2010-06-14

तुम प्रेम कहानिया नहीं लिखते..!!!!!!


सफ़र में लोग बेवजह का कितना पढ़ते है ...एक ही अखबार को कितनी बार मोड़ तोड़ के  .... ...सामने वाले  शख्स ने तीसरी बार अखबार उठाया  है......वो  बरसो बाद ट्रेन में बैठा है ... ....सामने  की  सीट  के दूसरे हिस्से पर एक लड़का बैठा है ....घुंघराले लम्बे  बाल .......हाथ में गिटार...... कोई धुन बजा रहा है ..."केयर लेस व्हिस्पर  है  ..".....किनारे वाली सीट पर एक लड़की किताब हाथ में लिए बैठी है ....एक लम्हे में कितनी पेरेलल स्टोरिया चलती है ...

वो भी इसी शहर में है ....पांच महीने पहले मारीशस से इंडिया शिफ्ट  हुई है ....कितना अजीब वर्ड है न "शिफ्ट ".....नयी जगह भीतर भी शायद "कुछ शिफ्ट "कर देती है   ...चार दिन पहले मानसी से उसका नंबर लिया था उसने ..
..कितना कुछ तो बांटा था  हम  दोनों ने ..कई साल ....फिर भी उसे  फोन करते वक़्त वो  नोर्मल नहीं था .....क्यों.?..
सन्डे  को  को मिलती हूँ .लंच साथ लेगे....उसने कहा था  फोन पर  वही आवाज ... ....कितने सालो बाद.....शायद १३ साल ........
. शहर शायद नजदीक है .ट्रेन मिनट दो मिनट के लिए रुकी है ..नए .मुसाफिरों में कुछ स्कूली लडकिया भी है सरकारी  स्कूली की  हिंदी मीडियम नुमा  लडकिया जिनके .  दुपट्टे   उनसे भी बड़े है ....गोया इम्तिहान के नंबर दुपट्टे की चौड़ाई तय करती है...गिटार अब भी बज रहा है .धुन चेंज हो गयी है ....स्कूली लडकिया चुहल कर रही है .... . वो फोन पर दो चार एस एम् एस करता है ........ अखबार पढने वाला एक टक किसी  स्कूली लड़की  को  घूर रहा  रहा है....वो  अपनी सहेली   के  पीछे सिमट सी  गयी है ...शायद इसी कारण से

१३ साल छह महीने ओर उनत्तीस दिन बाद के एक सन्डे की दोपहर  ....

 होटल की लोबी में वो पिछले पैंतालिस  मिनट  से वक़्त काटने की कई तरकीबे आजमा चूका है ... ....शीशे के दरवाजे के उस पार  वो ब्लेक साड़ी में लिपटी खड़ी दिखती  है .ब्लेक साड़ी   उसकी  फेवरेट है.. वो जानती है  वो  खड़ा हुआ  है...काफी कुछ तब्दील हुआ है ..वो भर गयी है कई जगह से ...आँखों पर चश्मा है......
सोरी यार शहर में नयी हूँ इसलिए जगह नहीं पहचानती ...पूछते पूछते आयी हूँ....वो पास खड़ी हुई है ....उसी  बोडी ड्यूडेरेंट की खुशबु नथुनों में जा घुसी है .. वो अब भी वही ब्रांड इस्तेमाल करती  है
"तुम अब भी खुद ड्राइव करती हो..."
हाँ ....उसने चश्मा हटा दिया है .चेहरे पर आँख के नीचे उम्र के थोड़े निशान आये है ...हम्म्म..माथे पर भी .....
वो तुम किसका   शेर कहते थे ......के "कोई सौ बार तेरी गली से गुजरा हूँ .कोई सौ  बार तू अपनी खिड़की पे नहीं आयी.... सोचा आज उसी शेर को लोबी में याद करोगे
   वो   याद  करने  की  कोशिश  करता  है    पर  याद  नहीं    रहा  …
..कितना स्कोर हुआ  गालियों   का ...?वो पूछती है ....
वो सिर्फ मुस्कराया है.......
रेस्ट्रोरेन्ट तक जाते जाते उन्होंने कई कुछ औपचारिक बाते की है ......मसलन काम....मसलन ट्रेन का वक़्त ... रेस्ट्रोरेन्ट के उस सेक्शन को उन्होंने गाँव का लुक दिया है ..पांच सितारा होटलों में भी अब गाँव बसते है ... वो याद करता है उसे चाइनीज़ का टेस्ट उसी ने डवलप   कराया था..किसी खूबसूरत लड़की के सामने .पहली बार उन लकड़ी के इन्सट्रूमेंट से खाना बड़ा अजीब लगा था उसे....डरकर  सिर्फ  "ड्रम्स ऑफ़ हेवन" खाये  थे उसने .....
बैठते हुए  वो अपने हाथ में पकडे एक पेकेट उसे थमाता है ....केनेजी का इंस्ट्रुमेंटल. है........
"अजीब  सा लगता है ...कभी सोचा नहीं था ...हमारे बीच ये रस्म भी होगी.....".वो कहती है
कैसी हो?
एज यूजवल .खालिस  शादी शुदा   औरतो की माफिक... शादी के बाद औरत की जिंदगी  थोड़ी  स्लो मोशन में चलती है.........तुम्हारा क्या हाल है ….कविताये-शविताये    जिंदा   है.....?
उसके बांये गाल पर एक गढ्ढा पड़ता था ...अब भी पड़ता है पर इतना गहरा नहीं.......
"ऐसे मत देखो .मै कोंशियस  हो रही हूँ" ...वो कहती है  .तो वो झेंप उठा है .....
जानते हो ....बरसो बाद मैंने अपने शरीर को गौर से देखा ...ऐसा नहीं के मै ध्यान नहीं रखती पर आज यहाँ आने से पहले  थोड़ी कॉन्शियस हुई....फिर तुम्हारी कनपटी के सफ़ेद बालो ओर  सर के उड़े बालो को देखकर तसल्ली मिली....के तुम भी कहाँ पहले जैसे हो अब.....?
उसमे कुछ बाते अब भी वैसी है ...अजीब से सचो को यूं बोल देना ..
तुम अब भी वही ब्रांड पीते हो.....वो सिगरेट का पेकेट  निकालती है अपने पर्स से ....
वो हैरानी से उसे देखता है ....
नहीं….. मैंने पीना छोड़ दिया है .
. ..वो सिगरेट के पैकेट को थामे रुक गयी है  ...
वो मुस्कराता है.....ऐसी कोई शर्त नहीं है ...कोई पुराना मिल जाता है तो
पी  भी लेता हूँ....पर बाँट कर!
उसने सिगरेट का पेकेट टेबुल  पर रख दिया है
बाई गोंड !!तुम  बदल गए हो.....
वो मुस्कराता है... बाई गोंड अभी भी मौजूद है …….
कुछ नहीं बस भीतर कुछ चीजों ने अपना  क्रम बदल  लिया  है  ...
वो उसकी कनपटी  के सफ़ेद बाल देख रही है ."तुम्हारे बाल जल्दी सफ़ेद हो गए 'है ना..
कभी याद आती है मेरी”?
 .....ऐसे सवालों  के बाद  अक्सर पॉज़ स्वंय अपनी जगह तलाश लेता है .... ये सवाल तो उसके ज़ेहन में अक्सर उठता है…. इस सवाल को वो इस मुलाकात के दरमियाँ नहीं लाना चाहता था .पर कुछ सवाल  प्लान नहीं होते है ....
पर जवाब भी वो खुद ही देती है .".जब कभी टी. वी पर बॉम्बे आती है ...तुम्हे याद करती हूँ.... "
बॉम्बे उन्होंने तीन बार देखी है  .एक साथ .....पूरी मुलाकात में पहली बार उसके भीतर कुछ पिघला है ..छूने की तमन्ना भी हुई है ..
"तुमने जवाब नहीं दिया...."
जब कभी ड्रम्स ऑफ़ हेवन  खाता हूँ तुम्हे याद करता हूँ
वो हंसी है.
अब ख़ामोशी अपनी जगह ढूंढ कर  कुछ देर बैठती है......
"अच्छा है हम दोनों की शादी नहीं हुई.... उसने ख़ामोशी को हटाया है " एक दूसरे का सब कुछ जान लेने के बाद उसे उसी तरह प्यार करना मुश्किल होता होगा ना "
वो उसको देखता है ... जाने  क्यों सिगरेट पीने की  तलब उठी है ..पीछे कुछ इंस्ट्रूमेंटल बज रहा है ... खाने से पहले सूप आया है ..
.... …“जानती हो  उस  उम्र   में   हमें  बहुत    कुछ   चाहिए   होता  है …. प्यार की कई किस्मे होती है ....... कई  शक्ले..आहिस्ता - आहिस्ता  जब जिंदगी में दाखिल  होती है ...शर्ते    फ़िल्टर   होने  लगती  है’” …...कभी कभी हम वक़्त के साथ अपने हिस्से का  तजुर्मा गलत कर देते है ....शायद वक़्त की अपनी लिमिटेशंस होती हो...
वो उसकी आँखों में देखती है ..."डेस्टिनी”…. फिर हंसी है
खाने के दौरान  कई दूसरे मसले उठते है ....
जोइंट फेमिली में रहना मुश्किल है भाई...कई जगह स्क्रीनिंग से गुजरना पड़ता है ....
पहले जब वो  इस तरह से झुंझला कर अपनी तकलीफ  किसी बात  पर जाहिर करती  थी ....   तो कितनी खूबसूरत लगती थी ..... .. वो चीजों को मेनेज करना सीख गयी है
जाने से पहले . उसकी आँखों में सीधे झांकती  है . .एक बात पूंछु?
... .. इस तरह से पूछे जाने वाले   सवाल  अक्सर  मुश्किल  होते है..
कितनी प्रतिशत बची हूँ मै तुम में ?
कुछ चीज़े ऐसे  ही छोड़ी जाती है ....अनडिस्टर्ब .... फ्लेश्बेक को  खूबसूरत ही रहना चाहिए …. 
एक ठंडी सांस!!
क्या तुम्हे ड्रॉप करूँ स्टेशन तक? वो पूछती है
नहीं .होटल की टेक्सी है ...थोडा सामान भी पेक करना है 

 चाइनीज़ खाते रहना..... खास तौर से ड्रम्स ऑफ़ हेवन ....विदा लेती वक़्त वो बोली है
रेलवे स्टेशन   की  ओर जाती टेक्सी में ....   उसे जाने क्यों लगता है .... इस मुलाकात में  प्यार नुमा  सा.. जायका नहीं था कुछ मिसिंग था .... तो क्या प्यार भी वक़्त के साथ रिसता है.?..

ट्रेन में चढ़ते हुए  हुए उसने देखा है
घुंघराले लम्बे  बालो वाला लड़का वही लड़का गिटार कंधे पे टाँगे ट्रेन में चढ़ रहा है ...उसके साथ एक लड़की है ..जिसके कान में वो कुछ फुफुसा रहा है ..सामन रखकर वो मुड़ा है ... वे दोनों उसी के  कम्पार्टमेंट में है  .... लड़की उसी देख के मुस्कराई है ..वही किताब वाली लड़की.... .ट्रेन ने आहिस्ता आहिस्ता रफ़्तार पकड़ी है ....उसने  दरवाजे के पास आकर  सिगरेट सुलगा ली है ..
एक लम्हे में कितनी पेरेलल स्टोरिया चलती है ...



ऑफ़ दी रिकोर्ड -
किसी ने मेल लिख कर पूछा था ...तुम प्रेम कहानिया नहीं लिखते....
 .
मेरे पास कहानिया नहीं है.......

98 टिप्‍पणियां:

  1. पढ़ते पढ़ते कहीं खो सा गया था, जो भी है कमाल का लिखा है!

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  2. क्या यह प्रेम कहानी नही है ?

