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2010-05-25

खुरदुरी बायोग्राफी के दो खुरदुरे एबस्ट्रेक्ट.......

नोस्टेल्जिया भी  विस्थापित होता  है ....
वो हमसे दो साल बड़ा  था   ..जब  हम दसवी में थे   वो  ग्यारहवी  में ....मेथ्स की .ट्रिगनोमेट्री  अबूझ पहेली थी ..कुछ कुछ डरावनी भी ...उसने डर निकाला ..." बोर्ड के  मेथ्स  के एक्जाम  में ....हौसला देने सुबह   वो  अपनी साइकिल  से मेरे सेंटर तक मेरे साथ  आया था......उसके पिता  ने रायपुर में रहते रहते दूसरी शादी कर ली  थी..अचानक उसकी दुनिया  बढ़ी  हो गयी थी ....वो   भी....जब हम शाम को  पार्क में क्रिकेट  खेल रहे होते ..वो   ट्यूशन  पढ़ा रहा होता ......सन्डे के दिन .कुछ देर खेलने आता तो उसकी मां कोने से आवाज देती  "बब्बू ".....बड़ी चुभती  थी वो आवाज....दो साल बाद  ....पहले ही  अटेम्प्ट   में  इंजीयरिंग में उसका एडमिशन हुआ ....दो बहनों के  रहने का  डर मां पर हावी हो गया .ओर बब्बू ट्यूशन  में ऐसा  उलझा के फिर कभी निकल न सका ...... गाडी मोड़ते हुए देखता हूँ........ उसके घर के बाहर अब भी साइकिलो की लम्बी कतारे है…... वो अब  हमसे कई साल बड़ा है .....

समय की नोक पर टिके  आदमी..... तुम  किसी पहले का ही मेटा मोरफोसिस हो

हने वाले कहते है ....."ओरिजनल" मिडिल क्लास  नहीं  रहा ..इसकी भी कई क्लास हो गयी है  ..हर दो चार साल बाद    . नए एडिशन भी  निकल रहे  है  .... मध्यमवर्गीय ईगो" वो भी .ओरिजनल नहीं  रहा.... ...अब वाले में दिखावे ओर  छिछोरेपन की परसेंटेज़ ज्यादा  है "....... फिमेल वाइग्रा भी अब लौंच हो गयी है ....   भगवान्  अब स्लो मोशन में नहीं चलता है ...कलयुग .ओर सतयुग जैसे सौ सालो का कांसेप्ट चला गया है ..हर दस साल में भगवान्  कदम बढ़ा देता है ..  ओर दुनिया भी  बदल  जाती है ......जेनरेशन गेप अब भाइयो के बीच बैठ के हँसता है   ... ... प्रायश्चित करने के लिए  मंदिर मस्जिद के दरवाजे पे जाने के बजाय ..कंप्यूटर पे "एपोलोज़ी डोट कोम" पे अपने गुनाह लिखकर आराम से  मेगी नूडल्स खा कर सोया जा सकता है ....सन्डे के दिन राजमा छोंक कर चूल्हे पर चढ़ा कर नीता दीदी अख़बार फैलाकर "वधू चाहिए" वाले कोलम को ढूंढ कर उस पर गोल घेरा के निशान नहीं  लगाती है ......ना छोटी वाली  उनके सर पे से सफ़ेद बाल  चुन चुन के  निकालती है ...शादी डोट कोम पे दोनों बहने शीट -पिट करती है. मल्होत्राइन का. छोटा पिंकू .......स्कूल जाने के लिए .ए.सी वेन से जाता है उसके स्कूल के सारे कमरे  ए. सी  है ..... ..... . पिंकू को बड़े होकर "इन्डियन -आइडोल”  बनना  है....…….बारहवी में ग्रेस मार्क लेकर पास हुई मल्होत्राइन की    बड़ी बेटी.".बेबी ".एम् टी.वी के रोडिस में   अंग्रेजी -हिंदी की कई गलिया देकर   डी. जे बन लाखो रुपये महीना  कमाने लगी  है ..      अभी अभी एक टी वी कमर्शियल   भी मिला है .   . उसकी क्लास के टोपर.. .बिट्टू की आँखों पर बड़े बड़े मोटे चश्मे है.  रोज  पोस्ट ऑफिस में कई  कम्पीटीशन फ़ार्म  भरके रजिस्ट्री कराता है…....शर्माइन  को लगता है   ..... बिट्टू की बुरी सोहबत से उनका लड़का "डल' होने लगा है ...अब ज़माना स्मार्ट लोगो का है …." …..अंग्रेजी बोलना स्मार्टनेस की अनिवार्य शर्त है....
अपना बकाया लेने आयी. माया को पैसे देते वक़्त..मल्होत्राइन उसका "करेक्टर सर्टिफिकेट " पकड़ा रही है.....उनीस साल की माया ..हाथ में एक साल .ओर पेट  में  ४ महीने के बच्चे को लिए सुबह सात बजे काम पे आ जाती थी  .... जिस रोज  चेहरा सूजा होता है ..उस दिन दूर से नमस्ते नहीं करती थी ...नजर झुका कर गुजरती थी ... . ऐसी हिन्दुतानी औरते शानदार  पंचिंग बेग है .....आफ्टर इफेक्ट्स ऑफ़ शराब ...........मल्होत्राइन  रोज उसे झिड़कती थी  ...बच्चे को लाने पे.... .कहाँ छोड़े ?बाप को फेफड़ो का  टी.बी खा गया .....मां पिछले बरस गुजर गयी ...उससे ढाई साल छोटी खुद दूसरे घरो में  जाती है  ... बिना कोम्पप्लेन" पिये ही उसका बेटा  बड़ा हो रहा है....सुना है अपनी कोख किराये पे देने के लिए गुजरात के अनंद  में शिफ्ट हो रही  है ........तीन लाख रुपये  मिलेगे ...ओर गर्भवस्था तक मेंटेनेस के लिए कुछ हज़ार रुपये ..
कलजुग है .कलजुग.....मल्होत्राइन की सास कानो पे  हाथ रखके  युग बदलने की कन्फर्मेशन दे रही है ..... बेबी अपने मोबाइल से  कोई नॉन वेज़ जोक फोरवर्ड कर रही है  सामने वाले घर में  बिट्टू शर्मा जी  से  किसी फॉर्म पर साइन करवा रहा है . बराबर में धोबी भी खड़ा है ....फॉर्म साइन करते करते धोबी  के प्रेस के एक रुपये से डेड रुपये  बढाने  पर शर्मा जी उसे डांट रहे है …..सरकारी  मुलाजिम है शर्मा जी.... .गजेटेड ऑफिसर…. सरकार अब भी मानती है के केवल सरकारी अफसर सच बोलते है..
.टूटे हत्थे वाली  आराम कुर्सी पे बैठे त्यागी अंकल बाहर वाले  आँगन में   अपने पोते  से अखबार सुन रहे  है ...दोनों पोतो को डयूटिया अलग अलग दिन है ....काले पानी का असर दोनों आँखों पर है ... बारीक अक्षर धुंधले दिखते है ... इस बदलती दुनिया में उनके पोते उम्मीद के सी ऍफ़ एल   बल्ब जलाते है...

2010-04-06

दिल ख्वाहिशो का कारखाना है

कहते है दोनों जुड़वाँ है ..अक्सर साथ चलती है .....मसरूफियत की आमद अगर है तो बेख्याली का आना भी तय है ...कहने वाले बेख्याली को "छोटी "कहती है .शायद इसलिए थोडा बागी  मिजाज है  .कभी कभी बेवजह ..बिना इत्तिला किये दरवाजे पर सुबह से दरवाजे पर आ बैठती है.....कुछ ख्याल कभी नज़र बचाकर  कुछ देर गुफ्तगू  करते भी है ...ठहरते नहीं...पर ...दिल ख्वाहिशो  का कारखाना है ..फ़िल्टर करके ...वक़्त के मुताबिक  उनका तर्जुमा करता है  ....ओर आसमान  फिर "डेस्टिनी " का बोर्ड ऊपर उठा देता है ....



मसलसल भागती ज़िंदगी मे....
अहसान -फ़रामोश सा दिन
तजुर्बो को जब,
शाम की ठंडी हथेली पर रखता है......
ज़ेहन की जेब से,
कुछ तसव्वुर फ़र्श पर बिछाता हूँ
फ़ुरसत की चादर खींचकर...
उसके तले पैर फैलाता हूँ
एक नज़्म गिरेबा पकड़ के मेरा....
पूछती है मुझसे
"बता तो तू कहाँ था?


किसी ने नज़्म मांगी थी ....हालात  मुताल्लिक नहीं थे ...पुरानी गठरी खोली ओर "रिफ्रेश "का बटन दबा दिया ....काश ऊपर वाला एक बार उस पहिये (कहते है दुनिया गोल है ) का  बटन  वाला  हिस्सा  मेरे  हाथ  की "रीच" में  करे.....ओर उसका रिफ्रेश बटन ......उफ्फ......दिल ख्वाहिशो  का कारखाना है






चूँकि त्रिवेणी की आदत इस सफ्हे को भी है.....ओर इन बदमाश  खयालो से इंतकाम भी लेना था



वे जो सड़क दर सड़क आवारा फिरते थे
कल सफ्हे पे मिले तो शक्ल   जुदा थी 

उर्दू पहनकर मुये  लफंगे भी  शरीफजादे हो  गये  


2010-02-05

पिछली तारीख के आइनों का डीप फ्रीजर

चिरकुट" दरअसल हमारे देश की एक नेशनल गाली का शिष्ट अनुवाद है ...हम इसके अविष्कारक को रोज मन ही मन सैल्यूट ठोक देते है ..कितना आसान है न गला फाड़ कर चिल्लाकर कहना ..."अबे चिरकुट"....कोई बुरा मानने से पहले पडोसी से पूछेगा "चिरकुट माने "?
कल रात हम उंघियाये से  हम वैसे ही  सिल्वेस्टर इस्टालिन  की एक मूवी देख रहे थे ..."डिमोलीशन मेन"  कई सालो बाद फ्रीज करके रखा पोलिस वाला ओपन किया  जाता है ..उस नए युग में  .जहां गाली देना अपराध है ......एक ठो गाली. पे फ़ौरन मशीन हरकत में आ जाती है .ओर आप पे जुर्माने की पर्ची कट जाती है ....सोचता हूं  गर हमारे यू. पी में वो मशीन आ जाये .तो ओवर लोड  से कुछ ही घंटे में क्रेश हो जायेगी...जहां दिन की शुरुआत ही...भेन ###...से होती है .....अगर पेशेंस  का  भी  कोई  नोबेल  प्राइज़  होता  तो यक़ीनन   हिन्दुस्तान के बस  ड्राईवरो  के पास कई ट्रोफी  जमा  होती ... ..कोई भी कही से निकल जाता है ...
एक ओर हाई -वे होता है ...दुनिया दारी का .....जिस  पे  चलने   के  लिए वैसे भी  जमीर को   स्टेपनी के टायर सा लटका  कर चलना पड़ता   है ..खुदा  भी  कोई  इंडिकेटर नहीं   देता ......कम ही लोग होते है ...जो अपनी  गड्डी  के पीछे लिखते  है "आपां तो ऐसे ही चलेगे "....
.खैर ......यूँ भी  साला  आदमी इच्छायो का डिवाइस है ....एक अभी ख़त्म नहीं होती के दूसरी सर उठाने लगती है .....शुक्र है ..यादो  का हैंगओवर  हेडेक  नहीं  करता ....पर  जल्दी नहीं उतरता .... 
आज वही है...... मारी लोबी के  ठीक बीचों बीच मुस्कराती हुई  बड़ी मेहनत से पैंट की हुई एक रिंग बेल थी .... , जिस पर ये लिखा था.... ‘.
keep your finger here and say loudly “ding-dong”…
मैं  अब भी  अक्सर उसे  दबा देता हूँ…....

ससे पहले मुलाकात कब हुई थी याद नही ,दोस्ती कैसी हुई .....ये भी याद नही वो मुझसे ४ साल सीनियर थे  उसके मुताबिक हम मे दो चीजे कॉमन थी एक तो नॉर्थ इंडियन होना दूसरा एरियन  होना ,मैं मार्च के आखिरी हफ्ते की पैदाइश हूँ ओर वो अप्रिल के पहले हफ्ते की.... बाकी हम दोनों में ओर कई बड़े अंतर थे मसलन के iq मे ….वो १४४ का लेकर पैदा हुए थे ओर हम सामान्य …खैर हमारी दोस्ती हुई ओर हमने उनसे उधार मांग कर खूब अंग्रेजी नोवल पढे ओर अंग्रेजी की जुदा -जुदा किस्मों की गालिया सीखी ....जब कभी हमारा फोरेन की सिगरेट पीने का मन होता हम उनके उपरी मंजिल के  कमरे में जा धमकते ..वे न केवल हमें एक ठो विदेसी सिगरेट पिलाते बल्कि हमारी बेहूदा कविताएं भी बड़ी तसल्ली से सुनते .....कहते है वक़्त ने सबकी स्क्रिप्ट लिख रखी है....हम  खामखाँ ही इतराते फिरते  है ...एक ही होस्टल की एक ही कॉलेज की अपनी अपनी जुदा दुनिया  होती है ..फिर उसकी .जुदा गलिया..अपनी अपनी गलियों में रुकते -गिरते- भागते -दौड़ते कुछ साल गुजर गये..........


उन्होंने उन हालात ओर उन वक्तों मे “ओर्थोपेडिक “ मे पी. जी मे ज्वाइन लिया ......जब इस ब्रांच मे जाना इराक मे युद्ध पर जाने जैसा ही था ,काम का बोझ ,सीनियरों की मार ,मानसिक प्रताड़ना ......नींद की कमी ,ओर तमाम अनगिनत दूसरे कारण थे जिसके मद्देनजर बहुत से लोग बीच मे ही डिपार्टमेंट छोड़ भाग जाते थे या अगले साल किसी दूसरी ब्रांच मे एडमिशन लेते थे । हम सब को लगा की ये दुबला पतला लड़का दम तोड़ देगा या भाग जायेगा.....कुछ महीनो की खामोशी के बाद ... अब आधी रात को होस्टल का फोन बजता (तब हॉस्पिटल ओर होस्टल के दरमियाँ इंटर कनेक्टेड फोन हुआ करता था..........

फोन पर उनकी फुसफुसाती हुई आवाज होती “ ,बहुत भूख लगी है ..... इतनी रातो को सूरत शहर मे दो ही जगह कुछ खाने को मिल सकता था या तो शहर के 5 सितारा होटल मे या रेलवे स्टेशन मे ...... तो  औकात के मुताबिक ५ किलोमीटर दूर रेलवे स्टेशन चुना जाता ..मेनू में सिर्फ अंडे की वेरायटी होती ......कोई भी दो जने कुछ लेकर आते , हॉस्पिटल की चोथी मंजिल पे सुनसान से गलियारे मे या किसी कोने मे वो पाव ओर ओम्लेट ठूस ठूस के खाते ओर गोल्ड -फ्लेक के इतने लंबे कश लेकर पीते.....जैसे फांसी पे चढ़े किसी कैदी को आखिरी सिगरेट दी जा राही हो....... तब उनके बदन से एक अजीब सी गंध आती.....यूँ भी हर वार्ड की अपनी एक गंध होती है उसके जिस्म मे भी वही होती ,...... ,उस दौरान भी उसका सेंस ऑफ़ ह्यूमर जिंदा रहता । “कोई शेर है इस मौके पे आर्या ? उन्होंने मुझे कभी अनुराग नही कहा आज भी नही बुलाते ..... फ़िर वे अंधेरे मे तेजी से घूम हो जाते.................


होस्टल के कमरों की चभिया या तो बाथरूम की दीवारों  पे ओंधी पड़ी मिलती है ..  .या खास कोनो  मे उंघती ...... दोस्तो को ठियो की ख़बर रहती.है .. ......कई बार जब हम कोई लेट मूवी देखकर लौटते तो फर्श पे एक गंधाई शर्ट मुंह चिडाती मिलती ...ओर अलमारी  से  कोई खाली हेंगर बिस्तर पर ...  ....ये वर्मा जी की आमद का साइन होता.......ओर ..मुश्किलों के ऐसे कई दौर  पी जी के जो  से गुजरने के बाद ....वे सीनियर हुए ...... फ़िर पास भी...हो गये ...... ओर नजदीक के कम आबादी  वाले उस शहर दमन के एक  हॉस्पिटल से जुड़ गये  … "ड्राई  -स्टेट" में रहने  के कारण   हम दोस्तों ने   उसे   "वेट सिटी "का  तक्खलुस  भी  दिया था ..... दिलजले ओर प्यार  में टूटे  आशिक वहां के दरिया में अक्सर अपना गम उड़ेल आते ..अलबत्ता गम में  अपनी अपनी केपिसिटी के मुताबिक किसी ओर चीज को भी मिक्स करते ......खैर

क़्त ने  फिर  पहिया  घुमाया .... ओर हमने पी .जी ज्वाइन की , इधर पिताश्री रोज हमे कोई नया रिश्ता बताते ओर हम रोज उसमे कोई नुक्स निकालकर मना कर देते ,  जब हम में ओर पिताश्री मे  फोनिया कोल्ड- वार शुरू होकर लम्बी खिंची तो एज यूजवल माताश्री ने  संधि दूत के  अपने रोल  में एंट्री ली ... .....ओर हमने उस शान्ति -प्रक्रिया के तहत एक लड़की से मिलने की हामी भर दी.....पता लगा लड़की दमन में है....... …. …..हमें लड़की से ज्यादा वर्मा जी से मिलने की उत्सुकता थी.....वर्मा जी होटल की उस औपचारिक मुलाकात में हमारे साथ रहे .....  ...  
वापसी में हम दोनों डगमगाते हुए उनकी फटफटिया पे उनके नए नए खरीदे फ्लेट पे पहुंचे....चूंकि भाभी श्री अपनी पी. जी के सिलसिले मे कही ओर  थी , तो वर्मा जी भी" बेचुलराई- जीवन" का आनंद ले रहे थे ..  ,उन्होंने महँगी वाइन खोली ....फर्श पे गद्दा डाला..ओर होस्टल की पुरानी रवायत के मुताबिक .जगजीत सिंह  भी महफ़िल में शरीक हुए ....कुछ पुरानी ओर नयी यादो के कोकटेल बना....गोल्ड फ्लेक  की फेक्ट्री से निकले  धुंए फेफड़ो में भीतर  गये ...  ...फ़िर अचानक हमारे वर्मा जी उठे ओर बोले “चल “.....वे आगे आगे हम उनके पीछे -पीछे .....वे दूसरे कमरे के दरवाजे पे खड़े हुए..एक बड़ा ताला हमारे ओर  कमरे के दरमियां था ...कुछ देर ताले से जूझने के बाद  दरवाजा खुला  ..पूरा कमरा खाली ..  बीचों-बीच एक काले रंग का बड़ा सा सूटकेस.......उन्होंने उसे खोला ..वही हरे कागज जो  दुनिया चलाते है .....
"आर्या जितने चाहिए ले ले "मैं हंस पड़ा था ,...वर्मा जी सेंटिया गये थे .....
.बकोल उनके  "सेंटियाना" एरियन  के   जींस  में  होता  है ...ओर उसके जन्म प्रमाण पत्र में बोल्ड अक्षरों से लिखा हुआ ...... 
ब्रेकेट  में .कहूं तो  .....हम दोनों   एरियन  है  
वो किसी फ़िल्मी शोट के माफिक था ....पर बिलकुल सच्चा ....खालिस सच्चा .....
वर्मा जी मेहनती थे ,अपनी काबिलयत के कारण जल्दी ही ख्याति पा गए ओर अच्छी खासी प्रक्टिस भी अर्जित कर ली...पर जैसा की अक्सर होता है
यरपोर्ट से फोन करना उनकी फितरत है ....खास तौर से तब जब वे देश छोड़कर परदेस जा रहे होते है ..
एक  दिन  मोबाइल बज उठा
“यार बाहर जा रहा हूँ
“क्यों ?इतनी अच्छी प्रक्टिस छोड़ कर ?
बस कुछ ओर करना  है
कुछ लोग  लोग मूडी होते है ओर बैचेन भी....   ."आपां तो ऐसे ही चलेगे " .वाले .ओर वर्मा जी उड़ लिए ...“,........कुछ साल वहां बिताकर अहमदाबाद के अपोलो मे ज्वाइन किया ही था की ...
फिर एक रोज उनका फोन आया “जा रहा हूँ”
कहाँ पूछना.. सवाल को पूरा करने की रस्म भर  होता है ....
ओर वर्मा जी ब्रिटेन उड़ लिए .अब सुना है  ..... परमानेंटली वही बसने जा रहे है ...
 
न हाल -चाल पूछा ना सलाम किया
जाने क्या बदल गया मेरी सूरत मे ......


पिछली तारीख के आइने बेखबर हो गये

2010-01-02

एबस्ट्रेक्ट सा कुछ !!!!

धूप पिछले दो दिनों से छुट्टी पे है ..परिंदे भी....सर्दियों का आफती धुंया नीचे उतर कर उंघती स्ट्रीट लाइटों  को दिन की शिफ्टों में काम करा रहा है   . ...  ... हर आधे घंटे  में अब भी कोई एस. एम् एस नए साल की बाबत इन-बॉक्स में दाखिल होता है ... मन करता है ..कोने में  खड़े उस आदमी से बस  दो कश मांग लूं....ऐसे मौसम में पोशीदा हुई कई छोटी छोटी ख्वाहिशो की  तलब बार बार  उठती है . .. .कुछ ख्याल किसी सफ्हे की तन्हाई को डिस्टर्ब करते है.... ..
(१)"अल्ट्रेशन "
उधेड़ के पुराने किस्सों को
रंग बिरंगे धागों से
मन माफिक जगह रख देता है .....
बड़ा हुनर है उसके हाथ में !!

(२)"इन्वर्सली पर्पोशनल"
मै उम्र का पैमाना
हाथ में लिए
जब भी
मापने बैठा हूँ
"आदमियत"....
हर बार पहले से छोटी मिली  है!!


(३)"औरत

पल्टो रवायतो के कुछ ओर सफ्हे
गिरायो इक ओर रूह
दफ़न कर दो एक ओर लाश
तहज़ीब के लबादे मे.........
ख़ामोश रहकर भी किस कदर डराती है.


ओर अब मोहब्बत !!
ग्यारह बजने में  दस मिनट थे

ट्रेन ने "व्हिसल" दी थी तब
प्लेटफोर्म नंबर एक पर
भरी भीड़ में
मेरे नजदीक आकर 
कानो पे  तुमने
"आई मिस यू" रखा  था ......
ग्यारह बजने में दस मिनट है
तुम्हे हिचकी  आयी होगी !!


टुकड़ा- ए -त्रिवेणी


घर लौटने से पहले उस रात जलाये थे  कागज के कुछ टुकड़े
वो डायरी का पन्ना भी लिपस्टिक लगाकर अपने होठ दिए थे जिसमे  तुमने .....

उस रात  मेरी  छत  ने  सुर्ख  लाल  रंग  से  होली  खेली  थी











2009-08-11

निगोडी दुनिया में " वंडरफुल लाइफ "



सुबह की नींद ..में दो बार बजे अलार्म के बाद जब कोई आवाज देकर आपको उठाता है ओर आप तकिये से लिपट कर कहते है "बस पॉँच मिनट ओर " हाय वो पांच मिनट .....कितने जालिम होते है .....के उन पांच मिनटों के बाद निगोडी दुनिया में फिर एंट्री होनी ही है .

एक
बारिश की भीगी दोपहरे ....बॉस ऑफिस में नहीं है.... सेक्सी जूली आपसे एक अदद समोसे की फरमाइश करती है ओर आप जूली को भीगी बारिश में अपनी बाइक पे बिठाकर दयाराम हलवाई के यहाँ समोसे खिलाने ले जाते है ....बीच में तीन स्पीड ब्रेकर है जहाँ जूली "आउच "वाला साउंड इफेक्ट देती है ...
दो
आसमान में बादल गरजते है ... जाहिर है एक बिजली भी होगी .....पीछे से बेक ग्रायुंड म्यूजिक ..ओर भगवान् प्रकट होते है "वत्स तुम्हे पांच दिन का अवकाश दिया जाता है वेतन सहित ये लो होनुलुलू के टिकट...

साले मन में रोज कितने लड्डू फूटते है!!!!!!!!

अमूमन हर इंसान के दस बीस दोस्त होते है ओर एक दो दुश्मन. दुश्मनी हमने किसी से कभी रखी नही अलबत्ता दोस्त हमारे दस –बीस से कही ज़्यादा है. .जिन्होंने हमें फ्लेश्बेक में कई सीन दे रखे है....
जैसे हमारे दूसरे रूम पार्ट्नर जिन्हें एक मोटे से तकिये से लिपट कर सोने की आदत थी …अचानक .....रोज रात 2 बजे उठने लगे …एक जुमले के साथ … भूख लगी है .तो किबला हम दोनों . रेलवे स्टेशन की लारी पे जाकर अंडे पाँव खाते …तकरीबन साढे तीन बजे वापस लौटते ...शुक्र है के चालीस दिनों के बाद वो रहस्मयी भूख अंडे –पाँव के नियमित चढावे से ही शांत हो गयी . अन्यथा आधी रात के इस नियमित विचरण से किस्म -किस्म की अफवाहे फैलने का भय था ,,
मसलन ... हमारे एक ओर अज़ीज़ दोस्त है… .ये अमिताभ बच्चन साहब के बहुत बड़े मुरीद है,इतने बड़े की जिस पिक्चर मे अमिताभ बच्चन साहब मरते है उसका अंत ये नही देखते है…तो ये महाशय हमे दिन भर अग्निपथ के डाइलोग सुनाते उसी अंदाज में हाथ को हिला कर “हें हे अपुन दीनानाथ चोहान .गाँव मांडवा ….? अपने घर ले-जाकर इन्होने इतनी बार अग्निपथ दिखाई है की पूछिए मत… फिर हमसे पूछते "अब क्या कहते हो”? “मिथुन की ऐक्टिंग लाज़वाब है मै उनसे कहता …….आज़ वो अमेरिका मे है, हमें पूरा यक़ीन है आधे से ज़्यादा अमेरिकियों को उन्होने अपने घर बुलाकर अमिताभ की पिक्चर दिखाई होंगी.
एक तीसरे महाशाया थे ,जो हमारी लॉबी मे रहते थे, पूरे 5 साल अंडर-ग्रॅजुयेट के दिनों मे इन्होने कभी साबुन नही ख़रीदा , पूरी लॉबी के साबुनों से नहाते रहे…..पर साबुन का कौन सा ब्रांड ज़्यादा बेहतर है इनसे बेहतर कभी कोई नही बता पायेगा ....….
मसलन ......हमारे बिल्कुल बराबर के रूम के एक महाशय, जो दिन में अक्सर हमारे दरवाजे के पीछे चिपकी ग्लेडरेगस की बालाओं को छि: छि: कहते पर हर रात को सोने से पहले हाथ में पानी की बोटेल लिए हुए बिना कोई अब्सेंट लगाए चार साल तक निहारने आते रहे ...कई बार तो दरवाजा खटखटा कर निहार कर जाते ....
मसलन के .....वे. जो ...अंग्रेजी में ऐसे उधार मांगते की आप सेंटिया जाते ...अक्सर रात में हमारी बाइक के पेट्रोल टेंक के पाइप से नीचे एक बोतल लगाये मिलते ..हमें देख बिना विचलित हुए शांत निर्विवार किसी योगी की भाँती बोलते " आई एम् टेकिंग जस्ट फ्यू ड्राप मेन"..ओर हम "या या श्युर 'कहते हुए बूंदों का बोतलों में जाना देखते .....
यूँ भी होस्टल में जब किसी चीज़ की तारीफ करनी होती तो ..कुछ यूँ होती है क्या सेक्सी शर्ट है ...या .क्या सेक्सी खाना है वहां का ...सभ्य समाज में आने के बाद आपको अपने तौर तरीके यूँ भी बदलने पड़ते है ....…ओर जब आपको लगता है की वो गोल्डन एरा ख़त्म हो गया ... इत्तेफकान भगवान् आपको नए सीन दे दे देता है ....

वे हमारे दोस्त तीस की उम्र के बाद बने ,हम पेशा है हम उम्र भी ..इत्ते बड़े पांच सितारा होटलों में अकेले नींद नहीं आती यूँ भी एक घंटा खामोशी से कागज पेन लेकर लेक्चर सुनने की आदत अब रही नहीं...ओर कांफ्रेंस के दिन भर लेक्चर आपको वैसे ही इतना खौफजदा कर देते है .. इसलिए अक्सर हम उन्ही के संग एक कमरे में ठहरते है ...... ...कमरे में घुसते ही ये साहब चैनल फटाफट बदलते है ओर बी ग्रेड या सी ग्रेड चुन चुन के फिल्म लगाते है ..मजे से देखते है ...जित्नेंदर की सफ़ेद जूतों वाली फिल्मे ......मिथुन की फिल्मे ....रामसे ब्रदर की होरर फिल्मे .... गुलशन कुमार के छोटे किशन कुमार की फिल्मे ....जोगिन्दर उनके फेवरेट विलेन है ...जब वे हीरो को धमकाते है .... ये ठहाके लगा कर हंसते है . मुझे पूरा यकीन है .इन्होने "देशद्रोही "फिल्म की सी .डी माँगा कर देखी होगी ...
बीच बीच में मुड़कर कहते है साला .हिन्दुस्तान का रियल सिनेमा यही है.....
१४ अगस्त की दोपहर के बाद अगले तीन दिन हैदराबाद इन्ही के संग कटेगे .
स्वाइन फ्लू से ज्यादा खतरा इस बात का है के की वे वहां मौज में आकर ये न कहे .सुन बे "शेडो" देखने चले क्या ?

आज की "त्रिवेणी "

कल तप रही थी पेशानी उसकी, बुख़ार था शायद
सुबह से ही भिगो रहे है मुये बादल उसे......

"नुमोनिया" हो जायेगा इस" दिन" को देखना ,इक रोज

ऐसे ही हमारे एक नेटिया दोस्त है कुश .....इत्तिफकान अभी तक हम रूबरू नहीं मिले है ...पर हमारे फोन के बिल में इनका भारी योगदान रहता है ... वे ठंडी सांस भर के अपनी एक छोटी सी ख्वाहिश बताते है .... की एक ओर ब्लॉग बनाना चाहता हूँ जिसका नाम कुछ यू हो.....के …" आप .मरने से पहले ये फिल्मे जरूर देखे "…उनकी ख्वाहिशे ओर भी है पर किन्ही अपरिहार्य कारणों से उन्हें यहाँ सार्वजनिक नहीं कर सकते... वो क्या कहते है ...ब्रीच ऑफ़ कोन्फ़ि डेंस हो जायेगा जी ...
खैर उन्होंने अगर ये ब्लॉग बनाया तो एक फिल्म हम भी उसमे जोड़ेगे जी....ओर आपसे भी यही कहेगे .मरने से पहले इसे जरूर देख ले ....." इट्स ए वंडरफुल लाइफ"

2009-04-22

"उस जानिब शायद कोई खुदा निकले"


दोपहरे बागी है ,आग उगलती है ..खिड़की पर खडा ए. सी हर पांच मिनट बाद जोर से आवाज करके हांफता है ...इंकलाबी सूरज !!!! .... छोटू रिटर्न गिफ्ट में मिली "फ्लोरिसेंट गेलेक्सी "दीवार पर चिपका रहा है...साथ में ढेरो सवाल.....खुदा की जगह की बाबत भी...अखबार में उलझा मै ..बीच की किसी जगह पे अंगुली रखता हूँ .....
शाम सूरज को जैसे जबरदस्ती उसे उसकी खोली में धकेलती है ....."सारे इल्म अब इस कम्पूटर में कैद है ."...एक मरीज बाप शाम को अपने छोटे बेटे को मेरे लेप टॉप की डेफिनेशन देता है ... बचपन कितनी खूबसूरत अता है ....उस उम्र में बाप से बढ़कर दुनिया की कोई शै नहीं होती ......
....लौटते वक़्त देर हो गयी है ....रात नींद में है ....छोटू भी..दीवार पर उसकी गेलेक्सी चमक रही है ...दो एस्ट्रोनोट, एक परी, पृथ्वी मार्स ,ढेर सारे तारे .... कौन है जो "अर्थ " को "पुश " करके दिन को रात में बदलता है .....दीवार पर निगाह दौडाता हूँ ......कहाँ होगा खुदा ? जूपिटर की मरम्मत में उलझा या किसी 'ब्लेक -होल "में फंसा हुआ ... ......कितने सालो से ....कितना तन्हा है ना खुदा ?


सूत के धागों में बाँध के ख्वाहिशे
कई बार फेंकी है फलक पे


उस जानिब शायद कोई खुदा निकले

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