2009-12-07

यथार्थ का क्रॉस वेरिफिकेशन !


बॉम्बे एयरपोर्ट में घुसने के बाद आगे समय काटने की बाबत मै  एक अख़बार उठाकर दाम पूछता हूं तो स्टाल वाला मुस्कराकर बतलाता है .कम्प्लीमेंटरी है .....शुरूआती एडिशन है ... .कोने पे एक महिला खड़ी है कुछ परेशान सी ..उम्र पचास के नजदीक .स्थूलकाय शरीर .ट्रोली पर ढेरो सामान .... हाथ में ई- टिकट का कागज ...पहली बार एयरपोर्ट आयी है ...केरला जाना है .......एयरपोर्ट की औपचारिकताओ से नावाकिफ ...मै उन्हें समझाता हूं....
औपचारिकताओ से निबट ...मै अखबार के पन्नो में उतरता हूं..वे वापस दिखाई दी है ..मेरा चेहरा परिचित लगने लगा है इसलिए मेरे पास आकर बैठी है ....बताती  है .बेटी दामाद के पास जा रही है .....दोनों नौकरी पेशा है .....बेटी की डिलीवरी होनी है  ..बेटा बहु के पास बोम्बे रहती है .पति को गुजरे दो साल हुए है ......
माँ के कर्तव्य ख़त्म नहीं होते ....मै सोचता हूं ...........मेरी मां तो ट्रेन में भी अकेले सफ़र नहीं कर सकती ....वे अब भी टिकट हाथ में संभाले बैठी है ......बैचेन सी ...
"अनुराग भाई "....कोई आवाज दे रहा है.......
लम्बा चौड़ा शरीर ..सफ़ेद कुरते पजामे के साथ गले में कोई रेशमी कपडा  .अंगूठियों से भरे हुए हाथ उसके .पीछे मुस्कराते दो चेहरे .
कैसे है ....
पहचानने की कोशिश कामयाब नहीं होती ........
नहीं पहचाना ....परेश पटेल .... अनुराग भाई ...सूरत जेल..
पीछे वाले अब भी इस्माइल दे रहे है ...
दिमाग का एक टूल फ्लेश्बेक से उठाकर उधना दरवाजे के पास की सब जेल का एक फोटो फ्लेश करता है.....मै चेहरे पे जबरन मुस्कान लाता हूँ..
आप अभी भी वही है सिविल हॉस्पिटल में ...वो पूछता है  ..
मै उसे अपने शहर का नाम बताता हूं ...
"तो गांव वापस जा रहे है "...गुजरात में घर को लोग गांव ही कहते है ...मै हामी भरता हूं....
"इधर का कोई काम-वाम हो तो बोलने का" ....परेश   की आवाज में एक कोंफिड़ेंस है.....
"भाई अपने इलाके का एम्. एल. ए है "...पीछे एक चेहरा गौरवान्वित होकर इस कोंफिड़ेंस की वजह बताता है....
"सब आपकी दुआ है अनुराग भाई...गांधी नगर में अपनी थोड़ी बहुत जान पहचान है....कोई भी काम हो तो बोलने का ."..
मेरी फ्लाईट का एनाउसमेंट हुआ है ...मै आंटी को देखता हूं वे अब भी पर्स को खोल बंद कर रही है ...परेश से विदा लेते वक़्त वो अपना कार्ड मेरे हाथ में दे देता है.....उम्र की  कुछ गलिया   वन वे  होती है .......ओर हर उम्र  के कुछ एजेंडे .......जिंदगी एक वृत्त है ...किसी बिंदु पे आपके अतीत को दुबारा तो मिलना है ...किसी यार    की  फिलोसफी  याद   आती  है.... ...
सीट पर  बैठे बैठे  फ्लेश्बेक  की खिड़की से कुछ धुन्धलाये चेहरे झांकते है......सब जेल .....जहां समय स्थिर था.... रुका सा ... भावुकता अविवेकी  ..मन की असुलझी गुत्थियों में चुभती.. यथार्थ  की कई किरचे है ...शाब्दिक जुगालियो ओर लफ्फाजियों से इतर असल दुनिया के किरदार ... ... छह सौ रुपये चुराने के इलज़ाम में पिछले चार महीने से जेल में अपनी पहली पेशी का इंतज़ार कर रहा बीस साल का उड़िया लड़का   ..  अपने आधे अधूरे बचे कम्प्रोमाइज़ फेफड़ो में टी बी ओर खून में एच आई वी लिए हुए.. पेंतालिस साल का भुवन.. जो रिहाई नहीं चाहता ... .. .उसकी दवा का जिम्मा सरकार पे जो   है ....ओर कई  चेहरे है ...
कार्ड  हाथ  से नीचे गिर गया है ......कोई  आवाज दे रहा है ......एयर होस्टेस है......

