2010-05-04

मौजजे होते है ....ये बात सुना करते थे

उम्र तकरीबन एक साल.. गोरा  रंग ...घुंघराले लम्बे बाल ..एक हाथ में काले मोतियों से बना कड़ा ...बात करती आँखे ...जिनका स्केलेरा बिलकुल व्हाईट है...दुनियादारी से. .नॉन पोल्यूटिड ...  अभी अपने  छह साला भाई पर जमी है ....जो बेमन से बस्ते को पीठ पर टांग रहा है....कई दिनों की छुट्टी  उदासी को भी किताबो संग रख देती है .. ओर  ... .पैरो को धीमा ..हाथ में .पानी की बोतल  थामे...आहिस्ता आहिस्ता  सर झुकाये   बड़ा  स्कूल   के गेट  तक का फासला तय  कर रहा है..... ..कुछ कदम का फासला ........  नन्हे ने  उसे अपनी आवाज में बुलाया है ......बड़ा जैसे दुनियादारी की सोचो में अब भी गुम है ....कदम दर कदम भाई का पीछा करती.... नन्हे की निगाहों में एक अजीब  सी बैचेनी  है..... ......सड़क की दूसरी  जरूरी  -गैरजरूरी ... तमाम आवाजो के बीच .........नन्हे  ने  मां की   गोद से उचक कर... फिर आवाज दी है ..गेट के नजदीक ....बड़ा  पीछे मुड़ा है.....एक मुस्कराहट दी है........नन्हा खिलखिला उठा  है.....
......बट्टा रख दो इस गुजरते लम्हे पे..........हाय पॉज़ का बटन दबायो कोई.!!






आज की त्रिवेणी...

"सलेक्शन "

सफ़ेद चादर  पे फलक की....  सलवटे है सुबह से
 काले बादल के  कई टप्पे यहाँ वहां पड़े है ..

रंगरोगन करने वाला  तो कोई तजुर्बेकार  चुनना था  तुमने .

67 टिप्‍पणियां:

  1. बात करती आँखे ..
    रख दिया जी पेपरवेट... अब री-प्ले तो हो नहीं सकता... पॉज़ ही करना पड़ेगा

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  2. कई दिनों की छुट्टी के बाद उदासिया अपनी भी किताबो के बीच थोक में मिलती थी... नन्हे की आवाज़ जैसे कुछ लम्हे हम मिस कर देते है.. मुझे तो लगता है नॉन पोल्यूटेड लाईफ को ही पॉज कर देना चाहिए.. पर आप के लिए प्रिस्क्रिप्शन है.. यु पॉज ना लिया करे..

    और ऊपर वाले ने कल ही आपकी शिकायत की थी मुझसे.. बोला कि यार ये तुम्हारा डॉक्टर सवाल बहुत उठाता है.. और देखिये आज फिर आपने ऊपर वाले की रिक्रूटमेंट सर्विस पर सवाल उठा दिया.. अब क्या समझाऊ आपको मैं... जाने दीजिये

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  3. एक ही उम्र (बचपन) की भी कई मोहक अदाऍं, तस्‍वीरें होती हैं, जी चाहता है उसे कैद कर लें, अपने बीते हुए बचपन को दुबारा देखने के लि‍ए, समझने के लिए और उस फासले को ऑकने के लि‍ए भी, पाटने के लि‍ए भी।
    त्रि‍वेणी का रंगरोगनकार भी कोई बच्‍चा रहा होगा, जो सि‍लेट पर यूँ ही घि‍स रहा होगा चॉक........

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  4. ***मुश्किल ही यही है कि गुजरते लम्हों को कोई रोक नहीं सकता.खुद ही किसी लम्हें में हम ठहर जाएँ तो बात अलग है.
    ***बच्चों की मासूमियत तो अब भारी बस्तों के तले दबी है...
    ***कुछ क़दम का फासला नन्हे भी जल्दी तय कर लेगा !
    ----
    *****त्रिवेणी..
    सुना है ईश्वर को भी बच्चे ही प्यारे लगते हैं इसलिए तूलिका भी किसी नन्हे के हाथों में दी होगी..तभी तो बेतरतीब सब बिखरा है वहाँ!

