2010-05-25

खुरदुरी बायोग्राफी के दो खुरदुरे एबस्ट्रेक्ट.......

नोस्टेल्जिया भी  विस्थापित होता  है ....
वो हमसे दो साल बड़ा  था   ..जब  हम दसवी में थे   वो  ग्यारहवी  में ....मेथ्स की .ट्रिगनोमेट्री  अबूझ पहेली थी ..कुछ कुछ डरावनी भी ...उसने डर निकाला ..." बोर्ड के  मेथ्स  के एक्जाम  में ....हौसला देने सुबह   वो  अपनी साइकिल  से मेरे सेंटर तक मेरे साथ  आया था......उसके पिता  ने रायपुर में रहते रहते दूसरी शादी कर ली  थी..अचानक उसकी दुनिया  बढ़ी  हो गयी थी ....वो   भी....जब हम शाम को  पार्क में क्रिकेट  खेल रहे होते ..वो   ट्यूशन  पढ़ा रहा होता ......सन्डे के दिन .कुछ देर खेलने आता तो उसकी मां कोने से आवाज देती  "बब्बू ".....बड़ी चुभती  थी वो आवाज....दो साल बाद  ....पहले ही  अटेम्प्ट   में  इंजीयरिंग में उसका एडमिशन हुआ ....दो बहनों के  रहने का  डर मां पर हावी हो गया .ओर बब्बू ट्यूशन  में ऐसा  उलझा के फिर कभी निकल न सका ...... गाडी मोड़ते हुए देखता हूँ........ उसके घर के बाहर अब भी साइकिलो की लम्बी कतारे है…... वो अब  हमसे कई साल बड़ा है .....

समय की नोक पर टिके  आदमी..... तुम  किसी पहले का ही मेटा मोरफोसिस हो

हने वाले कहते है ....."ओरिजनल" मिडिल क्लास  नहीं  रहा ..इसकी भी कई क्लास हो गयी है  ..हर दो चार साल बाद    . नए एडिशन भी  निकल रहे  है  .... मध्यमवर्गीय ईगो" वो भी .ओरिजनल नहीं  रहा.... ...अब वाले में दिखावे ओर  छिछोरेपन की परसेंटेज़ ज्यादा  है "....... फिमेल वाइग्रा भी अब लौंच हो गयी है ....   भगवान्  अब स्लो मोशन में नहीं चलता है ...कलयुग .ओर सतयुग जैसे सौ सालो का कांसेप्ट चला गया है ..हर दस साल में भगवान्  कदम बढ़ा देता है ..  ओर दुनिया भी  बदल  जाती है ......जेनरेशन गेप अब भाइयो के बीच बैठ के हँसता है   ... ... प्रायश्चित करने के लिए  मंदिर मस्जिद के दरवाजे पे जाने के बजाय ..कंप्यूटर पे "एपोलोज़ी डोट कोम" पे अपने गुनाह लिखकर आराम से  मेगी नूडल्स खा कर सोया जा सकता है ....सन्डे के दिन राजमा छोंक कर चूल्हे पर चढ़ा कर नीता दीदी अख़बार फैलाकर "वधू चाहिए" वाले कोलम को ढूंढ कर उस पर गोल घेरा के निशान नहीं  लगाती है ......ना छोटी वाली  उनके सर पे से सफ़ेद बाल  चुन चुन के  निकालती है ...शादी डोट कोम पे दोनों बहने शीट -पिट करती है. मल्होत्राइन का. छोटा पिंकू .......स्कूल जाने के लिए .ए.सी वेन से जाता है उसके स्कूल के सारे कमरे  ए. सी  है ..... ..... . पिंकू को बड़े होकर "इन्डियन -आइडोल”  बनना  है....…….बारहवी में ग्रेस मार्क लेकर पास हुई मल्होत्राइन की    बड़ी बेटी.".बेबी ".एम् टी.वी के रोडिस में   अंग्रेजी -हिंदी की कई गलिया देकर   डी. जे बन लाखो रुपये महीना  कमाने लगी  है ..      अभी अभी एक टी वी कमर्शियल   भी मिला है .   . उसकी क्लास के टोपर.. .बिट्टू की आँखों पर बड़े बड़े मोटे चश्मे है.  रोज  पोस्ट ऑफिस में कई  कम्पीटीशन फ़ार्म  भरके रजिस्ट्री कराता है…....शर्माइन  को लगता है   ..... बिट्टू की बुरी सोहबत से उनका लड़का "डल' होने लगा है ...अब ज़माना स्मार्ट लोगो का है …." …..अंग्रेजी बोलना स्मार्टनेस की अनिवार्य शर्त है....
अपना बकाया लेने आयी. माया को पैसे देते वक़्त..मल्होत्राइन उसका "करेक्टर सर्टिफिकेट " पकड़ा रही है.....उनीस साल की माया ..हाथ में एक साल .ओर पेट  में  ४ महीने के बच्चे को लिए सुबह सात बजे काम पे आ जाती थी  .... जिस रोज  चेहरा सूजा होता है ..उस दिन दूर से नमस्ते नहीं करती थी ...नजर झुका कर गुजरती थी ... . ऐसी हिन्दुतानी औरते शानदार  पंचिंग बेग है .....आफ्टर इफेक्ट्स ऑफ़ शराब ...........मल्होत्राइन  रोज उसे झिड़कती थी  ...बच्चे को लाने पे.... .कहाँ छोड़े ?बाप को फेफड़ो का  टी.बी खा गया .....मां पिछले बरस गुजर गयी ...उससे ढाई साल छोटी खुद दूसरे घरो में  जाती है  ... बिना कोम्पप्लेन" पिये ही उसका बेटा  बड़ा हो रहा है....सुना है अपनी कोख किराये पे देने के लिए गुजरात के अनंद  में शिफ्ट हो रही  है ........तीन लाख रुपये  मिलेगे ...ओर गर्भवस्था तक मेंटेनेस के लिए कुछ हज़ार रुपये ..
कलजुग है .कलजुग.....मल्होत्राइन की सास कानो पे  हाथ रखके  युग बदलने की कन्फर्मेशन दे रही है ..... बेबी अपने मोबाइल से  कोई नॉन वेज़ जोक फोरवर्ड कर रही है  सामने वाले घर में  बिट्टू शर्मा जी  से  किसी फॉर्म पर साइन करवा रहा है . बराबर में धोबी भी खड़ा है ....फॉर्म साइन करते करते धोबी  के प्रेस के एक रुपये से डेड रुपये  बढाने  पर शर्मा जी उसे डांट रहे है …..सरकारी  मुलाजिम है शर्मा जी.... .गजेटेड ऑफिसर…. सरकार अब भी मानती है के केवल सरकारी अफसर सच बोलते है..
.टूटे हत्थे वाली  आराम कुर्सी पे बैठे त्यागी अंकल बाहर वाले  आँगन में   अपने पोते  से अखबार सुन रहे  है ...दोनों पोतो को डयूटिया अलग अलग दिन है ....काले पानी का असर दोनों आँखों पर है ... बारीक अक्षर धुंधले दिखते है ... इस बदलती दुनिया में उनके पोते उम्मीद के सी ऍफ़ एल   बल्ब जलाते है...

