ लो.”... वो किसी ने कहा था ना....... …... जिस्म पे गोश्त चढ़ते ही आदमी की नीयत बदल जाती है........... ठीक लिखा था ..
पीछे   फिश  पोंड  में  तैरती    मछली   एक  पल  को  रुक  गयी  है  .जैसी  उसकी  बात  की  तसदीक   कर  रही  है …


घर !!
वो  बिस्तर पे है ...मुझे देख मुस्कराती है..चेस बोर्ड  उसके  किनारे रखता हूं......
थोबडे की सूरत ज्यादा   तो नहीं बिगडेगी   ना ....वो पूछ रही है .....
फिर एक्सीडेंट का खुलासा होता है ...
 ....रात को गाड़ी से  लौट रही थी तो पीछे कुछ शोहदे लग गये ....बदतमीजी   करने  लगे … सो  गुस्सा  आ गया  ... अपनी कार  उनकी मोटरसाइकिल  में मार दी..पर ..…
कुछ देर वहां बैठकर  मै निकलने के लिए उठा हूं....आंटी कहती है .
"समझा  उसको...….सरफिरी   है …."...
सरफिरी!  मै  बाहर निकल आया हूं.....


ऐसे  सरफिरे  हालात   की बिसात  पे  बरसो से  मात खा रहे है.!





त्रिवेणी-

फलांग जाता है कुछ किस्से...... कही देर तक रुकता है
शोहरत के मोडो पर  मगर अक्सर चौपाले  लगती है.......

एक कमज़ोर लम्हा मेरे माजी का अक्सर मुस्कराता है

57 टिप्‍पणियां:

  1. फलांग जाता है कुछ किस्से...... कही देर तक रुकता है
    शोहरत के मोडो पर मगर अक्सर चौपाले लगती है.......

    एक कमज़ोर लम्हा मेरे माजी का अक्सर मुस्कराता है..achha raha ye kissa bhi diwali ke ek gift jaisa...zmane ka जुगराफिया sach me tang hai shayad..apki post me magar kafi jagah hai...

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  2. …"लेप टॉप लेकर घूमेगे …. जेब में नया लेटेस्ट मोबाइल …पर मन में वही करवा चौथ …"

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  3. बहुत बढ़िया लिखते है आप !
    आपको और आपके परिवार को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं !

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  4. आपकी लेखनी में शब्द तो कम होतें हैं मगर अर्थ गहरा !

    गहरा आघात करती हैं आपकी साधारण सी लिखी हुई ये बातें !

    "तुम अस्सी प्रतिशत मर्द एक सा सोचते है" , मुझे लगा प्रतिशत शायद कुछ कम है ! मैंने सुना हुआ है या महसूस भर किया है कि ये प्रतिशत कम से कम " नब्बे" होना चाहिए !

    "ऐसे सरफिरे हालात की बिसात पे बरसो से मात खा रहे है.!" बात सच है सौ प्रतिशत !! ऐसा क्यूँ होता है ये नहीं पता ??

    आपकी लेखनी कि कशिश आपके ब्लाग पर खींची सी लाती है !!

    धन्यवाद !!

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  5. bahut sach hai ye ...
    bahuton ke aise kisse hain... examples hain...
    triveni bahut hi umdaa hai !!!

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  6. क़यामत की नज़र रखते है आप, हरकतों, दृश्यों, हालातों और संवादों पर...

    ऐसे जिद्दी आदमकद बढ़ते जा रहे है शहर में... हमें इन्हें रोकने के लिए कुछ करना चाहिए... चलिए... आज फिर शराब पी कर बीवी को पीटें और कल विधानसभा घेर कर महिला आरक्षण की मांग उठायें... !!!!!! (सन्दर्भ : ८० प्रतिशत)

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  7. आज कल मै भी ऐसे ही किस्से सुन रही हुं.... और कई बार मैने भी यही सुझाव दिया है कि ऐसे हालात मे जुदा हो जाना चाहिये... पर बात यही आकर ठ्हर जाती है कि डाइवोंस के बाद लड्को को ज्यादा प्रोब्लेम्स नही होती...सारी प्रोब्लेम लड्कियो के सर ही आती है....

