2010-01-23

सरवाइवल ऑफ़ फिटेस्ट उर्फ़ नैतिकता के मेनिफेस्टो .....

कैसे  रहते है लोग यहाँ "? एक्सामिन टेबल पर लेटी सेक्स वोर्केर को एक्सामिन  करते -करते  मेरी कुलिग़ ने अंग्रेजी मे मुझसे कहा था . 
 "सेक्स वर्कर ". सभ्य समाज की डिक्शनरी बदल रही है .सूरत के रेड लाइट एरिया की उस बस्ती मे दो कमरों को फेरबदल करके बनाया हुआ वो "अस्थायी जांच -केन्द्र "था , जिसके एक कमरे के बीचों -बीच परदा डाल कर आधे हिस्से मे छोटी सी पेथोलोजी लैब का सेट अप था ,ओर एक हिस्से मे एक्सामिन रूम. ३ महीने मे एक बार  तीन चार डिपार्टमेंट का मिलजुल कर  उन्ही के एरिया मे आकर कैम्प लगाना .नाको (N ACO ).के  उस  प्रोजेक्ट  मे  शामिल  था .
अगली  लड़की  तकरीबन  कोई  १७  साल  की  थी  पहाडी  नैन  नक्श  चेहरे पर छोटे छोटे चेचक के दाग मेरी मौजूदगी से वो थोडी असहज दिखी है   तो मैं कमरे से बाहर निकल आया .हूँ .
बाहर  सड़क के कोने मे  खड़ा   एक बूढा पीपल का पेड़  ओर  शिव   को  बैठा कर बनाया  गया  एक मन्दिर .मूर्ति के आगे पड़े कुछ फूल . मूर्तिया कभी  शिकायत नहीं करती  कही भी बैठ जाती है आँख मूँद कर कुछ       बुदबुदाती  एक  सात -आठ साल की बच्ची , दो चुटिया ,फूलों वाला फ्राक,सांवला रंग . कुछ भी ऐसा नही जो उसे दूसरे बच्चो से अलग करे .जन्म एक एक्सीडेंटल प्रोसेस है  ओर कभी कभी पैदा होने का अपराध अक्षम्य होता .है  .
उस एरिया मे कई वर्षो से एक एन .जी .ओ संस्था चला रही मनीषा जी 
बताती है 
बच्ची का नाम सोनिया है "पोसिटिव "है   ४ महीने पहले ही  उसकी .माँ   एड्स की भेट चढी है ,फिलहाल बाकी तमाम सेक्स वोर्कर इसे पाल रही है .माँ  के डाइग्नोसिस   के बाद   इसका भी टेस्ट कराया गया .
सोनिया .
अपनी पूजा ख़त्म
..करके मनीषा जी के  पास आयी है  उत्सुकता   भरी  निगाह  बेल्ट   पर  लटके  हुए   मोबाइल  केस  पर .है .जिंदगी की रील में कुछ  रोल की फुटेज किसी एक्स्ट्रा सी होती  है
  तकरीबन  एक  घंटा
  एक्सामिन का दौर  चला है कि  बाहर शोर गुल हुआ .है तकरीबन 40-5-५० लोग .है . बदन पे    सफ़ेद कुरता पजामा .गले में सोने की  मोटी चैन   रुद्राक्ष  की माला से गुंथी हुई है .भारी भरकम  शरीर .सबसे आगे वही है  शायद उनके लीडर.
..".कंडोम नही बांटने का  मुफ्त ' मे इलाज मिलेगा तो ओर धंधा करेंगी ''
 पीछे दर्जनों हँसते लड़के है .आँखों   में एक्स-  रे  लिए  ,कई जोड़ी निगाहें  नारे लगाती  आवाजे .
  लीडर की  आवाज फिर बुलंद होती है " हमे इन्हे शहर से बाहर निकालना है ओर यहाँ कंडोम  बंट  रहे है .....'
  किसी  ने  पास  की  पुलिस  चौकी  को  इत्तिला  दी  है  ,पोलिस वाले आ गए है .एक  हवलदार हमसे सामान समेटने को कहता है.
'आप लोग निकलिये साहेब '....एक सिपाही  हमे इशारा  करता है
आनन -फानन मे समान समेटा गया .है .वैन मे चढ़ते वक़्त पीछे मुड़ कर  .देखता   हूँ .एक ओर भीड़ खड़ी  है .दूसरी ओर मनीषा बेन का हाथ थामे सोनिया .अपनी दूसरी बंद मुट्ठी में फूल लिए .
साल २०००  नेशनल एड्स कंट्रोल  सोसायटी  (नाको) ,ब्रिटिश गवर्मेंट ओर गुजरात सरकार के साझा प्रयास से  एच  आई .वी के  लिए  चले   प्रोजेक्ट फॉर सेक्सुअल हैल्थ " जिसमे कई N.G.O भी  जुड़े  उसी दौरान  हुए  कुछ  अनुभवों में  से   एक !

किसी पगले कवि ने पुजारी को “धार्मिक दिहाड़ी मजदूर “कहा है...मेरा   ओर्थोपेडिक दोस्त  अक्सर बहक कर अकेले में   हमारे तबके को" पॉलिश्ड कमीनो   की जमात " कहता है भरे पेट की थ्योरी अलग होती है ”.हम साले  स्वेच्छा से हिप्नोटाइज लोगो का समूह है “. डिक्शनरी ऐसे शब्द एक्सेप्ट नहीं करती .ये "ऑफ दी  रिकोर्ड". शब्द  है .वैसी आधी दुनिया ऑफ दी रिकोर्ड ही चलती है नैतिकता का मेनिफेस्टो ऐसा ही है .कोई भी इसे हाइजेक कर सकता है  .यू भी  कृत्रिम नैतिकताओं" के डाइमेंशन  बड़े फ्लेक्सेबल है .किस दरो-दीवार की ऊंचाई कितनी रखनी है कब किसको खींच कर  बड़ा करना है .   सारे ऑप्शन   खुले   है !


69 टिप्‍पणियां:

  1. behtreen dhang
    behtreen kathan....

    ek baat to hai Anurag g ki Desh me bahut saare log to fayda utha rahe hain.....

    hai...
    DESH KA KYA HOGA....?

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  2. एक संजीदा मुद्दे पर लेखनी चलाई है आपनें ,आभार.

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  3. kuch log inko abhishpt khte hai ?
    dard jakar bhi koi ilaj nhi ?

    antrman ko bedhti post .

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  4. bahut ajeeb hai na
    bimari hatane ke liye bhi rok laga di gayai
    aur bimaari na hone dene ke tarike par hi
    desh mein jahan log apne swarth ke liye kaam kar rahe ho
    waha koi niswarth madad kare kaise sahan hoga

    aapki lekhni hamesha bahut der tak nishabd kar deti hai
    samjh nahi aata ki kya hoga iska solution
    kya koi rasta hoga

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  5. क्रत्रिम नैतिकताओं के डाइमेंशन बड़े फ्ले्क्सेबल हैं---
    वाकई भाई अनुराग जी।

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  6. पता नहीं कितने स्टैंडर्ड बना लिये हैं हमने अपनी सुविधा के हिसाब से. जहां जो फिट बैठा लगा दिया.

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  7. कृत्रिम नैतिकता के डाइमेंशन बड़े फ्लेक्सिबल हैं...

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  8. अनुराग भाई! आप यथार्थ को उस के चरम पर प्रस्तुत कर सकते हैं। आप की इस काबीलियत से ईर्ष्या होने लगती है।

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  9. कृत्रिम नैतिकता के डाइमेंशन बड़े फ्लेक्सिबल हैं...
    पते की बात... बढ़िया "अनुराग चिंतन".

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  10. यहाँ तो सूरत का ज़िक्र है और आपने मुझे लखनऊ बताया था .....सोचती हूँ ये डोक्टरस हर इन्सान को कितने करीब से पढ़ लेते हैं ....देख लेते हैं ....सच में कैसी कैसी होतीं हैं ये जिंदगियाँ.....सिर्फ १७ साल की.....और ये बच्ची जो महज़ ७,८ साल की है .... क्या कहा होगा भला उस पत्थर के भगवान से ....क्या दे सकेगा उसे समाज के साथ जी सकने का अधिकार .....अच्छा किया उसने जो वो फूल मुट्ठी में ही बंद रखे ....!!

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  11. यथार्थ अपने ठेठ नग्न रूप में इतना दयनीय भी हो सकता है! हो सकता है. बल्कि होता है, अक्सर देखा है.
    ये विरल अनुभव है हम जैसे कईयों के लिए. इन्हें हम विश्वस्त चश्मों से ही जान पाते हैं.इस रूप में ये पोस्ट एक दस्तावेज़ है.
    मोरल पुलिसिंग हमारे देश में कथित संस्कृति की आड़ में अपने हित साधती रही है.इसको लेकर एक आवेग की सी स्थिति रहती है जो विचारों में तर्क-प्रक्रिया को बिखेर देती है.कुछ जमा तो फिर आता हूँ.नहीं जमा तो भी आऊंगा.आने वाली टिप्पणियों के लिए.हर बार की तरह.

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  12. @
    मूर्तिया कभी शिकायत नहीं करती ...कही भी बैठ जाती है ...
    .जन्म एक एक्सीडेंटल प्रोसेस है ...ओर कभी कभी पैदा होने का अपराध अक्षम्य होता .है
    .निगाह बेल्ट पर लटके हुए मोबाइल केस पर ......जिंदगी की रील में कुछ रोल की फुटेज किसी एक्स्ट्रा सी होती है
    .हम साले स्वेच्छा से हिप्नोटाइज लोगो का समूह है
    सारे ऑप्शन खुले है ....

    मैं समझता था कि ऐसी बुनाई सिर्फ किशोर चौधरी ही कर सकते हैं।
    You too Doctor !

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  13. सच कहू तो मै इस लायक नही आपके लिखे क विश्लेषण कर सकु .

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  14. .
    .
    .
    आपकी इम्पैथी की तारीफ करता हूँ पर कहीं न कहीं यह "अस्थायी जांच -केन्द्र " इस बात का एडमिशन भी हैं कि देश और समाज के तौर पर हम इस बात से अब डिस्टर्ब नहीं होते कि औरतें आज भी धंधे में धकेली जाती हैं और पेट पालने के लिये सेक्स वर्क करती हैं...और हम उन्हे सम्मानजनक जीवन जीने का अवसर देने की बजाय एड्स से बचने के लिये कंडोम बांटने और एसटीडी स्क्रीनिंग करने को ही उन को राहत पहुंचाना मान लेते हैं...
    गुरूदत्त की एक फिल्म का यह गाना अक्सर याद आता है...
    "ये महलों ये तख्तों-ताजों की दुनिया..."

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  15. जिंदगी की रील में कुछ रोल की फुटेज किसी एक्स्ट्रा सी होती है...
    sachmuch..

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  16. मैं किशोर चौधरी जी को तो नहीं जानता लेकिन बात वहीं कहना चाह रहा था जो गिरिजेश राव जी ने कही है। शब्‍दों की बेहतरीन बुनार्इ्र।

    नौ साल लगे एक घटना को विचार मंथन से पोस्‍ट बनने तक में।

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  17. नैतिकता का मैनिफेस्टो !!!!! कमाल है डॉ.अनुराग ! आप ही लिख सकते हैं !!!किस दरों -दिवार की ऊंचाई कितनी रखनी है ये कौन तय करेगा .हम खुद को कब तक धोका देंगे ?????

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  18. 'पोलिशड कमीने और भरे पेट की थियोरी' मेरे लिए आज की पोस्ट से हमेशा के लिए याद रह जाने वाले शब्द हैं !

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  19. "...भरे पेट की थ्योरी अलग होती है ……..”
    बड़ी बात है/

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  20. ये कूचे ये नीलामघर दिलकशी के,
    ये लुटते हुए कारवां ज़िंदगी के,
    कहां हैं, कहां हैं, मुहाफ़िज़ खुदी के,
    जिन्हें नाज़ हिंद पर वो कहां हैं,
    कहां हैं, कहां हैं, कहां हैं...

    ये पुर-पेच गलियां, ये बदनाम बाज़ार,
    ये गुमनाम राहिल, ये सिक्कों की झंकार,
    ये इस्मत के सौदे, ये सौदों पर तकरार,
    जिन्हें नाज़ हिंद पर वो कहां हैं,
    कहां हैं, कहां हैं, कहां हैं...

    जय हिंद...

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  21. बाहर शोर गुल हुआ ....तकरीबन ५० लोग थे .... N.G.O वालो से उलझते ....
    ..".कंडोम नही बांटने का ........ मुफ्त मे इलाज मिलेगा तो ओर धंधा करेंगी ''

    स्खलित होते हीं पुरुष का 'मर्द' फिर लौट आता है...

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  22. अच्छा चिंतन है .
    भरे पेट की थ्योरी ऐसी ही होती हैं जनाब

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  23. किस बेबाकी से बात कह गए डाक्टर साब...दर्द उकेर के रख दिया आपने .... निहायत ही नजदीक से बात कही है आपने... क्या गुजारिश की होगी वो उस पत्थर से जहाँ इंसान भी पथ्थरों से गन्दी बात कर बैठते हैं मूर्तियों के बारे में ... क्या समाज अपनाएगा उसे ,,..?/


    अर्श

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  24. Kash ye post virodh karne wale leader sahab bhi padh paate. Sahi hai, hamare jeevan aur uske dheron pahlu off the record hi chalte hain.

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  25. बेहतरीन लेखनी का एक और नमूना..।
    हर बार की तरह आपने सोचने पर मजबूर कर दिया।
    भरे पेट की थ्योरी...
    पॉलिश्ड कमीने...

    क्या बात है!

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  26. बहुत ही भावपूर्ण पोस्ट ... इनकी दुनिया अलग टाइप की होती है ... आपकी पोस्ट से काफी कुछ जानने का मौका मिला ...आभार.

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  27. लगभग ऐसी ही पोस्ट शायद पहले भी पढ़ चुकी हूँ यहाँ...! कुछ अनुभव ऐसे होते हैं, जो हर बार एक सा असर करते हैं दिल पर, ये भी उनमे से ही एक है।

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  28. हम सभी अपने ही रचे हुये प्रवँचनाओं में लिसड़े पड़े हैं, उठने का प्रयास करो और फिसल कर वहीं गिर पड़ो ।
    सब कहते हैं, दुनिया ऎसे ही चलती है.. आप भी चलते रहिये । वह, जिसको समाज की सँज्ञा दी जाती है, केवल इतना चाह्ता है कि कुटिल चालों और शोषण के मुखौटों के लिये उसके गढ़े हुये सम्मोहक मानकों का जयकारा लगता रहे, घृणित के लिये आदरणीय सँबोधन इज़ाद करके वह उसकी मान्यता सदियों से कबूलवाता आया है, मसलन टट्टी अस्पृश्य है, जबकि समानार्थी विष्ठा सँभ्राँत है । ’ सेक्स-वर्कर ’ तो एक अदना सा ज़ुमला भर है... डाक्टर तुमने इस दोगलेपन को इतनी बारीकी से बुना है कि विसँगतियों के अन्य प्रतीकों के मध्य यह मिलावट गौण हो गयी है ।
    इस पोस्ट के कई छोटे छोटे बिन्दु एकसाथ मिल कर हमारे माथे पर कालिख एक उपस्थिति दर्ज़ करा सकते थे, पर ये प्रतीक-बिन्दु स्वयँ ही एक दूसरे पर भारी पड़ते नज़र आ रहे हैं ।
    मूर्तियाँ पत्थर की होती हैं, शिकायत नहीं करतीं, लिहाज़ा कहीं भी बैठ जाती हैं... शिकायत करने वालों को आज तक भला कहीं ठौर मिल पाया है ?
    भले हम सभ्य लोग इसे न मानें, पर.. " फिलहाल बाकी तमाम सेक्स वोर्कर इसे पाल रही है ", कथन में दयनीयता और जीजिविषा के टकराव में दयनीयता से टक्कर लेने की एकता है, यहाँ भरे पेट वालों का सिर-फुट्टौवल नहीं दीखता !
    .. तो और धंधा करेंगी '' यह मनवा रहा है कि इस धँधे के ग्राहक हैं, और वह हमारे आपके बीच में ही बाइज़्ज़त घुल मिल कर अपनी पैठ बनाये हैं । ताज़्ज़ुब नहीं कि बाइज़्ज़त बरी बने रहने की चाह धँधे वालियों को मुज़रिम ठहरा रही है ।
    NGO की पहल, मायने जागरूकता के चिराग जल उठने की आशँका... और चिराग की रोशनी या तो सच को उजागर करती है, या बदनीयत मँशाओं के ढेर में आग लगा देती है... फिर घाटा किसका ? NGO के या ऎसी कोई अन्य पहल का विरोध होना क्या दर्शाता है ?
    समाज और इसके ठेकेदारों के कुटिलता और कपट के ज़खीरे का यह पोस्ट बहुत छोटा टुकड़ा है... मुझे लगता है भावावेश में टिप्पणी लँबी होती जा रही है, जबकि डाक्टर अरविन्द ने पहली ही टिप्पणी में " .... आत्मदयात्मक स्टाईल है या फिर टिप्पणी औदार्य की अभिलाषा से आप्लावित ? " का शो कॉज़ नोटिस लगा चुके हैं । आई ऍम सॉरी फ़ॅर आइदर ऑफ़ एनीवन, डाक्टर !

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  29. सार्थक .

    ज़िन्दगी की सच्चाईयाँ कडवी भी होती हैं

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  30. पहले भी इसी तरह की एक पोस्ट आपके ब्लॉग पर पढ़ी थी ..बहुत दिनों तक उसके बारे में सोचा था ...वाकई ज़िन्दगी की कुछ सचाई बेहद नंगी होती है ..

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  31. गुरुवर अमर कुमार जी की टिपण्णी तो सोने पे सुहागा रही.. अगर कभी फिल्म बनायीं तो उसमे पोलिश्ड कमीने का जरुर इस्तेमाल करूँगा.. हाँ फिल्म के शुरुआत में ही क्रेडिट दे दूंगा.. डोंट वरी :)

    दो तीन शब्द और मिले है इसी ब्लॉग पर.. मतलब ढूँढने के लिए डिक्शनरी खोल के बैठा हूँ.. मिल नहीं रहे.. वैसे सुना है एक डिलीट नाम का बटन भी होता है ब्लॉग की सेटिंग में.. कभी वो भी दबाया करो डा.साहब..

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  32. भरे पेट की थ्योरी के नीचे हेंस प्रूव्ड नहीं लिखना होता.......
    @कंचन ....सच कहा पिछले महीने के किसी रोज कुछ इस तरह से जब मेरठ के रेड लाईट एरिया में विरोध हुआ ...वजह शायद दूसरी थी तो किसी का लिखा हुआ याद आया ....घटनाएं अपने आप को दोहराती है ...मनीषा बेन ने मुझे कहा था के एक साधारण औरत असाधारण परिसस्थितियों में कैसे असाधारण हो जाती है ओर कैसे एक असाधारण व्यक्तित्व सामजिक दबावों के कारण बुझ जाता है .मैंने यही देखा है ...इतने बरस बाद भी उनकी ये बात मुझे आज भी याद है .ओर मैंने असल जिंदगी में ऐसे कई चेहरे देखे है ....
    @संजय जी.....@प्रवीण शाह जी......
    सच कहा यथार्थ का ठेठ नग्न रूप ऐसा ही होता है .......इतना ही उबाऊ ....बोरिंग.....जिसके विश्वस्त चश्मों. भी अद्रश्य होते है .आँखों पर चढ़े हुए दिखते नहीं.....
    १७ साल की लड़की स्कूल से बंक करके पिक्चर देखने जाती है ...छोटी बहन से लड़ाई होती है .छोटी पिता को बताने की धमकी देती है .डर कर वो किसी ट्रेन में मामा के घर बिना टिकट जाने को चढ़ती है ....रेलवे पोलिस के हत्थे चढ़ती है ...बलात्कार के बाद रेलवे पोलिस के जवान मुंबई जाने वाली किसी ट्रेन में अध्बेहोशी हालत में चढ़ा देते है ...ऐसे दो चार एपिसोड़ो के बाद मुंबई के एक दलाल के हत्थे चढ़ी वो लड़की ....एक साल के बाद रोटेशन पालिसी में सूरत आती है ..इसी तरह हिम्मत जुटा कर मां को फोन करती है .बाप स्वीकार करने से मन kar देता है ....मां फ़ोनों पर रोती मिलती है ....
    अफ़सोस कोई फ़िल्मी कहानी नहीं है...किसी सरकारी अस्पताल के इनफेकशिय्स वार्ड का कोई बिस्तर इसके लिए रिज़र्व है .....ओर ऐसी गन्दी कहानिया कोई सुनने में इंटरेस्ट टेड नहीं है .....खुद मुझे भी डराती है .....
    मेरा दोस्त कहता है सालो मोरालिटी इतनी होनी चाहिए के एफोर्ड कर सको.... बाबा रामदेव जब शैम्पू ओर बाल गिरने से रोकने वाला तेल बेचते है ....तो शहनाज़ हुसैन की तरह दुकानदार नजर आते है ...पर नैतिकता की लंबरदारी बड़ी कठिन जॉब है ..जिंदगी सफ्हो को इस तरह से पलटती है के अगले पन्ने पर आदमी कुछ ओर नजर आता है......८० साल के ठाकरे .....ऑस्ट्रलियन को खेलने से मना कर रहे है के भारतीयों के साथ गलत किया....अजीब बात है यू पी ओर बिहार वाले बॉम्बे पहुँचते ही अपनी भारतीयता खो देते है ....पर लोग जानबूझ के अपनी आंखे मूंदने में माहिर है .....

    @हरकीरत जी.....
    मुझे दो सालो से पढने वाले जानते है की मैंने अपनी पढाई गोवरमेंट मेडिकल कॉलेज सूरत से की है .लखनाउ का जिक्र इसलिए किया था के मेरी इस साल की कोंफ्रेंस वहा थी .... डरमेटोलोज़ी की .....

    @डॉ अमर कुमार ......
    गुरुदेव ....यूँ तो @ओम आर्य जी ने .."स्खलित होते हीं पुरुष का 'मर्द' फिर लौट आता है."...तल्ख़ मगर सच्ची बात कह दी है ...पर जानते है ना हमारे तबके के मजदूरों ने भी अब अपने रेट बढ़ा दिए है ...मर्ज देखकर ओर मरीज की माली हालत देखकर अपनी मजदूरी तय करते है ......फिटेस्ट लोग ही अब बाकियों के हिस्से की हवा भी कब्जाना चाह रहे है .डार्विन की थ्योरी बदल रही है ...

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  33. इंसानियत करना और इंसान होना भी गुनाह है महीनता और सहजता से विभत्स्व सच्चाई उघाड़ती यह पोस्ट..

    अनुराग जी, आपकी टिपण्णी ने तो इस सच्चाई को डाईसेक्ट कर डाला..

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  34. सभ्य समाज की डिक्शनरी बदल रही है ..
    ... देव डी में चंदा कहती है... "लोग ***** कहने में अब शरमाते हैं, ओड लगता है ना. .."

    एड्स... इस पर दसियों पेज लिख दूँ... नाको में लगभग रोज़ का आना-जाना है...और हमारे साथी जो कार्यशाला करते हैं... उनके अनुभव... रोज़ का presentation ... चहल-पहल... बिजनेस के धंधे... फिलहाल तो इतना ही महसूस किया है की जब तक यह बीमारी का खौफ दिखाया जाता रहेगा.. नाको वालों की नौकरी मस्त रहेगी... कृत्रिम नैतिकता, आप इस डर को चाहे जैसे फैला और सिमटा सकते हैं...

    पुणे का बुधवार पेठ इलाका हो या कलकत्ता का सोनागाछी फिर चाहे बिहार में चतुर्भुज पार्क या दिल्ली का जी बी रोड...

    नैसर्गिक चिंतन...
    कल ही पेज थ्री देख रहा था... अब गटर का कीचड़ दिखाना है तो उसमें उतरना तो पड़ेगा...

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  35. "स्खलित होते हीं पुरुष का 'मर्द' फिर लौट आता है! "
    जज्बात हिला देने वाला जरूर है मगर सत्य है ! हम भी उस मर्द की category में आते हैं ! तो इस वाक्य से बचना आसान तो नहीं है !
    शायद आज के दिन में अगर कोई धर्म जरूरी है तो वह है "समानता " ...Equality ..Right to Live n survive ... तो वो चाहे सूरत का रेड लाइट एरिया हो या मेरठ का .. हक़ तो जीने का सबको है ,मैं तो सुप्रीम कोर्ट के उस वक्तव्य से सहमत हूँ जिसमे उसने केंद्र सरकार से पूछा था कि "अगर हैल्थ ,संक्रमण और एड्स से बचाव में सरकार योग्य नहीं है तो क्यों न वेश्यावृति को कानूनी वैध कर दिया जाय ?? "

    तरस तब आता है जब खुद की कालर के मैल को न देख कर हर मानुष दुसरे के गिरेबां पर लगे छीटों पर निशाना साधता है ! हर इंसा कभी न कभी काली कोठरी से बचते-बचाते थोड़ा बहुत मैल तो लगा ही लेता है ! पूरोषोतम राम तक एक बारगी अपने कमजोर व्यक्तित्व का उधाहरण देने में न चुके !! मगर जब बात समाज की आती है तो हर कोई ठेकेदार बन बैठता है !

    झकझोरने वाला लेख ,वो गजल याद आती है कि ..

    "बात निकलेगी तो दूर तलक जायेगी .... "

    साभार

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  36. अनुराग जी कही पढ़ा था "Educations begins a gentleman,conversation completes him.
    "कल ही ये पोस्ट पढ़ी थी ओर टोर्च जलाकर आत्मप्रवन्चनात्मक /आत्मदयात्मक चीजे ढूंढ रही थी अफ़सोस मिली नहीं .पहले भी ये पोस्ट पढ़ी थी जब आपने लिखी थी सोच ही रही थी की आपने किसी वजह से दोबारा लिखी होगी इसलिए आपकी टिप्पणी का इंतज़ार कर रही थी . "इन्फ्लेमाईटिस " रोग वाले लगता है ब्लोग जगत में भी बहुत सारे है .शायद किसी किसी की दुखती रग आपसे दब गयी है .
    जाने दीजिये पोस्ट पर आते है .उस दुनिया की खिड़की तो आपने खोली ही है पर बहुत कुछ ओर भी दिया है
    .....मूर्तिया कभी शिकायत नहीं करती ...कही भी बैठ जाती है .....
    .....जन्म एक एक्सीडेंटल प्रोसेस है ...ओर कभी कभी पैदा होने का अपराध अक्षम्य होता .है ... .
    जिंदगी की रील में कुछ रोल की फुटेज किसी एक्स्ट्रा सी होती
    “धार्मिक दिहाड़ी मजदूर
    पोलिश्ड कमीने
    स्वेच्छा से हिप्नोटाइज लोगो का समूह
    ....वैसी आधी दुनिया ऑफ दी रिकोर्ड ही चलती है ..
    @ओर अपनी टिप्पणी में
    सालो मोरालिटी इतनी होनी चाहिए के एफोर्ड कर सको.... वाला वाक्य मैंने डायरी में लिख लिया है .
    आखिर में यही कहूँगी
    "two man look out through the same bars,one sees the mud and the stars."

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  37. देर रात का वक्त है....चौकसी अपने चरम पर है। कल को लेकर ढ़ेर सारी खबरें हैं वादी में फैली हुई। कुछ सरफिरों द्वारा की जाने वाली कोई बड़े कांड की आशंका से ग्रस्त...और मैं इधर एक अलग ही किस्म के सरफिरे डाक्टर की बेबाक बयानी पढ़ रहा हूं। सोच रहा हूं कि डाक्टरों को तो तमाम दर्द से परे होना चाहिये, ये है कि शब्द-शब्द में दर्द समेट लाता है। इन कृत्रिम नैतिकताओं के डाइमेंशन की फ्लेक्सिबिलिटी को नापना छोड़िये डाक्टर साब...कोई फायदा नहीं इस नाशुक्रों की जमात में।

    कुश को जिन नये शब्दों के अर्थ की तलाश के लिये शब्द-कोश की दरकार हो रही है, मुझे उस पहली टिप्पणी पर यहां देर रात गये बेसाख्ता हँसी आ रही है। मिश्र जी की हिंदी का जितना कायल हूँ, उतना ही कई बार उनकी टिप्पणियों पर खुद को लज्जित महसूस करने लगता हूँ और ये मेरी बेसाख्ता हँसी दरअसल इसी लज्जा को छुपाने के लिये खींचा गया चिलमन है। वैसे एक इमोशनल पोस्ट के जायके को बदलने के लिये कई दफ़ा ऐसी टिप्पणियाँ बहुत काम आती हैं।

    ...त्रिवेणी कहाँ गुम है इन दिनों?

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  38. कुछ पोस्ट्स/ब्लॉग्स/किताबें/लेखों को पढ़ना बस ’पढ़ना’ भर नही होता..आपको पढ़ कर भी यह समझ आता है..वैसे तो आपकी ज्यादातर पोस्ट्स ही..जिन्हे सिर्फ़ ’पढ़’ कर काम नही चलता है..हाँ इस बार इतना फ़र्क रहा..कि इस पोस्ट पर कोई कमेंट नही पढ़ पाया..अभी तक...पोस्ट को कई बार पढ़ने के बावजूद..कम्बख्त कर्सर को हर बार बस स्क्रीन के टॉप राइट कार्नर पे छोटा सा लाल क्रास का निशान ही दिखता है बस..या शट-डाउन का ऑप्शन...यह भी ’एस्केपिज्म’ ही नही है क्या मेरा?..दिमाग को ’फ़ार्मलीन’ के सॉल्यूशन मे डुबा कर रख देने का भरम?
    ..सच कहूँ तो इस पोस्ट पर कुछ कहने का मन भी नही था..और निरर्थक भी..कुछ जुबानी लफ़्फ़ाजियाँ करके खुद को कथित नैतिकता का ज्ञान बधारने वाली जमात मे ही खड़ा देखता हूँ बस..मगर लगा कि ’चुप्पी’ इस पोस्ट की भावना के खिलाफ़ होगी..

    ..पूर्वी आंध्र के एक एन जी ओ के साथ मै भी कुछ समय तक जुड़ा रहा था..जो अनाथ बच्चों और अंधे बच्चों की शिक्षा और विकास जैसे कई ह्युमेनिटेरिअन कार्यों से संबद्ध है..और उनमे ही एक प्रमुख काम था सेक्स-वर्कर बनने को मजबूर की गयी महिलाओं-लड़कियों को समाज की मुख्यधारा मे वापस ला कर सम्मानजनक जीवनी-उपार्जन का जरिया देना..और इसी बहाने मुझे कयी भयावह सामाजिक तथ्यों का पता चला..
    ....समाज के आखिरी कोने पर उपेक्षित पड़े अतिनिर्धन, अशिक्षित अधिकाँश गाँव..जहाँ अरबों की सरकारी योजनाओं की चवन्नी भी दिखाई नही देती..वहाँ कई अंचलों मे मान्यता है कि किसी नाबालिग लड़की का कौमार्य कई यौन-रोगों का ’श्योर-शॉट’ इलाज है...इसलिये अपने ’बिगड़े’ हुए बेटों को यौनरोगों से मुक्त कराने की चाह मे कई संभ्रांत ’नैतिकतावादी’ परिवार कमउम्र गरीब लड़कियों को उनके भूख से मरते माँ-बाप से खरीद लेते थे.....और फिर उस ’इलाज’ के बाद वे लड़कियाँ ही वेश्यालयों को दे दी जाती थीं....उस जगह पर..जहाँ पर जिंदा रहना सबसे बड़ी सफ़लता होता हो और अगले दिन की रोटी की जुगाड़ सबसे बड़ी उपलब्धि..ऐसी जगह पर इन सब नैतिकताओं का कोई अस्तित्व नही होता..अगर चाहे तो ’आप’ खुद वहाँ से अभी भी किसी ९-१० साल की बच्ची को खरीद सकते हैं..सिर्फ़ २००० रुपये मे!...और यह तब है जब आज ’शाइनिंग/अतीत की सोने की चिड़िया/इक्कीसवीं सदी का भविष्य इंडिया’ अपने रिपब्लिक की ६०वीं वर्षगाँठ मना रहा है....
    ....हमें झोली भर-भर के इतने सपने दे दिये जाते हैं कि आंखों को ’हैंग-ओवर’ हो जाय..और हम फिर सपने देखने के इतने आदी हो जाते हैं कि वह नींद ही हमारी हकीकत बन जाती है..मगर ’हकीकत’ बस बुरी..और बदतर होती जाती है..मगर किसे फ़िक्र है..जब तक जिंदगी हैं, सपने हैं..समाज है, नैतिकता की झाड़ू है!

    ...एक सवाल याद आया..अक्सर मैं सोचता था कि किसी मरीज को ’अनेस्थेसिया’ देने के बाद क्या उसे ’सपने’ दिखते होंगे..’ऑपरेशन’. के वक्त?.अपना तो अभी कोई अनुभव नही रहा..आप मेडिकल लाइन से ठहरे..सोचा आपसे ही पूँछ लें? :-)

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  39. ..अभी आपके कमेंट्स भी पढ़े...और यहाँ टिप्पणियों के औचित्य/अभिप्राय पर प्रश्न उठाती टिप्पणी पर मैं यह कहना चाहूँगा कि किशोर चौधरी जी के ब्लॉग के बाद आपके ब्लॉग पर ही टि्प्पणियाँ देख-पढ़ कर मुझे ब्लॉगर मे ’कमेंट सेक्शन’ की उपादेयता और ’स्ट्रेंथ’ समझ मे आ्ती है..
    ..और यह भी सनद रहता है कि हम ’राहुकाल’ मे जी रहे हैं..’रीतिकाल’ मे नहीं...

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  40. फिर आई और उस असाधारण परिस्थिति में फँसी साधारण लड़की की हक़ीकत पढ़ी। ये हक़ीकत जब जब मैं कहानियों में भी पढ़ती हूँ तो डिस्टर्ब हो जाती हूँ, पता नहीं क्यों? कहानी का नाम नही याद आ रहा मगर अमृता प्रीतम की किसी ऐसी ही कहानी को पढ़ कर बहुत देर तक व्यथित रही थी। चित्रा मुद्गल की भी एक कहानी ठीक से नही याद पर शायद प्रेतयोनि थी..जो बिलकुल ऐसी तो नही थी, मगर कुछ ऐसा उसमें भी था। उसे पढ़ कर भी मैं बहुत दिन तक नही भूल पाई थी।

    वो सारी भूलें जिनका कोई प्रायश्चित नही होता सिवाय अपनो को खोने के....जाने क्यों मुझे बहुत दुःखी करती हैं....!!

    देखिये बात निकली तो कितनी दूर तक गई... दर्पण सही तो था...!

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  41. mere paas aaj kuchh kahane ko nahin....aaj jubaan chal nahin paa rahi....!!

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  42. भावनात्मक, और संजीदा पोस्ट. कितनी खूबसूरती से बिम्ब उकेरे हैं आपने-
    "मूर्तिया कभी शिकायत नहीं करती ...कही भी बैठ जाती है"
    बहुत सुन्दर.
    गणतंत्र दिवस की शुभकामनायें.

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  43. सारे प्रोदुसर्स जो एड्स पर रेडियो सिरिअल बना रहे हैं... उन्हें एक किताब "एड्स सूत्रा" नाम की दी गयी है .... जिसमें अनीता देसी से लेकर अमर्त्य सेन तक के लेख हैं... एक केस इसमें ऐसा है जिसके बारे में मैंने अपूर्व जी से जिक्र किया था... एक ४ साल का बच्चा ... ना माँ संक्रमित ना बाप... ना ही उस बच्चे को संक्रमित रक्त चढ़ाया गया है... अर्थात योन शोषण ????? तो यह तो समाज की हकीक़त जहाँ उबकाई भी शर्माती है...

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  44. वैसी आधी दुनिया ऑफ दी रिकोर्ड ही चलती है ....नैतिकता का मेनिफेस्टो ऐसा ही है ....कोई भी इसे हाइजेक कर सकता है ...यू भी कृत्रिम नैतिकताओं" के डाइमेंशन बड़े फ्लेक्सेबल है ...किस दरो-दीवार की ऊंचाई कितनी रखनी है कब किसको खींच कर बड़ा करना है .. सारे ऑप्शन खुले है ....

    कितना सही कहा आपने....निःशब्द कर दिया....

    संयोग से आजतक कभी भी बहुत नजदीक से यह सब देखने का अवसर तो नहीं मिला,परन्तु पढ़ सुन कर यदि अनुमान लगाने की कोशिश करूँ तो मन इतना विचलित होता है की उस सोच के साथ भी अधिक समय रह पाना दुष्कर लगने लगता है.....aur ye to jee rahi hain...

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  45. .....मूर्तिया कभी शिकायत नहीं करती ...कही भी बैठ जाती है ..... आँख मूँद कर कुछ बुदबुदाती एक सात -आठ साल की बच्ची ...
    मूर्ति चाहे पथ्थर की हो या फ़िर ....... कभी चाहे फ़िर भी शिकायत नहीं कर पाती....

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  46. *' पैदा होने का अपराध अक्षम्य होता है.'
    *मूर्तिया कभी शिकायत नहीं करती ..
    *'दोहरे व्यक्तित्व' वाले समाज का यही रूप है..एक हाथ से देने की बात करता है तो दूसरे हाथ से छीन भी लेता है.

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  47. काफी देर से पहुँचा । आप उस चीज को महसूस करवाने में कामयाब रहते हैं जिसके तहत आपने लिखा । इतनी शिद्दत से गुजरते हैं आपको पढकर । वरना इस तर‍ह के तथ्‍य तो कई जगह पढे हुए होते हैं ।

    टिप्‍पणियों की सार्थकता वास्‍तव में आपकी पोस्‍ट पर दिखती है जो पोस्‍ट की पूरक पाठ का काम करती हैं ।

    नैतिकता का मेनिफेस्टो ऐसा ही है ....
    लेकिन मुझें लगता है कोई भी इसे हाइजेक नहीं कर सकता है जैसे कि सेक्‍स वर्कर इसे हाईजैक नहीं कर पाती , गरीबी कभी इसे हाईजैक नहीं कर पाती । लेकिन रात मे उनके पास जाने वाले लोग कर लेते हैं फिर दिन में आंदोलन करते हैं । जैसे सेक्‍स वर्कर को यूज किया जाता है....वैसे ही नैतिकता को भी हमेशासे USE किया गया है ...बिचौलियों के द्वारा ।

    यद्यपि एक पाखंडी समाज कभी नैतिक नहीं हो सकता, किसी भी मामले में । उदाहरण के लिए अपने देश में अन्‍य देशों के कुछ उदाहरणों की तरह कभी किसी बडे आदमी ने अपना अपराध स्‍वीकार नहीं किया । लेकिन सोचने की बात है कि वर्णित वेश्‍या वृत्ति की वजह तो गरीबी की मजबूरी या दुर्घटनावश फंसना है लेकिन उनके पास जाने वालों की मजबूरी समाज के किस ढंग से पैदा होती है ।

    एक महीने पहले सोचा था एक कविता "नैतिकता के आधार पर ..." शीर्षक से लिखने की लेकिन अभी तक लिख नहीं सका ।

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  48. भद्र और सभ्य समाज में चिंतन सिर्फ कागजों और स्क्रीनों पर होते हैं. सड़क से गुजरने के बाद जल्दी से जल्दी धूल झाड़ने की चिंता रहती है. मुखौटा लगाना छोड़ दे तो मुखौटा बिकेगा कैसे.

    वैसे इस संस्मरण पर मुझे BSACS(Under NACO) का एक प्रोजेक्ट याद आया जिसमे मैं एक NGO के साथ कंडोम डिस्ट्रीब्युशन पर काम किया था. मुझे याद है मुफ्त के कंडोम को सल्टाना कितना मुश्किल होता है.

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  49. डॉ. साहब ! आज पहली बार आना हुआ आपके ब्लॉग पर...और बहुत प्रभावित किया आपकी लेखनी ने..पोस्ट के बारे में तो इतना कहा जा चूका है कि मेरे कहने के कोई मायने नहीं..परन्तु आपका लेखन पाठक मन पर गहरा प्रभाव छोड़ता है, ये अवश्य कहूँगी..शुभकामनाये

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  50. पहले तो मैं, आपकी भाषा से बड़ा प्रभावित हूँ, और ब्लॉग में हमेशा देखता ही रहता हूँ, मगर टिप्पणियों की भारी संख्या देखकर, जवाब देने का सामर्थ्य टूट जाता है। खैर...बहुत सारे जवाब देने वाले, वही कह गए जो मैं कहना चाह रहा था, [गोया यह भी मेरे दिल में है]....खैर....साहित्य और साहित्य नहीं के बीच की खाई को आप बखूबी भर रहे है....zaari rahne dein..

    Nishant...

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  51. अच्छा शब्द चित्र है । इसका एक पक्ष राजकुमार सोनी के ब्लॉग' बिगुल 'पर भी देखें ।

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  52. सर्वप्रथम १०००० रन बनाने के लिए बहुत बहुत बधाई .....!!

    कुछ भीनी- भीनी सी महक कुछ पलों की मुस्कराहट दे गयी .....शुक्रिया ....!!

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  53. अब क्या कहूँ? देर से आने पर शर्मिंदा हूँ...अच्छी चीजें पता नहीं क्यूँ अक्सर मुझ से बच कर पतली गली से निकल जातीं हैं...ये मेरे साथ ही क्यूँ होता है...अगर ये बात युनिवर्सल होती तो सभी देर से आते सिर्फ मैं ही क्यूँ देर से आया..खैर ये माथा पच्ची वाला विषय है, मैं आया ये अधिक महत्वपूर्ण है देर से ही सही...अंग्रेजी में कहें तो 'बैटर टू बी लेट देन नेवर' .
    आपकी पोस्ट पर यहाँ तहां बिखरे जुमले बीनने में वो मजा आता है जो सागर तट पर शंख सीपियाँ बीनने में आता है...गहरी संवेदना में डूबी पंक्तियाँ कई बार कीकर के काँटों जैसी चुभ जाती हैं...विलक्षण पोस्ट.
    नीरज

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  54. aatma tak utar gaya aapka ye sandesh :)

    bahut khoob
    http://sparkledaroma.blogspot.com/
    http://liberalflorence.blogspot.com/

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  55. pata nahi kyun ye comment publish nahi hua doctor sahab so aapko mail kar rahi hun


    neelima sukhija arora

    हुत दिनों बाद ब्लाग की दुनिया में लौटी हूं, आपका ब्लाग पढ़ कर सन्न रह गई। वाकई कितना आसान है, अपनी एक अलग डिक्शनरी गढ़ लेना, खभर पेट लोगों के सम्मोहन की दुनिया। कितना आसान होता है समस्याओं को देखकर आंख बंद कर लेना। पर बहुत मुश्किल होता है सच्चाई से आंखें दो चार करना। वो भी हमारी दुनिया का ऐसा सच, जिसे हमेशा परदे के पीछे छुपाया जाता है। सभ्य घरों के ड्राइंगरूमों में यह चर्चा का विषय नहीं होता। फिर भी हैट्स आफ टु यू कि आप दुनिया के इन सचों से भी गाहे बगाहे रूबरू कराते रहते हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  56. भारत तथाकथित सुधरे हुए समाज का एक हिस्सा है
    और लगता है .......
    " the more things change,
    the more they remain the same "

    We know about many ILLS within our civilized society ....
    &
    many we don't but as a whole, Society keeps on
    going ahead ,
    as it is ...........!!
    On other side,
    is Rahul, Thakre ,
    shah Rukh Amar Singh,
    Amitabh
    media Circus :-((

    भारत का इतिहास इसी तरह के विभाजन और आपसी लड़ाई झगड़ों की दास्ताँ लिए हुए है
    २०१० का समय भी ये धर्म, क्षेत्रीयतावाद , जात पांत के भेद भावों को मिटा न पाया उसका
    बहुत अफ़सोस है - -- हर देश भक्त को नमन --
    भारतीय जनता कब संगठित होगी ? बातें करने का समय कब का बीत चूका है ...
    अब तो , कायरता का त्याग करो ...नेता क्या करेंगें ? सिर्फ टेक्स लेंगें आपसे ..
    जनता जनार्दन कब जागेगी ?
    - लावण्या

    उत्तर देंहटाएं
  57. पहले भी आपकी इस पोस्ट पर कमेन्ट करना चाहा था,..लेकिन एरर की वजह से पोस्ट नहीं हो पाई ..इसलिए दुबारा ...बस इतना ही की भरे पेट का ही नहीं ...खाली पेट का भी सवाल है यहाँ ....अनुराग जी,बस कहने को ही हम सभ्य हेँ .

    उत्तर देंहटाएं
  58. सूरत की यादे फिर से जेहन में चल चित्र कि भांती घूमने लग गयी | आपके मेडीकल कोलेज के सामने मजूरा गेट पर विश्वकर्मा चेंबर में एक ऑफिस में मै काम करता था | उस क्षेत्र से रोजाना गुजरना पडता था | सींकचो के दरवाजो के उस पार चार पांच औरतो का झुण्ड जैसे कि कोइ कैदी हो और २० रू के ऑफर की आवाजे आज भी मेरे कानो में गूजती है | जब भी उस रोड से गुजरता था तो एक अजीब सी सहानुभूती पैदा होती थी उनके ऊपर | लेकिन जिंदगी की गाड़ी इतनी तेज गती से गुजर रही थी की इन बातो को सर झटक के आगे निकल जाना पडता था | चौक बाजार से सीधे जाने पर बरियावी भागल जैसा नाम था उस जगह का | आपकी लेखनी का एक एक शब्द हमारे लेवल से बहुत ऊपर है फिर भी टिप्पणी कर रहा हूँ |

    उत्तर देंहटाएं
  59. "मूर्तिया कभी शिकायत नहीं करती ...कही भी बैठ जाती है "...
    waah...

    late aaya hua..kshama uske liye.. ye aap hi likh sakte hain..kahani ko aisi jagah chodna ki uske baad bhi utsukta rahti hai ki kya hua hoga...lagta hai jaise picture abhi bakki hai..aur aapke jumle to bade bade lekhkon ko fail kar den..

    उत्तर देंहटाएं
  60. यकीन मानिए आपकी ही पोस्ट को पढ़ के ऐसा होता है अपनी कोई पुरानी बकवास सी कविता याद हो आती है, शायद अपनी सी लगती हैं आपकी कलम ,
    पिछली (ऊपर की) दो पोस्टों में भी अपने कुछ स्व विचार थोपे थे, यहाँ भी लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूँ...

    Title:Prostitute
    वो फुल तोडती,
    खुशबुएँ उससे लिपट जाती.
    उसने कहा तो था,
    चाँद से...
    तोड़ने आउंगी तुम्हें,
    और ओढ़ लुंगी तुम्हारी परछाई

    ..लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है...ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी.

    इस जिरह के साथ अपने को बाइज्ज़त बरी करता हूँ.

    उत्तर देंहटाएं
  61. Bahut hi driday vidarak aur marmik chintan!!
    kisi ne kaha tha ki ye (vaishyaen) samaj ki naliya hain jo samaj ko ganda hone se bachati hain...afsos ki bat hai ye ki inki svacchchhta tak ke bare mein samaj ne kabhi nahi socha!!

    Bahut achchha lekh hai apka...hardk sadhuvad!!

    उत्तर देंहटाएं
  62. आपके ब्लॉग पर पहली बार आई हूँ, आपकी पोस्ट को पढ़ा और काफी देर तक टिप्पणी के लिए सोंचती रही, वाकई बहुत ही हृद्यासप्र्द है आपके हर शब्द .......पर क्या जो हक़ीकत है उसे हम अपने आलेखों द्वारा हर सकते हैं, शायद नहीं | हर कोई कहेगा दुखद है, ये जो हो रहा नहीं होना चाहिए ,पर इसके लिए कोई कुछ समाधान भी नहीं ढूंड पा रहा ,कि ऐसे दलदल आखिर क्यों पनप कर बढ़ते जा रहे ,क्यों लड़कियां ऐसी जगहों में आकर फंस जाती हैं. शायद मेरी ये टिप्पणी स्वीकार्य ना हो ,पर जो विचार उठे mann में उस विचार को रखा मैंने डॉ. अनुराग हार्दिक आभार आपका ....

    उत्तर देंहटाएं
  63. Sir, I deliberately revisited this blog , its almost 10 years since your experience. I want to continue with the same

    मैंने फर्क देखा हे , "उस बदन पे सफ़ेद कुरता पजामा .गले में सोने की मोटी चैन ..... रुद्राक्ष की माला से गुंथी हुई है .भारी भरकम शरीर ...सबसे आगे वही है .शायद उनके लीडर.." की जगह अब तथा कथित रिसेर्चेर्स ने ले ली है , उस जगह का तो कोई ठिकाना नहीं रहा पर पुरे शहर में सोनिया मिल जाएगी , उसकी कहानी अब "ehtics के दुहाई देते हुए मसल लगाकर परोसी जाती है , शायद internation कांफेरेंसस और journals में , कुछ नहीं बदला है , मौसी , ऑटो वाले भाई की जगह अब पड़े लिखे समजदार लोग आ गए है , जो उन्हें अपनी academic भूख के लिए इस्तमाल करते है , हाँ अब सूरत में फिरंगी भी PhD के बहाने एन का इस्तमाल करतें है, so called reseachers अब दलालों की तरह काम करतें है , US से हर साल लोग आतें हैं दो--चार दिन की वोर्क्शोप करतें है.........दलाल हर साल नयी नयी सोनिया खोजतें है और उन्हें पेश करतें है , हाँ आपकी वाली सोनिया is now mother , उसका बच्चा , शायद उसका "पति" भी अब research ke kam aata hai , so called social research .और सोनिया अब लिंक वोर्केर बन गयी है , उसका काम सिर्फ एक है नए सोनिया को खोजना और उसे कोट Taee वाले भाई साहब ke samne pesh karna , जो सोनिया इस्तेमाल अब खुद को एक्सपर्ट इन HIV प्रोजेक्ट करने में करतें हैं ............

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  64. मूर्तिया कभी शिकायत नहीं करती कही भी बैठ जाती है आँख मूँद कर...

    ...................और हम उन्हें पूज कर अपना गिल्ट कम कर लेते हैं...

    यू भी कृत्रिम नैतिकताओं" के डाइमेंशन बड़े फ्लेक्सेबल है .किस दरो-दीवार की ऊंचाई कितनी रखनी है कब किसको खींच कर बड़ा करना है . सारे ऑप्शन खुले है !
    ....................आजकल आवो-हवा में कुछ ऐसा ही मंजर दीख रहा है...

    उत्तर देंहटाएं
  65. मूर्तिया कभी शिकायत नहीं करती कही भी बैठ जाती है आँख मूँद कर...

    ...................और हम उन्हें पूज कर अपना गिल्ट कम कर लेते हैं...

    यू भी कृत्रिम नैतिकताओं" के डाइमेंशन बड़े फ्लेक्सेबल है .किस दरो-दीवार की ऊंचाई कितनी रखनी है कब किसको खींच कर बड़ा करना है . सारे ऑप्शन खुले है !
    ....................आजकल आवो-हवा में कुछ ऐसा ही मंजर दीख रहा है...

    उत्तर देंहटाएं
  66. नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं?...

    उत्तर देंहटाएं

कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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