59 टिप्‍पणियां:

  1. bahut khoob likha hai aapne kya baat hai...achchi post...badhai ho

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपके साथ हमने भी इस परिवर्तन की यात्रा कर ली ... बहुत तेजी से बदल रहा है समय, हर बात समेट ली आपने "किराये की कोख, एक्स फक्टोर,घरेलू हिंसा अंतहीन सूची

    उत्तर देंहटाएं
  3. जमाने के बदलाव की असली सनद...किसी से अटेस्ट करवाने की ज़रुरत नहीं.

    आजतक आपका लिखा हुआ जब भी पढ़ा, हर बार लगा जैसे पूरी पोस्ट में एक ही शब्द लिखा हुआ है; "सच"....एक ही पोस्ट में लिखे हुए इतने सारे सच.

    क्या बात है!!!!

    उत्तर देंहटाएं
  4. "आजतक आपका लिखा हुआ जब भी पढ़ा, हर बार लगा जैसे पूरी पोस्ट में एक ही शब्द लिखा हुआ है; "सच"....एक ही पोस्ट में लिखे हुए इतने सारे सच."

    Shiv Ji ka ek ek shabd ek sach... aur aaj hum bhi jhooth bolne ke mood mein nahi hai... saala sach bhi ek hangover sa hota hai... sar mein ek dard sa paida kar deta hai... aur bina koi goli khaye utarta nahi... aapki posts ka hangover utarne ki goliyan kahan milengi??

    उत्तर देंहटाएं
  5. trignometri की तरह डरावनी ---कहाँ --अपने तो १०० % थे भाई। फिर भी --
    इंडियन आइडोल --रोडीज --लाखों की कमाई ---क्या मिला डॉक्टर बनकर ।
    करते रहो देश की सेवा।
    आफ्टर इफेक्ट्स ऑफ़ शराब .॥
    सही कहा । दुनिया सचमुच बहुत बड़ी और खराब है !

    उत्तर देंहटाएं
  6. मार्मिक है पर सच है । जीवन के कई नग्न-सत्यों को स्वीकार करने की आदत पड़ने का डर सताने लगता है रह रहकर ।

    उत्तर देंहटाएं
  7. जिम्मेदारीया ख्बाबो को हकीकत मे तब्दील नही होने देती है .

    उत्तर देंहटाएं
  8. दूसरी वाली (समय की नोक पर टिके आदमी) तो सर जी बिलकुल मेरे मन की बात लिख डाली.
    अंग्रेजी नहीं आती. जीवन निर्मूल है. निरर्थक है.
    "सरकार अब भी मानती है के केवल सरकारी अफसर सच बोलते है.." ---- यह तो रोज़ का देखना है और अब हमें इस घोर सत्य के साथ जीना ही पड़ेगा.
    कई सायकिल स्टैंड हमने भी देखें हैं आखिर बिना कोम्पलेन पिए बड़े हुए हैं.

    एक बात और इस उम्र में जो गुनाह हो रहे है क्यों न तिरुपति के पंडितों से ऑनलाइन पूजा करवाकर उसे कम लिया जाये. कहें तो एक-आध एस.एम्.एस. इंडियन आइडल में भी भेज दें...

    उत्तर देंहटाएं
  9. आज का लिखा बदले हुए हालातों का आईना है,इसमें कई झलकियाँ देखने को मिलीं..साबित हो गया भगवान अब धीरे नहीं चलते ..ओनलाईन कन्फेशन प्राप्ति के साथ साथ आरती और पूजा से वे भी तृप्त हो जाते हैं. सालों साल पहले गीतकार प्रदीप का लिखा एक गीत था 'देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान
    सूरज न बदला चांद न बदला ना बदला रे आसमान
    कितना बदल गया इनसान!!!!
    ...आज तो इस से भी कहीं बुरी हालत है..क्या लिखते वे अगर आज होते तो?
    -अति आधुनिक बनने की होड में सब से अधिक नुक्सान हर श्रेणी का मध्यम वर्ग खुद को ही कर रहा है.
    -कारण बहुत भी से हैं...सब जानते ही हैं.
    भविष्य के गर्त में क्या छुपा है अंदाज़ा लगा सकते हैं!