सन २000 में   सिविल हॉस्पिटल सूरत   से जुड़े  नाको प्रोजेक्ट (नेशनल एड्स कंट्रोल ओर्गनाइज़ेशन   ) के तहत हर पंद्रह दिन के एक बुधवार मुझे दोपहर के एक दो घंटे जेल में देने पड़ते थे .....पास के इलाके के .किसी रईस. बड़े नेता का सुपुत्र ...परेश उन दिनों किसी मर्डर चार्ज में अन्दर था

...



  • त्रिवेणी .....


    "6 दिसम्बर "

तवारीख़ के पन्ने पलटते है हर साल
अपने -अपने मज़हब का टीका लगा जाते है...


हर घंटे धर्म बदल जाता है बेचारी का

आदमियों की इस दुनिया में.... जहाँ .जमीर के कई “लिलीपुटीय संस्करण “ बिना अपराधबोध के अपने अपने क्षेत्रफल को हालात के मुताबिक घटा बढ़ा कर रोज  नयी दुनिया में फिनिक्स पक्षी की भांति मर कर पुनर्जन्म  ले रहे है ....घर के सामने खाली पड़े प्लाट में...दिसंबर की ठण्ड में ...  दो कुतियाये इत्तिफाक से एक ही समय में आठ पिल्लो को जन्म देती है  ...जिनमे से .एक असमय दम तोड़ देता है ...उन दोनों के बीच एक अबोला समझौता ...जिसमे वे बारी बारी से बाकी बचे सात पिल्लो को अपना अपना  दूध पिलाती है ...चकित करता है .....ओर आदमी की शर्मिंदा

60 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत दिनों बाद आज आपको पढ रहा हूं- एक सीधे सरल इंसान का चेहरा मेरी आंखों में उतर रहा है। बहुत बहुत मन है मिलने का। कभी मिलने पर कुछ कह न पाऊ तो यूं न समझना कि खामोश ही रहा मैं तो।

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  2. @ उन दोनों के बीच एक अबोला समझौता ...जिसमे वे बारी बारी से बाकी बचे सात पिल्लो को अपना अपना दूध पिलाती है ...चकित करता है .....ओर आदमी की शर्मिंदा

    शर्मिंदा हो गया तो आदमी कैसा।

    आपको पढ़कर लगता है कि दुनिया में सब कुछ ब्लैक एंड व्हाईट ही नहीं, ग्रे का भी एक शेड मौजूद है। शायद असल दुनिया के सारे किरदार ग्रे-शॆड में मौजूद हैं।

    वैसे परेशभाई नेता की कसौटी पर खरे उतरे। कहीं सुना था, इस प्रजाति के जीवों की याददाश्त बड़ी तेज होती है।

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  3. कुछ कहने के लिए बचता ही नहीं कभी...हमेशा सोच की दुनिया में पहुंचा देते हैं.......

