2011-01-29

कभी चलना आसमानों पे ...मांजे की चरखी ले के ...


खांसते बच्चे . ओर  बूढ़े मोहल्ले एक से लगते है
मै जब बड़ा हो जाऊंगा....बस अड्डे के पास मकान नहीं बनाऊंगा ......मै रजाई से मुंह निकालकर  कर पापा से कहता हूँ...किसी फाइल में डूबे  पापा सिर्फ" हूँ "करते है ... सवेरे सवेरे  हमारे उठने से पहले  पापा रोज दिल्ली जाते है ......रात देर में  घर आते है ...मै अक्सर कोशिश करता हूँ उनके आने तक जगा रहूं...उन्हें पतंग पसंद नहीं है ... मां सुबह जल्दी उठ जाती है ...दिन भर काम करती रहती है. ...मुझे  पतंग उडानी बहुत अच्छी लगती है ..आज मैंने पहला  पेचा काटा है ....वो भी राजू भैय्या  का ..राजू भैय्या बहुत अच्छी पतंग उड़ाते है ..पापा को पतंग क्यों पसंद नहीं है ?...
मां से मंजे के लिए  पैसे मांगू तो कहती है सारे खर्च हो गए ...मेहमानों के बिस्किट लाने में ...मेहमान .रोज  आते है ..ढेर सारे!!  बस अड्डे के पास हम  रहते  है  …किराये  के  मकान  में  … थापर नगर गली नंबर चार में……बस अड्डे से मोहल्ले में खुलती  गली जिसकी एक  दीवार पर ना जाने कौन  फिल्मो के पोस्टर चिपका जाता है   ...थोडा आगे चलकर एक मंदिर....जिसका लाल आँखों वाला  पुजारी  मुझे  उछल  कर घंटा बजाने पे घूरता है ....मुझे मन्दिर आना पसंद नहीं है पर  स्वेटर वाली आंटी आम पापड़ का मीठा पेकेट देती है ..इसलिए उनके साथ आता हूँ……..गाँव से मेरठ  चले   किसी  भी  काम के वास्ते चले  शख्स   की    ..हमारे घर  हाजिरी   तय    है  ……..... मम्मी- पापा किसी ज़मीन की बात कर रहे   है ... ..मुझे   नींद ने घेरना  शुरू किया है ....मै जगे रहने की कोशिश  कर रहा हूँ...बीच बीच में कुछ आवाजे सुने देती है ...पैसा .लोन...ढाई सौ गज...आहिस्ता - आहिस्ता   सारी आवाजे खो  जाती  है  … … कोई मुझे  रजाई  उड़ाते  वक़्त  प्यार कर रहा है ..चुभती  दाढ़ी ...पापा है .....
उम्मीदों के आसमान  में यकीनो  के मांजे
सुबह  उठता  हूँ पापा  चले  गए  है  … मां  उन की केप   पहना  रही  है  ..मुझे  केप  पहनना पसंद नहीं ..बाल कैसे चिपके चिपके से हो जाते है 
"मुझे  मंजा  लाना  है  मम्मी " …….... मां जैसे सुनती नहीं ...सीधे केप से  कान ढँक देती है ....स्कूल   पास  ही  है .. मै  पैदल  चल कर जाता हूँ..... स्कूल के नीचे बायीं ओर एक पोस्ट ऑफिस है ..जिसमे काम करने  वाले सारे बूढ़े है ..सब के सफ़ेद बाल है  ...दाई ओर एक नाई की दूकान है जिसे चलाना वाला कोई रिटायर्ड फौजी है ... उसे  "कटोरा कट" काटने में बड़ा मजा आता है ..छोटे छोटे बाल...मां अक्सर उसकी धमकी देती है.......गेट   पर   देव  खड़ा  है .... ऊँचा   है ओर मोटा भी...आते जाते  मेरी केप उतार देता है .....मुझे  उससे  डर  लगता  है  ..ओर मुझे वो  पसंद नहीं .....मै  साइड  से  निकल  जाता   हूँ ...आजकल  विनीत  मेरा  नया  पार्टनर  है ....अपने हाथ में वो एक लाल रंग की गाड़ी मुट्ठी  में दबाये रखता है ..क्लास शुरू होते ही उसे बेग की जेब में रख देता है ....
...लंच  में  .. मै टिफिन खोलता हूँ....आलू ओर परांठा है .. मां.  रोज रोज  बस आलू ओर परांठे  देती  है .....जिस रोज आलू नहीं ..उस रोज अचार ...अचार का तेल टिफिन से निकलकर ..सब कुछ पीला कर देता है ..मेरा बेग भी.....विनीत ने अपना टिफिन खोला है ..उसका सफ़ेद परांठा है...प्याज ओर टमाटर बीच में ...".खायेगा '.विनीत मुझसे पूछता है ....वो  मेरा बहुत अच्छा  वाला दोस्त नहीं है ..पर उसका परांठा !!!......मै आधे  से  ज्यादा  खा  जाता  हूँ …....उसका   "सफ़ेद परांठा"  कितना  अच्छा  है  !
लंच  के  बाद   अगला  पीरियड   हिस्टरी  का  है ….मेरा  कुछ  होम  वर्क  बाकी  है  ..मै  विनीत  की  कॉपी   से   कर  रहा  हूँ ….देव  ने   मेरी  केप  उतार   ली  है ….मै  उससे  लेने  की  कोशिश  करता  हूँ उसने मेरी हिस्टरी  की कोपी  उठा ली है....वापस लेने में ….  हिस्ट्री की कोपी फट गयी है ...होमवर्क का चेप्टर भी......
 पीरियड में  . हिस्ट्री की मैडम  मुट्ठी बंद करवा के  स्केल को खड़ा करके मारती है ....बहुत जोर से लगती है...सीट पर जाकर आंसू पोछता  हुआ मै सोचता हूँ..टीचर बना तो बच्चो को नहीं मारूंगा !
स्कूल से लौटता हूँ तो सीडियो पर मुड़ी तुड़ी अधजली .बीड़िया देख मुझे गुस्सा आता है   .. मां रोज की तरह कुछ बनाने में जुटी है .. कितना बड़ा गाँव है ?

