2010-03-09

के .....खुदगर्जी का सफ़र तो जारी रहेगा .....

स्टोर  भी बड़ी अजीब शै है .... ....सजायाफ्ता  मुजरिम सा  अलहदा   किसी कोने में  खामोश खड़ा रहता है ..... भीतर कई  अफ़साने छिपाये..... .हर सामान जैसे एक  रिश्ते का नाम लिए बैठा है.....यूं भी  जो चीज   ढूँढने जाओ वो  मिलती नहीं ... उधर  कुछ गिरा है ..... बायो  केमिस्ट्री की किताब  है    ..दो चार पर्चिया झाँक रही है ..किसी फ़ॉर्मूले  का पता देती  सी... एक साथ कितनी तस्वीरे.. फ्लेश  करती है  दिमाग में .....   वक्त  में जरा भी सेन्स नहीं है  .....कुछ भी फ्लेश कर देता है  दिमाग में .....   ..मोबाइल" व्हिसल" दे रहा  है ...किसी का जन्मदिन बताता है ...अब जन्मदिन याद रखने .की सहूलियत के वास्ते कई सिस्टम  है . साइंसदान  कहते है...साइंस   दिमाग  को ओवरलोड  से  बचाती   है ... पर दिल ….वो साला   साइंस  के इशारो को  नहीं समझता ...  ओवर टेक   करता   है.... कही अटका रहता है…….जिंदगी की  इन  तंग  गलियों  के  मोड़ो से ....इत्ते  सालो   बाद  भी वाकिफियत  नहीं है..........पता नहीं दिल के वास्ते कोई "पॉवर स्टेरिंग  "  कब ईजाद होगा .....


आओ दराजे  टटोले कुछ.....
कुछ सफ्हे पलटे ...
दीवार के पेंट को खुरचे थोडा सा
मुमकिन है
के
शायद सांस लेते
या ओंधे पड़े सुस्ताते
कोई नया पैरहन पहने
 वे कही ...
मिल जाये
अरसे  से ……
एक शुक्रिया  मुझ पर  बाकी है



अलमारी के दरवाजो पर इम्तिहान  के दौरान लिखे कोटेशन ......ढेरो .न्युमोनिक्स ओर पिछले गुजरे सालो  से मौजूद  कई  जुदा शक्लो में मौजूद  लफ्जों को .....जो कलेजे भर का हौसला देते थे .....गैर इम्तिहानो दिनों में भी...नाजुक मौको पे ......
 गोया खुदगर्जी का सफ़र तो जारी रहेगा

69 टिप्‍पणियां:

  1. शायद सांस लेते
    या ओंधे पड़े सुस्ताते
    कोई नया पैरहन पहने
    वे कही ...
    मिल जाये
    अरसे से ……
    एक शुक्रिया मुझ पर बाकी है

    Speechless ...

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  2. दीवार के पेंट को खुरचे थोडा सा
    मुमकिन है
    के
    शायद सांस लेते
    या ओंधे पड़े सुस्ताते
    कोई नया पैरहन पहने
    वे कही ...

    दिल के बहुत करीब... अद्भुत !!!

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  3. खूबसूरत.....बेहद खूबसूरत

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  4. बहुत खूब , अब "पॉवर स्टेरिंग " कहाँ से आए , दिल को पुराने से है प्यार और ये तो दिमाग ही ईजाद कर सकता है | और आप जैसे लेखक लोग उसे जिन्दा भी रखते हैं तो उत्सव की तरह |

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  5. यह वाकई दुःख मिश्रित सुख है. मैं ऐसी चीजें फैंक देना चाहता हूँ, पर यह हर बार मेरा पूरा दिन ले लेती हैं...

    यह इमोनालिज्म बहुत बेकार चीज़ है साला, एहसान का एहसास दिलाती है.

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  6. अदभुत लिखा है ...कुछ बातें यह दिल वाकई कभी नहीं भूल पाता

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  7. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  8. alt+A+C+ctrl+V

    कहाँ तक कोट करती.... हर वाक्य कोटेशन था.... गैर इम्तिहानो दिनों के लिये भी...नाजुक मौको के लिये भी......