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  5. ..बट्टा रख दो इस गुजरते लम्हे पे..........हाय पॉज़ का बटन दबायो कोई.!!

    waah..bas freez hi kar dena us lamhe ko .."stop" ya "statue" bol kar...

    aap ki triveni bhi bhali bhali si lagi doc saab

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  6. थोड़ी देर के लिए पॉज़ हो गया.

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  7. एक लम्हे को लेकर रची गई बहूत खूबसूरत रचना।

    त्रिवेणी भी कमाल की है।

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  8. हाय! इन बेईमान लम्हों पे जिन्दगी ठहरती क्यूँ नहीं ...
    जिन्दगी एक बार तुझसे भी बेवफाई करने को जी चाहता है .....

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  9. ....बट्टा रख दो इस गुजरते लम्हे पे....
    जो हर्षितमुख है, वह स्‍वयं भी प्रसन्‍न रहता है और दूसरों के चेहरे पर भी मुस्‍कान ले आता है।

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  10. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  11. सही कहा आपने अनुराग जी कुछ लम्हें होते ही ऐसे है कि बस मन करता है कि बस यह पल यही रुक जाए। बीती जिदंग़ी को जब एंकात में बैठकर थ्री डी में देखो तो पता नही कितने लम्हें निकल आऐगे। और जो आपने बट्टा शब्द प्रयोग किया है सच कितने दिन हो गए इस शब्द को प्रयोग किए हुए। और त्रिवेणी की प्रयोगशाला में मुझे कम्पाऊंडर बना लो अनुराग जी।

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  12. त्रिवेणी तो लाजवाब है ...
    ऊपर वाले ने पाज का बटन बनाया तो जरूर होगा कभी हाँथ लगा तो बताएँगे

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  13. एक डाक्टर ने एक साहित्यकार को दबा रखा है ऎसा लगता है . खैर बट्टा रख ही दिया हमने .....

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  14. wo lamha waqai "pause" hokar mere zehan mein bas gaya hai...us nanhe mein mere "betu"(nephew) ki tasveer hai....jo mujhe bus mein chadhta dekh kuchh yun hi bechein hokar mere palatkar muskurane ka intzaar kiya karta tha....aur ek baar dekh bhar lene se hi bas ....jane kya milta hoga use...:-)

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  15. " काले बादल के कई टप्पे "... इसका जवाब नहीं ।

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  16. आपने तो ऑलरेडी उस वक्त को बाँध कर बटुए में रख लिया है...बटुआ खोल कर इतनी खूबसूरत झाँखी दिखाने के लिए शुक्रिया!

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  17. और हाँ...कमाल की त्रिवेणी आपकी...उधर अपूर्व की कविता और राइटर (दर्पण) की गजल...सब कमाल है
    अभी सोचालय पे जाना तो बाकी ही है...

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  18. वाकई कुछ लम्हों पर बट्टा रखने का ही मन होता है ...काश रुक जाये किसी तरह .त्रिवेणी तो बस कमाल है.

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  19. फ्रीज़'!!!!!!अभी तक बट्टा रखा है .

    एक लम्हे को कैमरे में बंद करके आपने उसका कितना शानदार प्रिंट आउट निकाला है .मुझे अपना छोटा भाई याद आ गया तब पांच की थी ओर वो डेढ़ का .कई बार क्लास के गेट तक छोड़ने आता .घर आने पर मुझे देख जैसे खुश होता था आज तक याद है जैसे मेरे पैरो की आहट न मालूम उस को कैसे हो जाती थी.
    पर कुश का कहना सही है
    यु पॉज ना लिया करे..इस प्रेस्क्रिप्शन को थोडा फोलो करिए !!!!

    " काले बादल के कई टप्पे"
    हाय !!!!

