2008-05-31

mr .पटेल तुसी ग्रेट हो .........

यूं तो मुझे अपने नाम से खासा लगाव है , पर इम्तिहान के दिनों मे यही नाम दिक्कत करता था। रोल नंबर 1 .......यानी की ओपनिंग बेट्स मेन….इक्जाम लेने वाले भी फुरसत  में ताजादम   होते ओर खूब क्रिकेट खेली जाती ,इस खेल के नियम भी तो ये थे की कोई हेलमेट नही ,कोई  पेड नही. अमूमन हम या तो 'रिटायर्ड हर्ट' होते ……या फ़िर “क्लीन बोल्ड 
खैर हमारी बदनसीबी एक्साम के दिनों मे हमारे कमरे मे शिफ्ट कर जाती ......दूसरे साल में  पथोलोजी का  इक्जाम  होता था , जिसमे स्लाइड देखकर आपको spot पर पहचान लिखनी होती थी,  माइक्रोस्कोप सिलेवार लगाये जाते थे ……पूरे साल यूं भी हमे कभी माइक्रोस्कोप के खास मोहब्बत नही रही इसलिए हमने ओर हमारे कई दोस्तो ने  स्लाइड पहचानने का नया फलसफा तैयार किया .लाल ,पीले,ओर अलग रंगो से ये कोड बनाये कि फला शेप का ओर फलां कलर का दिखा तो ये है, नही तो वो . इसके अलावा हमने ये भी तय किया की शरीर के हिस्सों पर हाथ लगाकर दूसरे बन्दे को हिंट देंगे की ....... लिवर की स्लाइड है या किडनी की?
खैर किस्सा हमारी शहादत से शुरू होता , हम लगभग पहली माइक्रोस्कोप की तरफ़ धकेले जाते …नीचे झुकते तो रंग बिरंगी तितलिया सी नज़र आती ……..सारे कोड- वर्ड धरे धरे के रह जाते , इतने मे घंटी बजती ओर हमे अगली  स्लाइड पर हमे जिबह किया जाता ……हम अभी उन रंगो मे उलझ रहे होते ,की बराबर से रोल नंबर दो की श ..श ..श .श सुनाई पड़ती . वे महाशय पूछ रहे होते की क्या है? हम उन्हें ठंडी आंखो से घूरते ओर अगली  स्लाइड पर फ़िर हमारी बलि चडायी जाती.......बाहर आकर  रोल नंबर दो हमसे लड़ते “साले तुने बताया नही ”. हम उन्हें क्या कहते ?कुछ समझ मे आता तो बताते .बस बाहर आकर हम ठंडी साँस भर करकर अक्सर यही कहते की ‘ये  एल्फा बेटिकल तरीके से  तरीके से  रोल नंबर देने की परिपाटी गलत है
”(हमारी आवाज़ कभी नही सुनी गई ……आज भी कही किसी रोल नो १ की कही किसी जगह कोई शहादत हो रही होगी )...............
यूं तो हमने इसके लिए भी एक जुगाड़ ढूँढा हमारे एक ट्यूटर थे जिन्हें  अंडर - ग्रेज्युवेट सेसहानुभूति   रहती थे (वैसे इस कौम से सबको रखनी चाहिए )  तो तय हुआ की के साइड के दरवाजे से एक पर्ची सरकायेंगे जिसमे १ से १० तक रखी गई माइक्रोस्कोप की स्लाइड का  अंसर लिखा होगा। खैर एक्साम शुरू हुआ ,पर्ची हमारे हाथ आई ,बतोर इंटरल- इक्जाम्नर पटेल साहब थे  ....,सज्जन पुरूष थे ६ नंबर की स्लाइड पर वे खड़े थे ,ज्योंही हम पहुँच कर लिखने लगे .......वे थोड़ा नीचे झुके ओर दूसरी ओर मुह करके धीमे से बोले "अबे पहले माइक्रोस्कोप मे तो झांक ले"........



भगवान उनको  हेड ऑफ़ दी डिपार्टमेंट  बनाये........

2008-05-29

हिसाब ?


सोमवार का दिन था  ,देर  से  आँख  खुली तो होश फाख्ता हो गये वार्ड मे राउंड भी देना था ओर ओ.पी . डी  का टाइम हो रहा था.....पानी के कुछ  छपाके  मुंह  पे  मारे  मोटर  सायकिल  की किक्  मारी ओर हॉस्पिटल की ओर दौड़ पड़ा ......सोमवार भीड़ भरा रहता था  ..

बढ़ी दाढ़ी ओर गिल्ट भरा  सर झुकाए ओ.पी.डी मे घुसे. ...भीड़ इतनी थी की हमारे सीनियर ने आंखो आंखो मे एक चेतावनी दी.....पहला साल था ....भूख भी जोरो से लग रही थी ....रात को तीन बजे दरवाजा हमारे  ओर्थोपेडिक   डिपार्टमेन्ट वाले दोस्त ने खटखटाया था ..,महाशय को भूख लगी थी ओर थकान से चूर थे ....दो दिनों से किस्तों मे सोये थे ,रूम  पे कुछ नही था ...वे छिपते -छिपाते आये थे एक घंटे के लिए ... रात के इस वक़्त दो ही जगह कुछ खाना मिलना मुमकिन था या तो शहर के फाइव स्टार होटल मे या फ़िर रेलवे स्टेशन पे .बिस्तर पे लेटते ही वे सो गये ...जेब के हालात  देखते हुए हमने एक  एक जूनियर को उठाया ओर रेलवे स्टेशन से उनके लिए अंडा भुर्जी ओर पाँव लाकर दिए ......इन सब मे सुबह के साढे चार बज गये थे .
वैसे भी उन दिनों ओर्थोपेडिक  मे जिस बन्दे ने दाखिला लिया समझ लो कई कई महीने तक उसे अपने रूम की शक्ल तक देखने को नही मिलती थी काम का बोझ ओर ऊपर से सीनियर की कड़ी परम्परा जिसमे हाथ तक उठाना शामिल था ....बरसों से चली आ रही थी इसलिए कई लोग तो इसी कारण   से ओर्थोपेडिक दाखिला नही लेते थे ....यार थे ,इसलिए सुख दुःख बांटने के तरीके ओर जगह ढूंढ लाते थे  अक्सर किसी वार्ड के किनारे ,पथोलोजी लैब मे किसी रिपोर्ट को  
लेते वक़्त  या हॉस्पिटल के ठीक बाहर किसी चाय की दुकान मे छिपते-छिपाते सिगरेट के कुछ कशो मे बांटते थे खैर कुल मिलकर पिछली रात सुबह ५ बजे के करीब कुछ नींद आई थी ..... सोचा था की बीच मे मौका लगाकर कुछ नाश्ता पानी कर लेंगे पर उस दिन भीड़ इतनी थी की मौका नही लगा .३ नए मरीज वार्ड मे भरती हुए थे जिनमे से एक H.I .V वाला था जिसके सैम्पल भी मुझे ही कोल्लेक्ट करने थे ओर I.V ड्रिप भी क्यूंकि H.I.V मरीजो के सैम्पल ओर ड्रिप सिस्टर नही करती थी ....खैर जैसे तैसे दो बजे  तक कमर दोहरी हो चुकी थी ,भूख के मारे बुरा हाल था ओर मालूम था अभी वार्ड मे भी जाना था ओर H.I.V वाला मरीज चूँकि इन्फेकशियस  वार्ड मे भरती था जो की तीसरी मंजिल पे था .....वहां का काम भी करना था ..
.हम सभी बाहर निकले ही थे की ओ.पी.डी. के दरवाजे पे वो घुसा ...उसे देखते ही मेरी झुंझलाहट बढ गई ,उसकी उम्र तकरीबन १९-२० साल की रही होगी ,उसे नयूरोपथिक उल्सर था जिसके लिए वो अमूमन हर तीसरे दिन ड्रेसिंग के लिए आता था .....हमारे सर ने मुझे इशारा किया ......ओर हम उसे लिए हुए वापस ओ.पी.डी के बीच मे बने ड्रेसिंग रूम मे आ गये ....अकेला होते ही मैं उबल पड़ा
,"ये कोई वक़्त है आने का ? साला  कोई  पिकनिक  पे  आये  हो  या बाग़ मे घूमने की नौकर बैठे है.......
वो कुछ बुदबुदाया ......."क्या कहा ?मैं ड्रेसिंग का समान तैयार करते करते पलट गया ........"गाली देता है ? कहते हुए मैंने उसे एक थप्पड़ मार दिया ......उसकी आंखो से आंसू ढुलक पड़े ..वो खामोशी से सुबकियां लेता रहा ओर मैं ड्रेसिंग करता रहा ....अचानक उसका एक आंसू मेरे हाथ पे गिरा ..
..मुझमे पश्चात्ताप की एक लहर सी दौड़ गई ....इच्छा हुई की उससे माफ़ी मांग लूँ पर शायद ओहदे के झूठे गरूर ने मेरे लब सी दिए .
"यार टाइम से आया करो ?  मैंने नर्म लहजे मे कहा "वैसे देर क्यों हुई ? 
उसने मेरी ओर देखा "साहेब मैं २०  किलोमीटर साइकिल चलाकर हॉस्पिटल आता था ......आज किसी ने मेरी साइकिल चुरा ली  पैदल  आया हूँ......इसलिए देर हो गई ......
एक खामोशी सी पसर गई ऐसा लगा किसी ने मेरे मुह पे जोर का थप्पड़ मारा है ...... ग्लानि ओर अपराधबोध के अवसाद से मैं जैसे बैचैन हो उठा ....एक गुनाह के अहसास ने मेरी रूह को जकड लिया .....मैं सर झुकाए उसकी ड्रेसिंग करता रहा ....ड्रेसिंग ख़त्म हुई तो .....फ़िर कुछ देर उस कमरे मे चहल- कदमी करने लगा शायद उससे आँख मिलाने की मेरी हिम्मत नही थी .... वो खामोश बैठा मुझे देखता रहा ....फ़िर आहिस्ता से बोला "मैं चलूँ साहब फ़िर दवा की लाइन मे भी देर लगेंगी ......वो दरवाजे तक पहुँचा तो मैंने उसे आवाज दी
"सुनो "उसने पलट कर मेरी ओर देखा ........."सॉरी "उसके चेहरे पे एक फींकी सी मुस्कान आई "कोई बात नही साहब ",अगली बार किसी की साइकिल लेकर आऊंगा .
आज इस बात को लगभग ९-१० साल बीत गये है जिंदगी मुसलसल जारी है आज सुबह क्लिनिक आते वक़्त मेरी गाड़ी के सामने एक साइकिल वाला अचानक रुका .... कुछ कहने ही वाला था की उसकी सूरत ने मुझे बरसों पीछे ढकेल दिया .......



