2010-04-06

दिल ख्वाहिशो का कारखाना है

कहते है दोनों जुड़वाँ है ..अक्सर साथ चलती है .....मसरूफियत की आमद अगर है तो बेख्याली का आना भी तय है ...कहने वाले बेख्याली को "छोटी "कहती है .शायद इसलिए थोडा बागी  मिजाज है  .कभी कभी बेवजह ..बिना इत्तिला किये दरवाजे पर सुबह से दरवाजे पर आ बैठती है.....कुछ ख्याल कभी नज़र बचाकर  कुछ देर गुफ्तगू  करते भी है ...ठहरते नहीं...पर ...दिल ख्वाहिशो  का कारखाना है ..फ़िल्टर करके ...वक़्त के मुताबिक  उनका तर्जुमा करता है  ....ओर आसमान  फिर "डेस्टिनी " का बोर्ड ऊपर उठा देता है ....



मसलसल भागती ज़िंदगी मे....
अहसान -फ़रामोश सा दिन
तजुर्बो को जब,
शाम की ठंडी हथेली पर रखता है......
ज़ेहन की जेब से,
कुछ तसव्वुर फ़र्श पर बिछाता हूँ
फ़ुरसत की चादर खींचकर...
उसके तले पैर फैलाता हूँ
एक नज़्म गिरेबा पकड़ के मेरा....
पूछती है मुझसे
"बता तो तू कहाँ था?


किसी ने नज़्म मांगी थी ....हालात  मुताल्लिक नहीं थे ...पुरानी गठरी खोली ओर "रिफ्रेश "का बटन दबा दिया ....काश ऊपर वाला एक बार उस पहिये (कहते है दुनिया गोल है ) का  बटन  वाला  हिस्सा  मेरे  हाथ  की "रीच" में  करे.....ओर उसका रिफ्रेश बटन ......उफ्फ......दिल ख्वाहिशो  का कारखाना है






चूँकि त्रिवेणी की आदत इस सफ्हे को भी है.....ओर इन बदमाश  खयालो से इंतकाम भी लेना था



वे जो सड़क दर सड़क आवारा फिरते थे
कल सफ्हे पे मिले तो शक्ल   जुदा थी 

उर्दू पहनकर मुये  लफंगे भी  शरीफजादे हो  गये  


81 टिप्‍पणियां:

  1. त्रिवेणी की तीसरी लाइन धारदार है... मेरा चेहरा भी उभर आया...

    खाकसार ने कल भविष्यवाणी की थी अपोर्व को फोन पर की रेडियो सिटी पर बारिश होगी... बूंदाबांदी तो हुई ही.

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  2. गूगल भी ना :) भाव नहीं समझता है... शुध्ध मशीन है कारखाने से निकला हुआ...

    ऊपर अपूर्व पढ़ा जाये !

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  3. दिल ख्वाहिशो का कारखाना है सही कहा ,हर लम्हा कोई न कोई जाग जाती है और फिर से भुलावे दे कर सुलाना पड़ता है उनको ..

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  4. ख्वाहिशें हैं कि कभी पूरी नहीं होती , बहुत अच्छी लगी रचना

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  5. **बेख्याली में बेखुद क़दम ,ख्वाहिशों के गलीचे पर ही चल पाते हैं.
    वरना तो संभल कर ही दुनिया की भीड़ में चलना होता है.
    **तसव्वुर फर्श पर बिछे तो नज़्म बन गयी..
    [पुरानी नहीं ]यह नज़्म तो सदाबहार है ,और त्रिवेणी लाजवाब.

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  6. मसलसल भागती ज़िंदगी मे....
    अहसान -फ़रामोश सा दिन
    तजुर्बो को जब,
    शाम की ठंडी हथेली पर रखता है......
    ज़ेहन की जेब से,
    कुछ तसव्वुर फ़र्श पर बिछाता हूँ
    फ़ुरसत की चादर खींचकर...
    उसके तले पैर फैलाता हूँ
    एक नज़्म गिरेबा पकड़ के मेरा....
    पूछती है मुझसे
    "बता तो तू कहाँ था?


    बहुत सुन्दर...

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  7. 100 बात की १ बात त्रिवेणी लाजबाब है

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  8. सही कहा आपने.. दिल में ख्वाशियो का मॉस प्रोडक्शन चलता रहता है.. एक निकली नहीं कि दूसरी चालु ..
    बड़े दिनों बाद मिली नज़्म अभी भी उतनी ही गर्माहट लिए हुए है..