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  3. यही भी तो एक प्रेम कहानी ही है..प्रेम का रूप /अंदाज़ ही तो ज़रा बदला है ..अब जिसे अभिव्यक्त करने के लिए उन दोनों के बीच शायद शब्दों का अभाव हो गया हो तभी इतने 'pause' बीच में आये.
    **आँखों से झांकता सवाल-कितनी प्रतिशत बची हूँ मै तुम में ?--भीतर तक झकझोर देता है..शायद इस का जवाब होते हुए भी वह'कभी दे न सके.वक्त की भी अपनी लिमिटेशन जो होती हैं.
    आप की ही की लिखी पंक्ति .. बस भीतर कुछ चीजों का क्रम बदल जाता है.
    ---------------------
    लगता है भीतर कुछ पिघल रहा है.
    ----------------------

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  4. आपका बलोग पढकर अच्चा लगा । आपके चिट्ठों को इंडलि में शामिल करने से अन्य कयी चिट्ठाकारों के सम्पर्क में आने की सम्भावना ज़्यादा हैं । एक बार इंडलि देखने से आपको भी यकीन हो जायेगा ।

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  5. अब मैं आपमें और जोधपुर वाले व्‍यासजी में समानताएं देखने लगा हूं...

    लम्‍हे को कैद करके उसी में पूरा जी लेने की ख्‍वाहिश और उसी के साथ...

    जितना कम कहूंगा उससे अधिक समझा जाए तो बेहतर है...

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  6. अनुराग जी सही में आप प्रेम कहानियां नहीं लिखते हो। सही कहा है। जनाब लिखो तो तब जब आए। आप तो जी कहानी बुनते हो, रेशम के कीड़े की तरह, मुलायम, मखमली। आंखो के सामने चलती हुई किसी फिल्म की तरह। सही है जी आप क्या जानो लिखना। आप तो सिर्फ बुनना जानते हो भाव को, प्यार को। लिखना भी नहीं जी कभी, सिर्फ बुनना इसी तरह, रेशम सी, मुलायम, मखमली, सर्दी की दुपहरी की तरह जी।

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  7. कहानी भी स्क्रिप्ट के अंदाज़ सिमेटे.. अंदाज़ ही निराला है.

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  8. इस मुलाकात में प्यार नुमा सा.. जायका नहीं था… कुछ मिसिंग था .... तो क्या प्यार भी वक़्त के साथ रिसता है.?..

    प्रेम भी रिसता है ....दूरियों से ...समय की , मन की ...!!

    वक़्त के साथ बदलते हैं मायने हर रिश्ते के ...
    आपकी कहानी (अप्रेम कथा ) तो यही बता रही है ...

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  9. बोले तो बिन्दास और दीपक ने मुझसे पहले आ कर ठीक नहीं किया :) मैं भी कुछ ऐसा वैसा ;) ही लिखता।
    एक बात कहूँ - ये बीच बीच में फॉण्ट को बोल्ड न कीजिए। पाठक की समझ पर भरोसा कीजिए। जो अधिक चुभेगा वह अपने आप बोल्ड हो मन में अंकित हो जाएगा।:)
    व्यक्तिगत रूप से मुझे ऐसे अंश पढ़ने में ठेस सी लगती है। जैसे चले जा रहे हों और रास्ते में कोई हम्प बम्प जैसा उभर आए! ...
    मास्साब सिखाते थे उत्तर पुस्तिका में अपने उत्तर के प्रभावशाली और सुन्दर अंशों को रेखांकित कर देना। आप को कोई जरूरत नहीं, आप तो स्वयं मास्टर हैं।

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  10. वर्तनी की गड़बड़ियाँ खुद ठीक कर लीजिए न :)

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  11. एक लम्हे में कितनी पेरेलल स्टोरिया चलती है... पर कितने लम्बे अरसे तक जिन्दा रहती हैं....है ना?


    अच्छी रचना..

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  12. वक्त के साथ प्यार के एहसास भी रिसते हैं...एक खूबसूरत कथा को बुना है....

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  13. प्रेम करते तो हैं न ?
    लिखने का जिम्मा भी क्यों न लेना चाहते हैं फ़िर ?

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  14. आपने प्रेम को रेशमी नज़र से छू दिया ....

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  15. आपके पास कहानिया नहीं है.. जिंदगी ही आपको एक सधी हुई स्क्रिप्ट में मिली है... वो की जगह मैं लिखने में डर क्यों लगा जनाब? हम कौनसा आपको कैरेक्टर सर्टिफिकेट दे रहे थे..

    आपके पढ़ते हुए जो हर तीसरे सेकण्ड में इमोशंस बदलते है आज वैसा ही हुआ.. एक साथ तीन सौ की स्पीड से दिमाग में हलचले होने लग गयी.. इस से पहले बरगद वाले पेड़ में हुई थी.. ये घोर अनुरागीय पोस्ट है.. जिसका हम बेसब्री से इंतज़ार करते है.. पुरी पोस्ट को विज्युलाईज किया है.. और ये लाईन "कितनी प्रतिशत बची हूँ मै तुम में ?" यहाँ पर जाके हार्ट बीट्स टॉप पर थी..

    सुबह सुबह क्या पढवा दिया बॉस..!

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  16. कितनी प्रतिशत बची हूँ मै तुम में ? शायद कुछ सवालों के जवाब नहीं होते या शब्दों की अपनी लिमिटेशंस होती हैं... हाँ शायद प्यार भी वक़्त के साथ रिसता है पर कुछ है जो ठहर जाता है मन के भीतर ही कहीं तमाम पर्तों के नीचे...
    इतनी जीवंत अभिव्यक्ति की पढ़ के लगा सीन बाय सीन सब आखों के सामने ही चल रहा है...

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  17. ANURAAG JI,

    VERY RARE....VERY OLD SCOTCH.....EK DO JAGAH RUKNA PADHA ..GALE ME FANSE AANSUO KO NIGALNE KE LIYE.....

    KITNI BACHI HOON ,MAIN- TUMME...

    AB TO BHAIYYA MERATH AANA HI PADENGHA.. DOCTOR SE NAHI ...KISI APNE COUNTER EGO /XEROX SE MILNE KE LIYE..

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  18. एक लम्बे अरसे के बाद अनुराग से अपने खालिस अंदाज़ में मिलना बहुत अच्छा लगा...वो ही दिलकश मंज़र खूबसूरत जुमले और पढने वाले को साथ बहा ले जाने वाली कला...क्या लिखते हैं आप? कसम से तारीफ़ के लफ़्ज़ों को फूस में गिरी आलपिन की तरह ढूंढना पढता है...कमबख्त फिर भी नहीं मिलते और जो मिलते हैं वो इतने हलके और पौंचे होते हैं के उन्हें कहने से ना कहना ही बेहतर लगता है...
    अरसे बाद आप को पढ़ कर जो सुकून मिला है उसे बयां करना ना मुमकिन है...
    नीरज

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  19. शायद यही है कालजयी कहानी बहुत खूब बधाई और देर बाद आने के लिये क्षमा भी। शुभकामनायें

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  20. Asslam alaikum anurag ji-
    वैसे तो आप ने अपना वादा पूरा नहीं किया इसलिए नाराज़ होना मेरा हक है, बाकि आप उसकी परवाह करते हैं या नहीं ये..मैं आप पर छोडती हूँ...

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  21. क्या लिखते हैं सर. मानव मन पर ऐसी पकड़! वाह ही वाह.

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  22. आठ मिनट तक शब्द ढूंढते रहे चुप बैठकर....नहीं मिला भाई...
    अब का करें...इसीसे काम चलाइये...
    लाजवाब !!!!

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  23. कितनी प्रतिशत बची हूँ मै तुम में ?
    तो क्या प्यार भी वक़्त के साथ रिसता है.?..
    उफ़ ……………………गज़ब का लेखन्………………ये पन्क्तियाँ दिल मे उतरती चली गयीं और बहुत ही गहरे………………कमाल का लिखा है………………तारीफ़ किन लफ़ज़ों मे करूँ यही सोच रही हूँ न जाने कौन सा जादू है इनमें---------कितनी प्रतिशत बची हूँ मै तुम में ?यूँ लग रहा है जैसे ये पन्क्तियाँ तो आज दिल ही निकाल ले जायेंगी।

    इससे अच्छी प्रेम कहानी क्या होगी।

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  24. कितनी बातें पैरलल चलती hain !
    ...
    "इम्तिहान के नंबर दुपट्टे की चौड़ाई तय करती है." ओह !

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  25. एक लम्हे में कितनी पेरेलल स्टोरिया चलती है ...
    उनमें से एक स्टोरी... दिल के करीब रेल की तरह गुज़रती है और लम्बे समय के लिए थरथराता छोड़ जाती है...

    कितनी प्रतिशत बची हूँ मै तुम में?
    Poignant! Timeless!

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  26. सच कहा कुश ने "क्या पढवा दिया जनाब :)..
    एक टिप्पणी क्या ख़ाक कर पायेगी यहाँ ...
    सोचा नहीं लिखूंगा मगर ईमोसन कंहा बांधों में रुक पाते हैं !

    बेहतरीन कह कर ईमोसन की बेइज्जती न कर डालूं ..
    आप हर बार जिन्दागी को गहराई से छुन क चले जाते हो डाक्टर साहब ... :)

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  27. जनाब, एक जिन्दगी में कई जिन्दगियां भी पैरेलल चलती हैं...
    निशब्द...

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  28. आपके पास कहानिया नहीं है जिंदा इंसानों के जिंदा सपने है कुछ पूरे कुछ अधूरे . उम्र में शायद आपसे दस साल कम हूंगी या फिर आठ साल फिर भी कई बार लगता है आप ने तो मेरा कुछ कह दिया है .सच मानिए हमें तो वही ढाई साल पुराने अनुराग पसंद है जो नज्मे लिखते थे रूमानी सी ,ये गंभीर वाले तो कोई ओर लगते है .
    फिर भी इस में बहुत कुछ है

    #सफ़र में लोग बेवजह का कितना पढ़ते है

    # एक लम्हे में कितनी पेरेलल स्टोरिया चलती है ...

    #नयी जगह भीतर भी शायद "कुछ शिफ्ट "कर देती है

    # गोया इम्तिहान के नंबर दुपट्टे की चौड़ाई तय करती है..

    #चेहरे पर आँख के नीचे उम्र के थोड़े निशान आये है ...हम्म्म..माथे पर भी ....
    .
    ओर बीच बीच में आपकी फिलोसफी की आदत दिख जाती है

    #पांच सितारा होटलों में भी अब गाँव बसते है .

    अजीब से सचो को यूँ ही बोलने वाली इस लड़की का सवाल कितने प्रतिशत बची हूँ तुममे ?वाकई पूरी पोस्ट को एक पॉज़ देता है ,जो चीजों को तो मेनेज करना सीख गयी है पर दिल को नहीं वां से अब भी सच निकलता है
    "the door we open and close each day decide the life we live"
    no some times we cant choose the door and some time we cant choose the live.still we live.
    most wonderful line rather truth is
    प्यार भी वक़्त के साथ रिसता है
    yes !

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  29. कितनी प्रतिशत बची हूँ मै तुम में

    यह पंक्ति अशोक कुमार पाण्डेय की कविता की है…उनके ब्लाग असुविधा पर आप देख सकते हैं…http://asuvidha.blogspot.com/2010/03/blog-post.html बस लिंग परिवर्तन के साथ यहां उपयोग की गयी है…

    उपयोग ग़लत नहीं है…पर स्रोत का ज़िक्र होना चाहिये था

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  30. ...सुना था डॉक्टर्स के पास दिल नहीं होता... आपकी कहानी पढ़कर ये बात झूठ साबित हुई... :)

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  31. वाह डॉक्टर वाह !
    बिना रुके एक ही साँस में पूरा पढ़ते पढ़ते सारा दृश्य ही जैसे नज़र के सामने से निकल गया.
    कोई शब्द नहीं प्रशंसा के लिए.
    साधुवाद.

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  32. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  33. प्रेम कहानी की डिमांड पूरी करने में काफी वक़्त लग गया ..! न चाहते हुए भी आपने लिख ही डाली ... अपनी ही जिन्दगी में न जाने कितनी कहानियाँ एक साथ चला करती हैं .. कभी कन्फ्यूज़न भी होने लगता है .. कहानी पर नहीं .. अपने पर ... जिन्दगी शर्तों को फ़िल्टर कर हमारे सामने लाती है और फिर खुद ही में सुलगने लगती है ... यहाँ जिन्दगी के साथ प्यार ही नहीं , रिश्ते भी रिसने लग जाते हैं ...आज त्रिवेणी की कमी महसूस हुयी ...