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  8. आप सच ही लिखते हैं, कभी कभी तो बहुत कड़वा सच, जो सोचने पर मजबूर करता है| आप अपना काम बखूबी करते हैं बाकी हमारे जैसे पाठको का पता नहीं...सच में|

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  9. ज्यादा पढ़े लिखे लोगो के नाखून अद्रश्य होते है . साथ रहकर ही दिखते है

    सुशिक्षित लोगों में भी डोमेस्टिक वोय्लेंस !!

    एक भयंकर सच्चाई.

    अच्छी प्रस्तुति.

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  10. आज के पोस्ट की तीन झकझोरने वाली बातें:

    ज्यादा पढ़े लिखे लोगो के नाखून अद्रश्य होते है .
    समाज... कन्फेशन बॉक्स !
    जिस्म पे गोश्त चढ़ते ही आदमी की नीयत बदल जाती है!

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  11. "ज्यादा पढ़े लिखे लोगो के नाखून अद्रश्य होते है . साथ रहकर ही दिखते है …

    आपकी लेखनी गहरा आघात करती हैं
    साथ ही सोचने पर मजबूर भी करती हैं
    धन्यवाद
    दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं !



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  12. kya kahoon sir thitak gaya hoon us machli ki tarah !!

    "पीछे फिश पोंड में तैरती मछली एक पल को रुक गयी है .जैसी उसकी बात की तसदीक कर रही है …"

    80% mard keh he 20% ko baksh diya aapne (usne).
    jahan bhi aisi vivechana hoti hai apne aap ko safe zone main kar leta hoon...

    "ज्यादा पढ़े लिखे लोगो के नाखून अद्रश्य होते है . साथ रहकर ही दिखते है "
    aur lower class walon ki aur kum padhe likhe logon ki kharoonchein bhi....
    ...aakhir bani usi nakhoon se hai na !!



    ...aur ye shatranj wali baat pe gulzaar sa'ab ki nazm yaad ho aaiye.....

    wahi "bhagwan ke saath shatranj khelne wali"

    treveni bahut sundar hai....
    ...aisi ki padhte hi chale jao bas "thousand times and over" ( Kite Runner se saabhar).

    and let me praise you for ur 'Eye For Detail.'

    ek cheez jo atak gayi wo thi....
    "Wo kaun thi?"
    Tough it hardly matters !!

    PS: Waise accha hua main jayada padh likh nahi paiya, door se hi dikne walle naakhoon ke liye ye excuse acchi lagi.

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  13. वो जिसे हम समाज कहते है ना... इसका बड़ा तंग जुगराफिया है यार .....एक तलाक़ के बाद औरत "सेकंड हेंड "हो जाती है....
    bahut khoob likha aapne aur bahut hi acche dhang se is baat ko abhivyakt kiya.. aapki lekhnee ko naman karta hun..

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  14. "दिल की बात" कुछ अनूठे शब्द-चित्रों का बेमिसाल संकलन बनने वाला है भविष्य में।

    इस कैनवस पर जाने कितने नायाब कैरेक्टर्स से मिल चुका हूँ शब्दों के अनदेखे रंगों और जुमलों के दुर्लभ कूचियों के जरिये...इन "वो" से भी मिलना एक बेमिसाल अनुभव रहा।

    i am really nervous Doc for coming 22nd Sept...i am nervous for how u r goint to sketch me

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  15. डॉ साहब आपकी लेखनी का प्रभाव जबरदस्त है..पूरा कथ्य दिल दिमाग को झकझोरने लगता है..जो अच्छा और मार्मिक लगा वह पोस्ट में पहले से बोल्ड कर रखा था...इतना ही कह पा रहा हूँ कि एक एक पंक्ति लम्बे समय तक याद रहेगी...नारी के प्रति पुरुष और समाज की मानसिकता को एक नारी द्वारा बड़े कड़वे और साफ़ शब्दों में अभिव्यक्त किया गया है...पर सत्य कितना भी कठोर क्यों नहीं हो उसमे मौलिक और सहज सुन्दरता अंतर्निहित होती है..इस कारण यह पोस्ट बेहद पसंद आने वाली है.