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  20. बट्टा रख दो इस गुजरते लम्हे पे..........हाय पॉज़ का बटन दबायो कोई.!!
    काश ऐसा हो पाता!

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  21. सुंदर शब्द चित्र. 'पॉज के बटन' ने कमाल की अभिव्यक्ति दी है.
    'काले बदल के टप्पे' त्रिवेणी को असरकारी बना रहे हैं.
    ..बधाई.

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  22. सोचती हूँ...कहाँ कहाँ पॉज़ करुँगी! काश किसी सी.डी. में सारे खुशनुमा लम्हे रिकॉर्ड हो जाते! बस वही सी.डी. बार बार प्ले होती रहती!

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  23. सफ़ेद चादर पे फलक की.... सलवटे है सुबह से
    काले बादल के कई टप्पे यहाँ वहां पड़े है ..

    रंगरोगन करने वाला तो कोई तजुर्बेकार चुनना था तुमने .

    वाह...वाह......
    हमने फलक से पूछा
    ये कौन छोड़ गया है सलवटें
    वह मुस्कुरा के बोला
    रात चाँद आगोश में लिए
    ............guess

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  24. लाजवाब ..कुछ लम्हों को काश वही रोका जाता तो ज़िन्दगी कुछ तो जीने लायक होती .

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  25. aise lamhe aksar aankho ke aage se gujar jaate hain, par hum dhyaan nahi dete.is khubsurat lamho ko mehsoos karna aur phir utni hi khubsurati se sabdho pe pirona taaki lage ki hum sabhi us lamhe ka hissa hain.

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  26. लम्हे को रोका तो नहीं जा सकता लेकिन हर लम्हे को पॉज किये जाने लायक बनाने की कोशिश की जा सकती है और की जानी चाहिए.

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  27. haaye re...

    koi pause ka button dabaayo re..

    kya baat kahi hai..

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  28. डॉक्टर साब क्या ऑपरेशन के वक्त भी ऐसी ही बातें मरीज को सुनाते हैं.. अमा बेहोश करने की ज़रुरत ही न होती होगी। मरीज मंत्रमुग्ध और लो जी हो गया ऑपरेशन।
    जनाब हम तो आपको पढ़ते वक्त हमेशा पॉज का बटन दबा देते हैं बाकी के विंडोज़ पर..सच्ची। भाई जान जिस दिन मिलेंगे आप सीधे हाथ चूम लूंगा।

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  29. आज शाम को ही सब्जी लेने गया था.. आलू-प्याज की दुकान पर एक छोटा सा लड्का (जो अपने आप को बहुत बडा समझ रहा था) सब्जी के भाव बता रहा था और एक क्यूट सी फ़्राक पहने, उसी बडे लडके की छोटी बहन मोबाईल पर कुछ खिटिर पिटिर कर रही थी.. उसने मुझे देखकर अनदेखा कर दिया था, वो कहते है ’इगनोर कर देना’.. वही :)

    २ मिनट के बाद अपने बडे भाई से बोली ’वो कार भगाने वाला लगा के दो न?’ :) और फ़िर बडे भाईसाहेब ने थोडी देर के लिये हमे इगनोर मार दिया :)

    हमने भी उस लम्हे को कोडेक क्लिक कर लिया.. पल्लवी जी सही कहती है कि काश ऐसे लम्हो की सीडी बन जाती.. वैसे कभी कभी कुछ पुरानी फ़ोटोज़ देखते हुये ऎसी ही सीडी आटोमैटिकली प्ले भी हो जाती है...

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  30. इस पोस्‍ट ने पॉज का बटन दबा दिया है इसलिए हम सब देख सके उस लम्‍हे को आपकी ऑखों से .... क्‍या फोटोग्राफी है !

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  31. .....बट्टा रख दो इस गुजरते लम्हे पे..........हाय पॉज़ का बटन दबायो कोई.!!

    हर बार की तरह खूबसूरत पोस्ट लिखी है डॉक्टर साहब...
    दिल को छूने वाली....