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  9. एक शुक्रिया मुझ पर बाकी है
    sundar panktiyaan!!

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  10. ये जो स्टोर के दरवाज़े खुल रहे हैं समझ सकती हूँ किस लिए ......शायद कुछ बेशकीमती चीजे नए घर की ओर सफ़र में हैं ......और कुछ वहीँ दफ़्न होने के इन्तजार में ......पर ये मुआ दिल ....देखते हैं किसे साथ ले जाता है और किसे छोड़ जाता है ......कुछ यादें कुछ खुशबू तो उतारे हुए पैराहनों रह ही जाती है .....!!

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  11. शीर्षक पढके पहले सोचे के आज कौन सा कन्फेशन कर रहे है देखे तो लगा ये कागज तो अपनी दीवार की तस्वीर से लगे .पढ़ा तो मालूम चला हजूर कहां मुड गए है नज़्म जितनी खूबसूरत है उससे कही ज्यादा इसका इंट्रोडकशन है ..आपकी आदत सी हो गयी है क्या करे .देखिये

    सजायाफ्ता मुजरिम सा अलहदा किसी कोने में खामोश खड़ा रहता है .....
    वैसे हमारा कमरा भी किसी स्टोर से कम नहीं है दिखने में ,पर खामोश नहीं रहता बस .

    "हर सामान जैसे एक रिश्ते का नाम लिए बैठा है....."
    उफ्फ्फ ओर लडकिया हर रिश्ते को सहेज कर रखना चाहती है

    "वक्त में जरा भी सेन्स नहीं है "
    सेन्स होता तो ......
    ओर आखिरी लाइन तो दिल ले गयी एक दम
    ..........पता नहीं दिल के वास्ते कोई "पॉवर स्टेरिंग " कब ईजाद होगा .....

    पता नहीं कौन सी कम्पनी "पॉवर स्टेरिंग " लांच करे शायद हमारे कॉलेज से निकलने से पहले कर दे तो जिंदगी आसान हो जायेगी .वैसे भी लडकियों को इन "पॉवर स्टेरिंगो "की ताउम्र जरुरत रहती है .
    जो कलेजे भर का हौसला देते थे .....गैर इम्तिहानो दिनों में भी...नाजुक मौको पे ......

    हाय ये गैर इम्तिहानी दिन क्या आप पर भी गुजरे थे .बड़े जान लेवा होते है जी.कुछ पुराने मशवरे पड़े हो तो भिजवा दीजिये शायद इस हॉस्टल के काम आ जाये .

    गोया खुदगर्जी का सफ़र तो जारी रहेगा
    वल्लाह....
    i love this one

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  12. "पर दिल ….वो साला साइंस के इशारो को नहीं समझता ... ओवर टेक करता है.... कही अटका रहता है…….जिंदगी की इन तंग गलियों के मोड़ो से ....इत्ते सालो बाद भी वाकिफियत नहीं है..........पता नहीं दिल के वास्ते कोई "पॉवर स्टेरिंग " कब ईजाद होगा ....."
    ऐसे ही जुमले पढने के लिए हम तरसते रहते हैं और आप हैं की तरसा तरसा पढवाते हैं...आप और आपकी लेखनी लाजवाब हैं डाक्टर साहब...सच्ची...
    नीरज

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  13. यह बात सोलह आने सच कि आप दिल की बात,दिल से लिखते है और हम दिल से पढते है.........................।
    ना जाने कैसे और क्यों ये लाईन एकदम मुँह से निकल गई आपकी ये वाली पोस्ट पढकर।
    खैर हमें तो आपकी हर पोस्ट अद्भुत लगती है। बार बार पढने को जी करता है। चंद छोटे छोटे शब्दों से बहुत कुछ कह जाना और पढने वाले के दिल मे उतर जाना। "के.. खुदगर्जी का सफर तो जारी रहेगा..." वाह क्या शीर्षक है।

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  14. आस-पास बिखरा... कुछ भूला..कुछ याद
    अचानक आँखे मलता है....

