2008-06-30

मेरे सपनो को जमा करके किसी ने उछाल दिया है आसमां मे

सीधी साधी सपाट चलती जिंदगी के किसी मोड़ पर मिले कुछ इत्तेफाक बहुत खूबसूरत होते है ,इन इत्तेफाको से कई लम्हे उधार मिलते है .... ये लम्हे कभी बारिश की बूंदों से लिपटे होते है  .. कभी आसमान से झुककर नीचे झांकते है .......वो ना शायर था ना कोई दीवाना .......पर अक्सर होस्टल की छत की सबसे ऊँची मुंडेर पर लेटकर सिगरेट के कश भरता  ओर देर तक चाँद को निहारा करता  ...कई बार बारिशो में खींच कर ले जाता ....बदली वाले चाँद से उसे खासी मुहब्बत थी .......आज कल  अमेरिका मे है ....
 देर रात जब  मोबाइल बजा ....     छत  पर घूमते घूमते  नजर आसमान पर पड़ी....वही बदली वाला चाँद  वहां खड़ा था.....


 
रोज शब
खींच कर लाते है परिंदे
ओर उठाकर
टांग देते है
आसमान के सीने में
मुआ चाँद
फ़िर सारी रात सताता है

2008-06-27

खामोशी
















जी
चाहता है
हल्के से हाथो की जुम्बिश से
उस लम्स को
जो ठहरा हुआ है
तेरी चूड़ियो के काँच पर,
गिरा दूं ,
धड़कनो क़ी चादर को उठाकर
दिल मे गहरे तक
उतर जाउ
ओँधी पड़ी हसरतो को
खींच कर बाहर निकालू
ओर
उठाकर रख दूं
तेरी गोद मे
शायद
तेरे लबो पर
फिर कोई सदा आये

2008-06-26

एक दिन हॉस्पिटल से -अक्टूबर २०००

होस्टल की लोबी से तैयार होकर निकलने वाला मैं आखिरी बन्दा था , सीडियों पे पहुँचा ही था की  सामने  से नैनेश अपने स्कूटर पर आता दिखा .वो मेरा  जूनियर था ,खुदा का बंदा अमोल पालेकर जैसा सीधा. वो लोकालाइट था ओर होस्टल यदा कदा ही आता था ,इतनी सुबह!!
"वो वार्ड मे लफडा हुआ है ,  बुंदू  को सुबह सिस्टर ने बाहर निकाल दिया था रात को दारू पी कर हंगामे कर रहा था .... पता नहीं किसने  N.G.O वालो को फोन कर दिया वो आकर हंगामा मचा रहे है.
क्या टाइम हुआ है ? ८.२० ......
सर बलसाड से ट्रेन पकड़ कर आते थे ,उनके आने मे अभी पौन घंटा था ,मोबाइल वो रखते नही थे .
हमारी A.P. छुट्टी पे थी..मैंने मोटर साईकिल पर किक मारी ओर वार्ड पहुँचा ...बाहर वर्षा बेन खड़ी थी ,
तुम्हारे सर कहाँ है "मुझे देखते ही बोली . मुझे उनसे बात करनी है ..
 सर के आने में वक़्त है.
  वर्षा  बेन  उन NGO  मे से एक थी जिनके  साथ मेरी कभी बनी नही ओर मैंने अपनी नापसंदगी को कभी छुपाया भी नही.  सुबह सुबह वे लिपस्टिक ओर परफ्यूम लगा कर वार्ड के बाहर आ कर खड़ी हो गई थी .
"तुम्हारे सीनियर कहाँ है "
वे एक्साम गोइंग थे इसलिए मैं उन्हें परेशां नही करना चाहता था.
"बात क्या है ?
मैंने पूछा .....
बात ?  तुम्हारा कुछ मनेज्मेंट  है  या  नही  ?  इस  हॉस्पिटल  मे ?  पेशेंट को बाहर निकाल देते हो ? ये S.T.D का पेशेंट है....सिस्टर ने इसे बाहर निकाल दिया है ओर तुम्हारे जूनियर ने थप्पड़ मारा है ..
मैंने अरोरा को देखा वो जूनियर मोस्ट था ओर गर्म मिजाज था उसकी आंखो मे र्देखते ही मैं समझ गया की थप्पड़ लग गया है.....मैं वर्षा  बेन  को  जानता था वो फसाद खडा करने वाले लोगो मे से एक थी ,मनीषा बेन की तरह नही.
“ओर ऊपर से ये लोग झूठ अपनी गलती छिपाने के लिए गरीब आदमी पर इल्जाम लगा रहे है.,इसके पास पैसे कहाँ से आयेगे , अगर पैसे आ भी गये तो शराब कहाँ से पियेगा बतायो ?.वर्षा बेन बोली .
बूंदु वही सर झुकाकर खड़ा था ... बुन्दु अपने आप मे कमाल का करेक्टर था ,ओर उतना ही बड़ा एक्टर भी ...हम सब उसके फन से वाकिफ थे , ओस्कर जीतने वाली परफोर्मेंस  वो पिछले दो सालो से हमारी ओ पी.डी मे दिखाने आता था हर बार कसम खाकर जाता  था  की साहब इस बार नही....
.नतीजन ,उस पेशेंट को genital fungative ulcer था जो बेहद  बू मारता था   इतनी  की  पूरे  वार्ड  मे उसकी  बू  भरी रहती थी . वार्ड के दूसरे मरीज उसकी  बू से परेशां थे ओर सिस्टर उसे संभावित H.I.V समझकर सैम्पल के लिए उसका  ब्लड  नही  लेती  थी  ऐसे मरीजो मे रेसीडेंट को ही ये काम करने पड़ते थे ,हमे उसकी biopsy की रिपोर्ट का इंतज़ार था ,सिस्टर उसे infectious disease वार्ड मे  भेजने की जिद पे थी     .उसकी रोज सुबह ड्रेसिंग होती थी  जिसे करना अपने आप मे एक मुश्किल काम था ,कई बार मैंने भी उसकी ड्रेसिंग की थी .
ऐसे मे रात को उसने पीकर वार्ड मे हंगामा मचा दिया था..
बुन्दु  सर झुकाये खड़ा था
इतने में वार्ड का फोन बजा सिस्टर  बोली   अनुराग भाई प्रिस्नर वार्ड से फोन है .वहां एक बिगडा रईसजादा भरती था ,  रईसजादों के सारे गुण थे उसमे शौकीनी ,अय्याशी  . कही  पी कर रिवाल्वर  चला बैठे थे ,अगला अल्लाह को प्यारा हो गया . ये साहब जेल में .  मामूली से  कोई स्किन रेश थे . जाहिर है अस्पताल रेफर हो गए . बाप रसूखदार ओर पोलिटिक्स में सो  इनकी सेवा पानी में ३ -४ लोग रहते थे .  मैंने पुलिस वालो को भी उनके साथ कई बार हँसी मजाक करते देखा था.
मै   भी सर के साथ  रायूँड पर होता . आज उनका डिस्चार्ज का दिन था ओर वे जेल नही जाना चाह रहे थे प्रिस्नर वार्ड में रेसिडेंट को अधिकार नही था की जाकर मरीज को देखे .सिवाय इमर्जेंसी के या ड्रेसिंग वगैरह छोड़कर .इसलिए मुझे सर का इंतज़ार ही करना था .
आपको बुलाया है "एक ओर पंगा .....मैं बुदबदाया "यार ये हमारे सर मोबाइल क्यों नही खरीदते "?
इस हंगामे के बीच हमने राउंड लिया फ़िर O.P .D शुरू हो गई ,जब सर आये तो चुपचाप सारा किस्सा बताया गया उस वक़्त कमरे में मै ओर सर ही थे ....उन्होंने खामोशी से सारी बाते सुनी ..फ़िर .अरोरा को तलब किया गया ..अरोरा जी की डर के मारे घिघी बनी हुई थी
....उसने पी थी ?  सर ने पूछा...
जी अरोरा ने सर हिलाया .....
जब मारा करो तो इतनी जोर से  मारा  करो  की  आदमी शिकायत लेकर मेरे पास ना आये या फ़िर मारा मत करो....वे बोले .
समझे ....जी अरोरा ने सर हिलाया ..तभी दरवाजे पर वही वोयलेट लिपस्टिक दिखी....वो कुछ बोलने वाली ही थी की हमारे सर ने उनसे चाय के लिए पूछा ...नही...३ मिनट तक उनका कहानी नॉन स्टाप चली.
आप वार्ड में चलिये मै आता हूँ.....सर ने कहा.
ड्रेसिंग रूम में बुन्दू को बुलाया गया . मै  अरोरा ,नैनेश , सिस्टर भी साथ है.
तुमने बुन्दू को बताया के नही ? सर ने मुझसे कहा ..
मेरे जवाब का इन्तजार किए बगैर उन्होंने मेरे जूनियर से कहा
नैनेश तुने बताया ? तुममे से किसी ने इसे नही बताया ? वे हम पर गुस्सा होते है..
हम सब सर झुका लेते है.
तुझे कुछ बताया रिपोर्ट के बारे में ....वे बुन्दु से पूछते है.
बुन्दु पहले ही ऐड्स के डर से परेशां है.ओर इंजेक्शन का खौफ  खाता है  "क्या साहब ?" वो पूछता है.
तेरी एक रिपोर्ट आ गई है..कुछ गड़बड़ है  ...साहब उठकर चिंतित मुद्रा में खिड़की के पास जाकर खड़े हो गए है . दो मिनट का मौन .
बुंदु  इस मौन से थोडा बैचैन हो गया है .
सर  पीछे मुड़े फिर आहिस्ता से टेबल पर बैठ गए है . ठीक बुंदु के नज़दीक
"अब  तेरी बीमारी में क्या है  अगर अंग्रेजी पी तो बचने के चांस थोड़े है . देसी पी तो "काटना" भी पड़ सकता है   ये लड़के लगता है तुझे बताना भूल गये .
.हम सब ने सर थोड़ा ओर नीचे झुका लिए.
मैडम की कुछ समझ नही आ रहा था .वो हैरान खड़ी देख रही थी.
बुन्दू  साहब के पैरो में गिर पड़ा है
"मुझे बचा लो साहब ,  देसी पी थी.
मैडम के चेहरे पर पसीना आ गया है   .वे बाहर की ओर चलने लगी है .
 सर बड़ी विनम्रता से उन्हें रुकने  को कहते है . ओर अरोरा को ड्रेसिंग खोलने को इशारा करते है .
अरोरा  तेजी से ड्रेसिंग खोलता है
वर्षा बेन उबकाई लेती है ओर मुंह बंद करे  बाहर भागी  है . बाहर से उलटी करने की आवाजे सुनाई  दी है
  सिस्टर मुस्कराती है "साहेब तमे भी '.
सर भी मुस्कराते है.
"इसको इंजेक्शन शाम से शुरू कर देना."
वे अरोरा से कहते है.
अरोरा मुझे देखता है. मुझे मालूम है कि multi vitamin का इंजेक्शन लगना है.. बाहर निकलते है तो वर्षा बेन मुंह पर  दुपट्टा  रख  के खड़ी  है. 
'केम छो? सर पूछते है.
वो हाथ से इशारा करती है कि ठीक है.
सर बाकी लोगो को o.P.d में जाने को कहकर मेरे साथ प्रिस्नर वार्ड में जाते है .

वो फर्स्ट फ्लोर पर है.
 "साहेब" रास्ते में ही कोई नेता टाइप सीढिया पार करते ही मिल गया है ." सुप्रिडेंट साहेब से बात हो गयी है .   कुछ भी दिखा  के एक हफ्ता  रोक लो , फिर कोर्ट से जमानत ले लेगे "
सर मुस्कराते है .

वार्ड में  घुसते है तो रईसजादे को पोलिस वाले कोई पान मसाला अपनी हथेली में  पीस कर दे रहे है
वो रईसजादा  बैठे बैठे कहता   "साहेब कुछ करो"
"क्या करूँ तू ठीक तो हो गया "सर कहते है.
आहिस्ता आहिस्ता ठीक करना था.साहेब "
कोई इंजेक्शन देकर  कोई छोटी बीमारी नही आ सकती ?
छोटी तो नही पर बड़ी बीमारी आ सकती है.!
 सर मुझे देख मुस्कराते है.
बड़ी .वो सकपका सा जाता है .

 "देखता हूँ. "सर उससे कहते है ,फ़िर बाहर निकल आते है.
ऐसा करो शाम को बुन्दु को यहाँ शिफ्ट कर देना . रात भर रखना .सुबह ६ बजे ,वापस वार्ड में ले आना .पर ध्यान से .
मै समझ गया हूँ.


रात ११.३० बजे
होस्टल की लोबी में मेरे लिए फोन है ..सिस्टर है...
अनुराग भाई प्रिस्नर वार्ड से बार बार फोन आ रहा है.
कोई बात नही सिस्टर..आप वार्ड देखो....मै कहता हूँ....नीचे उतर कर कमरे में आता हूँ...नवाबजादे अपने आप अस्पताल छोड़ देंगे

सिगरेट के पैकेट को उठकर  झांकता हूँ   आखिरी सिगरेट है . जग्गू दा  को देर रात शिरकत करने के लिए टेप  ऑन करता हूँ  सिगरेट सुलगाकर बौल्कोनी  में खड़ा  हो जाता हूँ . पैकेट को फेंकने से पहले उस पर लिखे शेर को पढता हूँ जो जाने किस मूड में लिखा था

 " कुछ ग़म भी चाहिये, कुछ गिले भी, कुछ शिकवे भी
खुशियों से भरा रहे दिल, तो दिल सा नही रहता"

2008-06-24

इन आवारा नज्मो की उम्र बहुत लम्बी होती है



कुछ नज्मो से आपको मुहब्बत होती है ओर कुछ नज्मो को आपसे ..ऐसा रिश्ता बेख्याली के दिनों मे शायद ओर मजबूत होता है ..पिछले दिनों कुछ मसरूफियत भी रही ओर बेख्याली भी......एक नज़्म ने आज सुबह दरवाजा खटखटाया .....











हर शब

सफ़र करती है
कई रगो का,
कई मोडो पे ठहरती है
जमा करती है
कुछ लफ्ज़

और
रखकर
"मायनो" को
अपनी पीठ पर
सीने दर सीने फिरती है
आवाज दे देकर
जब ढूंढता है शायर

थकी हुई
किसी स्याही से लिपटी हुई
किसी सफ्हे पे सोयी मिलती है
थामो हाथ तो ........
नब्ज़ रुकी रुकी सी मिलती है
इन आवारा नज्मो की उम्र मगर बहुत लंबी होती है









(एक साल पहले लिखी गयी )

2008-06-21

तीन बरस की जिंदगी


सोचता था थाम लूँगा हाथो में
वक़्त है मगर ठहरता नही

जब उसे दरवाजे तक छोड़ कर वापस मुडा तो मेरे स्टाफ की लड़की पानी के गिलास उठाते हुए बोली "एक बात कहूँ सर 'बोलो मैंने कहा ...ये डॉ कितनी सुंदर थी ना,..मै मुस्करा दिया ,ये मुस्कराहट भी अजीब शै है अपने पीछे ढेरो दास्तान छुपाये रखती है .मेघा मेरे क्लीनिक पर आयी थी अपने किसी relative को दिखाने..बड़े ही ओपचारिक तरीके से हम मिले ,साथ में उसकी मदर -इन-ला भी थी .. आजकल ऑस्ट्रेलिया में थी ... ९ साल बीत गये ..

उस रात ११ बजे हॉस्पिटल के बाहर चाय की लारी पर था तब मोबाइल बजा था ..अजय था .."शेखर का एक्सीडेंट हो गया है... ..मोदीनगर के पास हुआ है किसी ट्रक ने टक्कर मार दी है...?क्या सब ठीक है ..मैंने डरते डरते पूछा था "कह नही सकता अभी बेहोश है "काफी fractures है शरीर में....मै स्टेशन पर खड़ा हूँ.... सुबह तक पहुँच जायूँगा ...तू कल सुबह वाली किसी ट्रेन से बैठ जाना......
दो दिन पहले ही तो उससे बात हुई थी ......साले छट्टी रखना २६ तारीख की ..एंगेजमेंट है ... नही आ सकता ..एक्साम है..मैंने कहा ..अबे हमने भी residency की है ..भाईसाहब आप पास हो गए है...उसका रिजल्ट अभी २० दिन पहले ही आया था. अभी ६ महीने है एक्साम में ....उसने गाली दी ...अभी अपनी होने वाली भाभी को तो देख ले .... वही है मैगी वाली ?. या कोई दूसरी है ?..मैंने छेडा…...चिंता मत कर अब राजमा चावल मिलेगे ..बहुत अच्छा बनाती है....उसने कहा ..राजमा चावल मेरी कमजोरी रहे है..वो जानता था बस तू आ जा यार ..ड्रामे मत कर... . वो गुस्सा हो गया था ...."ठीक है भाई" मैंने कहा .... आप हमेशा आगे रहे है.. ..पहले सेलेक्शन,पहले अफेयर ,पहले शादी ..मैंने "ओपनिंग बैट्समैन हूँ न.......वैसे फर्स्ट विकेट डाउन तू था न ? वो हंसा था ...
हम तीनो का ११ क्लास से साइकिलों से पूरा दिन तय करते ...क्रिकेट ओर badminton .दोनों ही टीमो का हिस्सा रहे ...वो ओपनिंग बैट्समैन था ,एक बार मेरठ में एक जगह हालात ख़राब होने की खबरे फैली ..कुछ दुकानों के शटर गिर गए थे ओर हमारा क्रिकेट मैच था ... तो मै ओर अजय साइकिलों से छोटी छोटी गलिया तय करते हुए उसके घर पहुंचे ..उसके घरवालो ने मना कर दिया ,वो बाहर छोड़ने आया तो अजय ने उसे साईकिल पर बिठा लिया ...वो मैच तो बीच में ही रोकना पड़ा था ..पर उसके बाद का मैच कई महीनो तक चला ......उसके घर में हमारी एंट्री बैन हो गयी थी...

फिरोजपुर जनता में ही T.T.को कुछ पैसे देकर मैंने हाथो हाथ जुगाड़ करवाया था ,थकी हुई ट्रेन थी पर कोई ओर आप्शन नही था ..ट्रेन में याद आया कि "मेघा से पहली मुलाकात कैसे हुई थी ? मेरठ में सर्दियों में रात भी ठिठुरती है ओर वो भी दिसम्बर के आखिरी दिनों में ,उस रात उसके होस्टल में हम लोग ये सोचकर बैठे थे की एक एक बियर पी कर कुछ खाने निकल जायेंगे ..लेकिन लंबे अरसे के बाद मिले थे तो वक़्त गुजर गया रात १२ बजे खाना कहाँ मिलता ?मैंने कहा यार भूख लगी है ?बहुत लगी है उसने पूछा .हाँ मैंने कहा था .."चल फ़िर "उसने जैकेट पहनी "इतनी रात को "कहाँ मिलेगा "है एक जगह वो बोला ....उसके पास सफ़ेद रंग का LML वेस्पा था ,हम उस पर बैठे ओर वो लेडीज होस्टल में घुस गये,हमें काटो तो खून नही "अबे पिटवायेगा '? मै फुसफुसाया था ..कही झाडियों के पीछे उसने स्कूटर खड़ा किया ओर पत्थर फेका ...कोई खिड़की खुली ..उसने सीटी बजायी ..अंधेरे में एक छाया बाहर आयी..भूख लगी है ..साथ में कौन है उसने पूछा ....अनुराग है ... ...अबे इधर आ ...उसने मुझे बुलाया मुझे उस माहोल में मिलने में बड़ी शर्म आयी ये साला कौन सा तरीका है रात के १२ बजे बियर पी कर उसके होस्टल में घुस कर खाना मांगो फ़िर छाती ठोककर कहो .."ये है मेरा बेस्ट फ्रेंड " खैर कुल मिलाकर १० मिनट बाद मैगी ,कुछ बिस्कुट लेकर हम स्कूटर पर बैठकर वापस रवाना हुए थे
 

दोपहर ४ बजे तक मै मेरठ पहुँचा था ..सीधा नर्सिंग होम पहुँचा तो नर्सिंग होम के बाहर ही अजय मिल गया
रात को ही घंटो उसका ऑपरेशन चला था ,डॉ होने के नाते उसे ये फायदा हुआ था ..
.. ऑपरेशन तो हो गया है ..multiple fracture है.'सीधे हाथ का अंगूठा ओर दो उन्गुलिया गयी वो कहता कहता रुक गया ....ये बहुत बुरी ख़बर थी.... " मन कही गहरे तक बैठ गया ...उसका तो सपना था की आगे न्यूरो सर्जरी करेगा ...सर्जन के सीधे हाथ का अंगूठा ओर अंगुलिया जाना मतलब ..कैरिएर ख़त्म ....होश आया मैंने पुछा ..."हाँ अभी आधा घंटा पहले ही आया है..' उसने कहा ...जा उससे मिल आ ..पर कदम उठ नही रहे थे .... अन्दर कमरे में घुसा तो उसकी मम्मी देखते ही फूट फूट कर रोने लगी... अंकल ने चेहरा उधर घुमा लिया था ...
मुझे देख वो मुस्कराया उसके चेहरे पर दाढ़ी बड़ी हुई थी चेहरे पर कई घाव थे बाकि शरीर पट्टियों में लिपटा हुआ था , उसके खूबसूरत चेहरे पर एक अजीब सी उदासी थी .. ..कितनी देर कमरे में खामोशी रही.. कई मिलने जुलने वाले आते रहे ....
तकरीबन ४५ मिनट बाद हम दोनों अकेले हुये..मै उसके पास उठकर गया .."कैसा है ? “सब ख़त्म हो गया यार” वो बोला .."वो मुझसे लिपटना चाहता था पर शायद शरीर ने उसका साथ नही दिया ..उसकी आँख से आंसू बह निकले सब ठीक हो जायेगा मैंने उससे कहा ...क्या ठीक होगा मै भी नही जानता था .. कुछ मिनट हम रोते रहे ........जाने कितनी देर से गुबार अपने अन्दर रोके हुए था ..मै हिल गया था ,हम तीनो में वो सबसे मजबूत था ओर मुश्किल वक़्त में हम उसका कन्धा ही ढूंढते थे ....
दरवाजा खुला तो मेघा ओर उसके परेंट्स थे .....मै उठा ओर आहिस्ता आहिस्ता बाहर निकल गया ....
अगले तीन दीन बाद उसका दूसरा ऑपरेशन हुआ ... उसके एक पैर में रोड डली ओर उसके fracture कि हालत देखते हुये बतोर एक डॉ हम जान गये थे कि उसका एक पैर अब नोर्मल नही रहेगा , उसकी चाल में उम्र भर एक लंगडाहट रहेगी .ज्यादा छुट्टी नही ले सकता था इसलिए ५ दीन बाद मै भी सूरत वापस रवाना हो गया ...अगले १ महीने वो हॉस्पिटल में रहा , ओर तकरीबन ६ महीने तक वो बिस्तर में रहा ..उससे फोन पर लगातार संपर्क में रहा ...३ महीने बाद एक दिन रात को उसका फोन आया ..वो सिसक रहा था..क्या हुआ ?..मेघा के घर वालो ने शादी से इनकार कर दिया था ..वे उसकी शादी ऑस्ट्रेलिया के किसी लड़के से कर रहे थे ..मै सन्न रह गया ..उसके पैर में जिंदगी भर खराबी रहेगी ये तय था ,अब वो सर्जरी भी नही कर पायेगा ..पर प्यार ?३ सालो से उनका अफेयर था....
मै बात करूँ मेघा से ?मैंने कहा ..नही ..उसके स्वर में सख्ती थी .. मै जानता था कुछ मामलो में उसके असूल पक्के थे "..प्यार में कोई शर्त नही होती" वो अक्सर कहा करता था ओर प्यार अपनी सूरत नही बदलता वो हर मौसम में एक सा रहता है....फ़िर भी अजय ने मेघा से बात की थी... नतीजा कुछ नही निकला था... उसके बाद हमारी फोन पर बातें होती पर वो कभी मेघा का जिक्र नही करता ..बात करने पर बात को घुमा देता ...अजय से मालूम हुआ ...वो ऑस्ट्रेलिया चली गयी है . वो लगभग ६ महीने बिस्तर पर रहा ...मै एक्साम में उलझ गया ओर रिजल्ट आने के बाद मुंबई जाने से पहले एक बार घर आया तो हम दोनों एक रेस्टोरेंट में खाना खाने बाहर गये तब तक वो एक छड़ी का सहारा लेकर चलता था .."अब क्या इरादा है ?मैंने पूछा ..पता नही ?सोचता हूँ USMLE दे दूँ ?"हूँ "मै सुनता रहा ... ,नानावटी हॉस्पिटल में ...

जिन दिनों मुंबई नानावती में था तब मालूम चला वो अपने बड़े भाई के पास इंदोर चला गया है ओर वही रहकर USMLE की तैयारी कर रहा है ... बाद में घर वाले भी वही शिफ्ट कर गये ....उसने एक्साम पास कर लिया ओर नॉन क्लीनिकल ब्रांच में पी.जी की.....फ़िर वही वही किसी पाकिस्तानी डॉ लड़की से शादी कर ली... अभी उसके एक प्यारी सी गुडिया है फिलहाल वे दोनों वहां के मेडिकल कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर की पोस्ट पर है.. ,.
आज से ३ साल पहले वो जब इंडिया आया था तो हम तीनो दोस्त दिल्ली में मिले थे उसके पास वक़्त की कमी थी ओर अजय तब दिल्ली में हिंदू राव हॉस्पिटल में ही था ... उन तीन सालो में जिस जिंदगी को मैंने जिया है उन्ही में मै समझा हूँ..कि जिंदगी क्या है...इसलिये सच मायनो में मेरी उम्र अभी ५ साल ही है उस रात वो बोला था ..
अभी कुछ दिन पहले मै अपने पुराने फोटो निकालकर उन्हें ठीक कर रहा था तो मेरे बेटे ने उसकी फोटो देखकर पूछा था" ये कौन है ?"
ये हीरो है बेटे असली हीरो "मै बुदबुदाया था


2008-06-18

वो बरगद का पेड़ मुझे अब भी छाया देता है


१७ जून रात २ बजे मंगलवार
.......'GOD FATHER-१" ... अभी ख़त्म हुई है ..उसका नशा चढ़े चढ़े मै घड़ी को देखता हूँ...,२ बज गए है .नींद नही आ .बाहर हलकी हलकी बूंदा बांदी है ,चाय की तलब उठ गई है , चाय बनाने के लिये फ्रिज में दूध टटोलता हूँ.... मम्मी शायद सो गई है माइकल ,स्लो म्यूजिक ओर डार्क शेड में मूवी....
आज सुबह जब दिन को चाय की प्याली में डूबोया था तब मालूम नही था की रात भी इसी चाय की प्याली में डुबोनी पड़ेगी..दिन भर मसरूफ रहा ...सुबह पापा को बनारस जाना था छोटे भाई के पास तो उन्हें रेलवे स्टेशन छोडा था तो रात ९.३0 बजे घर में घुसा था . छोटू भी नानी के पास गया है सोचता था जाते ही नींद आ जायेगी
कई सालो बाद पापा ने कहा उन्हें पेंट लेनी है...वरना वो आज भी सिलवाना पसंद करते है ,तो उन्हें कल बाजार लेकर गया था ......
..यूँ तो वे क्लास-१ ऑफिसर की पोस्ट से रिटायर हुए थे ..पर बेहद सादा जीवन जीते आये है... घर में ज्यादातर सफ़ेद कुरता पजामा ही उन्हें भला लगता है , अपने ऑफिस में भी ऐ.सी बंद कर दिया करते थे ,अनुशासन प्रिया रहे हमेशा मुझे ओर छोटे को सुबह ५ बजे उठा दिया करते थे .... पैंट के दाम देखने को उसके टैग पर झुकते है..मुझ पर गुस्सा करेंगे इसलिए मै पेंट उनके हाथ से लेकर ट्रायल रूम की ओर चलने को कहता हूँ.... .वे सोचते है की दुनिया अभी भी उसी रुपये से चलती है..मै उन्हें टी शर्ट try करने को कहता हूँ...वे मना कर देते है ....एक बार try तो करो..वे हिचकिचाते है मै शोरूम वाले लड़के को सोबर से कलर निकालने को कहता हूँ..वे ट्रायल रूम में जाते है ..ओर शर्माते हुए बाहर आये है..मुझे बहुत अच्छा लगा है.. उन्हें जबरदस्ती एक ओर टी शर्ट दिलाता हूँ.....उन्हें एक व्हाइट टी शर्ट भी पसंद आई है.... कई दिनों बाद हम बाप बेटा अकेले बाहर निकले है...मै उन्हें वही टी शर्ट डाल कर चलने के लिए कहता हूँ....मम्मी उन्हें देखकर मुस्कराती है .......

चाय उबलने लगी है...मै कप में उडेलता हूँ...मोबाइल पर एक मेसेज . बिना पढ़े पड़ा है......आज दिन भर शायद मैंने इस मोबाइल से ढेरो बातें की होंगी....ओर अखबार बता रहा है radition के खतरे ......
चाय का एक घूँट भरता हूँ.........सोचता हूँ GOD FATHER -२ भी देख लूँ.....आज का दिन मसरूफ रहा दोपहर घर नही आ पाया .पता नही पापा सो रहे होंगे या नही ..?
सुबह जब रेलवे स्टेशन उन्हें छोड़ने आया हूँ..कई हिदायते दे रहा हूँ...मोबाइल का ध्यान रखना ..,चैन बाँध लेना ..ध्यान से उतरना वे सर झुकाकर चुपचाप सुनते है ..मै उन्हें गौर से देखता हूँ...अचानक बूढे से लगने लगे है... ट्रेन आ गयी है ...मै उन्हें अन्दर तक छोड़ के आता हूँ... मैंने कहना चाहता हूँ "पापा आई लव यू " पर कह नही पाता ..अंग्रेज अच्छे है ..जब जी चाहा बेबाकी से कह देते है.. पर हम... पता नही कौन सी हिचक है......मै पैर छूकर नीचे उतर जाता हूँ.....

वे ताउम्र
बोझ ढोते रहे
ताकि
मै सीधा चल सकूँ
वे ताउम्र
बोझ ढोते रहे
ताकि
मै अय्याशिया कर सकूँ
मै उनसे प्यार करता हूँ
वे मेरे पिता है ...

2008-06-16

कहाँ छुपा के रखी है रात तुने ?


हर रात अपनी हथेलियों मे कुछ नज्म लिए आती है ...जिंदगी जब कभी आँख बचाकर तस्सवुर की इन तन्हा गलियों मे चक्कर लगाती है वहाँ ऐसी की कई राते मिलती है कुछ खफा खफा सी ....नाम लेकर बुलायो तो सीने से लगकर देर तक शिकायत करती है .....ऐसी ही दो राते








उस
खुश्क रात के होटो पर
बादल रखकर
जब तुम
भीगी -भीगी सी आयी थी,
हर साँस मे
एक समंदर लिये ,
जिसके साहिल दर साहिल
मैं डूबा था
वो रात........
अब भी कही पोशीदा है
रोज़ मेरे सिरहाने
सुबह भीगी-भीगी सी
पड़ी मिलती है
कहाँ छुपा के रखी है रात तूने?










(२)



उन सर्द रातो की
उलझी -उलझी सांसो मे
जब आरजुये
कोहनियो पर सर रखकर
एक करवट सोती है ,
तन्हाई चाँदनी को ओक मे
भर भर कर पीती है
खामोशियाँ सारी आह्टो को
आगोश मे भरे रहती है
एक ख़वाब ........
अक्सर जगा हुआ मिलता है
आओ कुछ ऐसा करे "सोना"
उस लम्हे को फिर से ज़िंदा करे
कि
नींद आ जायेगी इस ...."बेचारे "को




2008-06-14

इन दिनों तू कहाँ है जिंदगी ?...

गाड़ी चलाते फोन बजता है तो उठाता हूँ, "तुने सुना "उधर से मेरा दोस्त है.....
"नही यार अभी वक़्त नही मिल पाया "
... अमेरिका से उसने कोरियर करके एक सी .डी भेजी है .... साथ मे एक ख़त भी ...अब ख़त मिलना बहुत भला सा लगता है....लिखा है .रात के ३ बजे लिख रहा हूँ ...आज अचानक यहाँ एक स्टोरसे कुछ " रेयर" मिला है ... मालूम है तेरी पसंद के है "रंजिश ही सही .......मेहंदी हसन की आवाज मे भी है ओर अख्तर की भी.....slow वर्सन मे भी है ओर तेरा पसंदीदा "रात भर आपकी याद आती रही "भी है......मैं पढ़कर मुस्कराता हूँ उन दिनों मैं उसे लेकर कितना दौडा था इस गाने को ढूँढने के लिए अपनी यामहा पर ......
तब वो कैनी रोजर्स या दूसरे कंट्री सोंग्स   सुना करता था ...झुंझला गया था ,"क्या है इस गाने मे . ? अब  बदल गया है ...कितने किलोमीटर गाड़ी चला कर जगजीत का कन्सर्ट सुनने जाता है.....पिछले १० दिनों मे उसका तीसरा फोन है.....रात को १.३० बजे मोबाइल बज रहा है....... वही है...... "सुना "
मैं जवाब नही देता हूँ....
तू बदल गया है साले ...
वो फोन रख देता है....नाराज है......
वाकई जिंदगी हमे बदल रही है.....




मसलसल भागती ज़िंदगी मे
अहसान -फ़रामोश सा दिन
तजुर्बो को जब
शाम की ठंडी हथेली पर रखता है
ज़ेहन की जेब से
कुछ तसव्वुर फ़र्श पर बिछाता हूँ
फ़ुरसत की चादर खींचकर,
उसके तले पैर फैलाता हूँ
एक नज़्म गिरेबा पकड़ के मेरा
पूछती है मुझसे
"बता तो तू कहाँ था?




2008-06-13

बा-अदब बा-मुलिहजा होशियार रोल नंबर एक आ रहे है.



……….न दिनों होस्टल एक इबादतघर मे तब्दील हो जाता था ... एक अजीब सी खामोशी पसर जाती ....... सूरज रात मे उगने लगता …ओर दिन मे तो बदस्तूर उसे जलना ही होता ....... जिस “बेच ” का एक्साम नही होता  वो  भी  अपनी चाल सुस्त कर देता .शायद . ये एक अलिखित समझौता था .जो बरसों से  नियमनुसार  चला आ रहा था . ...   बाल्टी का डब्बा “ऐश- ट्रे ” बन जाता ... ओर आपकी सिगरेट का कोईब्रांड    ” नही रहता ..... सीनियर फ़रिश्ते सरीखे हो जाते .........बिन मांगे चाय का थर्मस भरा हुआ ....कुछ  सेवा करने वाले   आपके कमरे पर समय समय पर पहुंचे होते  ..... कमरे की अलमारियो   पर  चाक से प्रेरक शब्द “ लिखे होते ओर जिनके बीच-बीच मे कही कुछ अपने बनाये हुए “फंडे ” या फार्मूला होते . अमूमन सब की दाढ़ी बडी हुई होती , एक दो अपवादों को छोड़कर (ये वो लोग थे जो या तो बेहद ऊँचा I.Q. रखते थे ,या कुछ नही रखते थे ).
लोकालाईट (डे- स्कॉलर को गुजरात मे इसी नाम से पुकारा जाता है) हॉस्टल मे ही पढने आते थे ,कुछ दोस्त कपड़ो लात्तो समेत शिफ्ट हो जाया करते .........हमारे कमरे के मेन दरवाजे के पीछे   “  ग्लेडरेग्स मैगज़ीन  की कुछ  देवियो  के निहायत  ही  खूबसूरत  पोस्टर  चिपके  रहते  थे ......जो उन दिनों खास परेशानी का सबब बनते   क्योंकि  तब  हमारे  एक दोस्त के मम्मी –पापा गाहे -बगाहे आ जाते , उनके  आते ही  बाल्टी (जो उन दिनों एशट्रे थी ) किसी अनुभवी  फुट्बोलर  की माफिक  बडी  तेजी  से  एक तगड़ी  लात   द्वारा एकदम पलंग के नीचे पहुँचाई जाती  ओर दरवाजे को पूरा खोल दिया जाता ताकि उसके पीछे के पोस्टर पर निगाह न पड़े . तब भी  आंटी बार- बार दरवाजा बंद करती ओर हममे से एक उसे बार - बार खोलता रहता , बाद की रणनीती मे ये  भी  तय  किया  गया  की  एक शख्स अंगद की तरह खुले दरवाजे पर ही खड़ा रहेगा . .(दरसल वो पोस्टर भी  कलेक्शन  का हिस्सा था ओर नाजुक मौको पे प्रेरणा  का काम करते थे .... जो काफी मेहनत से चुन-चुन कर फाड़ कर वहां फेविकोल के मजबूत जोड़ से चिपकाये गए थे)....... यधपि  अंकल  ख़ुद  डॉक्टर  थे ,इसलिए चीजों को समझते –बूझते नज़र -अंदाज़ करते थे .कई  बार  हमे  हिंट  देते  हुए  लोबी  मे बाहर से आवाज देते हुए आते ,पर आंटी   अमूमन  दूसरी मांयो की माफिक भोली भली थी   .कितने “कोड वर्ड  ”  इख्तियार हुए  की उनके आने से पहले  उनके आने से पहले खबर पहुंचे , रूम फ्रेशनर खरीदे गए ,अगरबतिया लायी गयी ……….अनेको रणनीतिया  बनी सब    फेल  हुई . बाद के दिनों मे हमने रणनीतिया बनाना ही छोड़ दिया ।
मारे  खास  रूम -पार्टनर   शायद  144- I।Q लेकर पैदा हुए थे ,......वे साल भर वोली वाल खेलते ,सिगरेट फूंकते ..... ओर सारा साल  खूबसूरत लड़कियों के अवैतनिक सलाहकार के तौर पर काम करते .....किताबो को महज़ एक बार पड़ते ....फ़िर ना जाने दिमाग के कौन से  कोने मे फिट कर लेते .......हम ये सोच कर उनके साथ घूमते की चलो देखा जायेगा ...... एक्जाम टाइम  मे जब हम किताबो से जूझ रहे होते ओर वो साहिब इंडो पाक ” का कोई क्रिकेट मैच देख रहे होते....... नतीजन हम अक्सर फ़ैल हुए ,वो केवल एक बार …
….
होस्टल मे आप को किस्म किस्म के प्राणी मिलते है.......आप सोचिये आप इकठ्ठा पढ़ रहे है ,ओर धीरे धीरे कुछ चैप्टर पड़ते जा रहे है की चलो एक ओर कम हुआ की ......अचानक “धम “ से एक आवाज आती ,  जो  किसी  किताब  के  बंद  होने  की  बड़ी डरावनी  आवाज होती ।(जो बाद के दिनों मे काफी परिचित बन गई )ओर  एक  महाशय  टिपिकल  अंदाज  मे  पूछते ,” किसी  को  कुछ  पूछना तो नही है ” ? बाकि  के  हम  चार बडी  मासूमियत  से  उसे  देखा  करते . उससे  डर  कर हमारा एक मित्र ने दूसरे कमरे मे अपना बोरिया बिस्तर शिफ्ट करवा लिया .जिंदगी थमी  रहती ,एक महाशय अपने पास  टाफियो   का ढेर सारा डब्बा रखते ओर  सिगरेट  से कडुवे   हुए मुंह को.... उन मीठी गोलियों से बडी  तसल्ली मिला करती . 
न दिनों  उन लोगो की “ड्यूटी ’ लगती जो   एक्साम गोइंग नही  होते .उन्ही लोगो का खास फर्ज था सबके नाश्ते पानी  ओर तमाम दूसरे तरह के शौक पूरे करना .....जैसे गुटका ,मसाला ,पान ,चाय ,या खास डिश  ...
दूसरे कई काम उनके जिम्मे होते मसलन  सुबह फला बजे फला को उठाना .....दोपहर मे एक घंटे बाद फला को उठाना ........ ओर जब तक  वही डटे रहना है  जब  तक  की वो शख्स पूरी तरह आँख खोलकर वापस मुस्तेदी से अपनी गद्दी पर ना आ जाए  गद्दी यानि की पढने की जगह ,सबकी अलग अलग होती ...... इस हिदायत का कारण   भी  ये था   की  कई  बार जगाने के बाद लोग सो जाते तो ऐसी किसी दुर्घटना को रोकने के लिए ये कदम उठाया गया  ...........एक महाशय यूं तो पढने मे बहुत तेज़ दिमाग थे पर सोने मे उन्हें बड़ा मजा आता था ,इसलिए जब भी उनको उठाने के लिए जाया जाता ……वो खास अंदाज मे कहते बस ‘आधा घंटा ओर ” , फ़िर वो आधा घंटा रात के २ बजे से सुबह 5 बजे जाकर  पूरा  होता .......सालो यही सिलसिला चला .....सालो वे 5 बजे उठते रहे ,सालो वे एक्साम मे अव्वल आते रहे 
.र हर कोई उन जैसा खुशनसीब नही था..... एक महाशय थे  जिन्हें अमोल पालेकर कहा जाता था .वैसे ही शरीफ  सा लुक...  उन्हें इन्सोमिनिया की बीमारी थी जो सुबह तडके बेवफाई कर जाती तो ये साहेब रात भर जागते लेकिन सुबह आते आते ऐसे सोते घुटने मोड़कर की उन्होंने उठाना मुश्किल हो जाता ...........दूसरी ओर तकलीफ थी इन्हे कोंसटीपेशन  की . सुबह कई पल इनके बाथरूम मी गुजरते .........आलम ये होता .की जब हम सब तैयार होकर सुबह नीचे खड़े होकर इन्हे आवाज देते .....ये बाथरूम में  अपने पेट से जूझते हुए जोर अजमाइश में उलझे होते   ......वही से आवाज देते ...ओर नीचे हम घडी की सुइयों को धक् धक् चलता देखते ......थोड़ी देर बाद पसीने से लथपथ .. ये बगैर बेल्ट की पेंट सँभालते हुए ,दौडे दौडे  नुमाया होते    .... इनकी कमर ऐसी थी की लड़किया रश्क करती थी. 
इन दिनों ये ब्रिटेन के बाथरूमो में जूझते है के नहीं ये तो नहीं मालूम पर इनकी कमर अब वैसी कमर नहीं रही है ......अब सिगरेट के बाद टॉफी नहीं  खाते ..आँख के बड़े डॉक्टर है .....पर इनकी मूंछे अमोल पालेकर जैसी ही है.

2008-06-12

रोल नंबर एक हाजिर हो...पहला भाग.

अब भी जब घर मे क्रिकेट का मैच देखता हूँ तो कई बार  आज भी सीटी बजाता हूँ ,मेरा बेटा हैरान हो कर मुझ से इसकी कई बार दुबारा भी फरमाइश करता है ,होस्टल के दिनों मे क्रिकेट मैच एक समारोह की तरह होता था ,जिसमे बाकायदा कोई खास मैच शुरू होने से पहले टी.वी की बाकायदा पूजा भी की जाती थी ओर आगे की सीट के लिए पहले से लम्बी वेटिंग लगती थी ,हर रन पर तालिया ओर सीतिया बजती थी ओर हर विकेट पर जश्न होता था ,किसी मैच को जीतने के बाद बाकायदा जलूस निकलता था ओर देशभक्ति के जोर जोर से नारे गूंजते थे ,सचिन तब भी हमारे भगवान् हुआ करते थे .ओर चलते मैच के दौरान किसी नाजुक स्थिति मे सारे टोटके आजमाये जाते थे ,बाथरूम जाने वाले को भी अपनी सीट से उठने की मनाही थी .
पर कुछ क्रिकेट मैच अलग ही होते है उनमे से एक मैच ये भी था ,बात “फोरेंसिक- MEDICINE” के exam के viva की है। हमारे head एक south Indian थे क्रिकेट के बहुत शौकीन थे और बाहर से आने वाले examiner भी …उस दिन सूरत मे खूब बारिश हो रही थी… ओर “INDO-PAK SERIES ‘ का एक दिवसीय मैच भी ।बारिश की वजह से लाइट नही आ रही थी । हम अन्दर दाखिल हुए तो तो एक ‘RADIO’ धीमी आवाज मे मैच का आंखो देखा हाल बयान कर रहा था . उन्होंने हमारे अप्रोन पर टंगी हमारी “name plate” पर सरसरी निगाह डाली ओर फ़िर कहा ‘DEFINE POISON’ हम रटे –रटाये संवाद की तरह शुरू हुए “poison is a substance……॥ 
रेडियो पर जोर की अस्पष्ट आवाज़ हुई  "क्या हुआ ?"
 हिन्दुस्तानी रेडिओ नाजुक मौके पे ख़ास  खर खर  किस्म की आवाजे सुनाते है उन दोनों महानुभावो ने अपनी गर्दन का डायरेक्शन चेंज किया .कोई चोका लगा था .अजहर ने मारा था यूं तो हम भी बहुत बड़े क्रिकेट के शौकीन है पर उस रोज हमारा ध्यान कही ओर था दोनों फ़िर मुड़े
 " हाँ बतायो " 
मैं फ़िर शुरू हुआ ”poison is a……….फ़िर तेज शोर गुल . रेडियो कुछ disturb सा हुआ . हमारे सर कुछ बैचैन से हुए ,बुन्दू ने ने आँख का इशारा समझा ओर रेडियो के कान उमेठे .भाग कर 2 रन लिए गए थे दोनों के चेहरे पर एक तस्सली सी आई एक बार फ़िर .हम फ़िर शुरू हुए "poison is a substance…"
 जोरदार अपील .LBW ? अजहर  के लिए.
हमे काटो तो खून नही , ये मैच पाकिस्तान मे हो रहा था ,ओर वहां तो अपील से पहले ही umpire हाथ उठा देंते है .हमने मन ही मन भगवान -अल्लाह दोनों से दुआ की . हमारी प्राथना स्वीकार हुई .यदपि हम घोर नास्तिक ओर आर्यसमाजी पृष्ट-भूमि परिवार से नाता रखते है (ये बात ओर है की हमने उसके कई नियमो को माना  नहीं  ) लब्बे- लुआब   ये के अजहर को आउट नही दिया गया ओर हम भी आउट होने से बच गए , आज भी अगर कोई सोते सोते हमसे poison की परिभाषा पूछेगा तो हम उसे बता सकते है ॥ 
अमूमन एक्साम के viva से जब पहला शख्स बाहर निकलता है तो उस पर कई सवालिया निगाहे होती है ,जो धीरे धीरे एक घेरे के रूप मे तब्दील हो जाती है ओर फिर बाहर निकला शख्स अपने तजुर्बे सुनाता है .उसमे कितना सच ओर कितना झूठ होता है ये अलबत्ता बहस का विषय है वैसे एक्जाम के मुताल्लिक  ओर कुछ निर्देश भी होते है की आप बाहर निकलते ही सीधे उस दायरे से बाहर चले जायेंगे .हम बाहर निकले ओर खुशी मे ही डांस की मुद्रा शुरू की कुछ ठुमके ही लगाये थे की एक पोज़ मे पीछे मुड़े तो हमारे  सुब्रह्मान्यम सर पीछे खड़े थे
"ऐ लड़के क्या करता है ?".
“सॉरी सर -सॉरी सर “ कहते हम सरपट दौड़  लिए. 

2008-06-10

कितना मुश्किल है आसान होना ?

वो जब रोज थककर घर लौट कर आती है तो उसे अपनी थकान से ज्यादा इस बात की फिक्र रहती है की मेरे बेटे ने खाया की नही ?घर मे घुसते ही उसका पहला सवाल होता है ....उसने कुछ खाया है या नही.... ।वो दोपहर का पेट भर खाना सिर्फ़ छुट्टी वाले दिन खाती है ॥सुबह कभी कभी नाश्ता करती है कभी नही.....क्यूंकि जाते जाते भी उसे इस बात की चिंता रहती है कि नाश्ता ठीक बना या नही ? कई बार शायद रास्ते मे उसका भी मन होता है कि कही रुक कर कोल्ड ड्रिंक पी ले....पर ... उससे ज्यादा घर जल्दी पहुँचने की जल्दी....कितने सालो से वे एक सन्डे का इंतज़ार करती है कि उस रोज वो सिर्फ़ उसका संडे होगा.....पर सन्डे वो सुबह से ही जुट जाती है..... ऐसा लगता है सन्डे वो ज्यादा व्यस्त रहती है.....जब कभी छोटू भूखा सो जाता है या उसे कोई चोट लगती है तो वो रुआंसी हो जाती है....उससे लिपट कर रोती है ....."मैं नौकरी छोड़ दूँ?वो सवाल पूछती है ओर ना जाने किस "guilt " को अपने अन्दर सीचती राहती है.....कभी कभी साल मे एक दो दिन वो कहती है "सुनो चाय पिलायोगे ?"...ओर फ़िर थोडी देर मे ही गैस के पास आकर दूध मे पत्ती भी डाल देती है... एक गुलाब का फूल कई रोज तक संभाल कर रखती है ओर पानी से उसे कई रोज तक जिलाए रखती है...फ़िर बाद मे किसी किताब मे छुपा कर रख देती है.....बाज़ार मे किसी रोज अपने लिए खरीदने निकलती है ओर फ़िर किसी दूकान से छोटू के लिए टी शर्ट ले आती है.....तुम्हारा ?अगले सन्डे देख लेंगे.......



एक माँ की पाती

तुम क्या जानो ....
कितना मुश्किल होता है
इक नन्ही सी जान को
बहला -फुसला कर उठाना

छोटे से कंधो का
बस्ते का बोझ उठाना
छुट्टी की घंटी के संग
अपना चेहरा दिखाना
इक -इक निवाले मे
हाथी -घोड़े बिठाना
रोज़ कई शब्दो को
चुन कर इक कहानी बनाना
भरी दुपहरी झूठ-मूट
आँख मीच कर सो जाना
दिन भर की तल्खियो को
उसकी हँसी से मिटाना

तुम क्या जानो.....
कभी-कभी
अच्छा लगता है
बिखरा घर
तुम क्या जानो
कैसा लगता है
आँसू गाल पर रख कर सो जाना
तुमने देखा है कभी ,
सोया हुआ बचपन ?
हर रात
खिड़की से रात को उतारकर
टीका लगाती हूँ

तुम लिखो
चाँद तारो की बाते ,
मुश्किल लोगो की ,
उलझी उलझी सी बाते
मेरी दुनिया तो......
छोटी सी दुनिया है
जिसके सारे रिश्ते
इन्ही नन्हे हाथो से होकर गुज़रते है।

2008-06-07

तू बता जिंदगी किस मोड़ मुड़े ?

मेरठ फरवरी २००१
आबूलेन के एक चौराहे पर खडे हम दोनों कोल्ड-ड्रिंक पी रहे है ,मैं असमंजस मे हूँ की मेरठ शहर मे वापस आयूँ या सूरत वापस चला जायूं,मेरी जेब मे डॉ मेहता की चिठ्ठी पड़ी है ...जिसमे उन्होंने मारीशस मेडिकल कॉलेज को ज्वाइन करने का ऑफर दिया है..मेरी wife को भी microbiology मे एडजस्ट कर दिया जायेगा...मुझे मेरठ बड़ा अव्यस्थित सा लगता है ,कोई डिसिप्लिन नही ..यहाँ के लोग बात बात मे गुस्सा हो जाते है...."यार वहां गुजरात मे पैसा बहुत है ..यहाँ up मे लोग पैसा कमा के फ़िर जोड़ के रखते है ..वहां हर आदमी खर्च करता है इसलिए पैसे का फ्लो बना रहता है ..मैं अपना तर्क देता हूँ,..दस मिनट यहाँ खड़ा रह ...देख कितनी गडिया यहाँ से गुजरती है ....अब मेरठ वो नही रहा १० साल मे ये भी बदल गया है.....साला गाँव है....मैं बुदबुदाता हूँ..हैरान हूँ कि कोई गुजरात मे u.p या मेरठ को कुछ कह देता था तो मैं बिफर जाता था फ़िर मैं ऐसा सोच रहा हूँ.."बेटे ऐसी गाँव ने तुझे पाल पोस कर बड़ा किया है....उसने ओर मैंने अपने सपने साथ ही बोये थे ,साथ साथ ही उन्हें सीचा ओर साथ साथ ही उन्हें बड़ा होते देखा ओर गाहे बगाहे हौसलों की कुछ बूंदे एक दूसरे की मिटटी मे डालते रहे अलबत्ता दोनों की जमीन अलग अलग थी.....बाद के कुछ सालो मे मैं मेडिकल मे एडमिशन लेकर बाहर चला गया ...वो I.A.S के प्री मे तीन बार सेलेक्ट हुआ फ़िर अचानक घर मे पिता के आकस्मिक निधन की वजह से जॉब ज्वाइन कर ली..excise मे काफ़ी अच्छी पोस्ट पर है........."
लेकिन मैं अब शहर मे किसको जानता हूँ..मैं उससे कहता हूँ...सब यार दोस्त बाहर गये...
जब तू यहाँ से गया था तो उस शहर मे किसको जानता था ?अब वहां बहुत से लोग है ना...ये तो तेरा अपना शहर है....कितने दिन लगेंगे...मैं सड़क पर चलती गाडियों के देखता हूँ.......

नवम्बर २००० सूरत ....

यार माँ बाप अकेले पड़ जायेंगे ....छोटा भी बाहर है ..मैं कहता हूँ..
तुम साले शायरों का यही होता है...हर फ़ैसला किताबो के पन्नों से जोड़ कर लेते हो या ..दिल से... 'मेरे सूरत वाले दोस्त कहते है...दोनों बाहर जा रहे है ..एक U.K तो दूसरा हावर्ड..एक opthalmologist है ,दूसरा सोशल मेडीसिन वाला..दूसरे के पिता I.A.S.है इसलिए उसकी सोच भी W.H.O या किसी रिसर्च मे जाने की है...ऐसा नही है की वो ग़लत सोच वाले इंसान है...."सबके हालात जुदा होते है "मैं कहता हूँ...फ़िर शेर पढने लगा ..मेरा दोस्त कह रहा है... ' जिंदगी के गंभीर फैसले जज्बातों से नही लिए जाते '.... अजीब उलझन है......मैं सोचता हूँ...
पहले सोचते थे की बस डिग्री मिले तो छू लेंगे आसमान ....अब यहाँ कोई छोर नही मिल रहा है..इस शहर मे रहकर ढेर सारे सम्बन्ध बन गये है ,एक मन यहाँ भी खींच रहा है......

फरवरी २००१ मेरठ ....
डॉ श्रीवास्तव की .चिट्ठी पापा के आगे रखता हूँ....तुम जाना चाहते हो तो देख लो हमारी चिंता ना करो अभी इस शरीर मे बहुत जान है.....वे कहते है ....मैं उनका चेहरा गौर से देखने लगा हूँ..वे बूढे हो चले है ...चिट्ठी को भी नजदीक से ले जाकर पढ़ रहे है ,एक आँख मे मोतिया आ चुका है ..कई बार कह चुका हूँ की ऑपरेशन करवा लो ....बस तू आ जा फ़िर करवाते है... वो कई महीनों से टालते आ रहे है..... क्या उनका गला रुंधा सा है या मुझे वहम है ,वे अपना गला खंखारते है ... मम्मी चाय लेकर आयी है ..शुगर ओर ब्लड प्रेशर की मरीज है ...मोबाइल बज उठा है...सूरत से देवांग का फोन है....रानदेर रोड पर जगह final कर ली है ....तुने कुछ सोचा की नही ?वो भी opthamlologist है बता ....यहाँ एक दो जगह खाली है... ..मैं चाय पीता पीता बाहर आ गया हूँ....बताता हूँ....
बिना वजह गाड़ी उठाकर बाहर निकल गया हूँ.....आगे एक रिक्शा जा रहा है .हार्न देता हूँ, रिक्शा वाला सुन नही रहा है...देखता हूँ उसमे दो बूढे बुढिया बैठे हुए है ,बुढिया ने कमर का सहारा बूढे को दे रखा है ...बूढा शायद बीमार है....कुछ खांस भी रहा है....हार्न की आवाज सुनकर पीछे देखता है....उसकी शक्ल पापा से मिलती सी लगती है....
जून २००८
शुक्रवार का रात का खाना मेरे साथ खाना है ,उस दिन जरा जल्दी फ्री हो जाना ,मेरा excise वाला दोस्त फोन पर है...मैं समझ जाता हूँ कोई बात है ...वो आजकल गजिअबाद पोस्टेड है..रात को हम साथ बैठे है...उसके चेहरे पर गहरी उदासी है .....वो बोलना शुरू करता है ...
गाँव मे एक जमीन थी .बहुत ज्यादा नही थी ...केवल ५ लाख मे बिकी ...माँ ओर दोनों बड़े भाई के अलावा छोटे भाई बहन का भी हिस्सा मिलाकर सबके हिस्से १ लाख आता ,तुझे मालूम है छोटा कैसा है....मैं सर हिलाता हूँ.. जानता हूँ उसके छोटे के हालात ठीक नही है .सोचता था की इन पैसो से कोई व्यापार करवा दूंगा....पर .....वो खामोश हो जाता है.. भाइयो से कुछ डिसकस करने की सोच ही रहा था कि उससे पहले ही गाड़ी मे रस्ते मे ही मालूम चला दोनों भाइयो ने पहले से तय कर रखा था कहाँ इन्वेस्ट करना है ....बहन ने भी......ये बहुत ज्यादा पैसा तो नही था अनुराग....
उसकी आँखे भर आयी है...८ सालो ने रिश्तो के चेहरे बदल दिए है .. उसके बीच वाले भैय्या उसके हीरो हुआ करते थे ,मैं जानता हूँ... मेरे भी थे ....मैं क्या कहूँ .मैं खामोशी से सुनता हूँ... उसने सिगरेट सुलगा ली है ...

७ जून २००८ शनिवार शाम ६ बजे

क्लिनिक मे घुसता हूँ ..तो एक आदमी अपने बेटे ओर एक अपनी पत्नी से साथ बैठा हुआ है ....उसकी पत्नी कि एक बांह नही है.डॉ साहब ४ बजे से आपका इंतज़ार कर रहा हूँ...वो कहता है ..दूर से आए थे आपका टाइम मालूम नही था ...तो सोचा मिल कर जायेंगे ...उसके ५ साल के बेटे को सफ़ेद दाग है....क्या काम करते हो ?मैं पूछता हूँ...मजदूरी करता हूँ साहब .६० रुपये रोज......१५० रुपिया मेरी फीस देकर वो मुझे दिखाने आया है ...सरकारी अस्पताल मे उसे विश्वास नही है.....साहब मेरा बेटा ठीक तो हो जायेगा ना..उसकी बीवी मुझसे पूछती है....


दर्द है कि कम्बख्त ख़त्म होता नही..........रूह को चैन मिलता नही ....

2008-06-04

हर स्त्री के भीतर होती है एक लड़की .......

हर स्त्री के भीतर होती है
एक लड़की..........

बेमौसम की बारिश मे
वो अक्सर भीग जाती है,
उबले हुए भुट्टो को
देख रुक जाती है
अपने नन्हे के साथ

मुन्दी आँखो से ,
उनीदे तारो से
देर तक बतियाती है

मैके मे जामुन के पेड़
पर चढ़ जामुन खाती है ,
बीती हुई जगहो को
स्नेह से थपथपाती है.
पिता की बाँहो मे

चिड़िया के बच्चे सी
छिप जाती है
ढेर सारा प्यार

हथेलियों मे भर
माँ पर उडेल आती है .....

रोज़ कई सपनो को,
वक़्त के कोनो पर ,

जहाँ- तहाँ सजाती है ....
सचिन के चौके पे
आटे से सने हाथो से
सीटी बजाती है

छत पर दौड़
पतंग लूट लाती है......

हर स्त्री के भीतर
होती है एक लड़की ..........


है ना?


2008-06-03

संवेदनायो का मर जाना दरअसल आपका मर जाना है ..



कुछ बादल के टुकड़े ,कुछ ख़ूबसूरत लम्हे जाया हुए
जेब टटोली तो ढेर सारे सिक्के जमा हुए थे…… 


लो एक ओर दिन ख़र्च हो गया ज़िंदगी का







रविवार को दोपहर बाद किसी काम से दिल्ली जाना हुआ ,नेहरू प्लेस पर एक ब्रिज के नीचे दो मिनट को गाड़ी रेड लाईट पर रुकी तो बच्चो को ब्रिज के नीचे आपस मी खेलते हुए ओर हँसते हुए देखा ,दोनों के हाथो मी किताबो के बंडल थे ,जो शायद उन्हें बेचने के लिए दिए गये थे पर वे उन्हें छोड़ आपस मे हंस खेल रहे थे , मैंने अपने बराबर मे सोये हुए एक डॉ साहब को देखा ,जो तकरीबन मुझसे उम्र मे २० साल बड़े होगे ,वे सो रहे थे ,सोते वक़्त भी उनके चेहरे पे अजीब सी शिकन थी ....... याद करने की कोशिश की कब मैं खुल के आखिरी बार हंसा हूँ... कल दिन भर अजीब से ख्यालो मे उलझा रहा ...


रात को "आहा जिंदगी" का एक पुराना अंक हाथ आया ... तो उसकी कई बातें कही गहरे तक मन मे उतर गई ,सोचा उन्हें कुछ आप से बाँट लूँ ,कुछ ख्याल भी साथ साथ दिल मे आए.....
1.लेखक होना ओर बात है अच्छा आदमी होना दूसरी बात, सच बात है, टोलास्टोय जैसे महान लेखक अपनी वास्तविक जिंदगी मे शायद उतने महान नही थे जितने वो कागजो मे दिखते थे
२.आप चाहे जो कर ले पटना मे ठेकेदार क़ी पॉल खोलने वाले युवा इंजिनियर क़ी हत्या पर एक फाउंडेशन ज़रूर बन जायेगा लेकिन तिहार ज़ैल क़ी कॅंटीन तो पप्पू यादव के इशारे पर छूटेगी।

3. आदर्श का क्या पैमाना है?किसी ने कहा “अच्छा करो,किसी को तकलीफ़ मत दो ओर मज़ा करो.जब पूछा गया क़ी अच्छा क्या होता है?जिसे जो अच्छा लगे वही अच्छा. हो सकता है जो मेरा अच्छा हो वो आपको बुरा लगे. एक बार पैसा ओर नाम कमा ले तो कौन पूछता है कहाँ से आया?एक बार सफल हो जाइए फिर आदर्श बनाते …फिरीये … इसे पड़कर एक शेर याद आया
जहिदो जन्नत मे जाना कोई तुमसे सीखे

हर गुनाह से तौबा कर ली जब जवानी जा चुकी”
मैने ऐसे ही एक सज्जन अपने जीवन मे देखे है ,जो रिटायर होने के बाद अचानक आदर्शो क़ी बात करने लगे थे,पूरे जीवन उन्होने भ्रष्टाचार से ख़ूब धन एकत्र किया था।
सामाजिक ओर व्यक्तिगत आदर्श अलग अलग होते है,उनकी मिलावाट ना करिए. ऐसा क्यू है क़ी गुनाह करने वाले लोग ही उँचे बन पाते है?जिसे सफलता मिल गयी वही नायक……..उदारहण के तौर पर देखिए सलमान ख़ान हिरण को मार कर मुस्करे खड़े है, सेलीब्राती होने के नाते उनकी बड़ी सामाजिक ज़िम्मेदारी होनी चाहिए,अब वे निर्दोष होने क़ी रात लगाकर मंदिर –मस्जिद के चक्कर लगते है, ओर बेचारे लोग इस चिंता मे घुल रहे है क़ी सलमान ने ज़ैल क़ी रोटीया कैसे खाई होगी?कितने आदमियो को कुचला था उन्होने किसी को याद नही? लोग 50 लाख मंदिर मे दान कर देगे पर सड़क पर खड़े किसी ग़रीब को दुत्कार देगे. सुप्रसिद्ध लोगो के आदर्श-विरोधी कामो के बावजूद वे सफल बने रहते है, क्यूँकी आदर्श छविया अर्थशास्त्र द्वारा घड़ी गयी है,अब आदर्शो क़ी सूची नही बनती,प्रभावशलियो क़ी बनती है. अमिताभ बच्चन को देख लिजेए,तमाम ग़लत लोगो के साथ होते हुए भी वे प्रभावशाली बने हुए है.
लोग अपराध कर उसके बारे मे किताब लिखकर उसकी ‘रायल्टी” से लाखो –करोड़ो कमाते है। कही उसकी ग्लानि नही?

४.हर आदमी क़ी ये इच्छा होती है क़ी वो एक सफल जीवन बिताए, सामाजिक सफलतायो का मतलब सत्ता,शक्ति ओर धन है लेकिन समाज इस सफलता तक पहुँचने के लिए आदर्श भी स्थापित करता है जैसे मेहनत,प्रतिभा, ओर योग्यता। सफल होने क़ी राह कठिन है ओर लंबी भी ,इसलिए आसान पग्दन्डीयो क़ी तलाश क़ी जाती है। समाज के लिए सफलता महतावपूर्ण है चाहे वह पगडंडी वाली हो या सही रास्ते से तय क़ी हुई. हर व्यक्ति के अपने आदर्श है,जो सफल है. आज हम आम के ऐसे पेड़ लगाना चाहते है जो तुरंत फल दे हर इन्सान चाहता है कि शोहरत तो तुरंत भोग सके ओर उसे ज़्यादा से ज़्यादा उपयोग मे ला सके ओर इसलिए सफलता हमे जल्दी से जल्दी चहिये।पर्सिद्धे से लोग अच्छाई को भी जोड़ लेते है।जब हम गेंहू का बीज़ बोते है तो हमे 3 महीने मे फल प्राप्त हो जाता है,लेकिन हम आम का बीज़ बोते है तो हमे आम 5 साल बाद मिलने शुरू होते है,लेकिन गौर करने वाली बात है क़ी आम का पेड़ हमे अगले 100 साल तक फल देता रहेग.जब्कि गेंहू क़ी फ़साल केवल एक बार मिलेगी. कृषि से धीरज क़ी अच्छी शिक्षा ली जा सकती है्अर नये दिन का सामना धीरज ,शॅंटी ओर विश्वास से करना ज़रूरी है.

५.इमानदर व्यक्ति वह नही जो कभी झूठ नही बोलता ,हम आप सभी जानते है ऐसा होना संभव नही है.बल्कि वह होता है जिसे अपनी ग़लती मानने मे कोई भय नही होता. शमा माँगना भी इक ईमानदारी है. हम ज़िंदगी भर अपनी आत्मा के साथ रहते है ,कितनी बार इससे बाते करते है ओर कितनी बार इसकी कही बतो को सुनते है?आप मे अंतरात्मा है तो आप मुनभाई क़ी 3 घंटे क़ी फ़िल्म से इतना कुछ सीख जाएँगे जो सलमान ने 40 ओर संज्या ने 50 सलो मे नही सीखा. जब आपको अपनी आत्मा से शर्मिंदा होना पड़े ऐसी सफलता का आनंद आप नही उठा पाएँगे. कहते है बेईमानी सबसे ज़्यादा ईमानदारी के साथ क़ी जाती है,बेईमानो का हिसाब अपने आदर्शो के हिसाब के साथ चलता है…. “



ज़रूरते पूरी हो सकती है लालच नही

6. ये सब सोच-पद कर लगता है कितनी निराशा है,हम आप सभी जानते है क़ी सही क्या है ,ग़लत क्या है, पढ़ कर ख़ुश होते है ,पर उसे अपने व्यहवार मे नही उतारते…… एक मनुष्या सुबह उठता है,उसके पास काम करने के कई विकल्प मौजूद होते है,फिर जब वह ये फ़ैसला करता है क़ी उसे क्या करना है ओर वह उन कार्यो को प्राथमिकता देता है,जिन्हे वह समझता है ,यही मुल्या है. मुल्यो को जब हम अपने कार्यो मे शामिल करते है तो एह हमारे चरित्र का रूप लेता है. चरित्र क्या है ...मैं तो सामान्य जीवन मे घटी हर घटना को किसी व्यक्ति के चरित्र से जोड़ कर देखता हूँ ,कही किसी जाम मे फंसी हुई गाडियों की line तोड़कर आगे जाने वाला व्यक्ति, मुश्किल वक़्त मे किसी अनजान इन्सान के काम न आने वाला इन्सान ,अपनी बेटी की शादी उसकी इच्छा के विपरीत अपने आप तय करने वाला इन्सान ...कौन से पैमाने पर मापा जायेगा?
जिंदगी मे आने वाली अधिकतर मुश्किलो का कारण “काम तुरंत करने” के प्रति हमारा आलास या फिर प्रलोभनो को “ना” नही कह पाना होता है.
मेरे पिता ने भी कई बार कहा हैउस व्यक्ति को इमानदर कहना ठीक नही जिसने बेईमानी क़ी कभी परीक्षा ना दी हो?यानी प्रलोभन के वक़्त आपमे हिम्मत थी ना कहने क़ी? बुढ़िमानी ज्ञान का सही उपयोग है. आपका नही जानता पर मेरे पेशे मे कई बार होता है क़ी किसी ग़रीब से पैसे लेते वक़्त मन कही कचोटता है,पैसे वाले पैसा नही देना चाहते ओर रसूख वाले लोग सिफ़ारिश पर पैसा बचाना चाहते है. कई बार कोई गरीब इस तकलीफ मे होता है की जानता हूँ सस्ता antibiotic असर नही करेगा ..बीमारी अमीरी गरीबी का भेदभाव नही मानती ......हम सिक्के जोड़ने मे दिन ख़र्च करते जा रहे है , आपने कभी अपनी ज़िंदगी का हिसाब किया है?कितने दिन आपने उस तरह से जिये है जिस तरह से आप जीना चाहता है?अपने आस-पास देखिए कितने लोग आपने ऐसे जुटाए है जो आप से सच मे प्यार करते है?कितने लोगो ने आपको अब तक दुआ दी है?कितने लोग आपके नही होने पर आपकी कमी महसूस करेगे?
तो क्या सब ओर निराशा ही है ....
ऐसे मे आज सुबह हिंदुस्तान अख़बार के पहले पन्ने पर ये पढ़ा

एक दिहाडी मजदूर की लाडली तो दूजी रंगाई-पुताई करने वाले कामगार की बेटी . दोनों के इरादे बिल्कुल साफ की एक दिन डॉ बनके रहना है ,फहमिना C P MT मे सलेक्ट तो ७ बरस की प्रीति रोजाना कीचड भरा नाला पर का पढने जा रही है ,मेधा के साथ जज्बा अगर मिल जाये तो फ़िर ऐसे ही "strret स्टार" जन्मते है ,फ़िर मुफलिसी राग बेमानी हो जाता है ओर सुविधायों की बारात बेमतलब ,पर पता नही क्यों सुविधायों का ताना बना बुनने वाले को ऐसी मेधायो के चौबारे नही दिखते ?वो सुविधाये चाहे सरकारी टेंट से निकली हो या किसी खाते -पीते समाज की अंटी से ,फ़िर भी लाखनऊ की फहमिना ओर प्रीति के मूक ज़ज्बे इन पत्थर दिलो से सवाल नही करते .......सलाम मेरे देश के बच्चो ......

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