वो फलसफे उन किताबो के
वो अदालते जमीर की
वो अहले-दर्द कागजो मे
वो मह्फिलो मे बड़े- बड़े सुखन
सब उठा कर परे रख दो
वो एक शख्स अभी अभी
मेरा सारा "हिसाब" सरे-आम रख गया.........

2008-05-27

"मोरल ऑफ़ दी स्टोरी "

सुबह की चाय ख़त्म  ही की  है के मोबाइल ने आवाज देकर  बुलाया है ......अमित का  एस एम् एस  है ..... ‘डॉ श्रीवास्तव के यहाँ आज पगड़ी रस्म है …मीट एट हिज़ प्लेस एट . 3.30 “….भूल गया था ...वे शहर के जाने माने डॉ थे ..कुछ दिन पहले ही दिल के दौरे से उनका निधन हुआ था .आदतन   अखबार    के  पन्ने   पलटता हूँ ……सी बी एस सी बोर्ड का रिजल्ट आया है …एक लड़के ने स्कूल टॉप किया है …अपने माँ -बाप के साथ उसकी फोटो है … फोटो देखकर मैं पहचान जाता हूँ ..डॉ गुप्ता का बेटा है …सदर मे  जनरल  फिजियशन  है

दोपहर पौने चार बजे ……
मोबाइल 
ने फिर आवाज दी है …कहाँ है ?मेरा दोस्त पूछता है … ...'..रस्ते में हूँ '...डॉ श्रीवास्तव  साकेत में रहते थे ......पोश कालोनी ....घर  के बाहर गाडियों की लम्बी कतारे है ....गाड़ी पार्क करने के लिए कोई मुनासिब जगह ढूंढ रहा हूँ   की   अगर कोई कॉल आए तो आराम से निकल सकूं ….एक जगह पार्क करके उतरता हूँ. ..सामने डॉ अरोड़ा किसी को मोबाइल पर इन्सट्रकशन  दे रहे है …ड्रिप मे …### डाल देना.... .स्पीड कम रखना ....आधे घंटे मे पहुँच जायूँगा …..मैं उन्हें अभिवादन करता हूँ ....वे मुस्करा कर सर झुकाते है ....फ़िर मोबाइल मे ही घुस जाते है .."चार नंबर वाले का क्या हुआ ? उसे गैस पास हुई की नही ?....मैं आगे बढ़  गया हूँ ..डॉ श्रीवास्तव  की एक हज़ार गज की बड़ी कोठी....आगे  बड़ा लोन है.... उसी में सफ़ेद रंग का टेंट सीना तान के    खड़ा है …......गेट पर ही डॉ मित्तल मोबाइल पर है ….ऐसा करो डॉ त्यागी को  साडे चार  का टाइम बता देना ….…"तुम ओ. टी तैयार करो मैं पहुँचता हूँ "….वे नीचे झुक गए है .....मुझसे १५ साल सीनियर है …ये उनकी खानदानी आदत है .......दोनों भाई अक्सर ऐसे ही झुके हुए मिलते है ........आगे जाकर  जरूर पीठ की तकलीफ होगी …पूरे शहर मे उनकी विनम्रता मशहूर है.

मैं अन्दर घुसता हूँ …कई सफ़ेद कुरते पाजामे है ,मैं थोड़ा अटपटा सा महसूस करता हूँ.... टी शर्ट ओर जींस मे ही चला आया हूँ   एक  सफ़ेद कुरता पाजामा अब 
सिलवा ही लेना चाहिए   ....नजर दौडाता हूँ की अपने वाले बन्दे कहाँ है .. .आदमी की अजीब  फितरत है ... अब  हर जगह कम्पनी ढूंढता है ......अभी शहर मे   सात  साल ही हुए है प्रक्टिस करते हुए अपनी वेवलेन्थ वाले कुछ ही लोग है …..डॉ श्रीवास्तव से आज तक मेरी मुलाकात बस एक दो बार  आई. एम्. ए  की मीटिंग्स मे तकल्लुफाना अंदाज मे हुई थी ....कोई बता रहा है .......समीर यहाँ कुछ ही दिनों के लिए आया है ...समीर उनका बेटा है फिहाल अमेरिका मे शिफ्ट हो गया है शायद  सॉफ्टवेयर इंजिनियर है .. 
“तेरे पास  डिस्पोसेबल बायोप्सी पञ्च है   है  तीन मिलीमीटर वाला “?मेरा दोस्त  फुसफुसाता है ...  …
".हाँ .."मैं धीमे से कहता हूँ...... मंत्रों उच्चारण हो रहा है ….भीड़ बहुत है …कई लोग रुमाल निकलकर उमस ओर बदलते मौसम की चर्चा कर रहे है .......
..मेरे आगे दो तीन लोग है ….".अंदाजन एक करोड़ की होगी "..पहला दूसरे से उस कोठी की कीमत का अंदाजा ले रहा है ,दोनों शहर के प्रतिष्ठित सर्जन है …हाँ …दूसरा कहता है ….”बेटा तो बाहर है …पहला फ़िर बात अधूरी छोड़ता है ….”कोई फायदा नही ..दूसरा उससे कहता है ..डील हो चुकी है …समीर  चार दिन बाद वापस जा रहा ..आपने पहले जिक्र नही किया …पहला नाराजगी दिखाता है .”मुझे भी आज ही मालूम चला है ‘.. डॉ .शर्मा हमारे पास आकर खड़े हो गए है ,साकेत मे ही रहते है उम्र पेंतालिस से ज्यादा ओर पचास से कम है.....,लेकिन फिट रहते है .......उन्हें बतियाने का शौंक भी है ...हम भी कभी उनकी कंपनी मे बोर नही होते है ,…थोडी देर मे पगड़ी की रस्म पूरी  हो गयी है ....लोग हाथ जोड़कर निकलने की कवायद में है .....   ..
हम बाहर  आये है .......  कोई कह रह रहा है " श्रीवास्तव जी सज्जन आदमी थे" ..मैं उसे गौर से देखता हूँ..ये पहला आदमी है अब तक जो वाकई शोक मे है ..
...शर्मा जी बाहर तक हमारे साथ है..गाड़ी के पास खड़े होकर वो कहते है ...मोरल ऑफ़ दा स्टोरी क्या है समझे ?......आराम से जियो अपने लिए जियो एक छोटा सा फ्लेट लो ....वरना बच्चे बड़े होकर बाहर जायेंगे ..तुम्हारी मौत पर बीस दिन की छुट्टी लेकर आयेंगे ..फ़िर प्रोपर्टी बेचकर अमेरिकन डॉलर मे कन्वर्ट करके चले जायेंगे.......छह : महीने मे चौथा किस्सा है साकेत मे........
तेरा बेटा कितना बड़ा है .....मुझसे पूछते है .....
चार साल..... मैं कहता हूँ.......
रात को मीटिंग मे आ रहा है ना...... वहां एक पंच लेता आना" मेरा दोस्त मुझसे कहता है.
रात  दस बजे
 