    सामान रिश्ते का नाम लिए बैठा है !
    दिल का पावर स्टेयरिंग!
    खुदगर्जी का सफ़र !
    और एक शुक्रिया बाकी है

    ने जान फूंक दी उसमें..

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  15. क्या स्टोर के कमरे में लगे नोट्स में आप की लिखाई है?
    अगर है तो बहुत सुन्दर लिखायी है आप की !
    --------------
    'जिंदगी की इन तंग गलियों के मोड़ो से...'वाह !क्या बात लिखी है !
    सच में ..हम सोचते हैं तो आप उस सोच को शब्द दे देते हैं.
    सही है न.. मन का कोई पावर steering होता और दिल में ही जी पी एस की सुविधा भी होती तो बेचारे मन को इतना भटकना नहीं पड़ता मंजिल की तलाश में.
    कभी कभी 'शुक्रिया' जैसे कुछ क़र्ज़ बाकि रहें तो उन्हें चुकाने के इंतज़ार का भी एक बहाना होता है ज़िन्दगी के पास....चुपचाप गुज़रते जाने के लिए !

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  16. अल्पना जी ....बिलकुल असल पिक्चर है .तकरीबन तीन दिन पहले ली हुई ....सूरत के उसी कमरे से ....बी-४ बोएस हॉस्टल .....ख्याल तीन पहले ज़ेहन में दाखिल हुए थे .....टुकडो में उन्हें जमा किया .इत्तिफाकन अमेरिका से एक दोस्त का आना हुआ .....सो चल दिए ......वहां उसी कमरे में दाखिल हुए तो दीवार पर ये मौजूद था ....इज़ाज़त ली ...ओर कैद कर लिया कैमरे में ....
    सो जाहिर है मेरी हेंड राइटिंग नहीं है . पापा ने बहुत कोशिश की .....पर हम नहीं सुधरे ......शुक्र है गूगल ने ये सुविधा बख्शी है .वर्ना तो आधी पोस्टे बिना पढ़ी रह जाती

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  17. कमबख्त ये पॉवर स्टेयरिंग दिल के लिए बन जाता तो मुझ जैसों का भला हो जाता क्यों डाक्टर साहिब... हा हा हा , कुछ करो हो सकते तो इसके लिए... बढ़ाई गोया हम भी होते ...


    अर्श

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  18. सोच रहा हूँ आपकी पोस्टों पर टिप्पणी करना बन्द दूँ..

    ऐसा कौन सा स्पेस छोड़ देते हैं आप, जिसे मुकम्मिल करने के लिये टिप्पणी की जरूरत पड़े, आज तक समझ नहीं पाया.. खासतौर पर ऐसी बेतकल्लुफ पोस्टों पे..!

    सिर्फ़ रवायत के तौर पर, और अपनी अटेंडेंस लगवाने के लिये एक टिप्पणी दर्ज कर ही देता हूँ..!

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  19. बताइए हॉस्टल की दीवालों को भी नहीं बख्शते आप लोग। बड़े पढ़ाकू होते हें जनाब आप सब। अपने कॉलेज की दीवारें भी रँगी होती थीं पर सजावटी तसवीरों से। पढ़ाई में मन ना लगे तो दीवारें ही देख लिया करते थे पर यहाँ तो उस सुकून की भी गुंजाइश नहीं।

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  20. आपका दिल तो बडा ही हाजी है, फ़िर भी पावर स्टेयरिंग के ईज़ाद करने की बात करते हैं जनाब.

    चादर तान के सो जाईये, क्योंकि आप और हम जैसे दिलों के लिये ईज़ाद करना मुमकिन नहीं हो पायेगा, क्योंकि ऐसी तरलता और नाज़ुकता किसी फिज़िक्स या केमिस्ट्री के फ़ार्म्युले में बंध नहीं पायेगी.

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  21. मिल जाये
    अरसे से ……
    एक शुक्रिया मुझ पर बाकी है


    sundar panktiyaan..