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  4. यही तो डेमोक्रेसी का फालाउट है। एक सरकारी नौकर दो दिन गलती से भी जेल में रह जाए तो स्वत:सस्पेंड हो जाता है। नेता लोग तो चुनाव ही जेल से लड़ते हैं। उनके लिए कोई बार नही।

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  5. शानदार संस्मरण लेखन...बारी बारी कुतियों द्वारा देखभाल करने का वाकया वाकई सोचने को मजबूर करता है.

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  6. बहुत अच्छा लेखन। आप की संवेदना अपने आस पास में बहुत कुछ देख लेती है।

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  7. अच्छा संस्मरण- द वर्ल्ड इज़ सो स्माल :)

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  8. वक़्त शर्मिंदा है. आदमी नहीं.

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  9. जिंदगी एक वृत्त है' ,दुनिया भी ऐसी ही है.-'एक वृत्त'...
    संस्मरण की प्रस्तुति ख़ास है.
    एक छोटे से अंतराल में कितना कुछ गुजर जाता है,मगर उसे शब्दों में समेट कर व्यवस्थित कर देना आप के लेखन की खास बात है.

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  10. आपकी पोस्ट में कुछ ना कुछ ऐसा होता है जो देर तक भीतर और आसपास गूंजता है..

    " उम्र की कुछ गलिया वन वे होती है .......ओर हर उम्र के कुछ एजेंडे .......जिंदगी एक वृत्त है ...किसी बिंदु पे आपके अतीत को दुबारा तो मिलना है ... "

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  11. त्रिवेणी ने सहमा दिया ...कभी मूक जानवरों की ज़िंदगी ,
    इंसानों से बेहतर होती है ..अब परेश भाई जैसे लोग , राज करते हों
    तब , देश का क्या होगा ये तो राम जाने ...
    लिखा कीजिये , मेरी प्रविष्टी भी देखिएगा ,
    स - स्नेह,
    - लावण्या

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  12. उम्र की कुछ गलिया वन वे होती है ...

    उम्र भूलभुलैया है..कभी कभी ऐसे मोड आते है कि लगता है कि यहा से तो कभी गुज़रे थे.. और कभी कभी ऐसा फ़सते है कि आस पास कोई नही दीखता...सब चलते जा रहे है..किसी को नही पता कहा जाना है....बस चलना है..

    और वो जिसने ये भूलभुलैया बनायी है वो कही दूर बैठकर खेलता रहता है...

    कभी कभी मन होता है इन्कार कर दू चलने से... बोल दू जब तक नही बताओगे कि कहा जाना है और क्यू जाना है..नही चलूगा मै.. :(

    डाक्टर साहब कभी हमारे साथ कैन्डल लिट डिनर पर चलिये..आपसे ढेर सारी बाते करनी है..आपको सुनना है बस..पैसे मै दे दून्गा :)

    कमाल है आप!!आपका एक एक शब्द जैसे अस्थमा के मरीज के लिये इन्हेलर...

    वाह, वाह....

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  13. एक संवेदनशील इंसान जि़ंदग़ी को यूं ब्‍यौरों में बदलता है.कई बार निरपेक्ष रहकर भी.
    इस बार कुछ देर से आमद हुई पर पोस्‍ट से कारण भी पता चल गया.

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  14. डॉक्टर साहब कसक ले आती है आपकी लेखनी ! या यूं कहूं कि सिकन माथे पर .. कुछ ४-५ दर्जन शब्दों में आप पूरा एक ठेला लगा देते हैं ,जीवन का ठेला !!

    मैं सोचता हूँ कभी ऐसा भी हो कि आप नॉएडा पधारो और अपुन भी आप से ऐसे ही मिल लें .. :)

    Wonderful !!!

    http://darshanmehra.blogspot.com

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  15. सिर्फ जीना ही काफी नहीं हैं उसे बयां करना भी जरूरी है। किसी को अगर जिंदगी को बयां करना सीखना हो तो आपसे सीखे...


