2011-05-18

खाली पड़ी जगहों में गर थोडा खुदा फेंक दूं. ....

मोहल्ला कथाओ  के संस्करणों में भारद्वाज जैसे लोग नायक नहीं होते....सह नायक भी नहीं..टोटलीटी में कहे तो दुनिया के  एटलस में मनोज दिखता नहीं....न जैकी .. ...तो बात उन दिनों की है... जब सूरज बाबू  ओर धरती के  दरमियाँ ग्रीन हाउस इफेक्टवाला छेद इतना बड़ा नहीं था ...सो दोपहरे इत्ती चुभती नहीं थी.....
 भारद्वाज की आवाजे तब  तक लगती  जब तक आप अपना चेहरा बतोर "प्रजेंट सर "की मुद्रा में उसे दिखा न दे .."जूते पहनकर फ़ौरन आ.."..हाथ में बैट थामे वो सफ़ेद ड्रेस पहने इसरार मिक्स आदेश देता  …भारद्वाज हमारी टीम का केप्टिन था ... उन दिनों दिन का सबसे पंसदीदा हिस्सा शाम  थी.. मैंने घडी देखी... वक़्त से पंद्रह मिनट पहले ... आज  आपातकालीन मीटिंग  . थी.. कोने पे सूबेदार साहब का घर  था  ...टीम  ने कई बार तमन्ना की थी के घरो को व्हील पर होना चाहिए ..ताकि उनकी पोजीशनो को मुख्तलिफ जगहों पे सेट किया जा सके ...सूबेदार साहब बड़े फिक्रमंद आदमी थे....हमेशा फ़िक्र में रहते... .... बैचेनियो ओर तल्खियो  का कोकटेल ...अखबार में खबरे पढ़ देश के हाल पर मोहल्ले के कोनो में फ़िक्र  करते  पर गली के  कुत्तो ओर भिखारियों को गरियाते . मोहल्ले के बाहर का कोई आदमी पार्क के पास नज़र आ जाए तो उसे पकड़ कर इन्टेरोगेशन कर डालते ..कहते है वे रात -बेरात अपने घर का ताला भी कई दफा चेक करके सोते थे ...क्रिकेट से उन्हें  जितनी  खुंदक थी..उससे दुगुनी   बौल से .... . वहां गयी बौल का चेहरा कभी दोबारा देखने को नसीब नहीं होता था  गोया लेग साइड पर शोट मारना जुर्म हो गया....हालत ये के लोग लेग साइड पर दबाकर खेलने लगे पर ये आदते मेच में नुक्सान देने लगी कोल सूबेदार साहब  क्रिकेट   "देश को आलसी बनाने वाले खेल" था  ...देश की सारी प्रगति  योजनाये इसी की वज़ह से टेबलों में रुकी पड़ी थी.. ऑफिसों का सन्दर्भ इतने जोर से  देते  जैसे नॉन क्रिकेट दिनों में सरकारी बाबू  फाइलों को राजधानी एक्सप्रेस की तरह निबटाते है .... सूबेदार साहब का बढ़ता कलेक्शन  टीम की भविष्य  की योजनाओं जिसमे विकेट कीपिंग ग्लोव्स के अलावा तीन जोड़ी पैड खरीदना भी था के लिए रूकावट बन रहा था ..
टी उन दिनों भारी आर्थिक ओर दूसरे कई संकटों”  से गुजर रही थी..बीस रुपये की लेदर की बौल  आती थी ..रोज का एक या दो रूपया जेब खर्ची को मिलता था  स्कूल के किनारे के कल्लू  हलवाई के समोसे और कचोरियो  से अलग  वफादारी  थी . . दूसरे कई संकट थे जो सबके निजी निजी जोड़कर सामूहिक हो जाते थे .जैसे ...पिताओं के अपने तर्क थे .मसलन  शाम ओर सुबह का वक़्त पढने के लिए सबसे मुफीद है .शाम का ये खेल बकोल उनके हमारे उज्जवल भविष्य के लिए  बड़े आसन्न  खतरे की तरह था...पिताओ  की इन दूरगामी दृष्टियों से .माँ रक्षा करती...  .आर्थिक रूप से भी  गुप चुप मदद माँ  से मिलती पर उस इमोशनल बैंक की भी कई शाखाए थी...आखिर हर घर में दो  तीन भाई बहन जो थे. . हमारी टीम के दोनों  मेन बोलर ट्वेल्थ  क्लास में आये थे ट्वेल्थ क्लास यानी बोर्ड के इक्जाम ..जिनकी  अपनी ख्याति थी ..अपने साइड इफेक्ट्स ..जाने कौन सी दीप्ति से  विधार्थी का चेहरा उज्जवलित रहता का हर आने जाने वाला उसे खेलते देख टोक देता .".रे लल्ला इस दफे तो बोर्ड का इक्जाम है तेरा !  मोहल्ले के बुजुर्ग इस कर्तव्य को निभाना अपनी नैतिक जिम्मेवारी समझते ...