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  32. Hamko to aapki post ne pause kar diya....koi button to dabao jo ham yahan se jaaye....Umda blog hai aapka ....Kisi din aaram se khurakh lenge...abhi to khud hi release karna padega

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  33. kuch gujarte nanhe masum lamhon ki dastan bahut sunder lafzon mein piroyi hai,magar uff ye lamhe ruk nahi sakte,khule mann se bhag bhi nahi sakte ab,baste ka bojh bhari ho gaya.triveni bhi sunder.

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  34. सफ़ेद चादर पे फलक की.... सलवटे है सुबह से
    काले बादल के कई टप्पे यहाँ वहां पड़े है ..

    रंगरोगन करने वाला तो कोई तजुर्बेकार चुनना था तुमने .
    वाह क्या त्रिवेणी है...पूरी कि पूरी पोस्ट तो शानदार है ही, पोस्ट के बाद त्रिवेणी कि छाप बोनस में है....! डॉ साहब इतना बेहतरीन लेखन कैसे कर लेते हैं आप...!

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  35. ......बट्टा रख दो इस गुजरते लम्हे पे..........हाय पॉज़ का बटन दबायो कोई.!!

    हमने अपनी उम्र में बहुत कोशिश करी ऐसे लम्हों को रोकने की.... विकट विलापों से गुज़रते दौर में, इस लम्हे रोकने की कवायद से दूर जाने की हर इच्छा धर्म संकट से भी बड़ी होती थी....
    अंत बेहद संवेदनशील है

    Nishant
    www.taaham.blogspot.com

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  36. डॉ. साहब आप नहीं सुधरोगे. यूँ लम्हों को क़ैद करने से. चलो कोई बात नहीं. हम भी तो यही चाहते हैं.
    धन्यवाद.

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  37. किसी डाक्टर की कलम में क़ैद होते हैं यह लम्हे... और त्रिवेणी से होता है इलाज पाठक की दुखती रग का ...

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  38. Paused... Paused... Paused...
    अब और क्या लिखे... यहीं पर ठहर जाने का मन है अपना तो..
    ......बट्टा रख दो इस गुजरते लम्हे पे..........हाय पॉज़ का बटन दबायो कोई.!!

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  39. समझ गए भैया ! आपकी लिखाई ! हम जैसे अनुच्छेद
    लिखते हैं , जो और अच्छे होते हैं वो वाक्य लिखते हैं
    और आप टॉप क्लास का कारनामा कर देते है कि आप
    न अनुच्छेद , न वाक्य वरन शब्द लिखते हैं ! शब्द जो
    स्वयं में संज्ञा से लेकर सहायक - क्रिया तक फैला रहता
    है , उसको उसकी पूरी शक्ति के साथ रखते हैं आप !
    'बट्टा' के तरीके का शाब्दिक व्यवहार करके आपने
    खुद ही पाज का बटन दबा दिया है ! पुनि-पुनि पढ़ना होगा
    आपको , तब आपके 'फ्लेवर' के पूर्ण-पान का मजा आयेगा !
    जबर्दस्त .... और कुछ नहीं !
    त्रिवेणी में मैंने हिन्दी साहित्य में कुछ नहीं पढ़ा है , जैसा भी
    है पर 'क्रियेशन' अच्छा है .. आपको पढ़ते - पढ़ते इस त्रिवेणी
    के अंग-प्रत्यंग का भी आभास होगा , और तब शायद कुछ
    कहने में और मजा आये ! फिलहाल आपकी त्रिवेणी पाठशाला
    का आज से विद्यार्थी बन रहा हूँ !

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  40. हम सभी ने देखा एक ही दृश्य ... आपके शब्दों के बुने चित्रपटल पर

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  41. बचपन में गाना सुना था..जीवन के सफर मे गुजर जाते जो मुकां वो फिर नहीं आते....सो जीवन को गुजरते देखना अच्छा लगता औऱ अपना आगे बढ़ना....समय बदल गया है....अब लगता की वक्त थमता क्यों नहीं. या फिर हमारी सहुलियत के हिसाब से चलता क्यों नहीं.....