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  22. कालेज मे ’आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस’ के कोर्स मे ’न्यूरल नेटवर्क्स’ पढ़ा करते थे..जिसमे मशीन्स को ’सोचने’ की ताकत देने के लिये इंसानी दिमाग के ’न्यूरॉन्स’ के नमूनों के तर्ज पर मशीन को ट्रेनिंस-सेट्स के द्वारा असल जिंदगी की ’प्राब्लम-साल्विंग’ का हुनर देने की कोशिश की जाती है..मतलब यह कि (सारे फ़सादों की जड़) इंसानी दिमाग के (सो काल्स्ड) उम्दापन को ’कैश’ करने के कितने तरीके साइंस ईजाद कर लेता है..मगर दिल? आपका मेडिकल साइंस भी तो उसे बस एक ’मसल’ मान कर जिस्म मे खून पंप करने का ठेकेदार बस समझता है..वो तो फ़ितूरी शायरों-कवियों का दीवानापन है जो इस बेचारे दिल को जिंदगी के सारे इमोशन्स और रिश्तों के फ़ोल्डर्स को सहेजने वाला कोई सजायाफ़्ता मुजरिम सा स्टोररूम तज्वीज कर देते हैं...और दिल भी कम्बख्त किस ऑटोमोबाइल फ़ैक्टरी की पैदाइश है कि पॉवर-स्टेयरिंग भले न हो मगर ’पॉवर-ब्रेक्स’ तो पूरे हैं..
    आपको पढ़ना वैसे भी उन तमाम नॉस्टाल्जिक और कन्फ़ेशन से भरी तंग, अंधी और मोड़दार गलियों से गुजरने की तरह होता है..जहाँ कि अचानक किसी अंधेरे मोड़ पर पीछे से हमारा अपना जमीर झपट कर हमारी आँखों पर अपनी हथेलियां रख कर कह देता है...’आइस-पाइस’!!
    ...’ऐंड यू आर काट..आउट ऑफ़ द गेम’!!!!
    हाँ उससे आगे बस हमारी खुदगर्जी ही जाती है..अकेले..

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  23. हाँ यह भी सोच रहा था कि कितना सुविधाजनक होता है हमारा घर शिफ़्ट करना..कि हम स्टोर रूम से चुन-चुन कर ’फ़ालतू’ की चीजों को जलावतन कर देते हैं और सिर्फ़ अपने काम की चीजें अपनी जरूरत के पैमाइश मे फ़िट कर कर सहेज लेतें है..अगले मुकाम के लिये.....मगर रूह को क्या इतनी छूट मिलती है..अपना ’घर’ शिफ़्ट करते वक्त..स्टोर-रूम’ की सारी जरूरी-गैरजरूरी चीजें बस ’इंसीनरेटर’ के हवाले कर दी जाती हैं...कि एक पतला सूत भी ’अपना’ नही बचता रूह के पास...मगर यह बात हमें याद तक नही रहती...

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  24. दिमाग कुछ भी नहीं... कभी-कभी बड़ी जालिम चीजें फ्लैश कर देता है ! सेन्स तो बिलकुल नहीं है... नो डाउट अबाउट दैट !

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  25. anuraag ji,aapki is post ne wakai shabdhiin kar di ya hai
    kuchh khyal dil me hamesha ke liye raha jate hai.
    poonam
    ..

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  26. स्टोर में गुजिश्ता ज़िंदगी से जोड़ने वाले हाइपर लिंक्स भरपूर मिल जाते हैं..

    वैसे ये लाइन इस पोस्ट के प्रभाव में ही लिखी गयी है.सोचता हूँ आपकी पोस्ट्स को पढ़ने के लिए कौनसा वक्त ठीक रहता है क्योंकि इन्हें पढ़ना सिर्फ बौद्धिक व्यायाम नहीं है..एक पूरा भावों का दरिया गुज़रता है भीतर से.

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  27. Apoorva ka dusara comment mujhe ek puri post lag raha hai....!

