2010-02-05

पिछली तारीख के आइनों का डीप फ्रीजर

चिरकुट" दरअसल हमारे देश की एक नेशनल गाली का शिष्ट अनुवाद है ...हम इसके अविष्कारक को रोज मन ही मन सैल्यूट ठोक देते है ..कितना आसान है न गला फाड़ कर चिल्लाकर कहना ..."अबे चिरकुट"....कोई बुरा मानने से पहले पडोसी से पूछेगा "चिरकुट माने "?
कल रात हम उंघियाये से  हम वैसे ही  सिल्वेस्टर इस्टालिन  की एक मूवी देख रहे थे ..."डिमोलीशन मेन"  कई सालो बाद फ्रीज करके रखा पोलिस वाला ओपन किया  जाता है ..उस नए युग में  .जहां गाली देना अपराध है ......एक ठो गाली. पे फ़ौरन मशीन हरकत में आ जाती है .ओर आप पे जुर्माने की पर्ची कट जाती है ....सोचता हूं  गर हमारे यू. पी में वो मशीन आ जाये .तो ओवर लोड  से कुछ ही घंटे में क्रेश हो जायेगी...जहां दिन की शुरुआत ही...भेन ###...से होती है .....अगर पेशेंस  का  भी  कोई  नोबेल  प्राइज़  होता  तो यक़ीनन   हिन्दुस्तान के बस  ड्राईवरो  के पास कई ट्रोफी  जमा  होती ... ..कोई भी कही से निकल जाता है ...
एक ओर हाई -वे होता है ...दुनिया दारी का .....जिस  पे  चलने   के  लिए वैसे भी  जमीर को   स्टेपनी के टायर सा लटका  कर चलना पड़ता   है ..खुदा  भी  कोई  इंडिकेटर नहीं   देता ......कम ही लोग होते है ...जो अपनी  गड्डी  के पीछे लिखते  है "आपां तो ऐसे ही चलेगे "....
.खैर ......यूँ भी  साला  आदमी इच्छायो का डिवाइस है ....एक अभी ख़त्म नहीं होती के दूसरी सर उठाने लगती है .....शुक्र है ..यादो  का हैंगओवर  हेडेक  नहीं  करता ....पर  जल्दी नहीं उतरता .... 
आज वही है...... मारी लोबी के  ठीक बीचों बीच मुस्कराती हुई  बड़ी मेहनत से पैंट की हुई एक रिंग बेल थी .... , जिस पर ये लिखा था.... ‘.
keep your finger here and say loudly “ding-dong”…
मैं  अब भी  अक्सर उसे  दबा देता हूँ…....

ससे पहले मुलाकात कब हुई थी याद नही ,दोस्ती कैसी हुई .....ये भी याद नही वो मुझसे ४ साल सीनियर थे  उसके मुताबिक हम मे दो चीजे कॉमन थी एक तो नॉर्थ इंडियन होना दूसरा एरियन  होना ,मैं मार्च के आखिरी हफ्ते की पैदाइश हूँ ओर वो अप्रिल के पहले हफ्ते की.... बाकी हम दोनों में ओर कई बड़े अंतर थे मसलन के iq मे ….वो १४४ का लेकर पैदा हुए थे ओर हम सामान्य …खैर हमारी दोस्ती हुई ओर हमने उनसे उधार मांग कर खूब अंग्रेजी नोवल पढे ओर अंग्रेजी की जुदा -जुदा किस्मों की गालिया सीखी ....जब कभी हमारा फोरेन की सिगरेट पीने का मन होता हम उनके उपरी मंजिल के  कमरे में जा धमकते ..वे न केवल हमें एक ठो विदेसी सिगरेट पिलाते बल्कि हमारी बेहूदा कविताएं भी बड़ी तसल्ली से सुनते .....कहते है वक़्त ने सबकी स्क्रिप्ट लिख रखी है....हम  खामखाँ ही इतराते फिरते  है ...एक ही होस्टल की एक ही कॉलेज की अपनी अपनी जुदा दुनिया  होती है ..फिर उसकी .जुदा गलिया..अपनी अपनी गलियों में रुकते -गिरते- भागते -दौड़ते कुछ साल गुजर गये..........


उन्होंने उन हालात ओर उन वक्तों मे “ओर्थोपेडिक “ मे पी. जी मे ज्वाइन लिया ......जब इस ब्रांच मे जाना इराक मे युद्ध पर जाने जैसा ही था ,काम का बोझ ,सीनियरों की मार ,मानसिक प्रताड़ना ......नींद की कमी ,ओर तमाम अनगिनत दूसरे कारण थे जिसके मद्देनजर बहुत से लोग बीच मे ही डिपार्टमेंट छोड़ भाग जाते थे या अगले साल किसी दूसरी ब्रांच मे एडमिशन लेते थे । हम सब को लगा की ये दुबला पतला लड़का दम तोड़ देगा या भाग जायेगा.....कुछ महीनो की खामोशी के बाद ... अब आधी रात को होस्टल का फोन बजता (तब हॉस्पिटल ओर होस्टल के दरमियाँ इंटर कनेक्टेड फोन हुआ करता था..........