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  34. कह सकता हूं कि आपकी यह कहानी पिछले कुछेक सालों में मेरी पढ़ी कहानियों में वन आफ दि बेस्ट है। पता नहीं यह आपका कौन सा ड्राफ्ट था। लेकिन मुझे ऐसा लगा कि निर्मल वर्मा के लवर्स का पहला ड्राफ्ट ऐसा कुछ ही रहा होगा। आपमें भाषा सरलीकृत है लेकिन कहानी के एलीमेंट पकड़ने में आपने जो महारत दिखायी है वो मैं इधर बीच की नई कहानियों में बिल्कुल गायब है। नीलिमा ने जिन पंक्तियों को कोट किया है वो कहानी की जान । ऐसी अकुंठ प्रेम-कथाएं इस सदी में लिखी जा सकेंगी कि नहीं पता नहीं,लेकिन आपने लिखी है इसके हम सब गवाह हैं।

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  35. कम्बख्त क्या सोने सा दिल पाया है सरकार!!! पढकर लगा कही ये कहानी मेरी ही तो नही लेकिन मेरी तो अभी शादी ही नही हुयी.. फ़िर भी जैसे ये कहानी मुझमे समाती चली जाती है.. ’ड्रम्स ओफ़ हेवेन’ सिर्फ़ देखे हुये है, खाये नही पर तब भी उनका टेस्ट आता है.. सिगरेट मैने भी छोड दी है पर उसके साथ सुलगाने का मन करता है... और उसके पाज को तोडने का भी.. कम्ब्खत ऎसे पाज बडे डेयरिग होते है और ऎसे डायरेक्ट पूछे गये सवाल भी...

    उम्र के साथ हम खुद ही मे कितना बचते है.. मासूमियत उसके साथ चली गयी होती है.. और मुफ़लिसी खुद के ही साथ.. धीरे धीरे मशीन बनते जाते है जिसे दुनिया ’समझदारी’ कहती है...

    जाते जाते इवेन आई हेट लव स्टोरीज यार.. :)

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  36. अनुराग जी ,

    वक्त की अपनी लिमिटेशंस होती हैं ...तो क्या प्यार रिसता जाता है ...कुछ बेहतरीन पंक्तियाँ ...जैसे जो कुछ गुजरा अपने साथ तो गुजरा ...पर देखा किसी तीसरी आँख से .... । ये जो एक साथ पैरेलल कहानियाँ चल रहीं होती हैं न , हर स्टोरी की किस्मत में यूं सूरज देखना नहीं लिखा होता । है आपका भी अन्दाज़े-बयाँ और !

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  37. ये इत्तिफाक नहीं है लिखना ......ऑफ़ दी रिकोर्ड में ये के"मेरे पास कहानी नहीं है .....फिर भी लोग........?
    आदतन किसी पोस्ट को लिखने के तीन चार दिन बाद ही मै अपने कमेन्ट करता हूँ......मुझे कम लोग ही पढ़ते है ......पर जितने लोग पढ़ते है मेरी इस आदत को जानते है .....इसलिए सोचा था तीन चार दिन बाद बॉम्बे के ट्रिप से वापस आकर कमेन्ट करंगा....पर कुछ कमेन्ट ने मुझे दुखी किया....जिस मूड ओर जिस फ्लो में मैंने ये पोस्ट लिखी थी वो.....कही खो गया .....
    गुलज़ार को डूबके पढने वाले लोग जानते है ....के उनको मै भी जीता हूँ...उनकी एक नज़्म है .फसादात-३.... रात पश्मीने की से .......वो कुछ यूँ शुरू होती है ....मोजजे होते है ये बात सुना करते थे ".....मायूस को थोडा नीचे स्क्रोल करेगे .तो पायेगे एक शीर्षक ऐसा ही है .......कुछ ओर मसलन एक चौरस खिड़की .मसलन "एक सब जीने का....एक सबब मरने का "जो यूथनेसिया पर है..........मसलन "जरा नाखून तराशो अल्फाजो के "...जो इंसानी रिश्तो पे है ..मसलन.......मेरी फेवरेट....जाग जायेगा कोई ख़्वाब तो मर जायेगा ....जो मूलत ...बल मजदूर पर है .उनक खास तौर पे एक वर्ड को इस्तेमाल करना ".सोना" .उनके मुरीद अपनी नज्मो में इस्तेमाल करते है .........उनकी एक लाइन ..."...कहाँ छुपा के रखी है रात तूने पर मैंने" एक नज़्म लिखी थी.......
    उस
    खुश्क रात के होटो पर
    बादल रखकर
    जब तुम
    भीगी -भीगी सी आयी थी,
    हर साँस मे
    एक समंदर लिये ,
    जिसके साहिल दर साहिल
    मैं डूबा था
    वो रात........
    अब भी कही पोशीदा है
    रोज़ मेरे सिरहाने
    सुबह भीगी-भीगी सी
    पड़ी मिलती है
    कहाँ छुपा के रखी है रात तूने?

    गोया.....शुक्र है किसी ने ये नहीं कहा .....के आप तो गुलज़ार को चुराते है ......

    खैर सबसे ज्यादा हैरानी ओर दुःख मुझे अशोक जी के कमेन्ट से हुआ ....कम से कम मेरी प्रतिक्रिया तो आने देते....मुझसे मेल पर उनकी बात होती है ......उनके विचारो ओर उनकी कविताओं का मै भी मुरीद हूँ .ओर ये भी जानता हूँ के शायद वे वास्तविक जीवन में भी इतने ही स्पष्ट ओर ईमानदार व्यक्ति होगे ......अभी उनकी लम्बी कविता पर मैंने उनके आग्रह पे एक कमेन्ट किया था .......ब्लॉग लिखने मेरे लिए ....खुद को जीने के बेहतरीन टूल में से एक टूल का इस्तेमाल करना है ..

    उत्तर देंहटाएं
  38. @शुक्रिया डॉ पांडे का .जिन्होंने मुझ उस कविता का पता दिया जो कुछ यूँ है ........
    जिसका शीर्षक है ........"पता नहीं कितनी बची हो तुम मेरे भीतर "

    तुम्हारी तरह होना चाहता हूं मैं

    तुम्हारी भाषा में तुमसे बात करना चाहता हूं

    तुम्हारी तरह स्पर्श करना चाहता हूं तुम्हें

    तुम होकर पढ़ना चाहता हूं सारी किताबें

    तुम्हें महसूसना चाहता हूं तुम्हारी तरह


    वर्षों पहले पढ़ा था कभी

    मुझमें भी हो तुम ज़रा सा

    उस ज़रा सा तुम को टटोलना चाहता हूं अपने भीतर

    बहुत दूर तक गया हूं अक्सर इस तलाश में

    जहां मुझे पैरों पर लिटा जाड़े की गुनगुनी धूप में

    एक अधेड़ औरत गा रही है

    जुग-जुग जियसु ललनवा

    भवनवा के भाग जागल हो

    और उसकी आंखों से टपक रहा है

    किसी भवन का भाग्य न जगा पाने का दुख


    उस दुख से अनजान एक दूसरी औरत

    रुई के फ़ाहे सी उड़ रही है उल्लास से

    सखियों की इर्ष्यालु चुहल से बेपरवाह

    हर सवाल का एक ही जवाब है उसके पास

    घी क लड्डू टेढ़ों भल


    मैं देख रहा हूं तुम्हें अपने भीतर

    सहमकर सिमटते हुए

    मैं तुम्हें दौड़कर थाम लेता हूं

    और निकल जाता हूं

    बौराये हुए आम के बग़ीचे तक

    वहां मैली जनेऊ पहीने एक स्थूलकाय पुरुष

    कुलदेवी की मूर्ति के सम्मुख नतमस्तक है

    दान की प्रतीक्षा में उत्सुक विप्र बांच रहे हैं कुण्डली

    हो रही है धरती से स्वर्ग तक सीढ़ियों की व्याख्या

    पता ही नहीं चला इन सबके बीच

    तुम कब भाग गयी छुड़ाकर मेरा हाथ

    और मैं अवाक देख रहा हूं

    अपने भीतर के मैं को लेता आकार


    मै फिर फिर लौटकर आता हूं तुम्हारे पास

    चुपचाप हो जाता हूं तुम्हारे खेल में शामिल

    छुपम छुपाई खेलता हूं

    एक टांग पर दौड़ता हूं – इख्खट-दुख्खट

    कि तुम अचानक

    अपनी फ्राक से निकालती हो गुड़िया

    और सजाते हुए गुड्डे का सेहरा

    खींच देती हो उसका घूंघट…

    मैं ढूंढ़ता हूं तुम्हें अपने भीतर

    लेकिन वहां बिंदी है, चूड़ियां, पायल और सहमा सा घूंघट

    मैं बात करना चाहता हूं तुमसे

    पर वहां चुप्पी है, शर्म है और अजनबियत हज़ार वर्ष पुरानी

    और बाहर गा रहीं हैं औरतें कोरस में

    कैसन होईंहें बाबू क दुल्हिन

    दूध जैसन उज्जर

    पान जैसन पातर

    फूल जैसन कोमल

    अईसन होईंहे बाबू क दुल्हिन


    मैं बेचैन हो भागता हूं तुम्हारी तलाश में

    पर बीच में एक पाठशाला है

    जहां पिता दफ़्तर जा रहे हैं

    मां खाना पका रही है

    भैया खेल रहा है क्रिकेट

    और मुन्नी पानी ला रही है!


    इस लंबी यात्रा में जब-जब आना चाहता हूं तुम्हारे करीब

    हज़ारो हांथ आकर थाम लेते हैं मुझे

    तुम बस सिमटती चली जाती हो

    और मैं किसी जंगली घास की तरह

    घेरता ही जाता हूं सारी ज़मीन


    लिखा तो अब भी है उस किताब में

    पर पता नहीं कितनी बची हो अब तुम मेरे भीतर

    कौन जाने जब तुम होकर करुंगा मैं तुमसे बात

    तुम पहचान भी पाओगी अपनी आवाज़

    डरता हूं कि जब छुउं तुम्हें तुम होकर

    तो कहीं चौंक ही न जाओ तुम उस स्पर्श से


    सुनो! तुम्हारे भीतर भी तो एक ‘मै’ था

    तुम कहो ना कितना बचा है वह अब?


    मै अपनी पोस्ट ओर उस कविता में एक ही साम्यता देखता हूँ ......इसके शीर्षक ओर उसके एक डायलोग में .....

    जो तकरीबन साढे चार साल पहले दरअसल जो ओरिजनली यूँ था हाथ में केनेजी का ब्रिथलेस लिए ..".by the way how much percentage of me left in you " आप बहुत कुछ खोल नहीं सकते ...नेट के सफ्हे के भी अपनी लिमिटेशन होती है ....ओर किसी कहानी की भी.....क्झास तौर से जब जब वो कहानी न हो....

    फिर भी मै@आदरणीय ए एन पांडे जी से कहूँगा ...मुझे इस डाइलोग को उस कविता का स्रोत बताने में कोई हिचक नहीं होगी......

    रात को मै लेप टॉप का इस्तेमाल नहीं कर कर रहा था ....मोबाइल से पढ़कर उस टिपण्णी को डिलीट किया था ....क्यूंकि जिस तरह एल्कोहल का एब्यूज होता है ....जानता था यहाँ भी होना शुरू हो जायेगा...यूँ भी हो गया है ....

    वैसे एक ओर इत्तेफाक है मेरी इस पोस्ट को पढ़कर औट्रेलिया में जो पेशे से डोक्टर है मेरी एक मित्र ने मुझे फेस बुक पर कमेन्ट किया...


    hey anurag...i just read the write up..'tum prem kahaniyaan ...'on ur blog.....u won't believe i wrote a nearly similar story few months back.......its so amazing..i can't believe it..... it was in fact inspired by a female friend very close to me....will send it 2 u someday.....cheers...........i still can't believe....its awesome...

    मै उससे आज तक रूबरू नहीं मिला..न उसकी दोस्त से ....उसने मुझे पिछले ढाई सालो से पढ़ा है बस.....
    अजीब इत्तेफाक है न.....वैसे वो मुझसे नाराज नहीं हुई.....
    बाकी फैसला पाठको का ....सर माथे पे !

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  39. पता नहीं कभी कभी कुछ पढ़कर कुछ पुराना इंटरलिंक हो जाता है, 10 या 12 क्लास में एक स्टोरी पढ़ी थी, एक कलाकार एक खूबसूरत मूर्ति बनाता है। वो मूर्ति इतनी सुंदर है कि वो अपनी नजर भी उससे नहीं हटा पा रहा है, वो अपने देश का सबसे अच्छा कलाकार है लेकिन ये तो उसका भी मास्टरपीस है,वो उस मूर्ति से इतना प्यार में पड़ जाता है कि ईश्वर से एक ही इच्छा रखता है कि किसी तरह से इस युवती की मूर्ति में जान आ जाए। उसके प्रेम से ईश्वर भी इतने इंप्रेस हो जाते हैं कि उसमें जान डाल देते हैं। साल गुजर जाते हैं और उम्र गुजर जाती है वो युवती , औरत और फिर बुजुर्ग हो जाती है, उसके मरने का समय आ जाता है, उस कलाकार को अहसास होता है कि ये तो उसका मास्टरपीस था वो फिर ईश्वर से निवेदन करता है और ईश्वर उसे कहते हैं अच्छा जब वो मरने लगेगी तो तुम अपनी छैनी से उसे फिर मूर्ति का रूप दे देना। जैसे ही वो मरने लगती है और वो उसे मूर्ति का रूप देने लगता है तो वो देखता है जो चेहरा कभी खूबसूरती से दमकता था वहां अब झुर्रियां पड़ रही है वो बहुत कोशिश करता है लेकिन मास्टरपीस को वो रूप नहीं दे पाता।


    ....कुछ चीजें यादों में ही अच्छी लगती है वो गर्माहट जो यादों में बची रह जाती है वो यथार्थ में कहां रह पाती है, वो असल जिंदगी में आते ही खो क्यों जाती है, जो प्रेमी दुनिया के सबसे कीमती इंसाने थे, वहीं शादी के बाद इतने इरेटेटिंग क्यूं हो जाते हैं।

    ...कुछ चीजों को ऐसे ही अनडिस्टर्ब्ड छोड़ देना ज्यादा अच्छा है, वरना वाकई वो प्यारनुमा जायका कहीं चला जाता है

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  40. जब हम अपने किसी पुराने शहर, गाँव लौटते हैं, जब हम किसी भूतपूर्व से मिलते हैं तो वहाँ और उसके पास केवल कुछ राख मिलती है। वह जो कभी था कब का धुँआ हो गया होता है।
    बहुत सुन्दर कहानी है।
    घुघूती बासूती

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  41. ऐसा लगा ये मेरी कहानी है... बहुत सुंदर डॉ. साब... :)

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  42. जानते हैं डॉक्टर आप - जब कोई आदमी किसी स्त्री के मनोविज्ञान और व्यवहार को कलमबद्ध करता है .....तब शायद वो .वो करता है जों सृजनकर्ता श्रष्टि निर्माण के भावो के प्रवाह के इलेक्ट्रान को इंसानी एटम के न्युक्लिउस में फिट करते समय करता हैं.......पेशे से डॉक्टर हैं शायद ये सब आसान हो आपके लिए .....लेकिन संवेदनाओ को इस तरह कैद करना वाकई दुष्कर हैं

    सरकारी स्कूली की हिंदी मीडियम नुमा लडकिया जिनके . दुपट्टे उनसे भी बड़े है ....गोया इम्तिहान के नंबर दुपट्टे की चौड़ाई तय करती है...

    कितनी प्रतिशत बची हूँ मै तुम में ?
    ऐसा नहीं के मै ध्यान नहीं रखती पर आज यहाँ आने से पहले थोड़ी कॉन्शियस हुई.
    प्यार की कई किस्मे होती है ....... कई शक्ले..आहिस्ता - आहिस्ता जब जिंदगी में दाखिल होती है ...…शर्ते फ़िल्टर होने लगती है’” …...कभी कभी हम वक़्त के साथ अपने हिस्से का तजुर्मा गलत कर देते है ....शायद वक़्त की अपनी लिमिटेशंस होती हो...

    फिल्म मकिंग का इरादा तो नहीं आपका ? :-)

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  43. यहाँ मुहब्बत के बीच जंग कुछ जँची नही !!! आपकी कहानी एक खूबसूरत कहानी है ..... अब उसमे यदि कोई पंक्ति किसी अन्य की रचना से मिलती हुई लगी तो इसका मतलब 'चुराना' नही होता है ....शब्दों मे शालीनता और संस्कार बनाए रखना चाहिए ।

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  44. "वक्त के साथ प्यार के एहसास भी रिसते हैं"......

    बहुत सुन्दर !

    शुभकामनाएं.....

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  45. प्रेम है, कहानी नहीं।
    अच्छी अभिव्यक्ति की, अच्छे लेखन की बधाई।
    जहाँ तक बात है अन्य रचनाओं से मिलने की - तो यह कोई बड़ी बात नहीं। सच जो भी लिखेगा - वो दूसरे हज़ारों सच लिखने वालों से मिलेगा ही।
    शिवानी की भी एक कहानी है - इसी पृष्ठभूमि पर। मैंने ख़ुद भी कुछ लिखा है - बहुत कुछ मिलता है इससे - पर सब सच हैं - अपनी-अपनी जगह, और मौलिक भी।
    बधाई!

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  46. मेरा डॉ. अनुराग से बहुत संक्षिप्त सा परिचय है. उनसे परिचय होने और इस पहचान के आगे बढ़ने का सिलसिला भी एक असहमति से शुरू हुआ था. कोई एक साल से अधिक का समय बीत चुका है किन्तु आज जब उनके ईमानदार होने पर कोई प्रश्न कर रहा है तो मैं दुखी नहीं हूँ वरन समझता हूँ कि ये मेरा दायित्व है कि इस प्रश्न पर हस्तक्षेप किया जाये. इस प्रश्न से पूर्व आप कृपया ये भी जान लें कि मैं अनुराग जी के स्थूल व्यक्तित्व के इतर उनके शब्दों से बने 'ओरा' के जिस अल्पांश को समझ पाया हूँ उसके अनुसार वे एक बेहद संजीदा, खुले ह्रदय और संवेदनशील सोच का प्रतिनिधित्व करते हैं. अब तक मैं किसी जात, धर्म और संप्रदाय या पंथ का झंडा उनके लेखन में देख पाने में असमर्थ रहा हूँ और सिर्फ प्रेम व सामाजिक बराबरी और सुन्दरता की कामना ही उनके लेखन में महसूस कर सका हूँ इसलिए मेरी इस धारणा को बल मिलता है कि वे इंसानी वजूद और उसमें प्रेम के कारण उपजने वाली अनुभूतियों को नज़्मों में ढालते रहने को शायद एक बेहतरीन काम मानते हैं.

    लेखक एक अच्छा पाठक होता है अगर आप इस बात से सहमति रखते हैं तो अगली बात ये होती है कि अवचेतन में अनगिनत दृश्य, चित्र, वाक्य, संवाद और अनुभूतियाँ हमारे भीतर संचरित होकर मस्तिष्क के किसी कोने में बैठ जाया करती है. मुझे कई बार लगता है कि आज मैं जिसे देख रहा हूँ या पढ़ हूँ ऐसा पहले भी कहीं था फिर मैं जब कुछ लिखता हूँ तो जाने कितनी ही बार कई नामी लेखकों के संवाद उसी शक्ल में या किंचित लघुतम हेर फेर के साथ मेरी कहानियों में स्थान बना लेते हैं. ये इम्प्रेशन है इस पर उस लेखक को प्रसन्नता होनी चाहिए कि उसकी पंक्ति ने मेरे भीतर घर बनाया. रचना के सृजन की प्रक्रिया समाज और कल्पना के आस पास मंडराती है, समाज से हम शब्दों और वाक्यों को पाते हैं और कल्पना या अपने रचनात्मक सामर्थ्य से उसे पूर्णता देते हैं.

    एक गैर फ़िल्मी गीत जो कोई सात आठ साल पहले आया था, चल दरिया किनारे जाएंगे... मैंने सुना तो बड़ा पसंद आया. बड़ा ही हल्का मीठा गीत है. इस गीत की शीर्ष पंक्ति को मैंने सैंकड़ों फ़िल्मी, गैर फ़िल्मी, आंचलिक और लोक गीतों में सुना है. मैं इसके कॉपीराईट किसको दूं ? यह एक आम बोल चाल का वाक्य है. इसमें क्रिया से उपजने वाली अनुभूति के मोह से बंधा आग्रह है, और बहुत सामान्य है. इसके लिए किसी प्रकार का दावा अनुचित ही नहीं हास्यास्पद होगा. इस पंक्ति के प्रयोग से किसी गीतकार की ईमानदारी पर सवाल उठाया जाये तो आप खुद को मुंसिफ समझिये और फैसला दीजिये.

    रचना की नवीनता या फ्यूजन का कांसेप्ट विवाद का विषय रहा है उस पर बात होती तो सार्थक रहती कि किस तरह से डॉ अनुराग ने अपने ही शिल्प में कहानी के लिए एक नया प्रयोग किया है. नज़्मों और कविताई के नमकीन स्वाद से कहानी बुनने के दौरान कोई एक पंक्ति आकर ठहर जाये तो मैं समझता हूँ कि मुंडेर पर कोई सतरंगी पंछी आकर बैठ गया है, समझता हूँ कि चलती रेल में भुजिया वाले ने मसाला सही डाला है. मसाला के स्वाद पर उसे वही पुराना होने का उलाहना देना व्यर्थ है और उसको कोसिये मत कि वह मसाला भी किसी पेटेंट का हिस्सा नहीं है. भविष्य अगर इसे पेटेंट करता है और लेखक एक एक पंक्ति के लिए कॉपीराईट का दावा उठाते हैं तो मुझे अगले दिन कुछ ख़ास रोशन नहीं दिखते हैं.

    डॉ अनुराग ने मेरी उन असहमतियों पर संवाद किया और स्वीकार किया था कि सीमाएं हर एक की होती है. इसने उनको मेरे समक्ष सदा के लिए बड़ा बना दिया था. मैं अशोक जी से भी यही चाहूँगा कि वे तल्ख़ होकर बात करने की जगह इसे एक इम्प्रेशन समझें क्योंकि डॉ अनुराग उन लोगों में नहीं है जो पत्र पत्रिकाओं से लौट कर आई हुए रचनाओं को ब्लॉग पर लगाते हों. वे खालिस नज़्म प्रेम से बंधे हैं और ब्लॉग उनके लिए सेकेंडरी माध्यम नहीं है ऐसा मेरा विश्वास है.
    इस बार सोचा था कि कहानी पर विस्तार से लिखूंगा, हाय क्या बीनने बैठ गए हैं हम लोग, प्रेम उलझा जाता है.

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  47. "अच्छा है हम दोनों की शादी नहीं हुई.... उसने ख़ामोशी को हटाया है " एक दूसरे का सब कुछ जान लेने के बाद उसे उसी तरह प्यार करना मुश्किल होता होगा ना "
    bas yahin ittefak nahin rakh paati shesh ek ek pankti connect sa bunti hui.

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  48. एक खूबसूरत कहानी पर, जो किशोरजी के शब्दों में कहूँ तो डॉक्टर अनुराग के खास शिल्प में ढली है, उतनी ही सुंदर प्रतिक्रियाओं के ज़रिये चर्चा देखकर मन परिपूर्ण होने के अहसास से भर गया.पर काश सिर्फ कहानी और उसके ज़रिये प्रेम और समय के उस पर असर पर ही चर्चा देखने को मिलती!
    अच्छा हुआ अशोक जी ने जल्द अपनी बात रख दी अन्यथा उनके पक्ष के इर्द गिर्द और टिप्पणियां जिनका उद्देश्य किसीकी गरिमा के साथ खिलवाड भी हो सकता था,देखने को मिल सकतीं थी और हम अशोक जी का इंतज़ार ही करते रहते.
    अशोक जी का एक कवि और झुझारू व्यक्तित्व के रूप में मेरे मन में सम्मान है.उनमें अपनी बात किसी भी मंच पर रखने का ज़रूरी हौसला है. पर यहाँ संभवतः उनपर एक लेखक से ज्यादा अपनी रचना का 'पिता'ज्यादा हावी लगता है.एक पंक्ति के प्रति मुझे इसमें उनकी पजेसिवनेस अधिक लगती है और इस के आधार पर अनुरागजी की ईमानदारी पर सवाल उठाना कुछ ज्यादती है.बाकी स्वयं लेखक ने अपनी बात रख दी है और विस्तार से किशोर जी ने भी अपना पक्ष रखा है जो काफी हद तक मेरा भी माना जा सकता है, तो इस पर कुछ और कहना एक अन्य दिशा में बहस को ले जाना होगा.यहाँ तो बात एक पंक्ति की है,अशोक जी भी इत्तफाक रखेंगे की समान विषयों पर सोच की बुनियादी भूमि कई बार समरूप भी होती है.

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  49. है तो यह भी प्रेम कहानी, पर अंत तक आते आते प्रेम काफी कुछ रिस गया था हालांकि कहीं और एक दूसरी प्रेम कहानी शुरू हो गई थी । यही है जिंदगी ।

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  51. mai pahli bar likh raha hun, par mai do warson se padh raha hu aapko. Iss story pe yahi kahunga ki Gulzar ek nasha hain aur aap ek goldflake kash.

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  52. najdikiyan hone lagti hain kisi se to '' kitana shaamil huaa hun ab tak tumame?'' aur aksar duriyon ke baad '' kitane pratishat bachaa hun tumame?''

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  53. अशोक जी आप उत्तेजना में कुछ भी लिखे जा रहे हैं। मुझे समझ नहीं आया कि आप इस बहस में मुझे क्यों खींच लाए। जरूर बताएं ? मैंने इसे 'महान' कब कहा यह भी बताएं ? मैंने इसे पिछले कुछ सालों में पढ़ी वन आफ दि बेस्ट कहानी कहा। 'वन आफ दि बेस्ट' वो भी कुछ सालों की और 'महान' में फर्क होता है या नहीं ? मैंने कहानी की संभावनाओं को देखते हुए यह तारीफ की। यह जानते हुए कि डा. अनुराग एक प्रोफेशलन कहानीकार नहीं है मैंने कहानी के कच्चे होने की तरफ भी इशारा किया।

    मैंने कहानी की जो सीमाएं बताई हैं उनकी तरफ आपका ध्यान क्यों नहीं गया ? मैंने कहा है कि इस कहानी में कहानी के एलीमेंट जबरदस्त हैं। मैंने निर्मल वर्मा के हवाले से यह भी स्पष्ट किया कि यह कहानी कच्ची है। लवर्स जैसी कहानियों के प्रारंभिक(!) ड्राफ्ट ऐसे ही रहे होंगे !

    लेकिन आप हैं कि उत्तेजना में कुछ भी कह देते हैं। आप की 'बेहद खूबसूरत' कहानी के क्या मायने हैं यह भी स्पष्ट नहीं है ? आप मेरे मुँह में 'महान' शब्द डाल कर या तो कहानी को गिराना चाहते हैं या मेरी समझ को ??

    मैंने आखिरी में कहा था कि ऐसी अकुण्ठ कहानियाँ इस सदी में लिखी जा सकेगी या नहीं......। आप इधर की सभी साहित्यिक पत्रिकाओं में आई प्रेम कहानयिों पढ़ लीजिए। बीते हुए प्रेमसंबंध को लेकर ज्यादातर पात्रों में कहीं न कहीं कुंठाभाव जरूर मिलेगा। इस कहानी की यह उपलब्धी है कि यह प्रेम के अकुंठ भाव से बरतती है। जो प्रशंसा योग्य है। आपको इस बात पर एतराज है तो स्पष्ट करें।

    शेष फिर कभी।

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  55. हम तो इतना जानते है कि डॉ अनुराग का लिखा पढ कर रंग बदलते बाल, पुरानी मीठी यादें और आहिस्ता आहिस्ता रिसते प्यार की अलग किस्में याद आने लगीं.

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  56. मैं अक्सर जो पोस्ट पढ़ती हूँ, वहाँ टिप्पणी ज़रूर करती हूँ आपको छोड़कर... मैं अपने आपको यहाँ टिप्पणी करने लायक नहीं समझती क्योंकि प्यार का जो एहसास यहाँ होता है उसे सिर्फ महसूसा जा सकता है... कम से कम मेरे लिए.

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  57. बाप रे | क्या लिखा है | साहित्य के बारे मे मेरी ज्यादा समझ तो नहीं पर यकीनी तौर पर ये एक लाजवाब रचना है | पिछले काफी समय से मे आपकी ब्लॉग को पढ़ रहा हूँ,तक़रीबन शुरुआत से ही पर अब आपके लेखों का स्तर काफी ऊचा होता जा रहा है | प्रारंभ में आपके लेख मजेदार और सरल होते थे परन्तु अब उनमे एक किस्म की गंभीरता आती जा रही है | ऐसा क्यों है शायद आप ही जाने ? पर जो भी हो मे पसंद दोनों को ही करता हूँ |

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  58. शब्दों का बेहतरीन ताना बाना बुनकर इतनी सुन्दर कहानी लिखी है कि पढते पढ़ते लगा कि आस पास ही चल रहा है ये सब

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  59. कभी सोचा नहीं था अपने लिखे को सत्यापित करने के लिए रबर की मोहर की भी जरुरत आन पड़ेगी ....जब बड़े बड़े बुद्धिजीवी प्रेमचंद की" कफ़न "का पोस्ट मार्टम करते हुए उसे अतियथार्थ वादी घोषित करते है .....तो....छह महीने पहले मेरठ के मेडिकल कोलेज के बाहर .सर्दियों की एक रात याद आती है.........

    मेडिकल कॉलेज के बाहर खड़ा मेरा दोस्त है ...हम दोनों किसी पेशेंट के मुताल्लिक गुफ्तगू में उलझे है ..मेडिकल कोलेज से एक शरीर बाहर आ रहा है ..
    दो लोग हाथ में उठाने वाले स्ट्रेचर पर किसी शरीर को ला रहे है ... पीछे वाला एक आंख से आंसू पोछता है....फिर स्ट्रेचर संभालता है ...साथ में कम्बल लपेटे एक बूढ़ा..रोती बिलखती दो महिलाये ...पीछे नंगे पैर चलते दो बच्चे ...नजदीक आ रहे है ..आगे वाले की आंखे लाल है ...कोई सूखा नशा ..स्वेटर के नीचे से झांकती ….शर्ट अस्पताल का नुमाइंदा है ....एक बैलगाड़ी में डली चारपाई ..शरीर को वहां लिटा दिया गया है ...औरतो का रुदन जारी है.....

    पीछे वाला खाली स्ट्रेचर लिए आंसू पोछता वापस अस्पताल की ओर जा रहा है ...बूढ़ा वही ठहर गया है ......सामने
    सडक पे बारात है...जिसने लगभग पूरी सड़क को घेरा हुआ है.....साथ चलते जनरेटर के शोर में सिक्के हवा में उछालते है ....फिर छन्न से सड़क पे बिखर जाते है ....अनजाने चेहरों का समूह उठाने के लिए टूट पड़ा है.......उनकी नज़र बचाकर अपनी मस्त चाल से चलता हुआ एक सिक्का ठीक बुग्गी के पहिये के पास कुछ देर घूम कर ठहरा है....बुग्गी पे बैठा बच्चा एक नज़र बारात की ओर देखता है....दूसरी बूढ़े की ओर....कुछ मिनट..... वो नीचे झुक कर सिक्का उठाता है.....

    सर्दियों की वो रात किसी सफ्हे पर नहीं है........कभी उतारने की भी नहीं सोची.... लिखते वक़्त.... मै अपने आप से घबराता हूँ ....चूँकि उस लम्हे को रिवाइंड करना मुझे पसंद नहीं है .... बकोल कबीर पीछे मुड़े तो मुड गयी दुनिया की माफिक ......मै कुछ हकीक़तो से भागना चाहता हूँ ......



    मुझे प्रेमचंद की "हामिद का चिमटा" ओर "मन्त्र "कहानी भी याद है...................... .वे जटिल नहीं है .उनमे भारी भरकम विम्ब नहीं है .....वे लेखक की विद्धता ओर शाब्दिक कौशल नहीं दिखाती ............पर २२ साल बाद भी आज तक याद है ......क्यूंकि उनमे सबसे बुनियादी पक्ष है ....".मानवीयता " ........इससे किसी दूसरे लेखक का महत्त्व ख़त्म नहीं हो जाता ....जिसके पास विम्ब है ....ये दुनिया को अपने तरीके से सफ्हे पे उतारने का हुनर है ....जो सबके पास अलग अलग है .....एक को कम करके हम दूसरे को बेहतर नहीं कर सकते ........कुंवर नारायण जब कहते है ......एक अच्छा पाठक कैसे बने ये उतना ही जरूरी है जितना एक अच्छा लेखक ....मुझे लगता है वे मेरे मन की कह रहे है ..
    ...हर उस व्यक्ति का जो अच्छा लिखता पढता है ..मुझे अपनी ओर खींचता है ......मै बड़े बड़े नामो पर नहीं जाता ..क्यूंकि मेरा मानना है ....असाधारण लोग हमेशा असाधारण नहीं लिखते ..... .बतोर एक पाठक..अपने को उतना ही ईमानदार मानता हूँ .. जितना कुछ लोगो को बतोर लेखक ...बतोर व्यक्ति मुझे इमानदारी उससे ज्यादा प्रिय है ....बतोर लेखक होने के ......क्यूंकि मेरा मानना है एक अच्छा लेखक होने से ज्यादा जरूरी है ...... एक बेहतर मनुष्य होना ...

    यही कुंवर नारायण एक बात ओर कहते है ......उनके मुताबिक कवि या लेखक .सामाजिक चेतना को सीधे संबोधित करता है .....वो चौकीदार है .....जिसकी ताकत उसकी भाषा है.......................वे फिर सच कहते है ...क्यूंकि कभी कभी हम उन चेतनायो की गलियों से होकर गुजरते है ...जिनका मुहाना लेखक हमें दिखाता है .....किताबे हमें बेहतर मनुष्य बनाने का एक माध्यम है .हमारी संवेदनायों को ओर पैना करने करने का..........ओर लेखक मुझे उन गलियों का चौकीदार मालूम पड़ता है ....

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  60. इस दुनिया में मेरे इर्द गिर्द भी ढेरो लोग है ....जिन्होंने कभी प्रेमचंद का नाम नहीं सुना .....शायद सुनेगे भी नहीं .....वे thank you god for the world so sweet कहते हुए बढे हुए है .ओर अपनी दुनिया के भीतर जी रहे है .....आज उनके बच्चे यही गीत गा रहे है .....पर ये उनकी दुनिया है ...उन्हें मै या आप इस दुनिया में शामिल होने के लिए बाध्य नहीं कर सकते ...क्यूंकि हम ओर आप जिससे गुजरते है .....उन्ही को रखकर जिंदगी की एक तस्वीर बनाते है .....जो कभी मुकम्मिल नहीं होती ...ओर हर बार कोई एक टुकड़ा इसकी सूरत बदल देता है ......
    .असहमतिया होना जरूरी है ......ये एक बेलेंस बनाये रखती है ...आपके भीतर ........ये आपके विजन का दायरा बढाती है ..... ओर आपकी मनुष्यता को बचाये रखने में सहायक होती है






    अजीब बात है ...बकोल किशोर चौधरी ....हमें प्रेम पर बात करनी चाहिए ओर हम. कहाँ उलझे पड़े है ....????.शाम को वापस आकर उसी पर बात करूँगा ......क्यूंकि मेरी प्राथमिकता वही है ... एक मुआ दिल...

    इस दौरान ढेरो मेल मिले ........कुछ एस एम् एस भी.......उन्हें पढ़ सुन लगता है दिल की दुनिया अभी बदली नहीं है....ऐसी पोस्टो पर .त्रिवेणी जान बूझ कर नहीं लिखता .क्यूंकि मुझे लगता है के मुद्दा ......हाईजेक हो जायेगा .....

    .तीन साल पहले पोस्ट की कुछ इसी सोच पे ये कच्ची -कच्ची सी त्रिवेणी लिखी थी ....


    जुदा होकर ख़ुश रहना ....अजीब सा लगता है
    अलबत्ता दोनो मसरूफ़ है अपनी अपनी दुनिया मे.....

    हाँ गाहे -बगाहे याद आ जाती हो अक्सर.

    उत्तर देंहटाएं
  61. ये क्या चक्कर है? हर जगह विवाद ज़रूरी है क्या? इतनी सुन्दर कहानी पढने के बाद जब टिप्पणियों की
    बारी आई तो मूड ऑफ़ हो गया... कहानी का इतना सुन्दर अंश कॉपी कर के लाई थी, पेस्ट करने के लिये...अब क्या? मन नहीं मान रहा, कर ही दूं-
    " जानते हो ....बरसो बाद मैंने अपने शरीर को गौर से देखा ...ऐसा नहीं के मै ध्यान नहीं रखती पर आज यहाँ आने से पहले थोड़ी कॉन्शियस हुई....फिर तुम्हारी कनपटी के सफ़ेद बालो ओर सर के उड़े बालो को देखकर तसल्ली मिली....के तुम भी कहाँ पहले जैसे हो अब.....?"
    इतनी सच्ची बात....क्या कहूं??

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  62. किशोर ने बोलकर अच्छा ही किया.. मैने टिप्पणी देते वक्त कोई कमेन्ट्स पढे भी नही थे.. बाद मे पढे तो लगा कुछ बोलना एक फ़ेक आग मे ’घी’ के जैसा ही होगा और जो मानवीयता से भरी एक पोस्ट से ध्यान हटवायेगा... फ़िर ये सोचकर भी चुप रहा कि छोटा हू .. कही बडो को छोटे मुह बडी बात न लगे.. बडे मुह, छोटी बाते ज्यादा फ़बती है..

    आप की ही एक पोस्ट पर पढा था कि
    "करीब जाकर छोटे लगे
    वो लोग जों आसमां थे|"

    ध्यान तो फ़िर भी हटा ... लेकिन मुझे लगता है अच्छा ही हुआ.. वरना फ़िर आप इन लम्हो को रिवाईन्ड नही करते और जीवन की आग मे तपा ये किस्सा भी रह जाता.. ज़िन्दगी की ऎसी कितनी ही कहानिया है जिन्हे हम रोज़ जीते है और उनसे ही आखे चुराते है.. वो बडा होने के बाद भी उस सिक्के को आजतलक नही भूला होगा..

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  63. इस कहानी (या कहानी जैसी कुछ) की खासियत यह लगी कि हकीकत इस कहानीनुमा मे इस तरह घुली हुई लगती है..जैसे कि समंदर के पानी मे नमक..कई सारे प्रकटतया असंबद्ध दृश्य-चित्र जो जिन को लेखक कथानक मे सप्रयास गूँथ देने की बजाय पाठक के अपने विष्लेषण पर छोड़ देता है..जो जिंदगी के ज्यादा करीब लगता है..कथा मुख्य पात्रों के इर्द-गिर्द रची गयी नही लगती..बस जैसे कि वे दोनो कहानी मे बस आ गये हों..अन्य पात्रों की तरह..कई सारी समांतर जिंदगियों से एक स्लाइस..जो इतनी वास्तविक लगती है..जैसे कि हमारे पास ही बस अभी-अभी घटित हुई..इतनी सामान्य कि हमने ध्यान देना भी जरूरी नही समझा..देखें तो दृश्य का हर पात्र आइने जैसा है..जिसमे हम खुद को कहीं न कहीं तलाश कर सकते हैं..लड़के के गिटार की बेफ़िक्री, सफ़्हों डूबी लड़की की आंखें, अखबार पढ़ उकताये आदमी की आँखों मे लिप्सा के डोरे, हिंदी-मीडियम नुमा सिकुड़ती लड़की का फ़ैलता दुपट्टा और उसकी हँसी के गड्ढों की तेरह साल पहले की गहराई से चुपके से तुलना कर लिया जाना..हम सबकी जिंदगी इन्ही अच्छे-बुरे लम्हों का दस्तावेज भर होती है..मगर सबसे ज्यादा हांट करती है..उस कथित रूप से खुश औरत की उससे आगे भी ’ड्रम्स ऑव हीवन’ खाते रहने की गुजारिश..क्या है यह..एक अभुक्त प्रारब्ध, एक अनबुझ अतृप्ति या बस एक आत्मतुष्टि/इगो का क्षणिक सेन्सेशन??..’ड्रम्स ऑव हीवेन’ को खाते रहना उन स्मृतियों को जिंदा रखना है..जो उसकी तत्कालीन जिंदगी मे स्पीड-ब्रेकर से ज्यादा नही हैं?
    कुल मिला कर पोस्ट कई ऐसे सवाल भी खड़े करती है..जिनका उत्तर जिंदगी के पास शायद नही होता..मगर असल जिंदगी इसी अधूरेपन से ही तो पनपती है..बस..
    ..जो बात पंक्ति के सायास प्रभावित को ले कर कही जा रही है..उस पर मै यही कहूँगा कि इन यह पंक्ति उस कविता से उतनी ही प्रभावित है..जितने कि गुलजार जी के इब्नबतूता सर्व्रेश्वर जी से प्रभावित हो सकते हैं..और यह बात मै कविता को पढ़ लेने के बाद ही कह रहा हूँ..आदरणीय पांडेय जी स्वयं मे एक असाधारण कवि और सहृदय व्यक्ति हैं..और वो स्वयं समझते होंगे कि कविता मे प्रयुक्त पंक्ति प्रभावशाली होने के बावजूद उस विषय के संदर्भ मे उतनी ही सहज और सर्व-संज्ञात है कि बोलचाल मे इसका प्रयोग होता ही है..और आगे भी होता रहेगा!..आदरणीय पांडेय जी के अच्छे कवि होने के अतिरिक्त उनकी जीवन और साहित्य की सुंदरता के प्रति आस्था और तार्किक ईमानदारी के प्रति निष्ठा अभी तक असंदिग्ध रही है..इसलिये इस सर्वथा अनावश्यक और सारहीन विवाद को तूल दिये जाना मेरी समझ से परे रहा है..जरूरत है कि फ़ोकस रचनात्मकता पर ही केंद्रित रहे..स्रजन-शक्ति छुद्र विवादों मे व्यर्थ न हो!

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  64. wah wah! kya baat hai!

    log on http://doctornaresh.blogspot.com/

    i just hope u will like it!

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  65. कई जेहनी रस्तो से गुजरना थोडा मुश्किल है ....के उन पे किसी के खड़े होने की उम्मीद रहती है.....वहां इत्तेफाक की गुंजाइश नहीं रहती ......कोई एक दोपहर की बारिश ...किसी मंदिर की सीढिया...कोई एक पोस्टर ...... कोई एक लम्हा ...... वहां उन रस्तो पे धकेल देता है ....जो बरसो से आज तक .वन वे .है ....जहाँ कोई स्पीड ब्रेकर नहीं है...न स्पीड लिमीट... .उम्र के इस सिरे पे जब आप जीने के फन में माहिर हो चुके है .... रिश्ते उसी सूरत में नहीं है.... .पर ..कुछ चीज़े ऐसे ही होती है अनप्लांड .....यूँ भी वक़्त छलनी है ...सारे रिश्तो को जिसमे से गुजरना है ...आहिस्ता -आहिस्ता.....
    यूँ भी कभी कभी कुछ सोचकर लिख लेता हूँ के शायद पढ़ लोगी तुम कही.......

    "मेरी लकीरों में लिखी थी कुछ आहटे
    बहुत कुछ था जो मेरे इख्तियार में न था "

    ये भी इत्तेफाक है के आज सुबह गाडी में रेडियो ऍफ़ एम् पर जो पहला गाना बजा ....वो कुछ यूँ था......".जुदा होकर भी तू मुझमे कही बाकी है "......

    SOUNDS FAMILIAR......

    सुन रहे हो अपूर्व !

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  66. शुरुआत में सोचा था ये भी पहली पोस्टों की तरह आपकी ये पोस्ट भी किसी यात्रा की चर्चा है ....पर अंत तक आते आते लगा ये तो कहानी है .....

    पहली कहानी ...वो भी सुपर हिट ....??

    पता था ये दिन शीघ्र आने वाला है ....

    बहुत बहुत बधाई .....!!

    आपकी कलम तो खुद आपकी लेखनी की पैरवी करती है ....हम क्या कहें ....!!

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  67. ..पहली बार आना हुआ पर बहुत अच्छा लगा. शब्द जीवंत हैं भाषा में लय और गति है जीवन की और मन में कुछ अनबुझे से सवाल

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  68. एक बेहद ही खूबसूरत पोस्ट का जायका बिगाड़ के रख दिया इस व्यर्त्य के तूल ने। अशोक भाई शायद मेरी पसंदीदा कवियों की फ़ेहरिश्त में एकदम ऊपर की पायदान पे हैं...लेकिन एक मिस्रे को लेकर उनकी पहली टिप्पणी क्षुब्ध कर गयी मन को। बाद में बेशक कितनी ही सफाइइयां चलती रहे....

    "कितनी प्रतिशत बची हूँ मै तुम में ?" के बाबत मैं भी कुछ कहना चाहता हूं। बहुत साल पहले एक कविता पढ़ी थी एक किन्हीं रश्मी किरण का। कविता बहुत पसंद आयी थी तो उन दिनों अपनी होने वाली अर्धांगिनी को खत में लिखकर भेजा था...कविता के शब्द कुछ यूं थे कि
    "तुम चले जाओगे
    लेकिन थोड़ा-सा रह जाओगे
    पी कर छोड़े हुये चाय के प्याले में
    एश-ट्रे में छुटी
    अधजली सिगरेटों में..."

    वगैरह-वगैरह-वगैरह

    और फिर इस कविता का समापन होता है इन पंक्तियों से:-
    "सोचती हूं कि
    कितना बची रह जाऊं्गी तुम में मैं"

    ..तो यहां क्या कहा जायेगा। "कितना बची रहने" को बस "कितने प्रतिशत बची रहने" से फेर-बदल?

    क्षुब्ध मन लिये जा रहा हूँ डा० साब कि अपने प्रिय कवि से ऐसी प्रतिक्रिया की अपेक्षा न थी। सोचता हूं कि इससे भली तो अपनी गुमशुदगी ही थी।

    हां, पोस्ट ने अपनी एक बीस साल बाद हुई मुलाकात की याद दिला दी। सोचता हूं कितने फ्लैश-बैक हमदोनों के कामन हैं? एक बार और बैठने की दरकार है किसी शाम...

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  69. आपकी मिसरी सी यादों का इक मोती और..इक तड़प ,जिंदादिली इक चमत्कार सा है आपके कहने में.मानो खुद सामने बैठे सुना रहे हो.पढ़ते वक़्त सब भूल जाते है जब तक की मुलाकात खत्म नी होती..इस मुलाकात में प्यार नुमा सा.. जायका नहीं था… कुछ मिसिंग था .... तो क्या प्यार भी वक़्त के साथ रिसता है.?..
    प्रकृति का नियम परिवर्तन है,प्रेम उसी प्रकृति का इक भाव है.प्रकृति का नियम प्रेम पर भी लागु हो सकता है.आपके खुद की टिप्पणी का इंतज़ार रहता है हमेशा पर इस बार कुछ ज्यादा नी हो गयी:)

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  70. @ गौतम जी
    अंतिम पंक्ति का तो पता नही मगर जितना मुझे याद आता है कि यह खूबसूरत कविता शायद अशोक बाजपेई की कविता है ’विदा’...

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  73. .एक खूबसूरत कथा ...
    सच बात तो यह है कि एक अच्छा लेखक या कवी खुद भी अच्छा पाठक होता है और कई चीज़े पढ़ते वक़्त हमारे जेहन में गहरे तक बस जाती है और कही न कही नए रूप में अभिव्यक्त हो जाती है .
    अपने जो भी लिखा , बहुत अच्छा और दिल को छू जाने वाला क्लिखा . लिखते रहिये.

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  74. इसका प्रिंट आउट ले कर अपने पास रख लिया है एक बार पढ़ कर मूक कर दिया है आपके इस पोस्ट ने ...बाकी इसकी चर्चा कभी बाद में ....

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  75. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  76. अब @अशोक पांडे टिप्पणी हटा रहे है एक खूबसूरत लम्हे की हत्या होनी थी सो हो गयी

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  77. पढ़ते पढ़ते मुझे लगा मैं भी लेखक के साथ वजीन पे हूँ और एक स्टोरी और चल रही है जिसका पता लेखक को भी नहीं.

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  78. bada lamba safar gujar sa gaya ho aisa laga padhte hue....

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  79. i was somewhre lost in ur post...beautiful

    http://liberalflorence.blogspot.com/
    http://sparkledaroma.blogspot.com/

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  80. बहुत दिन बाद इस गली का रुख़ किया...अच्छा लगा। कहानी मैं इसे मानूंगा नहीं...हां, स्क्रीनप्ले ज़रूर है..बिना किसी तकनीकी लाग लपेट के लिखा गया साफ़ स्क्रीनप्ले। बहस छिड़ी है...एक लाइन को लेकर..आरोप-प्रत्यारोप लग रहे हैं। जानते हैं एक लेखक के लिए सबसे ज़्यादा दर्दनाक़ क्या है...जब वो जानता है कि उसकी लिखा हरेक लफ़्ज़, हरेक एहसास उसका अपना है कहीं से 'उठाया' नहीं, उसके बावजूद उस पर इल्ज़ाम लगाए जाएं।
    ख़ैर,ज़्यादा कुछ नहीं कहूंगा..बस निदा फ़ाज़ली साहब की 26/11 पर लिखी एक नज़्म याद आ गई इस लड़ाई से।
    "पता नहीं जिस क़ब्र पे उसके नाम का पत्थर लगा हुआ है
    उसमें वो कितना है लेकिन...
    घर के ताक़ में उसकी जो तस्वीर लगी है
    उसमें वो पूरा है अबतक…"

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  81. शानदार पोस्ट!

    इसे मैंने बस्ती से सिद्धार्थनगर की बस यात्रा के दौरान अपने मोबाइल पर बांचा था। बैटरी खतम हो रही थी और लग रहा था कि किस्सा निपटने के पहले ही कहीं मोबाइल जय हिन्द न हो जाये।

    मजेदार पोस्ट लगी।

    इसके बाद टिप्पणियां भी रोचक लगीं। मेरे पढ़ने तक अशोक पाण्डेय की टिप्पणियां मिट चुकीं थीं इसलिये अंदाज नहीं हुआ कि उन्होंने क्या लिखा।

    डा.अनुराग के बारे में काफ़ी कुछ कह चुके लोग। अशोक पाण्डेयजी शायद अपनी और बाकी प्रतिक्रियाओं से असहज हो गये होंगे और अपनी टिप्पणियां मिटा दीं।

    कई बार ऐसा होता है कि हम त्वरित प्रतिक्रिया करने के चक्कर में ऐसी प्रतिक्रियायें करते जाते हैं कि सवाल-जबाब,क्रिया-प्रतिक्रिया की भंवर में फ़ंसकर असहाय से हो जाते हैं और दे दनादन लिखत-पढ़त करते रहते हैं।

    पिछले दिनों युसुफ़ी साहब की एक किताब पढ़ते हुये लगा कि यार इस तरह की बातें तो मैंने अपनी एक पोस्ट में लिखी हैं।

    अशोक पाण्डेयजी को सोचना (सिर्फ़ सोचना) अपनी जगह सही हो सकता है कि डा.अनुराग ने बिना उनकी कविता का जिक्र किये एक लाइन अपनी पोस्ट में ठेल दी। लेकिन असलियत उनकी सोच से जुदा हो सकती है कि डा.अनुराग ने ऐसा कुछ न किया हो और उनकी ’पैरालल’ सोच यहां अवतरित हुई हो।

    न जाने कितने जुमले हम आये दिन प्रयोग करते हैं जिनको हमसे पहले न जाने कित्ती बार न जाने कित्ते लोग प्रयोग कर चुके होते हैं। मैं परसाईजी का और श्रीलाल शुक्लजी प्रशंसक हूं। न जाने उनके कितने जुमले या स्टाइल में जाने-अनजाने प्रयोग कर लेता हूं।

    अशोक पाण्डेयजी यहां प्रतिक्रियाओं के मामले में अकेले से हो गये और शायद इसीलिये झल्लाहट में अपनी प्रतिक्रियायें व्यक्त करते गये। कोई कवि सहज रूप में यह सोच सकता है जैसा उन्होंने सोचा लेकिन वे यह सोचने से चूक गये कि शायद उनकी कविता में प्रयुक्त बात उनसे पहले भी कोई कह चुका हो। कभी-कभी लोग कवि को सोचवाते भी हैं - देख भाई तेरी कविता के अंश टीप दिये अगले ने। कवि बेचारा जुट जाता है बेचारा कविता की खसरा-खतौनी लेकर उसको अपनी बताने के लिये।

    वैसे इस पोस्ट के बारे में डा.अनुराग से दो बातें कहनी थीं:

    १.उनकी टिप्पणियां देखकर लगा कि भाईजान अब अपनी ही पोस्ट पर टिप्पणियों का रिकार्ड बनाना चाहते हैं। वे इत्ती सफ़ाई क्यों दे रहे हैं। क्या तरह-तरह की बात करने से बात ज्यादा सही समझी जायेगी।

    २. मेरी समझ में उन्होंने जो जुमला इस्तेमाल किया कितनी प्रतिशत बची हूँ मै तुम में ? वह इस पोस्ट का सबसे लचर और अस्वाभाविक हिस्सा है। लग रहा है मामला प्रेम कक्षा से उठाकर सीधे गणित की कक्षा में फ़ेंक दिया गयाहो। ऐसे भी भला कहीं बात होती है आपस में अंतरंग क्षणों में। अंत तक पहुंचते-पहुंचते ,वास्तविक रूप से विदा होने से पहले,शब्द विदा हो जाते हैं और आप यहां नाजुक मोड़ पर प्रतिशत के सवाल पुछवाने लगे लगे। इसीलिये आपके पास प्रेम कहानियां नहीं हैं!


    कुल मिलाकर बहुत मजा आया। इस पोस्ट का फ़ायदा यह हुआ कि अब अशोक पाण्डेय की कवितायें पढ़ेंगे । मुझे पोस्ट बहुत शानदार लगीं और प्रतिक्रियायें सहज, स्वाभाविक।

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  82. anuraag ji sabne bahut bahut likh diya..main itna hi ki manbhawan likha!

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  83. एक इंटरव्यू पढ़ा था ...कई साल पहले ''गैब्रियल गार्सिया मार्खेज का ...कि''लेखक कई जगह से प्रेरणा लेता है'' ,जो लोग ज्यादा पढ़ते हेँ ज्यादा सोचते हेँ उन्ही के साथ बहुत कुछ होता है ,दिल कि बात सच्चाई से लिखने वाले डॉ अनुराग जी से आग्रह है कि दिल पर ना लें...जो हो गया उसे छोड़ दें ....शब्द किसी कि बपौती नहीं ...होते,अपना ही वाकया बताती हूँ ...किसी के आग्रह पर मैंने एक कविता सुनाई ....कुछ वर्षों बाद पता लगा वो भी कवितायें लिखते हेँ बाद में एक दिन आलोक श्रीवास्तव जी की कवितायें पलटते हुए...पाया वो उन्ही से प्रेरित है वरन एक पंक्ति ज्यो की त्यों आगई थी ...जबकि मुझे खवाबों- ख्यालों में भी इल्म नहीं था कि ये किसी और कि है ...बहुत दिनों तक शर्म से सिकुड़ी रही ....बाद में उन्होंने अपनी कुछ कविताएं मुझे पढने को दी ..उसमे भी एक विख्यात कवि कि कविताओं की समानता थी....में उनकी ईमान दारी की आज तक कायल हूँ ..इस लिए में नहीं मानती ...अच्छे शब्द शायद जेहन में मोमजामे की तरह नीचे जम जाते होंगे और शब्द जब तब सर उठाते होंगे जब-जब उनकी जरूरत रचना के वातावरण में उपजती होगी ...साथ ही किसी रचना /लेख /कहानी /कविता में समस्त प्रभावों को पकड़ पाना मुश्किल होता है ...लेखक जिसे उसने नहीं पढ़ा है तीसरे के जरिये प्रभावित होता है ...लेखन और जीवन का मूल स्वर क्षमा ही होना चाहिए और ये क्षमा प्रेम से उपजी हो तो ही बेहतर रचनात्मक परिणाम आते हेँ ये आपके नहीं उनके सोचने की बात है ...अन्यथा लौटा दीजिये शब्दों को कह दीजिये आपके शब्द आपको लौटाए ....अंत में एक बात और आपका लेखन किसी भी संयोजना का मोहताज नहीं है,में, आप हम सभी जानते हेँ आज के दिन कंप्यूटर बंद करिये,शहर की ऐसी सडक पर चले जाए जहाँ बारिश हुई हो ...या जंगल की और जहाँ खजूर के भीगे पेड़ों की लम्बी कतारें हों ...जगजीत को सुने किसी जंगली पोखर के किनारे खड़े रहें कुछ पल ....कल, आपकी करीब चार बार पढ़ी इस पोस्ट पर कमेन्ट पढियेगा... आमीन

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  84. "एक ख़ूबसूरत लमहे की हत्या होनी थी हो गई" नीलिमा की इस बात से सहमत और इसी बात से दुःखी....!

    पोस्ट पढ़ने के बाद बहुत बहुत बहुत नॉस्टैलजिक हो गई थी। इतनी की हर तरफ से भरे घर को छोड़ कर छत का एकांत ले लिया था। सोच रही थी कि कितने भाग्यशाली हैं वो लोग जिनकी लाइफ कुछ क्षणों को ही सही रिप्ले मोड में आती है। सब कुछ बदल कर के भी कितना कुछ नही बदला होगा उस दिन...! शायद दिल की धड़कनें तो बिलकुल भी नही...!

    किसी एक ऐसे ही लमहे का इंतज़ार करते हम जैसों की जिंदगी गुज़री जा रही है....!

    एक बात याद आ रही है कभी किसी को चिट्ठी में लिखा था " मंजिले तो जहाँ हैं वहीं रहेंगी और रास्ते भी वही रहेंगे। कमी तो मेरे पैरों मे ही है जो लड़खड़ा जाते हैं।" क्या कोई मानेगा कि मैने तब तक शराबी फिल्म का गीत "मंजिले अपनी जगह हैं, रास्ते अपनी जगह" नही सुना था।

    एक और बात याद आई बाबूजी के लिये लिखी गई किसी पोस्ट में ज़िक्र था "After twenty years of your departure I still love you" कुछ दिन बाद किशोर जी की एक पोस्ट का शीर्षक कुछ इसी से मिलता जुलता था। शायद किशोर जी ने कहा भी था कि उस पोस्ट के बाद ही ये शीर्षक उनके मन में आया मगर एक बार भी मन में इस वाक्य की जननी होने का मुग़ालता नही आया। क्योंकि पता है प्रेम का मूल एक ही है तो अभिव्यक्ति कहीं ना कहीं एक सी हो ही जायेगी।

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  85. कमाल का लिखा है!

    You made me senti..err...Romantic !

    Enjoying the Romance in air !

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  86. मान्य अनुराग जी,.... मनाओगे क्या तुम अपने को एकाध बार,..मेरे साथ त्योहारों से ज्यादा,...भवानी प्रसाद मिश्र की ये पंक्तियाँ मुझे किसी भी प्रेम कथानक में नायक नायिका के मिलने बिछुड़ने के तारतम्य में सर्वाधिक उपयुक्त लगती है ,कहानी हो या वाकया गीत गजल या कविता इन सबमें लेखन शैली के तकनीक के नमूने अलग-अलग हो तो लुभाते भी हेँ और बार-बार पढने को प्रेरित भी करते हेँ .इस प्रेम कहानी में एक अच्छी तकनीक में संवेदनाओं को गुंथा -जिया गया है ,
    १९९९ के नोबल पुरूस्कार प्राप्त ''जोन्स सारामागो ''ने भी कहा है'' कि साहित्य में आदमी नहीं रहेगा तो परम्पराएं और रचनाये शून्य हो जायेंगी स्वीडिश अकादमी ने उनके नाम का एलान करते हुए उनकी रचनाओं के बारे में कहा कि वे इंसानी हमदर्दी और व्यंग का आकार लेती हुई तफसीलों के जरिये हमें मौका देते हेँ कि हम हकीकत को महसूस कर सकें जो बार-बार हाथों में आकर छलावे कि तरह निकल जाया करती है .
    तो हमें भी मानना ही चाहिए कि जो लेखन अपने विस्तार में प्रेम इंसानियत,और समय को समेटता चलता है सही मायनों में होता है ...इस कथा अंश में खंड-खंड चरित्र एक ठोस पकड़ के साथ सामने आते है ,जहाँ वे एक दूसरे कि संवेदना ,उनके मर्म, उनकी बात को सुनते समझते और स्पर्श करते महसूस करते जीते हेँ मनस्थितियों द्वारा ही हमारे शब्दों के अर्थ भी निकले जाते हेँ लिखते तो बहुत से लोग हेँ लेकिन कुछ लिखा विशेष हो जाता है ...इतने पारदर्शी चरित्र इतनी धीमी गति से १३ साल का अंतराल पार करते हेँ ....बिना रुकावट --वो काली साडी में लिपटी ------वाला वाक्य ,इसके बाद कही-कही थोड़ी उधेड़बुन फिर संवेदनाओं कि पुख्ता जमीन पर आकार लेती इक्च्चायें ......हालांकि अभी बारिशी मौसम है और इसमें वसंत ऋतू बोलती है ....अपने ब्लोगिगंग के शुरूआती दौर में किसी ब्लॉग पर प्रेम कहानी पढ़ी थी ...गुम हो गई ....खैर समय के बरक्स किसी बात को रचनात्मक रूप से साध लेना,जो मिला ,जो खो गया उसे समेट लेना स्मृति की डिबिया में इत्र की तरह ........श्री जलालुद्दीन रूमी''के शब्दों को दोहराती हूँ '''यह कहना की हम एक दूसरे के लिए हेँ अब जहाँ कोई मायने नहीं रखता ....१३ साल बाद और अंत में ''ऑफ़ द रिकार्ड ''जिज्ञासा पैदा करता है कौन है जो दिल की बात .....पहुंचा रहा हैआप तक ?...मौसम आते -जाते रहेंगे आप हमेशा ऐसा ही खुशग्वार लिखते रहें ...आमीन

    उत्तर देंहटाएं
  87. Kamaal kee lekhni hai aapki..Anurag ji .

    ant par ane par pata chalta hai kuch padh rahe the ...otherwise it goes wd life..

    Vaky vinyaas adbhut..bahut hee samriddh kosh...

    Infact not getting enough words !

    उत्तर देंहटाएं
  88. डाक्टर साहब ,
    पिछली प्रविष्टि पर टीपने के बाद इसी प्रविष्टि पर हूँ . बहुत चबाना पड़ा आज आपकी इस पूरी प्रविष्टि को ! . ऊपर पढ़कर आर्द्र हुआ , नीचे आते आते माहौल ने 'चबाने' जैसा कर दिया . क्या कहूँ , मुझे लगता था कि हम जैसे उजबक-साहित्यिक-लंठों से लोग विवाद करते हैं पर आपको पढ़ते हुए लगा कि यहाँ किसी भी सहृदय और दुरुस्त की ब्लागीय-कुण्डली में विवाद-योग बन सकता है ! अब मैं अपने पर इतराऊं या कोसूं :-)

    स्पष्टीकरण देना स्वयं को बहुत बुरा लगता है , इसकी पीड़ा मैं समझ सकता हूँ , अभी हाल तक इससे गुजरा हूँ , Zeal कहाँ मानता है ! , ऐसी स्थिति में टीप-दर-टीप होती जाय तो मैं इसे संवेदनशीलता के साथ ही ग्रहण करूंगा ! संवेदनशील के साथ ऐसा हो जाना स्वाभाविक है !

    अगर दो रचनाओं में छायाएं मिलती हैं तो इन्हें दोष नहीं माना जाना चाहिए ! रचना क्या संवेदनशील बनती है , विचार का विषय यह होना चाहिए ! अशोक जी की टिप्पणियाँ नहीं देख सका इसलिए फिलहाल इतना ही कहना अलं होगा !

    अपूर्व भाई यादों के संग्रहण पर प्रश्न कर रहे हैं , मैं प्रेम के किसी भी कोण को पूर्णतया जान चुका हूँ ऐसा दावा नहीं कर सकता तथापि , कहना चाहूँगा कि स्मृतियों के साथ यांत्रिक 'डिलीट' का आप्सन नहीं रहता ! स्मृतियाँ तनु या सान्द्र हुआ करती हैं ! कभी संपीडित तो कभी विरलित ! इसलिए कहानी की घटना सहज सी दिखी मुझे !

    अनूप जी ने जिस प्रतिशत वाले वाक्य को रखा है , जिसे कि बहुतों ने बहुत सकारात्मक भावुक वक्तव्य के रूप में याद भी किया है , उसे मैं भी कमजोर वाक्य समझ रहा हूँ ! वहाँ पर इसका तुक नहीं बन रहा है ! उस भाव-संहति के वाक्यों के साथ वह वाक्य विजातीय और सायास का प्रभाव दिखा रहा है ! मुझे खटका था !

    मुक्तकंठ तारीफ़ फिर इस बात की करता हूँ कि आपने ब्लागानुकूल एक शिल्प ढूंढ लिया है , यह आपकी उपलब्धि है !

    अब आगे बढूँ ! अपने हिन्दी वाले ब्लॉग के पहले ही वाक्य पर भी जाऊं ''नोट'' दे आऊं नहीं तो कोई खामखा कहेगा कि सीधे सीधे मैंने नोबल पुरष्कार धारी सिम्बोर्स्का से सीधे चुरा लिया है , यद्यपि यह मानता हूँ कि प्रभाव वहाँ से लिया है , पर बीर-बन्दों का क्या भरोसा :-)

    उत्तर देंहटाएं
  89. डाक्टर साहब ,
    पिछली प्रविष्टि पर टीपने के बाद इसी प्रविष्टि पर हूँ . बहुत चबाना पड़ा आज आपकी इस पूरी प्रविष्टि को ! . ऊपर पढ़कर आर्द्र हुआ , नीचे आते आते माहौल ने 'चबाने' जैसा कर दिया . क्या कहूँ , मुझे लगता था कि हम जैसे उजबक-साहित्यिक-लंठों से लोग विवाद करते हैं पर आपको पढ़ते हुए लगा कि यहाँ किसी भी सहृदय और दुरुस्त की ब्लागीय-कुण्डली में विवाद-योग बन सकता है ! अब मैं अपने पर इतराऊं या कोसूं :-)

    स्पष्टीकरण देना स्वयं को बहुत बुरा लगता है , इसकी पीड़ा मैं समझ सकता हूँ , अभी हाल तक इससे गुजरा हूँ , Zeal कहाँ मानता है ! , ऐसी स्थिति में टीप-दर-टीप होती जाय तो मैं इसे संवेदनशीलता के साथ ही ग्रहण करूंगा ! संवेदनशील के साथ ऐसा हो जाना स्वाभाविक है !

    अगर दो रचनाओं में छायाएं मिलती हैं तो इन्हें दोष नहीं माना जाना चाहिए ! रचना क्या संवेदनशील बनती है , विचार का विषय यह होना चाहिए ! अशोक जी की टिप्पणियाँ नहीं देख सका इसलिए फिलहाल इतना ही कहना अलं होगा !

    अपूर्व भाई यादों के संग्रहण पर प्रश्न कर रहे हैं , मैं प्रेम के किसी भी कोण को पूर्णतया जान चुका हूँ ऐसा दावा नहीं कर सकता तथापि , कहना चाहूँगा कि स्मृतियों के साथ यांत्रिक 'डिलीट' का आप्सन नहीं रहता ! स्मृतियाँ तनु या सान्द्र हुआ करती हैं ! कभी संपीडित तो कभी विरलित ! इसलिए कहानी की घटना सहज सी दिखी मुझे !

    अनूप जी ने जिस प्रतिशत वाले वाक्य को रखा है , जिसे कि बहुतों ने बहुत सकारात्मक भावुक वक्तव्य के रूप में याद भी किया है , उसे मैं भी कमजोर वाक्य समझ रहा हूँ ! वहाँ पर इसका तुक नहीं बन रहा है ! उस भाव-संहति के वाक्यों के साथ वह वाक्य विजातीय और सायास का प्रभाव दिखा रहा है ! मुझे खटका था !

    मुक्तकंठ तारीफ़ फिर इस बात की करता हूँ कि आपने ब्लागानुकूल एक शिल्प ढूंढ लिया है , यह आपकी उपलब्धि है !

    अब आगे बढूँ ! अपने हिन्दी वाले ब्लॉग के पहले ही वाक्य पर भी जाऊं ''नोट'' दे आऊं नहीं तो कोई खामखा कहेगा कि सीधे सीधे मैंने नोबल पुरष्कार धारी सिम्बोर्स्का से सीधे चुरा लिया है , यद्यपि यह मानता हूँ कि प्रभाव वहाँ से लिया है , पर बीर-बन्दों का क्या भरोसा :-)

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  90. कहानी इम्तेहान के दिनों में ही पढ़ ली गई थी. और यह आपका ही जादू था किसी सायबर कैफे से प्रिंट आउट लेकर घर पर पढ़ी गई और पढ़ने के बाद किसी कुएं में धकेल दिया गया था और ‘तत्कालीन प्रेम’ को लेकर सोच में पड़ गया फिर अतीत के प्रेम भी नुमाया हो गए...

    कहानी के शिल्प के बाबत कुछ मित्रों से बात भी हुई थी. तब इस विवाद से अनभिज्ञ था. बाद में फोन पर टूटी फूटी बात पता चली थी.

    मैं हरसंभव कोशिश करता हूँ की मैं जिनका घनघोर प्रशंसक हूँ उनसे बचता फिरूं (आपके साथ यह सिर्फ लेखन तक ही सिमित नहीं है) ... मुझे अभी भी पूरी तरह से बात पता नहीं है लेकिन जो भी हो शिल्प बेहद दार्शिकाना है बेहतर हो हम विवाद की बात ना इस दरया में डूबने की कोशिश करें...

    उत्तर देंहटाएं
  91. prem kahani hai ya kuch aur, dil dub gaya shabd nahi hai. rupendra singh 09827958380

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  92. हाई अनुराग ,

    टिप्पणी में लिखा गया आपका संस्मरण काफी अच्छा लगा ,

    बुग्गी पे बैठा बच्चा एक नज़र बारात की ओर देखता है....दूसरी बूढ़े की ओर....कुछ मिनट..... वो नीचे झुक कर सिक्का उठाता है..... |

    मंटो की याद आ गयी | उन लम्हों को रिवाइंड करना आपको पसंद नहीं है, लेकिन अगर अपने मन की कहूँ तो ऐसे लम्हों को उनके तल्ख़ अंदाज़ के साथ सबको बताना एक लेखक की जिम्मेदारी होती है | उसके तुरंत बाद आप प्रेमचंद को भी याद कराते हैं |

    एक अच्छा लेखक होने से ज्यादा जरूरी है ...... एक बेहतर मनुष्य होना ...

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  93. aap bahut khoobsoorat likhte hain..ki har baar sansen bhi tham tham ke padhti hain..ek zindagi si jee leti hain aapke lekhan mein.. "आँखों से झांकता सवाल-कितनी प्रतिशत बची हूँ मै तुम में ?--" dil ko chhu gayi hai..

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कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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