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  42. वाह क्या शब्दजाल से चित्रित किया एक छोटी और सामान्य सी घटना को, घटित तो सबके साथ होती है पर व्यक्त करने का तरीका आपका लाजबाब है।

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  43. दुनियादारी की सोचो में अब भी गुम और दुनियादारी से नॉन पोल्यूटिड दोनों इक साथ और दोनों के गहरे मानी हो ऐसा नजारा सिर्फ आप ही दे सकते है.रचना में एक विशेष प्रकार का आकर्षण तथा मोहकता है.( जिसे उत्पन्न करने की आपमें असाधारण योग्यता है ) अपने ढंग की विशेष विलक्षणता है,पढ़ते वक़्त सर्वदा ऐसा प्रतीत होता जैसे अभी-अभी स्वप्न देख रहा थे और किसी ने सहसा जगा दिया हो (टिप्पणी का आप्शन देख के :-) इक चित्र सा खिंच जाता है आँखों के आगे जैसे कोई तजुर्बेकार चित्रकार बस रंग में तूलिका डुबोता और फिर कागज पर चला देता,अपने विचार और भावनाओं की मधुर रूप-रेखायें अपने चित्र में सादगी से कह देता है वह चित्रकार.( पिकासो उम्र भर नीले रंग से चित्र बनता रहा,इक ही रंग से परन्तु आपसे हमे और भी रंगों की उम्मीद है)

    ps;आपकी नन्हे जैसी नन्ही सी नज़्म का जवाब नहीं-
    बट्टा रख दो इस गुजरते लम्हे पे.
    हाय पॉज़ का बटन दबायो कोई.!!

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  44. जिंदगी के खूबसूरत लम्हों को काश.. पॉज किया जा सकता । पर तस्वीरें काफी हद तक वह करने की कोशिश तो करती ही हैं ।
    रंगरोगन करने वाला तजुर्बेकार ..........
    भई वाह ।

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  45. बट्टा रख दो इस गुजरते लम्हे पे..........हाय पॉज़ का बटन दबायो कोई.!!


    speechless....!!

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  46. ओ, एक दुनिया कितनी निर्दोष. एक दुनिया कितनी जीने लायक.
    फिर से पहचान कराने का शुक्रिया.

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  47. पॉज का बटन दबा दिया है, ये लम्हा यहीं फ्रीज्ड है, वैसे भी इससे खूबसूरत पल और हो भी क्या हो सकते हैं। जब नन्हे की नॉन पॉल्यूटेड आंखें पांच साल के भाई पर टिकी हैं जिसे ठोक पीट कर दुनियादारी सिखाई जा रही है।


    सफ़ेद चादर पे फलक की....सलवटे है सुबह से
    काले बादल के कई टप्पे यहाँ वहां पड़े है ..
    रंगरोगन करने वाला तो कोई तजुर्बेकार चुनना था तुमने .

    ...त्रिवेणी हर बार की तरह बेहद खूबसूरत , बस रंगरेज के मामले में आपने इस बार आपने फिर से ऊपर वाले पर सवाल खड़ा कर दिया।