    मैंने भी अबोले समझौते देखे हैं लेकिन कभी रिलेट नहीं कर पाया...

    मां की जिम्‍मेदारियां कभी खत्‍म नहीं होती। एक मां को मैं भी जानता हूं जो ऑस्‍ट्रेलिया से अमरीका तक जिम्‍मेदारियां पूरी करते हुए दौड़ रही हैं और अपनी रचनाशीलता को भी जिंदा रखे हुए है।


    आपका बयां करने का अंदाज दिन ब दिन खूबसूरत होता जा रहा है....

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  16. शुक्र है तीन अलग अलग इ मेल मिलने के बाद आपकी आमद हुई तो .ये ओर बात है की आपसे फरमाइश कॉलेज लाइफ ओर प्यार मोहब्बत के कुछ किस्सों की थी .क्या करते गर्ल्स हॉस्टल के अपने रिवाज होते है ओर आप गंभीर मूड में अवतरित हुए पर इस पोस्ट में बहुत कुछ है बूढी मांयो की ख़त्म न होने वाली ड्यूटी, कानून का सिर्फ अमीरों के वास्ते होना .ओर अब पंच लाइने

    उम्र की कुछ गलिया वन वे होती है .......ओर हर उम्र के कुछ एजेंडे .......जिंदगी एक वृत्त है ...किसी बिंदु पे आपके अतीत को दुबारा तो मिलना है .
    शाब्दिक जुगालियो ओर लफ्फाजियों से इतर असल दुनिया के किरदार
    हर घंटे धर्म बदल जाता है बेचारी का

    जमीर के कई “लिलीपुटीय संस्करण “ बिना अपराधबोध के अपने अपने क्षेत्रफल को हालात के मुताबिक घटा बढ़ा कर रोज नयी दुनिया में फिनिक्स पक्षी की भांति मर कर पुनर्जन्म ले रहे है ....बेस्ट तो मुझे ये ही लगी
    its always treat to read you.

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  17. "अंदाज का अलहदा होना ही काफी नहीं उसमे एक बात भी ख़ास होनी चाहिए..." ये मै आपसे सीखता हूँ. संस्मरण हों और उसे कहना हो तो आपका अंदाज मुझे उधार चाहिए. बाकी शब्दों से शब्दों का उकेरने का गुलजाराना हिसाब मुझे जंचता है और डा. साहब आपपे ये गजब फबता भी है.

    माँ के कर्तव्य ख़तम नहीं होते.. माँ पर श्री राहुल राजेश जी की कविता रखना चाहूँगा कभी 'कादम्बिनी' में पढी थी...

    "जहाँ ठहर जाए वहीं घर..
    जिसे छू ले वही तुलसी..
    जिसे पुकार दे वही बेटा..
    जब जागे तब बिहान..
    जब पूजे तब नदी..
    जब निरखे तब समुद्र.."

    मधुर भंडारकर की "जेल" देखी. अनुभव का कच्चा हूँ, इतने करीब से जेल देखी नहीं थी..जेल पे सोचो तो भारतीय न्यायिक प्रणाली पे तरस आता है.."उन्हें गुरुर बहुत है अपने शान पर..अब जबकि गिरेबां में झांकना नहीं है..."
    बेहतरीन पोस्ट...!!!
    मेरी बधाई लीजिये और संस्मरण के इस सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभारी भी फील कर रहा हूँ....!

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  18. फिर वो ही.. जादू.. शब्दो का.. भावनाओ से लिपटा.. शब्दों से स्केच बनाता.. संवेदनाओ को छूता.. बहुत खुब..

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  19. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  20. अरे त्रिवेणी भी तो है...

    उस बेचारी की ना जात स्थायी है न धरम ना ईज्जत ही..उसकी लाज स्थायी है..और स्थायी हैं उसके शायद पानी -पानी से आंसू..

