2010-11-22

इत्तेफाको के रिचार्ज कूपन नहीं होते दोस्त !!!!


हैदराबाद का एयरपोर्ट शहर से काफी बाहर है ....पर जल्दी आना यहाँ खलता नहीं है...  ......…..वक़्त अपने आप गुजर जाता है .... सफ़र अपने आप के साथ वक़्त बिताने का एक बेहतर जरिया है ...इंट्रो स्पेक्शन का भी.....  बोर्डिंग पास लेने की  लाइन पर  एक कपल है आगे ....लड़के ने.. रीबोक के शूज़ पहने है ....ब्लू जींस .....टी शर्ट पर लिखा है....आई एम् बोर्न फ्रीसाथ में….सर से पैर किसी कपडे से लिपटा पूरा जिस्म.है........झांकती दो आँखे बस.... मुझे अभि  याद आता है .....कहता था....औरतो के पैदा होते ही  रवायते बर्थ सरटिफिकेट के साथ स्टेपल हो जाती है ...
.दुनिया भर में  घूमने का शौक है उसे ...  ऐसे लोग  गुल्लक की माफिक होते  है ...ढेरो तजुर्बे अपने भीतर जमा किये..........चेक इन के बाद किताबो की एक शॉप में कुछ वक़्त गुजार कर मै एक जगह तलाश कर बैठा हूँ ...हाथो में अखबार लेकर ....कोंफ्रेंस में अकेले आना ..सफ़र करते वक़्त  ज्यादा महसूस होता है ...एक नजर आस पास दौडाता हूँ...कानो में हेड फोन लगाये एक लड़का बराबर में बैठा है.....दूसरी ओर मोहतरमा मोबाइल में उलझी है .अंग्रेजी में बात करती...बीच में बीच में तेज तेज कुछ शब्द कान में  पड़ते है...   ...ओह आई मिस यू टू.बेबी......तकरीबन  हर पांच  मिनट बाद .....सामने बैठी गुजराती फॅमिली में से एक १२ -१३ साल की लड़की हर बार इस "मिस यू " को सुनकर अपने प्ले स्टेशन से आँख ऊपर उठाती है...एक मिनट देखती है ....फिर खेल में लग जाती है .....प्रति व्यक्ति आय दर २० रुपये से कम......केपरीकोन राशि वाले ज्यादा रोमांटिक होते है ....करन जोहर के मुताबिक हिन्दुस्तान में राइटर की कमी है .......सारे पेज पलटकर मै  अखबार से  बाहर  निकलता  हूं  
ख़ूबसूरती अपना स्पेस भीड़ में भी तलाश लेती है ... एक.गोरा  गोल चेहरा ...बड़ा सा जूडा  .माथे के ठीक बीचो बीच एक बड़ी सी गोल बिंदी.....काली साड़ी.जिसके  बोर्डर पे लाल रंग है ... चलता आ रहा है ..साथ चलने वाले जैसे बेक ग्रायूंड में है....कहते है खूबसूरत लोगो को अपनी ख़ूबसूरती  का इल्म होता है ......उसे  भी है .. मेरे  सामने  दायी  ओर तीसरी   सीट खाली है .....वे नजरे  इधर  उधर घूमतीमुझ पर रुकी है ....  ....आधा मिनट.....अभी भी रुकी है .....मै थोडा असहज होने लगा हूँ......हिम्मत   करके उन आँखों   का पीछा   करता हूँ.... वे ब्राउन आँखे है ..... ब्राउन ……..... एयरपोर्ट  ने मुझे फिर यकीन दिलाया है के दुनिया गोल है ..... उन  होठो पे मुस्कराहट आयी है….जानी पहचानी मुस्कराहट. ...
मै ब्राउन आँखों संग   कई साल पीछे दौड़ जाता हूँ......
 ब बी एस एस  ए लार की तारो वाली साइकिले हमारे लिए सिटी होंडा सी थी.....हमारे गेंग की आवश्यक शर्त भी....मूंछे बेतरतीब सी उग रही थी....रोज रेजर पे एक उम्मीद भरी निगाह दौड़ती थी .ओर कशमकश के  साफ़ करूँ या नहीं...... संजीव ओर मैंने लगभग साथ साथ साइकिले खरीदे थी ...फर्क इतना था उसकी मे गोल्डन लाइने थी .....स्कूल जाने से पहले उसके घर के बाहर..... १० मिनट खडा होना मेरा रोज का नियम था......दस मिनट इसलिए   के  वो टॉयलेट    में सबसे ज्यादा वक़्त लगता......फिर आधी कमीज पेंट में खोंस्ता हुआ सोरी -सोरी   कहता हुआ बाहर निकलता..उसी वक़्त .उसकी गली में  दो सहेलिया भी अपने स्कूल रवाना होती.. ब्लू ड्रेस  ओर स्कर्ट  पहने .रेड टाई के साथ.....लडकियों के  बेस्ट कोंवेंट स्कूल सोफिया की ड्रेस थी वो ..मेरे पास से से  गुजरते वक़्त पता नहीं  क्या बुदबदाती  ओर खी  खी करती . उनमे से. ब्राउन आँखे वाली  अक्सर  गली के किनारे  पहुंचकर  पीछे मुड़कर देखती फिर हंसती .... ..मै कई बार टाइमिंग  चेंज करता ..  पर उनकी खी खी रोज मेरी पीठ पे चिपक जाती .....झुंझला कर मै   संजीव पे गुस्सा  होता….. मुझे लगता वो  हमारे हिंदी मीडियम में होने पर हंसती है ...
घमंडी है ....कोंवेंट वाली है न ....

. वो रास्ते में मुझे  बताता
माँ   शहद मिला दूध देती है रात को.....इससे कब्ज नहीं होगा बताता ... जाने कौन सा  शहद था.... पिछले छह महीनो से बे असर था...... 
"साले फीते बाँध लिया करो .किसी दिन बड़े जोर से गिरोगे ...संजीव कहता है .पर मै फीतों को ठूंसकर जूतों में फंसा देता हूँ....मुझसे फीते बंधते नहीं
 र्दिया बहुत अच्छी लगती है ....बस सुबह के उस हिस्से को  छोड़कर जिसमे पापा की पहली आवाज को जानबूझ रजाई से  ओर ढका जाता ....गर्म रजाई को छोड़ना बड़ा तकलीफदेह  काम है  ...मां रोज पानी गर्म करती है ओर मै सिर्फ हाथ मुंह धोकर बाहर निकल आता हूँ....वे धीमे से रोज कहती है ...आज छोड़े दे रही हूँ...कल नहा लेना .शुक्र है पापा का बाथरूम दूसरा है.......
सर्दियों में वो रोज होमियोपेथिक की तीन चार दवाइया चलने से पहले गटकता ...कभी कभी उन सफ़ेद मीठी गोलियों को मै भी ले लेता..उस रोज आफती  धुंध है ..  ....हम मुंह से धुया निकाल कर धुंध से मिला रहे है ... हाथो में  ठण्ड लग रही है ...इसलिए   एक हाथ  जेब में है .......मां  के बुने  ग्लोव्स मुझे फेशनेबल  नहीं लगते .मुझे लेदर के ग्लोव्स चाहिए ...काले ....जैसे हमारी क्लास के नीरज के है ...पर पापा सुनते नहीं ... "तुम्हे  जिद सूट  नहीं करती ' वो अक्सर कहता है .....धुंध में ही हमें जानी पहचानी दो परछाईया दिखने लगी है .....ब्लू ब्लेज़र ....व्हाईट जुराबे ...घुटनों तक.....
आधी धुंध में वे दोनों साइकिल रोके खड़ी है..कुछ परेशां सी....फ़ौरन साइकिल
पर नजर आती है .चेन उतरी हुई है ....कुछ फंसी हुई सी..... 
तुझे कसम है.. गर तू रुका तो....मै पहले ही उसे चेतावनी
  देता हूँ......देखना मत....
पागल है यार .उनका इक्जाम है ...देख कितनी रुआंसी हो रही है ...वो नजदीक आते आते धीमे से फुसफुसाता है

सीधा चल
  .....मै फुसफुसाता   हूँ.....बेक ग्रायूड में उनकी हंसी अब भी मेरे सर में सवार है ...
एक्सयूज़ मी.......कानो में कुछ सुनाई दिया है ....या शायद मेरे मन का
वहम............पर मैंने साइकिल तेज भगा दी है ......ओर तेज........ओर तेज......सर्दियों में भी मेरे माथे पर प"तुने कुछ सुना ".वो कहता है "उन्होंने शायद रुकने को कहा था ....".
नहीं तो ....मै झूठ बोलता हूँ

अच्छा है अकड़ ढीली होगी आज .मै
  कहता हूँ.....पर... जाने क्यों मन थका थका सा ..खाली है..  एक अजीब सी गिल्ट  ब्लेज़र पर  जम गयी  है .....जाने क्यों भारी लगने लगा है
हमें रुकना चाहिए था यार  .”...स्कूल के साइकिल स्टेंड पर साइकिल खड़ा करते वक़्त वो कहता है ..... मेरा ब्लेज़र ओर भारी हो गया है..
करीबन १५ दिन बाद ...किशोर एक पर्पोज़ल लाया है ..सोफिया में फेयर है ...सिर्फ चुनिन्दा स्कूलों को इनविटेशन है ...कोट पेंट ओर टाई का जुगाड़ वो कर लेगा ...हम पांच लोग है .. थ्रिल ओर  डर के मिले जुले   परसेंटेज पर इच्छाये ओर लड़कपन हावी है सो... उस जोखिम  को. उठाने की सामूहिक हामी भरी जाती  .. है.
धडधडाते दिलो से हमने  फेयर के  अन्दर एंट्री कर ली है .सेंत जोन्स में किशोर के दो दोस्त है शुरूआती मोरल सपोर्ट के वास्ते वे कुछ देर साथ है ...मै ओर संजीव आहिस्ता -आहिस्ता एक चौकन्नी बेफिक्री के संग उस ग्रुप से   अलग होते है...ठेठ बोयस स्कूल से पोलिश कोंनवेंटी  लडकियों के बीच पहुंचना भला सा लग रहा है ..कुछ मिनटों के बाद एक स्टाल हमें अपनी ओर खींचता है ..बन्दूक से गुबारे फोड़ने  पर इनाम है  ... हम दोनों दोस्त से पहले दो लड़के ट्राई  कर रहे  है .. स्टाल  वाली लडकिय चीयर्स करती है ..ऐसे प्रोत्साहन कम्बखत ओर नर्वस करते है ...मेरा नंबर आने तक हाथ  पसीने से भर गया  है ... पहले चार  शोट ठीक लग गए है ...मुझे तीन ओर निशाने मारने है...पांच शोटो में से ..आँख  निशाने की ओर साधते वक़्त  जाने क्यों किसी जानी पहचानी नजर को दाई ओर महसूस करता हूँ ....शोट लगाते ही उस ओर देखता हूँ.....ब्राउन आँखे वहां खड़ी है .....शोर मचा है ...शोट ठीक लगा है ...
"चल "पीछे से वो मेरे कान में फुसफुसा रहा है ...पसीने को हाथो से पोंछ जाने  क्यों मै अगला शोट ले लेता हूँ...मन में भगवान् को याद करता हुआ ...भगवान् जी सुन लेते है ..
ब्राउन आँखे हिली नहीं है ...आखिरी शोट है ....आँखे बंद करके वो तुक्का सही बैठ गया है......
मैडम आयी है ..वहां फुसफुसाहट शुरू हो गयी है .....बन्दूक थामे मै किसी मैडम को नजदीक खड़ा देखता हूँ.....
"मैडम . आप प्राइज़ डिस्ट्रीबूट करेगी.."....स्टाल वाली दोनों लडकिया मैडम से रिक्वेस्ट कर रही है ....ब्राउन आँखे चलकर नजदीक आयी है .....तो स्टाल उसका भी है ....
मैडम मेरी ओर मुड़ी है ".वेल डन  माय बॉय" .चश्मा ठीक करके वो मेरे कोट से स्कूल का नाम पढने की कोशिश कर रही है .....
"कौन सी क्लास में हो ...."
मेरी पीठ पर पसीने की एक पूरी लहर पैदा हुई है ओर ऐसा लगता है जैसे मेरे दिल की धड़कन वहां सबको सुनाई दे रही है .....धक्.. धक्
 १२ डी मैडम ...मेरी आवाज ओरिजनल नहीं है ....
गुड मैडम मुझे एक पैकट पकड़ा रही है ....
 मै ब्राउन आँखों को देखता हूँ.....वे मुस्करा रही है ....
उस दिन पहली बार मैंने उसकी आँखों को इतनी देर तक देखा है ...नजदीक से .....वे कितनी सुन्दर है ! मै थैंक-यू कहना चाहता  हूँ ...पर वो मुझे घसीट कर ले जाने लगा है ..... किशोर की किसी से लड़ाई हो गयी है ...पोल खुले  उससे पहले हमें निकलना होगा ......हम निकल गए है!
 उसके बाद की दुनिया मसरूफ है ....१२ में हमारा आखिरी साल .बोर्ड का इक्जाम ...संजीव को सिविल सेवा में जाना है .ओर मुझे मेडिकल में ..हम जानते है ...हमारे रस्ते आगे जुदा होने है ........अगले दो सालो में  मेडिकल एंट्रेंस मेरी   प्राथमिकता  है ....सो उस दुनिया के सफ़र के वास्ते फिलहाल संजीव से उतनी फ्रीक्वेंट मुलाकाते नहीं है .....
 ब्रायून आँखे फिर कभी मिली नहीं.....
 इंदोर जाने वाले यात्री ....कुछ अनायूसमेंट हो रहा है .वो खड़ी हुई है ...एक छोटा बेग लिए वो आहिस्ता आहिस्ता .....चल रही है ...मेरे पास एक सेकण्ड के लिए रुकी है ...नीचे देखती है ....फिर मुस्कराती है .........जहाँ तक नजर जाती है मै  आँखों  से  उसका पीछा करता हूँ....... फिर वो भीड़ में गुम गयी है ...संजीव का नंबर   मोबाइल पर मिलाते   मेरी निगाह नीचे अपने जूतों पर गयी है......फीते अब भी खुले है

83 टिप्‍पणियां:

  1. प्रति व्यक्ति आय दर २० रुपये से कम......केपरीकोन राशि वाले ज्यादा रोमांटिक होते है ....करन जोहर के मुताबिक हिन्दुस्तान में राइटर की कमी है


    हाहा, मुझे ये तीन लाइंस बहुत पसंद आई हैं| होंठों पे मुस्कान तिर आई| कई दिनों से नयी पोस्ट का इंतज़ार हो रहा था|

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  2. कितनी बार चलते चलते ठिठक कर खड़े हो जाते है उन्ही मोड़ों पर जहाँ ज़िन्दगी के कुछ लम्हे छुट गए थे ...कभी किसी इत्र की खुशबू ,किसी टोफ्फी का स्वाद , या जाना पहचाना सा द्रश्य.....

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  3. `.सर से पैर किसी कपडे से लिपटा पूरा जिस्म.है..'

    अगली बार देखेंगे ना तो वह भी जीन्स में दिखेगी--- फारिन की हवा जो लग चुकी होगी :)

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  4. ब्राउन आँखें .... बहुत अच्छी लगी कहानी ...रिचार्ज कूपन तो नहीं होते ..पर मौके आते हैं और हाथ से फिसल जाते हैं ...कहानी खत्म होने के बाद भी दिमाग में कुछ न कुछ चलता रहता है ....अच्छी प्रस्तुति

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  5. दुनिया गोल है और एअरपोर्ट पर तो पूरीतरह ही गोल लगती है.
    पूरा कथानक जैसे अपने आसपास ही घटित होता प्रतीत होता है.और पढते हुए सांस भी लेने का मन नहीं करता.

    वाकई ये सोफिया की गर्ल्स में खी खी करने का अजीब सा एटीट्यूड होता है :)

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  6. sar ji

    hyd aane par kabhi hamse mil to liya kariye ... badi khushi hongi

    vijay

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  7. एकदम सच कहा....
    ऐसे हसीन इत्तेफाकों के रिचार्ज कूपन तो और भी दुर्लभ हैं...

    चेहरे पर मुस्कान बिछ गयी पढ़कर...

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  8. उफ़! कहने को कुछ मिल नहीं रहा. खुले फीते.......भूरी आँखे.......सोफिया का फेयर.........किराये का कोट.................न जाने ये सब क्या क्या कह गया!

    कल्पनाओं से परे एक परिवार की उड़ान!

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  9. ब्राउन आँखे और जूते के खुले फीते ....जो अभी भी न बंधे हो शायद ...दुनिया वाकई गोल है ...न जाने क्यों इसको बहुत डूब कर पढ़ते हुए भी जो जीता वही सिकंदर फिल्म की याद आ गयी :) आपका लिखा हुआ बहुत दिनों तक दिल पर असर करता है जाने अनजाने कोई न पंक्ति याद आती रहती है आपके लिखे की अनुराग जी यही आपके लेखन की खूबी है ...

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  10. WOW...astonishing...amazing...just WOW!!!!!!
    आपके किरदार मन को कैसे बाँध लेते हैं कि उलझी सी रह जाती हूँ.
    काली साड़ी आज भी आपकी फेवरिट है. आपकी एक और कविता थी, काली साड़ी वाली वो मेरी अब तक की सबसे पसंदीदा पोस्ट थी अब ये भी उसी के साथ जुड गयी है.

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  11. खुले तस्मों के भीतरी और बाहरी वृतों में, एक सिनेमा स्कोप कविता को पढना... सुखद, बहुत सुखद.

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  12. जहाँ पर कुछ करने को न हो, समय बिताना एक बड़ा कार्य है, कलात्मक भी, जुड़ात्मक भी।

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  13. उस उम्र में ऐसा ही होता है स्वाभिमान ओर "इगो" में जरा सा फासला होता है एक ऐसी लड़की जो आपके फीते खुले देखकर हंसती है आप के इगो को हर्ट करती है आप उसके लिए मन में एक बायस बिठा लेते है ओर जब समझते है तब तक . ये भी अजीब इत्तेफाक है के उस शख्स से आप उम्र भर बात नहीं कर पाते .पूरी घटना को अगर एक सिरे से देखे तो ह्युमन नेचर लड़कपन का एक शेड दिखाती है के कैसे सोच किसी पोजिटिव बिहेवियर से बदलती है ओर आप को एक शख्स खूबसूरत लगने लगता है .
    कई टुकड़े दिलचस्प है जैसे बर्न फ्री के साथ बुर्के में बंद लड़की
    औरतो के पैदा होते ही रवायते बर्थ सरटिफिकेट के साथ स्टेपल हो जाती है “...
    ख़ूबसूरती अपना स्पेस भीड़ में भी तलाश लेती है
    खूबसूरत लोगो को अपनी ख़ूबसूरती का इल्म होता है
    ओर हाँ आज किसी ने इत्तेफाक से मुझे एक एस एम् एस भेजा
    loving hundred wrong persons may not even affect your life ,but hating one right person may disturb your whole life .

    सुना है आप यमुना नगर भी आये थे .जाने दीजिये
    अरसा हुआ आपकी त्रिवेणी पढ़े कुछ डालिए

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  14. आपको पढ़ते हुए लगता है कि एक तरह की बातें अलग अलग परिवेश में, कई जगहों और कई समयों पर होती रहती है. बहुत कुछ एक जैसा ही होता है...

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  15. इत्तेफाकों के रीचार्ज कूपन्स नहीं होते ...सही कहा ...वरना हमने भी खरीद लिए होते इस बार के मेरठ प्रवास के दौरान ...
    आपका लिखा हुआ हमेशा ही एक आम बात को भी कुछ ख़ास बना देता है ...

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  16. आपको पढ़ना ...यानि वसंत को पढ़ना ...!!!

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  17. कहीं दिल के डाक्टर तो नहीं होने वाले थे डाक्साब. जो गलती से चर्म में उलझ गये. दिल में सीधे उतर जाते हो जनाब बिल्कुल इन्जेक्शन की सुई के माफिक... पता भी नहीं चलता कि कब अन्दर गई और पूरी दवाई उतार दी..

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  18. .
    .
    .
    ओह वही ब्राउन आंखें... कैसे लिख लेते हो ऐसा डॉ० साहब... अपने भी बहुत से पुराने जख्म खुल जाते हैं...


    ...

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  19. मै ब्राउन आँखों संग कई साल पीछे दौड़ जाता हूँ......
    यादें जैसे बीते लम्हों को एक बार फिर से जीने का मौका होती है.किसी मरीचिका की खोज सी..
    चेखव की एक कहानी में गाँव की मास्टरानी एक शाम घर लौटते हुए crossing पे ट्रेन के गुजर जाने का इंतज़ार कर रही है-शाम के सर्दीले धुंधलके में.कुछ देर बाद ट्रेन गुजरती है.अचानक ट्रेन के डिब्बे में उसे डबडबाया सा चेहरा दिखाई देता है .हुबहू अपनी माँ का चेहरा,हालांकि उसकी माँ वषों पहले मर चुकी है,लेकिन चेहरा वही है,वही दो पहचानी भीगी आँखें.एक गुजरती हुई गाड़ी में अपनी मरी हुई माँ का चेहरा...उसकी झलक पाना ऐसी ही यादें होती है....कभी खट्टी कभी आपकी ब्रायून आँखों वाली की तरह मीठी;)

    ..बेतरतीब सी ख्वाहिशे है,गैरवाजिब सवाल है....कई शुबहे या फिर कोई कन्फेशन ..जो भी हो आप अलग ही अंदाज़ में यादों की पिटारी की किसी खास नियति या स्थिति को साफ़ खोल देते है...

    और वो तो बस आधा मिनट ही रुकी और आप तो.....असहज भी थे फिर भी... एक.गोरा गोल चेहरा ...बड़ा सा जूडा .माथे के ठीक बीचो बीच एक बड़ी सी गोल बिंदी....काली साड़ी.जिसके बोर्डर पे लाल रंग है ... ;)

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  20. काली आँखें गुर्राती रहीं 10 मिनट तक और मैं पढ़ता रहा ब्राउन आँखें....! अब कम्प्यूटर बंद करता हूँ..लगता है दिखेंगी आज सपने में..ब्राउन आँखें!

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  21. इस पोस्ट का तो शीर्षक ही बहुत कुछ बोलता है ...इस पर यही कहूंगी कि कुछ इत्तेफाक इतने खूबसूरत होते हैं कि दिल यही करता है कि काश इनको रिचार्ज कर सकते!
    ---पोस्ट पढ़ने फिर आती हूँ..

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  22. हैदराबाद एयरपोर्ट पर खुले फीतों की ब्राउन आखों में उड़ान ... लेंडिंग अतीत के पीले पन्नो पर.... एक ताज़ा हवा का झोंका महक छोड़ता आस-पास... वन लाइनर या गड्डी भर मुस्कान के बोर्डिंग पास :-)

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  23. आजकल एक गाना सुनने को मिलता है कत्थई आन्खो वाली एक लडकी ........और आप्ने जिक्र किया भूरी आन्खो वाली लडकी का . समानता है क्या

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  24. एयरपोर्ट ने मुझे दुनिया गोल होने का तकरीबन तीन चार बार सबूत दिया है .अलबत्ता ये भी इत्तेफाक की बात है ...जिससे इत्तेफाक चाहते है ...वो इत्तेफाक नहीं मिलता...यूँ
    लिखते रहना एक अच्छी जिद है ...लिखते लिखते मै सच लिखना चाहता हूँ फिर भी किसी झूठ की गुंजाईश बची रह जाती है .....
    संजीव सिविल सेवा में नहीं जा पाया इसका उसे आज तक मलाल है बावजूद इसके के वो एक्स्साइज़ विभाग में ऊँची पोस्ट पर काबिज़ है ..उस रोज उसने उस वक़्त फोन नहीं उठाया .तो मैंने यही एस एम् एस उसे किया था ....इत्तेफाको के रिचार्ज कूपन नहीं होते दोस्त '
    आज भी उसकी वही आदत है ...टोइलेट में ज्यादा वक़्त लगाना ...नियामत है के ..वो बचपन के उन दोस्तों में से है जिनके साथ समझ ओर दोस्ती वैसी ही है जैसे उस जमाने में ... ..हम पांच दोस्त थे ..... सर्दियों में हम अक्सर भूखे पेट घर से चलते ओर स्कूल के पास वाली गली में हलवाई के यहाँ से लगभग रोज पूरिया खाते......सुबह सुबह दोने में आलू -पूरी की सब्जी के साथ उसकी पूरिया ...उसका समोसा भी बहुत अच्छा था ...बीच में से उसे तोड़कर ...उस पर अचार का मसाले के साथ चटनी लगकर खाने का जायका आज भी जीभ पर है .किशोर के साथ शोर्ट लिव्ड दोस्ती रही....कुछ ही महीनो में हमने देख लिया था हमर फ्रीक्वेंसी मेच नहीं होएगी.....अलबत्ता इम्र के उस दौर पे आपको कभी आदर्शवाद के दौरे पड़ेगे .ओर कभी ....छिछोरेपन के .....बारहवी का साल था .बोर्ड का हल्ला .....पिता जी उन दिनों बड़े सख्त हुआ करते थे ...मुझे याद है लेदर के ग्लोव्स मैंने मां को पटा कर लिया थे ....घर से निकलते वक़्त मैंने उनी ग्लोव्स पहनता..बाहर जाते ही लेदर के काले ग्लोव्स ......मांये ऐसी ही होती है बच्चो से जल्दी पट जाती है .....शायद उनके जींस में ही ये डिफेक्ट खुदा ने जान बूझ के छोड़ा है ....तब पेमेंट क्रसिस जैसा कुछ नहीं होता था .....क्रिकेट की लेदर बोल हो ....या समोसों की बात....सब कुछ बाँट कर ...हिसाब से किया जाता था ...सिक्को की तब बड़ी वेल्यु होती थी ......
    जूते के फीते आज भी मुझसे स तरह नहीं बंधते के पूरे दिन बंधे रहे .....अब इतनी सहूलियत है के बिना फीतों वाले जूते अफोर्ड कर सकता हूँ.......बरसो बाद सोफिया स्कूल में एक टॉक देने जब बतोर डॉक्टर गया .....तो मन किया था फिर संजीव को एक एस एम् एस कर दूँ......

    कभी कभी ये सोचकर लिख लेता हूँ
    के शायद पढ़ लेगी वो कही....

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  25. बहुत बार होता है ऐसा जो हमें खिंच कर अतीत में ले जाता है..कोई आवाज़ ,कोई चेहरा,किसी के हाव भाव ,तो किसी की आँखें!
    अक्सर 'भूत 'से लौट कर वापस आने तक वर्तमान भी हाथ से छूट जाता है..सिर्फ छोड़ जाता है कुछ प्रश्न..आखिर वो नज़रें ठहरी तो क्यूँ ठहरीं?क्या ये' वहीँ तो नहीं हैं?
    हर किसी में इतनी उन्मुक्तता नहीं होती कि उस पल का रोक सके इसीलिये अक्सर भूत से वर्तमान का मिलान करने की कोशिश में वक्त फिसल जाता है और चाह होती है कि काश इत्तेफाक का रिचार्ज हो सकता! तो किसी नंबर के लिए फोन देखने की ज़रूरत नहीं होती ..
    न जाने कितनी बातें दफ़न होती हैं ज़हन में जो ऐसे संस्मरण पढ़ कर जी उठती हैं..

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  26. अलबत्ता ये भी इत्तेफाक की बात है ...जिससे इत्तेफाक चाहते है ...वो इत्तेफाक नहीं मिलता.
    'आप की ही सिगेरेट के डिब्बे पर लिखी एक नज़्म याद हो आई..कुछ अरसा पहले ही दोबारा पढ़ी थी ..
    'ये भी क्या कम इत्तेफाक हुआ है मेरे साथ ,हर शै मिल जाती है इत्तेफाक़न वो नही मिलता'
    ...

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  27. iktephak ke koopan ri-charge nahi hote.

    abhi sirf ye heading pe soch raha hoon....

    'apne abhitak 'lapoojhanna' ke bare
    nahi bataya....ye continue kyon nahi
    ho pa raha......apne khud 'kawn-kawn'
    blog swami ko iski recomendation ki
    hai....ummeed hai kuch to batayenge

    phir ate hain....sam ko

    dil ki bat ko dil se salam
    aur apko khali......pranam.

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  28. बस सोचा कि आपको बता दूं की आपकी कलम का कमाल बढ़ते ही जा रहा है !!
    आप ऐसे लिखते हो जैसे हम जीने लगते हैं पूरा वाकया ... नॉर्मली लम्बे पोस्ट पढने के बाद खुशी होती है कि "थेंक गोड" ख़त्म हुआ :) , मगर आपाकी पोस्ट के बाद दुःख होने लगता है कि "किन्नी जल्दी ख़त्म हो गया ,अभी तो जीने में मजा आया था " ...

    सुबहानल्लाह ....

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  29. केपरीकोन राशि वाले ज्यादा रोमांटिक होते है..=Agree..:)

    ख़ूबसूरती अपना स्पेस भीड़ में भी तलाश लेती है. = कमाल का observation .

    मांये ऐसी ही होती है बच्चो से जल्दी पट जाती है .....शायद उनके जींस में ही ये डिफेक्ट खुदा ने जान बूझ के छोड़ा है = Fully Agree :)) ऐसी ही माँ मैं भी हूँ .haha

    घमंडी है ....कोंवेंट वाली है न = कॉन्वेंट वाली घमंडी हों जरुरी नही ...:))

    उसके बाद की दुनिया मसरूफ है ....१२ में हमारा आखिरी साल .बोर्ड का इक्जाम ...
    =वक्त के साथ ये मशरूफियत बढ़ती ही क्यूँ जाती है ?? :((

    आज बहुत दिनों बाद आपके ब्लॉग पर आना हुआ Drsb मगर वापस स्कूल days पहुंचा दिया आपने ...अंतहीन यादों के सफ़र पर ....आपकी कलम के लिए hats off really .

    इक नॉन ब्लॉगर बचपन की मित्र ने बहुत उत्त्साहित होकर कहा इस ब्लॉग पर इस वाक्ये को पढ़ तो जरा .....मगर उसकी आँखें ब्राउन नही ....:)

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  30. अभी तो कमेंट पढ़ने आया था...आपका भी पढ़ने को मिल गया..
    ब्लॉग की घड़ी ठीक समय नहीं बताती..मैने रात 12 बजे लिखा था..इसने पूर्वाह्न 10.43 छापा!

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  31. रात के तीन बज रहे हैं डॉक्टर साहब. औऱ आपको पढकर कमबख्त जिस इत्तफाक का इंतजार कर रहे हैं वो न होने का मलाल फिर से होने लगा है। रात तीन बजे कुछ ज्यादा ही शिद्दत के साथ। औऱ जो इत्तफाक सही मायने में होते हैं उस समय तो हम बस सोचते ही रह जाते हैं, समझ ही नहीं आता कि क्या कहें, क्या करें।

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  32. आपको कमेन्ट करते वक़्त मैं असहज हो जाता हूँ.. अगर ज्यादा इमोशनल कमेन्ट कर दिया तो आप हंसने लग जाओगे और बोलोगे साला नाटक कर रहा है..
    इस पोस्ट को बाज लम्हों में होना चाहिए.. डाल देना साहब..!!

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  33. आपको तारीफ सुनने की बुरी आदत है :-) सभी तो कर रहे है ..हम नहीं करते इस बार ......जरा बताइए तो ...ये वही टीचर थी ना ?

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  34. बहुत समय बाद आया हूं। लेकिन एक बात कहूंगा कि आप बंदे बहुत ख़राब हो। आदमी पढ़ने के बाद भी जब तक किसी दूसरे काम में व्यस्त नहीं हो जाता पढ़ता ही रहता है ख़ुद में आपको, खोया सा, गुम सा............।

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  35. रचना कहना ठीक नहीं शायद इसे...संस्मरण ....मजेदार और बहुत जीवंत..कई जगह अचानक से हसी आई ..आपका लिखा कुछ भी पढते वक्त लगने लगता है की हम वहीँ पहुच गए हैं..और आप ही के बगल में बैठकर वो सब होता देख रहे हैं.अच्छी बात ये है की आप अपने अनगिनत अनुभव,जो बहुत ही स्वाभाविक होकर भी ख़ास होते हैं, यहाँ शेयर करते हैं.और इसके लिए "धन्यवाद"
    :)
    आपको खुद भी अपना ब्लॉग बहुत पसंद होगा,नहीं?

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  36. 7.5/10

    बरखुदार आपके लेखन में एक बहुत बड़ी खामी है. गर सरसरी तौर पर पढो, तभी तक सही रहता है .. मगर जैसे ही तवज्जो देकर पढना शरू करो तो अपने साथ बहा सा ले जाता है.

    मैंने गौर किया आपके अभी तक के पोस्ट टाईट्ल्स पर .. बहुत ही ख़ास से लगे. आप कहाँ से लाते हैं ??? कमाल है जनाब.
    एक बात तो कहनी ही होगी कि आपके लिखने की एक ख़ास स्टाईल है .. एक पहचान है ,,, बहुत बड़ी बात है ... इसी स्टाईल के लिए लोगों की एक उम्र गुजर जाती है.

    जिंदाबाद

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  37. आपकी लेखनी में अद्भुत क्षमता है , जब भी चलती है कुछ अनूठा ही निकलता है बाहर,
    आज सुबह ब्लॉगर गलियारों में घुमते हुए, आपके ब्लॉग द्वार पर पहुँची, वैसे आपकी त्रिवेनियों की मुरीद मैं तीन साल से ऑरकुट कम्युनिटी gulzaariyans से ही हो गयी थी, पर आज ब्लॉग पर आना अत्यंत सुखद रहा | सुबह से यहीं डेरा जमाये हूँ ,सब लेख, सारे archives पढ़ चुकी हूँ, पर ऐसा लग रहा है काश अभी और कुछ पढ़ने को भी होता, इसलिए सब links तलाश लिए,
    समझ नहीं आता कौनसा लेख सब से अच्छा है,जिस पर टिपण्णी दूं , फिर लगा आखिरी लेख पर ही करना उचित होगा , क्योंकि सर्वोत्तम का निर्णय करने की योग्यता मुझमें नहीं है|
    आदर सहित
    शिल्पा

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  38. यादों की पगडण्डी कहीं से भी निकल पड़ती है और उस पर चलना इतना सुखद हो सकता है, इसे पढकर ही पता चलता है.
    और ये भी कि यादें किसी रिकोर्डर की तरह जमा नहीं होती इसलिए उनको बाहर लाने के लिए 'इस तरह'की शीरीं-कलम चाहिए.

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  39. सुभानाल्लाह ......!!
    उस्ताद जी का कमेन्ट चुरा रही हूँ......

    मैंने गौर किया आपके अभी तक के पोस्ट टाईट्ल्स पर .. बहुत ही ख़ास से लगे. आप कहाँ से लाते हैं ??? कमाल है जनाब.
    एक बात तो कहनी ही होगी कि आपके लिखने की एक ख़ास स्टाईल है .. एक पहचान है ,,, बहुत बड़ी बात है ... इसी स्टाईल के लिए लोगों की एक उम्र गुजर जाती है.

    छोडिये ये डाक्टर गिरी अनुराग जी .....
    जब मिलेंगे तो देखूंगी फीते बंधे हैं या नहीं ......

    उत्तर देंहटाएं
  40. dr sab lappujhanna ke koopan .... kya
    iktephakon ki tarah richarge nahi hote....

    aur ye rahi post par tippani 'ustadji
    jindabad'

    pranam.

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  41. बढिया संस्मरण है अनुराग जी. और बड़ी परम्परागत रूपरेखा है आपकी ’ब्राउन आंखें’ की.... :) तरस गई हूं, मीनाकुमारी स्टाइल की ऐसी खूबसूरती देखने को, सच्ची.

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  42. Mere Upnyas me ek jaanlewa haseen haadse ki baat hai:

    Nayika ke zehan me achanak ek kaundh hui :

    "Jinhen band hote-hote zamaane lage
    kambakht wohi safe fadfadaane lage
    O, Barf-jani! ab to pighal!
    Tujh pe aaftaab mandraane lage."

    Anuraag ke chaahne waalon ko dekh kar oopar likhi ibaarten use de deen.

    Ab toh sambhal! Sambhaal!

    Chalo, Saali hi sahi
    Zidagi hi sahi
    Gaali hi sahi
    Muft ki gharwaali hi sahi !
    Jaisi bhi hai
    hamaari hai
    Kambakht Maut se toh laakh pyaari hai !

    Yahaan do baar barf aa chuki.
    Khoob aag taapi.
    Chalo, ham kahin aur chalte hain.
    GO-AA ?
    Ye Jaa aur wo Aaa.
    Go- Aa !

    Ham sab tumhen yaad kiya karte hain.

    उत्तर देंहटाएं
  43. ऐसे संस्मरण हमेशा मन को गुदगुदाते हैं..अपनी स्मृतियों में झाँकने को विवश कर देते हैं। अच्छा लगा पूरा वाक़या पढ़ना।

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  44. आपकी और भूरी आँखों वाली की, दोनों की याददाश्त बहुत अच्छी है :)

    उत्तर देंहटाएं
  45. आपके लेखों की ताजगी का मैं कायल हूं।



    फीते खुले ही रहें तो अच्‍छा है...

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  46. Kali sadee, brown aankhen, sofiya school ka fair, khule feete iske sahre kasee khoobsurat kahanee gadh lee aapne. aur han hyderabad ka airport bhee aur Anurag wo kaise bhool sakte hain.

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  47. मैने भी सोचा उस्ताद जी का कमेन्ट चुरा लूँ मगर अजीब इतेफाक है त्रभी हरकीरत जी ने चुरा लिया। मुझे लगा जैसे मै कोई फिल्म देख रही हूँ--- नदिया जैसा बहाव आपके शब्दों मे। दुनिया गोले तो पहले से है लगता है अब बहुत छोटी सी हो गयी है एक बिन्दू की तरह । शुभकामनायें। अगली पोस्ट फीते बाँध कर लिखें।

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  48. आपकी शैली बहुत अच्छी है.

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  49. pahle ye batao wo brown aankhon wali tumhe dekhkar muskurayi kyo...? farz karo wo bhi kaheen koi blog likhti ho aur yahi story usne bhi apne blog par likhi ho..kali aankho wala ek ladka...aisa hi kuch. tab to doule ittefak ho jayega.

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  50. आज पहली बार आपके ब्लॉग पर आया हूँ बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति ,अच्छी रचना , बधाई ......

    उत्तर देंहटाएं
  51. @तकरीबन हर पांच मिनट बाद .....सामने बैठी गुजराती फॅमिली में से एक १२ -१३ साल की लड़की हर बार इस "मिस यू " को सुनकर अपने प्ले स्टेशन से आँख ऊपर उठाती है...एक मिनट देखती है ....फिर खेल में लग जाती है ....


    कितनी खूबसूरती से शब्दों की चाशनी में उन किशोरावस्था की भावुकता को बयान किया.


    शायद ब्राउन इस पोस्ट को पढ़ रहीं होंगी...

    निशब्द....

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  52. @pallavi...कोई पुराना जान पहचान का मिले है तो चेहरे पर मुस्कान आ ही जाती है .शायद बाकी कुछ पढने वालो की तरह तुम भी समझ नहीं पायी.....के वो वही थी ब्राउन आँखों वाली....ओर एक बार फिर हम बिना बोले जुदा हुए.........

    वैसे एक बात ओर है .....मेरी भी आँखे ब्राउन है....

    उत्तर देंहटाएं
  53. 'i am born free' so lekar 'feete ab bhi khule hain' tak....ufff....kya likha hai sir aapne, vo brown aankhein fir kabhi nahin mili.....

    awww....poora padhte padhte kahin kho gayi...kahan tak baareeqi se koi bataaye ke kya kya accha laga, aur kya kya bohot accha laga...in total, aapka andaaz-e-bayaan bohot bohot hi kamaal ka hai....pleasure reading u

    उत्तर देंहटाएं
  54. अक्सर आपको पढ़ते हुए बीच-बीच मे पॉज लेने पड़ते हैं..जैसे कि एक्लेयर्स को जीभ तले दबाते हुए आप पॉज ले लेते हैं..चॉकलेट के मुँह मे आहिस्ता घुलते जाने से ठीक पहले..जब आप सिर्फ़ उस पल की खूबसूरती को जी रहे होते हैं..ऐसे पल बिखरे हुए हैं आपकी पोस्ट मे..अक्सर बिखरे मिलते हैं आपकी पोस्ट्स मे..जहाँ जो कुछ है..बस मौजूद है वक्त के उस खास हिस्से मे..!आपके फ़्लैशबैक्स पढ़ने वालों को भी स्मृतियों की उसी दुनिया मे छोड़ जाते हैं..जहाँ वे वक्त का हर फ़्रेम..जेहन का हर ताख टटोल लेते हैं..कि ताख मे बिछे किस कागज़ तले को याद रखी हो छुपा कर..मगर आपकी स्मृतियों का यह सेपिया-टिंटेड वैभव सबकी यादों मे नही मिलता..जहाँ वक्त ने एक खास शॉट फ़्रीज कर के रखा है..हमेशा के लिये..यादों के म्यूजियम के वास्ते..मौका मिले तो क्या वापस लौटना चाहेंगे उसी फ्रेम मे..जहाँ धुंध भरी सर्दी के बीच कोई लम्बे बालों वाला लड़का तेज साइकिल को अचानक ब्रेक मारता है दो परछाइयों के बीच..और अपने जूतों के आवारा तस्मों को कसने से पहले किसी ठहरी साइकिल की फसी चेन को निकालने मे जुट जाता है..अपने दोस्तों की दबी चेतावनी के बावजूद..जहाँ कोई निश्छल हँसी की चिड़िया किन्ही भूरी आँखों से उड कर उस लड़के के कंधे पर बैठ जाती है..और आस-पास गुनगुनी धूप बिखर जाती है..! जिंदगी के हर रास्ते से कितने रास्ते निकलते हैं..मगर हमें सिर्फ़ एक रास्ता ही चुनना होता है..बाकी सारे रास्तों का अनदेखा वैभव छोड़ कर..!वैसे उन आँखों को हर बार पीछे छोड़ देने की कोशिश किसी किस्म का सैडिज्म था या कोई कॉम्प्लेक्स..?..मगर आप भी कहानी लिखते-लिखते हमेशा बीच मे ढेर सा स्पेस छोड़ते जाते हैं..
    एस एल आर की साइकिल हमारे सपनों मे भी पूरी की पूरी समा जाती थी..उस वक्त मे..जब आँखें भी बदन के अनुपात मे बढ़ती थी..और अब भी मेरा आधा दिन जूतों के फ़ीते बाँधने मे (अरे दूसरों के नही अपने) जाया होता है..कम्बख्त!
    कुछ इत्तफ़ाक बिना रिचार्ज कूपन के ही बस सरप्राइज की तरह जुड़ जाते हैं..आपकी यादों के टाकटाइम मे!! :-)

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  55. aapko padna achha lagta hai....lagta hai, kuchh achha pad rha hu.

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  56. आज प्रथम बार आपके ब्लॉग पर आई, आपके रचनासंसार से साबका हुआ। कहानी अभिभूत कर गई। मेरा मानना है सबको अभिभूत करेगी ये कहानी। आपने वाणी वाणी ही ऐसे प्रसंग को दी है।............................बहुत हृदयानुञ्जक है............

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  57. "तुम तो प्रेम-कहानियाँ नहीं लिखते हो ना डा० साब?"

    हा ! हा!!

    अद्‍भुत...उन ब्राउन आँखों का तिलिस्म कुछ इस कदर पोस्ट से बाहर निकल कर तमाम पढ़ने वालों को अपने गिरफ़्त में ले रहा है कि उफ़्फ़्फ़...उफ़्फ़्फ़...उफ़्फ़्फ़!

    फिर पढ़ते-पढ़ते सोचने लगा कि भूरी आँखों का तिलिस्म जितना "ब्राउन" कहने से उभर रहा है उतना भूरी से नहीं। ऐसा कैसे कर लेते हो आप?

    फीते अब भी खुले का पंच सब कुछ कहे दे रहा है आखिर में। वल्लाह...

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  58. बकौल मनोहर श्‍याम जोशी- जूतों का फीता खुले रह जाने का भी कोई जीन होता है क्‍या.

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  59. ab tak nayi post nahi lagi hai.....ye to main do baar padh chuka hun...hehehe.... padh ke rashk hua...ghatnaon ke liye nahi...likhne ke liye.... intezar karte hue bhoori aankhon se takrana aur fir flash back men jana...ye sab ek dum cinema ke jaisa chalne lagta hai is post ko padhte hue... :)

    उत्तर देंहटाएं
  60. आंखों के रास्ते मन में समा गये इत्तेफाकों के निगेटिव जरुर मन में सुरक्षित रह जाया करते हैं, जब मन चाहे यादों के प्रिंट निकल सकते हैं।
    ऑर्कुट, फेसबुक और ब्लॉग जगत के जरिये तो ज़िंदगी इस तरह से वर्तमान और भूत के फ़्लैशबैक का संगम बनती जा रही है कि कब कौन कहाँ टकरा जाये इत्तेफाक भी रिकार्ड रखने में शर्माने लगा है।

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  61. देर से पहुंचा हूँ...समझ नहीं आता के आपके ब्लॉग पर ही पहुँचने में देर क्यूँ हो जाती है...अच्छी चीजें आसानी से मिलतीं...इत्तेफ़ाक से मिलती हैं...क्या हसीन इत्तेफ़ाक है ये...
    पोस्ट एक बार पढ़ी..दो बार...चार बार...दस बार...मन नहीं भरता...ऐसी पोस्ट्स से किसका मन भरा है...भर ही नहीं सकता...येही तो खूबी है, आपके साथ साथ हम भी उन गलियों में घूम आते हैं जो कभी बहुत प्यारी थीं लेकिन आज मुश्किल से याद आतीं हैं...वक्त कितना बेरहम होता है...नहीं?

    नीरज

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  62. ब्लॉग पर आकर हौसला बढ़ाने के लिए आपका बेहद शुक्रिया डॉ. साहब...उम्मीद है कि हौसलाअफ़ज़ाई के ऐसे इत्तेफ़ाक भरे रीचार्ज कूपन मिलते रहेंगे !

    उत्तर देंहटाएं
  63. aaj bade dinon baad blog likhne baithi lekin net me kuchh problem ho gayi aur hindi type hi nahi ho paya so sochi ki chalo time ka sadupyog kar len kuchh padhkar....aur isi itefaak se anilkant ji ke blog me aapki tippani padhi to laga ki chalo dr.sahab kya likhte hain chal kar dekhen...yahan aakar pata chala ki aaj tak kya miss kiya....aisa lekhan OHH MY GOD..

    "aise log gullak ke mafik hote hain..."..."jooton ke feete nahi bandhte.."..."aaj chod deti hun kal naha lena.."...."aise protsahan kambakht aur narvs karte hain.."

    is post ko padhkte hue aapki zindagi ke saath ek lagaav ho gata hai....brown aankhen to meri bhi hain..lekin hansne ki aadat itni bhi nahi..shayd isliye hi wo brown aankhen sabse alag aur khaas hain....i wish ki wo aapki post zarur padhe..aur haan ek raay manen to joote ke fite bandhna sikhiye hi mat...

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  64. आपका कमेन्ट आना अच्छा एहसास देता है....आपकी लेखनी की बड़ी प्रशंसक हूँ मैं.और ऐसा बहुत कम होता है. :)

    वो जो यथार्थवाद होता है आपके लेखन में वो अन्दर तक कही पहुच जाता है.

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  65. जय श्री कृष्ण...आप बहुत अच्छा लिखतें हैं...वाकई.... आशा हैं आपसे बहुत कुछ सीखने को मिलेगा....!!

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  66. anuraag ji itefaaq ke koopan recharge ho chuke hain aab kush aur bhi likhiye. padhne ka bahut maan ho raha hai.

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  67. मुई रूह को खूब झन्झोड डाल रहे हैं...

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  68. भई, फ़िदा हो गए हम तो....
    लम्हों को जीना और उस जीने को इस तरह बयां करना...सीखने लायक अंदाज़ है।

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  69. agar kabhi is blog ke post kitab ke roop me bajar me biki to mujhe isme jara bhi aschrya nahi hoga...aur wo kitab hot cake ki tarah stall se gayab hoyae to aur bhi aaschyra nahi hoga!

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  70. mana ke 'iktaphakon ke koopan re-charge nahi hote' lekin naya charge
    to mil hi sakta hai apke soujanya se.

    pranam.

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  71. 22 नवंबर और आज 28 जनवरी, तकरीबन दो महीने का फासला, ऐसा कैसे हो सकता है डाक साहब, कि दो महीने यूं ही गुजर जाएं और आप कुछ न लिखें न कोई त्रिवेणी, न कोई किस्सा, कुछ तो लिखिए, आपके ब्लाग पर ऐसी खामोशी अच्छी नहीं लगती।

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  72. बहुत संजीदगी से अभिव्यक्त किया है आपने हर भाव को ...आपका प्रस्तुतीकरण बहुत अच्छा है ...शुक्रिया आपका

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  73. अब करण जौहर के पास जिगर नहीं है प्रयोग करने का तो यह कहना ही पड़ेगा ना की हिंदुस्तान में राइटर की कमी है. दस नाम तो हम सुझा दें

    आपही की तर्ज़ पर "सबके पास अपने हिस्से की ब्राउन आखें हैं "

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  74. bahut achchha likhte hain aap Dr.Anurag. purani yadon ko samet kar shabdon ke zakhire taiyyar kiye hain aapne aur unhe ham jaiso par fenk maara hai, par ye chot aaram detai hai........! lage rahiye.

    उत्तर देंहटाएं
  75. .दुनिया भर में घूमने का शौक है उसे ... ऐसे लोग गुल्लक की माफिक होते है ...ढेरो तजुर्बे अपने भीतर जमा किये.......

    Aapke post "hazelnut coffee" wale hote hain. Naukari duniya bhar ghuma rahi hai. Airport, checkin aur queues jaise zindagi ka hissa ho gaye hain. Is thakavat aur bheed se alag hokar, jaise aapne kaha .. introspection ... ek Cappuccino-with-hazelnut lekar aksar kisi ekant mein baithna ....
    Aaj shaam ki meri coffee ke saath, mujhe pata hai, aapka yah post zaika deta rahega ..

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  76. Mera post publish na karein to koi dikkat nahi. Jahan pahuchana tha wahan pahuch chuka hai!

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कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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