    Kabeer ka nirgun...!

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  28. सूरत से लौटते ही सुरत बदल गयी.. वैसे स्टोर को सही लपेटा.. मैंने बचपन का काफी समय इसी स्टोर में बिताया है.. क्रिकेट की किट से लेकर सुपर कमांडो ध्रुव की कोमिक्से भी इसी में रहती थी.. वक्त के सेन्स की तो क्या कहे.. इसकी तो टाईमिंग ही गलत है.. दिल को पॉवर स्टेरिंग से चलाने का ख्याल तो धुआधार है.. यु दो चार पोस्ट के बाद अगर नज्मे भी मिल जाए तो कोई दिक्कत की बात तो नहीं है.. मेरे ख्याल से.. कम से कम अन्दर का शायर भी सांस तो लेता रहेगा.. वो भी तो खुदगर्ज है..

    इस उम्मीद पे जा रहा हूँ कि अगले हफ्ते से आप हर हफ्ते आयेंगे..

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  29. दिल का स्टोर रूम.........
    उफ़..... क्या कहूँ.....

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  30. पिछली पोस्ट देखने में लेट हो गयी थी इस बार कान पकडे ...
    सजायाफ्ता मुजरिम से स्टोर की कहानी खूब लिखी आपने ... वैसे घर का हर कोना कुछ कहता है बस सुनने का होसला चाहिए आपकी तरह ... दाराजों में दीमक लगने और सफ्हे पीले पड़ने से पहले आपने खुरच ही डाली यादें ... इसे पढ़कर एक बार को हम भी फ्लश बेक में चले गए .... शुक्रिया यादों को याद दिलाने का ....

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  31. पुरानी चीजे कितनी आसानी से हमे पुराने दौर मे ले जाती है..किसी टाईम मशीन की जरूरत नही पडती...पुराने न्यूजपेपर्स, चिट्ठिया और किताबो-कापियो पर पिछ्ले पन्नो पर लिखे नोट्स...
    और दिल तो बच्चा है...एक मूड मशीन होनी चाहिये..और सिर्फ़ टर्न आन और आफ़ के खटके..खटका ओन तो मूड ओन, खट्का ओफ़ तो मूड ....
    खुदगर्जी भी इतनी खूबसूरत है, नही पता था... भोकाल :)

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  32. आपकी पोस्ट उस बारीक धागे की तरह होती है जिसके रेशे और अलग नहीं किये जा सकते.इसलिए आपकी पोस्ट के बहाने हम अपनी यादो को रिफ्रेश कर लेते है.स्टोर रूम की अपनी ही महक होती है घर का हो या दिल का.पुरानी पुरानी चीज़े पड़ी रहती है.मालूम नहीं ये स्टोर रूम में पड़ी चीजों से बिछड़ना है के चीजों से जुडी यादो से.
    उस वक़त क्या था रूह पे सदमा न पूछिये,
    याद आ रहा था किस से बिछड़ना न पूछिये.

    घर के बाकी कमरों को जब पता चलेगा के स्टोर पे पोस्ट लिखी गयी है तो यकीनन जल जायेंगे के हम तो सजे संवरे रहते है और कोई पूछता नहीं.

    शुक्रिया बाकी रहा..बुक मार्क कर लिया गया.

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  33. पढ़ लिया है अनुराग सर,
    कमेन्ट को वापिस आता हूँ....

    उत्तर देंहटाएं
  34. डाक्टर साहब
    फिर से आपके ब्लॉग पर आया कुछ नए छांटे-फटके हुए अलफ़ाज़ मिले ( लफ़्ज़ों के तो आप सौदागर हैं हीं.....),पोस्ट अच्छी है.....कुछ लफ्ज़, हाथों की जुम्बिश की बोर्ड पर सटीक न होने के कारण बहक से रहे है......उन्हें उँगली थमाने की ज़रुरत है.......! 'साला' जैसा शब्द इस्तेमाल करना पोस्ट की मांग थी या मूड की.......नहीं जानता, मगर कुछ चुभता सा लगा.

    उत्तर देंहटाएं
  35. डाक्टर साहब ! आपकी इतनी घनी समवेदनाओं से डूबी पोस्ट को पढ़कर
    एक अलग दुनियाँ मे पहुँच जाते हैं .

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  36. एक बार स्टोर रूम में जाके वहां पड़ी चीजों के दो हिस्से किये एक जो ज़रूरी थे, और दूसरी जो फेंकनी थी, पर पता नहीं क्या मन आया कि काम उल्टा कर दिया, और उसके बाद का सुकून ज़िन्दगी भर रहा. क्या कभी किसी समय में की गयी ज़रूरी बातें याद रहती हैं? किस दिन कौन सा काम किया? और रहती भी हैं तो पलकों के नीचे कुछ गीला सा लगा कभी? पर एवें किये गए कई काम, (स्टोर रूम के कबाड़ की तरह) आँखों से चाह के भी नहीं फैंके जाते, और ये 'ज़रूरी' आंसू वक्त बे वक्त छलकते रहते हैं.

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  37. दिल के वास्ते पॉवर स्टेयरिंग की ईज़ाद कोई डॉकटर ही कर सकता है भाई ।

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  38. sabse pahle ek complaint....tumhare comment box mein kuch bhi paste nahi ho raha hai. isliye roman mein likh rahi hoon.aaj hi almaari ki safai karte waqt purane notes mile jinme ham log aapas mein likh likh kar baat kiya karte the. teachers ke cartoon mile ...aur kisi khaas mood mein likhi gayi shero shaayri bhi. tumhari post padh ke ek baar fir purani cheezen khangaalne ka man kar raha hai.

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  39. सच तो ये है डा० साब कि हम जैसों के लिये कई बार...कई बार क्या, हर बार ही ये वक्त का आउट आफ सेंस होना बड़ा कामयाब होता है। वर्ना जाने हमारा क्या बनता!...और आपका भी तो.. :-)

    तो उस रोज जो एसएमएम किया था तो रियूनियन के बहाने इसी स्टोर रूम में घुसे पड़े थे आप...कयों?

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  40. "सामान जैसे एक रिश्ते का नाम लिए बैठा है...."
    बात सादी है मगर आपने इस बात को वाकई अलहदा रखा है,... अभी तक बस सुना था "रिश्ते सामान का नाम लिए बैठे हैं"

    आपकी अजीब उर्दू और विज्ञान की ज़बान में मिली जुली जो पोस्ट आ रही है, मैं बहुत खुश हूँ नए नए शब्द सुनने को मिलते हैं।

    "वो साला साइंस के इशारो को नहीं समझता ... ओवर टेक करता है.... कही अटका रहता है…….जिंदगी की इन तंग गलियों के मोड़ो से ....इत्ते सालो बाद भी वाकिफियत नहीं है..........पता नहीं दिल के वास्ते कोई "पॉवर स्टेरिंग " कब ईजाद होगा ....."

    ये भी बहुत "नया अनुभव" था

    एक शब्द पढ़कर गच्चा खा गया

    "साइंसदान"

    पहले खीज हुई कि ये शब्द अभी तक क्यों नहीं पढ़ा....दान जैसे शब्द तो फारसी के हैं,,फिर इंटरनेट की यूनिकोड टाइपिंग पर ज़ोरदार आक्षेप लगाते हुए, दिमाग पर धक्का मारा

    समझ आया कि ये शब्द

    "साइंसदां" है...अगर मैं सही हूँ तो ये शब्द सुधारिएगा नहीं...ऐसे ही रहने दीजिये,,फब रहा है

    "आओ दराजे टटोले कुछ.....
    कुछ सफ्हे पलटे ...
    दीवार के पेंट को खुरचे थोडा सा
    मुमकिन है
    के
    शायद सांस लेते
    या ओंधे पड़े सुस्ताते
    कोई नया पैरहन पहने
    वे कही ...
    मिल जाये
    अरसे से ……
    एक शुक्रिया मुझ पर बाकी है"

    रचना "खबसूरत" है....



    निशांत कौशिक

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  41. इस बार .......

    इक नज़्म की फरमाइश है ........!!

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  42. साइंस दिमाग को ओवरलोड से बचाती है ... पर दिल ….वो साला साइंस के इशारो को नहीं समझता ... ओवर टेक करता है.... कही अटका रहता है…….जिंदगी की इन तंग गलियों के मोड़ो से ....इत्ते सालो बाद भी वाकिफियत नहीं है.......

    Like it !

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  43. Priy anurag ji...aapne mere blog me jo tippani di hai usme link bhi hai...me shahar ke bahar tha so dekh nahi paaya...but aaj dekha to usme msg tha ki "chittha mauzood nahi hai"....tippani ne bechaini badha di hai...kripya zarur uska correct address mujhe deve..

    Nishant kaushik

    www.taaham.blogspot.com

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  44. अभी कोई दोस्त मुझे मेल भेजता है ....अपने रोल मोडल को जानो....सोचता हूँ वक़्त ओर उम्र भी कितने रोल मोडल बदलता है . शुरुआत ..मोहल्ले के उन भैय्या से जो क्रिकेट खेलते तेज बोवलिंग करते थे ...फिर ...स्कूल की सीनियर क्लास का मोनिटर जिसके पास पहली बी एस सा एस एल आर साइकिल थी .तारो वाली ......फिर कोलेज का वो सीनियर जो स्टेज पर देवता सरीखा हो जाता था .ऊपर पहुँचते ही कैसा चमकता था उसका चेहरा....उसकी नक़ल इतनी की .उस जैसे वुड लेंड के शुस खरीदने मै कितनी दुकाने भटका था ....फिर दूसरा उसकी भी कई चीजे पसंद थी .उसकी गर्ल फ्रेंड भी ......
    अजीब इत्तेफाक है के शुक्रिया कहने के लिए मसोदा पहले कागजो पर उतरा था .... फिर इत्तेफाक से उस शहर में जाना हुआ .तो सोचा असल क्यों न लगा दूँ......
    देर रात में लव एंड बेली (सर्जरी की मोती किताब )में उलझे हुए जब ब्रेक लेने वास्ते किसी कुर्सी में सर टिका के सिगरेट खींचते थे .तो सामने उर्दू....अंग्रेजी के कित्ते लफ्ज़ चमकते थे ........
    @अपूर्व जब दिल को ठेकेदार समझने का उलहाना साइंस को देता है तो ये बात मै अपने कार्डियक सर्जन दोस्त को एस एम् एस करता हूँ......उसका जवाब उसके साथ १५ दिन पहले बांटी वाइन का स्वाद जीभ पर ले आता है ....यूँ ही जैसे आइस पाइस से इस खेल को सिखाने वाली सरदारनी याद आती है .जाने कहाँ होगी ?लंगड़ी टांग भी उसी ने सिखाई थी ....जमीर अब तक लंगड़ी टांग खेलता है ......
    @singhsdm
    शायद जिस मूड में ये पोस्ट लिखी गयी थी उस वक़्त साले से शालीन गाली मुझे कोई दिल वास्ते लगी नहीं थी ...यूँ भी कमीने ओर हाजी तो गुलज़ार साहब ने पेटेंट करवा रखा है .....
    @ निशांत ......".साइंसदान "जब लिखा ओर बाद में एडिट करने लगा तो जाने क्यों रुक गया .....शायद किसी किताब में प्रकाशक की गलती थी या वाकई इसके भी दो .रूप .मैंने हटाया नहीं उम्मीद थी के " दर्शन या "कुश "इसे पढ़कर गुलज़ार की किसी नज़्म को याद करेगे ......पर देखो हैरी पोर्टर के खोजी की माफिक तुमने इस वर्ड पर माइक्रोस्कोप रख दी .....

    @कुश@ मीता ओर @राखी .@priyesh@abhijeet..@manisha @gaytri@piyush..@shreya.@pallavi...जब भी मेरी किसी नज़्म को देखते है ....अपनी ख़ुशी जाहिर करते है .....चूंकि उनसे दोस्ती इन्ही नज्मो को बांटते -बांटते हुई थी .यूँ भी उनकी शिकायत है के मै नज्मो को भूलने लगा हूँ.......सच कहूँ तो सबो की मसरूफियत उतनी कैफियत अब नहीं देती......यूँ भी बेख्याली सर पे खड़ी है

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  45. जनाब कभी-कभी ऐसा ही मिस्ड कॉल के साथ भी होता है..

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  46. अनुराग जी जन्म दिन की बहुत बहुत बधाई!:) [सॉरी..२ दिन देर से शुभकामनाएं भेज रही हूँ...]

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  47. Beautiful post.
    "Ek shikriua mujh per baaqi hai"
    "khudgarzi ka safar jaari hai" :-)

    RC

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  48. बहुत ही बढ़िया, आपके दुसरे लेख भी वाकई कमल के है !

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  49. kyaa baat...kyaa baat....kyaa baat......sailyut.....auraag bhaayi......!!

    उत्तर देंहटाएं
  50. क्‍या खूब कही आपने-
    पर दिल ….वो साला साइंस के इशारो को नहीं समझता ... ओवर टेक करता है.... कही अटका रहता है…….

    इतने दि‍नों बाद आपकी पोस्‍ट पढ़कर ये खुशी हुई कि‍ आपके लेखन की लय और खूबसूरती ज्‍यों कि‍ त्‍यों बरकरार है।

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  51. ना ना गलत बात अनुराग सर,
    हमने कहा नहीं तो इसका मतलब ये कतई नहीं...
    पुखराज में अमृता प्रीतम....
    Right?
    वैसे अपूर्व भाई वेरीफाए कर सकते हैं.
    :)

    उत्तर देंहटाएं
  52. बहुत ही शानदार लिखा डॉक्टर साहब...

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  53. Padh ke mai bhi pahunch gaya apne store room me, aur dhoondhne lagaa kuchh mazboot rishte.. jo mazboot to hain par dhundhle ho chuke...

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  54. दिल के वास्ते कोई "पॉवर स्टेरिंग " सच इस दिल के वास्ते ...वाकई एक बैचैन चश्मदीद पुकार बहुत ...आपके शब्दों से गुजरती है ...आपको जनम दिन की अनेको शुभकामना तहे दिल से ...देर से सही ये तो नियति है मेरी ...में तारीखों दिनों समय विशेष में अपने को कभी नहीं बाँध पाती हूँ ...इस लिए आज ही सही ...स्वीकार करे ..आभार

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  55. पर दिल ….वो साला साइंस के इशारो को नहीं समझता ... ओवर टेक करता है.... कही अटका रहता है…….जिंदगी की इन तंग गलियों के मोड़ो से ....इत्ते सालो बाद भी वाकिफियत नहीं है..........पता नहीं दिल के वास्ते कोई "पॉवर स्टेरिंग " कब ईजाद होगा .....

    शायद सांस लेते
    या ओंधे पड़े सुस्ताते
    कोई नया पैरहन पहने
    वे कही ...
    मिल जाये
    अरसे से ……एक शुक्रिया मुझ पर बाकी है..
    Bahut khoobsurat prastuti... Sundar shabd sayojan.. lekin 'साला साइंस' shabd kuch khatakta sa prateet hua...
    Bahut shubhkamnayne..

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  56. hamesha ki tarah behtarin,dil ke store room se nikli ye yaadien,wo photo,purane hostel ke kamre tak le gayi.sunder.

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  57. ये खुदगर्जी का सफ़र अब खत्म करें .....किसी नये सफ़र .के ..हमराही से ...हदीस बात करें .....!!

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  58. शायद सांस लेते
    या ओंधे पड़े सुस्ताते
    कोई नया पैरहन पहने
    वे कही ...
    मिल जाये
    अरसे से ……
    एक शुक्रिया मुझ पर बाकी है

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कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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