    जमीर के कई “लिलीपुटीय संस्करण
    आदमी ही बौना हो गया है डा.साहब..इसे इसके हाल पर छोड़ दीजिये..देखिएगा ये चाँद पर समाज बसा आएगा...और वहां के गोधरा का लाईव प्रसारण का अधिकार हमारे चैनेल्स खरीद हम तक जरूर पहुंचाएंगे....!!!

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  21. यथार्थ का क्रोस वेरिफिकेशन.....अहा...हेडिंग्स इतनी उम्दा कैसे सोच लेते हैं जनाब..अबतो क्लिनिक पे आपके आना ही पड़ेगा...!!!

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  22. बहुत बहुत कोशिश के बाद भी इस बार कहने को कुछ नही....! क्या कहूँ....???

    वैसे बड़ी प्रतीक्षा कराई इस बार...!!!!!!

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  23. बहुत यथार्थ चित्रण है. सोचने को मजबूर करती हुई पोस्ट. बिल्कुल जीवंत चित्रण.

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  24. हूँ ....तो फिर टूर पर थे ....और इधर हम कितने चक्कर लगा गए .....अच्छा हुआ फ्लैश बैक में बता दिया वर्ना ये 'जेल ' शब्द हमें भीतर की सैर करा देता .....!!

    पिल्लों को मेरी ओर से गर्म सी प्यारी ....!!

    त्रिवेणी एक बार फिर आने का नेयोता दे रही है .....

    तवारीख़ के पन्ने पलटते है हर साल
    अपने -अपने मज़हब का टीका लगा जाते है...

    हर घंटे धर्म बदल जाता है बेचारी का

    सुभानाल्लाह........!!

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  25. आज तो बस निशब्द्। सब ने बहुत कुछ कह दिया मेरे कहने लायक बचा ही नहीं। शुभकामनायें

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  26. वही अद्भुत दृष्टि दुनियाँ पर. ऐसा आप ही लिख सकते हैं. हमें आपका लिखा पढ़ने को मिलता है, यह हमारे लिए गर्व की बात है.

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  27. आपकी रचनाओं में जो एक विशेष प्रकार का एकदम गजब का रस बसा होता है जिसमे डूब सारे शब्द मौन साध लिया करते हैं,इस बार बहुत लम्बे प्रतीक्षा के बाद मिला ....इतना अंतराल न रखा करें डाक्टर साहब....
    पोस्ट पर क्या कहूँ.......बस ...लाजवाब !!!

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  28. वापस आया था.. श्रीश के कमेन्ट भी पढे.. लग रहा है मुझसे पहले ये पहुच जायेगा आपके क्लीनिक :( ..

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  29. कई दिनों से सोच रहा था कि क्या बात अनुराग जी पोस्ट नही लिखी। और आज सुबह देखा तो पोस्ट लगी देखी। आपकी पोस्ट का एक अलग ही नशा है बिना बाचे चैन नही आता। खैर पोस्ट शानदार है हमेशा की तरह। कई ब्लोग है ऐसे जहाँ पर जाकर मै निशब्द हो जाता हूँ उसमें से एक ब्लोग आपका है। ये सच है माँ के कर्तव्य कभी खत्म नहीं होते है। नन्हें पिल्लो की घटना वाकई चकित करती है। वैसे इन नन्हों को गौद लेकर खिलाना कितना अच्छा लगता है। इस दुनिया में अक्सर चकित घटनाएं होती रह्ती है और हमें चकित करती रहती है। त्रिवेणी सच को बयान कर रही है।

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  30. डाकटरी की पढाई भी एक नयी विधा के लेखक को रोक नही पाई

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  31. आपके बोल दिमाग को धुंध और कोहरे से पटे उस निर्जन जंगल में अकेला छोड़कर चले जाते हैं जहाँ से .............वापस आना नामुमकिन सा लगता है.......