    उत्तर देंहटाएं
  10. आपके इन खुरदरे अब्स्ट्रेक्ट से खरोंच लग गयी है सच चुभता है न...अब इस दर्द की कोई दवा दीजिए डॉक्टर साहिब.

    उत्तर देंहटाएं
  11. सही में ज़माना स्मार्ट लोगों का ही है और अंग्रेजी तो नित्यांत जरुरी है ! जब हिन्दी में कोई माँ-बहन की गाली देता हुआ सुनायी देता है ! तो होंडा सिटी में बैठा हुआ ,रेबन का काला चस्मा लगाये तथाकथित सभ्य समाज का नशे में धुत्त युवक , हीन भावना से देखते हुए केवल तीन अक्षरों में अपने सभ्य होने का प्रमाण देते हुए कहता है "वट द फ.. " ...
    एम् टी वी का रोडीज हमारे नए मध्यम वर्ग की अन्ग्रेजियत को प्रदर्षित तो कर ही देता है !!

    खूब कहा आपने डाक्टर साहब !!

    उत्तर देंहटाएं
  12. बदलती दुनिया के सच और शब्द चित्र -इससे भी लंबा कमेन्ट भला क्या हो सकता है >

    उत्तर देंहटाएं
  13. wo ab pahle se kafi bada ho gaya tha ...........

    in lines mein kya bhed hai shayad hi koi jaane .....:-)

    jimmedari ke saath umr apne aap bad jaati hai
    baal pak jaate hain
    aur maathe par chinta ki laqeer nazar aane lagti hai

    jo ladka apne sapne kurbaan kar de wo waqayi umr se bada ho gaya hoga

    उत्तर देंहटाएं
  14. यह भी एक सच है कहना चाह रहा था लेकिन कहना पड़ रहा है कि यही सच है।

    बढ़िया लिखा।

    उत्तर देंहटाएं
  15. achha hai, par aapko nahi laga, thora lambaa ho aya :)

    उत्तर देंहटाएं
  16. ज्ञानजी का एक जुमला यूज करू तो ’हमे इक क्राईसिस की जरूरत है’

    एक क्राईसिस जरूरी हो गयी सी लगती है.. काफ़ी चीज़ो को हमे बदलना है और समझना है.. और वो चीज़े विकीपीडिआ से नही मिलने वाली...

    आपके पहले भाग मे वो जिम्मेदारिया है जिनके तले हज़ारो सपने सपाट हो चुके है.. ट्यूशन पढाते पढाते गट्टे पड चुके है उन्हे और उनके सपनो को भी..

    दूसरी कहानी तो जैसे हसते हुये चमाट पर चमाट लगाती जाती है... हर कैरेक्टर की सेलेक्टिव नैतिकता है जिसके बल पर वो नैतिक बना घूमता है...

    कभी कभी ज़िन्दगी को इतना जानना भी डराता है.. काश हम बच्चो से मासूम बने रहते..

    उत्तर देंहटाएं
  17. sach kuch logon ki umar kuch din me hi kai saal badh jaati ..umra ka ek aur safha paltne ke liye 365 akshar padhne zaroori nahi hain .... kisi haadse ki raushnaai achanakjab fail jaye safhe par to use usi waqt palatna pad jata hai ..

    post ke doosre part me ek saath kai saare sach aur changes dikhaye hain aapne ..sach much aaj kal change kitni tezi se ho raha hai ..kisi ko kuch samjh nahi aa raha .. kai sare parivartan tezi se hon to pata nahi chalta ki kitna badal gaya aur kya badal gaya.. parivartan ko tatasth rah kar dekhne wala hi cheezen samjh sakta hai ...do bhaiyon ke beech ke generation gap...ek hi compound ke isomers me bhed karna jaisa raha ...aur ye pehchaan ek tatasthta hi kara sakti hai ... aap ki post bahut sari cheezen dil o dimaga me la rahi hai .. jaise sote waqt achanak dimag chalne lage aur aati hui neend bhaga jaye...

    उत्तर देंहटाएं
  18. anuraag ji...hamesha aapko padhti hoon..bade niralepan se aap likhte hai..

    उत्तर देंहटाएं
  19. Aapne aajkal ke badalte samaaz ka sajeev chitran kiya hain.
    Aapki lekhni anokhi aur sabse judaa hain.

    उत्तर देंहटाएं
  20. आपकी पोस्ट पढ़ते हउवे लगता है किसी डोक्टर ने जैसे बच्चों से मीठी मीठी ,मुलायम मुलायम बातें करते हउवे आचानक एक तीखी सुई घोप देता है...ताकि हम अच्छे हो सकें....

    उत्तर देंहटाएं
  21. नोस्टेल्जिया भी विस्थापित होता है सच कहा पुरानी यादो में जाना हमेशा बेहतर नहीं होता कुछ यादे आज से टकराती है
    वो अब हमसे कई साल बड़ा है .....वाक्य ने एक तरह से कन्फेशन किया है के सफलता के पैमाने भले ही अलग हो पर इंसानी पैमाने पर वो कही आगे है .यही इस पोस्ट की खासियत है .
    अब दूसरा हिस्सा
    आदमी का मेटामोर्फोसिस तो अरसे से बंद है हाँ उसके चरित्र के कई क्लोन निकल रहे है. सरोगेट्री मदर तमाम माया जैसी है जिन्हें बुरा बताने वाली मल्होत्राइन है जिसकी बेटी बेबी है जिससे उसकी दादी ओर मां दोनों आँखे मूंदती है ,समाज में पैसा ही सफलता का पैमाना है इसे सीधा न कहकर आपने अपने विशिष्ट तरीके से कहा है . जैसे बिटू का चरित्र बेक में रहकर भी बेबी के चरित्र पे टोर्च फेंकता है. पोस्ट की कुछ ओर विशेषताए है
    बिना कोम्पप्लेन" पिये ही उसका बेटा बड़ा हो रहा है.
    शादी डोट कोम पे दोनों बहने शीट -पिट करती है…
    ऐसी हिन्दुतानी औरते शानदार पंचिंग बेग है .....आफ्टर इफेक्ट्स ऑफ़ शराब
    जेनरेशन गेप अब भाइयो के बीच बैठ के हँसता है
    सरकार अब भी मानती है के केवल सरकारी अफसर सच बोलते है..
    उम्मीद के सी ऍफ़ एल बल्ब

    इन दिनों आप ने लिखना कम कर दिया है ,पुरे महीने में एक ही पोस्ट आती है .कुछ सोचिये

    उत्तर देंहटाएं
  22. डॉ .अनुराग को पढ़ते हउवे अक्सर लगता कि...जैसे कोई डॉ . आपसे मीठी मीठी प्यारी प्यारी बातें करते हउवे आपकी जुबान में ....आपको अपने साथ comprtevil फिल करे का का मौका देती है और जैसे ही आप अपने डॉ . के साथ copmfrt फिल करने लगते हैं आचानक से डॉ . साहब तीखी और नुकुली सुई आपकी बांह में चुभा देते हैं..और हमें मजबूरन उस दर्द को बर्दास्त करना होता है ..ताकि हम ठीक हो सकें ...हम स्वस्थ हो सकें...
    यहाँ डॉ .अनुराग अपनी प्यारी प्यारी चतुराई भरी से बाते करते हैं अपने ब्लॉग पे और जैसे कोई प्यारी सी कहानी सुन रहे हो ..कुछ वैसे ही जैसे दादी nani से किस्से सुनते हउवे महसूस करते ..और धीरे धीरे नीद के आगोश में जाने लगते हैं....और सो जाते हैं.....मगर यहाँ डॉ .साहब आपको नीद में सो जाने नहीं देते ,जब हुम मुत्त्मुइन होते अपनी इन्ही प्यारी बातों के बीच कोई नुकीली सुई अकाक एसे चुबते हैं...और हम हक्पका से जाते हैं...........बेहतरीन पोस्ट है इसे जरुर पढ़ें......

    उत्तर देंहटाएं
  23. बदलते परिवेश की इतनी तेज़ धारा लेकिन फिर भी आपने बारीकी से उसे पढ़ लिया..बहाव में डूबते तिनके त्यागी अंकल को पोतों का सहारा दे दिया..नहीं तो आजकल वैसा कम ही दिखता है.

    उत्तर देंहटाएं
  24. aapki sabhi rachnayein seedhi..do took hoti hai..kam shabdon mein kitni gehri baat keh jaate hain aap ! Nostalgia.... behad sacchi !

    उत्तर देंहटाएं
  25. एक बिलियन लोगों की धरती पर लगातार बदलते परिवेश का, कुछ वाक्यों में फ्रेम कर पूरा चित्र दर्शाने का काम एक ही डाक्टर कर सकता है वही जो स्टेथिस्कोप बिना लोगों के दिल और आत्मा की गहराई नाप लेता है ....

    उत्तर देंहटाएं
  26. आपके लगाए शीर्षक बहुत ही रचनात्मक हैं। आपके पोस्ट के बारे में तो सबने काफी कुछ कह दिया है। फिर भी कहुंगा कि आपके भावों की तरलता प्रभावित करती है।

    उत्तर देंहटाएं
  27. बब्बू ट्यूशन में ऐसा उलझा के फिर कभी निकल न सका ...... गाडी मोड़ते हुए देखता हूँ........ उसके घर के बाहर अब भी साइकिलो की लम्बी कतारे है…... वो अब हमसे कई साल बड़ा है .....


    कहीं न कहीं बब्बू का जीवन उसी का उत्तर देता है ......सब कुछ तो था उसके पास ....ओर क्या चाहिए था उसे ? ....जीने के लिए एक मुट्ठी आसमान काफी नहीं ....? .कही और सोने के लिए गज भर जमीन .....?...फिर भी एक सवाल .....क्यों खुश नहीं था वो ..... ? शायद वो ज़िन्दगी को जी नहीं रहा है बस काट रहा है .....अपने लिए नहीं दूसरों के लिए ....अपने फ़र्ज़ की खातिर ......बहुत मुश्किल होता है ऐसा जीवन ....खुद को मार कर जीना .....पत्थर होकर जीना ....
    बहुत दिनों से किसी के ब्लॉग पे नहीं जा पाई थी आज खोला तो ....सुकून भी हुआ और कुछ सवालों ने आहात भी किया ....