    त्रिवेणी की आखिरी लाईन ने अच्छे अच्छो को लपेट लिया है.. गुड स्टाइल.. ! ख्याल रखियेगा कोई चुरा ना ले.. आजकल चोरिया बढ़ रही है

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  9. आइन्दा नज्मो को आपका गिरेबा पकड के ये पूछ्ना ना पडॆ इस बात का खयाल रखीय़े ..... उसे बुरा लग जायेगा तो भाव तक देगी नही...फ़िर मन्नते करनी पडेगी....

    आपकी नज़्म .... गरम दोपहर को थोडा शुकुन दे गई...

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  10. ....काश ऊपर वाला एक बार उस पहिये (कहते है दुनिया गोल है ) का बटन वाला हिस्सा मेरे हाथ की "रीच" में करे.....ओर उसका रिफ्रेश बटन ......उफ्फ......दिल ख्वाहिशो का कारखाना है .....khoobsoorat khayal aur zaroori bhi.

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  11. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  12. इस पोस्ट में आये सारे शब्द मेरे फैवरिट हैं...और भाव भी :) इत्तिफाकन, लेखक भी मेरा favorite हैं :)

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  13. कारखाना कहो या खदान कहो एक ही बात है | जिस दिन ख़्वाहिश खत्म साँसे खत्म |

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  14. बेखयाली के ख्याल बड़े अच्छे हैं सर.......शुक्रिया..........

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  15. तुम तो बेधड़क होकर रिफ्रेश का बटन दबा दिया करो.....तुम्हारी नज्मो को बार बार पढना भी अच्छा लगता है! अगर ये कारखाना बंद हो जाये तो सांस लेना भी दूभर हो जाये! ये ख्वाहिशें ही तो जिलाए रखती हैं!

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  16. जानते है आपकी नज्मो के साथ उनकी भूमिका का जादू भी सर चढ़कर बोलता है
    "दिल ख्वाहिशो का कारखाना है ..फ़िल्टर करके ...वक़्त के मुताबिक उनका तर्जुमा करता है ....ओर आसमान फिर "डेस्टिनी " का बोर्ड ऊपर उठा देता है ...."
    कसम से आप डॉक्टरी छोड़ किसी ओर पेशे में चले जाइए गर मसरूफियत में ये आलम है तो खुदा ऐसी मसरूफियत आपको बार बार दे ,,इस बार बहुत देर आपने खुदगर्जी का सफ़र किया त्रिवेणी की सफ्हे को नहीं हमें भी आदत है मेरी फेवरेट त्रिवेणी में से एक है

    उर्दू पहनकर मुये लफंगे भी शरीफजादे हो गये
    वाह्ह्ह
    ओर हाँ खयालो से इंतकाम जारी रखिये हम जैसो का भला हो जाएगा

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  17. सच कहते है आप कि" दिल ख्वाहिशो का कारखाना है" ना जाने कितनी ख्वाहिशे हमारे दिल में बन रही है। ये अलग बात है कि उन्हे पूरा करने में हाथ पैर ही मार रहे है। आपकी इस नज्म के शब्दों का जादू गजब का है। ये जादू हमें सुकून देता है। और त्रिवेणी तो गजब ढा गई।

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  18. निशब्द..समझ में नहीं आता कि क्या लिखूं..

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  19. इतिफाकन आना हुआ आपके ब्लॉग पर लगा यहाँ तो पहले आ जाना चहिये था,आपने तो keyboard तोड़ रखा है .
    बहुत खूब

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  20. जिन बटनों से दुनियां जन्नत हो सकती है,वह सब तो असंख्य दानवी मनुष्यों के हाथों है जिसे उन्होंने केवल अपने घर को जन्नत बनाने के लिए कैद कर रखा है....और साथ में ये वृहत अभियान में लगे हुए हैं-दुनियां को जह्हन्नुम बनाने का...

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  21. उर्दू पहन कर....

    त्रिवेणी जिंदाबाद..!!

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  22. आसमान से टपका तो चाँद पे जा अटका वही कहावत हो गयी , शायद ये कहावत में थोड़ी बहुत काट छाट है तो , मगर यहाँ के लिए फिट है .... ऊपर के आपके लेख से उतर ही रहा था डाक्टर साहब के निचे त्रिवेणी ने लहूलुहान कर दिया दिल को ... अमा ऐसे कैसे लिख लेते हो आप ..