 गले महीने एक टूर्नामेंट  होना था जिसके लिए हमें एक्स्ट्रा एफर्ट डालने थे .टीम का कप्तान भारद्वाज था .क्रिकेट को समर्पित..समर्पण भावना को कई पैमानों से मापा जाता था ..शाम को पांच बजे से घरो घरो में जाकर खिलाडियों को इकठ्ठा करना ..सोते हुए को उठाना .. पिताओं की तीखी नजरो को रोज़ बर्दाश्त करना .दो दो रुपये इकट्ठे करना .. चूँकि दो तीन खिलाडी मसलन त्यागी कभी आर्थिक भागदारी में हिस्सा नहीं लेते थे तो उनके हिस्से की भरपाई भी कप्तान को गाहे बगाहे करनी होती थी भारद्वाज  सारे क्राइटेरिया फुल फिल करता था...एक ओर गुण था ..केवल उसी के बस पूरी किट थी !....पिता ओर सख्त हो रहे थे ओर मांओ का इमोशनल बैंक भी अपने आखरी स्टोक में था ...भारद्वाज के क्रिकेट सेन्स के मुताबिक   जिस मैदान में टूर्नामेंट होना था उसकी लेग साइड की बाउंड्री  छोटी थी.... ओर हमारी टीम के इसी कमजोर पक्ष को मजबूत करने  के लिए हमें बेधड़क हो कर लेड साइड पर शोट खेलने की प्रेक्टिस करने थी...जीतने वाली टीम को ग्यारह सौ रुपये नकद के अलावा पूरी क्रिकेट किट मय नेट के मिलना तय था…… ग्यारह सौ रुपये के  मुताल्लिक  कई ख़्वाब भी टीम  मोटिवेशन की प्रक्रिया का हिस्सा थे.
 पातकालीन मीटिंग में तय हुआ के पिच को बदल के पार्क के दूसरे कोने में शिफ्ट कर दिया जाए ...वहां का खतरा दूसरा था ..चतुर्वेदी जी लेग साइड में पड़ते थे ...चतुर्वेदी जी हाइडिल से रिटायर इंजीयर थे...उस महकमे में  जहाँ उपरी कमाई को डेमोक्रेटिक राईट माना जाता है  ..चतुर्वेदी जी जिंदगी भर पक्के डेमोक्रेट रहे .... रिटायर मेंट के बाद वे अपनी इसी डेमोक्रेसी के चलते   बच्चो को सेटल कर अचानक सात्विक हो गये ... यूँ भी सात्विकता मोर्निंग वाक् की तरह  है ..आप कभी भी शुरुआत कर सकते  है . किसी रोज़ भी ब्रेक ले सकते है....वहां से बौल तो वापस मिल जाती पर वहां जाने वाले को अपने भविष्य की कई संभावनाओं का पता चलता... वे अपने आप को बड़ी गंभीरता  से  लेते  थे ...बाते करते वक़्त अटल बिहारी वाजपायी की तरह पॉज़ लेते..बड़ी क्लासिकल गरिमा से वे पढाई की महत्ता समझाते उनका स्लो मोशन दो तीन ओवरों का समय निकाल देता
वे एक एक संभावना पे टोर्च फेंकते....."सुन रहे हो बच्चे" उनका
विरासत में मिला फिकरा होता ..जिसका  परोक्ष अर्थ होता बात अभी बाकी है.......
 पातकालीन मीटिंग में तय हुआ चतुर्वेदी वाला जोखिम लिया जाए .... इसे ओर लोकतान्त्रिक बनाने के लिए दिनों के मुताबिक आदमी बांट दिए जाए  के फला दिन फलां आदमी का बौल उठाने का नंबर है ...बोर्ड के दोनों विधाथियो को अधिक जोखिम देखते  हुए इस प्रक्रिया से बाहर रखा जाये   ओर बोर्ड वालो की मम्मियो पर थोडा  इमोशनल टच ओर बिखेरा  जाये ताकि अगले एक महीने  तक वे  पिताओं से प्रोटेक्ट शील्ड का उनका   काम जारी  रहे.
"मै हफ्ते में तीन दिन जा सकता हूँ..."उसने कहा ... वो पार्क के उस कोने में बनी  बेंच के दूसरे  कोने में खड़ा  था .हर उम्र अपना एक यक्ष प्रशन लेकर आती है ओर पिछले किसी तजुर्बे को रिकंसट्रक्ट करती है  ..जिंदगी की नयी चाभी हाथ में थमा देती है .. उसकी एंट्री हमारी जिंदगी में भी ऑफिशियली पार्क के उस कोने से हुई थी ...सांवला सा चेहरा .,लम्बा कद ...दरमियाना शरीर ..गंवाई कट से बाल जिसमे भूरे से मिलते जुलते  कई रंगों के शेड्स ...ऊँची पैंट पर बाहर निकली शर्ट .पैरो में चप्पले ...यही था उसका  पहला पोट्रेट पहली बार उसे  नुक्कड़ वाले उस  बनिए की दूकान पे  देखा था ....मुझे देख वो बेवजह मुस्कराया था ..फिर वो कई बार गली में दिखा.. हर बार बेवजह मुस्कराना ... कभी गेंहू का बोरा लेकर चक्की पे   ...कभी कपडे लेकर धोबी ...पिछले एक हफ्ते से उसको अक्सर बाहर देखा था....उसकी साइकिल गली के कोने में उस आखिरी मकान में घुसती...जिसके सामने एक सरकारी जीप सदा मुस्तैद  रहती …..घर के  लोग मोहल्ले के लोगो से कम  वास्ता रखते.....शादी ब्याह का कार्ड या  होली दिवाली  का चंदा  लेने कोई जाता तो बाहर  दरवाज़े पे नौकर अपने जरिये से निबटा देता..घर की मालकिन  सरकारी जीप में ही बाहर निकलती ....उसकी दो लडकिया भी.!.  एक साल से  इन  किरायेदारो  की    उस ."अकडू फेमिली  "के इस नए सदस्य का यूँ बेवजह  मुस्कराना मुझे चौकन्ना कर देता...अलबत्ता उसका पहनावा फेमिली मेंबर जैसा टच देता नहीं था ....
"तुम "भारद्वाज उसकी ओर मुड़ा
 सिंह साहब मामा जी है मेरे ..अब यही रहने आया हूँ....उसने कहा था ...
हमारी टीम पूरी है ..त्यागी ने कहा
मै बौल बहुत फास्ट फेंकता हूँ ...उसने भारद्वाज से कहा ...वो कप्तान की हैसियत जान गया था  
एक बौल  में दो रूपया देना पड़ता है .त्यागी ने दूसरा फेंका...त्यागी ने टीम में कभी चवन्नी का योगदान परोक्ष रूप से भी नहीं किया था
मै चार दिन जायूंगा...उसने भारद्वाज को टटोला
क्या नाम है तुम्हारा
"मनोज " .
उसमे "सिंह साहब फेमिली" वाला शहरी अभिजात्य एब्सेंट था यही उसका पोजिटिव पक्ष था ...पर सिंह फेमिली का पूर्व इतिहास उससे एक शंकालु दूरी रख रहा था ..भारद्वाज ने  त्यागी की मझोली अकलमंदी को इग्नोर करते हुए  कप्तानी-धर्म के चरित्र की भूमिका को बखूबी निभाते हुए डीसीज़न पेंडिंग रख दिया.
वो अगले दिन सुबह फिर उसी चक्की पे मिला ..साइकिल  पे आटा रखते रखते मेरे पैर का नाखून उखड गया ..उसने मेरी साइकिल थाम ली ..थामे वापस  मेरे साथ आते आते उसने बताया उसका एडमिशन हो गया है...घर पर उसने आटा उतारा ओर अपने हाथो में बोरा उठाये अन्दर तक रख आया ..गर्मियों ने उसके चेहरे के पसीने देखते हुए मैंने पानी ऑफर किया ...वो गटागट पी गया ..ओर मिलेगा..उसने कहा
 ठंडा पानी मामी पीने नहीं देती.. जैस हम  फ्रिज को खा जायेगे
. तसदीक हो गया...मनोज फेमली   मेंबर नहीं है
गले चार दिनों में कई चीज़े एक साथ हुई....मनोज की टीम में एंट्री हुई.... .कमाल का बौलर निकला वो..हवा की तरह तेज फेंकने वाला .उठती गेंदे..भारद्वाज इम्प्रेस हुआ ..बाकी लोग भी....गली में एक भूरे रंग का छोटा पिल्ला  पता नहीं कहां से आ गया ..
वैज्ञानिक लोग बोलते है इस बिरादरी में प्यार सूंघने की गज़ब सेन्स है .. मनोज में उसने जाने यही  बू सूंघ ली ....उसके पीछे हो लिया...बुजुर्ग सभ्य बिरादरी स्नेह भी संकोच ओर दूर से करती है .दया भी डिस्टेंस से ...मनोज थोडा पगलेट है...गंवई जो ठहरा ...अपने हिस्से की आधी रोटी तो देता ही..मामी रसोई से चुपके से दूध भी देना लगा..एक रोज बारिश हुई..स्टोर से पुराने कट्टे निकलकर एक बेंच के नीचे घर जैसा अरेंजमेंट करके" जैकी " नाम भी दे दिया
...चतुर्वेदी पुराण अपने उठान पे था ....सूबेदार साहब  अपने बेटे से मिलने  शहर से बाहर थे ... ज्ञानीजन वो है जो कब  किसी चीज़ को रिजेक्ट करना है जानते है ...अपनाना नहीं! . अकडू फेमिली ने पिछले दो सालो में डिस्टेंस के  जो मानक बनाये थे एक देसी पिल्ला बजरिया मनोज  उसे ध्वस्त करने में अपना मूक योगदान दे रहा था .
जैकी के आगमन ओर   सूबेदार साहब के छुट्टी पे जाने की प्रोग्रामिंग पता नहीं किस दुष्ट ने की थी..(मेहता अंकल ऐसे  हादसों को " विधि का विधान  "कहते है ) मेच की तैयारी जोरो से चल रही थी ...पर कहते है ना जिंदगी में जो सुख इंजेक्ट करता है...वही दुःख भी....सूबेदार साहब की एंट्री मोहल्ले में हुई...ओर जैकी उनकी निगाह में पड़ा....नफरत के पास तर्क नहीं होते ...ओर कुछ लोग नफरत करने में बड़े कुशल होते है ..सूबेदार साहब ने इस फलसफे को बड़ी शिद्दत से निभाया जब उनके तरीके जैकी को बाहर करने में फ़ैल हुए..तो उन्होंने अकडू फैमली की घंटी बजा कर ऑफिशियल शिकायत दर्ज कर दी मनोज के खेल पर भी बैन लग गया..भारद्वाज का पल्स रेट बढ़ गया ओर हमारे भीतर गुस्सा .....मनोज घर से निकलता तो पर सामान लाने ...पार्क को देखता..जैकी उसके  पीछे दौड़ लगा देता ...मैंने एक दो बार उसे रोकने की कोशिश की ..
 नहीं यार मामी वापस भेज देगी..उसने सर झुकाकर कहा था ...मां अकेली है ...पढाई के लिए पैसे नहीं है उसके पास ...उस रोज़ उसने फ्रिज का पानी भी नहीं पिया ..जैकी उसके आस पास पूँछ  हिलाकर दौड़ता रहा ...
सूबेदार साहब ने  तडके  मुंह अँधेरे दो दफे जैकी का अपरहण किया..कही छुडवाया पर  जाने कैसे जैकी सूंघता सूंघता शाम ढले वापस आ गया…. उकडूं बैठ कर  जैकी अपनी कई सोशल विजिट त्याग कर  मनोज के दरवाजे पे जाकर उसे आवाज देता...नौकरों के दुत्कारने को इग्नोर करता..फिर अपने प्रयत्न में लग जाता
उदास होकर उसके दरवाजे के पास बैठ  जाता ..ज्यादा  भूख  लगती  तो हमारी  दी हुई रोटी  मुंह में ले जाकर वही बैठ कर खाता ..मैच के दिन नज़दीक आ रहे थे ....मनोज को फिर चक्की के पास पकड़ा गया ...भारद्वाज ने उसे दोस्ती का वास्ता दिया ..मनोज ने वादा किया  पहले मेच के दिन वो कोई बहाना बना कर निकल लेगा ....पर मेच के लिए व्हाईट शर्त पैंट आवश्यक  शर्त थी..तय हुआ अपने बैग में भारद्वाज उसके माप के कपडे रख देगा.. मनोज ने मुझसे वादा लिया के मै जैकी को दूध देता रहूंगा .. ... 
शनिवार को हमारा पहला मेच था ..उस रोज सब कुछ अच्छा हुआ मनोज ने शानदार बोवलिंग की थी...हम मेच जीतकर ख़ुशी ख़ुशी लौटे ..तय हुआ था मनोज हमारे पंद्रह मिनट बाद अलग रास्ते से मोहल्ले में घुसेगा ...पर पार्क के किनारे जैकी के जोर जोर से  कराहने की आवाज थी.. उसकी एक टांग टूटी पड़ी थी  पार्क में खेलते  छोटे बच्चो ने बताया .... सूबेदार साहब ने दो तीन बार लाते मरी तो जैकी उन्हें काटने दौड़ा ....सूबेदार साहब ने अपनी घूमने वाली लाठी उस पर चला दी थी ...सूबेदार साहब इंजेक्शन लगवाने गए थे .
मनोज उसके पास बैठा रहा ..जैकी की कराहे जारी थी ....हमने दूध में दवा की गोली मिलाकर पिलाई..कुछ देर कराह कर जैकी थक कर सो गया .मनोज वही बैठा रहा ...खामोश..उसकी मामिका नौकर उसे दो दफे बुलाने आया ....पर वो नहीं गया
थोड़ी देर में चला जायूँगा .उसने हमसे कहा....वो जैकी  की पीठ पे हाथ फेरता रहा ...
मै  खाना खाकर सो गया ..... एक घंटे बाद मां ने उठाया ..."तेरे उस लड़के ने सूबेदार साहब की कार का कांच तोड़ दिया है " ...गायब है
मै हडबडा कर उठा था ...अकडू फैमली के घर के आगे भीड़ थी...सूबेदार साहब  मौलिक गालियों पे उतरे हुए थे  .आधे घंटे शोर गुल के बाद बीच बचाव के बाद मनोज की मामी ने माफ़ी मांगी एयर उनके शीशे का हर्जाना देने का वादा भी किया ....मनोज का पता नहीं था ...लौटते  वक़्त  मैंने देखा जैकी बेंच के नीचे अब भी सोया पड़ा था.
अगले रोज़ से मनोज मोहल्ले में नहीं दिखा.......दो रोज ..चार रोज..मै जैकी की दूध पिलाता रहा ...जैकी मनोज के घर की ओर देखकर आवाजे लगाता ...पर मनोज नहीं दिखा.....दो हफ्ते के बाद जैकी लंगड़ा कर चलने लायक हुआ ...हमने तीन मैच जीत लिए थे ...चौथा मेच हार कर कर हम लौटे तो जैकी भी नहीं दिखा......कभी नहीं
दिखने के लिए .
.


35 टिप्‍पणियां:

  1. काफी दिन बाद आपकी पोस्ट आई है।

    पोस्ट की शुरूवात थोड़ी कमजोर सी लगी लेकिन अंत आते आते पोस्ट ने एकदम जकड़ लिया। कुछ नेरेशन सजीव हो उठे मसलन आटे का डब्बा रखते वक्त....नाखूनों में चोट....साइकिल थामना......एकदम शानदार लेखन।

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  2. कितने किरदार आस पास घुमते से लगे ..फर्क सिर्फ जगह का है पात्र हु -बहु वही है ..त्यागी ,भारद्वाज ,मनोज ,चतुर्वेदी जी और सूबेदार
    मोहल्लो में पलने वालों की कहानी है ...आपकी यादों की गलियों की सैर मुझे अपने मोहल्ले में ले गई जहाँ ऐसे ही एक सूबेदार नाली की पटिया टूटने के डर से बछो को खेलने नहीं देते थे...

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  3. ना जाने सूबेदार साहब जैसे लोगों ने कितने मनोज और जैकी को बेघर किया है.. अनुराग भाई आपके लेखन में प्रवाह और जादू है.. बहुत बढ़िया...

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  4. ब्लॉग लेखक के द्वारा अनुमोदित टिप्पणी

    पूरे आठ हज़ार पाँच सौ सत्तानबे लफ़्ज़ों की इस पोस्ट में सूबेदार साहब नफ़रत करने के लिये लाज़िमी तौर पर घुसे पड़े हैं..
    ऎसे लोग ज़िन्दगी को कोसते हुये, और ज़िन्दगी ऎसे लोगों को ढोने की शर्मिन्दगी कॊ कोसते हुये गुज़र जाया करती है ।
    बेशक खाली पड़ी जगहों पर ख़ुदा फेंके जा सकते हैं, लेकिन उस हृदयहीन सूबेदार के पास ठौर कहाँ पायेंगे ?

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  5. पोस्ट पढ़ते भर खयाल आतारहा कि आपका कहना हैकिआप कहानी नही लिखते....

    अगर इन हक़ीकतों को कहानी ही कह देंगे तो कोई उज्र नही होगा....!!

    सोचती हूँ किकुछ लोगो को जिंदगी तज़र्बे कितने देती है.....!!

    जिंदगी में जो सुख इंजेक्ट करता है...वही दुःख भी....

    आज का फेसबुक स्टेटस मिल गया मुझे

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  6. आपकी क्रिकेट रणनीति तो ऐसी बन रही है जैसे CIA का लॉन्ग टर्म वार प्लान हो तालिबान को परास्त करने के लिए | लेकिंन लेकिन आपका सूबेदार घाघ मुल्ला उमर की तरह निकला | संस्मरण लिखने में तो महादेवी से भी दो कदम आगे हैं |

    लड़कपन में क्रिकेट का जूनून बहुत था पर अब तो एकदम से रूचि खतम हो गयी है | मैच तक देखने का मन नहीं करता | जीवन में समय-दर-समय कैसे रूचियाँ और समझ बदलती है पता ही नहीं चलता |

    खैर, ये लिखें की जरूरत नहीं कि आप ने बहुत अच्छा लिखा है |

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  7. अत्यंत सूक्षम स्मृतियों से परिपूर्ण रोचक प्रस्तुति ।
    बचपन की यादें कभी हंसा जाती हैं , कभी रुला भी देती हैं ।

    लगता है यह पोस्ट आपने जल्दबाजी में लिखी है । आशा करता हूँ भाई गिरजेश राव जी न पढ़ें ।

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  8. हाय! कितना वफादार निकला जैकी॥ बढिया कहानी... बधाई॥

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  9. बहुत दिनों बाद आपकी पोस्ट आयी .शीर्षक ने भ्रम दिया के कोई नज़्म होगी पर इस लम्बी पोस्ट को गौर से पढने पर कई चेहरे निकले . पोस्ट लिखने का स्टाइल थोडा रूटीन से हटकर है वैसी ही टन है जैसी वही" इश्क की बायलोजी "में है फिर भी कई सारी लाइने मिली जैसे
    बैचेनियो ओर तल्खियो का कोकटेल .
    संकट थे जो सबके निजी निजी जोड़कर सामूहिक
    .पिताओ की दूरगामी दृष्टियों
    माँ के इमोशनल बैंक
    ग्यारह सौ रुपये के मुताल्लिक कई ख़्वाब भी टीम मोटिवेशन की प्रक्रिया का हिस्सा थे.
    यूँ भी सात्विकता मोर्निंग वाक् की तरह है ..आप कभी भी शुरुआत कर सकते है . किसी रोज़ भी ब्रेक ले सकते है..
    हर उम्र अपना एक यक्ष प्रशन लेकर आती है ओर पिछले किसी तजुर्बे को रिकंसट्रक्ट करती है
    बुजुर्ग सभ्य बिरादरी स्नेह भी संकोच ओर दूर से करती है .दया भी डिस्टेंस से .
    ज्ञानीजन वो है जो कब किसी चीज़ को रिजेक्ट करना है जानते है ...अपनाना नहीं!
    जिंदगी में जो सुख इंजेक्ट करता है...वही दुःख भी...
    .नफरत के पास तर्क नहीं होते ...ओर कुछ लोग नफरत करने में बड़े कुशल होते है .

    जैकी की 'सोशल विजिट" भी चेहरे पर एक मुस्कान छोड़ जाती है ,

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  10. शुरुआत में पोस्ट एक खास टच से शुरू होती है अपना वही टेस्ट बनाते हुए अंत में थोडा सीरियस हो जाती है इस पोस्ट की यही खासियत है आपने ये टच क्यों दिया ओर क्यूँकर कुछ शब्दों का इस्तेमाल कुछ खास तरीके से किया शायद आप बता सकते है लगा के आप चतुर्वेदी के चरित्र को थोडा ओर हाईलाईट करेगे पर अंत में गंभीर कर गए .
    लिखते रहिये आपकी ख़ामोशी चुभती है .

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  11. एक अच्छे संस्मरण का दुखान्त

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  12. कोई पात्र अनजाना नहीं मिला इस कहानी में. सभी लगा कभी न कभी मिले थे कहीं.

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  13. आप इसे उपन्यास की शक्ल दें...बेहतरीन पोस्ट है।

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  14. डाक्टर साहब, आपके लेखों में जो एकरसता आ गई थी, वह यहाँ से समापन की ओर दिखने लगा है..

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  15. क्रिकेट मेच खेलते - खेलते कहानी जेकी और मनोज के माध्यम से जीवन के दर्द और वफादारी का अंजाम भीतर तक खारोच देता है

    ढेर सारे बेमिसाल वन लाइनर ब्रेन सेल को गुगुदाते ...बस कमाल के हैं!

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  16. बड़ा ही रोचक कथानक, सलीके से उद्घाटित होता हुआ।

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  17. अनुराग जी बहुत देर से आपके ब्लॉग पर पहुँची। व्यस्तता तो महज बहाना है...। बस नहीं पहुँच पाई थी अब तक।
    अंदर कहीं कोई बीज जो दबा पड़ा है, मरा नहीं है, लेकिन धड़कता भी नहीं थी कि उसके जिंदा होने की शिनाख्त की जा सके, आपको पढ़ते हुए बस धड़कने लगा है, अपने जिंदा होने का सुबूत देने लगा है, जरा-से पानी की तलब है उसे कि अंकुरित हो जाए और बस...

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  18. चतुर्वेदी जी और सूबेदार साहब शायद अलग अलग शक्लें लिए हुए हर शहर के मोहल्ले में मिल जायेंगे... बहराल हर सिचुएशन को बखूबी पोट्रे किया है आपने, चाहे वह मनोज के कपड़े हों, सूबेदार की गाली गलौज या फिर बारहवीं के विद्यार्थियों की स्थिति..

    ठाकुर इतना गेप मत रखा कीजिये पोस्ट्स में, इस तलब का भी कुछ ख्याल कीजिये...

    मनोज

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  19. bhai kush ke shabdon me 'mere sardara to aap hi ho....'

    nitya ke tarah jab kal yahan aaya to
    .....bachhan-chachhan ke film ke tarah.....is blog pe bhi first day...
    first show......ke tarz par 'pahla'
    comment.....bina padhe likh mara....
    lekin google bawa ko dhoka nahi de paya....aur o mere galat chahat ko...
    lagta hai galti se gatak gaye.......
    but ye comment padh ke mara hai....
    kal dekhta hoon laga ya na laga...

    pranam.

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  20. इत्तफाक है कि हमारी भी सबसे पहले जिस कुत्ते से दोस्ती हुई थी उसका नाम भी जैकी था! और आज वह भी न जाने कहा होगा... कही होगा भी या नहीं? हर मोहल्ले में एक भारद्वाज...एक सूबेदार..और मनोज मिलते हैं! बस उनके नाम अलग हैं...लेकिन नाम से क्या फर्क पड़ता है! चरित्र वही हैं...सेम टू सेम !

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  21. पहली बार आयी और आने के बाद
    अफ़सोस और ख़ुशी दोनों हुई..
    देर से आने का अफ़सोस
    और फिर भी आ जाने कि ख़ुशी..!!
    लगा कि कहानी का हर पात्र
    हमारे इर्द-गिर्द घूम रहा है...!

    "घरो को व्हील पर होना चाहिए ..
    ताकि उनकी पोजीशनो को मुख्तलिफ
    जगहों पे सेट किया जा सके ..."



    कुछ ऐसी ही ख्वाहिश मेरी भी रही थी कभी...
    जो जिन्दगी के इस मोड़ पर आ कर ठहराव मैं बदल गयी है !!
    कहानी कई मोड़ लेती है...जिन्दगी की तरह...!!
    भावपूर्ण.....!!

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  22. .टीम ने कई बार तमन्ना की थी के घरो को व्हील पर होना चाहिए ..ताकि उनकी पोजीशनो को मुख्तलिफ जगहों पे सेट किया जा सके .... बैचेनियो ओर तल्खियो का कोकटेल . ."
    ऑफिसों का सन्दर्भ इतने जोर से देते जैसे नॉन क्रिकेट दिनों में सरकारी बाबू फाइलों को राजधानी एक्सप्रेस की तरह निबटाते

    मुझे शुरू में इस्तेमाल पंच अच्छे लगे और कहानी के बहाने सरकारी महकमों की खिचाई भी.

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  23. कई दिनों से ऐसी निश्चिंतता नहीं मिल रही थी कि इस कहानी को उसी संजीदगी से पढूं, जिससे इसे लिखी गयी है...आज समय मिला..पढ़ा...लेकिन दिमागी हालत अभी ऐसी नहीं कि कुछ भी कह या लिख पाऊं इसपर....

    बस इतना ही कहूँगी...

    इस तरह से कथा रूप में आगे भी लिखते रहें और पोस्ट अंतराल इतना न रखें...

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  24. आपकी लेखनी...ओह !!!!

    बेजोड़ !!!!

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  25. Dear Anurag,
    Nice and vivid depiction indeed !
    Keep it up !

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  26. aapki post aaraam se padhne vali hai ...aadhi hi padh paaee , bahut achchhi lagi ...lekhni ka pravaah ...sab sahaj sa hai ...

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  27. डॉ0 मुद्दत बाद आप ब्लॉग पर दिखे..... भारद्वाज जैसे लोगों को लेकर जिस तरह कहानी को तह ब तह गूंथा है वो लाजवाब है. ज़रा जल्दी जल्दी ब्लॉग पर तशरीफ़ लाया करें. मोहल्ले कुछ और लोगों को ब्लॉग पर टहलाने आईये.

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  28. शानदार है।

    अपना भी मोहल्ला याद आ गया।

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  29. बेहतर कथानक ,प्रशंसनीय रचना।

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  30. हर मोहल्ले में एक ऐसा ही कैरेक्टर होता है जो उस मोहल्ले की प्रतिभा को दबाने का काम करता है.. वैसे हमारे केस में तो प्रेम भी दबा दिया गया था मोहल्ले के पात्र द्वारा.. पर अब क्या किया जाए..
    खैर कुछ किरदार ज़िन्दगी में बिना वजह ही आते है.. और आकर चले भी जाते है.. गाहे बगाहे ये किरदार यादो में आते जाते भी रहते है..

    पर जनाब आप गाहे बगाहे ना आया करो.. चक्कर लगाते रहो हजूर.. अच्छा लगता है

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  31. बेहतर कथानक ,प्रशंसनीय रचना,बधाई

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  32. @neeliam..@dr daral.....गुलज़ार के बाद मनोहर श्याम जोशी दूसरे ऐसे लेखक है जिनका "औरा " मुझ पर कई दिनों तक काबिज़ रहता है .. ओर मे उससे शर्मिंदा नहीं रहता ....ये टोन ...ये जुमले ...उनकी देन है....रेडार ये पोस्ट उनको समर्पित है ........लिखने में एक बंधी बंधाई परम्परा को तोड़ते हुए उन्होंने नए 'अनियम " बनाये......लेखक को ओर आज़ाद किया....की जो लिखना है लिखो...स्क्रिप्ट राइटिंग की तरह बोलचाल के जुमलो का तरतीब से इस्तेमाल.......कई .लोग पसंद भी करते है कई लोग नहीं भी.......
    @dr amar @yogendr ji...@arun ji
    खैर मुझे याद है मनोज ने एक बार मुझसे कहा था ...तुझे जान बूझ के धीमी बोल डालता हूँ ताकि चोट न लगे ......मनोज जैसे लोगो के भीतर कुदरत कुछ डाल के भेजती है .जिस वो चाहे भी तो नहीं बदल सकते....यही कुदरत सूबेदार साहब के साथ भी करती है ....मनोज कहाँ है पता नहीं........भारद्वाज कहाँ है ये भी नहीं पता.......भारद्वाज की सफ़ेद पैंट शर्त अब तक याद है ....एक ओर लेफ्ट हेंडर बौलर हुआ करता था हमारी टीम में "सोनू " वो भी कहाँ है नहीं पता ....पता नहीं अब भी क्रिकेट खेलते होगे या नहीं.......
    @kanchan...@sonal
    फ्लेश बेक में जाता हूँ तो सोचता हूँ मनोज क जैकी से जुड़ाव क्यों कर हुआ.....क्या खुद अकेला महसूस करता वो बच्चा जैकी को हमराज बनाना चाहता था .सुखो का दुखो का....मनोज को मैंने उदास होते भी देखा था .टूटते भी......उसकी मामी शायद एक साल ओर रही फिर माकन छोड़कर चली गयी......किरायेदार ऐसे ही होते है ..आपकी जिंदगी में उथल पुथल करते है ...फिर चले जाते है.....

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  33. ये पोस्ट कब आई और कैसे छूट गई थी मुझसे???

    आपकी किस्सागोई बस आपकी है डा० साब...unmatched, unparalleled...

    और फिर किस्से की गोई को अलग मोड़ देती आखिरी की टिप्पणी...

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  34. क्रिकेट पर हाल ही में वैतागवाड़ी पर फर्स्ट बोल्लर पढ़ा था, वहां खेल कि बारीकियां थी यहाँ उसके साथ चलते समानांतर परिवेश कि ... आपका ही एक कथन "सबके पास अपने हिस्से का सच होता है " ये मार्के का है कई चीजों पर लागू होता है सच के साथ, प्यार, क्रिकेट पर भी और जूते पर भी...
    जिसने क्रिकेट खेली हो रम कर (मैं) उससे पूछिए ये खेल हमारे कितनी अन्दर तक धंसा होता है. लेखन से मनोहर श्याम जोशी कि थोड़ी सी याद आई.

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  35. ओह आपने खुद ही जवाब में लिख डाला है ये. पोस्ट पहले ही पढ़ ली गयी थी.

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कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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