फोन पर उनकी फुसफुसाती हुई आवाज होती “ ,बहुत भूख लगी है ..... इतनी रातो को सूरत शहर मे दो ही जगह कुछ खाने को मिल सकता था या तो शहर के 5 सितारा होटल मे या रेलवे स्टेशन मे ...... तो  औकात के मुताबिक ५ किलोमीटर दूर रेलवे स्टेशन चुना जाता ..मेनू में सिर्फ अंडे की वेरायटी होती ......कोई भी दो जने कुछ लेकर आते , हॉस्पिटल की चोथी मंजिल पे सुनसान से गलियारे मे या किसी कोने मे वो पाव ओर ओम्लेट ठूस ठूस के खाते ओर गोल्ड -फ्लेक के इतने लंबे कश लेकर पीते.....जैसे फांसी पे चढ़े किसी कैदी को आखिरी सिगरेट दी जा राही हो....... तब उनके बदन से एक अजीब सी गंध आती.....यूँ भी हर वार्ड की अपनी एक गंध होती है उसके जिस्म मे भी वही होती ,...... ,उस दौरान भी उसका सेंस ऑफ़ ह्यूमर जिंदा रहता । “कोई शेर है इस मौके पे आर्या ? उन्होंने मुझे कभी अनुराग नही कहा आज भी नही बुलाते ..... फ़िर वे अंधेरे मे तेजी से घूम हो जाते.................


होस्टल के कमरों की चभिया या तो बाथरूम की दीवारों  पे ओंधी पड़ी मिलती है ..  .या खास कोनो  मे उंघती ...... दोस्तो को ठियो की ख़बर रहती.है .. ......कई बार जब हम कोई लेट मूवी देखकर लौटते तो फर्श पे एक गंधाई शर्ट मुंह चिडाती मिलती ...ओर अलमारी  से  कोई खाली हेंगर बिस्तर पर ...  ....ये वर्मा जी की आमद का साइन होता.......ओर ..मुश्किलों के ऐसे कई दौर  पी जी के जो  से गुजरने के बाद ....वे सीनियर हुए ...... फ़िर पास भी...हो गये ...... ओर नजदीक के कम आबादी  वाले उस शहर दमन के एक  हॉस्पिटल से जुड़ गये  … "ड्राई  -स्टेट" में रहने  के कारण   हम दोस्तों ने   उसे   "वेट सिटी "का  तक्खलुस  भी  दिया था ..... दिलजले ओर प्यार  में टूटे  आशिक वहां के दरिया में अक्सर अपना गम उड़ेल आते ..अलबत्ता गम में  अपनी अपनी केपिसिटी के मुताबिक किसी ओर चीज को भी मिक्स करते ......खैर

क़्त ने  फिर  पहिया  घुमाया .... ओर हमने पी .जी ज्वाइन की , इधर पिताश्री रोज हमे कोई नया रिश्ता बताते ओर हम रोज उसमे कोई नुक्स निकालकर मना कर देते ,  जब हम में ओर पिताश्री मे  फोनिया कोल्ड- वार शुरू होकर लम्बी खिंची तो एज यूजवल माताश्री ने  संधि दूत के  अपने रोल  में एंट्री ली ... .....ओर हमने उस शान्ति -प्रक्रिया के तहत एक लड़की से मिलने की हामी भर दी.....पता लगा लड़की दमन में है....... …. …..हमें लड़की से ज्यादा वर्मा जी से मिलने की उत्सुकता थी.....वर्मा जी होटल की उस औपचारिक मुलाकात में हमारे साथ रहे .....  ...  
वापसी में हम दोनों डगमगाते हुए उनकी फटफटिया पे उनके नए नए खरीदे फ्लेट पे पहुंचे....चूंकि भाभी श्री अपनी पी. जी के सिलसिले मे कही ओर  थी , तो वर्मा जी भी" बेचुलराई- जीवन" का आनंद ले रहे थे ..  ,उन्होंने महँगी वाइन खोली ....फर्श पे गद्दा डाला..ओर होस्टल की पुरानी रवायत के मुताबिक .जगजीत सिंह  भी महफ़िल में शरीक हुए ....कुछ पुरानी ओर नयी यादो के कोकटेल बना....गोल्ड फ्लेक  की फेक्ट्री से निकले  धुंए फेफड़ो में भीतर  गये ...  ...फ़िर अचानक हमारे वर्मा जी उठे ओर बोले “चल “.....वे आगे आगे हम उनके पीछे -पीछे .....वे दूसरे कमरे के दरवाजे पे खड़े हुए..एक बड़ा ताला हमारे ओर  कमरे के दरमियां था ...कुछ देर ताले से जूझने के बाद  दरवाजा खुला  ..पूरा कमरा खाली ..  बीचों-बीच एक काले रंग का बड़ा सा सूटकेस.......उन्होंने उसे खोला ..वही हरे कागज जो  दुनिया चलाते है .....
"आर्या जितने चाहिए ले ले "मैं हंस पड़ा था ,...वर्मा जी सेंटिया गये थे .....
.बकोल उनके  "सेंटियाना" एरियन  के   जींस  में  होता  है ...ओर उसके जन्म प्रमाण पत्र में बोल्ड अक्षरों से लिखा हुआ ...... 
ब्रेकेट  में .कहूं तो  .....हम दोनों   एरियन  है  
वो किसी फ़िल्मी शोट के माफिक था ....पर बिलकुल सच्चा ....खालिस सच्चा .....
वर्मा जी मेहनती थे ,अपनी काबिलयत के कारण जल्दी ही ख्याति पा गए ओर अच्छी खासी प्रक्टिस भी अर्जित कर ली...पर जैसा की अक्सर होता है
यरपोर्ट से फोन करना उनकी फितरत है ....खास तौर से तब जब वे देश छोड़कर परदेस जा रहे होते है ..
एक  दिन  मोबाइल बज उठा
“यार बाहर जा रहा हूँ
“क्यों ?इतनी अच्छी प्रक्टिस छोड़ कर ?
बस कुछ ओर करना  है
कुछ लोग  लोग मूडी होते है ओर बैचेन भी....   ."आपां तो ऐसे ही चलेगे " .वाले .ओर वर्मा जी उड़ लिए ...“,........कुछ साल वहां बिताकर अहमदाबाद के अपोलो मे ज्वाइन किया ही था की ...
फिर एक रोज उनका फोन आया “जा रहा हूँ”
कहाँ पूछना.. सवाल को पूरा करने की रस्म भर  होता है ....
ओर वर्मा जी ब्रिटेन उड़ लिए .अब सुना है  ..... परमानेंटली वही बसने जा रहे है ...
 