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  32. एक छोटे से वाक्यात को महसूस कर भावनाओं में ढाल कर शब्दों में बदल देना कोई आपसे सीखे ...इसे कहते हैं शब्दों की जादूगरी ... ऐसे न जाने कितने ही किस्से रोज आँखों के सामने होते होंगे पर हर कोई इनको बयां कर सके इतनी मजाल कहाँ ....
    व्यस्तता का कारण तो पहले बता ही दिया था आपने ...बहुत दिन बाद लिखा मगर खूबसूरत पोस्ट

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  33. डायरी में कुछ दिनों पहले मार्क कर रहा था कि अनुराग जी को याद दिलाना है कि एक नया कैरेक्टर शब्द-चित्र जल्दी लगायें...और जब तक बताता यथार्थ का ये सनसनाता क्रास वेरिफिकेशन दिख गया।

    पढ़ने के बाद...दुबारा पढ़ा और जब कुछ लिखने को स्क्राल किया नीचे तो निगाह "खोये ज़मीर" की तलाश के अनूठे अंदाज पर नजर पड़ गयी और सब गड्ड-मड्ड हो गया तो फिर से जाना पड़ा क्रास वेरिफिकेशन को वेरिफाय करने।

    परेश का विजिटिंग कार्ड गिराना हो या ज़मीर के लिलिपुटियन संस्करणों में साम्य ढूंढ़ना या फिर त्रिवेणी बुनना...you are one of the most unique species of our time!

    एक{कई} और मुलाकात जरुरी है सनम...

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  34. बहुत ही खूबसूरत लेखन है आपका, प्रभावित किये बिना नहीं रहता.. एक अलग ही शैली बना ली है आपने, आपको पढने वाला चार शब्द पढ़कर बता सकता है की आपकी लेखनी है या किसी और की... त्रिवेणी में गजब की भावुकता डाल दी है...

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  35. post ser aur triveni sava ser... dil ke kisi kone mein ek khwahish si palne lagi hai milne ki...

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  36. डाक्टर साहिब ,
    बेवजह की मसरूफियत रह रही है आजकल , मगर सब खैरियत है इस बात का शुक्र है ... सोचता हूँ अमा पुरे शारीर में क्या दिमाग ही रख रक्खा है ... इस बार के पोस्ट के बारे में कुछ कह पाना मुश्किल सा लग रहा है ... बार बार पढ़ने के बावजूद शब्द साथ छोड़ रहे हैं... पहले परेश ने फिर त्रिवेणी ने और आखिर में इस ज़मीर ने ...
    बस दिल में अब यही बात है ... कम से कम एक मुलाक़ात अब तो जरुरी है सनम ... गौतम भाई के ताज पे ... :)


    अर्श

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  37. तरकश पढ़ी थी जावेद अख्तर की... शुरू में वो लिखते है... मैं खार रेलवे स्टेशन पर बैठा हूँ... आसमान से समंदर बरस रहा है... बगल में एक कुत्ता अपने बदन में छुपने की कोशिश कर...

    बस - बस मैं शक जरूर था की स्क्रिप्ट लिखने वाला (अतीत में ही सही) इतना प्रभावशाली लिख सकता है की दृश्य साकार हो जाये... पर्जेंट टेंस में आपका लिखना इस बात का सुबूत है... कभी कभी climax की कमेंट्री लगती है बस रेडियो भीड़ में भी कान से सटाए रहो...

    त्रिवेणी समझ में आने लगी थी... लेकिन यह कुछ कठिन लगा... अपनी मंदबुद्धि में नहीं आई...

