जिंदगी जब अपने नाखूनों से
रूह के जिस्म पर
कई खराशे छोडती है
ऑर वक़्त किसी सुद्खोर की माफिक
हर शाम नुक्कड़ पर खडा
दिन के हर लम्हे का हिसाब मांगता है .........
लफ्जो के ढेर पर बैठा
एक शायर
आहिस्ता आहिस्ता
अपनी हथेलियों मे छिपे
कई तसव्वुर
छोड़ता है
कितनी रूहे मुस्करा उठती है
सोचता हूँ कभी मैं भी जाकर
उन हथेलियों को छू आऊँ
ऑर
उस "लम्स" को सूरज पर रख आऊँ
लम्स =स्पर्श