न हाल -चाल पूछा ना सलाम किया
जाने क्या बदल गया मेरी सूरत मे ......


पिछली तारीख के आइने बेखबर हो गये

72 टिप्‍पणियां:

  1. अनुराग जी,
    कुछ लिखते नही बन रहा, बस यही कह सकता हूं कि...
    कुछ नही.. कुछ नही..

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  2. डिमोलिशन मैन बड़ी अच्छी फिल्म लगी थी मुझे, एक तो हीरो पसंदीदा था, उसपर कहानी भी अच्छी लगी...पर इस डीप फ्रिज से आप ऐसी यादें निकल लेंगे कौन सोच सकता है.आपकी हर पोस्ट में कुछ ऐसी लाइनें होती हैं, कि एक जगह लिख रख दीवार पर टांग दी जाए मसलन "यादो का हैंगओवर हेडेक नहीं करता".

    बहुत सी यादों में घुमा देती है आपकी पोस्ट, हर बार. हम भी यादों के डीप फ्रिज से कोई याद निकाल के चुस्की ले रहे हैं.

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  3. वक़्त ने सबकी स्क्रिप्ट लिख रखी है....हम खामखाँ ही इतराते फिरते है !!!कितना सही कहा ....
    .
    .
    वैसे सेंटियाना भी अपने में कमाल की ऊर्जा देती है कभी कभी ,वो ऊर्जा शायाद कभी बिना सेंतियापे के आपको छूं भी न सके !!

    वैसे मुझे लगता है अक्सर हर मानुष वर्मा जी की ही तरह होते हैं ! कुछ अपनी अटेची बाँध के नए घरौंदे और नए आसमां कि तलाश जारी रखते हैं और कुछ अपनी यात्रा को वक़्त की नदी की धार में हिलोले खाने के लिए छोड़ देते हैं !!

    "डॉ साहब ऐसा लगा जैसे लेख का पहले वाला हिस्सा ठीक से अपने लिए जगह नहीं तलाश पाया !!

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  4. लिखने का अंदाज काफी दिलचस्प है आपका !

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  5. what to say boss... you always take me to those places and make me meet all old folks ,which usually comes once in a month kind of dreams - life has got its own wheels and so does the memories ... but there is a big difference. at least for me , i prefer to live with my memories , rather than with the life..

    the world is full of all kind of people and i believe that i came across mostly good people ,who left a mark on my heart...

    after reading your post as usual .. the eyes are moist and i am holding my tears not to roll down, after all they belong to the good people in my life..

    anuraag ji , well, there a whole life full of such memories, , nothing more can be said now..

    just few words...na thanks kahunga , na kuch aur.. bus .

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  6. वक़्त ने सबकी स्क्रिप्ट लिख रखी है....हम खामखाँ ही इतराते फिरते है . यह बात तो समझ में आ रहा है. लेकिन आइना बेखबर हुआ, उदास हुआ. ये नहीं होता है. वक़्त के साथ असर कम या ज्यादा होता है. अक्सर आइना दिखाने वाले आइना नहीं होते.

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  7. पुरानी दो-तीन पोस्टों का मिक्स-अप एकसाथ पढ़ने को मिला. हालाँकि ये सब आपके ब्लॉग पर पहले से पढ़ चुका हूँ लेकिन दोबारा पढ़कर अच्छा लगा.

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  8. आपकी पोस्ट में इतने किस्से इतनी यादें होती हैं कि डूबे बिना रहा नहीं जा सकता।
    त्रिवेणी हर बार की तरह बेहतरीन

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  9. आप बस यह कीजिये कि अपने इन सभी स्मृति कोशों को पन्नो पर सजाकर एक पुस्तक छपवा लीजिये...मैं दावे के साथ कह सकती हूँ कि किसी भी हिट फिल्म से बड़ी हिट यह होगी...
    आप ऐसे चित्र खींच देते हैं कि पाठक खुद को भूल कर उसका हिस्सा बन सब प्रत्यक्ष देखने लगता है....

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  10. "आपां तो ऐसे ही चलेगे"

    काश मैं भी इन डाक्टर साहब सा हो पाता!

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  11. वाह बोस यूं वापिस पूरी एम बी बी एस करवा दी आपने ...लगता है मैडीकल होस्टल्स की पटकथाएं रामूं की फैक्ट्री की तरह एकही टैबल पर रची गई हैं......

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  12. likhne ka andaz bahut khoobsoorat hai...bahut achcha laga padhkar

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  13. बड़ी अच्छी लगती हैं....आपकी ये डीप फ्रीज्ड यादें...जो आपके उन गुज़रे दरीचों तक ले जाती हैं....very nice

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  14. यादों को संजोना तो महत्वपूर्ण है ही लेकिन दिल के अन्दर से निकालकर प्रस्तुत करना वह भी खूबसूरती के साथ और भी महत्वपूर्ण है, जिसमें कि आपको महारत हासिल है.

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  15. अभी बस यूं ही देख लिया आपके पोस्ट को ताकि सनद रहे की रात में कुछ पढ़ना है.. यहाँ किये गए कमेन्ट के बाद आते हुए मेल बताते रहेंगे.. अभी समय की कुछ कमी है.. फिर आता हूँ..

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  16. कमाल के इंसान लगे वर्मा जी...वाह..आपकी कलम की छुवन से उन्हें नयी ज़िन्दगी मिल गयी...दिलचस्प वृतांत...आपके पास जो यादों का खज़ाना है वो अद्भुत है और आपने उन्हें गज़ब का सम्भाल के रखा है...इजिप्शियन ममी की तरह जिसमें आपकी लखनी जब चाहे प्राण फूंक देती है...कमाल है जी कमाल...
    नीरज

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  17. एक ही पोस्ट मे इतना कुछ शायद ये हुनर आपमे ही है। क्या कहें हम भी जा रहे हैं मगर शुभकामनायें दे कर

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  18. Verma ji ke saath aapki in purani smritiyon mein bhatakna achchha laga.

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  19. सिर्फ़ एक बार ..एक बार ऐसे ही शब्द मै पिरोऊ .लेकिन मै जानता हूं मै डा.अनुराग नही

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  20. Kya baat hai....Aapka andaz-e baya hi nirala hai!! Aatit ke aaine me sanjoi hui yaado ko itane rochak dhang se pesh kiya hai.....Aabhar!!
    http://kavyamanjusha.blogspot.com/

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  21. आपने अच्छा तरीका ढूँढा है किस्त में autobiography लिखने का ! कब छपवा रहे हैं ?

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  22. हां, पुराने दिनों को याद करना सचमुच बहुत सुकून देता है....ताज़गी भी. आभार.

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  23. अभी थोड़ी ही देर हुई जब हम अपनी यादों का पिटारा अपने किसी मित्र के औरकुट प्रोफाइल के फोटो में ढूंढ रहे थे.. कहीं मिला नहीं.. गुम हुआ सा लगा.. शायद मिला भी हो तो अब हम ही अजनबी हो चले हों.. यहाँ से फिर उधर का ही रूख कर रहा हूँ.. अबकी पहचानने का जज्बा साथ लिए हुए हैं..

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  24. आपकी पोस्ट यहीं - कहीं , आस - पास से गुजरती हैं ...मन और आँखों में समा बाँध देती हैं..
    कई वाक्य ओरिजनल, वज़नदार और लाजवाब हैं.. उनके पास अनुरागी होने का पेटेंट है...

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  25. वाकई में आपका डीप फ्रीजर बहुत उम्‍दा किस्‍म का है , निकालने पर हर चीज बिल्‍कुल ताजी दिखती है । और स्‍वाद भी लाजवाब रहता है ।

    न हाल -चाल पूछा ना सलाम किया
    जाने क्या बदल गया मेरी सूरत मे ......
    पिछली तारीख के आइने बेखबर हो गये

    "यादो का हैंगओवर हेडेक नहीं करता" हर बार कुछ कोट मिल जाते हैं, डायलॉग मारने के लिए ।

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  26. पहले तो ईमानदारी से बताये" चिरकुट " का अर्थ हमारे गर्ल्स होस्टल में किसी को पता नहीं था हमने डिक्शनरिया खोली फिर देर रात कमरे में छह लडकिया जमा हुई ओर "नेशनल गाली "कौन सी होगी के कयास लगाये गए ,हर कयास पर ठहाका लगता था .लडकियों के मुंह से इतनी गलिया सारा जुर्म आपके माथे पर .
    इस बार के अनुरागिश

    जमीर को स्टेपनी के टायर सा लटका कर चलना पड़ता है ..खुदा भी कोई इंडिकेटर नहीं देता ......कम ही लोग होते है ...जो अपनी गड्डी के पीछे लिखते है "आपां तो ऐसे ही चलेगे "....

    आदमी इच्छायो का डिवाइस है ....
    ३.वक़्त ने सबकी स्क्रिप्ट लिख रखी है....हम खामखाँ ही इतराते फिरते है ...
    ४.एक ही होस्टल की एक ही कॉलेज की अपनी अपनी जुदा दुनिया होती है ..फिर उसकी .जुदा गलिया..
    इस पे तालिया
    ५.होस्टल के कमरों की चभिया या तो बाथरूम की दीवारों पे ओंधी पड़ी मिलती है .. .या खास कोनो मे उंघती ...... दोस्तो को ठियो की ख़बर रहती.है .. .

    आप राज खोल रहे है होटलों के .
    ६.वही हरे कागज जो दुनिया चलाते है .....
    ७.सेंटियाना" एरियन के जींस में होता है ...ओर उसके जन्म प्रमाण पत्र में बोल्ड अक्षरों से लिखा हुआ ......

    हम तो एरियन नहीं है फिर भी ?कोई डिफेक्ट है क्या ?
    ८.
    ."आपां तो ऐसे ही चलेगे "

    उत्तर देंहटाएं
  27. कृपया
    "आप राज खोल रहे है होस्टलो के" .पढ़ा जाए .

    आप लड़की से मुलाकात वाला हिस्सा सफाई से गोल कर गये. ये भी के नुक्स क्यों निकालकर मना कर देते थे

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  28. पोस्ट नहीं पढ़ी अभी... बस नीलिमा के कमेन्ट पढ़ कर जा रहा हूँ... बस इतना बता दूँ कि "हम भी नीलिमा से कम बड़े फैन नहीं हैं आपके "

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  29. हम तो नीलिमा के ही फैन है.. आपकी पोस्ट पर नीलिमा के कमेंट्स पढ़ना जैसे पिज्जा हट के पिज्जा पर चीजी बाईट्स लगे हो..

    बाकी बाते फुर्सत से अभी टेम नहीं है..

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  30. ***'वक़्त ने सबकी स्क्रिप्ट लिख रखी है'
    कितनी सच्ची बात कही है आप ने.
    -संस्मरण पढ़ा..नये शब्द भी मिले जैसे--'बेचुलराई- जीवन'
    -'-कुछ लोग लोग मूडी होते है ओर बैचेन भी..-'
    आप बहुत गहनता से दूसरों को पढ़ते हैं..उतनीही कुशलता से उनको लिखते भी हैं..
    त्रिवेणी लाजवाब है...

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  31. अच्छे ब्लॉग मैं घूँट घूँट कर पढ़ती हूँ.
    जैसे सर्दी की रात काली कॉफ़ी घूँट घूँट करके पी जाती है.

    आदमी इच्छायो का डिवाइस है ....एक अभी ख़त्म नहीं होती के दूसरी सर उठाने लगती है,
    और उसपे ये सितम के इच्छायो से मुक्ति का कोई रास्ता भी नहीं.


    उससे पहले मुलाकात कब हुई थी याद नही ,दोस्ती कैसी हुई .....ये भी याद नही,
    यादें भी अजीब होती अक्सर याद ही नहीं रहती.

    कहते है वक़्त ने सबकी स्क्रिप्ट लिख रखी है....हम खामखाँ ही इतराते फिरते है ..
    nothing stands before time and tides ..

    कुछ लोग लोग मूडी होते है ओर बैचेन भी.... ."आपां तो ऐसे ही चलेगे " .वाले .ओर वर्मा जी उड़ लिए .

    कभी लौट आये तो पूछना नहीं,
    देखना उन्हें गौर से,
    जिन्हें रास्तो पे खबर हुई
    के ये रास्ता कोई और है..


    न हाल -चाल पूछा ना सलाम किया
    जाने क्या बदल गया मेरी सूरत मे ......


    पिछली तारीख के आइने बेखबर हो गये

    awesome

    अहमद फराज़..
    तूं भी हीरे से बन गया पत्थर ,
    हम भी कल जाने क्या से क्या हो जाये..

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  32. बहुत खूब ..........आपके कहने का अंदाज निराला है .

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  33. हेलो डाक्टर दिल की चोरी हो गयी...का मरीज आप ही के यहाँ आया होगा.

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  34. पता नही आपके Dictionary में चिरकुट का अर्थ क्या होगा, मराढी में पटे पुराने कपडे को चिरगुट कहते हैं । तो शायद चिरकुट भी किसी को उसकी औकात दिखाने को ही कहा जाता हो पर है तो ये मुंबईया गाली ।
    वर्माजी से मिलकर अच्छा लगा ।

    न हाल -चाल पूछा ना सलाम किया
    जाने क्या बदल गया मेरी सूरत मे ......

    पिछली तारीख के आइने बेखबर हो गये
    आपकी त्रिवेणी तो लाजवाब ।

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  35. कृपया,
    मराठी में फटे
    पढें ।

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  36. दो दिन लटकाये रहे इसे अपने लैपटाप पर! अब सोचा पढ़ा ही जाये। पढ़ भी गये।
    पढ़ते हुये जो मुस्कराना शुरु किये तो अभी तक मुस्करा रहे हैं!आखिर न्यूटन साहब के जड़त्व के नियम की इज्जत भी तो करनी है!

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  37. डॉक्टर साब, किसी ने आपसे बल्कि कईयों ने आपसे ज़रुर और कई बार कहा होगा कि आप बहुत अच्छा लिखते हैं। चलिए सत्य का उद्घाटन ेक बार और सही..। भाई साब बेहतरीन और बेशकीमती लिखते हैं आप.. दिल की बात उड़ेल कर रख दी। लेकिन जैसा कि नीलिमा जी ने फरमाया है आप भावनाओं में दो चीज़े-और बेहद अहम चीज़े - गोल कर गए।

    इटली के बड़े फिल्मकार हुए हैं, फैलिनी। उनने कहीं लिखा था कि किसी फिल्म में अगर कभी कहीं टंगी बंदूक दिखे तो फिल्म में कहीं न कहीं, कभी न कभी उस बंदूक का इस्तेमाल भी होना चाहिए। तो उस लड़की का-जिससे आप मिलने गए थे, और उस नुक्स के बारे में बताएं, जिसकी वजह से आप रिश्ते गोलिआ देते रहे? उम्मीद है कि प्रति-टिप्पण आवेगी और आप राज़ खोलेंगे।
    सादर

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  38. ha ha ha "आपां तो ऐसे ही चलेगे"... :)
    Hum bhi April ke pahle hafte ki paidaish hain, aaj garv ho raha hai :)
    sentiyana sach mein arians ki jeans mein hota hai...aur ye avastha kabhi bhi aa sakti hai :) Best of luck for him...

    14th feb ke kya plans hain? wo kab bateyenge :D

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  39. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  40. aur Neelima jo ko full support.. Wasie ek post Bhabhi ji ke naam ki bhi aani chhaiye :P 14th Feb ko expect karen :D?
    ye kahani bhi sunni hai humein...apke jaisi hi cold war stage mein hum bhi hain..deadlines di ja chuki hain..par Arians aife kaiffe haath aayenge kisi ke.. humein bhi UD ke bhaag jana hai...

    Bhabhi ji wali kahani mujhe sunni hai ki aap log kaise mile? Might be it can inspire me into something.. we never know :D I am looking forward to it..

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  41. सिल्वेस्टर स्टेलॉन की डिमॉलिशनमैन की खूब याद दिलाई।
    अपन भी उसके फैन हैं।

    कुछ यही हम भी कह सकते हैं...यही गति अपनी भी है।
    अब इस उम्र में क्या ख़ाक़ मुसलमां होगे...

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  42. ना जाने कितने लोग रोज इस देश से जाते होंगे...आप बेहिसाब जुडे होंगे उनसे कि इतनी अच्छी त्रिवेनी के साथ इतना सेंटी पेन को भी बना दिया.....

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  43. सफर में हूँ तो पोस्ट रुक-रुक कर पढ़ रहा हूँ। फिलहाल तो सिलवेस्टर की गालियों पर सैंड्रा बुलौक की दबी-दबी हँसी पर थमक गया हूँ।

    खुदा ने भी लगता है एक ही "आर्या" बना कर छोड़ दिया है। दूजा ढ़ूंढ़े से नहीं मिलेगा पूरे जहान में। पोस्ट के शेष हिस्से के लिये अलग से आता हूँ।

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  44. अभी परसों ही हमने बेचुल्रई जीवन का आनंद लिया... यहाँ जिस तरह से गिरहें खुलती हैं और बदन पर के कांटे मुलायम बनते हैं वो अद्भुत है, यह सही है की यहाँ जीवन बेतरतीब जैसा चलता है लेकिन खुद में एक इतिहास समेटे हुए रहता है... अमूमन हमारे बिस्तर के पास ही सारी चीजें मिलेंगी... पानी के बोतल से लेकर माचिस तक... ४-५ सिम कार्ड से लेकर किताबें तक... और इस बीच कभी फ़ोन खोजना और रिमोट खोजना एक चुनौती पूर्ण कार्य लगता है... बेसिन में विविध प्रकार के पाउच, शेविंग किट, कुल मिलकर गड्ड-मड्ड वाली स्थिति...

    मुझे लगता है आपके पास मन समझने का मनोविज्ञान है अपनी दृष्टि से उसे देखते हैं... साथ ही कुछ बचा भी लेते हैं... वर्मा जी में अपना भी अक्स दिखा...

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  45. "जो आदमी सेंटी होता है वो जल्दी ही मेंटल भी हो जाता है" ---- पूजा
    किन्तु pieses तो सेंटीमेंटल ही होते हैं...

    वक़्त के साथ अपना भी फिलोसफी यही हो गया है - अपुन तो ऐसे ही चलेगा!
    किन्तु सोचता हूँ क्या हमारे स्क्रिप्ट में संसोधन की गुंजाईश है? काश अपनी "प्रदर्शित फिल्म" री-एडिट कर सकता !!!!

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  46. यूँ भी साला आदमी इच्छायो का डिवाइस है ....एक अभी ख़त्म नहीं होती के दूसरी सर उठाने लगती है ....
    sab to aapne hi kah diya, ham kya kahein..

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  47. .... वो पैसों का क्‍या हुआ... :)


    तो इस तरह मिल लिए आपके एक और दोस्‍त से.. पहले अपने भाई के स्‍कूटर पर पुरानी जींस पहनने वाला मिला था... अभी उसकी यादें भी कम नहीं हुई कि दूसरी थमा दी...

    बताते रहिएगा... हम भी जानेंगे कि कैसे कैसे लोग होते हैं दुनिया में...

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  48. हरियाणा से डेल्ही एयरपोर्ट के रस्ते ....जी टी रोड से थोडा आगे एक टेम्पो दिखा था ...उसके पीछे लिखा था ".आपां तो ऐसे ही चलेंगे "..एक दम फ्लेश किया था....ओर स्टोर हो गया था ...दिमाग में भी ओर दिल विच भी.....
    होस्टल में आठ नौ साल आपको कई किरदार देते है हर किरदार के पास अपनी एक कहानी होती है ......यूँ भी अपनी जिंदगी में खुदा ने जिस मामले में दिल खोलकर बरकत दी है वो है .... दोस्तों की ....ओर उसमे भी तीन चार लोग ऐसे है जिनके पास बड़ा वाला आई क्यु था ....१४४ वोल्ट वाला .....तीन उसमे मस्त थे ......एक थोडा गंभीर.....इत्तेफाक से दो उसमे रेडियो लोजिस्ट है .....वर्मा जी दिलदार आदमी है ...मुझे याद है उनकी लोबी सबसे ऊपर थी ...उसी लोबी में एक साहब थे ...स्टाइलिश कही दूर दराज दार्जिलिंग एरिये के ...कपडे .मोटर साइकिल सब कुछ स्टाइलिश ..सिगरेट को वो "फेग" कहते .....खास तरीके से हिंदी बोलते ऐसे की लगता .कोई अंग्रेज हिंदी बोल रहा है....होस्टल में अक्सर एक इमरजेंसी स्टोक रहता है सिगरेट का ....ठूंठो की बारी आने से पहले ....वे मांगते तो वर्मा जी स्टोक में से निकल कर देते...उनके रूम पार्टनर नाराज होते....तो वे कहते .....यार मना नहीं कर सकता ....."फेग" सुनकर रोक नहीं पाया ... .....वर्मा जी तीन कंट्री घूम चुके है .जब प्रेक्टिस छोड़ी तो लाखो अर्न कर रहे थे ..मुझमे ऐसा हौसला नहीं है ....नयी जगह .नयी दुनिया में जाकर आज़माइश करने का ...
    अब सिगरेट कम हो गयी है .लगभग ख़त्म सी .किसी पुराने दोस्त के मिलने पर जलती है या किसी पसंदीदा शख्स से पहली मुलाकात के बाद ......
    @नीलिमा ......
    कंप्यूटर ने दुनिया बहुत छोटी कर दी है इत्ती के आने वाले वक़्त में आने वाली पीढ़िया एक दूसरे को बताएगी के देख ...तेरे दादा जी ने चौथी क्लास में कंचे खेले थे ...ओर दसवी में क्लास बंक करके पिक्चर देखी थी .....यानी उस दुनिया के कई हिडन फोल्डर रहने चाहिए ......गोया के तब जब उनका ताल्लुक किसी दूसरे से है ...अब आप समझे @गुस्ताख जी
    .खाकसार की मजबूरी....
    @पंकज.........
    पिता जी से वो अबोला इस मुलाकात के बाद भी रहा .मै फोन करता वे उठाये रहते काटते नहीं ....फिर मम्मी आती ...पर हम भी जिद्दी थे ..उसकी एक लम्बीदास्तान है ...
    १४ फ़रवरी ...डरते डरते असली बीवी के साथ कही डिनर करेगे ..सबूत के तौर पर आर्यन को रखेगे के कही कोई सेना आकर न थाम ले के इस तारीख को डिनर कर रहे हो......शुक्र है शादी इस तारीख को करने दी .....

    @सागर
    sari दिक्कत इस फिल्म के साथ यही है के री- एडिट नहीं होती ....
    @सिदार्थ जी....
    मै लिखने बैठा तो हर शख्स के पास एक दास्तान मिली......
    .

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  49. इसी वीकेंड लखनऊ कानपुर में था. सबसे ज्यादा समय गाडी में ही गुजरा. तो गाली के साथ होर्न बजाने की बात भी खूब दिखी. एक और बात मेरे दोस्त ने बताई यूपी के कुत्ते बड़े एडवेंचरस होते हैं. कानपुर लखनऊ के बीच में उन्होंने दिखाया कितने सड़क पार कर रहे थे और कितने इस कोशिश में शहीद हुए थे. आज कल अपने एक भाई (दोस्त की जगह भाई सही रहेगा) मम्मी-पापा के फ़ोन से परेशान हैं. शरीफ टाइप के हैं... तो कोर्ट मैरेज करना नहीं चाहते और घर वाले... ! किसी दिन एयरपोर्ट से आपको फ़ोन करता हूँ.... होस्टल, स्टेशन का खाना.... कैसे कहूं की पोस्ट में अपनी ही बातें नहीं है.

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  50. चिरकुट" दरअसल हमारे देश की एक नेशनल गाली का शिष्ट अनुवाद है....
    ये बढ़िया लगा...पूरी पोस्ट अच्छी लगी..अंत में ये त्रिवेणी भी पसंद आई...

    न हाल चाल पूछा न सलाम किया
    जाने क्या बदल गया मेरी सूरत में

    पिछली तारीख के आईने बेखबर हो गए..

    Nishant...

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  51. ..."डिमोलीशन मेन"

    अपनी ऑफिस की कैब में बैठा था....
    किसी वजह से गाली निकल गयी...
    "इनकी माँ का...
    साले गाड़ी चलते हैं या..."
    "एक्सक्यूज़ मी, देखते नहीं आपके बगल में लड़की बैठी है आप अबयूसिव लंग्वेज़ यूज़ कर रहे हैं?"
    "मै'म विथ ड्यू अपोलोजीज़ अगर में ये गाली फ्रेंच में या रशियन में देता तो क्या आप समझ पाती?"
    तो सर मैंने पहले ही कहा था कि दुनियाँ में दो तरीके के लोग होते हैं, एक अच्छे और एक जो मानते हैं की वो बुरे हैं.

    ऐसे ही मूवी मुझे भी याद आ रही है (शायद यही हो) , और याद आ रहा है, उस संभ्रांत सी सभ्यता के नीचे चूहे का बर्गर खाने वाली सामानांतर सभ्यता. वैसे अंततोगत्वा उसी 'चूहे का बर्गर सभ्यता' ने सर्वाइव किया था.

    TBC....

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  52. triveni achchhi thi yadon ki film samjhne ke lie bhi kalpansheelta prayog me lani padti hai. shukra hai aappko padhte padhte thodi bahut mil gai hai

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  53. सुना है आज आपकी शादी की सालगिरह है ।बहुत बहुत बधाई और आशीर्वाद ।

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  54. जहाँ तक मेरा ख्याल है, अभी इस वक्त कहीं डिनर पे आउट होंगे आप जैसा कि बताया था आप्ने...सेलेब्रेशन-टाइम!!!

    विश यू आल द गुड विशेज फार द स्पेशल डे!

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  55. Anurag bhai mujhe pahichante to honge nahin.. :)
    hardik shubhkamnayen...
    vaise mere liye wo sabhi log khas hi hote hain jinki marriage anniverseries is din padti hain..
    Jai Hind...

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  56. पिछली तारीख के आईने बेखबर नहीं हैं .....लीजिये हालचाल भी पूछ लिया ....और सलाम भी करके जा रहे हैं .....और हाँ वर्षगांठ ढेरों शुभकामनाएं .......!!

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  57. आपका लेखन आत्मग्रस्त और व्यक्तिवादी विचारधारा से मुक्त है ...व्यक्ति के सुख-दुःख के बडबोलेपन से हटकर .....यही बात है जो दूसरे लेखन से आपको जुदा रखती है,अपने परिवेश को अधिक आत्मीयता और नजदीक से खोजना -परखना ...बोध के स्तर पर जाकर अपने अतीत को काटकर साहसी लेखन ..एक अनवरत तस्वीर की आँख ही बंद ना हो ...यकीन करें जब भी किसी अखबार में पुनह लिखना शुरू करूंगी आपके ब्लॉग की चर्चा सबसे पहले होगी....बधाई .....

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  58. मानसविज्ञान में देजा-वू नाम कि एक मानसिक स्थिति होती है...स्वतंत्रता बनाम संस्कृति पर आपका कमेन्ट देखकर..मैं कुछ पल के लिए इस स्थिति से गुज़रा....या दूसरा पक्ष कहूँ कि "गोया यह भी मेरे दिल में है"... नया लेख नहीं आया...इंतज़ार है...

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  59. kya pata kyu kaise sab khota jaa raha hai
    zindgi aage badh rahi hai aur peeche sab dhuaan hai
    sab dhundhla
    shayad kuch hai hi nahi yaa phir dikhayi nahi deta
    aur ho bhi kyun ? kiske liye ho ? log jo aage nikal gaye hain wo bhi to kabhi mud kar dekhte hi nahi

    rishte kaise kab badal jaate hain waqayi pata nahi chalta

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  60. ohh main to late ho gayi
    mujhe to pata hi nahi tha ki aapko 14th feb ko chori kiya gaya tha...........

    bahut bahut badhayi
    aur sukhad jeevan ke liye hardik shubhkamnaayen

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  61. चिरन्जीव अनुराग,
    यह कहने की कोई आवश्यकता नहीँ है कि तुम्हारे पोस्ट अत्यन्त भावुकता पूर्ण तथा मानवीय सम्वदेनाओँ से परिपूर्ण होते हैँ। ऍसे ही लिखते रहो। नन्हे आर्यन को ढेर सा प्यार

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  62. वर्मा जी की दास्ताँ पढ़ते हुए हुसैन बंधुओं को सुन रहा हूँ, "मैं हवा हूँ, कहाँ वतन मेरा..."

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  63. न हाल -चाल पूछा ना सलाम किया
    जाने क्या बदल गया मेरी सूरत मे.
    पिछली तारीख के आइने बेखबर हो गये

    Anurag sir this is one of your best trevenis.

    आइना और इससे जुडी philosophy मुझे हमेशा ही fascinate करती है.

    अक्स शायद बदल गया मेरा,
    आइना बेवफा नहीं होता.
    या फ़िर...
    बाल हैं बिखरे हुए चेहरा शिकन आलूद है
    आईने मुझसे तेरी यूँ बेरुखी अच्छी नहीं।

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  64. "आपां तो ऐसे ही चलेगे "
    एक गाना याद आता है..मगर बोल नही याद आते..
    आश्चर्य नही होता जब वर्मा जी सत्तू बाँध कर ऐंवे ही निकल पड़ते हैं....वक्र्त के हाइवे का एक खास मोड़, एक टर्न आता है जब अचानक हम जिंदगी की गाड़ी हाइवे से उतार कर किसी गली के अंदर ठेल देते हैं..जिसमे जी पी एस काम नही करता.!.मैं जिंदगी के इस मुकाम को ’द होली मूमेंट ऑफ़ इमेंसिपेशन’ कहता हूँ!..और अगर कन्फ़ेस करूँ तो अपनी जिंदगी मे हर वक्त इस मोमेंट का इंतजार करता रहता हूँ..अभी भी..मगर कभी-कभी लगता है कि जिंदगी की गिरफ़्त अज़गर की तरह होती है..हम जितना छूटने की कोशिश मे हाथ-पाँव फ़ेंकते हैं वो अपना शिकंजा उतना ही कसती जाती है..और जब हम परिस्थितियों का नाम मजबूरी कह कर ’सरेंडर’ कर देते हैं..फिर वो आराम से हमें बिना जल्दबाजी के उदरस्थ करती रहती है..बहुत कम लोग होते हैं वर्मा जी सरीखे जो इस पकड़ से भाग पाते हैं..और उस पर ’मदर ऑव आइरॉनी’ मुझे यह लगती है कि कहीं-कहीं हमारी जिंदगी की फ़ितरत भी आपके वर्मा जी की तरह होती है..जो ठीक उसी समय बेड़ियाँ तोड़ डाइनिंग टेबल से भाग खड़ी होती है.जब कि दस्तर्ख्वान पर किंग-साइज लंच सज रहा होता है..जिसे जुटाने की खातिर हमने सारी उम्र उन्ही बेड़ियों के हवाले कर दी होती है..
    ...हमें लाइफ़-दी-गड्डी के पीछे लगा साइनबोर्ड नही पढ़ आता..
    "आपां तो ऐसे ही चलेगे "

    ..बस ऐंवे ही..

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  65. और हाँ एक बात याद थी २ महीने से..कभी एक नॉवेल पढ़ा था ’कुरु कुरु स्वाहा’ जिसे पढ़ कर हिंदुस्तान की
    नेशनल यूनिफ़ार्म’ पता चली थी..आपको पढ़ कर मुल्क की नेशनल गाली पता चली..वैसे मतलब तो पल्ले नही पड़ा कभी..मगर गालियाँ हमेशा मतलब के लिये पाबंद नही होती..है ना?

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कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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