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  16. वास्तविक जिन्दगी के कितने नजदीक ले गयी ये रचना ,.. हर शब्द पूरी तरह से कुछ कहने और झकझोर के रख देने वाला है ... कमाल की बात है , क्या वाकई आँखों में हर चीज लिखी हुई दिख जाती है ???..

    अर्श

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  17. ऐसा क्यों होता है की लड़कियां थप्पड़ बर्दाश्त कर जाती हैं अक्सर...और अगर नहीं करती हैं तो दोषी वो ही होती हैं, अमूमन सबकी नज़र में, और कई बार खुद की नज़र में भी. कहाँ हिम्मत होती है बंधन तोड़ के निकलने की...अजीब बिसात है, जीतना कितना मुश्किल है...जो अपनी शर्तों पर जीती है ऐसी सरफिरी को मेरा सलाम.

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  18. ये संजय ग्रोवर उर्फ़ गुलशन ग्रोवर आपके खैर ख्वाह हैं क्या ......उन्हीं की टिप्पणी से पता चला आपने करवा चौथ पे कुछ लिखा है ....हालांकि आप पहले ही मुझे बता चुके थे कि आप अगली पोस्ट में कुछ ऐसा ही लिखने वाले हैं .....!!

    पर ये करवा चौथ वाले दिन आप .....??????

    देखती हूँ औरत के भीतर उठते ज़ज्बातों को कितनी बारीकी से पकड़ते हैं आप ....."जब भी सामने वाले को पता लगता है अकेली हूं... .डाईवोरसी ..उसका बिहेवियर बदल जाता है . जैसे साला कोई नोटिस बोर्ड टंगा हो "अवलेबल "."

    सौ प्रतिशत सच ........!!

    "...आँख की स्क्रीन पे लिखा आ जाता है...”पकड़ लो.”.."

    बहुत सी बिसरी बातें याद दिला दी आपने .......!!

    पीछे फिश पोंड में तैरती मछली एक पल को रुक गयी है .जैसी उसकी बात की तसदीक कर रही है …

    इस पंक्ति के लिए सलाम .....!!

    उत्तर देंहटाएं
  19. शतरंज के खेल में माहिर असल ज़िन्दगी में भी शह और मात के पल पल खेले जाने वाले खेल के लिए अभिशप्त हैं.यहाँ सिरफिरापन उनके प्रतिकार का एक पहलू ही लगता है.एक पूरा समाज ही जैसे उनके खिलाफ जुगत में लगा है.
    एक और रंग इस पोस्ट से उजागर हुआ.ज़िन्दगी का ये रंग सपनों के संसार की किसी छवि में नहीं होता.
    अंदाज़ आपका अपना है, उसके तो क्या कहने,यहाँ यही कहता हूँ-एक ज़रूरी सवाल लिए पोस्ट जो हम सबसे है.

    उत्तर देंहटाएं
  20. ज्यादा पढ़े लिखे लोगो के नाखून अद्रश्य होते है . साथ रहकर ही दिखते है …....!!!!

    ये तो ९५ प्रतिशत लोगो का सच है डॉ० सॉब....
    आप तो जानते ही हैं कि आप की पोस्ट पढ़ने क तुरंत बाद इतने तूफान आते हैं मन में कि तुरंत कुछ कह ही नही पाती...!

    फिर से आऊँगी कुछ कहने के लिये अभी तो उन सब लाईनों में फँसी हूँ, जो ऊपर लिखी हैं....!

    उत्तर देंहटाएं
  21. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  22. अभी तो हम स्वयं को बहुत अज्ञानी समझते है ! आपकी इन्ही पोस्ट में हम समाज को समझने की कोशिश सी किया करते हैं...कभी कभी असमर्थ भी पाते है...

    आपकी बातें तो सीधा दिमाग पर प्रहार करती हैं और उन पहलुओं पर विचार करने पर मजबूर कर देती हैं जिन्हें न तो अभी देखा है न महसूस किया है...क्या समाज ऐसा ही है?

    आज हम आपकी त्रिवेणी समझ पाने में असमर्थ रहे...जहाँ आप पहुचाना चाह रहे हैं वहां हम पहुँच ही नहीं प् रहे हैं...
    कृपया इसको स्पस्ट कर दीजिए....

    हम आपके इस ब्लॉग का नियमित पाठक है...

    कमेंट्स इसलिए नहीं करते हैं क्योकि पढ़ने के बाद हम अपने आप को उस स्थान पे नहीं पाते है की हम कमेन्ट करे....

    महान प्रस्तुति!!!! भावनाओ का खेल....."सब मोह माया है".....

    Mail Id: Surya4me@gmail.com

    उत्तर देंहटाएं
  23. हर बार की तरह ही साफ, सीधा और जबरदस्त!!

    फलांग जाता है कुछ किस्से...... कही देर तक रुकता है
    शोहरत के मोडो पर मगर अक्सर चौपाले लगती है.......

    एक कमज़ोर लम्हा मेरे माजी का अक्सर मुस्कराता है

    -क्या कहने इसके!!

    उत्तर देंहटाएं
  24. "ऐसे सरफिरे हालात की बिसात पे बरसो से मात खा रहे है.!"

    सरफिरो की किस्मत ऐसी ही लिखी गयी है, लेकिन वो तो बहादुर है बहुत बहादुर.... हमारी दुवाये उनके साथ है...

    १९४२ a love story का वो गाना याद आ गया--

    "दिल नाउम्मीद नही, नाकाम ही तो है,
    लम्बी है गम की शाम, मगर शाम ही तो है॥ "
    "ये सफ़र, बहुत है कठिन मगर
    न उदास हो, मेरे हमसफ़र!!"

    उत्तर देंहटाएं
  25. @ पीछे फिश पोंड में तैरती मछली एक पल को रुक गयी है


    इसे कहते हैं दिल से लिखना....बहुत खूब।

    उत्तर देंहटाएं
  26. कितनी ही जगह आँखें ठिठकी. कितनी ही बातों को दोबारा पढ़ा.. हर बार पढ़ कर एक ही बात निकली दिल से.. "सच है!!"

    बहुत संजीव प्रस्तुति.. सच कहने का एक बेहद उम्दा तरीका...

    उत्तर देंहटाएं
  27. अदृश्य नाखून
    हर खाने की अपनी मुश्किलें
    कन्फेशन बोक्स
    सेकंड हेंड औरत
    अवलेबल
    जिस्म पे गोश्त
    तैरती मछली

    सोच रहा हूँ इन शब्दों को खींचकर सिल्वर स्क्रीन पर फेंक दू.. जो भी तैयार होगा वो बड़ी कातिल चीज़ होगी..
    आपका क्या कहना है?

    उत्तर देंहटाएं
  28. 'ऐसे सरफिरे हालात की बिसात पे बरसो से मात खा रहे है.'

    त्रिवेणी में ही पूरी पोस्ट का सार छुपा है जैसे.

    ज़िन्दगी है ही शतरंज की बिसात!

    उत्तर देंहटाएं
  29. हम भी मात ही खा रहे है आज तक़ डाक्साब्।कभी-कभी खराब भी लगता है जब कोई पूछता है कि क्या फ़ायदा उन बातों को जो आपको जंहा का तंहा बनाये रखते हैं,अपने साथ के लोगों को देखो कंहा से कंहा पहुंच गये,सच बहुत आगे निकल गये हैं वो लोग,उतनी दूर कि मै उन्हे कभी पकड नही पाऊंगा,सच पूछो तो मै पकडना ही नही चाह्ता।पीछे ही सही,मात खाया हू सही,पर सुबह नहाने के बाद बाल संवारते समय आईना देख कर कभी नही शर्माता।अरे साला सेंटी हो गया था लगता है,खैर जो आपको पढ कर सेंटी कैसे ना हो,ज़िंदगी को सामने रख कर तस्वीर बनाते है आप्। दीपावली की बहुत-बहुत शुभकामनाएं

    उत्तर देंहटाएं
  30. ८० प्रतिशत ? हमें ये प्रतिशत ९८ से भी एक दो पॉइंट ज्यादा लगती है ....
    बाते तल्ख़ है पर
    "लेप टॉप लेकर घूमेगे …. जेब में नया लेटेस्ट मोबाइल …पर मन में वही करवा चौथ …"
    सच कहा पर ये सिर्फ पुरुषों की ही नहीं लड़कियों की सोच भी है .जींस टी शर्ट पहनेगी लेकिन शादी के लिए जन्म पत्री बनवायेगी....
    केवल एक तलाक़ के बाद नहीं ३० के पार होते ही कुंवारी लड़की भी सेकंड हेंड हो जाती है इस दुनिया में हर कामकाजी लड़की को "अवलेबल ".समझा जाता है ,ओर हर लड़की को २५ की होते होते बार बार एक ही बात कही जाती है शादी कर लो जैसे बम्ब फूट जायेगा