    उनीस साल की माया ..हाथ में एक साल .ओर पेट में ४ महीने के बच्चे को लिए सुबह सात बजे काम पे आ जाती थी .... जिस रोज चेहरा सूजा होता है ..उस दिन दूर से नमस्ते नहीं करती थी ...नजर झुका कर गुजरती थी ... . ऐसी हिन्दुतानी औरते शानदार पंचिंग बेग है .....आफ्टर इफेक्ट्स ऑफ़ शराब ...........मल्होत्राइन रोज उसे झिड़कती थी ...बच्चे को लाने पे.... .कहाँ छोड़े ?बाप को फेफड़ो का टी.बी खा गया .....मां पिछले बरस गुजर गयी ...उससे ढाई साल छोटी खुद दूसरे घरो में जाती है ... बिना कोम्पप्लेन" पिये ही उसका बेटा बड़ा हो रहा है....सुना है अपनी कोख किराये पे देने के लिए गुजरात के अनंद में शिफ्ट हो रही है ........तीन लाख रुपये मिलेगे ...ओर गर्भवस्था तक मेंटेनेस के लिए कुछ हज़ार रुपये ..

    वो सारे दर्द सिर्फ मेरे ही नहीं थे ...इन तमाम औरतों के भी थे ......जो उड़ना भूल चुकी हैं .....



    कुछ इस कदर अँधेरे
    पैर पसारे बैठे थे
    दिल की तख्ती पर
    के मैं लिख भी न सकी
    तेरा नाम .....
    उम्मीदें भी अब थक कर
    दम तोड़ने लगीं हैं
    आ मांग लें इस टूटते तारे से
    ज़िन्दगी की .....

    आखिरी शाम .....!!

    उत्तर देंहटाएं
  28. शुरुआत से अंत तक एक खिंचाव है जिसकी वजह से कहीं बोझिल नहीं होता
    पढने में !
    पढ़ते हुए लगा कि आसपास को आपने आत्मीय कूची से सधी पेंटिंग में बदल
    दिया है , इस पेंटिंग में खुरदुरेपन हैं और आप पाठक की उंगली उन खुरदुरे
    स्थलों तक पहुंचा दे रहे हैं !
    सबसे अच्छी बात लगी कि नितांत सहज और निजी किस्म का ब्लागानुकूल
    'फॉर्म' चुना है आपने !
    सामाजिक संरचना लेखन के फॉर्म को बदलती है , इसी तर्ज पर कहना चाहूँगा
    कि तकनीकी का बदलाव भी नए फॉर्म का आग्रह किया करता है ! आपके यहाँ इस
    बात को भी सशक्त रूप में देखा जा सकता है , जैसे फॉर्म की चुनौती का स्वीकार
    पारंपरिक विरासत(साहित्यिकता-संवेदनशीलता) को रखते हुए किया हो
    आपने ! अधिकाँश ब्लोगों पर नए तकनीकी माध्यम में 'कंटेंट' का बिखरना
    और नदारद होना ज्यादा दिखता है !
    बाकी बात फिर पढ़ने पर बोलूँगा , ऐसी प्रविष्टियाँ और पढ़ान मांगती हैं ! आभार !

    उत्तर देंहटाएं
  29. बदलते वक़्त को सहजता से समेट लिया है आपने अपनी इस पोस्ट में ....इतनी तेजी से सब बदलता जा रहा है मुझे यह देखने की जानने की बहुत उत्सुकता होती है कई बार की अब इसके आगे कैसे वक़्त बदलेगा ... और आखिर यह कहाँ कैसे थमेगा ..

    उत्तर देंहटाएं
  30. भाइयों के बीच गेनेरेशन गैप की प्रदर्शनी है ये पोस्ट. देखा है हमने भी साइकिलों के कतार में उलझे दोस्तों को किसी से पूछता हूँ 'उसका क्या हुआ बड़ा तेज लड़का था'... कुछ सीनियर बैच में, कुछ अपने बैच में. 'चश्मा' के बारे में पूछता हूँ (यही कहा करते थे हम उसे)... किसी ईंट भट्ठे पर मुंशी है ! बाप ने चार-पांच शादियाँ की थी. उन्हीं चार-पांच में से एक आदिवासी माँ का बेटा था चश्मा.... होनहार. पूरे स्कूल में तेज था. खैर... हर अगली सुबह लगता है पिछले रात से गेनेरेशन गैप हो गया !

    उत्तर देंहटाएं
  31. badalte huye halaton ka marmik sach bahut khubsurati se bayan hua hai.hmm bhaion ke bicj baithi generation gap badi hoti ja rahi,aise bahut se tadafdar lines ,magar sacj ka aaina dekhate.sunder lekh,kuch badlav achhe oti hai,kuch nahi.

    उत्तर देंहटाएं
  32. Aapki post padh kar thahar se gaye... nahi samajh paaye ki kaise karein react....aisa sach ki kirdaar aankho ke aage nacne lage.....mano purana rishta ho inse....samajh nahi paa rahi ki writing ki tareef karoon ya sach par dukh jataoon.

    उत्तर देंहटाएं
  33. डियर डॉक्टर,
    एक पूरा का पूरा जमाना ही कुछ शब्दो में उकेर दिया,
    बहुत ही सार्थक लेख,
    साधुवाद.

    उत्तर देंहटाएं
  34. अनुराग जी . क्या शिल्प . क्या शब्द विन्यास . कथ्य . प्रवाह - रोचक एवं सत्य ।

    उत्तर देंहटाएं
  35. मेरी पिछली टिप्पणी कहाँ गयी ?
    कहीं ऎसा तो नहीं कि, यहाँ भी ’वो’ लगा हुआ है,
    अरे ’वो’ जो गन्दगी से बचने को लगाई जाती है !