उन दिनों सब  लोग एक से  थे ...न ज्यादा अमीर .न ज्यादा गरीब...
 उस रोज  "स्वेटर वाली आंटी" ने ..मुझे ओर छोटे को  सुबह खाने पर  बुलाया है ..वो  सर्दियों में बहुत सारे स्वेटर   बुनती  है .....इसलिए उन्हें सब स्वेटर वाली आंटी  कहते है ....वे  बहुत अच्छी  है .. हमेशा प्यार करती है  .सुबह के स्कूल में अभी  टाइम है ...वहां  पहुँचता हूँ  तो देखता हूँ  बहुत सारे बच्चे है पूरी ..काले छोले..ओर हलवा ...काले छोले मुझे बहुत अच्छे  लगते  है कई दिनों से आंटी मंदिर नहीं गयी  .... आंटी का पेट फूला हुआ है .
"आप बीमार हो'.....मै पूछता हूँ...
वे हंसती है ...ओर मेरे सर पर हाथ फेरती है.ओर थोडा हलवा मेरी प्लेट में डाल देती है .
"आंटी   के  पेट  में  बेबी  है "बराबर में बैठी .रविंदर  कौर  मुझे  धीमे  से  बताती  है  ….रविंदर  कौर  गली  नंबर  तीन  में  रहती  है ...बड़ी होशियार है ..नेल कटर से नेल  काटती है .(   पापा अपने  ब्लेड से  नेल  काटते  है ) उसके  घर  में  एक  बड़ा  डौगी  है ….जब  कभी  "लंगड़ी - टांग"  में  उससे  लड़ो  तो  वो  बहुत  जोर  से  भौंकता  है  ….
पेट  भर गया है ...ऐसा  जैसे  फट जाएगा .... ..स्कूल पहुँचता हूँ तो देखता हूँ एक कोने में भीड़ जमा है ...विनीत के होठो पर खून है ....देव   ने उसे मारा है....देव के हाथ में उसकी गाडी है ...विनीत.  रो रहा है . .....किसी ने मुझे देव की ओर धक्का दिया है ...."तू लडेगा" ..देव मेरी ओर बढ़ा  है ...मेरी घिघ्घी  बंध आयी है ...देव ने हाथ घुमाया है...मै  पीछे हट गया  हूँ फिर  जाने  क्या  हुआ  है  के  मैंने  घूंसे  बरसाने  शुरू  किये  है  …लगतार  ….देव  गिर  गया  है  …..मुझे  लगता  है   काले  छोलो   ने  मुझमे  ताकत  भर  दी  है  .....
स्कूली ड्रेस में भी सारे बच्चे एक से लगते है
सुबह उठा  हूँ... वीर सिंह अंकल आये है ....चंडीगढ़ से ....मेरे लिए हमेशा  कोई  किताब लेकर आते है ..... पापा बताते है बचपन के दोस्त है …. एक ही गाँव से निकले चंडीगढ़  से वे जब भी सन्डे को  आते है ..पापा उनके साथ घंटो चेस खेलते है ..........रात को वीर सिंह अंकल मुझे कहानिया सुनाते है
.अगले  दिन  विनीत ने  मुझे घर पे बुलाया है....वो गली नंबर पांच में रहता है....उसके पास मांजे  की एक चरखी है ...बहुत सारी पतंगे ...हम उसकी छत   से पतंग   उड़ाते है ..उसकी मम्मी  नीचे   बुलाती है ...प्लेट में गरम गरम सफ़ेद परांठा है ...ब्रेड के साथ.......मै पूरा खा जाता हूँ..... ….ओर ऑमलेट  खायोगे बेटे? उसकी मम्मी पूछ रही है .... ऑमलेट !!!!!..मैंने अंडा खाया है ....मै डर गया हूँ.....नहीं ...मै कहता हूँ....वापस लौटते वक़्त मन में अजीब सा गिल्ट है ..... घर जाने से पहले गली नंबर  तीन के  अस्पताल के नल से मुंह धोता हूँ....  मम्मी को नहीं बतायूँगा..बहुत मार पड़ेगी  
रात को वीर सिंह अंकल मुझे एक कहानी सुनाते हैवे कहानिया लिखते भी है ..."मै भी बड़ा होकर कहानिया लिखूंगा" ....मै उनसे कहता हूँ....
सपने में उनकी कहानी के साथ ऑमलेट भी आया है !
दो रोज से   मै  विनीत  के घर नहीं गया हूँ... ...तीसरे दिन विनीत   मुझे बुलाने आया है....मै शर्त रखता हूँ ऑमलेट नहीं  खायूँगा .......फिर कई दिन .रंग बिरंगी पतंगों.में बीतते है ... हाथ की अंगुलिया काटने लगी है मंजो से .... उसकी मम्मी ब्रेड सेंडविच बनाने लगी है ....उनके यहाँ की  ब्रेड कितनी मुलायम होती है न ...साफ सुथरी  कोनो से कटी हुई.....आठ दिन बाद बसंत है ...पतंगों का त्यौहार ... हम ने  उस दिन के लिए  एक रुपये वाली बड़ी पतंग भी खरीदी  है....".सरदारा "….
वक़्त के कन्ने कटते है जब ..
अगले रोज  विनीत  स्कूल में नहीं आया है ....दोपहर को मै उसके घर जाता हूँ....उसके यहां सामान की पेकिंग हो रही है ....पापा का ट्रांसफर हो गया ..वो बताता है ...उस रोज हम छत  पर पतंग नहीं उड़ाते...न सेंडविच खाते ...दो दिन बाद उसे जाना है ...वापस लौटते वक़्त  मै सड़क के कई पथ्थरो पर ठोकर मारता हूँ...  घर आकर मां से झगड़ता  हूँ..बिना खाए सो जाता हूँ....
सुबह जल्दी आँख  खुली है .पापा तैयार  होकर चाय पी रहे है .ये ट्रांसफर क्या होता है पापा ....मै पापा से पूछता हूँ.....वे कुछ समझाते है .जो मेरी समझ नहीं आया है........
क्या आपका भी होगा
?..मै पूछता हूँ......वे हाँ कहते है ....जाते वक़्त मुझे प्यार करते है ......
मेरा स्कूल जाने का
  मन नहीं है ......मां गुस्सा होकर तैयार करके भेजती है .स्कूल में मन नहीं लगा है ...लौटा हूँ तो मां बताती है ... विनीत आया था..मुझे घर पे बुलाया है ...
मै उस रोज उसके घर नहीं गया हूँ...मां के कहने पर भी नहीं.... आज फिर मां से लड़ा हूँ कई बार
.. अगले दिन सुबह  मुझे ठण्ड  सी   लगती है ....स्कूल   में सब कुछ सुस्त सुस्त सा है ...मेरे सर में बहुत दर्द है....आज घर बहुत दूर  लगा है ......सीढियों पर चढ़ते चढ़ते  रुक गया हूँ... .मां दौड़ी आयी है ....कहती है मुझे बुखार है ...रोते हुए प्यार करती है ....मै जब भी बीमार होता हूँ..मां बहुत प्यार करती है .....दवाई के साथ वो  मुझे ग्लूकोज़ का बिस्किट भी देती  है..मै दवाई लेकर  सो गया हूँ.....  घंटो  सोया हूँ...उठता हूँ....तो कमरे  के बाहर में हवा के साथ अजीब सी आवाजे सुनाई  दी  है .जानी पहचानी ... क्या .पापा छुट्टी लेकर आये है.?... ...."..मां "मै आवाज देता हूँ.....मां के हाथ में ढेर सारी पतंगे है ओर हुचकी है .....बताती है विनीत आया था....छोड़ गया है... पापा कमरे के कोने में कोई कटोरी लेकर खड़े है ...गाजर का हलवा है ...मेरी फेवरेट डिश हवा से एक पतंग बाहर निकल कर गिरती है…."सरदारा" है….
 ... जनवरी महीने का एक मंगलवार   साल २०११ ..
नीचे अख़बार पढने उतरा हूँ तो मां चाय पीते पीते बताती
  है .वीर सिंह अंकल नहीं रहे . मन अजीब सा हो गया है ...... ...अखबार की तह बताती है ... ... पापा ने नहीं पढ़ा ....पापा चुप चुप से  है.... चाय में चीनी नहीं है ...पर वे चुपचाप पी रहे है ... उन्हें एक घंटे में चंडीगढ़ निकलना है  ...मुझे उनकी ख़ामोशी मुझे बैचेन करती है  . ड्राईवर  को हिदायत देकर   भेजता हूं……पापा को अगले दिन आना है.....
बुधवार की दोपहर....
.. क्लीनिक से लौटते  वक़्त  सोचा है ......अगले  आधे दिन की छुट्टी रखूंगा गाडी पार्क करते  देखता हूँ.......पापा दूर सड़क पे  से आर्यन के साथ आ रहे है ...उसके हाथ में ढेर सारी पतंगे है…. सबसे आगे "सरदारा "है