आई एम् ए  की मीटिंग है...मैं लेट पहुँचा हूँ ,  टाक ख़त्म हो गई है ,मैं अपने दोस्त को पंच पकड़ा देता हूँ ....लोग गिलास पकड़ कर खड़े है .... कुछ नेपकिन में दबाये ........डॉ मलिक पास आये है  ....अपने हाथ की प्लेट मे से एक पकोडा मुझे उठाने को कहते है ....."सामने   देख रहे हो ..".........  डॉ गुप्ता सामने    है....... उनके आस पास दो तीन लोग है ...."ये आदमी खाली  एम् . बी. बी. एस है लेकिन  इसके चेहरे  पर एक अजीब सा तेज है ..इस पूरी महफ़िल पे किसी के मुंह पे नहीं मिलेगा .....  जानते हो क्यों.......क्यूंकि उसके बेटे ने स्कूल टॉप किया है....."वे एक बड़ा घूँट भरते है...कंधे पे हाथ धरते है......मोरल ऑफ़ दी स्टोरी .क्या है समझे ?.तुम्हारी औलाद ही असल पूंजी है ...बाकी . सब बकवास है .......समझे .....
मै सर हामी में हिला देता हूँ ......वे एक बड़ा घूँट लेकर ओर नजदीक आ गये है     "तेरा बेटा कितने साल का है ?"



2008-05-26

बरिशो मे धूप की बात ?

रोज सुबह इस दिन से कुछ वादे करता हूँ....दोपहर तक आते तक बेवफाई कर देता हूँ...शाम को फ़िर उन वादों को याद करता हूँ ओर रात तक आते आते उनकी पीठ फ़िर थपथपा देता हूँ..दिन ऐसे ही गुजर जाते है...कभी कभी इस भागती दौड़ती जिंदगी मे किसी किताब का कोई पन्ना दिल के कोनो मे पड़े कुछ अहसासों को जगा देता है या कोई ऐसा पुराना गीत जिससे कोई पुराना नाता हो दिल के दरवाजो को ठकठका देता है....पिछले ४ दिनों से बारिश काम ओर दिल दोनों के बीच आ रही है .....ओर बखूबी आ रही है.....इसलिए एक धूप की नज्म जो मैंने बहुत पहले किनी धूप के दिनों मे लिखी थी....इस उम्मीद मे यहाँ भेज रहा हूँ...की शायद कुछ हल मिले........



उफ़्फ़ .......
कितनी तेज़ धूप है आज
आसमां ने कोई खिड़की खोली है शायद
कुछ ख़्याल ओंधे मुह लेटे थे
रोशनी चुभी तो
लफ़्ज़ो को झाड़कर
उठ खड़े हुए,
मसरूफियत से भागे कुछ ख़यालो ने
बमुश्किल उन लफ़्ज़ो को जमा किया था
कई बार टोका है
इन ख़्यालो को
इन लफ्जो को गिरह मे बाँधकर रखा करो
बेवफाई शगल है इनका
देखना
आज की रात फिर ...
कोई शायर ऊँघता मिलेगा

2008-05-24

मोबाइल ..मुई technology ओर एक दिन ..

सुबह की शुरुआत एक मोबाइल बजने से हुई ,उनीदे होकर हमने फोन उठाया ,एक तो सुबह सुबह की नीद इतनी प्यारी होती है की पूछिये मत .
 ‘कैसे है ? उधर से कोई मोहतरमा थी “कौन ‘हमने घड़ी देखी सुबह के पौने छः बजे थे ... ….मैं बोल रही हूँ ……फ़िर कुछ सेकेंड का सन्नाटा क्यों मजाक कर रहे है ?...... आपको किससे बात करनी है ?मैंने झुंझला कर पूछा
आपसे ……देखिये आपने ग़लत नंबर मिलाया है ये डॉ अनुराग का नंबर है...……जाने दो शादाब बोल रहे हो ...क्या अब तक नाराज हो .....मोहतरमा मानने को तैयार नही थी ....हमने फोन काट दिया .. ,एक पोसिशन बनाई ओर वापस उस नींद मे जाने की पुरजोर कोशिश ….नही आयी …उधर करवट …इधर करवट ……ये साला शादाब ...….….!

चाय की चुस्किया लेते ओर अखबार सामने रख हमे भी एक भाई साहब की बड़ी याद आयी ,जब हमने नयी नयी प्रक्टिस शुरू की थी ओर हमारा नंबर दूसरा हुआ करता था ओर अगले डेड साल मे हमने नंबर बदल लिया. एक रोज हम अपने क्लिनिक पर बैठे हुए थे की एक साहब आये ओर हमसे मिलने ओर बात करने की फरमाइश करने लगे .लेकिन स्टाफ ने कहा पहले आप फीस जमा करिये तब भीतर जाइये .वैसे भी अक्सर लोग सिर्फ़ "बात करना" ओर मिलना ही चाहते है डॉ से ...
खैर उन साहेब ने बड़ी जोर मशक्कत की तो हमने उन्हें अन्दर बुलवा लिया .उन्होंने हमे देखा ,नमस्कार किया फ़िर चलने लगे ...हमारी माजरा समझ नही आया ...

.हमने पूछा मह्श्य तकलीफ क्या है ?
उन्होंने मोबाइल निकल कर सामने रख दिया ...."ये तकलीफ है ?"
मैं समझा नही . 

डॉ साहब मेरा तेल का व्यापार है पर जबसे मैंने आपका नंबर लिया हूँ लोग दवाइयों ओर बीमारियों के बारे में पूछते है  मैं परेशां हो गया   हूँ  .लोग मुझे फोन करके परेशां करते है ...तो मैं ये नंबर कटवाने जा रहा था सोचा उस आदमी की शक्ल भी देख लूँ जिसने मुझे इतनी तकलीफ दी है.
चाय पीने तक शुक्र है दुबारा फोन नही आया .

रात 10 बजे


A T.M से पैसे निकलने थे  .उसके बाहर एक चौकीदार खड़ा था हम गाड़ी सड़क पे लगा के जैसे ही वहां पहुंचे उसने हमारे पैरो को गौर से देखा ,मुझे लगा कोई कीचड तो नही लगा .सब ठीक ठाक था  .हमने चौकीदार को देखा ….वो मुस्कराया …तीन दिन से लात मारने पर ही पैसा निकाल रही है …complian दे रखी है कोई आता नही  क्या करे ?
"ओर अगर कोई लात मारके सारे पैसे निकाल ले तो ".हमने पूछा ..
अरे साहब इतनी बेवकूफ नही है …कार्ड डालोगे तभी लात असर करती है ….
जय भारत …..



उपरोक्त घटना के सभी पात्र वास्तविक है ओर उनका इन घटनायो से गहरा सम्बन्ध है ओर वे चाहे तो बुरा मान सकते है ,अगर शादाब कही पढ़ रहे हो तो अपना असली नंबर उन मोहतरमा को दे दे ....

2008-05-22

कशमकश ?


कई बार
सोचता हूँ
कि
फलक पर
सीडीया लगा कर
चढ़ जायूँ
ओर जोर- जोर
से चिल्लाकर पूंछू

....कोई है ?

2008-05-19

रेड लाइट एरिया ओर कुछ तजुर्बे .... भाग एक

स दिन ओ .पी . डी मे काफी भीड़ थी ....  मेरी  कुलिग़  ने   आवाज  दी  .... अन्दर  एक्सामिन रूम  में एक लड़की  थी .......उम्र तकरीबन उन्नीस - बीस  के  दरमियां ...  सांवला रंग .आंखो में डर ओर कई सवाल. .  .
जेनाईटल वार्ट्स....मेरी कुलीग ने कहा
स्टेटस .....?मैंने पूछा 
पता नही ?मेरी  कुलीग  ने  सर  हिलाया  था   .
व्यासायिक रूप से तेजी से देश के पटल पर प्रगति करने के कारण सूरत शहर   न केवल अपनी सूरत बदल रहा था .....कामकाजी माइग्रेशन पॉपुलेशन को  भी आकर्षित कर रहा था ...डायमंड इंडस्ट्री ...साडी उधोग ...पर इस सबके साथ एक ओर अनचाही चीज़  का ग्राफ   आश्चर्यजनक तरीके से बढ़ रहा  थी ..एच आई वी.मरीजो का  ..
"कुछ बताती है ?" मैंने पूछा .
शायद 
लेंग्वेज नही समझ पाती ? मेरी कुलिग़ ने कहा ...
वो एक सेक्स वर्कर है  .....

यहाँ कौन लाया ?मैंने पूछा ,
 बाहर खड़ा है …

कई लोग बस पहली नजर में  पसंद नहीं आते ......बेवजह! .....सफ़ेद शर्ट   बड़ी बड़ी  मूंछे ....मुंह में पान- मसाला ...शरीर   में अजीब सी गंध .उसे मैंने कोने में बुलाया ....
"कुछ खून की जांच जरूरी है .बीमारी बढ़ी हुई है ....तभी कुछ होगा ...."
साहेब कुछ इंजेक्शन -विन्जेक्शन दे दो ..टेस्ट के लफ़डो  में काहे को पड़ता है ? मैंने उसे घूरा
साहेब बहुत टाइम खोटी होता है इधर आने में .दोबारा नहीं भेजेगे  इसको....."
"देख भाई.बीमारी तेरी मेरी मरजी  से नहीं चलती है .मेरी आवाज में थोड़ी तल्खी आ गयी थी......
जो काम है हिसाब से होगा...
उसने कमरे के एक कोने मे खड़ी दूसरी महिला को देखा …..मैं उसे पहचानता था  जया  बेन   वो  उस  एन .जी .ओ से  जुड़ी   सक्रिय कार्यकर्त्ता थी  जो खास  तौर से रेड लाईट एरिया मे काम करता था  .
वो मेरे पास आयी ...”अनुराग भाई बड़ी मुश्किल से लेकर आयी हूँ ,आने नही दे रहे थे …तीन दिन बाद कह नही सकते की इसे भेजेगे या नही...आपने उसकी हालत देखी ही है ?
आप कुछ करो तभी मैं औरो को लेकर आ सकती हूँ ,,,,,..मैं जानता था   वो  सच  कह  रही  है
,"पर सब कुछ मेरे हाथ मे नही है जया बेन इसका मामला कुछ गड़बड़ लगता है .. .” उसका टेस्ट होना जरूरी है "
 पर तब तक कुछ तो करो ..उसने कहा …"सर से पूछना पड़ेगा .जया बेन ".मैंने कहा …..
 
मै उन्हें लेकर सर के पास पहुंचता हूं .....वे हाथो मे कोई फाइल लिये निकल रहे थे ,मुझे देखकर रुके .. सुपरिडेंट ऑफिस मे मीटिंग है ….पहले ही लेट हूँ .....उन्होंने घड़ी देखकर  कहा ..

समस्या ब्रीफ की गयी...सर बहुत ज्यादा वार्ट्स है जेनाईटल एरिया मे …..मैंने कहा .
अगर लगता है "
पोजीटिव ."है   तो रिपोर्ट का इंतज़ार करो ?नही तो जितना हो सके निकाल दो .वे  

वे इंग्लिश में बोले ....फ़िर मुझे पास बुलाया ओर  धीमे से कहा “इन लोगो को डिसकरेज नही करना ..बाकी जो तुम ठीक समझो ....पर पूरे प्रिकाशन लेना ……कहकर वो निकल गए ।
वो सफ़ेद शर्ट वाला बाहर ही खड़ा था … “साहिब जल्दी ख़त्म करो …धंधे का टाइम खोटी हो रहा है …
मैंने उसे अनसुना कर अपनी कुलिग़ से कहा

'कुछ वार्ट्स निकलने होगे ...ग्लोव्स डबल पहनना ….उसने सर हिलाया ,जब उसको "माइनर ओ.टी "मे लिटाया ....
    ..”नाम क्या है तुम्हारा ?
उसकी आँखे फ़िर मुझसे चिपक गई.........नाम  -नाम ?   मैंने कई  बार  दोहराया    पर वो ना जाने   क्यों   आँखों से   देखती रही ......  ....बाहर  भीड़ बहुत थी इसलिए  मैंने जल्दी जल्दी इंजेक्शन लगाया ओर हम दोनों प्रोसीज़र करने लगे ,उस एक घंटे मे वो कभी दर्द से सिसकिया भरती ओर कभी कस कर मेरा हाथ पकड़ लेती,फ़िर कई बार डांटने के बाद हाथ छोडती ....
.. एक घंटे बाद जब मैं बाहर निकला तो सफ़ेद शर्ट वाला बैचैनी से टहल रहा था ,मैंने देखा भीड़ काम
नही
हुई थी ओर मेरे दूसरे कुलीग मरीजो से उलझे हुए थे वो मेरी तरफ़ लपका 
..ख़त्म हो गया ?
"पूरी तरह नही ..मैंने कहा ."एक बार ओर आना पड़ेगा ....
काहे कू? उसका मुंह बिगड़ गया ....
अबे मर जायेगी. मैं झल्ला कर बोला ..उसने जैसे कुछ सुना नही
" रोज रोज आयेगी तो धंधा कब करेगी ?
 इस बीमारी मे उससे धंधा करवयोगे....मैंने कहा ....
"अभी तक कर ही रही थी न ..
.....उसकी टोन मुझे पसंद नहीं आयी थी.....

अभी १० दिन तक वो इस हालत मे नही है ,वैसे भी ये रोग वो ग्राहकों को ही देगी....
"१०दिन् ....आपने पहले तो नही बोला अब मैं मैडम को क्या जवाब देगा ...ऐ जया बेन ..वो जया बेन की तरफ़ लपका ....
मैंने जया बेन को किनारे पे बुलाया "इसका टेस्ट करवा देना जया बेन ....ओर 5 दिन बाद लेकर आना .....जया बेन उसे डपट कर मेरे पास आयी
"शुक्रिया अनुराग भाई ..... बंगलादेशी है ',उसने मुझे बताया ….तभी जबान नही समझती ….मैंने कहा" कुछ जवाब नही देती' .... …।
हाँ अब कुछ कुछ समझने लगी है ….पर दूसरी मुश्किल भी है … बेचारी गूंगी है !
...मैंने     मुड़कर    उसे    देखा ......जाते जाते   वक़्त  आँखे एक पल को मुझसे मिली ....फ़िर धीरे धीरे भीड़ मे गुम हो गयी.....
पां दिन बाद मेरी कुलिग़ मेरे पास आयी .
"कोई प्रिक नही लगा था ना?उसकी रिपोर्ट आयी है ,एच .आई .वी . पोसिटिव है "
.वो गूंगी गुडिया वापस फ़िर कभी नही आयी , बाद मे जया बेन ने बताया उसे बोम्बे भेज दिया गया है ................एक शहर मे ज्यादा दिन नही रखते ........!
 

