2009-12-23

हर दिन साहूकार सा,...हर लम्हे का कुछ मोल है .



"सुन तू पापा से बात कर  ना .....मुझे अभी शादी नहीं करनी ...मुझे अभी पढना है यार ....वो  रुआंसी   हो उठी   दी  को देखता   है ...
अचानक दी छोटी हो उठी  है ....८ साल   की दी....स्कर्ट पहने उसका हाथ पकडे ...उसका स्कूल में पहला दिन है ..उम्र  तकरीबन .तीन साल   ....
"मैडम मै अपने पास बिठा लूं  इसे? .....रोयेगा "...दी मैडम से विनती सी कर रही है ...मैडम  उसे प्री नर्सरी में बैठा कर आने को कह रही  है ...दी उसे  बैठा रही  है ..
"मै यही हूं  इस दीवार के पार "...उसके बाल ठीक करके दी जा रही है .....
वो अपने आस पास के बच्चो को देखता है ...फिर दरवाजे को....दी वही खड़ी  है दरवाजे पे....
"तू सुन रहा है "...दी उसे आवाज  . दे रही है ........दी अब भी दरवाजे  पे है ....
..."वो मुस्कराता है ... चिंता   मत  कर ... अपुन दोनों फाइट करेगे ....


"जाने क्या निस्बत है कि शब जाते जाते
रोज याद का कासा छोड़ जाती है .....
हर सुबह एक लम्हा पड़ा मिलता है"

62 टिप्‍पणियां:

  1. हमें भी सुबह लम्हा ही पड़ा मिलता है पर रात आते आते पुलिंदा बन जाता है... अब इसी बात को लीजिये... क्या सभी के जीवन पर एक नोवेल नहीं लिखा जा सकता ?

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  2. सूरज ठेकेदार सा, दिन साहूकार सा. और रात ... पश्मीने की... इधर दिल पशेमान सा...

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  3. अहा डाक्टर साहिब क्या बात कर दी आपने हुज़ूर, मुद्दतों बाद आना हुआ है ब्लाग पर और आते ही आपको पाया एक अलग ही कलेवर में , सच कहूँ तो कभी कभी सोचने लगता हूँ के इस द्त्य्ले को कैसे सिखा होगा आपने , कही सिखाई भी जाती है क्या ?? :) :)
    सच में रोंगटे खड़े कर दिए , पुरानी बातें याद आने लगी ,.. तुरंत झटका लगा देते हो आप तो अपने लेखन से , और ऊपर से यह त्रिवेणी... कमाल ही कहूँगा .. बढ़ाई

    अर्श

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  4. बचपन मे मुझे बड़ा आश्चर्य होता था एक बात से..कि एक खेत मे बस कुछ मुट्ठी बीज ही डाले जाते हैं..मगर फिर जमीन इतनी लहलहाती फ़सलों के बहाने कितने क्विंटलों अनाज के खिलखिलाते दाने कैसे उड़ेल देती है..ऐसे उजबक सवालों का जवाब आपकी ऐसी पोस्ट्स पढ़ के ही मिलता है..कागज की इस खेती मे आप तो मुट्ठी भर शब्द ही बोते हैं..मगर उनसे उपजी बेतहाशा भावनाएं हमारे दिल-ओ-दिमाग के सारे गोदामों को भर डालती हैं..और ऐसी कि महीनों तक बाकी..और ताजा!!!..दी एक एक सवाल के बहाने उम्र का एक पूरा हिस्सा रिवाइंड होता है..और अंत मे दिये उस सवाल के जवाब के बहाने एक अगामी भवितव्य आँखों मे कौंध जाता है..आश्वस्त करता सा....और क्या कहूँ!!!
    त्रिवेणी गुलज़ार साहब की एक खूबसूरत से त्रिवेणी की याद दिलाती है..अरे वही..सूदखोर सूरज वाली !!;-)
    और हाँ यह गिने-चुने लम्हे भी फ़िसलते जाते हैं..हमारे बेखुद और बिजी दिन की फ़टी जेब से..कि रात को गिनो तो पता लगता है कि खोया ज्यादा पाया कम...मगर यही तो जिंदगी है..बस!!!

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  5. शिर्षक पढ़ते ही निदा फाजली साब का वो दोहा याद आ गया...वो "तोता कुतरे आम" वाला...सूरज ठेकेदार-सा सबको बाँटे काम।

    अभी दर्पण के पोस्ट पर लिख कर आया था त्रिवेणी में आपकी उफ़नती "सरस्वती" की बाबत। कहीं आपको हिचकी तो नहीं हुई कि आपने ये पोस्ट लगायी।

    मैं दसवीं में था जब दीदी की शादी तय हो गयी थी। वो परेशान दिख रही थी। सर्दियों के दिन थे। मैं देखता, हमेशा चहकने वाली दीदी अचानक से भर-भर दिन रजाई में मुँह ढ़ाँपे सोयी रहती...कई बार पूछना चाहा था कि तुम नहीं चाहती हो ये शादी करना तो कहो..मैं कहता हूं पापा से...लेकिन नियति ये हाय री नियति।

    इस पोस्ट को पढ़ा तो सोचा कि ये तो मेरी बात थी, डा० साब को कैसे पता चली।

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  6. लम्हा लम्हा जोड शायद जिन्दगी कटती है

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  7. भाई वाह क्या बात है , बहुत बढ़िया ।

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  8. ये वही सीढिया है जो नीचे से ऊपर जाती है.. और लौटकर ऊपर से नीचे भी आती है.. ठीक वैसे ही जैसे दी...
    सोच रहा था आज आपको बोलु कुछ पोस्ट करने के लिए.. आज आपने पोस्ट कर दी.. तो मज़ा आ गया.. शायद यही टेलिपैथी है..

    त्रिवेणी का क्या कहू.. कभी गुलज़ार साहब आकर ये ब्लॉग पढ़ ले तो वे ही कुछ कहे..

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  9. मासूम बचपन का सुंदर चित्रण॥

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  10. kuch log kuch roohe blessed hoti hai.kuch hi shabdo me puri kitab si baat kah jate hai.
    fir kitab ka saransh likhna ya tipanni karna kaha mumkin hai.

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  11. जय हो! कहां कहां फ़ंसा देते हो भाई!

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  12. कुछ लम्हें अनमोल होते हैं ! मेरी कोई दी नहीं उसकी कमी अक्सर खलती है.

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  13. सुन तू पापा से बात कर ना .....मुझे अभी शादी नहीं करनी

    जाने क्या निस्बत है कि शब जाते जाते

    रोज याद का कासा छोड़ जाती है .....

    हर सुबह एक लम्हा पड़ा मिलता है"

    यादों के कासे में दी का आना और एक लम्हा छोड़ जाना .....कहीं मन में कोई उफान था ये ...आप बेहतर समझ सकते हैं उसे .....हाँ कुछ शब्द और भी किसी जगह लिखे हैं ....देखिएगा ......!!

    इस सुबह के लम्हे में इक टीस सी है .....

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  14. एक पोस्ट लिख रहा हूं, शायद शीर्षक आपके इसी पोस्ट से उधार ले लूं.. उम्मीद है कि आप एतराज नहीं करेंगे..

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  15. दिल की नहीं दिल की गहराईयों से निकली हुई बात.

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  16. एक लम्हा--- पूरी ज़िन्दगी--- इन लम्हों की बूँदों से भर जाता है ज़िन्दगी का सागर और ये बूँदें उछलती कूदती अठखेलियाँ करती बहती जाती हैं। लोगों को देती हैं सन्देश लो सहेज लो इन लम्हों को फिर देखो जीवन का आनन्द उल्लास । बहुत सुन्दर पोस्ट है बधाऐर शुभकामनायें

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  17. कम शब्द में एक बेहतरीन भाव..धन्यवाद अनुराग की इस शानदार प्रस्तुति के लिए!!

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  18. हमेशा भावुक कर देते हो आप, हमें

    प्रणाम

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  19. इमोशनल हो रही हूं .
    भाई मुझसे तीन साल छोटा है .पहली बार मै ही स्कूल लेकर गयी थी उसे ..दो दिन पहले मेरा जन्म दिन था जानते है मेरी बेस्ट फ्रेंड ने मुझे क्या गिफ्ट दिया है ?उसने आपकी दस पोस्ट का प्रिंट आउट निकलवा के मुझे दिया है .ओर कुछ नहीं कहूंगी.त्रिवेणी पर बाद में कुछ कहूंगी

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  20. इन कुछ शब्दों ने ही आँखे भिगो दी और सिहरन दे गई ये पोस्ट |
    इस निश्छल प्रेम में साहूकार कहाँ ?

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  21. त्रिवेणी आपकी ही किसी पोस्ट पर पढ़ी हुई सी लग रही है... सारी तिवेणियों का स्टॉक किये जाता हूँ..यह पहले से मौजूद मिली।

    बहुत ही मासूम और प्यारा चित्रण..क्या सोच रहे हैं आजकल??

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  22. aap script writing bhi shuru kar dijiye...galti se doctorki line mein fanse hue ho....ye buri baat hai....full time likhna shuru kar dijiye...aapka nahi sachmein jyada logo ka bhala hoga..... aur lekhani ka bhi .... :)

    sochiye, aapke post ko koi gift de raha hai...isse achchi baat kya ho sakti hai??

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  23. बहुत बढ़िया भावपूर्ण पोस्ट।
    बहुत उम्दा!!

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  24. मुझे भी एक लम्हा पड़ा..
    यह पोस्ट !

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  25. मुझे भी एक लम्हा पड़ा मिला ..
    यह पोस्ट !

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  26. हमम्म्म् याद आया अपना लवली.... माधुरी मैम से रक्वेस्ट उसे ना मारने की... भईया के गुस्सा होने पर चुपके से बात... बढ़ती उम्र के हर सही गलत पर कभी साथ कभी सलाह और फिर अचानक अपनी मंजिल अकेले तय करने को निकले कदम पर चुपचाप हमकदम बनता वही लवली....!

    इन दिनो के मोलों का हिसाब रखता कौन है, जिसकी साहूकारी बड़ी सटीक है....???

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  27. बड़ी मस्शक्कत से तीन दिन की मेहनत के बाद फोर्सेफ़ से मेरी डिलीवरी करायी गयी थी.. मेरी स्टीचिंग हो रही थी, इसी दरम्यान मेरे बच्चे को साफ़ कर मेरे पास लाकर मुझे दिखाया गया और मैंने उसे गोद में लेने को हाथ बढ़ा दिए...डॉक्टर ने हँसते हुए पूछा..और बच्चा चाहिए ????? और मैंने कहा था..हाँ बिलकुल....

    मैंने अपने भाइयों का जो प्रेम पाया था ,मुझे लगता था,दुनियां मेरे इससे खूबसूरत रिश्ता ,इससे सुदृढ़ सहारा और क्या हो सकता है...यह जिसे न मिले,वह जीवन में बहुत कुछ से वंचित रह जायेगा...मेरे बच्चे को भी वह सुख मिले..इसलिए मुझे और बच्चा चाहिए था...
    ईश्वर की असीम अनुकम्पा से भाई बहन के प्रेम और रिश्ते की ख़ूबसूरती को देखने का मौका मिला है....
    आपकी यह पोस्ट पढ़ मन भावुक हो गया....पढ़ते ही जो जैसे मन में आया, मैंने लिख दिया...

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  28. न जाने कितने पल शोर करते हुए गड्ड्मगड्ड हो गये इस एक पोस्ट को पढकर. बचपन ----

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  29. अपुन दोनो मिलकर फाइट करेंगे ये वाक्या दी को निश्चित ही आश्वस्त कर गया होगा वैसे कहां हैं दी अब । त्रिवेणी मुझे भी पढी सी लगी पर वह लम्हा जो शब छोड जाती है कितना खूबसूरत ख्याल है ।

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  30. दिन रात सींचा करते है लम्हों का पेड़
    फल पककर टपक जाता है खुद ही ,
    देखो कच्चा फल तोड़ न लेना डाल से ....

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  31. ८ साल की 'दी'..३ साल के भाई के लिए कितनी बड़ी हो गयी!
    कितनी सुरक्षा का अहसास भाई को हुआ होगा..
    और ये यादें ताउम्र ज़हन में रहती हैं.इन्हीं से मजबूत बना रहता है यह रिश्ता..

    त्रिवेणी बेहद उम्दा..!!!
    **[हर लम्हे का मोल होता है इसीलिए हर लम्हे को संभाल कर रखना चाहीए../गुज़ारना चाहीए.]

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  32. डॉ. साब आप मेरे गुलज़ार हो...

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  33. कुछ रिश्‍तों की चमक समय की धमनभट्टी में और निखरती ही है.और ये रिश्‍ता तो बेहद ख़ास है.जिनकी उंगली पकड़ कर बड़े हुए उनके लिये बड़ा बनकर आगे आना एक भाई की जि़न्‍दगी में कभी न कभी आने वाला अनिवार्य क्षण है.भावुक सा हो रहा हूं.

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  34. जय हो
    "रंजना" मैडम

    वाह !
    धमनभट्टी (संजय व्यास जी)

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  35. डागडर साहब !
    बड़े शैतान है सागर और अपूर्व भाई ,
    जहाँ पहुँच जाते हैं कुछ नहीं छोड़ते ..
    अब क्या टिपयाऊँ ...
    इन्हीं की बातों में मेरी भी बात ...

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  36. अनुराग सर , आपकी ही पोस्ट की विशेषता है, किसी भी दूसरे ब्लॉग से अलहदा, कि पोस्ट से बड़े कमेन्ट होते हैं, और हों भी क्यूँ न, architecture अपना काम करके चला जाता है और हम जैसे दिहाड़ी मजदूर फावड़ा बरछी लेकर देर तक उस ज़मीन को खोदते रहते हैं .मकान पहले ही बन चुका है हम तो बस उसे मूर्त रूप दे रहे हैं, मुझ जैसे भी होते हैं कुछ मजदूर जो इंटों को अपने ढंग से लगाने की कोशिश करते हैं, और किसी Supervisor से डांट खाते हैं. अब देखो न, आपकी करीने से सजी, एक एक इंच तक नापी गयी पोस्ट का मैंने क्या हाल किया , कभी बचपन को याद करता हूँ, कभी colors चैनल को, कभी निदा फ़ाज़ली और फ़िर....
    ...पता नहीं अभी तो एक अच्छा मजदूर बनने कि जुगत में हूँ.


    और इससे बड़ी बात क्या होगी कि आपकी त्रिवेणी काफी दूर तक गयी,
    शायद यहाँ तक:
    तेरे भी कुछ कुछ लम्हे,
    मेरे साथ चला करते हैं,
    कुछ और हैं तेरे जलवे,
    हर सू ही मिला करते हैं.

    अगर कभी सो जाऊं,
    शायद मुझे चूमेंगे,
    अगर कभी खो जाऊं,
    मुझे ही ये ढूँढेंगे.

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  37. अपने आस पास, घटी कहानी (?) लगी.

    आजकल हर कहानी को पढ़ के ऐसा ही लगता है...
    लड़ाई के हरने से डर भी लगता है, पर हम फाईट करेंगे.

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  38. नेट कितनी खूबसूरत चीज है..एक लम्हे को देखिये कहां कहां पनाह मिल गयी ...ओर वो लम्हा अभी भी जिंदा है ....उन लोगो के पास जिनसे आज तक रूबरू मिलना भी नहीं हुआ .....शायद कही गुजर भी रहा हो....
    @नीलिमा .......@राखी जैसे पढने वाले ...कभी कभी किसी साधारण लिखे को भी खास बना देते है..... किसी पुरानी पोस्ट को भी इतनी शिद्दत से पढ़ते है ... जब कोई मेल आकर अचानक किसी पुरानी पोस्ट से अपना नाता जोड़ता है... तो भला सा लगता है ...जिंदगी के कितने क्लोन है ना ....
    नीलिमा जन्म दिन की शुभकामनाये !


    @मीता …..जानती हो जब मै ६ साल का था .तब मुझे पाइलट बनना था .....सात साल की उम्र में क्रिकेटर .ओर आठ की उम्र में डॉ .... एलेवेनथ की छुट्टियों में गिटार सीखने के लिए ट्यूशन ज्वाइन करने की गिटार वाली खवाहिश अधूरी ही रह गयी......अनुराग कश्यप की फिल्मे .इम्तियाज अली की फिल्मे ..अनुराग बासु की....सुधीर मिश्रा की फिल्मे...ओर न जाने कितनी खवाहिशे .....

    @सागर
    कॉलेज टाइम में सीनियर आपके हीरो होते है ....मेरे भी कई थे ...एक नॉन हीरो भी था ....सिगरेट पीता .क्लास में नहीं जाता ...बरसो से फेल होता .पर वोलीवाल बहुत अच्छा खेलता ... डांस बहुत अच्छा करता ....क्रिकेट में लाजवाब था .ओर तो ओर स्टेज पर कम्पेयरिंग ... उसकी मोटर साइकिल खुला दरबार थी...जो कोई चाहता मांग कर ले जाता .... मै कन्फ्यूज रहता ..क्या आदमी है ..आवारगी के बावजूद जाने क्या बात थी उसमे ....मुझे पसंद आने लगा ...एक रोज बोयस हॉस्टल के गेट पे बहुत स्मार्ट लड़की आई...मुझसे बोली निकी को बुला दोगे.....मालूम चला निकी की पहली गर्ल फ्रेंड थी ..जिससे वो अब तक प्यार करता था .गुजरात में उस वक़्त नियम था .पहले साल पहले पांच टोपर स्टेट के भीतर ट्रांसफर ले सकते है ......वो टोपर थी चली गयी.........एक रोज टी वी रूम में कोई इमोशनल सीन आया .उसकी आंखो से चुचाप आंसू निकले ओर फ़ौरन गायब हो गए ....एक रोज देर रात सिगरेट बांटते वक़्त मैंने पूछा ....इतना प्यार करते थे ..तो रोका क्यों नहीं.....बोला वो प्यार ही क्या जिसमे रोकना पड़े ...उसे जाना था वो चली गयी....गर प्यार होता तो बाद तक भी रहता .....वक़्त के साथ ख़त्म नहीं होता......
    मेरे हीरो की लिस्ट में उसका नाम आज तक शामिल है .अलबत्ता दुनिया के नजरिये से वो सफल नहीं हो.....बरसो से ढूंढता हूँ फेस बुक पर गूगल में ...सिर्फ जानने के लिए कहाँ है ? होस्टल कितनी कहानिया उड़ेल कर रख देता है ......

    @कार्तिकेय ,@दर्शन ....@अपूर्व
    जब लिखना शुरू किया था तब पता नहीं था कौन कहाँ पढ़ेगा ..कैसे पढ़ेगा .....कोई कनेक्ट होगा या नहीं ..अपने दोस्त की लव स्टोरी लिखता हूँ ....ओर . जब चौबीस साल का लड़का अमेरिका से देर रात इमोशनल मेल लिखता है ...या दिल्ली से ......तो लगता है ..अब शब्द मीलो सफ़र करते है ....ओर मोहब्बत अमेरिका हो या दिल्ली कम्बखत एक सा दुःख देती है .......मै उन्हें जानता नहीं पर वो मुझे अपना दुःख बांटने के काबिल समझते है ....किसी ने कही लिखा था कल आजकल के लड़के लडकिया दुनियादार ज्यादा हो रहे है .....मुझे उल्टा लगता है ....अब दुनियादार लोगो के साथ वाजिब लोगो की जमात भी बढ़ रही है ......
    कोलेज टाइम का एक किस्सा लिखने के बाद क्लिनिक का फोन बजता है ...तो दूसरी ओर डॉ विपुल है ....मै पूछता हूँ के मेरे नंबर कैसे मिला ?कहते है ....आज आपको ढूंढना था सो ढूंढ लिया..विपुल चिटठा जगत शौकिया चलाते है ...मेडिकल कोलेज की याद उन्हें भी इमोशनल कर देती है ...
    "पढ़े लिखे लोग भी इमोशनल होते है " .मेरा मन जोर से चिल्लाने को करता है ......

    @कार्तिकेय ....हाँ ये त्रिवेणी पहले की लिखी हुई है .....
    @रंजना जी .....
    जानती है इसलिए मै कहता हूँ कुछ टिप्पणिया कभी कभी पोस्ट से सार्थक हो जाती है ....आपने ऐसी ही एक बात कह दी ...जो मेरे दिल की जी बी में स्टोर हो गयी है ........कई बार सोचता हूँ ऐसी टिप्पणियों को जमा करूँ....पर समेट नहीं सकता ......

    @निर्मला जी @आशा जी ...अपना आशीर्वाद हर बार देने आती है .....लावण्या जी की तरह .....
    @अर्श मेरी जान ......गौतम का कहना है तुम हीरा आदमी हो...मै गौतम से कहता हूं...तुम न भी कहते तो भी वो हीरा ही रहता ....सो ...तुम्हारे लिए ....
    ....

    ख़वाहिशो की दौड़ मे, ज़रूरते भीड़ सी है

    ज़िंदगी की जेब मे मगर कुछ तन्हाईयो के सिक्के है ..........

    .हर दिन साहूकार सा,हर लम्हे का कुछ मोल है .

    उत्तर देंहटाएं
  39. पढते ही बीते लम्हें एक फिल्म चलने लगी। यही तो खासियत आपके लिखें कि वो जिदंगी से निकला होता। और मेरे सर कहते है जो लेखन जिदंगी से निकलता है वो लेखन ही सच्चा लेखन होता है। और त्रिवेणी के लिए कुश भाई से सहमत हूँ। आजकल ज्यादा ही बिजी हूँ इसलिए देरी के लिए माफी जी।

    उत्तर देंहटाएं
  40. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  41. @Anuraag sir, Gautam Daajyu, Arsh, Apoorv, Kanchan Di & Saagar...


    Kuch rishtey udhaar liye the Samay se,
    Asal choro? sood ka bhi 'defaulter' hona chahta hoon,
    हर दिन साहूकार सा,हर लम्हे का कुछ मोल है .

    उत्तर देंहटाएं
  42. ज़िंदगी का एक भी लम्हा खोया नहीं है. सब कुछ वैसा ही संभला हुआ रखा है अतीत की तिजोरी में.

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  43. रोएं भी खड़े हो गए और आँख भी जवाब दे गई..!

    दीदी कहता रहा,,हाल तक फिर अचानक से दी कहने लगा..!

    उस फाइट मे साथ तो दिया मैंने पर मेरे एक ना चली..! बस राहत की एक बात ...आज दी खुश है और आज भी मेरे लिए साईं बाबा से प्रे करती रहती है..!

    डा.साहब ये पोस्ट नही था....एक पूरी बूँद ही गिरा दी थी आपने लम्हे की..ऐसी पोस्ट पर...कुछ सोच नही पा रहा..दर्पण की हेल्प ले लेता हूँ..बेईमानी नही करूँगा.."-+architecture अपना काम करके चला जाता है और हम जैसे दिहाड़ी मजदूर फावड़ा बरछी लेकर देर तक उस ज़मीन को खोदते रहते हैं ."

    टिप्पणी मे जिस नॉन हीरो की चर्चा है वो भी आवारा हम सबके गलियों मे एक मिल ही जाता है..इतने भीतर तक गुजर जाते हैं आप..!कहाँ से सीखा ये आपरेशन..जिंदगी के सारे एहसास को जैसे एक-एक बार स्ट्रेचर पर लिटा चुके हों आप और सुझा रहे हों जिंदगी बीज मंत्र...!

    क्लिनिक जादुई लगती है आपकी...त्रिवेणी..साँस लेती है.मै अपनी रोक लेता हूँ..!

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  44. वाकई ईसमे एक टीस है जो कही जोर से चुभती है और आवाज भी नही आती...
    ईन्तजार आपके अगले ब्लाग का

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  45. अनुराग जी आपकी सब पोस्ट से अलग और मेरी पसंद की पोस्ट है.
    जिस समय आपने छपा इसे तब स्टूडियो में था और पढ़ कर बाहर चला आया, पता नहीं क्यों ? शायद इसी छूटते हुए एक पल को देखने.

    देर से आया हूँ पर आत्मा वहीं भटक रही थी आपकी पोस्ट के आस पास.

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  46. अचानक दी छोटी हो उठी है ....८ साल की दी....स्कर्ट पहने उसका हाथ पकडे ...उसका स्कूल में पहला दिन है ..उम्र तकरीबन .तीन साल ....
    "मैडम मै अपने पास बिठा लूं इसे? .....रोयेगा "...दी मैडम से विनती सी कर रही है ...मैडम उसे प्री नर्सरी में बैठा कर आने को कह रही है ...दी उसे बैठा रही है ..
    "मै यही हूं इस दीवार के पार "...उसके बाल ठीक करके दी जा रही है .....

    बहुत ही खूबसूरत पोस्ट है, हर बार की तरफ लाजवाब... बचपन की कई यादें दिलाती हुयी...

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  47. बिलकुल Dr साहब... हर सांस कितने ही ऐसे लम्हे जुड़ते हैं और सांस की ही तरह छूट जाते हैं...
    कितने अजीब होते हैं कुछ लम्हे,
    सदियाँ बीत जाती हैं एक पल में,
    जबकि वक़्त तो ठहरा ही रहता है...

    और कुछ लम्हे ऐसे होते हैं जो हम रिश्तों की डोर में पिरोकर सँजोकर रख लेते हैं...
    कुछ रिश्ते जीवन को एक मतलब दे देते हैं... जैसे कि... जैसे कि चक्कर लगाते किसी मून को एक एहसास सेटिलाइट बना दे...

    उत्तर देंहटाएं
  48. त्रिवेणी पढ़कर गुलज़ार की ये लाइनें याद आ गयी... " इक बार वक्त से लम्हा गिरा कहीं, वहाँ दास्ताँ मिली लम्हा कहीं नहीं" एक लम्हा मिलता है पर यादें बेहिसाब दे जाता है!

    उत्तर देंहटाएं
  49. बहुत खूब
    बेहतरीन रचना
    बहुत बहुत आभार
    एवं नव वर्ष की हार्दिक शुभ कामनाएं

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  50. मुख्तसर सी बात है,पूरी तरह से मुकम्मिल, किसी भी स्पेस की ज़रूरत नहीं, मगर फ़िर भी यहां से कहीं भी किसी भी मोड पर मुड जाने वाली बात...

    नव वर्ष की हार्दिक शुभ कामनायें...

    उत्तर देंहटाएं
  51. वर्ष नव-हर्ष नव-उत्कर्ष नव
    -नव वर्ष, २०१० के लिए अभिमंत्रित शुभकामनाओं सहित ,
    डॉ मनोज मिश्र

    उत्तर देंहटाएं
  52. आपको पढ़ना सदैव सुखद होता है, क्योंकि आप जब भी लिखते हैं मन से जुडा हुआ महसूस करती हूँ...सुन्दर अभिव्यक्ति.....त्रिवेणी तो हमेशा कुछ कहती ही है......
    नव वर्ष की मंगल कामनाओं के साथ आपके लेखन को भी शुभ कामनाएं......

    उत्तर देंहटाएं
  53. बहुत ही खूसबूरत भाव हैं और साथ ही साथ सार्थक भी।
    नव वर्ष की अशेष कामनाएँ।
    आपके सभी बिगड़े काम बन जाएँ।
    आपके घर में हो इतना रूपया-पैसा,
    रखने की जगह कम पड़े और हमारे घर आएँ।
    --------
    2009 के ब्लागर्स सम्मान हेतु ऑनलाइन नामांकन
    साइंस ब्लॉगर्स असोसिएशन के पुरस्कार घोषित।

    उत्तर देंहटाएं
  54. yakeen kar len anurag ji, ye ham hi hain..but ya..bada change aagaya hai aapke blog par..hamari nazar na lage...bahut achha lag raha hai...aor jahan tak aapka saval hai...aap to hamare dil mein baste hain.....or hamesha rahenge...hope u'll be fine

    उत्तर देंहटाएं
  55. डाक्टर साहब,
    चीरा लगाकर इमोशन्स बाहर निकाल दिए हैं आपने। त्रिवेणी तो कमाल की है हीं, लेकिन "दी" की कहानी तो लाजवाब नहीं है। मेरी कोई बड़ी बहन नहीं, हाँ लेकिन अभी पिछले महीने हीं छोटी बहन की शादी हुई है। दो-तीन सालों से घर में जो माहौल था, उसे मैंने भी महसूस किया है...इसलिए सबकी तरह मैं भी इस कहानी से खुद को जोड़ पाया हूँ।

    और क्या कहूँ.....बस आप ऐसे हीं लिखते रहिए।

    चलते-चलते नव-वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ स्वीकार करें।

    -विश्व दीपक

    उत्तर देंहटाएं
  56. हमेशा की तरह बेहतरीन पोस्ट | ये पोस्ट भी माझी में डुबोती हुयी

    उत्तर देंहटाएं

कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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