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  48. लीजिये..दबा दिया पॉज का बटन..समूची स्रष्टि को जैसे एकदम से ’स्टेच्यू’ कह दिया हो..कि घड़ी की सेकेंड वाली सुई पर जैसे पावरब्रेक लग गया हो..रह गयी है नन्हे के कमल से गुलाबी होटों के बीच ’अंडर-कंस्ट्र्क्शन’ दाँतों तले दबी रह गयी एक शाश्वत भोर जैसी मुसकान..और उस तरफ़ उसी भोर की गुनगुनी धूप मे अँगड़ाई ले कर खिलते हुए हँसी के खुशबूदार फ़ूल..और छोटे-छोटे दाँत जैसे उसी नजारे को देखने के लिये व्हाइट यूनिफ़ार्म पहन होठों की सुर्ख खिड़कियों से उतसुकतावश इकट्ठे बाहर झाँकने लगे हों..कि किताबों बीच ठहरी उदासी किसी गैस-गुब्बारे सी उड़ कर क्षितिज पार खो गयी हो..एक दृश्य जिसमे दो मुस्कराते फूलों के बीच के सारे नजारे, सारी चीजें कहीं विलीन हो गयी हों.. वजनीला बस्ता, मुदित-मन स्कूल, टँगे-टँगे थक गयी पानी की बोतल, यहाँ तक कि माँ की अधखाली गोद भी..और रह गयी हो बस उन दो मुस्कराहटों के बीच लेटी खाली सड़क..जिस पे अपनी मसरूफ़ियत की हाथगाड़ी धकेलता बूढ़ा वक्त भी मुस्कराहटों के इस तिलिस्म की छाँह मे ठहर गया है..और गमछे से पसीना पोछते हुए इस पल के ऐश्वर्य के नशे मे ऊँघने सा लगा हो.....काश !!

    आँखों की उस पाकीजा धवलता के बारे मे आपका ऑब्सर्वेशन कमाल का है..कहते हैं कि आंखे हमारी आत्मा की रोशनदान सरीखी होती है..शफ़्फ़ा्क!!..मगर जैसे जैसे उम्र-दर-उम्र हमारे लालच और स्वार्थ की काई आँखों की कोरो मे इकट्ठी होती जाती है..उस रोशनदान की सफ़ेदी पर हमारे छल-कपट जाले बुनने लगते हैं..फिर तो रोशनी भी उन रोशनदानों से गुजरने मे कतराने लगती है..
    त्रिवेणी मस्त है..जबर्दस्त..अप्रेजल कर डाला रंग-रोगन करने वाले का ही..वैसे मै तो कहता हूँ कि जाने दीजिये...बच्चा है जी..अभी अप्रेंटिशिप मे है..जब तक रंग और चादर खराब नही करेगा..तो सीखेगा कैसे...थोड़ा बिगड़ने भी तो दीजिये ;-)

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  49. (not to be published)
    इधर भी मॉडरेशन!!..कोई खास वजह?

    उत्तर देंहटाएं
  50. और एक बात..चित्र को समझने की कोशिश तो की गयी..मगर खूब पल्ले नही पड़ा..उम्मीदों की उँगलियों मे फ़ँसी चाबियाँ नजर आ रही हैं..मगर उनका ताला नही दिख रहा..या शायद हँसी का बक्सा इन होटों से खो तो नही गया..जिसकी तलाश ही इन चाबियों को रही हो?
    अच्छा तो है!

    उत्तर देंहटाएं
  51. सफ़ेद चादर पे फलक की.... सलवटे है सुबह से.....खूबसूरत वक्त क्या रुकता है,बच्चों की मासूमियत इंसान की जिन्दगी में नेमत होती है
    शब्द दर शब्द आत्मा में उतरते जाते हेँ ...कमाल कमाल आपको सलाम

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  52. आज बड़े दिनों बाद अपने सबसे फ़ेवरिट ब्लौगर को पढ़ने लौटा हूं। ब्लौग में व्याप्त तमाम अनर्गल विविधताओं में आप शीतल बयार लेकर आते हैं अपने हर नये शब्द-चित्र के साथ।

    काश कि कोई ऐसा पेपर-वेट होता जिसे हम सब रख पाते अपने गुजरते लम्हों पर। अहसासों के कितने छुपे दर्द, कसक को एक साथ उभार कर रख देते हो आप भी डा० साब...

    ...और त्रिवेणी तो उफ़्फ़्फ़। अश्कों को इससे पहले इतने खूबसूरत बिम्ब में बँधे पहले कभी नहीं देखा- काले बादल के टप्पे...हायsssss

    अब ये सारी त्रिवेणियाँ निश्चित रूप से एक संकलन माँगती हैं। कोई प्रकाशक ढ़ूंढ़िये ना डा० साब!

