2008-08-29

इन मुई गोलियों का कोई मजहब नही होता


छत से नीचे झाँककर देखता हुआ वो आदमी जिसकी टांग पकड़े दूसरा आदमी खड़ा है कह नही सकते की गोली उसके पार से निकल जाये ओर वो वही मर जाये ,सरकार उसको इस काम की शायद सात या आठ हज़ार रुपये महीना देती है....पता नही वो किस गाँव का है ?उसके गाँव में शायद केबल ना हो ,उसकी बीवी अपने रोजमर्रा के काम में उलझी हो ओर उसकी बेटी स्कूल गई हो ... १८ घंटो के बाद भी अगर वो जिंदा रहा तो कोई उसका इंटरव्यू लेने नही आयेगा..उसे सबसे पहले यही मालूम करना है की गोली किसको लगी ....उसने अपने दो साथियों को गिरते देखा था .....उसके बड़े अफसर शायद उसे एक दिन की छुट्टी दे दे .........


छोटे के स्कूल से .....परचून की दुकान तक
कितनी सरहदे खींची हुई है अब भी गाँव मे.......

फ़ौजी की लड़ाई मरने के बाद तक चलती है




दो दिन पहले जम्मू मे १८ घंटे लड़े जवानो के लिए

2008-08-25

"आदमी मे मगर जिंदा शिकायते रही "


इस वक़्त हर आदमी के पास शिकायतों का एक पुलंदा है ....सिलेवार लगाई गयी तकलीफों सहेज कर रखी है ..ये तकलीफे मगर इस "टेक्नोलोजी सक्षम" समाज को धीरे धीरे अंधेरे गलियारे की ओर धकेल रही है ,ऐसा गलियारा जिसके दोनों ओर सजे गमलों में केक्टस लगे है ..नकारात्मकता के केक्टस .....




सोमवार अक्सर ओर दिनों की अपेक्षा ज्यादा मसरूफ रहता है .शायद इतवार की छुट्टी के कारण...एक हॉस्पिटल का राउंड लेकर जब क्लीनिक पहुँचता हूँ...तो फरजाना दिख जाती है ...उसके साथ उसी की एक हम उम्र लड़की है...१९ साल की फरजाना के हाथ में एक फार्म है... रोजाना डेढ़ किलोमीटर पैदल चलकर टेंपो पकड़ कर स्कूल जाना उसकी रोज की कवायद में शामिल है ,सुबह उठकर भैंस का दूध निकालना ओर रात को लालटेन की रौशनी में पढ़कर वो इंटर में 87 प्रतिशत नंबर लायी है ...उसे 20 हज़ार का वजीफा मिला है चेक के रूप में ,इन पैसो को वो पढ़ाई के लिये आगे इस्तेमाल करना चाहती है....पर दिक्कत ये है की .किसी बैंक में उसका अकाउंट नही है ओर नया खाता खोलने के लिये बैंक वाले किसी खातेदार का साइन मांगते है .....इस शहर में वो सिर्फ़ मुझे पहचानती है
आज से ७ साल पहले १२ साल की इस बच्ची को अपनी माँ के सिरहाने एक हस्पताल में देखा था ...उसकी माँ को connective tissue disorder है ,इसलिए वे हर महीने-दो महीने एक चक्कर मेरे क्लीनिक का लगाते है ..
अपने साथ आयी लड़की के लिए वो हिचकिचाते हुए पूछती है ..क्या मै उसके फार्म पर भी साइन कर दूँगा ..बिंदिया ..दूसरी लड़की का नाम है...
वो दोनों उस समाज का प्रतिनिधत्व करती है जहाँ पढने से कतराते लड़को को पुचकार कर धंधे में बिठा दिया जाता है ओर पढने की इच्छा रखने वाली लड़की की पढ़ाई जारी रखने के लिये बेहद चतुराई से रखे गये "तथाकथित नैतिक' ओर सामाजिक तानो बानो को फलांघने का उलहाना भी लंबे समय तक झेलना पड़ता है इस दोयम दर्जे के समाज की तमाम बाधायों से वे लड़ती है पर अपनी संघर्षो की कड़वाहट को सहेज कर नही रखती .....अपने सपनो को सहेजती है
मै अपने बैंक मेनेजर को फोन करके साइन कर देता हूँ.... जाते जाते वो मेरे लेप टॉप पर धोनी को देखकर पूछती है .आप धोनी के भी फैन है(दसवी क्लास मे उसकी फर्स्ट डिविसन आने पर मैंने उसे कलाम की किताब "विंग्स ऑफ़ फायर ".दी थी )....मै उससे कहना चाहता हूँ मै हर उस इंसान का फैन हूँ जो असल जिंदगी में हीरो है .......पर सिर्फ़ मुस्करा देता हूँ...


सोचता हूँ अब इन नेज़ो को तराश लूं
ओर घोप दूं आसमान के सीने मे.........

इल्म क़ी बारिश हो ओर वतन भीग जाये

 













नेल्सन मंडेला अपनी आत्मकथा मे लिखते है की किसी ने उनसे पूछा कि "आप २७ साल जेल मे बंद रहे आपको कही गुस्सा नही आया ?ओर आप उसी जेलर को अपने सम्मान समारोह मे बुलाना चाह कर सम्मानित कर रहे है क्यों ?वे कहते है मुझे बहुत गुस्सा आता है इसलिए मैं इन लोगो को अपने साथ जेल के बाहर नही ले जाना चाहता मैं इनसे आजाद होना चाहता हूँ....
-आहा जिंदगी से


2008-08-20

'चार किताबे पढ़ लिख कर ये भी हम जैसे हो जायेगे "

ग्रीन टी शर्ट में "आर्यन "अपने कजिन के साथ



"बच्चो के साथ झाडियों में जुगनू ढूंढेगे
दिल के मुआमलात में बचपन भी चाहिए "-बशीर बद्र






पिछले साल दीवाली पर हमेशा की तरह बहुत भाग दौड़ रही ,दीवाली से पहले उपहारों का आदान -प्रदान,एक दूसरे के घर जाना ओर पेशे से जुड़े कई काम ....हर आदमी व्यस्त था रास्ते भी ख़ूब जाम रहे , अक्सर सड़को पर झूंझलहट रही, छोटी दीवाली पर ऐसे ही किसी ख़ास रिश्तेदार के घर जाते वक़्त एक चौराहे पर जाम मे कई देर तक फँसे रहने के बाद ,ग़ुस्से ओर झुंझलाहट मे मै जब ट्रॅफिक पोलीस वाले के बराबर से गुज़रा तो पिछली सीट से ज़ोर से आवाज़ आई “हॅपी दीवाली” मेरे ४ साल के बेटे ने उस ट्रेफिक पुलिस वाले को कहा.तो उसके चेहरे पर इन तनाव के पलोमे भी एक मुस्कराहट आयी अचानक मुझे लगा सचमुच हम छोटी छोटी चीज़ो को कभी कभी कितना मुश्किल बना देते है ओर देखो ये इंसान आज के दिन भी अपनी ड्यूटी कर रहा है ,घर से दूर. मैने शीशा नीचे उतारा ओर कहा” हॅपी दीवाली”
उसने मुस्करा कर जवाब दिया “आपको भी”.

बंगलोर में एक 8 साल की बच्ची दही चावल से भरा कटोरा सिर्फ़ इसलिए खा जाती है की उसके पापा उसे सर मुंडाने देंगे, वो इसलिए सर मुंडा कर स्कूल जाती है क्यूंकि उसकी क्लास में पढने वाला एक बच्चा lukemia से पीड़ित है ,ओर chemotherapy की वजह से गंजे सर के साथ वो स्कूल आने में शर्म महसूस करता था ….. उस नन्ही परी को किसने सिखाया बड़ा होना ?-







3D Spinning Smiley

2008-08-18

इश्क -मुश्क आग का दरिया ओर छापामार सेना ...



फलसफा नंबर एक -
“तुमने जिंदगी में क्या कमाया है ये तुम्हारे बैंक अकाउंट से नही तुम्हारे पास कितने दोस्त है इससे पता चलता है .”ये जुमला अक्सर गुजरात की अड़लट्रेडट शराब के घूँट भरते हुए होस्टल के कमरों में अक्सर कहा जाता …जिसमे बेकग्राउंड में धीमे –धीमे गाते जगजीत सिंह अक्सर इस बात की तसदीक करते ,वक़्त बदलता …लोग बदलते …कमरा बदलता …पर ये जुमला वही रहता …..
इस जुमले को आज सुनकर ढेरो लग हंस देंगे ..कुछ ‘लड़कपन के वो दिन वाला गीत कहकर …’पीठ थपथपा देंगे ,कुछ नाक भो सिकोड़ लेंगे पर क्या आपने कभी अपने दोस्तों को गिना है ? क्या उन्हें आप उंगलियों पे गिन सकते है ?जब आप 4 साल के होते है तब सब आपके दोस्त होते है ….10 की उम्र में तकरीबन 30 …15 की उम्र में 20 .ओर 20 की उम्र में 15 ….. ये दायरा ओर सिकुड़ता जाता है .

ब तक हमने नही किया था प्यार
किया था क्या ,
ताज्जुब है ? 
 
याद नही किसने लिखी , ओर कहाँ पढ़ी पर जेहन में आज भी है . तब प्यार फिजायो में घूमता था ,कब कौन इसकी चपेट में आ जाये ,कह नही सकते .
पहले साल सारी लड़किया “बस दोस्त ”…..ओर आपको किसी ओर नज़र से नही देखती .(ऐसा उनका कहना था }बोयस होस्टल में दोस्तों में एक अलिखित समझौता होता कि फला शख्स ,फला पर सेंटी है तो बाकि समझदार लोग अपने आप उस लड़की से दूरी बना लेते थे …….
प कितने ही बड़े तीरंदाज हो ,क्रिकेट के ओपनिंग बेट्समैन हो या "अनाटोमी की  ग्रे' आपको जबानी याद हो …..किसी ख़ास लड़की के सामने आते ही ……दिल बहुत तेज़ी से धड़कने लगता ,,,,पैर कापने लगते …,,,ओर आप जो उसे प्रपोज़ करने की सोचकर गये होते उसके घर के हाल - चल पूछ आते या फ़िर सडे गले कोई नोट्स ले आते ……शर्ट के अन्दर पड़ा ग्रीटिंग कार्ड्स पसीने से भीगा आपको गाली देता लाइब्रेरी की सीडियो पर कई आशिक राजधानी एक्सप्रेस की तरह धड-धडाते जाते ,लेकिन फिरोजपुर जनता की तरह लुटे पिटे से वापस आते ,
श्क बड़ी कमीनी शै है …आपका सुख - चैन छीन लेता है ।अगर आपने प्रपोज़ करने की पहली बाधा पार कर ली तो …"हाँ ”की तलवार गिरने में बहुत वक़्त लेती ….इस दौरान अगर “दोस्ती ” बरकरार रहती .तो एक गुंजाइश बाकि रहती …… अमूमन लड़किया “माहोल ” से ज्यादा प्रभावित रहती …अपने अकेले दिल पर उन्हें थोड़ा कम भरोसा रहता .उनके हॉस्टल में लड़कियों का एक खास समूह होता जिसकी घुसपेठ हर बैच में होती जो अमूमन हर लड़के का एक “ करेक्टर - सरटिविकेट ” तैयार करता ,जिस पर बाकायदा कुछ खास टिपण्णी लिखी जाती .......ओर भविष्यवाणी की जाती कि ये लड़का गब्बर सिंह से बड़ा विलेन है . . उनका संविधान अपने मन मुताबिक संशोधन करता जिसके मापदंड ऐसे थे कि अगर ‘ भगवन राम ‘ भी भेष बदल कर आते तो रावण से बड़े विलेन करार दिए जाते
क्सर हर रात इस समूह कि कुछ सीनियर कन्याये परिकर्मा करते हुए हर कमरे की गंध लेती कि कही किसी गरीब का घर तो नही बस रहा .जहाँ भी उन्हें ये खुशबु मिलती “ब्रेन -वाश का सेशन आपातकालीन स्थ्ति घोषित कर शुरू किया जाता .उस वक़्त under-graduate के लड़कियों के दो हॉस्टल थे .... ओल्ड LH , ओर न्यू LH .(ऐसा नम उनकी बिल्डिंग के लिए दिया गया था ) ....अगर आप का दिल किसी ओल्ड LH की कन्या पर आया होता तो आपको आगाह कर दिया जाता कि बेटे "रकीबो " से अलग कई अनदेखे दुश्मनों से छापामार युद्ध लड़ने के लिए कमर कस लो . ओर अपने "करेक्टर एसिनेशन "के लिए तैयार रहो .
से –ऐसे दस्तावेज़ तैयार होते कि रिश्वत लेकर झूठे दस्तावेज़ तैयार करने वाले सरे सरकारी बाबू शरमा जाये . एक दो गवाह भी अमूमन मौजूद रहते ……..आपके खिलाफ गवाही देने को …..ओर इस बात कि पुरी तसल्ली के बाद कि दिल के चारो कोनो में किसी कोने में आपके नाम कि कोई छोटी सी बूँद तो किसी लड़की के दिल में नही है .ये छापामार सेना वहां से कूच करती .
ओर आप बेचारे इन सबसे अंजान किसी कोने में सिगेरेटो से अपना बचा कूचा दिल फूंक रहे होते या जगजीत सिंह को सुन रहे होते. (शायद जगजीत सिंह भी ये नही जानते होंगे कि कितने प्यार में डूबे ,तैरते ,सँभालते ,अटके लोगो के वो खेवैया रहे है , अगर हमारा बस चलता तो कबका उन्हें ‘भारत - रत्न ” दिलवा देते ).......काश ये अवार्ड भी s.m.s वोटिंग पर आधारित होता 
खैर .इस छापामार सेना से जूझने के लिए हमारे पास कुछ गिने चुने उदारहण होते जैसे कि एक साहिब ने पहले साल किसी मोहतरमा को प्रपोज़ किया ओर आखिरी साल में लड़की ने उन्हें हाँ बोली ….वे कई प्रेमियों के लिए मिसाल बन कर रहे ..अक्सर चाय कि चुस्कियों के साथ वे इश्क के दांव पेचो पर मशवरा देते ....
पर दोस्ती ओर प्यार की एक नाज़ुक दहलीज़ पर जो लोग कुछ वक़्त बिताते . वो वक़्त बढ़ा मुश्किलों ओर उलझन भरा होता लड़के “हाँ ओर न ” के नाज़ुक झूलो में झूलते …..इस दौरान दूसरी किसी लड़की की ओर देखना भी ना काबिले बर्दाश्त गुनाह होता आपकी गर्दन फ़ौरन कलम कर दी जाती . आप लगातार “ओब्सेर्वेशन -पीरियड “ में रहते . .कुछ लोग इस आग के दरिया को पार ककर जाते कुछ गम को गले लगा लेते ....कुछ अपने सीने में इश्क को दफ़न कर लेते ओर कुछ फ़ौरन नए दरिये की ओर रुख कर लेते ..……यूँ ही जिंदगी चलती रहती …


बाद के सालो में इस छापामार सेना के कई प्रभावी सदस्यों ने कुछ ऐसे ही 'संशयास्पद चरित्र' वाले लड़को से लव मेरिज की ....


आख़िर में एक ओर कविता याद नही किसने लिखी ओर कहाँ लिखी…..
मै आपकी दोस्त हूँ
मै आपकी मित्र हूँ
ओर आप क्या चाहते है ?
मै ओर क्या चाहता हूँ ?


जय हो इस" आग के दरिया' की


फलसफा नंबर दो -
दुनियादारी की समझ बड़ी ग़लत चीज़ है ये आपको बदल देती है
दुनियादारी आपको चुप रहने का गुर सिखा देती है आप सलीके से उन्हें क्रमानुसार चुनते है ओर इनका इस्तेमाल करते है ..... दरअसल अब आपके पास एक ओर लोकर है .चुप्प्यियो का …..चुनी हुई चुप्पिया ……इस सभ्य समाज में रहकर" तटस्थता की ये चुप्पी "मोबाइल की तरह जेब में रहती है





2008-08-13

मेरे तजुर्बे बड़े है मेरी उम्र से



दोपहर एक हॉस्पिटल से कॉल आयी..रास्ते में भीड़ भरी सड़क पर अचानक आगे गाडियों में ब्रेक लगी ,उल्टे हाथ में मॉल पे लाल रंग से बड़ा सा मैकडावल लिखा हुआ ..उसके बाजू में "सिंह इस किंग" के पोस्टर पे अक्षय कुमार हँसता हुआ ...एक कोने पे बैनर टंगा हुआ ...केटमास पर ५०% की छूट ....दूसरा बैनर ......लिलिपुट पर ७०० रुपये की खरीदारी पे एक बैग....कार का शीशा खटका...ऐ साहब झंडा लो न....१० -१२ साल का लड़का .......बैनर को पढने की फ़िर एक कोशिश...साहेब लो न...मै .गाड़ी में लगायूँ ....कहते कहते उसने लगा दिया ....एक ओर दे ...मै उससे मांगता हूँ....पीछे गाडियों का हार्न बज रहा है...कितने का है एक ?मै पूछ रहा है ...एक रुपये का.....गाड़ी में चिल्लर ढूंढता हूँ ...एक पाँच का सिक्का हाथ में आता है....उसे दे देता हूँ....गाड़ी आगे बढाई है ...कुछ दूर चलने पर फ़िर गाड़ी रूकती है...शीशा खटक रहा है....साहेब ....बाकी के झंडे ....वो हांफता हुआ तीन झंडे मुझे देता है.....पिछले दो मिनट वो भागा है...... पीछे वाली गाड़ी का हार्न फ़िर बजने लगा है ..मै उसे कुछ कहना चाहता हूँ ..पर वो भीड़ में गुम हो गया है......
१० साल गुजर गये है आजादी ने बहुत कुछ बदल दिया है.....पर कुछ अब भी वैसा ही है......

रेलवे स्टेशन की ये पोस्ट कभी ब्लॉग शुरू किया था तब डाली थी...आज दुबारा वही दोहराने का मन किया ....जिन्होंने पहले पढ़ा उनसे गुजारिश की दुबारा पढ़े ....
13 august 2008 7.40pm




दिसम्बर की सर्द सर्दिया थी ओर कुहरा मुंह चिडा रहा था कुछ कुलियों ने अलाव जला लिए थे ओर हम गर्म जकेटो की  जेबों  मे  अपने  हाथो  दिए  ट्रेन का इंतज़ार कर रहे थे , समय काटने के लिए लगभग सारी "आउटलुक "पढ़ चुका था ,बावजूद इतनी सर्दी के नई दिल्ली  का  वो रेलवे स्टेशन अभी भी सोया नही था ,हम तीनो दोस्त छुट्टी बिताकर वापस कॉलेज सूरत जा रहे थे ओर रात १० बजे की जम्मू-तवी मे हम लोगो का रिज़र्वेशन था ,कोहरे की वजह से ट्रेन लेट थी ,घर सी लायी हुई आलू - पुरिया को हमने अखबार बिछाकर खाना तय किया ,वैसे भी पिछले दो घंटो से सिगरेट ओर चाय पी-पी कर फेफडे ओर पेट दोनों गाली देने लगे थे ,एक हफ्ते से घर मे रहने से उन्हें भी अब इस धुंये की आदत सी नही रही थी ,घर जाकर जैसे सिगरेट की तलब ख़त्म हो जाती थी ओर भूख बढ़ जाती थी ओर उस  एक  हफ्ते  मे  हॉस्टल  की  कभी एक कटिंग चाय ओर सुखी ब्रेड का वो butter toast,या सुखा पोह्वा या शेट्टी की कैंटीन का वो अजीब सा  संभार  का पानी छोड़ के आलू के ,गोभी के ओर तमाम परांठे  भी  माँ देसी घी मे तिरा कर खिलाती थी जैसे एक हफ्ते मे ही हमे गामा पहलवान बना के वापस भेजेगी ....
हमने एक suitcase को तिरछा किया ओर अखबार उसपे फैला कर अपने तीसरे दोस्त को आवाज दी जों रॉबर्ट  लुड्लाम के नोवेल मे घुसा हुआ था ,पुरी मे आलू -गोभी डाल के उसका रोल बनाके मैंने पहले को पकडाया ही था कि नीचे जमीन पे घिसट ता एक दस बारह साल का लड़का ठीक सामने आकर खड़ा हो गया .......मैले - कुचेले से कपड़ो मे उसने दो कमीजे ..........अपने बदन से ठंड को रोकने के लिए लिपटा रखी थी ......उसके हाथ मे ब्रुश था दूसरे मे बड़ा सा कपड़ा जों कई तहे बनाकर वो  शायद फर्श पे चलता था ,उसके कंधे पे एक खाकी रंग का स्कूल का बस्ता था पर उसमे किताबे नही जूते- पालिश करने का सामान था .......
उसने एक नजर हमारी आलू-पुरी पे डाली फ़िर अजीब से ढंग से हमारे जूतों को घूरता हुआ बोला "पोलिश करवाएंगे ? 
मेरे दोस्त ने उसे आलू-पुरी का एक रोल ऑफर किया तो उसने अजीब से अंदाज  में  उसे घूरा "पोलिश करवानी है "?  
उसने  हामी  भरी  ओर अपने जूते उतार दिए ,जब तक वो पोलिश करता रहा  उसने  एक टुकडा नही तोडा .....हम दोने ने स्पोर्ट्स   शूसपहने थे ....."कितने पैसे "  
मेरे दोस्त ने पूछा .तीन रुपया ?
मेरे दोस्त ने दस रुपये का नोट निकाला ...."छुट्टा नही है साहेब"
मेरे पास भी नही है ,अभी ट्रेन जाने मे वक़्त है तू इधर उधर घूम ले जब हो तब दे देना . '
वो लड़का एक टक मेरे दोस्त को देखता रहा ......उसके घुंघराले लंबे बाल माथे पे गिरे ........उन्हें हटाते हुए वो कुछ देर  तक  ठिठका  रहा  फ़िर आलू पुरी पे एक निगाह मार के घिसटता हुआ आगे चला गया ...हमने जल्दी जल्दी आलू पुरी ख़त्म की ,हमारा तीसरा दोस्त अब भी नोवेल मे दुबका हुआ था .............
"चाय पिएगा ? मैंने उससे पूछा उसने  हाँ  मे सर हिला दिया 
.हम दोनों उठकर आगे जा के एक चाय के स्टाल पे खड़े हुए वहां तीन चाय का आर्डर दिया ....एक सिगरेट फ़िर जल गयी .कितने पैसे "?मैंने पूछा . तीस रुपया . मैंने जेब से सौ का नोट निकाला ,साहेब छुट्टा दो . मैंने पर्स टटोला तो उसमे छुट्टा नही था ,मेरे दोस्त ने अपने पर्स मे से कुछ पैसे निकाले तो ढेर सरे सिक्के छन छन करके उसके पोलिश किये हुए जूतों के पास गिर गये . . मैंने उसे देखा तो उसके चेहरे पे मुस्कान आ गयी.....हम दोनों चाय के कुल्हड़ हाथ मे लिए लौटे तो वहां वही लड़का हमारे . दोस्त के पास उक्डू हो के बैठा था .....जो की अभी भी किताब मे मगन था ,
उसने हथेली मेरे दोस्त के आगे फैला दी "साहेब आपके बाकी पैसे "।



११ सल् पहले दिल्ली के रेलवे स्टेशन की एक रात

2008-08-10

रेड लाइट के बहाने कुछ गुफ्तगू ......


स्वर्ग की सड़क है पर कोई उस पर चलना नही चाहता ,नरक का कोई दरवाजा नही है पर लोग उसमे छेद करके घुस जाना चाहते है –
अजात



चौराहे पर रेड लाइट है पर पीछे गाड़ी में बैठे मह्शय को शायद मार्क्सवादी विचारधारा पसंद नही है ( लाल सलाम ) इसलिए लाल रंग देखकर भी वे हार्न दिये जा रहे है …उनके मुताबिक जब ट्रेफिक पुलिस वाला नही है तो मै क्यों खड़ा हूँ ..हार्न लगातार बज रहा है …साइड से वो मेरे पास से मुझे घूरते हुए निकल गए है ….जितनी बड़ी गाड़ी उतना बड़ा गुस्सा ……कोई रुकना नही चाहता है ... ऐसा लगता है पता नही कहाँ जाना है सबको ….जहाँ भी थोडी सी जगह दिखी …निकल लो ….क्रोध गाड़ी का एक्सीलेटर बन गया है ..लोग मोटरसाइकिल ओर ---स्कूटर की पिछली सीट पर क्रोध को बैठा कर बाहर निकलते है …उसकी आदत बिगड़ गई है वो हर जगह साथ चला आता है क्रोध ..अंहकार .. ?दोनों आपस में गुथ गये है ,मिल गये है .इतने की अलग –अलग शक्ल पहचानना मुश्किल है …सड़क पे आप हार्न बजाते है .. ऑफिस में मातहत को धकियाते है ओर ब्लॉग पे ?.किसी ने जरा सी वैचरिक असहमति हमसे दिखायी ….उसके गुण - दोषों पे माइक्रोस्कोप टिका दी …यही व्यक्ति जब आपकी प्रशंसा कर रहा था तब आप इस मुई माइक्रोस्कोप को धूल चटाते है ? हम उन्हें हमेशा सराहते है जो हमें पसंद करते है ..जिन्हें हम सरहाते है उन्हें हमेशा पसंद नही करते ….
एक सज्जन है जिन्होंने "लाफ्टर क्लब "बना रखा है ,वे कही भी मिल जाए आपके जीवन में खुशियों की महत्ता बताने लग जाते है .फ़िर एक फार्म निकालते है सामाजिक कार्यो के लिए आपसे चंदा मांगकर आपको उसका सदस्य बनाते है..सुबह सुबह उनके क्लब के सदस्य कालोनी के पार्क में जोर जोर से हँसते है .वे मुझसे खफा रहते है क्यूंकि कभी कभार मै अपने साडे चार साल के बेटे को पार्क में घुमाने ले जाता हूँ वो उन्हें हँसता देख मुफ्त में हँसता है......उनका बस चले तो खुशी का पेटेंट करा ले ..(जैसे पंडितो ने नर्क का भय दिखकर अपना बिसनेस चला रखा है .-फ़िर अजात )एक ओर मह्श्य है वे हमेशा ही खफा रहते है ,जब विजिलेंस में थे (अच्छी पोस्ट पे )तब इस बात पे खफा रहते थे की लोग काम इतना बड़ा कराते है ओर पैसे कम देते है .. ड्राईवर ओर मातहत को इत्ते जोर से सुबह सुबह डांटते थे की सारी कालोनी सहम जाती थी ...जो पैसे देता था उससे भी खफा जो नही देता उससे भी .....अब रिटायर हो गए है उन्हें सिस्टम से नाराजगी है ..समाज से नाराजगी है समाज भ्रष्ट है ...........क्रोध में पर एक खासियत है ये जाति धर्मं ,उम्र , लिंग - भेद जैसी सामान्य बातो से ऊपर उठ गया है भेदभाव नही करता .. मेरा १४ साल का भतीजा भी इंडियन क्रिकेट टीम से नाराज है
मेरा एक दोस्त कहा करता था की हम सब दौड़ रहे है...रेट रेस यू नो ....जो जितना जोर से दौड़ा उतना बड़ा चूहा ... इस रेस से परेशान भी है ओर इसे जीतना भी चाहते है ...इस भाग दौड़ में हम अपने आप को खो रहे है ....यही मै पिछली पोस्ट में कहना चाहता था .....के .....


साँस लेते है बिजली के तारो पे अब
रिश्ते कंप्यूटर के परदो पे बनते है

2008-08-09

एक ओर दिन खर्च हो गया जिंदगी का



रोज सुबह जिंदगी अपने झोले में से नया दिन निकालती है , ओर सूरज अखबार के साथ दिन भर का हिसाब आँगन में फेंक देता है अपनी अपनी जेबों में अपना अपना हिसाब लिए हम पूरा दिन खर्च कर देते है मायूस ओर थका सा चाँद भी जैसे कोई रस्म अदा करने फलक पे आता है ,उम्र इसी हिसाब किताब में गुजर रही है इक उम्मीद मगर रोज सिरहाने साँस लेती है की कल कोई मौजजा होगा .....




कई बार झंझोडा है
गुजरे वक़्त के सफ्हो को
कई बार झाँका है
दीवार के उस जानिब .......
अल्फाज़ फेंके है जोर से दूर तक
नाम लेकर गली गली घूमा हूँ
पिछले कई रोज से
सन्नाटा है जिस्म में
कोई आहट कही सुनाई नही देती
जिंदगी की पेचीदा गलियों में
गुम हो गयी है खुशी

सोचता हूँ थाने में रपट करवा आयूँ

2008-08-04

देस से दूर एक भींगी होली----


कुणाल किशोर
झारखण्ड की कोयला नगरी का धनबाद का ये लड़का यूँ तो सॉफ्टवेयर इंजीनियर है...ओर कुछ समय से अमेरिका के सन प्रांसिस्को राज्य में है ,उम्र में मुझसे छोटा है पर ढेरो तजुर्बे जमा करके बैठा है
ऑरकुट ने मुझे ढेरो दोस्त दिये ये महाशय उनमे से एक है ..एअरपोर्ट से उसने मुझे देर रात सर्दियों में पहली मर्तबा फोन किया था ....उसकी ख़ास बात उसकी हिन्दी है जो अमेरिका में रहकर भी वैसी ही है या यूँ कहे की उसके साथ ओर जुड़ गयी है ....एक जैसे ख्याल... गुलज़ार की त्रिवेणी के अलावा जिस चीज़ ने हमें जोड़ा वो क्रिकेट है... तभी तो २० -२० की जीत पर सन् फ्रांसिस्को में भी डांस हुआ ओर जम कर हुआ इस मर्तबा हमने ये तय किया की उसके भारत आने पर हम मुकम्मल तौर से मिलेंगे .. ....उसके पास एक हीरे का (मै सोने का नही कह रहा उससे ज्यादा कह रहा हूँ )दिल है ...परदेस में रहकर भी इनके लिखे में मिटटी की महक आती है ,आम हिन्दुतानी की तरह ये भी एक भावुक इंसान है जो इनके लिखे को पढ़कर महसूस होता है ...उन्ही की एक याद यहाँ बाँट रहा हूँ.....




...और होली बीत गई| ये मेरी तीसरी होली थी जब मै घर से बहुत दूर हूँ, मीलो दूर, और मैने इस बार भी खूद के साथ बहुत होली खेली| पिछली रात से ही शुरू हो गया, बालकोनी मे बैठ कर पहले मैने यादो की लकडियो मे रात का अगजा जलाया और निःशब्द बैठा उस अगजे की लौ मे मै अपना बचपन और देश मे बीताई थोडी सी जवानी तापने लगा जो मेरे सिगरेट की धुये मे खाँसते मुँह से निकले भस्म साँसो की हौक से और धूँ-धूँ कर जल रही थी और मानो सब कुछ बहुत साफ सा दिख रहा हो और ये कल की ही बात हो.....
....मै पाँच बर्ष का था, मेरे बाबा के बाल पूरे काले थे, माँ के चेहरे मे भी झूर्रिया नही थी| बाबा ने हमे प्लास्टीक की पीली पिचकारी मे लाल रंग थमा दिया और मै आँगन की दीवारो मे पिचकारी की धार से अपने बाल मन की चित्रकारी करता और उधर मेरे बाबा मेरी माँ को रंगो मे सराबोर कर देते| पलट कर जब मै माँ को उस हालत मे देखता तो बाबा को मुक्के से मारता चिल्ला-चिल्ला कर तब तक रोता रह्ता जब तक माँ मुँह धो कर अपने गोद मे मुझे लेकर सुला ना दे| कुछ सालो बाद की होली मे मै अब घर से पिचकारी भर भर कर निकलने लगा और अपने पुराने किराये के मकान वाले उस बील्डीग के १५ परिवरो के हमउम्र बच्चो के साथ होली मनाने का सिलसिला शुरू हो गया| शुराआती दिनो मे गली के शरारती बच्चो ने होली मे बहुत रूलाया क्योकी उम मे मेरे से थोडे बडे होने के कारन वो मेरा कीमती रंग छीन कर मुझे ही उदेल देते| खैर धीरे धीरे हम और बडे हो रहे थे और हमारी होली की परीधी अपने बील्डीग से निकल कर पूरे मोह्ल्ले तक पहँच गई थी और अब हम अपने बील्डीग वाले संगठीत हो कर मोह्ल्ले मे दूसरी बील्डीग के साथी बच्चो को घर से निकाल कर रंगने की मजा का स्वाद चख चुके थे| होली अब रास आने लगी थी, दिन भर भरी दुपहरिया मे टोली बना कर, फटे कपडो मे टिन्ने के डिब्बो को पीटते-गाते, हास्य़ परिहास करते हम सब गाँव वाले कम से कम एक दिन बैर-भाव, जात-पात, ऊँच-नीच भूला कर प्य़ार के एक रंग मे रंग जाते|
...पर शायद मुझे होली के बहुत रंग देखने थे| मेरे दो कमरे का भाडे का घर बडी होती मेरी चार बहनो और दो भाईयो के लिये प्रयाप्त नही था और मेरे पिता ने किसी तरह दुर एक घर बनाया जहाँ बगल मे वहाँ के कोल वाशरी मे काम करने वाले अफसरो की कोलोनी थी| मै उस समय अपने सरकारी हिन्दी विध्यालय मे द्सवी मे पढ्ता था पर मै चाह कर भी अपने बगल के बडे से कोलोनी मे एक दोस्त बना ना सका क्योकी उस 'पोस' कोलोनी के बच्चो के मन मे ना जाने यह धारना बैठ चुकी थी कि उनकी कोलोनी के परिधी से बाहर रहने वाले लोग जिनके घर Dish का connection भी नही और जिनके बच्चे बेचारे सरकारी हिन्दी विध्यालय मे पढ्ते है, उनके स्तर के नहीं| खैर मेरे नये कोलोनी मे भी फिर होली आई और मै रंगो की पूडिया को हर एक पोकेट मे भर कर मै कोलोनी के परिधी मे उस तरह दाखिल हुआ मानो अभिमन्यू अपने को शष्त्रो-अष्त्रो से सुसज्जित कर चक्रव्युह मे घुस रहा हो| पर कोलोनी के अन्दर तो दूसरी दूनिया थी सभांत लोगो की जहाँ ओभरसियर का बेटा तो सुपरवाईजर के बेटे को ही, सुपरवाईजर का बेटा तो सिर्फ इंन्जीनिय्रर के बेटे को हीं रंग लगाता है| मै पूरी कोलोनी का चक्कर लगा कर वापस बेरंग लौटने लगा और पहली बार होली मुझे कचोट रही थी| घर जाने से पहले मैने अपने रंगो को खूद अपने हाथो से चेहरे को रंगा क्योकी मेरे माँ बाबा के कान्हे को होली मे कोई ना रंगे उन्हे गवारा ना होता|
...कुछ होली फिर मेरे ऐसे ही बीते| अब मै अपनी आगे की पढाई के लिये घर से बाहर निकल चुका था और वक्त के साथ होली के बद्ले मायने को सीख रहा था| अब दूनिया सब कुछ के प्रेकटीकल मिनींग सिखा रही थी, होली अब परिवार के सभी सदस्यो को इकट्ठा कर के अपने पास पडोस के लोगो से मिल जुल कर साथ हँसने-गाने, खाने-खिलाने और मिल-जुल कर मनाने के पुराने मानसिकता वाली परिभाषा को नकारते हुये modernise हो गई थी| लडके अभी अभी पार हुये एक बडे त्य़ोहार Valentine's Day की Exhausting feeling से थके थके है और लडकियो को अपने complexion पे risk गवारा नही औरी ऐसे मे होली मे घर जाना कोई जरूरी नही| मै भी जमाने के गुर सिखता रहा और होली मे घर से दूर होता गया और एक बार नौकरी मिली नही कि उसके बाद कभी फुरसत भी नही मिली कि कोई होली घरवालो के साथ बिताऊ|
...काम का दायरा बढता गया, परिवार का दाय़रा छोटा| मै US आ गया और दो होली आई गई सी हो गई| मैने घरवालो को पिछ्ले साल ही ये आश्वासन दिया था कि मै अबकी होली सब के साथ बिताऊगा और सभी मेरे आने की राह देखते रहे| जाने के ऐन वक्त, प्रोजेक्त मे मेरे रूकने की जरूरत आन पडी और मुझे रूकना पड गया| मुझे अब तक मेरी गलती का एह्सास भी नही था क्योकी वक्त के साथ होली के मायने बदल चुके थे और ये इतनी बडी बात नही थी के मै एक और होली घर से दूर रहुन्गा| माँ को मैने जब कहा कि मै इस बार भी नही आ रहा हूँ, माँ ने इतना ही कहा कि बेटे होली मे अच्छा खाना खाना और अबीर लगा लेना|
आज मेरी अगजा की रात थी पर देश मे होली की सुबह हो चुकी थी और मै होली के दिन बनने वाले मेरे घर पर व्यंजनो को बहुत miss कर रहा था| मैने माँ की कही बात याद की और मै देशी रेस्टोरेन्ट मे जम कर खा कर आया| सन फ्रान्सिस्को की रात को निहारता मै अपनी १५ह्वि मंजिल के बाल्कोनी मे बैठ अपने दोस्तो का number घुमाने लगा to wish them Happy Holi. घर का नंम्बर लग नही रहा था और माँ-बाप तो भागते नही, (भागती तो संतान है), मै दोस्तो मे मगरूर रहा उनके GF के साथ होली के चटपटी किस्सो मे अपनी भी होली तलाशता हुआ| आधी रात के बाद जाकर मेरी माँ से बात हुई| मैने माँ से कहा की "माँ तुम और बाबा अकेले हो, बाबा को अच्छा से अबीर लगा दो और सभी पकवान अपने हाथ से खिला दो"| माँ ने मुस्काराते हुये कहा कि "बेटा तुम्हारे बाबा ने तो उसी बार आखिरी बार अबीर को छुआ था जब तुम 1st year मे होली मे आये थे और मै अब पकवान बनाती नही क्योकी बिना तुम लोगो के कोई पकवान हमसे खाये नही जाते| अब अगली बार हो सके तो आने की कोशीश करना और अपने बाबा को अबीर लगाना पर हाँ अपने career को नुकसान पहुँचा कर नही, मै तो ऐसे ही थोडी स्वार्थी हो कर पूछ रही थी क्योकी फिर बहू आने पर पता नही तुम फिर कोई होली हमारे साथ खेल सको या नही? अच्छा ये सब अभी से तु मत सोच, पहले ये बता की तुने आज अच्छा खाया या नही?
मेरी आत्मा रून्ध चुकी थी, मैने माँ से कहा कि माँ आधी रात यहाँ बीत चुकी है, मुझे अगजा जलाना है| और मै बची खुची रात जलाने बैठ गया| बचपन से अब तक सभी होली एक एक कर मुझे याद आती गई| दिख रहा था मुझे कैसे मैने ही छीना था उनसे उनकी होली जब माँ को रंगा देख डर गया था मै, ५ साल का ही था| अगले १० साल उन्होने अपने जज्बात भूला कर हमारे रंगे हुये चेहरो को देख होली खेली| जब आदत सी हो गई थी उन्हे हमारी, हमने अपनी सुविधा से अपनी होली redefine कर ली और किसी की दूनिया बेरंग कर अपने रंग, अपने ढंग भर लिये, छोड दिया उन्हे तब अकेला होली मनाने जब मेरी आन्खो मे गये रंग को साफ करते करते बाबा को मोतियाबिन्द और हमारी पकवान बनाते बनाते मँ को Sugar हो गया|
अगजा जल चुका था और मेरी होली भी हो चुकी थी| भीगा हुआ था मै अपनी दो नयनो कि पिचकारी से, रंग सफेद था पर दाग जा नही रहे थे, रुह तक रिसते हुये कुछ नमक मानो दो बून्द खून से माफी मांग रहे थे|

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कुणाल किशोर्
सन फ्रांसिसको, अमेरिका
होली, २००७

2008-08-03

जीने की लौ कहाँ से जलती है ?



हम सब दरअसल गलतियों का पुलंदा भर है रोज सुबह कई मुखोटे डाल कर निकलते है ओर दिन को झूठो में लपेट उस पर सच का मुलम्मा चढाकर रात की ओर धकेल देते है उस पर "दुनियादारी ' का ग्लो साइन बोर्ड मजबूती से टिका देते है ,इस बोर्ड का साइज़ साल दर साल बढ़ रहा है


क्या आपने कभी सीढियों को . देखकर सोचा है कि . इनके माने किसी जिंदगी में भी होते है .....मैंने इन पर मायने बिछे देखे है.... जीते जागते मायने ..पहली बार उन्हें उसी हॉस्पिटल की पहली मंजिल पर देखा था( जो इन दिनों विस्फोट की वजह से चर्चा में है .).अहमदाबाद का सिविल हॉस्पिटल ..रेडियोलोजी डिपार्टमेन्ट ओर उसके ठीक ऊपर एक कमरा
एशिया के इस सबसे बड़े हॉस्पिटल की इमारत के एक कोने में गुजरात मेडिकल कौंसिल का एक दफ्तर भी है ,वही कुछ काम था हम दो लोग थे , जाट ने रेडियोलोजी डिपार्टमेन्ट ज्वाइन कर लिया था जाहिर था रात वही गुजरेगी...
रात को महफ़िल जिस कमरे में जमी उसका मालिक वही था ,अस्त व्यस्त उस कमरे में बिखरी ढेर सारी किताबे , एक कोने में रखा टेप रिकॉर्डर ...ओर कैसेटो में कैद जगजीत सिंह....मेहंदी हसन ...बीचों बीच इक पलंग उस पर कुछ अखबार के फैलाये हुए पन्ने ...जिसके इक कोने पर गोल्ड फ्लेक का पैकेट ओर दूसरे कोने पर इक इलेक्ट्रोनिक प्यानो . रखा था हवा से लड़ने को ... दो पैग के बाद प्यानो खुला ,टेप रेकॉर्डर बंद हुआ ...ओर कुछ गजले ..बाहर आयी वो गाता नही था पर सुनता बड़े गौर से था उसे मेहंदी हसन की एक एक गजल मुह जबानी याद थी ,कभी कोई लफ्ज़ या शेर भूल जाते तो वो फ़ौरन दुरस्त कर देता ,...देर रात तक हम बैठे ...... ये हमारी पहली मुलाकात थी.....
उसका असली नाम भारत भूषण था पर लोग उसे बी.बी बुलाते थे ओर इसी नाम से उसे इतना याद रखने लगे कि कभी कोई कुरियर वाला या कोई रजिस्ट्री उसके नाम से आती तो पहली बार मे वापस हो जाती या अस्पताल मे दर्जनों डिपार्टमेन्ट मे घूमती..बाद मे किसी को याद आता अरे अपना बी.बी...
उसके चेहरे में कोई असाधारण बात नही थी ,उसका चेहरा आम चेहरों जैसा था इतना आम की आप शायद एक बार मिलकर उसे याद न रख पाये पर उसके दिल के भीतर जिसके भीतर जाने के लिए आपको ढेरो दरवाजे पर करने होते थे एक लौ थी एक ऐसी लौ जो कई सालो से muscular dysdrophy नाम के अंधेरे से खामोशी से लड़ रही थी .( ऐसा रोग है जिसमे आपकी मसल्स की शक्तिया आहिस्ता आहिस्ता ख़त्म हो जाती है ओर एक अवस्था ऐसी आती है की आप की साँस लेने में मदद करने वाली मसल्स भी इसका शिकार हो जाती है )

उसके पिता साईकिल पर कपड़ो के गट्ठर रखकर जालंधर के इक गाँव में फेरी लगाते थे ,तीन बहनों का अकेला भाई उसे ओर उसकी छोटी बहन को इस अंधेरे ने घेर लिया था ....शायद बचपन के किसी मोड़ पर उसे लग गया था कि उसका बचपन आम बचपन नही है तभी उसने किताबो से दोस्ती कर ली.... पढने लिखने में आम बच्चो से कही बेहतर था ,शांत प्रकति का वो बच्चा 10 क्लास में वो अपनी बहन को साईकिल पे पीछे बैठाकर स्कूल जाता था ,12 क्लास तक आते आते उसने अकेले साईकिल से जाना शुरू किया ,अहमदाबाद के मेडिकल कॉलेज में जब उसने एडमिशन लिया तब उसका कमरा 2nd फ़लूर पर था ,दूसरे साल में वो 1st फ्लोर पर शिफ्ट हुआ ओर आखिरी साल में ग्राउंड फ्लोर पर …. रेडियोलोजी में एडमिशन मिलने पर वो पहले साल उसी कमरे में रहा उसके बाद ठीक  रेडियोलोजी डिपार्टमेन्ट के ऊपर चूँकि लिफ्ट थी …
वो इक बेहतरीन साकी था ..हर ब्रांड का जुगाड़ करता ...पूरी पार्टी का मेनेजमेंट करता ....नमकीन ,मूंगफली ..कोल्ड ड्रिंक्स ,सोडा सिगरेट .ओर खाना ..ओर . अगले रोज सुबह सुबह इक हिसाब का कागज मिलता ...की आपने इत्ते पैग पिये ,इत्ते बिखेरे ..इत्ती सिगरेट फेफडो में डाली .....इत्ते लोगो में आपका कुल जमा हिसाब ये है...उसकी ये  हिसाबी मशहूरी इतनी फैली की दूसरे डिपार्टमेन्ट के लोग भी पार्टियों की इत्तिला बी बी को देते .ओर अपनी फरमाइश उसके रजिस्टर में नोट कराते ...

उस डिपार्टमेन्ट में इक ब्लेक बोर्ड टंगा होता था रिपोर्टिंग रूम में(शायद अब भी हो ) ..जो उन रेसिडेंट डॉ की अपनी इक दीवार थी ...हॉस्पिटल से जुदा दीवार....... जिस पर वे फलसफे लिखते ....जो मन में आता वो लिखते ...कभी कभी क्रिकेट मैच का स्कोर भी.. बस इक अलिखित रूल था ...जो पहले आकर लिख देगा ..पूरा दिन वही लिखा रहेगा .बी बी अक्सर चोक की इस लडाई में फर्स्ट आता ...उसके फलसफे कभी उदासी में लिपटे नही होते ...
रेडियोलोजी डिपार्टमेन्ट में जिस किसी को छुट्टी लेनी होती थी .इक हाजिरी बी बी के पास भी लगाता था अपनी ड्यूटी को रिप्लेस करने के लिये..बी बी के यहाँ किसी की अर्जी कभी खारिज नही हुई...बाद के दिनों में लोग पहले प्रोग्राम बनते ओर बाद में बी बी को इत्तिला करते ..वो जब भी किसी से मिलता पूरा मिलता ,पूरा खर्च हो जाता पर फ़िर भी कुछ ऐसा अपने पास रख लेता जो सिर्फ़ उसका अपना था …यही उसकी अच्छाई थी ओर यही उसकी बुराई भी उसके बारे में ...लोग उतना ही जानते थे जितना वो बताता था

उसकी छोटी बहन उससे दो साल छोटी थी पर तीन साल पहले अपनी लडाई हार गयी थी ...जाट बताता है अमूमन घर न जाने वाला बी.बी उन दिनों जब घर से लौटकर आया तब कई दिनों तक खामोश रहा. ...उसके कमरे में महफिले बंद रही .हिसाब का रजिस्टर बंद रहा ...उधार के पैसो की भी जब दरकार नही हुई तब जाकर दोस्तों को चिंता हुई....चुचाप वो x रे की रिपोर्टिंग करता ,किसी के उकसाने से भी नही उलझता ....कई महीनो बाद जब उसने अपने दोस्तों को कमरे पे बुलाया .. दोस्तों को चैन मिला
.उसका शरीर धीरे धीरे उसका साथ छोड़ रहा था वो जानता था इसलिये ,PG ख़तम होने के बाद जालंधर के एक  रेडियोलोजी सेंटर में उसने इसलिए जॉब नही की क्यूंकि वहां भी ढेरो सीडिया उसके सामने थी ….
,जाट ने उसे अपने पास बुलाया ,यमुना नगर में अपने सेंटर पर … ९/११ सितम्बर वाले ऐतिहासिक दिन बी बी वहां आया ....कुछ दिन वहां रुक कर स्वाभिमानी बी बी नही रुका...उसने हिसार का एक सेंटर ज्वाइन किया ,जहाँ ऊपर ही सी टी स्केन था ओर ऊपर ही उसके रहने का कमरा … हिसार के उस सेंटर पर जब वे पहली बार गये तो बाहर से सीडिया देखकर बी बी बोला ..”.चल यार यहाँ से चलते है ...इधर भी साले कई सारे पहाड़ खड़े कर रखे है “,जाट के ये कहने पर की वे इतनी दूर से आये है इक बार मिल तो ले..फोन करने पर मालूम चला .पीछे से दूसरा रास्ता है...जिसमे लिफ्ट लगी है ..उन्होंने गाड़ी ऊपर चढाई फ़िर लिफ्ट से ऊपर गये ..लिफ्ट में बी बी बोला था ..अब ठीक है ...अपनी रोटी का जुगाड़ हो गया ... आखिरी वक्तों में .वो रात को कुण्डी लगाकर नही सोता था की कब वो हमेशा के लिए सो जाये शायद उसे अंदाजा हो गया था की . उसकी छाती तक बीमारी पहुँच रही है ओर किसी दिन साँस लेने की की उसकी कवायद मुश्किलों में पड़ने वाली है
30 september 2003 … उस रोज सोने के बाद वो नही उठा ...चुचाप लम्बी नींद ने आखिरकार उसे अपनी आगोशी में ले लिया .

गुलज़ार की एक नज़्म है लगता है उसी के लिए लिखी है

मुझे बस यूँ नही मरना है की सब मरते हुए देखे
की मेरा मुह खुला हो ,धौकनी चलती हो साँसों में
नाल इक नाक में नाक में अटकी हुई ,दो बाह की नस में
मशीनों की तरफ सब देखते हो ,धड़कने की लय
विलंबित है
ये कितनी मात्रा पे चल रही है
मुझे बस यूँ नही मरना
की एक्सीडेंट से कुछ यूँ गिरा जैसे किसी के हाथ से
चिल्लर बिखर जाये !
अठन्नी ,पैसे ,दस पैसे ,चवन्नी
बड़े गुस्से में पूरा नोट फाड़ के जैसे उडा देता
है पुर्जो में
मुझे बस यूँ नही मरना …..
मुझे कुछ ऐसे उड़ जाना है जैसे हिचकी लेकर ओस उड़ती है
की जैसे शेर कहते –कहते सकता पड़ गया .बस !
या लिखते लिखते अफसाना ,सियाही ख़त्म हो जाये !!


मै नही जानता की ऊपर कोई स्वर्ग या जन्नत जैसी कोई चीज़ है या नही कोई हमारे कामो का स्कोर कार्ड तैयार कर रहा है या नही …पर यदि वाकई कोई चित्रगुप्त है तो शेखर ,कृपा ओर बी बी जैसे लोगो को देखकर लगता है की कही हिसाब में गड़बड़ है .

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