    आपसे सीखने को बहुत कुछ है सर

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  38. आनंद ले रहे हैं , समझ और सीखने की कोशिश कर रहे है आपको पढकर ।

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  39. मर्डर केस के अपराधी सरे आम खुले में घूमते मजे करते हैं और शरीफ निर्दोष मर्डर के इलज़ाम में जेल में सड़ते हैं...ये ही तो आनंद है जीवन का और ये सिर्फ हिन्दुस्तान में होता है ऐसा नहीं है पूरी दुनिया में ये ही सब होता है...कहीं कम तो कहीं ज्यादा...इंसान और उसकी फितरत सब जगह एक ही है...इसीलिए मैं कहता हूँ...
    सच्चा तो सूली पर लटके
    लुच्चे को है माफी प्यारे

    उल्टी सीधी सब मनवा ले
    रख हाथों में लाठी प्यारे
    नीरज

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  40. उन दिनों जेल में बतोर मेडिकल ऑफिसर इतनी इज्ज़त मिलती थी जिसके उन दिनों हम आदी नहीं थे ...पर वहां जाकर एक अजीब सा डिप्रेशन होता था ....अमूमन मुझे अकेला जाना होता था पर मै अपने एक जूनियर को साथ ले जाता था .वहां चार बाय चार के एक कमरे में मिस्टर पर्दीप पचुरिया फाइलों ओर एक कंप्यूटर को किसी तरह समेटे नाको को रिप्रेसेन्ट कर रहे थे .शरीफ आदमी थे ....१५ दिन में एक बुधवार आता था ...नाको के उस प्रोजेक्ट में तीन एन जी ओ भी जुड़े थे ....उस ढेड साल के दौरान ..कई अंधेरे दिखे ..जो रौशनी को मुंह चिडाते थे ...कोलेज की फेंटेसी की दुनिया से इतर जादुई यथार्थवाद का नशा पहली विजिट में ही उतर गया था ..रेड लाईट एरिया में तीन चार केम्प करने के बाद अन्दर बाहर की दुनिया के कंट्रास्ट ने सारी कविताएं एक किनारे रख दी थी ..तब पता चला बिना कविता लिखे .....बिना इश्तेहार किये इन अंधेरो में भी ढेरो ऐसे लोग है जो कही से रौशनी दे रहे है ....
    परेश कोई किताबी पात्र नहीं है ..बहुतेरे परेश रेजिडेंसी पीरियड में नजरो के सामने से गुजरे ..वे कभी शर्मिंदा भी नहीं लगे ...न ही डरे...हुए उन्हें अपने बाप पर विश्वास था ..शायद हमारे समाज ने भी इस सच को एक अप्रत्यक्ष स्वीक्रति दे दी है के इस देश में दो कानून है .......

    @सागर
    .६ दिसंबर एक ऐसी तारीख जिसका बेजा इस्तेमाल हर आदमी कर रहा है ...........मीडिया भी .....टी वी पर खबर देख रहा था .पहले कोई चोटी वाले सज्जन आये ...एक घंटे बाद देखता हूँ एक दाढ़ी वाले मौजूद है ... एक घंटे में ही धर्म बदल गया था.....तो मसला ये था .........

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  41. aise shoor veeron se roz pala padta hai jo pahle aaye din hawalat mein nazar aate the magar aajkal netagiri ki dukan safalta poorvak chala rahe hain....janta ke sewak.

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  42. जनता के सेवक की परिभाषा पर क्या कहें... इंसान सीखना चाहे तो कितने ही उदहारण है कुतियों जैसे ! लेकिन...

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  43. "नहीं पहचाना ....परेश पटेल .... अनुराग भाई ...सूरत जेल..."
    "भाई अपने इलाके का एम्. एल. ए है "...


    બહુ ડેન્જર કોમ્બીનેશન છે, અનુરાગ ભાઈ!

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  44. I really loved this article a lot. Its one of the most impressive and influencing of all those that I have read of yours. For the first time I have seen immensely beautiful philosphy mixed with your original 'light and fresh' style of scripting.

    Although "Aunty's" frequent mention was for a while making me link it to the title of the article and to "yathaarth" as I was reading it, and realizing later what it was actually about, but it has overall bloomed beautifully.

    [Sorry but don't have time write now to go to the Hindi tool and type comments in Hindi ... I prefer writing comments in the language they are rather than mixing them up and confusing everybody all the more!]

    God bless
    RC

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  45. उम्र की कुछ गलिया वन वे होती है .......ओर हर उम्र के कुछ एजेंडे .......जिंदगी एक वृत्त है ...किसी बिंदु पे आपके अतीत को दुबारा तो मिलना है ...किसी यार की फिलोसफी याद आती है.... ...

    bahut sahi line likhi hai apne...

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  46. फिर से एक और् उम्दा पोस्ट... कभी कभी सोचता हु की आपकी सोच को ही एक दिन के लिये उधार ले लु......कैसा रहेगा?

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  47. अजीब इत्तेफ़ाक है. कल ही अपने एक ऐसे मित्र से मिला जो कॊलेज के प्रथम वर्ष में नज़दीक आया, और वर्ष के अंत में किसी मर्डर के केस में फ़ंस गया और उसे उम्र कैद की सज़ा हो गयी.

    अब वह किसी राजनैतिक पार्टी का महा मंत्री है.

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  48. आपको पढ़ने के बाद यही महसूस हुआ कि‍ ब्‍लॉग से गैरहाजि‍र रहने पर मैंने क्‍या खोया। ऐसी पोस्‍ट ब्‍लॉगिग को एक गंभीर आयाम प्रदान करता है।

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  49. उन दोनों के बीच एक अबोला समझौता ...जिसमे वे बारी बारी से बाकी बचे सात पिल्लो को अपना अपना दूध पिलाती है ...चकित करता है .....ओर आदमी की शर्मिंदा
    जिंदगी एक वृत्त है किसी भी बिंदू पर आपको वापिस तो आना ही है ।
    बढिया पोस्ट ।

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  50. बहुत ही अच्छी रचना
    बहुत-२ आभार

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  51. अनुराग जी ...जिन्दगी का ये हलफनामा ..खुद्दारी और इमानदारी से लिखा गया है ....राहत इन्दोरी जी ने कहा है ''वफा दुनिया में ज़िंदा रहेगी मगर आदमी से शर्मिन्दा रहेगी'' हमेशा की तरह दिल को झिझोंड देने वाला लेखन ..बहुत -बहुत शुभकामना मुझे आपकी किसी कविता का इन्तजार है ...

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  52. उम्र की कुछ गलिया वन वे होती है .......ओर हर उम्र के कुछ एजेंडे .......जिंदगी एक वृत्त है ...किसी बिंदु पे आपके अतीत को दुबारा तो मिलना है ...

    सच कहा आपने, पर दोबारा वो गलियां वैसी नहीं रहती...

    और आदमी टू शर्मिंदा होना कब का भूल चुके हैं, ये शब्द तो dictonary में शायद है ही नहीं अब...

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  53. ...उन दोनों के बीच एक अबोला समझौता ...जिसमे वे बारी बारी से बाकी बचे सात पिल्लो को अपना अपना दूध पिलाती है ...चकित करता है .....ओर आदमी की शर्मिंदा
    वाकई जहां इंसान के जमीर के अब लिलिपुटिए संस्करण ही बचे हैं ऐसे में कम अज कम जानवर तो हैं जो ये याद दिला जाते हैं कि इंसानियत भी कुछ होती है

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  54. Bade arse baar aapki triveni padhi...uspe tippanee karneki meree haisiyat nahee!

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  55. फिर से आया था डा० साब इधर झांकने .... अच्छा किया, नहीं तो आपकी इस टिप्पणी से व्म्चित रह जाता।

    एक पोस्ट बनता है अब तो...

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  56. aadamjaat to shuru se hi sharamproof hai anuraag g....beharhaal hamesha ki tarah udvelit karne wali post

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  57. उम्‍दा संस्‍मरण, पढ़कर नयी नसीहत मिली, आपके पास कम आना होता है, जब भी आता हूँ कुछ न कुछ नया ही मिलता है।

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कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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