85 टिप्‍पणियां:

  1. इतने दिनों बाद आपको पढ़ कर अच्छा लगा ... लेकिन विनीत का पुनीत में बदल जान समझ नहीं आया...!!!!

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  2. humesha kee tarah bahut bahut bahut pyari post hai ...bahut thakan thee door ho gayi..akhir apna bachpan dekhna kise acccha nahi lagega... sachmuch laga mera bachpan likh diya gaya hai ... mera ghar bhi bus stand ke pas tha kiraye wala. daddy ko patang udana nahi pasand lekin katora kat bahut pasand hai...han wo omlette haadasaa bada zordar tha..shukar hai main bach gaya tha bachpan....ab to chhup ke khata hun.... :P

    bahut accha laga....sach men...

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  3. इतनी लम्बी जुदाई. अच्छी बात नहीं है ये. यादें गहरी उतर जाती हैं. पैंतीस मिमी के कैमरे की रील की तरह. बस डवलप कर कापी निकालना बाकी रह जाता है.

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  4. डायरीनुमा कहानी और सुखांत, पढ़कर आनन्द आ गया।

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  5. काफी दिनों बाद आपको पढ़ा .. दिली की बात अच्छी लगी..

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  6. बचपन की यादें --जैसे एक एक लिख कर रखी थी ।
    बस यह समझ नहीं आया कि उस वक्त आप किस क्लास में थे ।

    वर्णन बहुत सुन्दर लगा ।
    समय के साथ सोच भी बदलती है ।

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  7. डॉकसाब आपकी कलम पतंग के मांझे की तरह ही बारीक पर धारदार रचती है.सीधा और बेरोकटोक. दिल में उतरने वाला.स्मृतियों की पतंग कभी कटती नहीं,आ आकर मन के आकाश पर लौटती है.खासकर इस पोस्ट की तारीफ लायक शब्द नहीं मिल रहे.बस इसी में, यहीं घंटों बैठा रहूँ.

    ये पोस्ट ऑफिस का स्टाफ सब जगह एक जैसा क्यों होता है?

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  8. डाक्टर साहब आये दिन मै आपके ब्लाग पर आता हूं और देखता हू नया क्या लिखा है . बहुत दिनो बाद आपने लिखा और जो लिखा वह आपकी ही अपनी तरह की विधा है .
    और हा बस स्टेंड के पास रहने के यह साईड एफ़ेक्ट मे भी झेल चुका हूं.

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  9. पत्ता टूटा डार से पवन ले गयी उडाय..
    अब के बिछड़े कब मिलेंगे दूर पड़ेंगे जाय.

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  10. अनुराग जी
    एक अरसे बाद आपको देखकर ख़ुशी हुई... स्वागत है...
    लेखन बरक़रार रखें...शुभकामनाएं...

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  11. `उन दिनों सब लोग एक से थे ...न ज्यादा अमीर .न ज्यादा गरीब...'

    गुज़र गया वो ज़माना कैसा... कैसा :(

    बहुत दिनों बाद चर्चा में देखकर अच्छा लगा॥

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  12. बहुत दिनों बाद नेट पर आया हूँ.. कुछ अच्छा पढने का मन था.. आपका ब्लॉग एड्रेस मुह्जुबानी याद था... पहुँच गया... आज मैंने बहुत दिनों बाद कुछ बेहतरीन पढ़ा है.. आपकी आगे की पोस्ट पढने में व्यस्त हूँ.. ज्यादा लिख नहीं पाउँगा...

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  13. खट्टे मीठे संस्मरण और उन्हें व्यक्त करने का आपका अंदाज़ हमेशा की तरह पसंद आया।

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  14. आज आपको पढ़कर ऐसा लगा जैसे कोई typerwriter पर टाइप कर रहा हो और हम उसके एक एक अक्षर के अंकन को गौर से देख रहे हो ...बसंत पतंगे आशाये ... सब एक साथ .... यादों में डूबने जैसा मज़ा कोई नशा नहीं होता ..अतीत की यात्रा बिलकुल योगी की ध्यानावस्था की तरह हो जाती है ..और आज जो आपकी कलम से निकला है वो भी कुछ ऐसा ही है ...
    बसंत की शुभकामनाये .. आर्यन के साथ सावधानी से पतंगे उड़ाना आप ..सरदारा भी :-)

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  15. शब्दों का ब्रुश अतीत के रंग में डूबा आज पर फूल बरसा रहा है...

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  16. काश मैं भी अनुराग होता,
    और यहाँ दर्ज़ करता... तेज औ’ शातिर निगाहों से इन्फ़ेक्टेड बचपन की यादें... बनते और फूटते यादों के बुलबुले... उन बुलबुलों में उभरते मिटते रँगीन नक्शे...उन फ़ानी बुलबुलों पर उतर आये नक्शों की बदलती रँगीनियों के मायने.. जो अपनी उम्र के अलग अलग मुकाम पर अपना अलग अहसास छोड़ जाते.. इधर मैं अपनी उम्र के मुकाम के हिसाब से हर बार उन्हें चौंक कर देखता.. उनके लिये अल्फ़ाज़ तलाशने को उन पर आँखें गड़ाता मैं... पहचान लिये जाने पर चँद शोख बुलबुले इतराते हुये आसमान को बढ़ लेते.. आवारा यादों के यूँ ढँगर-ढँगर डोलते रहने की यही सज़ा होती हो, शायद... मायूस से कुछ बुलबुले भारी मन से ज़मीन पर लेट जाते.. और कुछ गीली निशानियाँ वहाँ छॊड़ते हुये बेबस दम तोड़ जाते.... पर कुछ तो जैसे चिढ़ कर झुँड बनाते हुये बुज़्ज़ों की शक्ल में मेरे चेहरे पर दस्तक देने की जल्दबाजी में खुद ही फूट जाते... तब मैं एक अज़ीब अहसास से शर्मा जाता..
    वैसे शर्माना तो आज भी पड़ रहा है, क्योंकि मैं डॉ. अनुराग नहीं हूँ.... जो इतना अच्छा लिख सके.. जिसमें एक स्केच की लकीरों सी सच्चाई हो.. न रँग न रोग़न.. सिर्फ़ सच्चाई, जिसे आप अपनी तरह से गढ़ सकें !
    बहुत अच्छे... आसमाँ से ज़मीन की तरफ़ तकने में तुम कामयाब हो, शाबास अनुराग
    (लिखना तो चाहता था, शाबास मेरे बच्चे)

    खुले विचारों पर बँद दरवाज़ा..
    बस यही एक ख़लिश नहीं जाती
    पर अब शिकायत भी न करूँगा

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  17. आपकी पोस्ट पढते हुए सोचता हूँ कई जगह एक सी बातें चलती है. कुछ बातें अलग भी होती हैं तो बिलकुल एक सी लगती हैं. इंसान की कुछ बातें हैं जो एक जैसी ही होती है. समय, परिवेश.. भले अलग हो.

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  18. एक-एक कर सब दॄश्य गुजरते चले गए पढ़ते-पढ़ते, और ये माँ और पिता ऐसे ही होते हैं हर बार...

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  19. गौर से इस पोस्ट को देखती हूं तो सोचती हूं भारी भरकम शब्द नहीं है न मुश्किल उर्दू या कुछ ऐसी चीज़ जिसे तीसरी बार पढने में समझा जा सके एक बार को लगा क्यों ओर कैसे आपने सीधी सादी पोस्ट लिखी दोबारा पढ़ा लगा क्या इसलिए के मेन- करेक्टर एक बच्चा है ?
    पूरी पोस्ट वक़्त के बदलाव के साथ कुछ चीज़े बिना खोले कह जाती है जैसे मां हिडन में रहकर भी कामकाज में जुटी हुई
    लाल आँखों वाला पुजारी ,
    अचार का तेल टिफिन से निकलकर ..सब कुछ पीला कर देता है
    सफ़ेद परांठा
    टीचर बना तो बच्चो को नहीं मारूंगा !
    उम्र के इक मोड़ पर पिता का बच्चा हो जाना ओर पिता के दोस्त के जाने पर बेटे का इमोशनल सपोर्ट देने की कोशिश करना.

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  20. ओर हाँ आपकी त्रिवेणी मिस कर रही हूं , अरसा हुआ

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  21. हमारे सरदारा तो आप हो गुरु..

    कल रात को सोच रहा था कि इस बार आपको बोलु कोई नज़्म लिखिए.. और ऊपर नीलिमा भी त्रिवेणी लिखने को कह रही है.. पुराने दिनों में लौटना युभी सुखद होता है बॉस.. सुबह सुबह भरे गले से ही पढ़ा है..
    पढ़ते पढ़ते हुए धीरे धीरे स्क्रोल कर रहा था ताकि पता नहीं चले कि कब ख़त्म होगी पोस्ट.. पता नहीं क्यों लेकिन इस बार ख़त्म करने का मन नहीं हुआ..

    वैसे वीर सिंह अंकल वही है ना जिन्होंने आपको शायद गांधी पर एक किताब दी थी.. या कोई और किताब थी.. मुझे कुछ कुछ याद है..

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  22. Bahut acchi post hai Dr.sahab, purane dino ki yaad tazaa ho gayee.

    Agli post ka intzaar hai.

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  23. पता है अनुराग..इस पोस्ट को पढ़ते हुआ मुझे महसूस हुआ जैसे तुम्हे कोई अचेतन अवस्था में तुम्हारे अतीत में ले गया हो! तुम्हे एक एक घटना दिख रही है और तुम बस बोलते जा रहे हो! वैसे अर्ध चेतना में इंसान ज्यादा साफ़ और ज्यादा सच बताता है....तुमने पूरे होश में ऐसा असर दिखाया है!

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  24. अन्दर तक चिर कर रख देने वाली पोस्ट..transhfar kyon hota hai...

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  25. बहुत दिनों बाद आपने लिखा , पढ़ना अच्छा लगा , वो बचपन के अनुराग का अनुरागी मन , और कलम से एक झूठ का भी नजर अंदाज़ न होना ...

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  26. डॉ. साहब, तमाम सरदारे रिश्तों की डोर बांधे ख़ूब ऊंची परवाज़ भरते हैं लेकिन कटते हैं तो दुख होना लाज़िमी है। काफ़ी दिनों बाद लिखा..अच्छा लगा।

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  27. पतंगों के रंग, तितलियों के रंग...और,और... ये रहे, इन्द्रधनुष के रंग...
    मैं झब्बे(सरदारा) में कन्ने बांधते हुए माँ से पूछता हूँ,
    "माँ मैं बड़ा कब होऊंगा..."
    "जब रंग दिखने बंद हो जायेंगे" पिताजी किसी फ़ाइल को पलटते हुए कहते हैं...

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  28. "कोई मुझे रजाई उड़ाते वक़्त प्यार कर रहा है ..चुभती दाढ़ी ...पापा है ....."


    बहुत दिनो बाद आपको पढा.. और वैसा ही सुकून मिला.. दिल से लिखी हुई दिल की बात... ऐसा लगा जैसे आपके बचपन की एक फ़िल्म चल रही है सामने.. और किसी किसी सीन में मेरा भी बचपन झलक रहा है...

    मिजाज़ मस्त हो गया डौक्टर साब..

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  29. aapki posts kuch aise hoti hain, ki mujhe koi visheshan hi nahi soojhta tareef karne ke liye.....
    bahut achcha laga ye lekh padh ke...aisa laga jaise koi apne bachpan ki baat bata raha ho..:)..safed parathe...parath aur aaloo ki sabzi....:)
    btw..November mein mera meerut aana hua tha...vahan rickshaw se kahin jaate hue aapke naam ka signboard padha ..main aise utsaahit ho gayi jaise 5th class ke bachche..:)....main saket ki taraf kahin jaa rahi thi..(shayad)..main road pe gali ki or ishaara karte hue aapke clinic/ ghar ka board laga tha....

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  30. ohhhh.......ab pata chala.......to daksaheb......manji ki charkhi lekar...........asaman par chale gaye
    the.....lekin......pathak bhi kahan
    man ne wale ..... dor ko samet te hue
    le hi aaye ......


    pranam.

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  31. प्रभु...क्या कहूँ...आप आप हैं...आपस कोई दूसरा नहीं...बेमिसाल...लाजवाब..जब आपको पढता हूँ बस ये ही दो लफ्ज़ बुदबुदाता हूँ....

    नीरज

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  32. आज आपको पढ कर लगा की वाकई दिल से लिख रहे हैं। शब्दों में कारीगरी कम है लेकिन साफगोई गजब की है, यूं लगा की अवचेतन और चेतन मन में बहुत समय से रखी बातें कह रहे हैं। या ऐसा कहें कि पढ़ते हुए ऐसा लग रहा था जैसे आप बतिया रहे हैं या कोई पाडकास्ट सुना रहे हैं। ....वीर सिंह अंकल के जाने की उदासी भी पूरी पोस्ट पर दिख रही थी...पर शायद यही जिन्दगी है

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  33. कुछ हकीकतें जब लि दी जाती हैं, तो कहानी सी क्यों लगने लगती हैं....!!!

    वो बचपन में देखी गई बाल फिल्मों के कैरेक्टर्स की तरह आँखों के सामने से गुजरे माँ, बाबूजी, विनीत, देव सब.......!

    और वीर सिंह अंकल.........!!!!!

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  34. agree with Kush...! ye moderation tippaniyan padhne ke hamare maulik adhikaro ke beech me aa raha hai.

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  35. पुराने दिनों को याद करते हुए हर घटना को यूँ बुना जैसे कोई स्वेटर को बुनता जाता है और उसमें हर रंग़ भरता जाता है प्यार का, बचपन का,....दुख का,और जब फिर कोई उसे पहनकर निकलता है तो देखने वाले कहते है अरे किसने बुना बड़ा खूबसूरत बुना है। और उस स्वेटर हर किसी को प्यार होता जाता है कुछ इसी तरह की लेखनी है प्यारी खूबसूरत जिसे हर पल पढने को जी चाहता है... सच आप लिखते बड़ा..... सच पूछे तो पतंग कभी उड़ाई नही पर आज सोचने पर मजबूर हूँ क्यों नही उड़ाई... वैसे ये सरदारा पतंग़ कैसे होती है...

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  36. एक पोस्ट में कितने मासूम पलों को ऐसे उकेर देते हो कि "उल्टी लटकी हुई छिपकली " का सा हाल हो जाता है अपना ...एकदम आपके ब्लॉग से चिपके हुए उन सारे पलों को दुबारे जीने कि कोशिश में ,कुछ खटास और कुछ मिठास भरी मासूमियत की ये फुहार ... पूरा भिगो देती है !!

    शुक्रिया डॉक्टर साहब , जीने के इस सफ़र में कुछ अलग रंग भरने के लिए !

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  37. आपका दिल है कि कोई बायस्कोप... ? ज़िन्दगी की डोर से बंधी सभी भावनाएं निरपेक्ष दर्ज होती हैं. आँखों से न देखी जा सकने वाली और स्मृतियों में न रह सकने वाली और शब्दों के बंधनों से बच निकलने वाली बातें आपके यहाँ महकती मिला करती है. आपको पढना आनंददायी है. बाद दिनों की आमद से लगता है कि लेखक जब कुछ नहीं कर रहा होता दिखता है उसी समय सबसे महत्वपूर्ण काम कर रहा होता है.

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  38. बड़ा लम्बा गैप कर दिया डॉक्टर साहब...

    आपका यह रंग.....कुछ कहने बोलने लायक स्थिति में छोड़ता कहाँ है...

    क्या कहूँ ????

    कलम सलामत रहे आपकी...

    प्लीज लिखते रहा करें...इतनी प्रतीक्षा न करवाएं...

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  39. उन दिनों सब लोग एक से थे ...न ज्यादा अमीर .न ज्यादा गरीब...



    ...............

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  40. vaah anuraag ji maza aa gaya. office main baitha magazine design kar raha tha. apki post kholi to bas pushoo mat refresh ho gaya. socha tha ki kaam khatam karke padhunga lekin pehla pehra hi parha tha aur end tak lagataar chalta raha. ruk hi nahi paya. apne mera kaam late karva diya yaar. aab raat ke 2 bajenge. aur ha dev ki dhunai mujhe zyada pasand ayi. kyuki asi hi dhunayi bachpaan main meri huyi thi 6-7 class main parhta hounga us samay. aur mujhse 1-2 saal shote larke ne aise hi mere tabartor mukke barsaye the jaise ki apne barsaye the dev k. sach main maza aa gaya parh kar. aur meri khushnasibi aur bhi barh gayi ki hamare newspaper ki magazine main bhi basant par hi imroz ji ka artical (mohabat ki har roz basant) jaisa unhone desraj kali ji ko phone par bataya, parha vo bhi kamaal hai.
    main abhi bhi basant ka anand lene k liye apne gaav (pind)firozpur jata hu. kehne ko city hai lekin mehak gaav ki hi hai. is baar bhi jaunga aur basant aisi ki aasma bhi mushkil se hi dikhta hai. sirf rango main lipti pariya hi nazaar ati hain.

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  41. उन दिनों जिंदगी में उलझनों के इतने मोड़ नहीं होते थे .....ख्वाहिशे कम होती थी उनका कद भी.....सो शिकायते भी कम होती थी....स्कूल तक का फासला अमूमन कदमो से तय होता ....पिता से डर भी लगता था ओर उनके साथ वक़्त गुजारना अच्छा भी ...हमारे हिस्से अमूमन रविवार आता...जब मकान बनना शुरू हुआ तो वो सन्डे भी बंटने लगा ......कट्टर आर्यसमाजी पिता...पतंगों ,कंचो..ओर तमाम गिल्ली डंडो से नफरत करते...मेथ्स पढ़ाने बैठते तो ......हमें मेथ्स से ज्यादा उनसे डर लगता ...कंचे फेंके जाते ...पतंगे फाड़ी जाती ओर चरखिया बेरहमी से शहीद ... पर बसंत होली से ज्यादा फेवरेट रहता ...खुदा भी बसंत की सेटिंग सन्डे को नहीं रखता.....स्वेटर वाली आंटी सर्दियों में स्वेटर बुनकर दुकानों में बेचती थी ...ओर गर्मियों में आम पापड़ ओर बहुत कुछ....पर गर्मी ओर सर्दी दोनों वक़्त मुस्कराती रहती थी....शादी के सात साल बाद ...उनकी गोद भरी हुई थी..
    .वीर सिंह अंकल ने एक दो किताबे लिखी......बंगलादेश की आज़ादी के दौरान पाकिस्तानी युद्धबंदियो के केम्प के वो इंचार्ज थे..सो उन पर उन्होंने एक एक किताब लिखी थी....फिर वक़्त ओर परिवार की जिम्मेवारियो में खर्च हो गए

    हाथ भर के फासले पे गिरती है,
    वक़्त कन्ने काटता है जब
    कभी चलना आसमानों पे
    मांजे की चरखी ले के .....
    जिंदगी को दोबारा उडायेगे !

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  42. उन दिनों सब एक जैसे होते थे ...स्कूल की यूनीफोर्म में सब एक जैसे ही लगते हैं ...

    उम्मीदों के आसमानों में यकीनों के मांझे...
    GR8!

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  43. पतंगे जो दूर असमान को छूने को होती है..
    ढेरो रंग यूँ असमान पे बिखर जाते है..
    नाज़ुक सी पतंग का नाज़ुक से धागे से
    ..मज़बूत साथ..
    जूझती रहती है हवाओ से कोई एक दिशा पकड
    डगमगाती कभी संभलती ..
    पतंग है या मुई ज़िन्दगी हुई..
    तमाम मौसमों में अब ज़रा-ज़रा ही बची है बसंत
    और असमानों में पतंग..


    यादों में बसे गाँव,मोहल्ले गलियां सब एक जैसे ही होते है..कभी कभी नाम भी वही...क्या हर बच्चा यही सोचता है आंसू पोंछते हुए..टीचर बना तो बच्चो को नहीं मारूंगा !आपकी कलम किसी पतंग की तरह हकीकत की ज़मीं से स्मृतियो के आस्मां पे ले जाती है..पर भाषा के विनम्र धागे से एक संतुलन के साथ शुरू से अंत तक बाँधे रखती है.आपको पढ़ने का देर तक असर रहता है जैसे कटी हुई पतंग पे भी यूँ अंत तक नज़र जमी रहती है...कितनी यादें बरसती रहती है आपके जहन में जिनके छींटे मन को भिगो-भिगो जाते है..


    आप ही की एक त्रिवेणी आप ही के लिए-

    जाने क्या निस्बत है कि शब जाते जाते
    रोज याद का कासा छोड़ जाती है .....

    हर सुबह एक लम्हा पड़ा मिलता है

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  44. Dear Anurag,

    After a long wait,it was a very touchy description of the mind of a child in THOSE days. It appears to be a God's gift to you to write in this style ! Not every other writer can do such a miracle.
    Congretulations !Keep it up

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  45. खांसते बच्चे . और बूढ़े मोहल्ले एक से लगते है.......
    उम्मीदों के आसमान में यकीनो के मांजे..................