2000-2001 ...नेशनल एड्स कंट्रोल सोसिएटी (नाको) ,ब्रिटिश गवर्मेंट ओर गुजरात सरकार के साझा प्रयास से H.I.V के ख़िलाफ़ एक अभियान चलाया गया जिसमे कई N.G.O को भी जोडा गया ओर इसे" प्रोजेक्ट फॉर सेक्सुअल हैल्थ " का नाम दिया गया ,सूरत गवर्मेंट मेडिकल कॉलेज को मोडल बनाया गया ...जो सफल रहा ओर बाद मे बरोदा ओर दूसरे शहरो मे भी ये प्रोजेक्ट चलाया गया ...उसमे रेसीडेंसी के साथ साथ मैंने मेडिकल ऑफिसर के तहत एक साल तक काम किया ... उसी दौरान कुछ अनुभवो मे से एक......


2008-05-17

आवारा बारिश .......

उस मोड़ पे हम दोनों कुछ देर बहुत रोये
जिस मोड़ से दुनिया को एक रास्ता जाता है ---बशीर बद्र

आज बारिश हो रही है बड़ी तेज बारिश....बारिशे कभी बता कर नही आती इसलिए अच्छी लगती है ....ये उन शै मे से एक है जो अब तक अच्छी लगती है ....वरना हर रिश्ता , ,हर फलसफा अपना चेहरा बदल चुका है .....जिंदगी का sign board इस बारिश मे भी चमक रहा है.......
कोई इस रस्ते मे जाना नही चाहता है उसे मालूम है एक बार गया तो फ़िर जिंदगी की इन पेचीदा गलियों मे गुम हो जाएगा .फ़िर भी हर शख्स ये सोचकर रास्ता शुरू करता है की वो खोयेगा नही ..लेकिन हर शख्स खो जाता है....
तेज हवा चली है ओर कोई किताब नीचे गिरी है ,उसे उठाता हूँ...कुछ नीचे अभी भी उसमे से निकलकर गिरा है .एक सरसरी निगाह डालता हूँ....जगजीत सिंह के औटोग्राफ है.. पीछे मुड़कर देखता हूँ तो सोचता हूँ की ज़िंदगी कहाँ खीच लायी है वक़्त हमेशा एक कदम आगे रहा है.. उन दिनों खुशिया ढूँढने के लिए मेहनत नही करनी पड़ती थी ओर कच्चे-पके फलसफे आसमान से थोक के भाव गिरते थे ,जिंदगी मे E.M.I नाम को कोई चीज़ शामिल नही थी ,ओर महीने के सारे दिन एक जैसे लगते थे , अपने जग्गू दादा एक बार सूरत आये थे ,टिकटों का जुगाड़ हमने भी किया , कुछ गजल चली माहोल बना ,फ़िर बारिश हुई ...खुले मे प्रोग्राम्म था ..बीच मे रुका . हम किसी तरह जुगाड़ लगा कर उनके पास पहुँच गये वो कही जाम की चुसकिया ले रहे थे, पर ज़ाल्दबाज़ी मे कोई काग़ज़ ले जाना भूल गये अब औटोग्राफ़ किस पर ले? डरते-डरते सिगरेट का पैकेट निकाला. जग्गू दादा मुस्कराए ओर उसी पर कलम चला दी.......... कई सालो तक हमारे रूम की दीवार पर चिपका रहा........ अक्सर लोग उसे हाथ से सहलाकर चले जाते थे ....आज वही हाथ आया है, उस दिन भी ऐसी बारिश थी. ऐसी बारिशे रोज़ रोज़ नही होती.



2008-05-13

मैं जाट ओर वो होस्टल -भाग दो


चूँकि कमरे मे तीन दीवारे थी ओर बाकि जगह अलमारी ने ले रखी थी ,इसलिए हमने अपनी अपनी एक -एक अलमारी बाँट ली ,तीसरी अलमारी हमारे लोकल दोस्तो के लिए रिजर्व थी ,एक रोज जब मैं जोर्ज माइकल का पोस्टर खरीद कर लाया तो जाट बोला “यो कौन है “ 
मैंने कहा "गाना गाता है ",अगले रोज़  रोज़ दूसरा पोस्टर .
जाट खामोशी से देखता रहा …..कुछ हफ्तो बाद एक दिन शाम को जाट ने पलंग पे एक पोस्टर फैलाया ……ताऊ देवीलाल .. ओर उन दोनों के बीच चिपका दिया ……रात को मैंने उससे पूछा 
“तू ये लाया कहाँ से ? 
हरियाणा से मँगवाया है .
दिनों मेस मे  अक्सर  दो  ही चीजे  बनती  थी बटाटा यानि आलू ओर पूरी ..
आलू हिन्दुस्तानी परिवार का बुनियादी  ओर कम्पलसरी  हिस्सा है...पर यहाँ इसकी रोज़ रोज़ की प्रजेंस उब देने  लगी ...अक्सर हम आधा पेट उठते ओर रात को कॉलेज के पीछे लारी पे जाकर अंडे खाते ...जाट पाव ज्यादा खाता ओर अंडे कम.....
उसका पेट अंडे बरदाश्त कर लेता पर मेरा अक्सर बेसबब बगावत इख्तियार करता  .
बारिशो के महीने शुरू हुए  तो लोकल दोस्तों ने  कहा ' यहाँ रेन कोट भी जिंदगी का जरूरी हिस्सा है ' हम दोनों हंस दिए ..गुजराती आसमान को हमने अंडरएस्टीमेट किया था   बारिशे गिरी ओर गिरती रही.. अंदर कमरे में गीले कपडे बदस्तूर जमा होते रहे ..अंतत  पांच दिन  गुजरने के बाद "गुजराती  आसमान" से  ब्रेक की कोई उम्मीद न देखकर जाट ने एक रोज़ होस्टल लोबी में खड़े होकर आस पास निहारा  ओर एक रैन कोट चूज़ किया ..पहनकर चला दिया  क्लास से बाहर निकल कर वो छतरियो पर एक सरसरी निगाह मारता ओर कोई पसंद की उठा कर चला आता ....रंग बिरंगी छतरिया  लडकियों की होती.. फ़िर हमारी एक दोस्त ने उसे एक छतरी गिफ्ट कर दी...
र शायद गुजराती आसमान हमारी बेअदबी से उस साल ज्यादा ही नाराज था ...बहुत बारिशे गिरी इतनी की मेस बंद हो गयी ओर एक सप्ताह का अवकाश ,बरोदा -अहमदाबाद ओर  नजदीक वाले  अपने अपने घर चले गए ....महीने के आखिरी दिन थे .बैंक मे पैसे नही थे ओर मेस बंद ....जेब मे कुल जमा  पूँजी के नाम पर    एक पचास का नोट  पूरे दो दिन काटने थे ....लंच ओर डिनर के साथ ...एक लोकल दोस्त ने लंच पे बुलाया ,मैं ओर जाट खुश हुए ....एक टाइम के खाने का बंदोबस्त हुआ ...सोमवार को बैंक खुल जाना था .
तब मेरे पास एक फटफटिया हुआ करती थी जिस पर  यू .पी  का नंबर था ओर  जब कभी पोलिस  थामती  हम बीस रुपये देकर छूट जाते उन दिनों" स्टूडेंट कंशेसन" मिलाकर ट्रेफिक पोलिस का यही रेट था  .(वैसे एक बार जाट को पकड़ लिया  जाट ने खाली जेबे दिखा दी पोलिस वालो ने वही बैठा लिया ...  जाट ने तकरीबन  तीन  बीडी उनसे  मांग कर पी डाली  तो पोलिस वालो ने सरेंडर कर दिया था .) . खैर उस दिन हम खुशी खुशी लंच करके वापस लौट रहे थे की अचानक सामने से एक ठुल्ला दिखा ओर उसने हमे थाम लिया ....मरते क्या न करते जेब मे हाथ डाला तो ५० का नोट था ...मैंने उसके हाथ मे दिया ....उसने जेब में डाला ओर मुड लिया .जाट ने उसे आवाज़ दी   "पईसी वापस ना करने? थारा तो बीस का रेट चल रिया सै 
पोलिस  वाले ने मुझे देखा .मैंने तुरंत अनुवाद करके उसे बताया ...सुनते ही उसने डंडा हिलाया हम दोनों दुखी मन से भागे तुम्हारा तो २० का रेट है ....
पोलिस वाले ने हम दोनों को हड़का कर भगादिया.....तब किसी से उधार मांग कर हमने अगले दो दिन काटे .....
अगले साल हमारी इस सबसे बड़ी समस्या का हल हो गया कॉलेज मे 
रेसिडेंट मेस मे हम दोनों को एंट्री मिल गयी जिसको ज्यादातर नॉर्थ इंडियन ने चला रखा था ...लेकिन जाट का i.q गजब का था ओर उसकी याददाश्त गजब की थी ....अक्सर जब हम एक्साम के दिनों मे ऊपर-नीचे हो रहे होते जाट आराम से टी.वी पर क्रिकेट मैच देख रहा होता ,उसने गुजराती पढ़ना फौरन सीख लिया ओर अक्सर गुजराती के अखबार बोल बोल के पढता ....तब हमे एक मोहतरमा से इश्क हुआ  प्लान बना के... लड़के बर्थ डे पार्टी में हमसे गाने की फरमाइश  करगे .ओर हम ओर हम तीन दिनों तक रिहर्सल किया हुआ गाना इसरार के बाद  सुनाकर लड़की को" इम्प्रेस" कर देंगे . धड़कते दिल से उस रोज हम पहुंचे ...पहले बीस मिनट गुजरे ..फिर अगले पांच मिनट .हम बेचैन हुए ..एक दोस्त को इशारा किया ...वे इग्नोर कर गए ...अगले पांच मिनट ओर ...आखिरकार हमने जाट को लात मारी ...जाट ने दोस्ती की खातिर आखिरकार वादा निभाया  ...ओर हमने एक दो रिक्वेस्ट के बाद रिहर्स किया हुआ गाना सुना दिया .वो इश्क तो परवान नहीं चढ़ा अलबत्ता वो गाना हमारी जिंदगी में दोस्तों की महफ़िल में बदस्तूर बिना हिले दस साल तक शामिल रहा ...वो गाना था "दिए जलते है फूल खिलतेहै......
 
. मारे कॉलेज के 
एनुवल फंक्शन   मे ओडीटोरियम का उपरी हिस्सा under -graduates के लिए रहता था ओर  फंक्शन वाली रात वाली रात  हवा मे ही इतना नशा होता था की पीने वाले भी   नशे  मे  रहते थे दरअसल ये सालो से चली आ रही परम्परा थी...उस दिन सिगेरेट की इतनी खपत थी की बाद के सालो मे हम लोगो ने ये भी सोचा की क्यों छत से जलती हुई रस्सी टांग दी जाये क्यूंकि माचिस की बड़ी किल्लत रहती थी क बार किसी ने मांगी ओर फ़िर गुम.......
जाट की केपसिटी बहुत अच्छी थी मैंने आज तक उसे एक या बार ही चढ़े हुए देखा है....कई लोग होस्टल से दो पैग  लगाकर चलते थे ....टीचर्स से डरते भी थे अपने साथ एक ऐसा बन्दा रखते थे जो थोड़ा होश मे हो अगर गेट पर कोई कड़क या सख्त टीचर खड़ा होता तो पहले उसे गुजर जाने देते .....
तो एक रोज .जब आधे घंटे तक  जाट नही दिखे तो हम उन्हें ढूंढने निकले .देखा जाट एक साहेबजादे को बाहर ओडी टोरियम की दीवार से टिका रहे है 
..क्या हुआ .....
अबे फला बाहर गार्डन मे पड़ा है .....तू उसे देख .....मैं तीसरे को बाथरूम से लेकर आता हूँ....
हम गार्डन मे पहुंचे तो देखा वे महाशय तारो को देख रो रहे है .......क्या हुआ ? 
"साला जाट कहाँ है  मुझे गार्डन मे छोड़ गया  दोस्ती यारी भी तो एक चीज़ होती है" ...खैर हम दोनों ने बारी बारी से बीच में बैठाकर दो लोगो को हॉस्टल के कमरे में पहुँचाया .इन सब मे तीस मिनट गुजरे तब याद आया ...ऑडिटोरियम की दीवार के सहारे तीसरा अब भी खड़ा होगा   .तीसरा वाकई वही खड़ा था .

जाट दूसरे दोस्तो की तरह "दिल चाहता है "देखकर फोन नही करता , कभी देर रात पीने के बाद उसका फोन आता पर .... वो ओर मैं साल मे दो बार तो मिलते ही है...... आज जाट इतना कमाता है की मुझसे इन्कम टैक्स बचाने के तरीके पूछता है ...उसके पास सारे लेटेस्ट गदेट्स है उसके पास बड़ी गाड़ी है ....दो खूबसूरत बच्चे है... उसकी गाड़ी मे जगजीत की सी डी बजती है.....साल मे एक बार छुट्टी मनाने विदेश जाता है ओर जब कभी मेरा मन बहुत उदास हो जाता है मैं घंटे की ड्राइव करके हरियाणा पहुँच जाता हूँ...हमारी बीवीया हमसे नाराज रहती हैक्यूंकि हम दोनों जब मिलते है तो घंटो रात भर पीकर जग कर बतियाते है ....आज से साल पहले जब मैंने 
प्रेक्टिस शुरू ही की थी तब अचानक किसी लाइट के  डिफॉल्ट की वजह से मेरी एक लेसर मशीन को जबरदस्त  नुकसान हुआ तब जेब मे इतने पैसे भी नही थे की दूसरी लूँ ,परेशान हालत मे मैंने जाट को फोन लगाया ,वो मुझसे साल पहले प्राइवेट प्रक्टिस मे गया था ...परेशां मत हो इन्सुरेंस वालो को फोन करना ....नही बात बने तो शाम को मुझे बताना ....मैं पैसे लेकर जाउन्गा ...ये पोस्ट लिखते लिखते सोच रहा हूँ उसे फोन कर लूँ..... .. . ... ......." ..... musical nights ?...... " ......



2008-05-12

जाट को ....जिसने कई साल मेरे साथ गुजारे ......भाग 1

ससे   पहली  मुलाकात  सी.ऍम.ओ ऑफिस के बाहर हुई थी ... जहाँ  हम  मेडिकल - चेकअप की लाइन  में खड़े थे ,जहाँ हम मेडिकल -चेक अप की लाइन में खड़े थे .चूँकि  हम  आल इंडिया एंट्रेस वाले पंद्रह  रिजर्व सीटो   वाले थे .उसमे भी आधे एब्सेंट सो लोग कम थे .ओर हम लाइन में आगे .... लाइन  छोटी  थी ,.... 'पूरे कपड़े उतरवा लेगे ' मुझे देखकर  वो  बोला  तो   मेरे  पसीने छूटने लगे  ओर दिल  राजधानी एक्सप्रेस की रफ़्तार से दौड़ने लगा ..... मेरे पीछे खड़ी लड़की तो लगभग बेहोश सी  हो  गई....अन्दर  ओंपचारिकता   भर थी...
...म बाहर निकले तो जाट मुस्करा रहा था हमने देखा हमारे बाद लड़की को लगभग घसीटते हुए उसके माँ- बाप अन्दर ले गये....बाद मे यही जाट हमारे रूम पार्टनर तय हुये....ओर शुरू के कुछ  दिन   हमें हरयाणवी भाषा से एडजस्ट होने में लगे ......वो अक्सर कहते "तैने बेरा है " कई  दिनों  बाद  हमे  पता  चला  की " बेरा  "का मतलब "पता " या   मालूम होना है ....जाट अपने  हरयाणवी    चुटकुले सुनाता ओर उसमे कई खास लड़को वाले चुटकले  होते  एक  बार  हम  लड़कियों के साथ केन्टीन बैठे हुए थे ओर जाट शुरू हुआ "एक चूहा भाजा जा रहा था ........भाजा का हरियाणवी मे  मतलब भागना होता है......हम लड़के बैचैन हो उठे ......जाट क्या सुना रहा है ...कल ही तो हमे सुनाया था.......जाट का  ध्यान हमने तोडा .जाट .ने अनसुना किया फ़िर शुरू हुआ "एक चूहा जंगल मे भाजा जा रहा था ".......
जाट ...किसीने आवाज दी जाट ने फ़िर अनसुना कर दिया....चूहा .....
जाट किसी ने आवाज दी "क्या कर रहा है ' ?
के कर रहा हूँ" चुटकुला सुनाने लग रिया हूँ ."
जाट लड़किया .....कोई फुसफुसाया .....अबे यो दूसरा चूहा है ............................जाट  गुस्से मे खड़ा हो गया ....

र्मी हो या सर्दी..... जाट गर्म पानी मे ही नहाता......,हॉस्टल  के  गीजर  ठीक  होने  से  पहले  उसके  पास अपनी एक रोड थी जिसे उसने एक लकड़ी के चारो ओर लपेट कर बनाया हुआ था ,उसे  वो अक्सर बाल्टी  मे डालता  ओर पानी जब खौलने लगता तब जाट नहाने की बाल्टी ले कर चलता ....रोज मैं उम्मीद करता की अभी बाथरूम  से उसके चीखने की आवाज आयेगी पर कभी नही आयी ....एक दिन सुबह जब वइवा की तैयारी मे मैं किताब हाथ मे लिए इधर से उधर उस कमरे मे  ठहल    रहा था
"देख  पानी  गर्म  हुआ  के  ना"?जाट बोला .....
मैंने पानी मे हाथ डाला ओर एक झटके से दूर जा गिरा .....जाट के ठहाका गूंज उठा ......
उसके बाद मैंने कभी उसे गर्म पानी पर नही टोका ....
मारे ठीक नीचे एक मैस  हुआ  करती थी  ओर  गर्मियों  मे  उसकी  बालकनी  मे उसका महाराज अक्सर मुह खोल कर   खर्राटो से    सोते थे ......जाट भाई को रात को  कई -कई बार  बहुत लगती थी ओर वे बाथरूम  की दूरी   से  बचते हुए  अक्सर बालकनी  से  ही  अपनी  शंका  का निवारण कर लिया करते थे ........एक   रात उन्होंने निवारण किया ओर अचानक तेजी से लौटे ओर अपना एतेहासिक कम्बल ओढ़ कर लेट गये.नीचे से तेज तेज आवाजे आयी..... कुछ मिनट बाद पता चला वे रजिस्थानी गालिया  है ...फिर थोड़ी देर में दरवाजा  इस अंदाज में भड भडाये    जाने लगा जैस पोलिस  वाले रेड पे हो.........हम उठे ओर दरवाजा खोला ..गीला मुंह लिए   .महाराज  थे .जानना चाहते थे   ये पराक्रम   हमारी बालकोनी से  तो नहीं हुआ   है ... जब  तसल्ली   हुई  तो वे  ऊपर   की   बालकनी  की ओर रवाना हुए .
जाट भाई  के पास  एक  रंगीन  कम्बल हुआ करता था जिसके  वे अक्सर नाराज हो जाने के बाद ओड कर लेट जाया करते ....ओर आवाजे देने पर भी  अपना मुह उसमे से बाहर नही निकालते ......उन दिनों नये -नये ताले फिट हुये थे.... जिनकी तीन चभिया दी गई थी जिसमे से एक चाभी हमारे लोकल दोस्तो के पास थी ओर उस ताले  मे  ये खासियत  थी की  आप उसकी एक क्नोब घुमा कर  जोर से बंद करो  तो वो लाक हो जाता था......तो एक सुबह हम आराम से उठे तो जाट गायब था  हम होस्टल- केन्टीन  गये  चाय -वाय पी वापस लौटे तो जाट कमरे मे नही था ,हम तैयार होकर कॉलेज के लिए रवाना हो गये ,पहली क्लास मे जाट नदारद .......पूरे किसी लेक्चर मे जाट नही दिखा ......ये साला जाट गया कहाँ ..?

..उन दिनों हमारा एक घंटे का लंच ब्रेक होता .....मेस मे भी जाट नही दिखा ......शाम को हम कशमकश मे होस्टल लौटे तो जाट खाली अंडर वियर मे सुलगे हुए खड़े थे....दरअसल वो बाथरूम मे अपने कपड़े धो रहे थे .....नहाने के साथ साथ ओर हम ताला लगा कर चल दिए ,दूसरी चाभी अन्दर रह गई ओर  पूरी   लोबी मे बदकिस्मती से उस रोज कोई नही आया ......हम उस रोज आगे आगे थे ओर जाट हमारे पीछे .......कई दिनों तक वे उस कम्बल को ओडे रहे ......

.....जाट की डाइट बहुत अच्छी थी इसलिए अक्सर पार्टियों मे वो देर तक खाना खाता मिलता .....एक बार पहली बार हमारे एक लोकल दोस्त ने हमे खाने पर बुलाया जिसकी मम्मी को हिन्दी लगभग ना के बराबर आती थी,खैर पहुँचने के थोडी देर बाद गोल गप्पे मेज पर बैठा कर सर्व किए गये ....१०-१२ खाने के बाद .....जब हम इस इंतज़ार मे थे कि नया कुछ आएगा ....हमे हाथ धोने को पूछा गया तो हम परेशान से हाथ धोकर बैठ गये .....वही हमारा डिनर था ......जाट ओर मैंने फ़िर लौटते वक़्त एक लारी पर खड़े होकर केले खाये.......

2008-05-10

माँ को .

कुछ देर बस पास बैठ जाऊँ
माँ अब ओर कुछ नही चाहती हैं





2008-05-08

वो मोटर साईकिल अक्सर याद आती है......

उस मोटर साईकिल को शायद हीरो होंडा वालो ने पिछले २० सालो मे एक ही बार बनाया होगा.....सड़क पे चलते चलते झटके खाकर रुक जाती ओर फ़िर ढक्कन खोल कर फूंक मार कर फ़िर कुछ किलोमीटर चल जाती ....फ़िर बीच मे रुक जाती ओर इस बार उसे लिटा कर आडी टेडी तिरछी करके फ़िर फूंक मारी जाती ,फ़िर नशे मे कुछ देर चलती .....अपनी मेडिकल कोल्लेज के पहले दो साल हमने इस मोटर साईकिल पे काटे...उसका मालिक भी अपने आप मे एक विलक्षण व्यक्ति था .....उसने भी कभी इस टंकी को फुल पेट्रोल को सुख नही दिया ....तब तक हम पिता जी से हर बार फोन पर एक यामहा खरीदने के लिए फुसफुसाती आवाज मे गुहार लगते ..जिसे अनसुना कर दिया जाता ...कई बार जब हमे किसी ख़ास बर्थ डे पार्टी मे पहुँचना होता ...बीच सड़क पे ये अचानक रुक जाती.......ओर फ़िर उस सुनसान इलाके मे हम फूंक मार कर उसे कुछ किलोमीटर दौड़ते... उन दिनों सिगरेट पीना शुरू नही किया था  पर शायद उन फूंको ने जितना नुकसान फेफ्डो को पहुँचाया उतना उन कम्बख्त सिगरेटो ने भी नही... .अलबत्ता हम अक्सर लेट पहुँचते ओर हमारे जाट भाई अक्सर ये कहते हुए पार्टी से लौटते ...."साला भूखा रह गया मैं तो .....कई बार तो हम देर रात को उन पेट्रोल पम्प पे हाँफते उस गाड़ी को पहुँचते ओर  बंद हो चुके उस पेट्रोल पम्प के कर्मचारी से मिन्नत करते .....सिविल हॉस्पिटल से है....बेचारा जब कोई नींद से उठकर पेट्रोल भरने के लिए राजी होता .....तो ये कहते १० रूपये का भर दो........उसकी नींद खुल जाती....पर ये  साहब पेट्रोल भरवा कर शान से  किक मारते..ओर हमे बैठा कर फुर्र होते ...सिविल हॉस्पिटल सूरत को जितना बदनाम इन्होने  चुप चाप   इन  पेट्रोल पम्पो   पे किया ..शायद यही  कारण   है की आज की तारिख मे भी कोई पेट्रोल पम्प वाला अपना इलाज कराने सिविल हॉस्पिटल ना जाता हो ....(ओर ये भी इसी कारण अपनी स्विफ्ट गाड़ी को C.N.G कराके घूम रहे है..)....इनसे  विशेष प्रेरित होकर हमारे जाट भाई.भी एक दिन एक मूवी के ब्लेकिये से पूछ बैठे "सिविल के डोक्टर है कुछ डिसकाउंट मिलेगा ?
खैर बाइक के मालिक ....एक लड़की के प्रेम में गोता लगा बैठे ......पर एक साल तक दरिया   किनारे ठहलते रहे .दरिया......वो इश्क का दरिया ....फिर हम सबके . बेहद उकसाने के बाद इन्होने खैर उसे प्रपोज़ कर दिया ...लड़की क्या कहती......ये रोजाना   गांधी के सत्यग्रही की तरह नियमित तौर पे ... उससे जवाब सुनने लायब्रेरी पहुँच जाते ....ऐसा कई महीनों चला ...... फ़िर तो यही होता....अक्सर कमरे मे जगजीत चलते ....जुगाड़ से जुटाई गई बोतल खुलती (गाँधी का देश होने के कारण गुजरात  ओफिशयली नशा  मुक्त प्रदेश है )ओर कई हाँ ओर ना मे उलझे आशिक अपने अपने दुखडे रोते ..ऐसी पार्टियों मे एक मह्श्य अक्सर बिन बुलाये पहुँचते ओर एक सिगरेट का बहाना लेकर तेजी से ३ ४ पैग गटक जाते ....ओर बिन मांगे कई सलाह भी डे डालते ....ओर जाते जाते मुझसे कहते यार ये केसेट कल मुझे देना ..जगजीत क्या गाता है .......... 
.खैर   लब्बे लुआब ये के उस लड़की ने हाँ बोल ही दिया ..... इनकी पहली डेट पर हम दोस्तो ने इन्हे आधी टंकी भरवा कर दी......बाद के दिनों मे इन्हे अक्सर उस लड़की के किनेटिक होंडा स्कूटर पे देखा गया ,हमारे पिता जी हमारी फरियाद सुन ली ओर यामहा आने के बाद हमे अपनी  फटफटिया हीरो पुक से छुटकारा मिल गया ....जिसका स्टैंड अक्सर टूट जाता ओर हम उसे खड़ी करने के लिए कई दिनों तक खम्भा ढूंढते फिरे....ओर die -hard पार्ट ३ के शो को जब हम देखने पहुंचे तो स्टेंड वाले ने हमसे एक खम्भे पे टिकाने के १५ रुपये एक्स्ट्रा लिए थे....दरअसल हमारा मिस्त्री उसका ओरिजनल पार्ट रोज लाने का कहकर हमे कई महीनों बरगलाता रहा था .....




कभी भीड़ मे कभी तन्हाई मे
अपने लड़कपन के लम्हो को
वो अक्सर खीच लाता है
कुछ सिगरेट
ओर अधजली तीलियो के साथ बैठकर
वो उनसे कुछ देर
बतियाता है,
लबो पर मुस्कान लिए
नम आँखो से फिर
उन्हे छोड़ आता है

2008-05-07

बस यूं ही ......

वो खामोशी.......
जिसे ना जाने कौन खीच लाता था
हम दोनों के ....दरमियाँ
आज सुबह..... मुंह अंधेरे
मेरे आँगन मे
ढेरों लफ्ज़ छोड़ गयी है...
अपने हिस्से के ......मैंने समेट लिये है
तुम भी 

अपने हिस्से के उठा लो     ....."सोनां"

कम्प्लेन!!!!
बरसों बाद
जब
अपने  माजी की गलियों के
उस जाने -पहचाने मोड़ पे
रुकता हूँ
बेहिस पड़े उदास से कुछ रिश्ते
आँख मल के हैरां से
मुझे देखते है
फ़िर
फुसफुसा कर कहते है
" एक बार ओर तो कहा होता "


कांच का चांद !!!!
कई बार दबे पाँव खामोश रातो मे
इन चमकती यादो को
फलक से उतार के
दूर साहिल के दूसरे कोने मे
डूबो कर आया हूँ
मेरी आंखो को अब ये 
मुआ चाँद चुभता है......


 



 जब बेख्याली पहलू में सोती है ओर जिंदगी रोज वही दिन   रीवाइंड" करके  आपकी हथेली में दे देती है .....उस जानिब से  नज्मे ऐसे ही किसी सफ़्हे पे आहिस्ता  से उतर आती है


2008-05-06

पिछले दो दिन .....


रात को एक C.M.E से लौटते वक़्त जब घड़ी ने अंदाजन १२ बजाये होगे ,पार्किंग मे मेरे दोस्त ने मुझे टोका .. "अरे तीन दिन के बाद अपना रात का वक़्त खाली रखना ,बच्चे का जन्मदिन है .......जरूर मैंने कहा .उसकी गाड़ी पर विदा करने गया तो पूरी गाड़ी समान से भरी थी .क्या है यार ?मैंने पूछा 

कम्बल है  "उसने कहा .
 इतने सारे ?
  अनाथालय के बच्चो के लिए है  .पहले सोचा उसी दिन बेटे के हाथो बंटवा दूँ पर उस दिन बहुत भागदौड़ हो जायेगी .सुबह हवन होगा ..... रात को पार्टी ....तो उस दिन वक़्त नही मिलेगा तो कल सुबह अपने बेटे को लेकर जायूँगा .....ख़ुद इसलिए बांटना चाहता हूँ की पता नही वहां का मनेजर उन्हें दे या न दे .....उसने एक सिगरेट जलाई .
 हम दोनों के मोबाइल लगभग साथ साथ बजे "अभी निकल रहा हूँ ,लगभग एक सा जवाब.
वही पार्टी वही  चेहरे उन पर चस्पा वही मुस्काने  ! अजीब बात है है ना , आने वाले को भी मालूम है उसे क्या करना है ओर मेजबान को भी..........बस हर साल कुछ नए चेहरे जुड़ जाते है क्यूंकि आपका दायरा बढ़ रहा है गोया की आपकी तरक्की आपके मेहमानों मे शुमार लोगो के ओहदे ओर उनकी संख्या तय करती है.
 सिगरेट का एक ओर कश !
" माँ बेचारी सीधी सादी थी ओर पिता जी आम नौकरीपेशा .. . हमारे पिता जी को हालात ओर उनकी अपनी पेर्सोनालिटी ने ईमानदार बना दिया था ,अपने घर से जो गाँव मे था एक मात्र पढे लिखे ,जिम्मेदारियों से घिरे हुए ,रिश्वत मांगने की हिम्मत नही थी ओर फ़िर कुछ पोस्टिंग ऐसी जगह जहाँ ऊपर की कमाई कुछ नही......एक स्कूटर हुआ करता था लंबा सा सफ़ेद रंग का ..पिता जी रोज सुबह कई मिन्टो तक उसमे किक मरते तब जाकर स्टार्ट होता था .....विजय मोडल था .....मेरे बड़े भाइयो की पेंट काटकर दरजी उन्हें मेरे नाप की बनाता.....आधी तनखा गाँव चली जाती... .इसलिए मेरा बर्थ डे बचपन मे कभी नही मना,हम पुराना निक्कर पहनकर दोस्तो के बर्थ डे पे जाते वहां केक कटता हुआ देख  सोचते हमारा बर्थ डे क्यों नहीं मनता ?
हर बार आकर मां से झगड़ते   .

 हमने बस इतना सीखा कि ५ रुपये कि पेस्ट्री लेकर घर पे मोमबत्ती लगाकर भाई बहन खा लेते थे .   माँ कहते बेटे मकान बनना है है ना ! कितने साल वो मकान बनता रहा ,इसलिए मैं भी चाहता हूँ की मेरे बच्चो का जन्मदिन मैं तरीके से मनायू पर अन्दर एक आत्मा बैठी है उसके लिये भी मुझे ये कम्बल बाँटने होगे .
एक सिगरेट ओर जल गई थी .
मुझे अपना एक सीनियर याद आया वो अक्सर कहा करता की “आपके पास ना ज्यादा पैसे होने चाहिए ना कम  . ना इतने कम हो की आप का बच्चा होस्टल वापस आने के लिये ट्रेन के फर्स्ट क्लास मे जाने की फरमाइश करे तो आप पुरी ना कर पायो पैसे होने चाहिए पर अगर वो प्लेन मे आना चाहे तो आप को सोचना पड़े ...थोड़ा हाथ तंग रहता है तो इंसानियत ओर पैसे के लिये तमीज बनी रहती है.

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails