2010-07-01

सुनो खुदा !तुम्हे छुट्टी की इज़ाज़त नहीं है

हिल रोड के उस चर्च के बाहर जूते उतारने की कवायद नहीं है ….आलस में उस कवायद का बेजा फायदा उठा कर..मै  कैमरा हाथ में लिए जूते पहने अन्दर चला जाता हूँ....आर्यन  अपने सेंडिल से उलझा  मुझे आवाज दे रहा है ......मै उसे अनसुना कर भीतर चला गया हूँ. बेंचो पे कितने लोग बैठे है ..... अपनी अपनी उम्मीदों ...ख्वाहिशो ....गमो को अंडरलाइन  किये हुए…. यहां मोमबत्तियो की सिफारिश है .. ...झुके हुए सर   में ज्यादा   उम्र दराज लोग है .....अक्सर पचास के बाद ही खुदा की तलब ज्यादा  लगती है  आदमी को....डेमेज कंट्रोल एक्सरसाइज़ !.. खुदा!      किसने किया होगा उसका नामकरण ?.  रोज कितने कितने क्रिटिक्स  के दरमियां से गुजरना पड़ता है .. उसे..पढ़े लिखे……बहुत पढ़े  लिखे ... ....बे पढ़े क्रिटिक्स.........जिनकी थेंक्स गिविंग की आदत नहीं है......
 .इतने साल बाद भी  शायद   एक दिन वास्ते   भी ….खुदा को   परफेक्ट डिकलेयर  नहीं किया गया …. ..शेखर   कहता था ...आदमी ने  अपनी रूह की रिपेयर वास्ते   गेराज.खोले है .अलग अलग नामो से……जिसके मेकेनिक को कभी छुट्टी की इज़ाज़त नहीं  !

.....सामने रखी बेंच पर कुछ देर बैठ डिज़िटल कैमरे से मै कुछ फोटो लेता हूँ...यहाँ वहां घूम के हम सब बाहर निकले है ....सड़क के उस  पार चर्च के सामने शायद एक प्रार्थना  स्थल है ...वहां की कुछ फोटो लेकर हम गाडी में बैठे है ...ड्राइवर को बेंड स्टेंड जाने के निर्देश मिले है .....मेरा मोबाइल बजा है ...लम्बी बातचीत है ....बेंड स्टेंड आ गया है….
समंदर की लहरे उछाल मार रही है .. हाई टाइड की सम्भानाये पिछले कई दिनों से है...मुंबई अब बादलो के इकठ्ठा होने से  डरने लगा है......कुछ किनारों पे कई जोड़े प्रेम का दुस्हासिक प्रदर्शन कर रहे है ...उनसे दूर   एक कोने  पर .मै  आर्यन को   आगे चट्टानों पे ले जाना चाहता हूँ ....वो कुछ अनमना सा है ......कुछ गुस्से में .....
आपने अच्छा नहीं किया .......

मै उसकी ओर देखता हूँ.....

जूते पहनकर कर कोई मंदिर में जाता है
?


मस्जिद की सीडियो पर ...चढ़ते चढ़ते
उदास आँखो से देखता है
दूर गली के कोनो पर
नीले हरे लाल
कितने रंग बिरंगे 
मोती बिखरे है वहाँ
झुकता है सजदे मे
जब उसका सर
जेब मे पड़े काँच
खनक जाते है
कितनी सर्द ओर बोलती निगाहे
जम जाती है उसके चेहरे पर
घबरा कर आँखे बंद कर
जाने क्या क्या बुदबुदाता है......
यूँ भागता है फिर
गली की जानिब………
कहते है
उसकी दुआओ मे सबसे ज़्यादा असर है
" खुदा
तेरा नन्हा नमाज़ी कन्चे खेल रहा है.......





पुनश्च:
उन चट्टानों के इर्द गिर्द तमाम शोर गुल में .एक कोने पे ...एक घायल कौवा है.....खुले घाव लिए....दूसरे कौवे बारी-बारी  से आ रहे है ....नोचकर जा रहे है .......वो जिंदा है .पर प्रतिरोध की हालत में नहीं है .....मेरे साथ बैठा  दीपक एक पत्थर उन कौवो को मारने के लिए उठाता है ...."रहने दो बेटा...ये कुदरत का नियम है ......".कुछ दूर बैठे एक बुजुर्ग उसे रोकते है ......कुदरत का नियम ?
 .आदमी कितनी निष्ठा से इस का पालन कर रहा है ना!

58 टिप्‍पणियां:

  1. कहाँ कहाँ से गुज़र गई आपकी इस कृति को पढने में (फिर हिंदी उर्दू का घालमेल कर दिया मैंने )
    बच्चे का मासूम सवाल "जूते पहनकर कर कोई मंदिर में जाता है ?"
    पहली बार जूते आपने उतरवाए होंगे ...उसके लिए खुदा ,यीशु ,भगवान् सब एक ...काश सभी इतने मासूम हो जाते

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  2. खुदा अगर छुट्टी पर चला गया तो क्या वह खुदा रह जायेगा

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  3. बैंड स्टैंड जैसी जगह पर जाकर जिंदगी के ऐसे सरोकार बटोर लाए ?

    बहुत खूब।

    काफी संजीदा किस्म की पोस्ट है।

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  4. कैसे हो डाक्टर साब , मेरी नब्ज़ पकड़ के देखो और बताओ इतने दिनों तक मैं कहाँ था .... आज की रचना हमेशा की तरह कमाल कर देने वाली ... आर्यन की बात अछि लगी उसका गुसा भी जायज़ है जूता पहन कहीं मंदिर जाते हैं... और ऊपर वाले की नियति पर भी ...
    बधाई कुबूल फरमाएं

    अर्श

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  5. धर्मनिरपेक्षता का सही उदाहरण:-
    "जूते पहनकर कर कोई मंदिर में जाता है?"

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  6. सभी टिप्पणियाँ ब्लॉग लेखक के द्वारा अनुमोदित की जानी चाहिए.

    अनुमोदन हेतु प्रेषित :
    बज़रिये तफ़रीह रूबरु होना एक तल्ख़ असलियत और एक मासूम सवाल से..
    उसे इतने पैने तरीके से इस कदर पिरो कर पोस्ट की शक्ल में उतार देना, वाह्ह.. क्या बात है ?

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  7. कुदरत का नियम? इन्सान? दीपक और बुजुर्ग!

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  8. उन चट्टानों के इर्द गिर्द तमाम शोर गुल में .एक कोने पे ...एक घायल कौवा है....घायल कौवा लिए....दूसरे कौवे बारी-बारी से आ रहे है ....नोचकर जा रहे है .......वो जिंदा है .पर प्रतिरोध की हालत में नहीं है .....मेरे साथ बैठा दीपक एक पत्थर उन कौवो को मारने के लिए उठाता है ...."रहने दो बेटा...ये कुदरत का नियम है ......".कुछ दूर बैठे एक बुजुर्ग उसे रोकते है ......कुदरत का नियम ?
    .आदमी कितनी निष्ठा से इस का पालन कर रहा है ना!


    अभी तक इन शब्दों में उलझी हूँ ......घायल कौवा.....घायल कौवा.......दूसरे कौवे बारी-बारी से आ रहे है ....नोचकर जा रहे है......

    मन आहात है .....

    शायद पिछली कोई कड़वाहट .....

    "रहने दो बेटा.....कुदरत का नियम....?????


    मस्जिद की सीढियों पर ...चढ़ते चढ़ते
    उदास आँखो से देखता है
    दूर गली के कोनो पर
    नीले –हरे –लाल
    कितने रंग बिरंगे
    मोती बिखरे है वहाँ
    झुकता है सजदे मे
    जब उसका सर
    जेब मे पड़े काँच
    खनक जाते है


    एक संवेदनशील मन ही इतनी सुंदर कल्पना कर सकता है ....


    कहते है
    उसकी दुआओ मे सबसे ज़्यादा असर है
    " ऐ खुदा”
    तेरा नन्हा नमाज़ी कन्चे खेल रहा है.......

    वही अदा है बिलकुल.....गुलजार की सी .....

    एक लम्बे अरसे से पढ़ती आई हूँ आपको ....एक बार भी कलम ठहरी नहीं .....न पाठक रुके .....स्याही अपना रस्ता खुद बनाती रही .....


    अब मान भी लीजिये .....आर्यन का कहना ......

    जूते पहनकर कर कोई मंदिर में जाता है ?

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  9. हम तो कभी अपने रूह को रिपेयर करवाने नहीं जाते... हमारी रूह हमें फटी-चुटी घायल ही अच्छी लगती है...और वैसे भी हमें अपनी खुशी के लिए किसी को डिस्टर्ब करना अच्छा नहीं लगता. वैसे ही खुदा को इतने लोग डिस्टर्ब किये रहते हैं :-)
    कौवे वाली घटना थोड़ा अपसेट कर गयी... वो बूढा ज़रूर कोई पारसी रहा होगा.

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  10. बच्चे का एक मासूम सवाल ....बडे खड़ा करते जिसपे बवाल ...

    बच्चे के माध्यम से बहुत गहरी बात कह दी आपने....

    शुभ्कमानायुएँ....

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  11. चलो, भेजते खुदा को छुट्टी पर।

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  12. मोमबत्तियो की सिफारिश
    पचास के बाद ही खुदा की तलब ज्यादा
    ...डेमेज कंट्रोल एक्सरसाइज़ !..

    आखिरी में उसी आदमी की नीयत पे एक तंज जिसे थेंक्स गिविंग की आदत नहीं है


    आदमी कितनी निष्ठा से इस का पालन कर रहा है ना!



    छोटी सी पोस्ट बहुत कुछ कह गयी है .

    जिन दो पोस्टो को आपने लिंक दिया है वे बेहद इमोशनल पोस्ट है आपके दोस्त शेखर को कभी नहीं भूल सकते वो भूलने वाली चीज़ नहीं है

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  13. उन चट्टानों के इर्द गिर्द तमाम शोर गुल में .एक कोने पे ...एक घायल कौवा है.....खुले घाव लिए....दूसरे कौवे बारी-बारी से आ रहे है ....नोचकर जा रहे है .......वो जिंदा है .पर प्रतिरोध की हालत में नहीं है .....मेरे साथ बैठा दीपक एक पत्थर उन कौवो को मारने के लिए उठाता है ...."रहने दो बेटा...ये कुदरत का नियम है ......".कुछ दूर बैठे एक बुजुर्ग उसे रोकते है ......कुदरत का नियम ?
    .आदमी कितनी निष्ठा से इस का पालन कर रहा है ना!

    Jhakjhoor dene wali pankatiyan ...!!Sachchayi ..aaah tak !

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  14. अच्छा मुझे तो अपने लिए लगता है की खुदा छुट्टी पर ही है तभी कोई अर्जी मंजूर नहीं होती ...:) आर्यन का सवाल और घायल कोवे का दर्द गहरे दिल में उतर गए ...बेहतरीन

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  15. आर्यन के अपने उसूल हैं इस उम्र वाले....! हमारे भी थे। पेड़ों के नीचे पड़े छोटे बड़े पेबल्स पर सिर झुकाना .... टूतते तारे पर आँख बंद करना ये सब ज़रूरी नियम हैं इस उम्र के...!

    और उस नियम को उसका रोल मॉडल तोड़े तो आक्रोश तो होगा ही...!:)

    नज़्म कितने दिन बाद मिली और कितनी खूबसूरत मिली।

    और

    वो जिंदा है .पर प्रतिरोध की हालत में नहीं है .....

    कुदरत का नियम ?
    .आदमी कितनी निष्ठा से इस का पालन कर रहा है ना!

    ये दो वाक्य लेख को इतना संवेदनशील बना जाते हैं, जितना हज़ारो पंक्तियाँ भी नही बना पाती...!!!

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  16. ऽअप एक दिन की बात कर रहे हैं अगर खुदा 1 सैकेण्ड के लिये भी छुट्टी पर चला जाये तो सारी सृष्टि हि उलट पलट ज़ाये………………एक बहुत ही गम्भीर आलेख लिखा है।

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  17. Ham to soch rahe hain aapka Doctor hona bhi usi khuda ki mistake hai...aur ab writing ka hunar de wo galtiyon ko repair kar raha hai....Nanha namazi bahut payara hai
    " ऐ खुदा”
    तेरा नन्हा नमाज़ी कन्चे खेल रहा है......so touching....By the way Kabhi baat ho to pls. recommend kariye hamein bhi .....Sifarish waha bhi chalti hai :-)

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  18. बहुत खूब , उम्मीदों ...ख्वाहिशो ....गमो को अंडरलाइन किये हुए....

    आपका अंदाज़ कभी हँसा जाता है कभी रुला जाता है , कैसे मैकेनिक जाये छुट्टी , इतने सारे दिल हथेलियों पर रिस रहे होंगे ।

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  19. खुदा ने दुनिया बना दी तो सम्हालें भी । इतनी जटिलता डालने की क्या आवश्यकता थी कि छुट्टी भी न मिले । कोई अधीनस्थ तो होगा ।

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  20. jindagi ki sachachai ko dekhne ke aapne aapne pahlu hote hai...
    aapka aap tha.. un buzurgwar ka aapna...

    aap bahut badiya likhte hai...

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  21. दिमाग में चल रहे भावो को दिल के थ्रू कीबोर्ड पर निचोड़ डालते हैं आप. और कुदरत का नियम... ! आज फिर टिपण्णी पर बस 'ओह !' कहके निकल जाना चाहता हूँ.

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  22. आज बहुत दिनों के बाद आपके ब्लॉग पे आना हुआ। सचमुच आपका अंदाजे बयाँ बांध सा लेता है।

    ………….
    दिव्य शक्ति द्वारा उड़ने की कला।
    किसने कहा पढ़े-लिखे ज़्यादा समझदार होते हैं?

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  23. "...Jee me aata hai
    Ki bas haath pakad kar isko
    Subah ke mele me le jaoon
    Khilaune de doon..."
    -Gulzar

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  24. Kahaaniyaan hi sahi sab teer-tukke hi sahi
    Agar wo khwaab hai use taabeer karke dekhte hain

    Suna hai bole to baaton se phool jhadte hain
    Ye baat hai to chalo baat karke dekhte hain

    Suna Hai log use aankh bhar ke dekhte hain
    'Faraaz'uske shahar me kuchh din thahar ke dekhte hain

    उत्तर देंहटाएं
  25. किसने कहा आप डॉक्टर हैं... आप तो पेंटर हैं... ज़िन्दगी के कैन्वस पर शब्दों और तजुर्बों के रंगों से एक नयी तस्वीर पेंट कर देते हैं हर पोस्ट में... हर पेंटिंग अपने आप में मास्टर पीस...
    कुछ दिन पहले ही आपका ब्लॉग फीड रीडर में जोड़ा... और पिछले दिनों ऑफिस में वर्कलोड भी कुछ कम था तो आपकी पुरानी पोस्ट्स पढ़ना हमारा फ़ेवरेट टाइमपास बन गया था... पूरा तो नहीं पर काफ़ी कुछ पढ़ा... और ऑलमोस्ट हर बार ही निशब्द हो गये... वैसे तो अब तक बहुत बार बहुत लोग कह चुके होंगे ये पर हम भी कुछ अलग नहीं कह पायेंगे, आपकी तरह शब्दों के जादूगर नहीं है ना... बहुर अच्छा लिखते हैं आप... आपकी हर पोस्ट ज़िन्दगी के बेहद करीब होती है और हर बार ही ज़िन्दगी को देखने का एक नया नज़रिया दे जाती है... और पढ़ने वाला हर बार मुश्किल में पड़ जाता है की तारीफ़ करने के लिये हर बार नये नये ऐजिक्टिव्स कहाँ से ढूंढ़ के लाये...
    पोस्ट्स पढ़ते हुए पता चला की आप भी ना सिर्फ़ हमारी तरह गुलज़ार साब के फैन हैं बल्कि उन्हें जीते हैं और उनका अंदाज़ आपकी हर नज़्म और पोस्ट्स में साफ़ झलकता है... और जाने क्यूँ उनकी एक नज़्म याद आ रही है अभी, हालाँकि इस पोस्ट से उसका कोई लेना देना नहीं फिर भी... वैसे तो पढ़ी हो होगी आपने फिर भी शेयर करने में क्या जाता है :)

    सदा कैन्वस पे उभरते हैं बहुत से मंज़र
    एक सनसेट है, पके फल की तरह
    पिलपिला रिसता, रसीला सूरज
    चुसकियाँ लेता हूँ हर शाम लबों पे रखकर
    तुबके गिरते हैं मेरे कपड़ों पे आ कर उसके
    एक इमली के घने पेड़ के नीचे
    स्कूल से भागा हुआ बोर-सा बच्चा
    जिस को टीचर नहीं अच्छे लगते
    इक गिलहरी को पकड़ के
    अपनी तस्वीरें किताबों की दिखा कर खुश है
    मेरे कैन्वस ही के ऊपर से गुज़रती है सड़क इक
    एक पहिया भी नज़र आता है टाँगे का मुझे
    कटकटाता हुआ एक सिरा चाबुक का
    घोड़े की नालों से उड़ती हुई चिनगारियों से
    सादा कैन्वस पे कई नुक्ते बिखरते हैं धुएँ के।
    कोढ़ की मारी हुई बुढ़िया है इक गिरजे के बाहर
    भीख का प्याला सजाए हुए, गल्ले की तरह,
    माँगती रहती है ख़ैरात 'खुदा नाम' पे सब से।
    जब दुआ होती है गिरजे में तो बाहर आकर
    बैठ जाता है खुदा गल्ले पे, ये कहते हुए
    आज कल मंदा है, इस नाम की बिक्री कम है।
    'क़ादियाँ' कस्बे की पत्थर से बनी गलियों में
    दुल्हनें 'अलते' लगे पाँव से जब
    काले पत्थर पे क़दम रखती हुई चलती हैं
    हर क़दम आग के गुल बूटे से बन जाते हैं!
    देर तक चौखटों पे बैठे, कुँवारे लड़के
    सेंकते रहते हैं आँखों के पपोटे उनसे।
    नीम का पेड़ है इक-
    नीम के नीचे कुआँ है।
    डोल टकराता हुआ उठता है जब गहरे कुएँ से
    तो बुजुर्गों की तरह गहरा कुआँ बोलता है
    ऊँ छपक छपक अनलहक़
    ऊँ छपक छपक अनलहक।
    -- गुलज़ार

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  26. पुनश्च: ये पोस्ट भी हर बार की तरह निशब्द कर गयी... :)
    अपनी अपनी… उम्मीदों ...ख्वाहिशो ....गमो को अंडरलाइन किये हुए….
    एक तरफ़ पचास पार कर चुके आदमी जिन्हें ख़ुदा की तलब ज़्यादा लगती है और दूसरी तरफ़ कंचे खेलता नन्हा नमाज़ी और सवाल करता नन्हा आर्यन... कितने निश्छल मासूम होती है ये उम्र... किसी डेमेज कंट्रोल की कोई ज़रुरत नहीं...

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  27. आदमी ने अपनी रूह की रिपेयर वास्ते गेराज.खोले है .अलग अलग नामो से……जिसके मेकेनिक को …कभी छुट्टी की इज़ाज़त नहीं !
    ....क्या बात है, यूं कभी सोचा नहीं।

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  28. interesting blog, i will visit ur blog very often, hope u go for this website to increase visitor.Happy Blogging!!!

    उत्तर देंहटाएं
  29. हम ने सोचा था कि आदमी अब बदल गया है मगर वो तो कुदरत के नियम फालो कर रहा है! -- करारी चोट -- हमेशा की तरह लाजवाब पोस्ट बधाई।

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  30. कुदरत का नियम ?
    आदमी कितनी निष्ठा से इस का पालन कर रहा है ना!
    घायल कौए के उदाहरण से बदलते हालातों में इंसानियत की कुछ छुपी कुछ उघडी हुई घिनौनी सच्चाई बयाँ कर दी.
    खुदा भी थक गया है शायद ,जो बीच बीच में आँखें बंद कर लेता है..वो जानता है कि उसे छुट्टी की इजाज़त नहीं है.

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  31. हम तो अपने अन्दर उस नन्हे नमाज़ी को आज भी समेटे है.. अभी तक ज्यादा डेमेज किया तो नहीं है.. ना ही पापो का छोटा वाला रिचार्ज लेने जैसी कोई बात है..
    खुदा नाम किसने रखा होगा.. ये सोचना ही खुदा को नाम देने जैसा है.. जो सिर्फ आप ही कर सकते है..

    एक और बात अगर कभी आप बेस्ट रीडर का अवार्ड बांटने के मूड में रहो तो नीलिमा को एक ठो अवार्ड ज़रूर दे देना.. :)

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  32. मैं मासूमियत से बस इतना ही कहूंगा कि आप बहुत अच्छा लिखते हैं..........

    उत्तर देंहटाएं
  33. हमेशा की तरह बहुत लाजवाब पोस्ट....

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  34. God Bless Aryan!!
    ये मासूम जाने, हमे कितना कुछ सिखा जाती है..

    मेरा एक दोस्त क्रिश्चन है उससे कितनी ही बार मैने कहा है कि मुझे चर्च लेकर चल लेकिन वो खुद ही क्रिसमस के दिन घर लेट जाता है.. कहता है आज घर वाले जबर्दस्ती चर्च ले जायेगे.. वो शायद धार्मिक रीति रिवाजो मे विश्वास नही करता..हर वीकेन्ड अपने बाईक गैन्ग के साथ निकल जाता है नेचर की खोज मे.. उसे कई बार मूर्ति विसर्जन के खिलाफ़ कहते पाया है.. नेचर उसके लिये धर्म है और वो जैसे उसका सिपाही एक और दोस्त है मराठी ब्राह्मिन.. पूरी कुरान पढ रखी है उसने.. इस्लाम की किसी भी बात पर उसके पास लाखो तर्क होते है... इन लोगो को देखता हू तो यही लगता है सबको उस ’खुदा’ की तलाश है.. बस अपने अपने तरीके है..

    ज़िन्दगी और कुछ भी नही, तेरी मेरी कहानी है... सबकी अलग अलग अपनी अपनी खोज है...

    उत्तर देंहटाएं
  35. Anurag ji,

    Aap ke blog par tippani di nahi jaati, har baar aata hun padhta hun (khairiyat ye ki samajh bhi jata hun) par kahun kya? kaise?
    Tino (ye aur do related posts) padhin. Aap kahe ke doctor hain? shabdon ke?
    bhavnaon ke ya antardwand ke?

    आदमी कितनी निष्ठा से इस का पालन कर रहा है ना!
    kaise likha hoga aapne..?
    vismit hun...


    Aur iske liye..
    उसकी दुआओ मे सबसे ज़्यादा असर है
    " ऐ खुदा”
    तेरा नन्हा नमाज़ी कन्चे खेल रहा है.......

    standing ovation kam sa maloom hota hai.

    उत्तर देंहटाएं
  36. Anurag ji,

    Aap ke blog par tippani di nahi jaati, har baar aata hun padhta hun (khairiyat ye ki samajh bhi jata hun) par kahun kya? kaise?
    Tino (ye aur do related posts) padhin. Aap kahe ke doctor hain? shabdon ke?
    bhavnaon ke ya antardwand ke?

    आदमी कितनी निष्ठा से इस का पालन कर रहा है ना!
    kaise likha hoga aapne..?
    vismit hun...


    Aur iske liye..
    उसकी दुआओ मे सबसे ज़्यादा असर है
    " ऐ खुदा”
    तेरा नन्हा नमाज़ी कन्चे खेल रहा है.......

    standing ovation kam sa maloom hota hai.

    उत्तर देंहटाएं
  37. "तेरा नन्हा नमाज़ी कंचे खेल रहा है"

    उफ़्फ़्फ़! क्या लिखते हो डा० साब....सुभानल्लाह!!!

    पोस्ट-दर-पोस्ट शब्द-दर-शब्द कितने अर्थ, कितने भाव समेट देते हो आप- हर बार।

    उत्तर देंहटाएं
  38. किस गेराज में बैठ कर तेज़ करते हैं कलम की धार.... बहूत पैनी होती जा रही है लहुलुहान कर दिया आत्मा को...
    वाह! छोटे सरकार के मासूम शब्दों में दुनिया में उठे बवाल का कितना सुंदर जवाब है....
    ज़हन मैं कुछ अधिक समय ठहरने वाली है यह पोस्ट....

    उत्तर देंहटाएं
  39. बहुत ही सुंदर पोस्ट .मुझे भी यही सब बातें अनुभूत होती हैं किसी मंदिर मस्जिद या चर्च के द्वार पर , पर इतने सुंदर शब्दों में उसे उतरना मेरे लिए आज तक संभव नही हुआ .धन्यवाद इस अतीव सुंदर पोस्ट के लिए

    उत्तर देंहटाएं
  40. ..... अपनी अपनी… उम्मीदों ...ख्वाहिशो ....गमो को अंडरलाइन किये हुए…. यहां मोमबत्तियो की सिफारिश है ..

    ....क्या बात है

    उत्तर देंहटाएं
  41. क्या बात है डाक्टर साब आपको कब से अपने ब्लाग पर टिप्पणियों का फिल्टर लगाने की जरूरत पड़ गई

    उत्तर देंहटाएं
  42. आप की पोस्ट की खासियत होती है आप पहले ही confession कर लेते है.नहीं तो जूते पहन के जाने पे हम आर्यन की तरफ होते चाहे हिल रोड के उस चर्च के बाहर जूते उतारने की कवायद नहीं है ….पर आप खुद ही मान लेते है की आलस में उस कवायद का बेजा फायदा उठा कर....

    आपकी observation की क्षमता से हमेशा ही प्रभावित रहती हूँ (बेंचो पे कितने लोग बैठे है ..... अपनी अपनी… उम्मीदों ...ख्वाहिशो ....गमो को अंडरलाइन किये हुए…. यहां मोमबत्तियो की सिफारिश है ..)

    कहते है
    उसकी दुआओ मे सबसे ज़्यादा असर है
    " ऐ खुदा”
    तेरा नन्हा नमाज़ी कन्चे खेल रहा है.......

    अवाक् हूँ सोचती हूँ कोई कैसे इतना अच्छा लिख लेता है..

    उत्तर देंहटाएं
  43. मुझे ये बात भी उत्साहित करती है कि आपने मेरा ब्लॉग खोलने की कोशिश करते हैं.
    दरअसल मैं भी आप के बात से परेशां हूँ और कोई हल चाहता हूँ. पर समझ में नहीं आ रहा ऐसा क्यूँ हो रहा है. अगर आप कुछ सुझा सकें...

    उत्तर देंहटाएं
  44. आदमी ने अपनी रूह की रिपेयर वास्ते गेराज.खोले है .अलग अलग नामो से……जिसके मेकेनिक को …कभी छुट्टी की इज़ाज़त नहीं !
    :
    jab bhi aapka likha padhte hai..man ko zankar jaati hai..

    उत्तर देंहटाएं
  45. प्रिय अनुराग,
    एक मासूम की भावनाओं का अति उत्तम चित्रण ! तुम्हारी लेखन शैली वास्तव में अद्वितीय है !
    मेरे विचार में कोई भी समझदार व्यक्ति तुम्हारी पोस्ट पर अनावश्यक टिप्पणी नही करे गा, अतः "सभी टिप्पणियाँ ब्लॉग लेखकके द्वारा अनुमोदित की जानी चाहिए" अनावश्यक प्रतीत होता है

    उत्तर देंहटाएं
  46. पोस्ट कब रोजनामचे से फ़लसफ़ाना हो जाती है और कब फ़लसफ़ाना से रूहानी..पता नही चलता..
    जिस उम्र तक सज़दा करते सरों के बहुत पास, दिल से सटी जेबों मे कंचे धड़कते रहते हैं..उसी उम्र तक रूह पाकीजा और सज़दे पुरअसर रहते हैं ..दिल भी तो एक नन्हा नमाजी होता है..जो कभी मंदिर मे जूतों की फ़िकर करता है..तो कभी गली मे कंचों की खनखनाहट के बीच सज़दों की..
    वैसे खुदा का काम बोरिंग भी बड़ा होता है..२४x७..बिना संडेज, सिक लीव, कैज्युअल्स के..कहीं ऊपर किन्ही नीरस ऊबी हुई शामों मे हमारी अर्जियों पर दस्तखत करते हुए सोचता होगा..कि कब इसे पेशे से रिटायर हो..और फ़ुरसत मिले...मगर फ़ुरसत मे हो तो खुदा काहे का...
    अंत की कविता अच्छी लगी मगर त्रिवेणी की कमी खटकी पिछली कुछ पोस्ट्स से..

    उत्तर देंहटाएं
  47. डाक साब,कुछ दिले-बीमार आपका ईमेल पता पूछ रहे थे ? मैं उन्हें क्या जवाब दूं ?
    :-)
    मेरा पता है - rangnathsingh@gmail.com

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  48. "उन चट्टानों के इर्द गिर्द तमाम शोर गुल में .एक कोने पे ...एक घायल कौवा है....घायल कौवा लिए....दूसरे कौवे बारी-बारी से आ रहे है ....नोचकर जा रहे है .......वो जिंदा है .पर प्रतिरोध की हालत में नहीं है ..."

    देख रहा हूँ कव्वे भी इंसान से कितना कुछ सीखने की कोशिश में लगे हैं...या यूँ कहूँ के इस से ये ज़ाहिर हो रहा है की इंसान भी कव्वे की जाति के ही हैं...दोनों में इतनी समानता...कमाल है...

    आपके नन्हे नमाज़ी वाले जुमले पे सर की टोपी उतर कर आप के क़दमों पर डाल दी है...
    कमाल लिखते हैं आप और उस से बड़ा कमाल ये के देर से ही मैं कैसे न कैसे आप तक पहुँच ही जाता हूँ....:))

    नीरज

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  49. आर्यन बच्चा है .. सवाल मासूम हैं .. बड़े होने के बाद ऐसा कुछ भी नहीं पूछेगा .. पर 'बड़ा होना' यही है मूल !

    कंचे बज रहे हैं , इसी में सब चलता जाएगा ! बिना छुट्टी के ! बिना नागा किये ! कविता सुन्दर है ! 'पुनश्च' के प्रतीक खोल रहा हूँ जो खुल के ( भी ) खोलना नहीं चाहते !

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  50. खुदा का नाम किसने रखा होगा? खुद खुदा ने कहा, ‘’खुद आ’ और हम सब खिंचे चले गये॥
    मोमबत्तियो की सिफारिश
    पचास के बाद ही खुदा की तलब ज्यादा
    ...डेमेज कंट्रोल एक्सरसाइज़ !..

    नहीं जी खुदा की तलब तो बचपन से लग जाती है जिस दिन पहली बार किसी डर से सामना होता है और फ़िर ताउम्र न डर पीछा छोड़ता है न खुदा।
    हम रिचा की बात से सहमत्…आप डाग्दर बाबू कम और लेखक, कवि, पेंटर ज्यादा है। हमारा तो फ़ायदा ही फ़ायदा है।

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  51. डा. साब,
    समय निकाल स्क्रिप्ट लिख डालिये।
    जमेगी! चलेगी!

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  52. ऊपर वाली पोस्ट में टिपण्णी का जुगाड़ गायब है या मुझे दिख नहीं रहा?

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  53. इसका फार्म बेहद आकर्षक है ।

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  54. आदमी ने अपनी रूह की रिपेयर वास्ते गेराज.खोले है .अलग अलग नामो से……जिसके मेकेनिक को …कभी छुट्टी की इज़ाज़त,लाजवाब-लाजवाब.

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कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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