    उन दिनों सब लोग एक से थे ...न ज्यादा अमीर .न ज्यादा गरीब.......
    स्कूली ड्रेस में भी सारे बच्चे एक से लगते है...
    वक़्त के कन्ने कटते है जब .. और बुधवार की दोपहर

    .. उपर्युक्त हर एक अपने आप में एक सच्ची मन को छू जाने मर्मस्पर्शी लघुकथाएं, जो मन को झकझोर कर रही हैं ....... बहुत लाजवाब प्रस्तुति ...आभार

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  46. उडती फिरती तितली जैसी यादों के पतंग --- शायद आप से बेहतर कोई नही उडा सकता। शुभकामनायें।

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  47. "उन दिनों सब एक जैसे होते थे न ज्यादा आमिर न ज्यादा गरीब "
    बार बार जब भी अपने अतीत में जाती हूँ तो तो बस यही मुझे भी लगता है पर" उन दिनों" के वही हम लोगो में इतनी असमानताए कैसे आ गई ?
    एक जिला कलेक्टर की बेटी और एक महरी की बेटी एक ही" टाट पट्टी"(हमारे समय में इसी पर बैठकर प्राथमिक पाठशाला में पढ़ते थे ) पर पढने बैठते और एक जैसी ही शिक्षा पाते थे |
    बाsन्ती मौसम में बसन्ती बयार दे गई आपकी यह बासन्ती पतंग की सुन्दर सी पोस्ट |

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  48. ek baat puchhu......ek nhin do........pahla, itne din kahaan the?
    dusri, aapke sansmarano me itna dard kyu h?

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  49. bahut achha laga itne samay baad aapko padhna...
    as ever, bahut aachha likha hai

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  50. na jane kyu yesa lagta ki aap ki har khani ki cheze meri zingadi se judi hui lagti hai.

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  51. बसंत पंचमी के अर्थों की फि‍र से याद दि‍लाई। शुभकामनाएं।

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  52. पिछले दस दिन से यह पोस्ट पढ़ना टाल रहा था-हमेशा की तरह। आज अभी अचानक पढ़ने लगा तो पढ़ता गया। सेंटिया गये।

    बेहतरीन!

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  53. aap kya bachpan mein bhi diary likha karte the anuraagji?? itni yaade kaise samet ke rakhte ho??

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  54. बहुत पहले ठान लिया था कि डा० अनुराग की पोस्ट सबसे आखिरी में मैं पढ़ूंगा। पोस्ट छप जाने के कई दिनों बाद। वैसा ही करता हूं हर बार और इस बात पे खुश हो लेता हूं तनिक कि अन्य पाठकों से ज्यादा लुत्फ़ उठाता हूं। सारी टिप्प्णियां और एडिशनल छौंक के तौर पर आयी आपकी खुद की टिप्पणी।

    सपाट बयानी में लिखी गयी पोस्ट इस बार वैसे तो अपने फेमस अनुरागी-जुमलों से वंचित है, लेकिन जायका वही है हमेशा की तरह। कहानी का नायक सबको अपने जैसा दिखा...आपके लिखने का तिलिस्म ;-)

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  55. कसम से आज भी नहीं पढता पर सारा कुसूर मौसम का है जो हमने ऐसे दिनों के लिए अब आपको छांट लिया है. कल से याद आ रहे हैं की अब इसे निपटा दिया जाए. हिंग भी है, फिरकारी भी और कमेंट्स के बाद रंग भी है चोखा....

    कई लोग अब साहित्यिक टाइप संस्मरण लिखने लगे हैं... कभी कभी बोझिल हो जाता है और कहीं कहीं लादा हुआ लगता है खैर... गुरु भाई से लड़ना तो गुरु भाई बन कर लेकिन यह याद रखना की गुरु भाई एक ही है.

    आप समझ गए ना ?

    Ham Gautam ji se bhi jeete

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  56. जो चले जाते हैं ज़िंदगियाँ उनकी भी किस्से कहानी बन जाती हैं
    और जो साथ रह जाते हैं यादें उनकी भी किस्से गढ़ती चली जाती हैं।
    और अगर देखने, महसूस करने, समझने और बाद में कभी लिखने में सामंजस्य हो तो ईर्द-गिर्द घट रहे सब कुछ में से अपने मतलब का निकाल लेता है रचनाकार।
    इधर-उधर से दिन भर आते मेहमानों की भीड़ में जुटी माँ का श्रम या रोज़ दो सौ किमी के लगभग की यात्रा करने के कारण पिता के पास समय की कमी, बचपन के साथियों से ट्रांसफर के कारण जुदाई आदि से जैसे इमोशनल
    अत्याचार बालमन पर अंकित हो जाया करते हैं उसे बहुधा बड़े मन स्वीकृती नहीं देते।
    यादों को फ्लैश बैक मोड में चला लेना/देना आपके लेखन की खूबी है।
    स्मृति एक्स्प्रैस के चक्के सालों साल यूँ ही ही चलते रहें। पाठकों की बेहतरी है।

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  57. डॉ.अनुराग बहुत दिनों बाद आई आपके ब्लॉग पर । कहानी पसंद आई । अंत सुंदर है ।

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  58. डाक्टर साहेब, आपके व्लाग पर पहली बार आया यह सोच कर की इलाज की बात करेंगे मगर आप तो दिल की बात करते है और मेरा व्लाग है दिल की बातें आने में देर हुई माफ़ी चाहूँगा

    उत्तर देंहटाएं
  59. डियर डॉक्टर,अब तुम भी बहुत बहुत दिनो बाद लिखते तो मैं भी बहुत दिनो बाद तुम्हारे ब्लॉग पर आता हूँ, और आज पढ़ कर 30 साल से भी ज्यादा पीछे चला गया। सब दिन एक साथ नज़र के आगे से किसी मूवी के flash back की तरह निकल गए।
    इस बार यह अच्छा किया की रविंदर कौर को नाम से संबोधित किया!
    और याद है इन्ही हिस्ट्री की मैडम ने एक बार कुछ लड़को को punish किया था, तो रोते हुये विशाल गर्ग ने मैथ्स की मैडम को बोला था " ये तो लड़कियों को कभी punish ही नहीं करतीं।" सच में उस समय शिकायतें भी कितनी मासूम होती थी न!
    और हाँ, उस साल के अंत में ही स्कूल की स्मारिका में तुम्हारी कविता छपी थी, "पहलवान ने करी दुकान.......
    बस ये ही दुआ है अगले अनेक 30 सालों तक ऐसे ही प्रभावशाली लिखते रहो।
    ऊपर वाला हुनर और भी दे (और हम जैसे पढ़ने का आनंद लेते रहें)

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  60. सब कुछ शब्द चित्र सा लगा.....एक सिरे से दूसरा सिरे थामे हुए रहा जैसे पूरा घटनाक्रम[/संस्मरण ] ...
    बेहद प्रभावी लेखन .

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  61. कभी चलना आसमानों पे
    मांजे की चरखी ले के..
    उम्मीदों की पतंगे टाँकेंगे
    थोड़ी तुम उड़ना थोड़ी मैं उडाऊं
    प्यार के दो वक़्त काटेंगे ....

    फिर आसमां से उठी है सदा
    के अरसे बाद कोई
    मेरे मकान की छत पे
    उतर आया है .....

    स्वागत है ......!!

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  62. समय की लंबाई नापती पतंगें.

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  63. जब भी दुखी होता हूं, अभिव्यक्ति की ऊंचाईयों वाला साहित्य पढ़-पढ़कर दुरुहता से कष्ट होता है..मैं आपके ब्लॉग को पढ़ता हूं.। बहुत शुक्रिया इतना शानदार..जानदार लिखने के लिए।

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  64. बहुत ख़ूबसूरत....
    नाजुक पलों और भावनाओं को बड़ी खूबसूरती से शब्दों में समेटा है आपने..

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  65. anurag ji aapka profile indianwoman ki blog par dekha .apki shabdo ke sath dosti ko dekh khud ko apki blog par aane se nahi rok paai.aapko pahli bar hi padh rahi hun magar laga jaise kisi ne mera hi aks rakha hai . .kabhi kabhi hi hota hai jab shabdo ki shakti se taraaiyan bhar ayein or chahkar bhi dhundhalki unhe padhne me hume aksham kar de.aapko anant shubhkamnaon mere antartam ke shudhtam swarup se.

    उत्तर देंहटाएं
  66. बहुत सुन्दर प्रस्तुति
    आज दैनिक भास्कर में आपकी प्रस्तुति 'हाईकू/त्रिवेणी' पढ़कर बहुत अच्छा लगा.. धन्यवाद
    आपको सपरिवार होली की हार्दिक शुभकामनाएं

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  67. raatbhar taro ki bewafai par badbadaya hai
    tum uthakar isko aasmaan pe tang dena
    chand kal peekar gir para tha angan main
    *****

    chilchilati dhoop aur shawn ka bantvara hua
    zindgi ki kchehri main benama likha hai
    rasookh walo ne mausam ko rishwat di hai
    *********

    dhoop andhera hai asma main chand nazar nahi aata
    dekhna uske school k baste ko zara hilakar
    copy par aarhi-tirshi rekhaine kheench raha tha savere

    apki ye triveniya dainik bhaskar k punjab aur haryana edition main shapi hai parh kar accha laga. sath main apki photo bhi hai jis k sath kisi artist ne experiment bhi kiya hai vo bhi acchi hai. umeed karta hu apne dekha hoga. agar nahi dekha hai to pls apna mail ID bata de main apko jpg ya pdf file mail kar doonga.
    shukriya

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  68. बहुत खूब.
    बहुत ही खूब.
    बचपन की यादें ताज़ा कर दी.
    सलाम.

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  69. Anurag ji janmdin ki hardik shubhkamnayen .pahli bar aapke blog ko dekha .achchha laga .

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  70. वाह
    साथ ही जन्म दिन मुबारक हो

    उत्तर देंहटाएं
  71. अच्‍छा है अनुराग तुम बहुत दिन बाद लिखते हो... तुम्‍हें लिखने की लत न लगे यही कामना करता हूं।

    बस दिल और दिमाग के बीच चलते हुए इतनी ही सहजता से लिखते रहो और मैं हमेशा पढ़ता रहूंगा।

    किसी दिन आया तो मिलूंगा...

    हां, उन मेहमानों की तरह नहीं :) जो मेरठ जाते हुए आते थे.. पर आर्यन के लिए कुछ लेता हुआ आउंगा....




    वादा...

    उत्तर देंहटाएं
  72. आज कैसी ये अजाब सी महक है फिजां में
    कहीं उतरी है कोई खूबसूरत सी नज़्म या
    किसी दिल की जमीं पे 'अनुराग' उतर आया है
    ए हवाओं जरा जश्न तो मनाओ .....
    आज इक आफ़ताब का जन्मदिन आया है ....

    ):):):): शुभकामनाएं ......!!

    उत्तर देंहटाएं
  73. आज पहली बार आपके दीदार हुए है ..यादे लम्बी जरुर है पर उबाऊ नही ? आपको पढना अच्छा लगा ..

    उत्तर देंहटाएं
  74. dak sahab muaf karenge......chithha charcha ekadas ke sare sitare kahan
    gayab hain........google search me
    naam dala jaye.....aur march ending
    ki yearly charcha pesh ki jaye.....

    ise tagada na man kar balak ka agrah
    mane........

    pranam.

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  75. बहुत सुन्दर कहानी , सच में लगी दिल की बात ।
    वन्दे मातरम्

    उत्तर देंहटाएं
  76. आहटें उसकी पहले लौट गई थी मेरे दर से
    अब वह फिर महक का सामां लिए आया है ......

    अब कुछ प्यारी सी नज्मों का इंतज़ार है .....:)

    उत्तर देंहटाएं
  77. जितना पढ़ रही हूँ.....

    उतनी ही बचपन की यादें ताज़ा होती जा रही हैं..

    हम आज भी कहीं न कहीं miss करते हैं उसे

    वर्तमान में खोजते रहते हैं उन लम्हों को जो

    वापस नहीं आने हैं कभी....!!

    उत्तर देंहटाएं

कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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