    तीखा है, पर असली है ।
    तिकड़मी ज़माने का सच ऎसा ही होता है ।
    बस एक बात की मुझे यह खुशी है कि,
    मैं ना बदला, तू ना बदला, देख सारी दुनिया बदल गयी !
    अगर इसका हिस्सा बन जाते तो यही सच.. कड़ुआ सच अनैतिक लगने लगता..
    मीनाक्षी कहती, " हॅनी व्हाई डू यू हर्ट यूअर रीडर्स एवरीटाइम.. यू नो इट साउन्ड्स एज़ अनफ़ेयर ऍन्ड इम्मॉरल, ना ?
    शुक्र है कि वह शायद ऎसा न सोचती हो, वरना बेहतरीन ब्यान पढ़ने को न नसीब होती ! खुश रह और थोड़ी खुशियाँ भी बाँट !

    उत्तर देंहटाएं
  36. बचपन का मोहल्ला भी जुदा था ....उसकी दुकाने भी.....कोने पे पूरी बाजू का बनियान पहने ढीले पजामे के साथ बैठा बनिया .....जिसके बनियान में एक जेब होती थी जो उसकी तोंद के वजह से अक्सर डिसबेलेंस रहती थी .शाम तक आते उसमे कई दाग लग जाते थे ....किसी चीज़ को देते वक़्त वो जान बूझ कर नाप तौल कम करता ....सारे मोहल्ले की उसे खबर रहती ...दीवाली पर किसके यहाँ कितनी मिठाई आई ..कितने लोग गिफ्ट लेकर आये .....अब बड़े बड़े मॉलो ओर बाजारों की स्कीमो ने ऐसे तमाम बनियों को बेक ग्रायुंड में धकेल दिया है .....गलिया ख़त्म हो गयी है ..मोहल्लो ने आकार बदल लिया है ....सबके बाहर बड़े बड़े गेट ...अब खट्टा मांगने या सब्जी बांटने का रिवाज़ भी ख़त्म सा है ......सब कुछ बदल गया है.इतनी फास्ट फोरवर्ड के सोचता हूँ उम्र होने लगी क्या .....यूँ भी पेंतीस के बाद जब कभी ग़लतफ़हमी होती है के जिंदगी का स्टेयरिंग हाथ में आ गया है .कोई एक मोड़ औकात में ले आता है .....
    बब्बू जैसे कितनो को जानता हूँ ........एक ओर लड़का होता था क्लास में ....किसी डेयरी में काम करते थे उसके पिता... .हेंड रेटिंग ऐसी के मोती .....सब कुछ करीने से करता ....क्लास में फर्स्ट आता ....देहरादून गया .दो साल बाद लौटा तो वो ग़ुम हो चूका था ...बरसो बाद मिला तो किसी दुकान पे था ......पिता की शराब उसे निगल गयी .....यहाँ के आस पास के गाँव के बच्चो को देखता हूँ ..काबिल लोग ....लेकिन बड़े इंस्टी टयूट के एक्जाम कैसे दे .कोई कोचिंग नहीं.कोई डाइरेक्शन नहीं .....आधे अंग्रेजी की बदोलत मारे जाते है .आधे बड़ी बिल्डिंगो में जाकर सहम जाते है .......
    बरसो पहले लिखा था .......


    दाल रोटी की फ़िक्र में गुम गये
    मुफलिसी ने कितने हुनर जाया किये ..



    फर्क सिर्फ एक टाइमिंग का है .....खुदा ने आपको किसके घर फेंका है .....हमें -.आपको इतराने की जरुरत नहीं

    उत्तर देंहटाएं
  37. कभी कभी शब्द बहुत चुभते हैं कोई कैसे इतनी खुरदरी बायोग्राफी लिख सकता है

    उत्तर देंहटाएं
  38. सही बात है....संसार बदलता जा रहा है....समय के पहिए में आज सब किसी को पीछे छोड़ते हुए नहीं, कुचलते हुए आगे बढ़ रहे हैं....किसे फिक्र है उस साथी की जो पीछे छूट गया....

    उत्तर देंहटाएं
  39. thank you God for the food you have given us ...
    स्कूल में यही सिखाया जाता है ... हिंदी में पूजा भी करो तो गाली नज़र आती है .. अंग्रेजी बिना तो जीवन ही व्यर्थ है ...
    किराए पर कोख क्या दी , जमीर ही बेच कर खा लिया ..
    नॉन वेज जोक फॉरवर्ड नहीं करने देती है माँ , ओफ्फ्फ्फ़ माँ तुम कितनी बेकवार्ड हो ...
    ऑफ़ बीट है सब कुछ ... prograsive दुनिया में रिश्ते ट्यूब लाईट हो गए हैं .. चलो पोता ही सही कुछ तो चल रहा है ...

    उत्तर देंहटाएं
  40. sir, kai mahino se aapke blog ko follow kar rha hu. main bas itna poochhna chahta hu ki aap itna kuch kaise mahsoos kar lete hai. aapko padhne ke pahle main khud ko bada sensetive manta tha, par fir pata chla ki abhi to hum bachche hai.
    Thanks ki aapne jaane-anjaane muje ye realize karva diya.

    उत्तर देंहटाएं
  41. १-पहला एबस्ट्रेक्ट " बब्बू " इसी के लिए शायद जिगर ने लिखा था "इस दर्ज़ा बेकरार थे दर्दे -निहां से हम.
    कुछ दूर आगे बढ गये उम्रे रवां से हम"कई बार उम्र सालों के जोड़-बाकी के हिसाब किताब से नहीं गिनी जाती.बब्बू जैसे लोगो को कोई विकल्प दिखाई नहीं देता मगर इक सपना तो उसने भी देखा होगा.ये अलग बात है की जीने के रस्ते में इतनी ठिठुरन है की सपनो की धूप वहां नहीं पहुंचती .पहले ही अटेम्प्ट में इंजीयरिंग में उसका एडमिशन हुआ ....दो बहनों के रहने का डर मां पर हावी हो गया .ओर बब्बू ट्यूशन में ऐसा उलझा के फिर कभी निकल न सका .सिर्फ इक भविष्य हीन जिद्दी जिजीविषा के सिवा क्या है ज़ो इस विकराल समय में साँस लेने को सही ठहरा सके.
    २-दूसरा एबस्ट्रेक्ट-अंग्रेजी के इस आतंक के पीछे वही गुलाम मनोवृति काम करती हैजहाँ गोरा आदमी हमेशा काले से बेहतर होता है "आका"

    ३-आपकी अपनी टिप्पणी के बिना आपकी रचना अधूरी होती है ये तो नहीं कहा जा सकता मगर इक लोभ सा होता है की कुछ और भी लिखा पढने को मिल जाये शायद.आपकी रचना किसी पहाड़ी यात्रा से बढकर होती है जिसका कोई एक शिखर अंतिम हो सकता है मगर आपकी रचना का नहीं.अब खट्टा मांगने या सब्जी बांटने का रिवाज़ भी ख़त्म सा है.इससे पढ़कर याद आया की गाँव में जिनका चूल्हा बुझा होता था वो किसी के घर आग मांगने भी जाते थे.जलती आग का कोयला या लकड़ी मांग कर लाई जाती और अपना चूल्हा जला लिया जाता.किसी को भेजते थे की जा जरा देख के आ फलाने के घर चूल्हा जल रहा के नहीं.

    उत्तर देंहटाएं
  42. humesha ki tarah aaj ke halaton ko khhobsurti se pakda hai aapne apne is shabda chitra mein..

    उत्तर देंहटाएं
  43. bahut dino baad aana huaa aaj aapne blog pe.. aur dil ki baatein dil ko chhu gayeen..
    biography khurduri hai lekin bahut sach hai.. aur ye sach bas aapka hi nahi hum sabka hai..

    aur sabse badd sach ye -
    फर्क सिर्फ एक टाइमिंग का है .....खुदा ने आपको किसके घर फेंका है .....हमें -.आपको इतराने की जरुरत नहीं

    उत्तर देंहटाएं
  44. ज़िन्दगी में हमारी हम उम्र कई लोग हमसे अचानक ही कई साल बड़े हो जाते है.. तब कही आनंद फिल्म के राजेश खन्ना की आवाज़ गूंजती है.. ये ज़िन्दगी एक रंगमंच है बाबोमोशाय! और हम सब एक कठपुतली जिसकी डोर उपरवाले के हाथ में है..
    बहरहाल लम्बे अंतराल के बाद आपकी आमद ने स्वाद ही बढाया है.. कुछ लाईन्स उठा रहा हूँ.. अपनी किसी फिल्म में जोड़ तोड़ के ड़ाल दूंगा.. विद रोयल्टी ऑफ़ कोर्स! :)

    उत्तर देंहटाएं
  45. बब्बू, बिट्टू, बेबी पिंकू सब इतनी इफ़रात मे हमारे आस-पास हैं कि कभी-कभी हम खुद को उनसे अलग समझने की भूल कर बैठते हैं..इसी तस्वीर का एक और एंगल सुनिये..उस बंदे से मेरी पीजी के दौरान मुलाकात हुई थी..गाँव का था..दलित और गरीब(यह हमेशा कॉम्बो पैक ही होता है)..बदकिस्मती से पढ़ने मे बेहद अच्छा..AIEEE मे बिना कोचिंग वगैरह के अच्छी रैंक आ गयी थी..मगर इतने पैसे इकट्ठे नही हो पाये जो एडमिशन मिल पाता..दोस्तों ने उसकी फ़ीस के लिये चोरी कर पैसा इकट्ठा करने तक का प्लान बनाया..मगर उसने साफ़ मना कर अपने प्रारब्ध को स्वीकार कर लिया..और अपने सारे सपने अपने छोटे भाई की आँखों मे ट्रांसफ़र कर दिये..किसी तरह एम एस सी की फिर ट्यूशन पढ़ा-पढ़ा कर भाई की पढ़ाई आगे बढ़ायी..उसकी अथक मेहनत रंग भी लाई..और भाई जब रूड़की से इंजिनियरिंग पढ कर बाहर निकला तब तक दुनिया काफ़ी तब्दील हो चुकी थी..फ़ास्ट-फ़ारवर्ड दुनिया के ट्रैक पर भाई एक अच्छी नौकरी के साथ बुलेट-ट्रेन का इंजन बन चुका था..और बड़ा भाई अभी भी पैसेंजर का डिब्बा!..सो ’किंग-साइज लाइफ़’ की रेस मे बुलेट-ट्रेन इंजन ’आउटडेटेड’ डिब्बों को काट कर आगे बढ़ गया..और वो डिब्बा अभी भी किसी पिछली सदी के स्टेशन के यार्ड मे खड़ा होगा..किसी गाँव मे..मगर खुश होगा वो..कि सपना पूरा तो हुआ..भले ही उसकी कीमत बाकी जिंदगी चुकानी पड़े!..सपनों की गाड़ी जब स्टेशन से आगे बढ़ती है..तो सारा ट्रैक हसीं ही नजर आता है..तब यह पता नही होता है कि किस मोड़ पर फ़िश-प्लेट्स उखड़ी पड़ी होंगी..!!
    एक लड़का जो ४-५वीं क्लास मे अपनी खूबसूरत मोतियों जैसी राइटिंग और शार्प दिमाग की वजह से पूरे स्कूल मे हमारे जैसे तमाम रकीब बना चुका था...आजकल अपने बाप की आटाचक्की सम्हालता है..और बाकी वक्त मे अपने तीनों बच्चों को!!..सोचता हूँ कि जब उसके बच्चे बड़े होंगे तो क्या उन्हे भी अपने बाप की तरह आटा चक्की के सपने दिखायेगा?
    हमारी जनरेशन नाइटीज के उदारीकरण के बाद के उस दौर की जनरेशन है..जिसके बाद कुछ भी ’सेम’ नही रह गया..जिंदगी की इस स्प्रिंट-रेस मे कमजोरों के लिये कोई जगह नही है..गिरने वालों के लिये कोई बहाना नही...और छोड़ने वालो के लिये कोई ऑप्शन नही!
    ’सरोगेसी’ खुद मे एक अलहदा पोस्ट की दरकार करती है..
    ..और ख्वाब भी अब ऊपरवाले के ’मॉडरेशन-एप्रूवल’ के इंतजार की लम्बी कतार मे ओवर-एज हो जाने के आदी हो गये हैं..;-)

    उत्तर देंहटाएं
  46. आपका गंभीर बातें कहने का अंदाज़ अनोखा है...
    एक बेहतर शब्द-चित्र...

    धन्यवाद....

    उत्तर देंहटाएं
  47. anurag bhaayi....kyaa kahun....laazawaab likha hai aapne....

    उत्तर देंहटाएं
  48. अनुरागजी
    आपने तो सारे दर्द समेट लिए अपनी इस पोस्ट में|जिदगी के तेजी से बदलते रंगों को और उनकी बदरंग सच्चाई को बेहद ईमानदारी से अभिव्यक्त किया है |मध्यम वर्ग के जीवन में इस तेजी से आते बदलाव का क्या अंजाम होगा ?भविष्य के गर्त में छुपा है |अल्पनाजी से सहमत हूँ |
    आप्कीलेखन शैली अत्यंत रोचक है और धारदार भी |

    उत्तर देंहटाएं
  49. आपने वाकई तेजी से बदलती दुनिया की तसवीर खींच के रख दी है । मूल्यों की ये गिरावट आज नही आई है आजादी के बाद के सालों में लगातार धीमें धीमें नामालूम हमारी रगोंमें प्रवेश कर गई है ये, इतनी कि हमें पता ही नही चलता । चाय के कप के साथ मूल्यों की गिरावट की बातें करने वाले हम अक्सर अपने उसूलों से समझौता कर लेते हैं ।
    आपका लिखा हमेशा की तरह सोचने पर मजबूर करता हुआ । पर त्रिवेणी कहां रह गई ?

    उत्तर देंहटाएं
  50. अद्वितीय लेखन शैली,मर्म को भेदते सत्य मुखरित हैं...

    शुभकामनाएं...

    उत्तर देंहटाएं
  51. आपका लिखा पढने के बाद आसानी से उसके प्रभाव से मुक्त हो शब्द ढूंढ कर टिप्पणी कर पाना असंभव लगने लगता है....
    क्या चित्र खींचा है आपने....क्या कहूँ...
    आपकी अनुभूति और अभिव्यक्ति क्षमता को नमन !!!

    उत्तर देंहटाएं
  52. बदलाव प्रकृति का नियम है . इसी नियम के तहत तब और अब में फर्क है. जैसा हम अब सोचते हैं वैसा हमारे बुजुर्ग तब सोचते थे.यह बदलाव कितना सार्थक या निरर्थक है , यह आने वाला समय बताएगा.

    उत्तर देंहटाएं
  53. डॉ अनुराग जी की लेखनी के बहुत दीवाने हैं. उनमे इंतजार बना रहता है. मैं भी हूँ उनमे से, कल एक मित्र ने कहा यार कितना बड़ा दिल है... जैसे मैं भागभरी मैनियों का हवाला देते हुए कहता हूँ दोस्त कमल के पत्तों से भी बड़ा ... फिर मुझे आपकी सेहत पर रश्क होता है कितना पढ़ कर कितनी जगह हौसला बढ़ा आते हैं ? फेसबुक पर आपके सेहतनामे में बुखार का ज़िक्र देखा तो लगा कि अभी थोड़ी ही देर में कहीं किसी की पोस्ट पर जरूर डॉ साहब का कमेन्ट देखने को मिल जायेगा.
    ये हौसला बना रहे और बड़ा दिल भी.

    उत्तर देंहटाएं
  54. नोस्टेलजिया और मेटोमौरफिस में उलझा मन आकर टिप्पणी के इस जुमले पर अटक जाता है डा० साब "यूँ भी पेंतीस के बाद जब कभी ग़लतफ़हमी होती है के जिंदगी का स्टेयरिंग हाथ में आ गया है .कोई एक मोड़ औकात में ले आता है..."

    कहां-कहां से बुन के लाते हो आप भी?

    कुछ अजब व्यस्तताओं में उलझा रहा तो ...अभी अवकाश पे घर आया हुआ हूं। एकदम फुरसत में हूं।

    उत्तर देंहटाएं
  55. याद था यहीं से फिर शुरू करना था .. आपके यहाँ टीपों को पढ़ना भी एक अच्छा अनुभव होता है .. मैंने अपूर्व की टीप की कहानी पढ़ी .. नया क्या कह पाउँगा और सच कहिये तो ब्लॉगवुड की प्रविष्टियों का भाव-शिल्प अभी तक अंगीकार नहीं कर सका हूँ , इसलिए इस माध्यम को सही से समझना भी जरूरी है ! अब आगे चलता हूँ !

    उत्तर देंहटाएं

कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails