2010-02-19

एक चौरस खिड़की...वक़्त की उस डोर का सिरा अब भी थामे बैठी है .....

पैर के  नीचे तकिये को ठीक करके मैने उचककर  उस  खिड़की से नीचे झाँकने की कोशिश की है  .....एक पतंग  कटकर गिरी है ....बड़ी वाली.गिलासटा ..दो मिनट हो गए है कोई लेने नहीं आया ....पिछले दस दिन से वही खिड़की  मेरी बाहरी  दुनिया है ... प्लास्टर के नीचे खुजली बहुत लगती  है .मै स्केल लेकर  खुजाता हूं ...मां अभी भी काम से लगी है   .जब से  पैर  में प्लास्टर चढ़ा है वो मुझे ज्यादा प्यार करने लगी है ...ग्लूकोज़ के बिस्किट देती है.....नीचे बहादुर से कंचे वाली बोतल भी मंगा कर देती है ....मुझे कंचे वाली बोतल बहुत अच्छी लगती है . बड़ी साइकिल चलाते चलाते मुझे चोट लगी है ..दाये पैर  में फ्रेक्चर है ....सुनील भैय्या ने टेप चला दिया है ....
ली नंबर चार ...थापर नगर के उस बड़े मकान के वो चौथे किरायेदार है ..आमने सामने दो  मकान ऊपर .दो नीचे ...पापा मां को बताते है ...पकिस्तान   से   आये पंजाबी शरणार्थियो ने  ये मोहल्ला   आबाद किया है ....मै    पापा से  "शरणार्थी "का मतलब पूछता हूं .....वे कई बार बता चुके पर मेरी समझ नहीं आता.....
सुनील भैय्या   हमारे सामने रहते है ..........दस दिन पहले ही उनकी शादी हुई है ..मेरे प्लास्टर वाले दिन...शादी में उन्हें टेप मिला है .....पिछले छह दिन से वो सुबह से एक ही केसेट चला देते है ....सनम तेरी कसम .....मुझे गाने याद हो गए है ....नयी भाभी को मैंने दो बार देखा है. ...उन्हें दूसरा  कमरा  मिल गया है ....जब मां आँगन में मुझे नहलाती है ...तो वो भी  अपनी खिड़की से मुझे देख मुस्कराती है .. उनके .माथे पर बड़ी बड़ी बिंदी.है......हाथ में.ढेर सारी चूडिया  है  .....माँ तुम ऐसी बिंदी क्यों नहीं लगाती....मै मां से कहता हूं तो मां डांट कर चुप करा देती है..मै  रोज मां को  बाथरूम में  नहलाने को कहता हूं ...पर मां मानती नहीं ....
नीचे ब्लेकी पतंग से खेल रहा है ......फाड़ देगा ....मै खिड़की से" शै शै "करता हूं .......ब्लेकी सामने वाले होमियोपेथिक डॉ का कुत्ता है ...जब से  खुजली हुई   है  डाक्टरनी  उसे घर में घुसने नहीं देती है .पर ब्लेकी दिन रात यही रहता है.......रात को  घर में घुसने को  कूं कूं  करता है...पहले मुझे  उससे डर लगता था .... आजकल  वो मेरे  बिस्कुट का पार्टनर है .........डॉ अंकल को मैंने दो बार   चुपके  से उसे रोटी  डालते  देखा है ... .... दूसरा गाना शुरू हो गया है ....निशा आ हा आ हा .....
 बिट्टू आया है ...बिट्टू कभी मेरे घर पर अपना गेम लेकर  नहीं आता ...इन दिनों माँ कोई भी  चीज़ मांगने पर घर में सबको एक  ही बात कहती   है ....कहती है" मकान बन रहा है ."...मुझे समझ नहीं आता के मेरे गेम के आने से मकान का क्या सम्बन्ध है ...
  प्लास्टर उतरने का दिन है ...काटने वाले की मशीन से मुझे डर लगता है के कही वो मेरा पैर ही न काट दे ...कितना पतला पैर निकला  है .सूखा सा .माँ रोज पैर पे  तेल की मालिश करती है ....सर्दिया  आने लगी है ....एक महीना गुजर गया है....मुझे बड़ी  साइकिल से डर लगता है ...मुझे  बिट्टू जैसी छोटी   साइकिल  चाहिए  भले ही उसपे   घंटी न हो ....  . टोकरी न  बनी हो ....पर छोटी   हो......मकान फिर बीच में आ जाता है ...मेरी मां से लड़ाई हुई है ....
पापा  रोज दिल्ली से रात में आते है ..उनका ऑफिस  दिल्ली में जो है .....मै रजाई में दुबका हूँ .आंख मीच कर ..वो रोज  की तरह खाना खाकर .  कागजो में उलझे   है ..अपनी खाकी फाइल  लेकर .....वो फाइल  पापा हमेशा ताले में रखते है ...सन्डे को  सारा दिन उनके साथ रहती है ....उसमे अजीब से कागज है ...पोस्ट ऑफिस ...ऐसे  से  कुछ ....माँ कुछ मेरी साइकिल की बात कर रही है ....मेरे कान मुड गये है .....पापा सिर्फ हां -हूं में जवाब दे रहे है .थक कर .मै सो गया  हूं.....
उन सर्दियों  का रविवार ...दोपहर ढाई बजे ...
पापा ने मुझे आवाज दी है ..उनके पास एक नयी साइकिल  खड़ी  है ...घंटी वाली .लाल ....उसके आगे टोकरी भी है ..."...वे मुझे साइकिल पर बैठा कर  खड़े है ....ब्रेक लगायो....ब्रेक वे पीछे से चिल्ला रहे है .....मै ब्रेक लगानी हमेशा भूल जाता हूं .....
साल २०१० का एक  रविवार सुबह नौ    बजे ......
मै चाय का कप हाथ में लिए बाहर आया हूं ...नीचे गली में .पापा आर्यन के  साथ उसकी साइकिल में पिछले आधे घंटे से उलझे है ..प्लास ओर चाभी लेकर  ..उसकी टोकरी ओर कोई नट बोल्ट ठीक कर रहे है ..थोड़ी देर में . साईकिल  फिट घोषित होती है . .....आर्यन घंटी बजा कर निकला है "ब्रेक लगायो....ब्रेक" पापा चिल्ला रहे है ....

सफ्हे दर सफ्हे कुछ देर   ठहरती  है
.....
कुछ लफ्ज़ टटोलती है ..कुछ हर्फ़ पलटती है .….
हर शब एक नज्म अपनी शनाख्त करती है

74 टिप्‍पणियां:

  1. कैसे इतनी खूबसूरती से याद करते हैं ?
    ...निशा आ हा आ हा ..... आ हा हा... हा हा हा हा.. निशा

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  2. शीर्षक जाहिर है गुलज़ार की एक नज़्म से बिना शुक्रिया किये उधार लिया हुआ है......

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  3. बहुत खूबसूरती से यादों को संजोया है.

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  4. मुझे ये त्रिवेणिया भी बहुत पसंद आती हैं....एक शब्द ने परेशान किया॥ "गिलासटा " से अभिप्राय नहीं समझ आया...
    सफ्हे दर सफ्हे कुछ देर ठहरती है .....
    कुछ लफ्ज़ टटोलती है ..कुछ हर्फ़ पलटती है .….
    हर शब एक नज्म अपनी शनाख्त करती है

    शनाख्त.इस शब्द पर ध्यान गया अचानक .उर्दू भाषा में, मात्राएँ तो होती हैं..मगर उन्हें अक्सर लिखा नहीं जाता...मसलन दिल,दल,दुल, सिर्फ मात्रा के कारण पहचाने जाते हैं उर्दू में.और यह मात्राएँ लगभग लगे ही नहीं जाती....शनाख्त शब्द के साथ भी मेरी यही शिकायत है...

    ... प्लास्टर के नीचे खुजली बहुत लगती है .मै स्केल लेकर खुजाता हूं

    ये अमूमन आम बात है..मगर लिखना इस बात को साकार कर गया...जैसे गुलज़ार के एक गीत में है "एक सौ सोलह चाँद कीरातें, एक तुम्हारे कांधे का तिल"....
    मुझे पसंद भी आया और...बेहतरीन रहा.....अगली पोस्ट का इंतज़ार रहेगा..

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  5. निशांत की यह पुराणी आदत है इसने ऑरकुट पर भी मुझे इस सब चीजों को लेकर खासा परेशां किया है... स्पेल्लिंग हो या कुछ और यह भावार्थ के साथ शब्दार्थ भी पकड़ते हैं... जो भी हो लड़का और इसकी सोच दोनों बेमिसाल है एक शानदार पाठक को दिल औ' दिमाग दोनों खोल कर पढता है... बधाई हो

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  6. बढ़िया है हमेशा की तरह। रेशमी अहसास।
    गिलास्टा क्या है?

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  7. एक चौरस खिड़की...वक़्त की उस डोर का सिरा अब भी थामे बैठी है .....
    ज़िन्दगी की खट्टी मीठी यादो के पैरो की आहट सुनायी देती है शीर्षक से ही...
    मै खिड़की से" शै शै "करता हूं पढ़ के हंसी चेहरे पे बिखर आती है..
    मै ब्रेक लगानी हमेशा भूल जाता हूं .....जब जानते है के कोई आवाज़ देने वाला है तभी हम भूलते है..
    उन सर्दियों का रविवार ...दोपहर ढाई बजे ...
    साल २०१० का एक रविवार सुबह नौ बजे ....जैसे किसी पुरानी डायरी के कोई पन्ने मिल गये हो..
    नज्म की शनाख्त भी अच्छी हुई..

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  8. ये यादें...
    कम्बख़्त पीछा ही नही छोड़ती...
    अच्छा है

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  9. मैंने पहले भी कई बार कहा है फिर भी वो ही बात बार बार कहते थकान नहीं होती..."आप बहुत अच्छा लिखते है"
    आप जैसा लिखना तो छोड़ सोचना भी बहुत मुश्किल है. लिखते रहें...पढना अच्छा लगता है.
    नीरज

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  10. हमेशा की तरह शानदार लेखन. आपकी सोच हर शब्द में झलकती है. वाह!

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  11. यादों का लम्बा सफ़र बहुत खूबसूरती से समेटा है आपने...बहुत अच्छा लगा पढना

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  12. लगता है डायरी के खूबसूरत पलों यहाँ लाकर छोड दिया है एक बार फिर से जीने के लिए। कुछ पल के लिए हम भी बचपन में चले गए। सच बचपन की तस्वीर भूलाए नही भूलती। सच आप भावों को शब्दों ऐसे ढालते है कि लगता है सब कुछ आँखो के सामने हो रहा हो। गजब.....

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  13. पहले लगा कि कहानी है कोई.... मगर कहानी तो वो लिखे जिसके पास हक़ीकतों का अंबार ना हो। हर बार खूबसूरत और कंटेजस भी...! :)

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  14. हवा सी बहती पोस्ट के कई अक्षर ऐसे है यहाँ ठहर ठहर कर उनके अर्थ समझने का प्रयास किया है ......बहुत सुन्दर ...लाजवाब

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  15. @निशांत ...@अजित जी .......पतंगो के कई डिज़ाईन होते है ...उनके रंग रूप के मुताबिक फिर उनको नाम दिया जाता है .गिलास्टा एक डिज़ाईन का नाम है .मेरा फेवरेट ....शायद हर जगह.हर शहर की भी अपनी भाषाये.अपने शब्द होते है .
    शनाख्त के बारे में आप दुरुस्त फरमा रहे है

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  16. bahut sundar tareeke se ekbar phir apni yaado ke kuch panno ko sanjoya hai. bahut badhiya laga padhakar

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  17. आर्यन --बिलकुल आप की ट्र्यु कॉपी ।
    बहुत बारीक नज़र से सब कुछ ब्यान किया है आपने।

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  18. साल २०१० का एक रविवार सुबह नौ बजे ......
    मै चाय का कप हाथ में लिए बाहर आया हूं ...नीचे गली में .पापा आर्यन के साथ उसकी साइकिल में पिछले आधे घंटे से उलझे है ..प्लास ओर चाभी लेकर ..उसकी टोकरी ओर कोई नट बोल्ट ठीक कर रहे है ..थोड़ी देर में . साईकिल फिट घोषित होती है . .....आर्यन घंटी बजा कर निकला है "ब्रेक लगायो....ब्रेक" पापा चिल्ला रहे है ....

    ...इस एक पैराग्राफ ने पूरा जीवन कागज़ पर उतार कर रख दिया है! जो काम एक मोटा उपन्यास भी कर पाता या नहीं.. वह काम इस एक पैराग्राफ ने कर दिया है....शायद इसी को लेखन की ताकत कहते हैं.
    ...इसे पढ़कर याद आया कि किशोरावस्था में पैर तो मेरा भी टूटा था...!
    ..आभार.

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  19. शब्दों की अद्भुत जादूगरी से भावों के एक केनवास पर एक बेहतरीन समय चित्र !..बिलकुल मुग्ध कर देने वाला!

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  20. सही है cycle ki 'cycle' यूँ complete हो गई :). अच्छा लगा आपके साथ बचपन की यादों में उतरना।

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  21. मखमली शब्दों से खुरदरी सी यादें भी कितनी कोमल लगती हैं बहुत अच्छी लगी ये पोस्ट भी। बहुत बहुत शुभकामनायें

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  22. 'ब्लेकी सामने वाले होमियोपेथिक डॉ का कुत्ता है ...जब से खुजली हुई है डाक्टरनी उसे घर में घुसने नहीं देती है',
    यह क्या सिर्फ़ पालतू जानवरों के साथ होता है?
    ---नहीं ...
    बहुत से मरीज़ ऐसे मिल जाएँगे जो लोंग टर्म care सेंटर /केंसर हस्पताल/paraplegic centre, मेंटल हॉस्पिटल और आप के स्किन विभाग में दिख जाएँगे जो परिवार से उपेक्षित और घर से निकाले हुए होते हैं.
    ------------------------------
    ****'साइकल मिलने की खुशी' ..और २०१० में आर्यन और पापा ... कहते है कि वक़्त खुद को दोहराता है.*****
    -------------------------------
    त्रिवेणी....लाजवाब!

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  23. आपकी यादों मे मै भी बिना ब्रेक लगाये घूमती रही .....बचपन और आज को एक साथ खड़ा पाई कई बार ....आपकी कलम की शैली एक बार पढ़ना शुरू करने के बाद ख़त्म करने के बाद ही चैन लेने देती है .

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  24. हम भले हीं छोड़ आयें गलियाँ....गलियां हमें नहीं छोडती..

    गुलज़ार साब को कुछ ज्यादा अच्छे से पकड़ी हुई हैं ये गलियां...और कमोबेश आपको भी

    छोड़ आए हम, वो गलियाँ

    जहाँ तेरे पैरों के, कँवल गिरा करते थे
    हँसे तो दो गालों में, भँवर पड़ा करते थे

    हे, तेरी कमर के बल पे, नदी मुड़ा करती थी
    हँसी तेरी सुन सुन के, फ़सल पका करती थी
    छोड़ आए हम ...

    हो, जहाँ तेरी एड़ी से, धूप उड़ा करती थी
    सुना है उस चौखट पे, अब शाम रहा करती है

    लटों से उलझी-लिपटी, इक रात हुआ करती थी
    कभी कभी तखिये पे, वो भी मिला करती है

    छोड़ आए हम ...

    दिल दर्द का टुकड़ा है, पत्थर की डली सी है
    इक अंधा कुआँ है या, इक बंद गली सी है
    इक छोटा सा लम्हा है, जो ख़त्म नहीं होता
    मैं लाख जलाता हूँ, यह भस्म नहीं होता
    यह भस्म नहीं होता ...
    छोड़ आए हम...

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  25. आज आपके बारे में बहुत कुछ जाना ....लिंक की दोनों पोस्ट पढकर .....आर्यन बिलकुल पापा की तरह है ....एक डाक्टर इतना संवेदनशील भी हो सकता है विश्वास नहीं होता ..... आपकी संवेदनशीलता आँखें नम कर गयी ....पापा के लिए टी शर्ट ..... और सम्मान ...
    मैंने कहना चाहता हूँ "पापा आई लव यू " पर कह नही पाता ..अंग्रेज अच्छे है ..जब जी चाहा बेबाकी से कह देते है.. पर हम... पता नही कौन सी हिचक है......मै पैर छूकर नीचे उतर जाता हूँ.....

    आज आपके लिए श्रद्धा और बढ़ गयी है .....!!

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  26. शीरीं कलम.और फिर मन की बात.
    और क्या चाहिए?
    लगता है आपके भीतर एक हिलोर मारता समुद्र है.गहन.विस्तृत.

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  27. पापा - शब्द लाल रंग में
    और आर्यन भी :)
    वे लिंक्ज़ भी पढ़े और आप इसी तरह खूबसूरती से
    कभी दिल को
    संजीदा तो कभी खुश करनेवाली बातें
    और लाजवाब त्रिवेनीयाँ लिखते रहें और
    विवाह की शुभ तिथि ,
    परिवार के साथ आनंद पूर्वक मनाते रहें
    ये मेरी दिली ख्वाहिश है
    with tons of good wishes
    for your bright future,
    warm rgds,
    - लावण्या

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  28. कुछ पोस्टों पे "टार्च फेंकना" लगभग नामुमकिन-सा हो जाता है। पढ़ने के बाद एक विचित्र से सुरुर में डूबा पाठक कुछ लिखने की मशक्कत करे कि पोस्ट के अद्‍भुत जायके का होठों पर देर तक सटे हुये किसी स्वाद जैसा आनंद लेता रहे...

    तो बगैर कुछ कहे "पापा" और "आर्यन" पर जा रहा हूँ।

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  29. awesome!!!
    आपको डॉक्टर बनने की सलाह किसने दी थी????

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  30. कसम से क्या याद दिलाया है.. चादताडा, मागियन, लठियन.. क्या क्या मस्त नाम थे और बडे बडे चैम्प लोग.. कुछ दिनो पहले हमारी कम्पनी मे भी पतन्गे उडवायी गयी थी...पूरानी यादे ताज़ा हो गयी थी...
    एक किस्सा और याद आता है..जब पहली बार पापा को बैठाकर साइकिल चलायी थी..वो कभी बैठते नही थे..हमेशा मुझे बिठाकर ही चलाते थे.. उस दिन मैने जबरदस्ती की थी, आज भी उनकी आखो की चमक मुझे याद है..घर आकर मम्मी को बोल रहे थे कि लडका अब बडा हो गया है...
    ये पापा लोग भी बडे अलग किस्म के मैटीरियल होते है...फ़ोन पर जब बाते करने को नही होती तो बस यही बोलते है "मम्मी को फ़ोन दे?" :) हम दोनो के बीच मे अभी भी काफ़ी कुछ अनबोला रहता है..काफ़ी कुछ :)

    वैसे आप भाभी जी से मुलाकात के किस्से कब सुना रहे है??

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  31. 'जब से पैर में प्लास्टर चढ़ा है वो मुझे ज्यादा प्यार करने लगी है' यूँ तो पूरी पोस्ट छू गयी पर ये लाइन अभी अनुभव की हुई है... इस पर एक पोस्ट पेंडिंग है. कभी समय मिला तो लिखता हूँ.

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  32. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    इसे 20.02.10 की चिट्ठा चर्चा (सुबह ०६ बजे) में शामिल किया गया है।
    http://chitthacharcha.blogspot.com/

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  33. टिप्पणी केवल इस लिए है, सनद रहे कि मैने यह पोस्ट हमेशा की तरह दो बार पढ़ ली है | आपकी पोस्ट हमेशा की तरह लाजवाब है |

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  34. शब्द और भाव इतने घुले मिले हैं कि अलग ही नहीं हो पा रहे .....बेहतरीन अभिव्यक्ति !

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  35. .
    .
    .
    तो एक नयी पीढ़ी के पैरों नीचे आ गये पैडल और हाथों में ब्रेक...
    बहुत बहुत बहुत खूबसूरत पोस्ट,
    आभार!

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  36. पहली बार पढने बैठी तो एक फ्लो सा बना ओर एक चोरस खिड़की ,एक गली इमेजिन हुई ओर उसमे प्लास्टर बांधे बैठा एक बच्चा नयी नयी बहु भी ओर एक मां भी .डूबता उठाते फ्लो से बहार आई त्रिवेणी को महसूस किया .
    दोबारा पढने बैठी तो गौर किया इसमें किसी लेखक के भारीभरकम शब्द नहीं है ,बड़े बड़े वाक्य नहीं कोई विम्ब नहीं है तो सिर्फ सीधे सादे शब्द .
    मै चाय का कप हाथ में लिए बाहर आया हूं ...नीचे गली में .पापा आर्यन के साथ उसकी साइकिल में पिछले आधे घंटे से उलझे है ..प्लास ओर चाभी लेकर ..उसकी टोकरी ओर कोई नट बोल्ट ठीक कर रहे है ..थोड़ी देर में . साईकिल फिट घोषित होती है . .....आर्यन घंटी बजा कर निकला है "ब्रेक लगायो....ब्रेक" पापा चिल्ला रहे है ....

    ये वाक्य सच में पूरी पोस्ट को समेट देता है या बकोल आपके शनाख्त करता है
    अगर मुझे आपकी पांच बेस्ट त्रिवेणी चुननी हो तो उनमे से एक होगी

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  37. अतुलनीय स्मृति सँचयन,
    सार सँक्षेप शैली ऎसी कि पाठक विवश हो इन टुकड़ों की गहराई में उतरने को बाध्य हो जायें ।
    ब्रेक लगाओ..ब्रेक जैसा सँयम तुमने कई जगह दिखाया है.. पर प्लास्टर वाली बात से शुरुआत, पाठकों को बरबस ही हमदर्द नज़रिये से पोस्ट पढ़ने और महसूस करने को मज़बूर करती रहती है । यह एक सफल शिल्प है... बस यही कि अतुलनीय स्मृति सँचयन !


    पिछले कुछ दिनों से मुझे पोस्ट की सूचना क्यों नहीं मिल पाती ? मनोज जी की चर्चा से यहाँ पहुँचना.. मेरे लिये शर्मनाक है, न.. कि नहीं ?

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  38. कहानी की विधा में लिखा गया संस्मरण...कितना खूबसूरत. बिल्कुल कहानी सा.

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  39. एक और बेहतरीन पोस्ट आपकी कलम से ..याद रहेगी यह बहुत दिनों तक शुक्रिया

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  40. क्या बात है! दो ठो लिंक भी थमा दिये! देखते हैं!

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  41. नीलिमा जी का कमेन्ट पढने फ़िर से आया था :) शत प्रतिशत उनकी बातो से अग्री..

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  42. तकरीबन दो बार मै इस प्लास्टर की गिरफ्त में अब तक आया हूँ ..पहली बार शायद ७-८ साल का था ...दूसरी बार नाइंथ क्लास में ...दूसरी बार हाथ फ्रेक्चर हुआ था जब क्रिकेट खेलते वक़्त किसी अधकच्ची दीवार से गेंद लेने के वास्ते ऊपर चढ़ा था ओर वापसी में ....
    कमल हसन का मै तगड़े वाला फेन हूँ पर सनम तेरी कसम के वो गाने ...जय हो सुनील भैय्या की .. नयी केसेट आने में महीनो लग गए ..
    उस मोहल्ले में कई बाते थी .मसलन पिछली गली वाली एक आंटी जिनकी एक खिड़की हमारे घर की ओर खुलती थी ...उनके पास हमेशा सौ का नोट होता था .खुलने के वास्ते ....जाहिर है सौ का नोट तब बड़ा था ...जब तक मै वहा रहा मेरी याददाश्त में वो उनके पास ही रहा ....ब्लेकी मेरा दोस्त रहा ....फिर एक रहस्मय बीमारी में मेरी नयी साइकिल आने के बीस दिन बाद चुपचाप चला गया .तब डॉ अंकल को मैंने चुपचाप रोते देखा था . आदमी भी रोते है ... मुझे तब पता चला था ...
    बिट्टू ने कभी अपने खिलोने नहीं बांटे ...सामने वाली भाभी से बाद में मेरी दोस्ती हो गयी.....तब पापा के पास एक सफ़ेद स्कूटर होता था" विजय ".सन्डे को निकलता...मां कहती है माकन बनने के दौरान चोधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री बने थे ओर सरकारी कर्मचारियों को मिलने वाले लोन भी बंद हो गए थे ...बाद में वो स्कूटर भी बेचना पड़ा था ...
    आर्यन ओर पापा में वो दोस्ती है जो मेरी पापा के साथ नहीं थी ......वो पापा को डांट भी देता है ओर हक से लड़ता है .....पिछले कई सालो में पापा भी बदल गये है ....

    गुलज़ार की वो नज़्म कुछ यूँ है .......
    दीवार के बीचो बीच जड़ी एक चोरस खिड़की
    चोरस इक आकाश का टुकड़ा थाम
    के बैठी रहती है
    इतने में आकाश के "सीमी परदे" पर
    दिन ओर रात के कितने मंज़र आते है ओर जाते है
    सुबह सुबह जब रौशनी "फेड इन" होती है
    ओर पसेमंज़र में चिडियों की आवाज़े गूंजती है
    शाख पे लटका जामुनि रंग का फूल
    उतरता है ऊपर से
    झूल झूल के करतब दिखला के
    फिर ऊपर उठ जाता है
    ओर कभी उस शाख पे एक बादामी चिड़िया
    फूल के साथ नज़र आती है उस परदे पर ,
    दोनों में कुछ है ,लगता है ,
    ब्याहे ,ब्याहे से लगते है
    जब मंजर तब्दील होता है
    ऊँचे ऊँचे शमलो वाले गबरू बादल
    काले काले घोड़ो के रथ दौडाते है
    लगता है सब रणभूमि की ओर चले है
    नेजे भले ,तलवारों के टकराने से बिजली कौंधती रहती है
    फिर युद्ध का मंज़र छट जाता है
    सुरक लहू भी सिन्दूरी होते होते
    फिर काला पड़ने लगता है
    सब तस्वीरे धुल जाती है
    कश्ती खेते खेते फिर सीमी परदे पर चाँद आता है
    मालकोस की धुन पर सा मा गाते गाते तारे भर जाते है
    मंज़र तो चलता रहता है
    मेरी दोनों आँखे जब तक नींद में डूबने लगती है
    हस्पताल के
    एक चकोर से कमरे की दीवार के बीचो बीच
    जड़ी एक चौरस खिड़की
    चौरस इक आकाश का टुकड़ा थामे बैठी रहती है

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  43. kuch purane pal humesha hi zehan mein atake rehte hain..aur achanak... kuch hota hai...woh pal kahin se fir aankhon ke saamne maujood ho jaate hain..

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  44. Bahut khoob yaad kiya apne Anurag ji ..un lamhon ko....vo plaster wali khujlii ka anubhav mere khate main kabhee aya nahii:))))

    Ik break jarur lagaya thaa...ab fir gaddii fir line par :))

    wonderful to read you !

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  45. गुलज़ार साहब की एक कहानी भी है जिसमे चौरस खिडकी से बाहर रात भी चौरस दिखाई देती है..

    पता नहीं था कि आपने पोस्ट की है.. कभी कभी मेल भी भेज दिया करे नयी पोस्ट की :)

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  46. अनुराग जी ...यादों का ये गुनगुना सफर ...पढ़कर नहीं चल कर अपना शरण्य ढूँढता है लिखना आदमी के लिए उसकी मुक्ति का अवसर है उसके लिए राहत की साँस है,हम जीने की निर्जनता में यकीन नहीं करते, चाहतें हैं की जीना हमें सुलभ हो.. आपका लेखन..इस की पुष्टि करता है और हमेशा से इस बेतरतीब सी दुनिया को करीने से दिखाता है ,,,थर्रा देने वाली तकलीफों से निजात भी .बधाई

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  47. सायकिल के पहिये के साथ एक बहुत बड़ी सहूलियत है...कि इसे जब चाहे आगे घुमा लो,जब चाहे पीछे...बस यह स्टैंड पर लगा होना चाहिए..नहीं ??
    बस जिन्दगी के साथ यह सुविधा नहीं होती...न ही पीछे मोड़ने की न स्टैंड लगा कहीं रुक जाने की..
    निराले ढंग में पिरोई सुनहरी यादों को बेहतरीन शब्द दे कागज पर बिखेर दिया है आपने....वाह !!!

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  48. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  49. निर्मला कपिला जी ....लावण्या दी.शुशीला जी....ओर ढेरो ऐसे लोग है जिनके ब्लॉग पर मेरी हाजिरी न के बराबर होती है पर वे अपना स्नेह ओर आशीर्वाद हमेशा बनाये रखती है ....इधर ऐसे ही एक नौजवान" अर्श" ने टिपण्णी वाया मेल भेजी है ...सो उसे यहाँ चेप रहा हूँ.....




    शब्द ढुंढने पड़ जाते हैं डाक्टर साहिब , आपके लिखे पे सच कहूँ तो पढ़ तो बहुत पहले ही लिया था मगर शब्द की कमी हमेशा ही खलती है आपके लिखे पे...

    अपने को ठिठका सा पाता हूँ अपने को आपको पढ़ कर ....
    कभी कभी सोचता हूँ अच्छा है ग़ज़ल नहीं लिखते .. :) वरना ... हमारा क्या होता ...


    बधाई होली की भी अग्रिम ही

    अर्श
    aapke blog par post nahi kar paa rahaa ....

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  50. beautiful anuraagji....aap ka yaado ka basta kabhi khali na ho..

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  51. चिरंजीव अनुराग
    पिछ्ले १० दिनों में मैं ने तुम्हारे ब्लॉग पर पोस्ट की गयी सारी पोस्ट्स पढ़ ली हैं. मेरे इस आत्मीय व अनौपचारिक संबोधन का एक कारण यह भी है कि हमारे पुत्र तथा पुत्रवधू भी जो यूपी से हैं तथा गुजरात के एक सरकारी मेडिकल कॉलेज से सीबीएससी के माध्यम से एमबीबीएस तथा पी जी कर चुके है लगभग तुम्हारे समकालीन ही रहे हो गे
    .तुम्हारे आगे आने वाले पोस्ट्स की प्रतीक्षा रहे गी
    सस्नेह आशीर्वाद

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  52. वे ताउम्र
    बोझ ढोते रहे
    ताकि
    मै सीधा चल सकूँ
    वे ताउम्र
    बोझ ढोते रहे
    ताकि
    मै अय्याशिया कर सकूँ
    मै उनसे प्यार करता हूँ
    वे मेरे पिता है ...


    इस अपने से लिंक के लिए धन्यवाद. आपकी त्रिवेणी को Justify करती है.
    अब नयी पोस्ट के बारे में: जब ४-५ lines पढना शुरू किया था लगता था कि आप सामायिक वास्तविकता बता रहे हैं कि अब पतंगे पड़ी रहती हैं, दो दिनों तक और कोई उठाने वाला बचपन नहीं.
    बच्चे की diary अच्छी लगी.
    और वास्तव में क़ाश हमें भी शरणार्थी, सरहदें, युद्ध का मतलब पता नहीं होता...
    क़ाश की हमारी भी बड़ी बड़ी चिंताओं में पतंगे, ब्लेकी और गेम शामिल होते.
    अभी भी हमको बच्चों से बहुत कुछ सीखना है बड़े होने के लिए.
    अपनी कविता का एक हिस्सा याद हो आया :
    चलो छपाक -छुपुक करें किसी सन्डे के पानी में,
    और टॉस करके सारी कचहरियों में ताले कागा दें.
    ....चलो बचपन हो जाएं

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  53. भूल सुधार:कागा दें को लगा दें पढ़ें.

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  54. आपकी साइडबार की त्रिवेणी आपकी ही 'Inversiley Propotional' की याद दिलाती है. कोई भी स्वीकारोक्ति type अल्फाज़ बेहतरीन लगते हैं. सागर जी को भी इसमें महारत हासिल है.

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  55. शुक्रिया@ दुआ अंकल ..रिचा ने बताया था....फेस बुक पर ...आपके बारे में .....सुनकर संकोच हो आया था मुझे क्यूंकि .पेशेवर लेखक नहीं हूँ....कभी कभी शायद अपने तरीके से बात कह जाता हूँ ....वैसे रिचा भी बहुत अच्छा लिखती है ओर ऑस्ट्रेलिया में रहने के बावजूद कई भारतीयों से ज्यादा भारतीय ओर संवेदनशील है......जानते है पापा बहुत बदल गए है ...आर्यन ओर उनकी कुछ खास दोस्ती है ...अपने सीक्रेट ....मै उस रिश्ते के बोर्डर पर खड़ा रहता हूँ....
    @दर्पण ...पिता के लिए ये कविता कोलेज टाइम में लिखी थी .तो थोडा सेंटियाना उस उम्र में ज्यादा था ........

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  56. फिर से आया था- पोस्ट पढ़ने और टिप्पणियां चखने।

    जितना रश्क आपके लिखे से होता है, उतना ही पोस्ट पर आयी टिप्पणियों से भी....

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  57. वाह क्या खुब लिखते हैं आप.....वैसे कभी सामने वाली भाभी मुस्कुराती क्यों थी पता चला......

    बचपन, किशोरावस्था एक साथ याद कर लिया आपके सहारे

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  58. jab bhi ham apni hi zindgi ko phir se kisi aur jeete hue dekhte hain .... apni yaaden bhi jud hi jaati hai
    papa phir se aryan ke saath ........ break lagao .....

    kitni aasani se dimag ki baaten kah di
    itni hi jald scene badalte hain
    kadi judti jaati hai

    yaaden khazane jaisi hai sahej kar rakh le

    उत्तर देंहटाएं
  59. अगली पोस्ट का इंतज़ार!
    आपको सपरि्वार होली की बधाई और शुभकामनाएं.

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  60. !होली की हार्दिक शुभकामनायें !

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  61. आप जल्दी स्वस्थ हो जाएं यह मंगल कामना है अनेक खूबियां हैं आप लेखन में .............जितनी तारीफ की जाए कम है। होली की बधाई......इस अवसर पर प्रकृति भी उल्लास से सराबोर है.....उसका एक रूप इस रचना में देखिए....
    -डॉ० डंडा लखनवी !



    नेचर का देखो फैशन शो

    -डॉ० डंडा लखनवी

    क्या फागुन की फगुनाई है।
    हर तरफ प्रकृति बौराई है।।
    संपूर्ण में सृष्टि मादकता -
    हो रही फिरी सप्लाई है।।1

    धरती पर नूतन वर्दी है।
    ख़ामोश हो गई सर्दी है।।
    भौरों की देखो खाट खाड़ी-
    कलियों में गुण्डागर्दी है।।2

    एनीमल करते ताक -झाक।
    चल रहा वनों में कैटवाक।।
    नेचर का देखो फैशन शो-
    माडलिंग कर रहे हैं पिकाक।।3

    मनहूसी मटियामेट लगे।
    खच्चर भी अपटूडेट लगे।।
    फागुन में काला कौआ भी-
    सीनियर एडवोकेट लगे।।4

    इस जेन्टिलमेन से आप मिलो।
    एक ही टाँग पर जाता सो ।।
    पहने रहता है धवल कोट-
    ये बगुला या सी0एम0ओ0।।5

    इस ऋतु में नित चैराहों पर।
    पैंनाता सीघों को आकर।।
    उसको मत कहिए साँड आप-
    फागुन में वही पुलिस अफसर।।6

    गालों में भरे गिलौरे हैं।
    पड़ते इन पर ‘लव’ दौरे हैं।।
    देखो तो इनका उभय रूप-
    छिन में कवि, छिन में भौंरे हैं।।7

    जय हो कविता कालिंदी की।
    जय रंग-रंगीली बिंदी की।।
    मेकॅप में वाह तितलियाँ भी-
    लगतीं कवयित्री हिंदी की।8

    वो साड़ी में थी हरी - हरी।
    रसभरी रसों से भरी- भरी।।
    नैनों से डाका डाल गई-
    बंदूक दग गई धरी - धरी।।9

    ये मौसम की अंगड़ाई है।
    मक्खी तक बटरफलाई है ।।
    धोषणा कर रहे गधे भी सुनो-
    इंसान हमारा भाई है।।10

    सचलभाष-0936069753

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  62. रंजन रस रंजन..रोचक मनोरोचक ..

    होली की ढेरों शुभकामनाएं

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  63. हयात - मुहोब्बत = शरणार्थी

    नज़्म अपनी शनाख्त करती है, जैसे ज़िन्दगी समभाव पर आ गयी हो. ना रंज है ना ख़ुशी ना होने से ना मिट जाने से लगावट.

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  64. रंज के साथ ख़ुशी लिख दिया है जाने किस भाव में हूँ कृपया इसे ग़म पढ़ें

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  65. प्लास्टर चढ़ा छोटा बच्चा जिसकी मां उसे इन दिनों कुछ ज्यादा ही प्यार करती है, और नई नई शादी हुए सुनील भैया जिनके यहां तेज आवाज में टेपरिकार्डर पर गाने बजते हैं। बहुत सी चूड़ियों औऱ बड़ी सी बिंदी वाली नई भाभी।
    एक से एक सुंदर बिंब हैं आपकी रचना में। लेकिन पूरी रचना का सबसे खूबसूरत हिस्सा है ब्रेक लगाओ ब्रेक। यादों के झरोखे से पापा का बेटे को और फिर पोते को कहना। बहुत सुंदर।

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  66. मैं तो सच कहूं आज पढ़ा है इस पोस्‍ट को दैनिक जनसत्‍ता में संपादकीय पेज 6 पर समांतर स्‍तंभ में शीर्षक एक चौरस खिड़की। बधाई इतने हृदय प्रभावी लेखन के लिए। शब्‍द वही होते हैं बस जादू उसे पिरोने भर में है जो भावों के साथ पिरोया जाता है। खुबसूरत।

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  67. दीवार के बीचों बीच जड़ी ये खिड़की शब्दों के आने जाने का रास्ता है ....मगर ये रास्ता आम नहीं है ...
    इस खिड़की को खुली ही रहने दो ..

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  68. आप कि ये कुछ लाइन मैंने पड़ी अपने दिन याद आ गए आप कि तरह मैंने भी उसकी याद कुछ इसी तरह से सजो रखा है उमीद करता हु कि जल्दी ही लाइव करुगा पर कबतक वो पता नहीं, खैर मेरा नाम Piyush है और मैं पेसे से SEO हु और ब्लॉग्गिंग करना मुझे अच्छा लगता है

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  69. कितना रोचक खज़ाना समेत रखा है भाई, यादों की इस पिटारी में? जितना भी निकलता आता है मन नहीं भरता.

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  70. achhi post hai doc sab .... mujhe bhi kuch wo din aa gaye jab ...kanche khelte hue haar ke bhaga tha main..aur gir gaya tha...chhot ke karan kai din ek khidki ke paas kate...

    gulzaar saab ka sher yaad aayaa...

    "khidaki me kati hain sab raten
    kuch chauras aur kuch gol kabhi .. "

    उत्तर देंहटाएं

कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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