    अर्श

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  23. एक नज़्म गिरेबा पकड़ के मेरा....
    पूछती है मुझसे
    "बता तो तू कहाँ था
    kamaal hai anuraag ji...ab to hamara bhi yahi sawaal rahega... :)

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  24. अनुराग जी, आप को पढ़ा तो ऐसा लगा जैसे ठंडी और ताज़ी हवा का एक झोंका आया है,

    एक नज़्म गिरेबा पकड़ के मेरा....
    पूछती है मुझसे
    "बता तो तू कहाँ था?

    मेरे पास शब्द नहीं है आप कि तारीफ के! सचमुच!

    वे जो सड़क दर सड़क आवारा फिरते थे
    कल सफ्हे पे मिले तो शक्ल जुदा थी

    उर्दू पहनकर मुये लफंगे भी शरीफजादे हो गये

    वाह! कमाल का लिखा है !

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  25. har baar ki tarah dhardaar...

    http://dilkikalam-dileep.blogspot.com/

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  26. हा...हा...हा ... आधी रात को हंसी का कारखाना खुल गया .....

    एक नज़्म गिरेबा पकड़ के मेरा....
    पूछती है मुझसे
    "बता तो तू कहाँ था?

    आपका तो गिरेबा पकड़ लेती है... हमारी तो अंगुली भी नहीं पकड़ती ... शायद उर्दू पहननी पड़ेगी ... :-)

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  27. ये नज्में भी हाथापाई पर उतर आयी! क्या जमाना आ गया है।

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  28. मसलसल भागती ज़िंदगी मे....
    अहसान -फ़रामोश सा दिन
    तजुर्बो को जब,
    शाम की ठंडी हथेली पर रखता है......
    ज़ेहन की जेब से,
    कुछ तसव्वुर फ़र्श पर बिछाता हूँ
    फ़ुरसत की चादर खींचकर...
    उसके तले पैर फैलाता हूँ
    एक नज़्म गिरेबा पकड़ के मेरा....
    पूछती है मुझसे
    "बता तो तू कहाँ था?

    पुराने हुए तो क्या हुआ
    नज्मों ने ढूंढ हीं लिया आपको, ले ही आये पकड़ के महफ़िल में...
    नहीं तो बड़ी तेज धूप रहती है आजकल
    महफ़िल सूखती रहती है
    कुछ फनकारों के 'अब्सेंस' में

    क्या करें दिल ख्वाहिशों का कारखाना जो है

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  29. उर्दु पहनने की कोशिश करेंगे डाक्साब।गज़ब लिखा है आपने।

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  30. अनुराग जी एक बात कहूंगी आपकी पोस्ट पर एक दो टिपण्णी देख के मुझे ऐसा लगता है के किन्ही खास शायर जैसे गुलज़ार को पकड़ने के लिए एक खास समझ का होना जरुरी है .इससे पहले भी मैंने अनुभव किया है जैसे जब आपने अपने दोस्त मेजर गौतम पर एक नज़्म कही थी "मेरे वाले को गोली लगी है "उसे पढ़कर भी एक साहब ने कहा था वे समझ नहीं पाए जबकि वे खुद कहानी लिखते है .यहं भी कुछ ऐसा महसूस किया .ओर दुःख भी.
    here you portray life of a busy man who wants to read and write but because of busy schedule he is unable to do so.
    this is the simple thing अब उम्म्मीद करती हूँ के लोग समझेंगे

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  31. बेहद खूबसूरती के साथ आपने जेहनी उलझनों को तरतीब देते हुए दिल कि बात कि है ....उसके बाद नज़्म पढना भी अच्छा लगा ..

    एक नज़्म गिरेबा पकड़ के मेरा....
    पूछती है मुझसे
    "बता तो तू कहाँ था?

    आप के इन मिसरों ने गुलज़ार कि वो नज़्म याद दिला दी जिसमे थके हरे गुलज़ार कि ऊँगली उन्ही कि एक नन्ही नज़्म थाम लेती है ...

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  32. वे जो सड़क दर सड़क आवारा फिरते थे
    कल सफ्हे पे मिले तो शक्ल जुदा थी

    उर्दू पहनकर मुये लफंगे भी शरीफजादे हो गये




    waaaaaaaaaaahhhh

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  33. "उर्दू पहनकर मुये लफंगे भी शरीफजादे हो गये."

    बहुत गजब. दिल ख्वाहिशों का कारखाना ही है. प्रोडक्शन भी गजब होता है.

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  34. उर्दू पहनकर मुये लफंगे भी शरीफजादे हो गये
    आपने यह लाइन किस के लिखी समझ नहीं आ रही। क्‍या हम हिन्‍दी वाले? चलिए छोड़िए भी। अच्‍छा आलेख था पर उर्दु अधिक होने से समझने में कठिनाई हुई। बस जैसे-तैसे समझ ही लिया कि सपने ज्‍यादा मत देखो।

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  35. @अजीत जी ....ये लाइन उन बदमाश ख्यालो के वास्ते लिखी थी....जो इधर उधर आवारागर्दी करते घूम रहे थे .पकड़ में नहीं आ रहे थे .......उन्हें लफ्जों का लिबास मिला तो जेंटलमेन हो गए .....ये एक शायर की अपनी नज़्म से गुफ्तगू है....ओर ख्यालो को उलहाना....

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  36. एक नज़्म गिरेबा पकड़ के मेरा....
    पूछती है मुझसे
    "बता तो तू कहाँ था?

    बहुत खूब.......!!

    पूरे महीने भर का हिसाब माँगा इसने ......

    वे जो सड़क दर सड़क आवारा फिरते थे
    कल सफ्हे पे मिले तो शक्ल जुदा थी

    उर्दू पहनकर मुये लफंगे भी शरीफजादे हो गये


    किसे पकड़ा है कॉलर से ....???

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  37. आसमान फिर "डेस्टिनी " का बोर्ड ऊपर उठा देता है ....दिल से निकली एक उम्मीद ...फैज की एक नज्म है
    जान बाकी है तो करने को बहुत कुछ है अब वो जो कुछ के मेरी जाँ नहीं करने देते ....

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  38. शुक्रिया नीलिमा जिन दिनों ये नज़्म लिखी थी उन दिनों वक़्त के साथ ऐसी कुश्तिया चल रही थी.....गुलज़ार साहब को मै उन लोगो में मानता हूँ जो जिंदगी में गैर मामूली चीजों को अपनी नज्मो में इतना तवाजो देकर ऐसे शामिल करते है ...के लगता है उफ़ कैसे पकड़ा है इस आदमी ने ...मसलन जब वे लिखते है

    "उबलती हंडिया ओर इतनी सारी /सभी ने जिंदगी चूल्हे पे रखी है /न गलती है न पकती है....."
    तो मै फ़िदा हो जाता हूँ ......
    ओर जब अपनी मां से शिकायत करते है इतनी मासूमियत से जिंदगी से बिना तल्ख़ हुए ........तो आप उन पर निसार हो जाते है .खास तौर से ये जानकार के उन्होंने एक साल की उम्र में अपनी मां को खोया है ......

    मै तुझे पहचानूँगा कैसे /तुझे देखा ही नहीं /ढूँढा करता हूँ तुम्हे /अपने ही चेहरे में कही /लोग कहते है मेरी आँखे मेरी मां सी है /यूँ ही लबरेज है पानी से मगर प्यासी है /कान में छेद है पैदाशी आया होगा /तुने मन्नंत के लिए कान छिदया होगा / सामने दांतों में वक्फा है तेरे भी होगा /एक चक्कर तेरे पाँव तले भी होगा .../जाने किस जल्दी में थी जन्म लिया ओर द... और देखेंौड़ गयी/क्या खुदा देख लिया था की मुझे छोड़ गयी /मेल के देखता हूँ मिल ही जाए तुझसी कही /तेरे बिन ओपरी लगती है मुझे सारी जमी /तुझे पहचानूँगा कैसे तुझे देखा ही नहीं /

    एक बार किसी ने मुझसे कहा था के काश साइंसदान आने वाले समय में कोई ऐसा सोफ्टवेयर इजाद करे जिससे सारी भाषायो का अनुवाद हो सके .तो मै सारी दुनिया की किताबे पढ़ सकूँ.....आज तक मुझे वो बात याद है .....क्यूंकि किताबो ने मुझे भी बहुत कुछ दिया है इतना के......इतना के ....

    ...खैर मेरी भी दिली तमन्ना होती है ....के एक ऐसा कमरा हो जिसमे ढेर सारी किताबे .....पसंदीदा फिल्मो की सी डी .....फर्श पर सिर्फ एक गद्दा .....मोबाइल ऑफ़ ....उफ़ दिल ख्वाहिशो का इक कारखाना है

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  39. आसमान फिर "डेस्टिनी " का बोर्ड ऊपर उठा देता है ....
    उर्दू पहनकर मुये लफंगे भी शरीफजादे हो गये !
    वाह डॉक्टर वाह!
    बहुत ही सटीक शब्द हें, जिनकी सुंदरता शब्दों में व्यक्त नहीं की जा सकती.
    ऐसा लिख लिख कर तुम भी दिल की ख्वाहिशें और ज्यादा ही बढ़ा देते हो.
    लगे रहो .....
    ऊपर वाला और भी दे.

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  40. वाह , कारखाना है तभी मर्जी से पोस्ट्स भी बनी जा रहीं हैं , किसी के लिए कभी कारखाना तो कभी जमीन , जो बो रहे हैं उग रहा है ...
    वे जो सड़क दर सड़क आवारा फिरते थे
    कल सफ्हे पे मिले तो शक्ल जुदा थी
    उर्दू पहनकर मुये लफंगे भी शरीफजादे हो गये
    किस किस से मुलाकात कर आते हैं आप ?खैर नतीजे हमेशा ही अच्छे निकलते हैं |

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  41. मसरूफि‍यत और बेख्‍याली- कितना मुश्कि‍ल है दोनों को साथ लाना। और अगर ये साथ आ गये तो समझो अंदर का शायर कहीं और ठि‍काना ढूँढेगा।

    (नये उपमान काबि‍ले-तारि‍फ हैं।)

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  42. दिल ख्वाहिशों का कारखाना है जितना मिले उससे ज्यादा ही मांगा करता है। ...और ख्वाहिशें भी कैसी कैसी, मसरूफियत हो न हो ख्वाहिशों का कारखाना धड़ाधड़ चलता है, प्रोडक्शन हमेशा चालू ही रहती है।

    ...खैर आपको पढ़ने के बाद गुलजार साहब की याद आना तो लाजमी ही है। कितनी ही बातें हैं, कितनी ही ख्वाहिशें हैं जो वो चुपके से हम सबके कानों में फूंक जाते हैं। पता नहीं किस उम्र से उनकी पढ़ती गुनती आ रही हूं, अब तो याद भी नहीं पड़ता। पर आप हैं कि याद दिला जाते हैं कितने दिन हुए जब तूने गुलजार साहब की नज्म पढ़ी थी।

    ....पर आप इतने दिनों में पोस्ट न लिखा करें वरना नज्मों की तरह हम सब भी आपका गला पकड़कर पूछने लगेंगे कि बता इतने दिन तू कहां था

    ....और दुआ करूंगी आपकी ये दिली तम्न्ना भी पूरी हो जाए ...के एक ऐसा कमरा हो जिसमे ढेर सारी किताबे .....पसंदीदा फिल्मो की सी डी .....फर्श पर सिर्फ एक गद्दा .....मोबाइल ऑफ़ ....उफ़ दिल ख्वाहिशो का इक कारखाना है

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  43. एक नज़्म गिरेबा पकड़ के मेरा....
    पूछती है मुझसे
    "बता तो तू कहाँ था?


    युगों से एक नज़्म लिखने बैठा हूँ,
    अफ़सोस...
    ...पूरी नहीं होती.

    मेरी नज़्म !
    मेरी ज़िन्दगी !!
    मेरा आत्मज्ञान !!!
    और हा,
    ....मेरा प्रेम !!!!


    एवें ही

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  44. कान में छेद है पैदाशी आया होगा /तुने मन्नंत के लिए कान छिदया होगा /

    आंसुओं की हद तक परेशां करने वाली line...

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  45. अनुराग जी ! आप सचमुच शब्दों के सौदागर हैं ...कुछ उधारी चलेगी ?

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  46. दिल ख्वाहिशों का कारखाना है... सोच रहा हूँ कितना प्रोडक्सन है. कभी हड़ताल भी नहीं होती यहाँ तो...

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  47. गज़्ज़ब त्रिवेणी..साहब इंतकाम बदमाश खयालों से लिया गया या हम मुए पाठकों से..
    एक बुजुर्ग सज्जन की याद अभी भी जेहन के फ़्रीजर मे ताजा है जो जब किसी से नाराज होते थे..तो इतनी खालिस और शीरीं उर्दू मे गुस्सा उतारते थे कि जैसे उनका गुस्सा उर्दू के लफ़्ज-दर-लफ़्ज आसमानी फ़ुहार की तरह बदन को भिगोता..कि बस उन्हे गुस्सा दिलाते रहो..और मस्त भीगते रहो! कम्बख्त जबान ही ऐसी है कि किसी को गाली भी दो तो सामना वाला बोलेगा..’सर जी वन्स मोर..प्लीज्ज!’ ;-)
    और ख्वाहिशों का कारखाना..कारखाना कैसा भी हो..मगर प्रोडक्ट को बाजार के तमाम मसाइल से गुजरते हुए अपनी डेस्टिनी चुननी पड़ती है..किसी की ख्वाहिशों से सारा बाजार जगर-मगर सजा रहता है..तो कुछ की ख्वाहिशें डिपार्टेमेंटल स्टोर के सबसे आखिरी के भूले हुए किसी शेल्फ़ पर धूल खाती अपनी एक्स्पायरी डेट का तर्जुमा पढ़ती रहती हैं..
    ..बस जिंदगी!!

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  48. और शायद उम्मीदें भी ख्वहिशों के इसी कारखाने का कोई बाइ-प्रोडक्ट होती होंगी क्या!..हर ख्वाहिश के साथ मुफ़्त मे मिलती तो है..

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  49. अरे डाक्टर साहब हम तो रिफ्रेश(फॉयरफॉक्स में रीलोड) बटन बहुत दबाते हैं, पर इतनी बढ़िया कविता नहीं निकलती! :-(

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  50. का डॉक्टर साहब अबहीं भी लिखते हो !!
    आप को पढना सदैव ही रोचक और मनोरंजक रहा है.
    आप दिल चुराने में माहिर हैं !!
    आप चोट्टे हैं, क्या दिल की दुकान खोलेंगे क्या !!
    आपकी दिल चुराने की गन्दी आदत के कारण हमें कहना पड़ रहा है- उधौ मन न भय दस-बीस.

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  51. उर्दू पहन कर मुए लफंगे भी शरीफ जादे बन गये। वाह जबरदस्त पंक्ति।
    आपका ख्वाहिशों का कारखाना पढ कर गालिब का शेर याद आ गया ।

    हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले
    बहुत निकले मेरे अरमान, मगर फिर भी तो कम निकले ।

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  52. "उर्दू पहनकर मुये लफंगे भी शरीफजादे हो गये"
    हमें उर्दू नहीं आती, इसलिये हम मुये लफंगे ही रह गये. वैसे उर्दू हमें बहुत प्यारी है, हम लखनऊ में जो पैदा हुये थे...हमें भी शरीफजादी होना है...कोई टीचर बताओ ना डॉक्टर...हमें भी उर्दू पहननी है...कोई दर्जी की राह सुझाओ ना...
    आपको पढ़ना मानो बहती हवा में सेमल की रुई सा उड़ना है...

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  53. वैसे मुझे मालूम है कि ये लाइन आपने शब्दों के लिये कही थीं, पर मुझे उर्दू न जानने का बहुत दुःख है और मैं इसे सीखना चाहती हूँ.

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  54. दिल ख्वाहिशो का कारखाना है..साला आधी जान तो टाईटल से निकल जाती है और फ़िर इस बार की त्रिवेणी...

    आपके खयाल तो बहुत जहीन है, सिर्फ़ गुफ़्तगू करते है.. यहा तो मारा मारी चलती है..आवाजे आती है कि ’ये काटा- वो काटा’.. खून कही दिखता नही..

    मेरे दिन तो सब के सब अहसान-फ़रामोश ही रहते है.. तजुर्बो की कमी है तो बस फ़ेसबुक/बज़ पर सवाल दाग देता हू.. कुछ भले मानस समझा भी देते है..उन्हे ही गुल्लक मे डालता रहता हू.. नज़्मे तो अब हक मागती है.. इस बार लगता है कि भीतर की पार्लियामेन्ट मे रिज़र्वेशन बिल तो आ ही जायेगा..

    बाकी रिफ़्रेश बटन रिस्की है.. सबकुछ फ़िर से लोड कर देगा.. रिसेट बटन की दुआ करिये.. जहा अच्छे पल आये, ज़िन्दगी को सेव करिये और जहा कुछ इधर उधर होता है तो वापस रिसेट.. उन्ही अच्छे पलो से फ़िर से स्टार्ट :)

    और उफ़्फ़ ये उर्दू.. लफ़न्गो की फ़ार्मल ड्रेस बनती जा रही है... मुझे भी शरीफ़ और जहीन बनना है :)

    वैसे लेबल काफ़ी ज़हीन है :) very very beautiful... its you and only you.. hats off!!

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  55. आपकी नज़्म गुलजार की एक नज़्म में उतरती है ....
    शीर्षक है ...." नर्सिंग होम "


    कभी हाथों से उड़ाता हूँ कभी मारता हूँ
    वक़्त बेरंग से कीड़े की तरह
    दस्त-ओ-बाजु पे मेरे
    रेंगता रहता है दिन भर
    रात बोसीदा रजाई की तरह ओढ़े हुए
    और नाखूनों से तारों को खुरचते रहना
    चाँद भी एक फफूंदी लगी रोटी की तरह सर पे टंगा रहता है

    कैसे कटे कोई बीमारी में बेकारी के दिन?
    उलटी लटकी हुई बोतल से उतरती हुई फीकी बूंदें ....
    दस्त ओ बाजु में मेरे
    रेंगती हैं दिन भर
    एक बेरंग से कीड़े की तरह ....!

    उत्तर देंहटाएं
  56. @हरकीरत जी........इत्तेफाक से आज सुबह ही फेसबुक पे ये नज़्म डाली है ..ओर एक देर रात इन्ही नज्मो को (नया ज्ञानोदय में )पढ़कर नींद ख़राब हुई थी .....
    @अपूर्व @पंकज....ज्यू ज्यू दिन बीतते है .स्कोर बढ़ता चला जाता है ....इस कारखाने का .मंदी का कोई असर पढता नजर नहीं आता

    उत्तर देंहटाएं
  57. चलो इन ख्यालों को थोडा विराम दें , आराम की तो फुरसत नहीं देती जिन्दगी ...
    आपका ख्याल मन को भा गया , इस छोटे से दिल की एक बड़ी सी तमन्ना लिए घुमते है हम भी
    एक कमरे में किताबें और मै बस और कोई न हो ...
    ये दिल है और इसकी आरजू बेवजह

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  58. दिल ख्वाहिशो का कारखाना है..........कहने को इतना खुबसूरत एहसास .......... काश मेरे पास भी एक अदद दिन होता कुछ न करने को ......... न भूख होती न प्यास ......... देखो अनुराग भाई क्या हो गया इस सफ्फे से गुजरने के बाद........ इतना अच्छा कैसे लिख लेते हो..........?????????

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  59. डॉ साहब
    नज़्म तो वाकई बहुत खूबसूरत है.........
    अंतिम पंक्ति में ...."बता तो तू कहाँ था? लिख कर आपने अपनी नज़्म को गुलज़ार साहब की ओर धकेल दिया........शानदार नज़्म के आखिर में गुलज़ार साहब की नज़्म के उन्वान को चस्पा कर देने की वजह समझ में नहीं आयी .....!

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  60. सभी ने सभी कुछ कह दिया है आपकी पोस्ट पे यूँ भी कहना मुश्किल सा होता है.
    कुछ राजे निहां दिल का अयां हो नहीं सकता.
    गूंगे का सा है ख्वाब बयां हो नहीं सकता.



    वे जो सड़क दर सड़क आवारा फिरते थे
    कल सफ्हे पे मिले तो शक्ल जुदा थी

    उर्दू पहनकर मुये लफंगे भी शरीफजादे हो गये


    आदमियत कुछ और शैय है इल्म है कुछ और शैय.
    कितना तोते को पढ़ाया पर वो हैवां ही रहा..

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  61. मसलसल भागती ज़िंदगी मे....
    अहसान -फ़रामोश सा दिन
    तजुर्बो को जब,
    शाम की ठंडी हथेली पर रखता है......
    ज़ेहन की जेब से,
    कुछ तसव्वुर फ़र्श पर बिछाता हूँ
    फ़ुरसत की चादर खींचकर...
    उसके तले पैर फैलाता हूँ
    एक नज़्म गिरेबा पकड़ के मेरा....
    पूछती है मुझसे
    "बता तो तू कहाँ था?


    shabad nahi hai
    aap itni sunder upmaayen dete hain ...ki bas man sakun se bhar jata hai

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  62. इस त्रिवेणी के साथ नाइंसाफी है...सरासर नाइंसाफी। एक नहीं कई सारी। एक तो यही कि इस एक को अकेले आना चाहिये था...बस इन तीन लाइनों को पूरे पोस्ट में...दूजे ये कि एक बेमिसाल नज़्म के साथ स्पेस शेयर करना पड़ रहा है इसे...और तीजे कि डा० साब को बकायदा समझाना पड़ रहा है इसको व्याख्या सहित।

    इससे बेहतर तो ये होता कि शुरू में ही पढ़ लेता मैं...कम-से-कम इन टिप्पणियों से तो बच जाता। शुक्र है नीलिमा का...शुक्र है कि वो हमारी जमात में ही शामिल है।

    ब्लौग से मन उचाट-सा हो रखा है। एक दोस्त, जो कि ब्लौगर नहीं है, लेकिन मेरी ही तरह आपकी और कुश की फैन है, का उलाहना भरा एसएमएस आया कि डा० साब की ये पोस्ट पे कुछ लिख तो दो....

    शुक्र है उस उलाहने का भी।

    इस त्रिवेणी पे सब कुछ कुर्बान...आखिरी जुमले पे बचा-खुचा भी। ऐसा जुमला सदियों में एक बार बुना जाता है....कभी कोई मीर था...फिर कोई ग़ालिब...जाने कितनी पीढियां बरबाद कर गये दोनों...और विरासत में छोड़ गये गुलज़ार...और उसने भी लेगेसी लगता है पास-आन कर दिया इस कमबख्त डा० को।

    you are an alien in this hindi bloging...

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  63. उर्दू पहनकर मुये लफंगे भी शरीफजादे हो गये ...

    wah kya line hai.. chura liya hamne...

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  64. क्या बात है डौक्टर साहब.. बहुत अच्छे!

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  65. हमेशा की तरह ये पोस्ट भी बेह्तरीन है
    कुछ लाइने दिल के बडे करीब से गुज़र गई......

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  66. दिल ख्वाहिशो का कारखाना है सही कहा ....
    itni khubsurat rachna kaise likhte hai aap log....
    kaash main bhi itna achh alikh pata...
    bahut hi behtareen...
    regards
    shekhar
    http://i555.blogspot.com/

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  67. Refresh Button se page Reload to ho jayega magar yadonke virus bhee saath aa jaayenge.

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  68. ek khwahish hamari bhi shaamil ho... yeh refresh button dabaate rahiyega!
    bahut din baad aap ki yeh nazm padhi... lekhni ko taraashna bhi ek sangeetkar ke riyaaz jaisa hai...padhne wale ke chehre par muskaan khudbakhud uski bekhayali se kheench laati hai..
    bahut khoob!

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  69. Hello There

    So hooked on to your blog.. Just adore the way you pen your observation. ever thought of publishing your book? You will do great..
    Glad to know you are from meerut too. I was brought up in meerut .. now in US ..
    Rajni

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  70. मुझे ये शायर डाक्टर पसंद है...:))

    नीरज

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  71. Daactar Saahab,
    Tabiyat acchhi ho gayee.....
    Hum bhi shareefzaade ho gaye!

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  72. जीवन की आपाधापी में
    ऐसा अक्सर होता है
    तनहाई में कोई
    एक शिकायत करता है--
    "बता तो तू कहाँ था?
    ---आनंद आ गया पढ़कर।
    -और हाँ,
    त्रिवेणी वाकई लाज़वाब है

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  73. Dr. Anuraag...aap ka introduction to lajawaab hain....sentiyaane ke jagah theek khoji aapne...kaise chupe rahe aap hamse itne dino.....aur is treveni par to ham Kurbaan

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  74. एक नज़्म गिरेबा पकड़ के मेरा....
    पूछती है मुझसे
    "बता तो तू कहाँ था?
    Bahut sundar rachna hai Anurag ji!Ab aapke blog par aksar aana hoga....

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  75. इसे पढ़कर हमरा रीफ्रेश का बटन तो दब गया ।

    उत्तर देंहटाएं
  76. ख्वाहिशें हैं कि कभी पूरी नहीं होती , बहुत अच्छी लगी रचना

    उत्तर देंहटाएं
  77. ख्वाहिशें हैं कि कभी पूरी नहीं होती , बहुत अच्छी लगी रचना

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  78. You have inherited Gulzar intellectually, artistically and philosophically. Definitely you need to reconsider your full time profession Doctor.
    Enjoyed reading you like always.
    Anticipating that your pen spills even more ink... oops I meant that you keep tapping the keys on your PC (Ink aur pen kaa zamaana nahi raha na ab)

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कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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