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  53. उन दिनों की बहुत याद आती है जब आप हर सप्ताह दिखाई दे जाते थे, कई दिनों से मैं भी मोजजे के ही इंतजार में था मगर आज यही कह जाता हूँ कि अभी इंतजार बना हुआ है... फिर जिनको साधू स्वभाव मिला होता है उनको यायावरी भी उपहार में मिलती है. सोचता हूँ कि कहीं नयी दुनिया की नयी नज़्मों में उलझे हुए हैं आप....

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  54. नहीं पता कि वो रंगरोदन करने वाला तजुर्बेकार था या नहीं.. पर आप की शब्द्चित्रकारिता नयी उँचाइयाँ हासिल करती जा रही है, डॉ. साहब.. बहुत खूब.. बधाइयाँ सर ..

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  55. Kuch kahun.. nahi pause behtar hoga..

    aur fir thodi der baad.........bada achchha likhte hain aap

    उत्तर देंहटाएं
  56. अनुराग जी ,बरगद का पेड़ ....वाली पोस्ट पर ये प्रतिक्रिया है ... तकलीफ होती है आपकी पोस्ट को पढ़कर ...जिन्दगी जीने के अपने तरिको और तजुर्बों के साथ ...इस भाव के साथ एक बच्चा है जो निरंतर जीने की कोशिश में लगा हुआ है ..जिसका सब कुछ उससे छूट गया है किसी के भीतर संवेदना का विकास एक दूसरे ही स्तर पर ..सामान्यता हमारे एबस्ट्रेक्ट विचार इतने अधिक स्पष्ट और इतने संवेदना सम्पन्न होते हेँ की उनका अपने आप में कोई उपयोग हो ही नहीं सकता जैसे 'दुःख' सिवाय के लिखा जाय ..बोलने-बतलाने की जगह पर....आखिरकार आदमी अपने सारे विवेक का क्या करे जिसके आगे तमाम चीजें अर्थ हीन हो गई है ,
    इस संदर्भ में अशोक वाजपई की कविता''शहर अब भी संभावना है'' की पंक्तियों को लिख देने का लोभ नहीं रूक पा रहा है .
    अपनी इक्षाओं के सप्तवर्णी आकाश में ,
    कोई इतना सुन्दर है , कि प्रार्थना करता हूँ
    वह सदा ही इतना सुन्दर रहे ,
    लेकिन फिर प्रार्थना के बाद का यह अवसाद ,यह क्यों है?
    ......क्या कहूं कोई शब्द ऐसा नहीं है जिसे किसी प्रमाण में बांधा जा सके इस छूटे हुए अमूल्य के लिए ..नमस्कार .

    उत्तर देंहटाएं
  57. यूँ कहूँ के जबसे इस लम्हे से रूबरू हुआ उस सुबह...तब से फ्रीज है आँखों में ...नन्हे को फोटो जैसे कोर्निया में बस गयी है ....अक्सर आप उस मूड से लिखते है जिस मूड से गुजरते है ....गुजरना पढने से भी हो सकता है .गुजरना जिंदगी से भी ......सच कहूँ तो लिखने कुछ ओर बैठा था .नन्हे ने डाइरेक्शन चेंज कर दिया .......
    @पिछली पोस्ट पर अपूर्व की टिपण्णी के बाद बहुत कुछ कहने का मन हुआ .पर मसरूफियत ने ऐसे हाथ पकडे के लेप टॉप बस खुलने बंद होने की फोर्मलिटी में रह गया .......
    @विधु जी......
    बरगद का पेड़ वाली दो नो पोस्टे मेरे दिल के करीब है .सच कहू तो आप बीती है ......यूँ भी अपने आप को उलीचने के लिए अब लेप टॉप ही तो है .इस भाग दौड़ भरी दुनिया में शायद इस ओर मुखोटा उतारने की सुविधा है ओर तसल्ली भी .......

    उत्तर देंहटाएं
  58. बहुत खूब...त्रिवेणी बहुत अच्छी लगी

    उत्तर देंहटाएं

कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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