    जिस्म पे गोश्त चढ़ते ही आदमी की नीयत बदल जाती है..........सौ प्रतिशत सहमति
    @सूर्या जी
    जहां तक मै समझी हूं त्रिवेणी को "इन्सान जब अतीत को याद करता है केवल अपनी अच्छी ओर शोहरत भरी बातो को याद करता है अपनी कमियों तक पहुँचते वक़्त उन्हें फलांग जाता है यानि उनका जिक्र नहीं करता है ये सब देखकर वाही कमजोर लम्हा मुस्कराता है
    क्यों ठीक कहा न अनुराग जी



    फलांग जाता है कुछ किस्से...... कही देर तक रुकता है
    शोहरत के मोडो पर मगर अक्सर चौपाले लगती है.......

    एक कमज़ोर लम्हा मेरे माजी का अक्सर मुस्कराता है

    ओर हाँ ये टेम्पलेट आपके अब तक के सबसे खूबसूरत टेम्पलेट में से एक है पर IE में खुलने में दिक्कत कर रहा है

    उत्तर देंहटाएं
  31. आप अपनी पोस्टों में इंसानी जिदंगी के रंगो में से एक एक रंग ढूढकर लाते है। और हम सबको उन रंगो से परिचय कराते है। और इन्हीं रंग़ो से जब आपके शब्दों के रंग मिलते है तो वाकई कमाल हो जाता है। और हम बस देखते रह जाते है। कुश भाई ने हमारे दिल की बात कह दी। और त्रिवेणी का जवाब नही।

    उत्तर देंहटाएं
  32. नीलिमा जी, त्रिवेणी का मतलब समझाने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद्.....

    आपने लिखा था :
    "@सूर्या जी
    जहां तक मै समझी हूं त्रिवेणी को "इन्सान जब अतीत को याद करता है केवल अपनी अच्छी ओर शोहरत भरी बातो को याद करता है अपनी कमियों तक पहुँचते वक़्त उन्हें फलांग जाता है यानि उनका जिक्र नहीं करता है ये सब देखकर वाही कमजोर लम्हा मुस्कराता है"

    उत्तर देंहटाएं
  33. जिन्दगी क्या हुई
    जैसे
    शतरंज की बिसात.

    Bilkul yahi hai. kab shah aur kab maat.

    उत्तर देंहटाएं
  34. बढ़ा दो अपनी लौ
    कि पकड़ लूँ उसे मैं अपनी लौ से,

    इससे पहले कि फकफका कर
    बुझ जाए ये रिश्ता
    आओ मिल के फ़िर से मना लें दिवाली !
    दीपावली की हार्दिक शुभकामना के साथ
    ओम आर्य

    उत्तर देंहटाएं
  35. @surya
    सच कहा नीलीमा ने
    अक्सर जब भी अपने माजी को हम सरेआम केवल अच्छी बातो के लिए खंगालते है ..अक्सर उन बातो को दोहराते है ...जहां मेरा उजला पक्ष दिखे ....अपनी कमियों को छुपा जाते है ....ये त्रिवेणी इसी बात को लेकर कही है .

    उत्तर देंहटाएं
  36. वो ऐसी ही है ..अपनी मर्जी से आपकी जिंदगी में दाखिल हो जायेगी ...अपनी मर्जी से गायब .... जब दाखिल होगी तो पूरी बेतकल्लुफी से ….. और जब जायेगी तो आप को एक खीज देकर ..............ये सिरफिरापन लगता है . .......पता नहीं क्यों ऐसा होता है......... कहने को तो हम बड़े सामाजिक हैं पर दर्द दूसरो का अपना बनाना नहीं आता .................थोडी सी दिल की बात करलो तो क्या जाता है.......................डॉ. साहब सफल हैं आप बस इतना कहूँगा ये पोस्ट बेमिसाल है.

    उत्तर देंहटाएं
  37. ... गर जीत गए तो क्या कहना, हारे भी तो बाजी मात नहीं!
    सरफिरों के बीच ही पला, बड़ा हुआ, आज भी सरफिरों का ही साथ पसंद आता है, खुद हूँ या नहीं, बोलूंगा नहीं, मगर इतना बोल सकता हूँ कि इन सरफिरों की मात दे सके, इस ज़माने में दम नहीं

    दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं!

    उत्तर देंहटाएं
  38. सुख, समृद्धि और शान्ति का आगमन हो
    जीवन प्रकाश से आलोकित हो !

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    दीपावली की हार्दिक शुभकामनाए
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    उत्तर देंहटाएं
  39. चलिये, इनको ठीक होने दिया जाये। अदृश्य नाखूनों के जख्मों से।

    उत्तर देंहटाएं
  40. बेहतरीन लेख। आपकी दोस्त की सलामती के लिये दुआ करता हूं।

    उत्तर देंहटाएं
  41. दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें

    उत्तर देंहटाएं
  42. साले मर्दों के जींस भी उन्ही के माफिक जिद्दी होते है .. जल्दी म्यूटेट नहीं होते...उसने तब भी ऐसा कहा था .....ओर भी बहुत कुछ कहा था .....पर ब्लॉग में सब कुछ तो कहा नहीं जा सकता.....
    जब लाख रुपये महीना कमाने वाला .एक शानदार सोसायटी के शानदार फ्लेट में रहने वाला सॉफ्टवेयर इंजिनियर अपनी पत्नी पे हाथ उठाता है .....जब एक पढ़ा लिखा क्लास वन ऑफिसर अपनी गर्भवती पत्नी को कूट डालता है ...तो ये कहानिया फ़िल्मी नहीं लगती....एक पार्लर चलाकर पूरे परिवार का पेट भरने वाली खूबसूरत औरत अपने शराबी पति से मर खाकर सुबह वाही स्टेंडर्ड सीडियो से गिरने वाला बहाना बनाती है तो कलेंडर में तारीख दोबारा टटोलने का मन करता है .की गोया हम वाकई २००९ में है. ....वाई- फाई के इस युग में ..
    याद है एक बार किसी सामजिक कार्यकरम में शिरकत की थी...एक महिला ने जब पढ़े लिखे के बीच मौजूद इस "मर्दवादी वाइरस" के मौजूद रहने का जिक्र किया था तो बहुतेरे लोगो ने फ़ौरन उनको अप्रासंगिक .एलिटिस्ट करार दे दिया था .....
    उस जैसी औरते "दिस इज मेनस वर्ल्ड " के बोर्ड को उखाड़ फेकने में बाकायदा अपना रोल बखूबी निभा रही है ....भले ही उन्हें याद रखा जाए या मिस फिट घोषित किया जाए .....

    उत्तर देंहटाएं
  43. वो बाजी लगाते हैं उनसे
    जिन्हें चाल की समझ भी नहीं...क्या करें ???

    उत्तर देंहटाएं


  44. पाँच दिन परानी पोस्ट, आज पढ़ पा रहा हूँ ।
    फिर भी लगता है, देर नहीं हुईं है । क्योंकि..
    ऎसी कहानियाँ कभी पुरानी नहीं हुआ करती हैं ।
    आज इस पल भी, कहीं न कहीं ऎसे घटनाक्रम चल ही रहे होंगे,
    जो अपने आप में एक कहानी को एक जन्म दे रहे होंगे ।
    बुकमार्क कर सहेज ली है, यह बेहतर रचना ।

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  45. पढ़कर खामोश हो गई हूँ जटिल मुद्दे को उजागर किया है इतनी सहजता से... नज़र की बारीकियां, शब्दों को ओढ़ कहीं भीतर दस्तक देती हैं...

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  46. bahut ghri bat kahi hai bhai aapne kya dusre ke man ko itni achhi tarh aur imandari se smjha ja skta hai ?

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  47. अपन तो हैं ही लेट लतीफ और कुछ आपका ब्लॉग भी हम से रूठा रहता है कि टिप्पणी करने ही नही देता । आज देखते हैं । लेकिन सरफिरी की बातों से मै भी सहमत हूँ ।

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  48. ऐसे सरफिरे हालात की बिसात पे बरसो से मात खा रहे है.!

    anuraag ji,
    aapne gautam ji ko apni mulaakat ke baabat kuch likhne se mana kyoun kiya hai ,hum unke hi blog se seedhe yahaan aaye aur aap ka khoobsoorat kaarnaama dekha .
    allah kare jore kalm aur jyaada

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  49. कुछ-कुछ याद सा है बचपन मे पड़ोस मे देखी उस जवान लड़की के बारे मे, खादी के कुर्ते में, आजाद-किस्म के खयालों वाली (क्यों डरते हैं आजाद खयालों से हम..गुलाम किस्म के खयालों वाले?), अपनी मर्जी से नौकरी करने वाली..शादी करने वाली..तब शायद बड़ी उत्सुकता होती थी उसे देख्नने की..और थ्रिलिंग सा डर लगता था..सो उसे देख कर छुप जाते थे..और छुप-२ के देखते थे..काफ़ी बच्चों के लिये ऐसी औरतें बुरी औरतों की चलती-फिरती डेफ़िनीशन्स होती थीं..पता नही क्या हुआ फिर उसका..शायद कुछ बुरा ही हुआ होगा..शतरंज का खेल..हमारे मोहरे..हमारे कानून..और हमारे फ़ैसले..सो और हो भी क्या सकता है..
    खुद को भी नाखूनों वाला ही पाता हूँ..द्रृश्य या अदृश्य का पता नही..सो जेंटलमेनशिप के दस्तानों मे छुपाये रखता हूँ..जिसके लेवल पे लिखा है कि इसे यूज करने से शिकार आसानी से आ जाते हैं शिकंजे मे!!!!
    ..सहमत हूँ पूजा जी की बात से..
    हाँ एक बात और..आपका बीच-२ मे ऐसा लिखना

    पीछे फिश पोंड में तैरती मछली एक पल को रुक गयी है .जैसी उसकी बात की तसदीक कर रही है …
    जो पॉज देते हैं आप प्रवाह को..वो आपकी कलम के कटाव को और धारदार और लीथल बना देता है..मल्टीडाइमेन्शनल!!

    त्रिवेणी ऐसी बस आप बहा सकते हैं..सक्सेस के कांस्टीट्यूशन मे दफ़ाए ढ़ूंढता रहता हूँ ऐसी..कि सारे कमजोर लम्हों को अपने रिश्तों से ’डिस्‌ओन’ कर दूँ..अपने मुफ़लिस रिश्तेदारों की तरह!!!

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  50. भाई,सच में ऐसे खुबसूरत लोग मात खाते हैं ,यह त्रासदी सालती हैं
    बहुत मुश्किल मगर रास्ता वही ...इतना सुंदर मत लिखो कि ईर्ष्या हो

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  51. jane kitniyon ko maar khaakar bhi karwa chauth karte dekhti hoon. khuda aisa sarfirapan sabko de!

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  52. na jane aaj bhi kitni aisi hi dost house assualt ka shikaar hokar bhi,chuppa leti hai apne zakhm , so called soceity mein izzat banaye rakhne ke liye. ye aapki dost sar phiri nahi,sachhi,himmatwali lagi.gehen samajik mudde ki aur dhyan kich liye post ne,aur hamesha ki tarah bahut kuch sochne par dimag chal pada.

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  53. aap gajab ke likhane wale hain . shabd vinyaas par kaun fida nahin hoga .. isako kahate hain rachana .. aapke dard -e -bayani men bhi ek alag si khubsurati hai

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  54. एक कमज़ोर लम्हा मेरे माजी का अक्सर मुस्कराता है..जिन्दगी चाहे जीतना बड़ा मोहरा हो ...सावधानी हटी ,दुर्घटना घटी ....फिर भी दुःख है उसकेलिए ...

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  55. शायद इसीलिए क्योंकि मेरा जूता है जापानी..... फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी. अब यह हिन्दुस्तानी मन तो करवा चौथ भी करवाएगा और हर उपलब्ध औरत को भोगना भी चाहेगा. और मजे की बात है अपनी संस्कृति को महान भी मानेगा.

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कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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