जिंदगी की गलिया लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
जिंदगी की गलिया लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

2011-05-18

खाली पड़ी जगहों में गर थोडा खुदा फेंक दूं. ....

मोहल्ला कथाओ  के संस्करणों में भारद्वाज जैसे लोग नायक नहीं होते....सह नायक भी नहीं..टोटलीटी में कहे तो दुनिया के  एटलस में मनोज दिखता नहीं....न जैकी .. ...तो बात उन दिनों की है... जब सूरज बाबू  ओर धरती के  दरमियाँ ग्रीन हाउस इफेक्टवाला छेद इतना बड़ा नहीं था ...सो दोपहरे इत्ती चुभती नहीं थी.....
 भारद्वाज की आवाजे तब  तक लगती  जब तक आप अपना चेहरा बतोर "प्रजेंट सर "की मुद्रा में उसे दिखा न दे .."जूते पहनकर फ़ौरन आ.."..हाथ में बैट थामे वो सफ़ेद ड्रेस पहने इसरार मिक्स आदेश देता  …भारद्वाज हमारी टीम का केप्टिन था ... उन दिनों दिन का सबसे पंसदीदा हिस्सा शाम  थी.. मैंने घडी देखी... वक़्त से पंद्रह मिनट पहले ... आज  आपातकालीन मीटिंग  . थी.. कोने पे सूबेदार साहब का घर  था  ...टीम  ने कई बार तमन्ना की थी के घरो को व्हील पर होना चाहिए ..ताकि उनकी पोजीशनो को मुख्तलिफ जगहों पे सेट किया जा सके ...सूबेदार साहब बड़े फिक्रमंद आदमी थे....हमेशा फ़िक्र में रहते... .... बैचेनियो ओर तल्खियो  का कोकटेल ...अखबार में खबरे पढ़ देश के हाल पर मोहल्ले के कोनो में फ़िक्र  करते  पर गली के  कुत्तो ओर भिखारियों को गरियाते . मोहल्ले के बाहर का कोई आदमी पार्क के पास नज़र आ जाए तो उसे पकड़ कर इन्टेरोगेशन कर डालते ..कहते है वे रात -बेरात अपने घर का ताला भी कई दफा चेक करके सोते थे ...क्रिकेट से उन्हें  जितनी  खुंदक थी..उससे दुगुनी   बौल से .... . वहां गयी बौल का चेहरा कभी दोबारा देखने को नसीब नहीं होता था  गोया लेग साइड पर शोट मारना जुर्म हो गया....हालत ये के लोग लेग साइड पर दबाकर खेलने लगे पर ये आदते मेच में नुक्सान देने लगी कोल सूबेदार साहब  क्रिकेट   "देश को आलसी बनाने वाले खेल" था  ...देश की सारी प्रगति  योजनाये इसी की वज़ह से टेबलों में रुकी पड़ी थी.. ऑफिसों का सन्दर्भ इतने जोर से  देते  जैसे नॉन क्रिकेट दिनों में सरकारी बाबू  फाइलों को राजधानी एक्सप्रेस की तरह निबटाते है .... सूबेदार साहब का बढ़ता कलेक्शन  टीम की भविष्य  की योजनाओं जिसमे विकेट कीपिंग ग्लोव्स के अलावा तीन जोड़ी पैड खरीदना भी था के लिए रूकावट बन रहा था ..
टी उन दिनों भारी आर्थिक ओर दूसरे कई संकटों”  से गुजर रही थी..बीस रुपये की लेदर की बौल  आती थी ..रोज का एक या दो रूपया जेब खर्ची को मिलता था  स्कूल के किनारे के कल्लू  हलवाई के समोसे और कचोरियो  से अलग  वफादारी  थी . . दूसरे कई संकट थे जो सबके निजी निजी जोड़कर सामूहिक हो जाते थे .जैसे ...पिताओं के अपने तर्क थे .मसलन  शाम ओर सुबह का वक़्त पढने के लिए सबसे मुफीद है .शाम का ये खेल बकोल उनके हमारे उज्जवल भविष्य के लिए  बड़े आसन्न  खतरे की तरह था...पिताओ  की इन दूरगामी दृष्टियों से .माँ रक्षा करती...  .आर्थिक रूप से भी  गुप चुप मदद माँ  से मिलती पर उस इमोशनल बैंक की भी कई शाखाए थी...आखिर हर घर में दो  तीन भाई बहन जो थे. . हमारी टीम के दोनों  मेन बोलर ट्वेल्थ  क्लास में आये थे ट्वेल्थ क्लास यानी बोर्ड के इक्जाम ..जिनकी  अपनी ख्याति थी ..अपने साइड इफेक्ट्स ..जाने कौन सी दीप्ति से  विधार्थी का चेहरा उज्जवलित रहता का हर आने जाने वाला उसे खेलते देख टोक देता .".रे लल्ला इस दफे तो बोर्ड का इक्जाम है तेरा !  मोहल्ले के बुजुर्ग इस कर्तव्य को निभाना अपनी नैतिक जिम्मेवारी समझते ...
 गले महीने एक टूर्नामेंट  होना था जिसके लिए हमें एक्स्ट्रा एफर्ट डालने थे .टीम का कप्तान भारद्वाज था .क्रिकेट को समर्पित..समर्पण भावना को कई पैमानों से मापा जाता था ..शाम को पांच बजे से घरो घरो में जाकर खिलाडियों को इकठ्ठा करना ..सोते हुए को उठाना .. पिताओं की तीखी नजरो को रोज़ बर्दाश्त करना .दो दो रुपये इकट्ठे करना .. चूँकि दो तीन खिलाडी मसलन त्यागी कभी आर्थिक भागदारी में हिस्सा नहीं लेते थे तो उनके हिस्से की भरपाई भी कप्तान को गाहे बगाहे करनी होती थी भारद्वाज  सारे क्राइटेरिया फुल फिल करता था...एक ओर गुण था ..केवल उसी के बस पूरी किट थी !....पिता ओर सख्त हो रहे थे ओर मांओ का इमोशनल बैंक भी अपने आखरी स्टोक में था ...भारद्वाज के क्रिकेट सेन्स के मुताबिक   जिस मैदान में टूर्नामेंट होना था उसकी लेग साइड की बाउंड्री  छोटी थी.... ओर हमारी टीम के इसी कमजोर पक्ष को मजबूत करने  के लिए हमें बेधड़क हो कर लेड साइड पर शोट खेलने की प्रेक्टिस करने थी...जीतने वाली टीम को ग्यारह सौ रुपये नकद के अलावा पूरी क्रिकेट किट मय नेट के मिलना तय था…… ग्यारह सौ रुपये के  मुताल्लिक  कई ख़्वाब भी टीम  मोटिवेशन की प्रक्रिया का हिस्सा थे.
 पातकालीन मीटिंग में तय हुआ के पिच को बदल के पार्क के दूसरे कोने में शिफ्ट कर दिया जाए ...वहां का खतरा दूसरा था ..चतुर्वेदी जी लेग साइड में पड़ते थे ...चतुर्वेदी जी हाइडिल से रिटायर इंजीयर थे...उस महकमे में  जहाँ उपरी कमाई को डेमोक्रेटिक राईट माना जाता है  ..चतुर्वेदी जी जिंदगी भर पक्के डेमोक्रेट रहे .... रिटायर मेंट के बाद वे अपनी इसी डेमोक्रेसी के चलते   बच्चो को सेटल कर अचानक सात्विक हो गये ... यूँ भी सात्विकता मोर्निंग वाक् की तरह  है ..आप कभी भी शुरुआत कर सकते  है . किसी रोज़ भी ब्रेक ले सकते है....वहां से बौल तो वापस मिल जाती पर वहां जाने वाले को अपने भविष्य की कई संभावनाओं का पता चलता... वे अपने आप को बड़ी गंभीरता  से  लेते  थे ...बाते करते वक़्त अटल बिहारी वाजपायी की तरह पॉज़ लेते..बड़ी क्लासिकल गरिमा से वे पढाई की महत्ता समझाते उनका स्लो मोशन दो तीन ओवरों का समय निकाल देता
वे एक एक संभावना पे टोर्च फेंकते....."सुन रहे हो बच्चे" उनका
विरासत में मिला फिकरा होता ..जिसका  परोक्ष अर्थ होता बात अभी बाकी है.......
 पातकालीन मीटिंग में तय हुआ चतुर्वेदी वाला जोखिम लिया जाए .... इसे ओर लोकतान्त्रिक बनाने के लिए दिनों के मुताबिक आदमी बांट दिए जाए  के फला दिन फलां आदमी का बौल उठाने का नंबर है ...बोर्ड के दोनों विधाथियो को अधिक जोखिम देखते  हुए इस प्रक्रिया से बाहर रखा जाये   ओर बोर्ड वालो की मम्मियो पर थोडा  इमोशनल टच ओर बिखेरा  जाये ताकि अगले एक महीने  तक वे  पिताओं से प्रोटेक्ट शील्ड का उनका   काम जारी  रहे.
"मै हफ्ते में तीन दिन जा सकता हूँ..."उसने कहा ... वो पार्क के उस कोने में बनी  बेंच के दूसरे  कोने में खड़ा  था .हर उम्र अपना एक यक्ष प्रशन लेकर आती है ओर पिछले किसी तजुर्बे को रिकंसट्रक्ट करती है  ..जिंदगी की नयी चाभी हाथ में थमा देती है .. उसकी एंट्री हमारी जिंदगी में भी ऑफिशियली पार्क के उस कोने से हुई थी ...सांवला सा चेहरा .,लम्बा कद ...दरमियाना शरीर ..गंवाई कट से बाल जिसमे भूरे से मिलते जुलते  कई रंगों के शेड्स ...ऊँची पैंट पर बाहर निकली शर्ट .पैरो में चप्पले ...यही था उसका  पहला पोट्रेट पहली बार उसे  नुक्कड़ वाले उस  बनिए की दूकान पे  देखा था ....मुझे देख वो बेवजह मुस्कराया था ..फिर वो कई बार गली में दिखा.. हर बार बेवजह मुस्कराना ... कभी गेंहू का बोरा लेकर चक्की पे   ...कभी कपडे लेकर धोबी ...पिछले एक हफ्ते से उसको अक्सर बाहर देखा था....उसकी साइकिल गली के कोने में उस आखिरी मकान में घुसती...जिसके सामने एक सरकारी जीप सदा मुस्तैद  रहती …..घर के  लोग मोहल्ले के लोगो से कम  वास्ता रखते.....शादी ब्याह का कार्ड या  होली दिवाली  का चंदा  लेने कोई जाता तो बाहर  दरवाज़े पे नौकर अपने जरिये से निबटा देता..घर की मालकिन  सरकारी जीप में ही बाहर निकलती ....उसकी दो लडकिया भी.!.  एक साल से  इन  किरायेदारो  की    उस ."अकडू फेमिली  "के इस नए सदस्य का यूँ बेवजह  मुस्कराना मुझे चौकन्ना कर देता...अलबत्ता उसका पहनावा फेमिली मेंबर जैसा टच देता नहीं था ....
"तुम "भारद्वाज उसकी ओर मुड़ा
 सिंह साहब मामा जी है मेरे ..अब यही रहने आया हूँ....उसने कहा था ...
हमारी टीम पूरी है ..त्यागी ने कहा
मै बौल बहुत फास्ट फेंकता हूँ ...उसने भारद्वाज से कहा ...वो कप्तान की हैसियत जान गया था  
एक बौल  में दो रूपया देना पड़ता है .त्यागी ने दूसरा फेंका...त्यागी ने टीम में कभी चवन्नी का योगदान परोक्ष रूप से भी नहीं किया था
मै चार दिन जायूंगा...उसने भारद्वाज को टटोला
क्या नाम है तुम्हारा
"मनोज " .
उसमे "सिंह साहब फेमिली" वाला शहरी अभिजात्य एब्सेंट था यही उसका पोजिटिव पक्ष था ...पर सिंह फेमिली का पूर्व इतिहास उससे एक शंकालु दूरी रख रहा था ..भारद्वाज ने  त्यागी की मझोली अकलमंदी को इग्नोर करते हुए  कप्तानी-धर्म के चरित्र की भूमिका को बखूबी निभाते हुए डीसीज़न पेंडिंग रख दिया.
वो अगले दिन सुबह फिर उसी चक्की पे मिला ..साइकिल  पे आटा रखते रखते मेरे पैर का नाखून उखड गया ..उसने मेरी साइकिल थाम ली ..थामे वापस  मेरे साथ आते आते उसने बताया उसका एडमिशन हो गया है...घर पर उसने आटा उतारा ओर अपने हाथो में बोरा उठाये अन्दर तक रख आया ..गर्मियों ने उसके चेहरे के पसीने देखते हुए मैंने पानी ऑफर किया ...वो गटागट पी गया ..ओर मिलेगा..उसने कहा
 ठंडा पानी मामी पीने नहीं देती.. जैस हम  फ्रिज को खा जायेगे
. तसदीक हो गया...मनोज फेमली   मेंबर नहीं है
गले चार दिनों में कई चीज़े एक साथ हुई....मनोज की टीम में एंट्री हुई.... .कमाल का बौलर निकला वो..हवा की तरह तेज फेंकने वाला .उठती गेंदे..भारद्वाज इम्प्रेस हुआ ..बाकी लोग भी....गली में एक भूरे रंग का छोटा पिल्ला  पता नहीं कहां से आ गया ..
वैज्ञानिक लोग बोलते है इस बिरादरी में प्यार सूंघने की गज़ब सेन्स है .. मनोज में उसने जाने यही  बू सूंघ ली ....उसके पीछे हो लिया...बुजुर्ग सभ्य बिरादरी स्नेह भी संकोच ओर दूर से करती है .दया भी डिस्टेंस से ...मनोज थोडा पगलेट है...गंवई जो ठहरा ...अपने हिस्से की आधी रोटी तो देता ही..मामी रसोई से चुपके से दूध भी देना लगा..एक रोज बारिश हुई..स्टोर से पुराने कट्टे निकलकर एक बेंच के नीचे घर जैसा अरेंजमेंट करके" जैकी " नाम भी दे दिया
...चतुर्वेदी पुराण अपने उठान पे था ....सूबेदार साहब  अपने बेटे से मिलने  शहर से बाहर थे ... ज्ञानीजन वो है जो कब  किसी चीज़ को रिजेक्ट करना है जानते है ...अपनाना नहीं! . अकडू फेमिली ने पिछले दो सालो में डिस्टेंस के  जो मानक बनाये थे एक देसी पिल्ला बजरिया मनोज  उसे ध्वस्त करने में अपना मूक योगदान दे रहा था .
जैकी के आगमन ओर   सूबेदार साहब के छुट्टी पे जाने की प्रोग्रामिंग पता नहीं किस दुष्ट ने की थी..(मेहता अंकल ऐसे  हादसों को " विधि का विधान  "कहते है ) मेच की तैयारी जोरो से चल रही थी ...पर कहते है ना जिंदगी में जो सुख इंजेक्ट करता है...वही दुःख भी....सूबेदार साहब की एंट्री मोहल्ले में हुई...ओर जैकी उनकी निगाह में पड़ा....नफरत के पास तर्क नहीं होते ...ओर कुछ लोग नफरत करने में बड़े कुशल होते है ..सूबेदार साहब ने इस फलसफे को बड़ी शिद्दत से निभाया जब उनके तरीके जैकी को बाहर करने में फ़ैल हुए..तो उन्होंने अकडू फैमली की घंटी बजा कर ऑफिशियल शिकायत दर्ज कर दी मनोज के खेल पर भी बैन लग गया..भारद्वाज का पल्स रेट बढ़ गया ओर हमारे भीतर गुस्सा .....मनोज घर से निकलता तो पर सामान लाने ...पार्क को देखता..जैकी उसके  पीछे दौड़ लगा देता ...मैंने एक दो बार उसे रोकने की कोशिश की ..
 नहीं यार मामी वापस भेज देगी..उसने सर झुकाकर कहा था ...मां अकेली है ...पढाई के लिए पैसे नहीं है उसके पास ...उस रोज़ उसने फ्रिज का पानी भी नहीं पिया ..जैकी उसके आस पास पूँछ  हिलाकर दौड़ता रहा ...
सूबेदार साहब ने  तडके  मुंह अँधेरे दो दफे जैकी का अपरहण किया..कही छुडवाया पर  जाने कैसे जैकी सूंघता सूंघता शाम ढले वापस आ गया…. उकडूं बैठ कर  जैकी अपनी कई सोशल विजिट त्याग कर  मनोज के दरवाजे पे जाकर उसे आवाज देता...नौकरों के दुत्कारने को इग्नोर करता..फिर अपने प्रयत्न में लग जाता
उदास होकर उसके दरवाजे के पास बैठ  जाता ..ज्यादा  भूख  लगती  तो हमारी  दी हुई रोटी  मुंह में ले जाकर वही बैठ कर खाता ..मैच के दिन नज़दीक आ रहे थे ....मनोज को फिर चक्की के पास पकड़ा गया ...भारद्वाज ने उसे दोस्ती का वास्ता दिया ..मनोज ने वादा किया  पहले मेच के दिन वो कोई बहाना बना कर निकल लेगा ....पर मेच के लिए व्हाईट शर्त पैंट आवश्यक  शर्त थी..तय हुआ अपने बैग में भारद्वाज उसके माप के कपडे रख देगा.. मनोज ने मुझसे वादा लिया के मै जैकी को दूध देता रहूंगा .. ... 
शनिवार को हमारा पहला मेच था ..उस रोज सब कुछ अच्छा हुआ मनोज ने शानदार बोवलिंग की थी...हम मेच जीतकर ख़ुशी ख़ुशी लौटे ..तय हुआ था मनोज हमारे पंद्रह मिनट बाद अलग रास्ते से मोहल्ले में घुसेगा ...पर पार्क के किनारे जैकी के जोर जोर से  कराहने की आवाज थी.. उसकी एक टांग टूटी पड़ी थी  पार्क में खेलते  छोटे बच्चो ने बताया .... सूबेदार साहब ने दो तीन बार लाते मरी तो जैकी उन्हें काटने दौड़ा ....सूबेदार साहब ने अपनी घूमने वाली लाठी उस पर चला दी थी ...सूबेदार साहब इंजेक्शन लगवाने गए थे .
मनोज उसके पास बैठा रहा ..जैकी की कराहे जारी थी ....हमने दूध में दवा की गोली मिलाकर पिलाई..कुछ देर कराह कर जैकी थक कर सो गया .मनोज वही बैठा रहा ...खामोश..उसकी मामिका नौकर उसे दो दफे बुलाने आया ....पर वो नहीं गया
थोड़ी देर में चला जायूँगा .उसने हमसे कहा....वो जैकी  की पीठ पे हाथ फेरता रहा ...
मै  खाना खाकर सो गया ..... एक घंटे बाद मां ने उठाया ..."तेरे उस लड़के ने सूबेदार साहब की कार का कांच तोड़ दिया है " ...गायब है
मै हडबडा कर उठा था ...अकडू फैमली के घर के आगे भीड़ थी...सूबेदार साहब  मौलिक गालियों पे उतरे हुए थे  .आधे घंटे शोर गुल के बाद बीच बचाव के बाद मनोज की मामी ने माफ़ी मांगी एयर उनके शीशे का हर्जाना देने का वादा भी किया ....मनोज का पता नहीं था ...लौटते  वक़्त  मैंने देखा जैकी बेंच के नीचे अब भी सोया पड़ा था.
अगले रोज़ से मनोज मोहल्ले में नहीं दिखा.......दो रोज ..चार रोज..मै जैकी की दूध पिलाता रहा ...जैकी मनोज के घर की ओर देखकर आवाजे लगाता ...पर मनोज नहीं दिखा.....दो हफ्ते के बाद जैकी लंगड़ा कर चलने लायक हुआ ...हमने तीन मैच जीत लिए थे ...चौथा मेच हार कर कर हम लौटे तो जैकी भी नहीं दिखा......कभी नहीं
दिखने के लिए .
.


2010-05-25

खुरदुरी बायोग्राफी के दो खुरदुरे एबस्ट्रेक्ट.......

नोस्टेल्जिया भी  विस्थापित होता  है ....
वो हमसे दो साल बड़ा  था   ..जब  हम दसवी में थे   वो  ग्यारहवी  में ....मेथ्स की .ट्रिगनोमेट्री  अबूझ पहेली थी ..कुछ कुछ डरावनी भी ...उसने डर निकाला ..." बोर्ड के  मेथ्स  के एक्जाम  में ....हौसला देने सुबह   वो  अपनी साइकिल  से मेरे सेंटर तक मेरे साथ  आया था......उसके पिता  ने रायपुर में रहते रहते दूसरी शादी कर ली  थी..अचानक उसकी दुनिया  बढ़ी  हो गयी थी ....वो   भी....जब हम शाम को  पार्क में क्रिकेट  खेल रहे होते ..वो   ट्यूशन  पढ़ा रहा होता ......सन्डे के दिन .कुछ देर खेलने आता तो उसकी मां कोने से आवाज देती  "बब्बू ".....बड़ी चुभती  थी वो आवाज....दो साल बाद  ....पहले ही  अटेम्प्ट   में  इंजीयरिंग में उसका एडमिशन हुआ ....दो बहनों के  रहने का  डर मां पर हावी हो गया .ओर बब्बू ट्यूशन  में ऐसा  उलझा के फिर कभी निकल न सका ...... गाडी मोड़ते हुए देखता हूँ........ उसके घर के बाहर अब भी साइकिलो की लम्बी कतारे है…... वो अब  हमसे कई साल बड़ा है .....

समय की नोक पर टिके  आदमी..... तुम  किसी पहले का ही मेटा मोरफोसिस हो

हने वाले कहते है ....."ओरिजनल" मिडिल क्लास  नहीं  रहा ..इसकी भी कई क्लास हो गयी है  ..हर दो चार साल बाद    . नए एडिशन भी  निकल रहे  है  .... मध्यमवर्गीय ईगो" वो भी .ओरिजनल नहीं  रहा.... ...अब वाले में दिखावे ओर  छिछोरेपन की परसेंटेज़ ज्यादा  है "....... फिमेल वाइग्रा भी अब लौंच हो गयी है ....   भगवान्  अब स्लो मोशन में नहीं चलता है ...कलयुग .ओर सतयुग जैसे सौ सालो का कांसेप्ट चला गया है ..हर दस साल में भगवान्  कदम बढ़ा देता है ..  ओर दुनिया भी  बदल  जाती है ......जेनरेशन गेप अब भाइयो के बीच बैठ के हँसता है   ... ... प्रायश्चित करने के लिए  मंदिर मस्जिद के दरवाजे पे जाने के बजाय ..कंप्यूटर पे "एपोलोज़ी डोट कोम" पे अपने गुनाह लिखकर आराम से  मेगी नूडल्स खा कर सोया जा सकता है ....सन्डे के दिन राजमा छोंक कर चूल्हे पर चढ़ा कर नीता दीदी अख़बार फैलाकर "वधू चाहिए" वाले कोलम को ढूंढ कर उस पर गोल घेरा के निशान नहीं  लगाती है ......ना छोटी वाली  उनके सर पे से सफ़ेद बाल  चुन चुन के  निकालती है ...शादी डोट कोम पे दोनों बहने शीट -पिट करती है. मल्होत्राइन का. छोटा पिंकू .......स्कूल जाने के लिए .ए.सी वेन से जाता है उसके स्कूल के सारे कमरे  ए. सी  है ..... ..... . पिंकू को बड़े होकर "इन्डियन -आइडोल”  बनना  है....…….बारहवी में ग्रेस मार्क लेकर पास हुई मल्होत्राइन की    बड़ी बेटी.".बेबी ".एम् टी.वी के रोडिस में   अंग्रेजी -हिंदी की कई गलिया देकर   डी. जे बन लाखो रुपये महीना  कमाने लगी  है ..      अभी अभी एक टी वी कमर्शियल   भी मिला है .   . उसकी क्लास के टोपर.. .बिट्टू की आँखों पर बड़े बड़े मोटे चश्मे है.  रोज  पोस्ट ऑफिस में कई  कम्पीटीशन फ़ार्म  भरके रजिस्ट्री कराता है…....शर्माइन  को लगता है   ..... बिट्टू की बुरी सोहबत से उनका लड़का "डल' होने लगा है ...अब ज़माना स्मार्ट लोगो का है …." …..अंग्रेजी बोलना स्मार्टनेस की अनिवार्य शर्त है....
अपना बकाया लेने आयी. माया को पैसे देते वक़्त..मल्होत्राइन उसका "करेक्टर सर्टिफिकेट " पकड़ा रही है.....उनीस साल की माया ..हाथ में एक साल .ओर पेट  में  ४ महीने के बच्चे को लिए सुबह सात बजे काम पे आ जाती थी  .... जिस रोज  चेहरा सूजा होता है ..उस दिन दूर से नमस्ते नहीं करती थी ...नजर झुका कर गुजरती थी ... . ऐसी हिन्दुतानी औरते शानदार  पंचिंग बेग है .....आफ्टर इफेक्ट्स ऑफ़ शराब ...........मल्होत्राइन  रोज उसे झिड़कती थी  ...बच्चे को लाने पे.... .कहाँ छोड़े ?बाप को फेफड़ो का  टी.बी खा गया .....मां पिछले बरस गुजर गयी ...उससे ढाई साल छोटी खुद दूसरे घरो में  जाती है  ... बिना कोम्पप्लेन" पिये ही उसका बेटा  बड़ा हो रहा है....सुना है अपनी कोख किराये पे देने के लिए गुजरात के अनंद  में शिफ्ट हो रही  है ........तीन लाख रुपये  मिलेगे ...ओर गर्भवस्था तक मेंटेनेस के लिए कुछ हज़ार रुपये ..
कलजुग है .कलजुग.....मल्होत्राइन की सास कानो पे  हाथ रखके  युग बदलने की कन्फर्मेशन दे रही है ..... बेबी अपने मोबाइल से  कोई नॉन वेज़ जोक फोरवर्ड कर रही है  सामने वाले घर में  बिट्टू शर्मा जी  से  किसी फॉर्म पर साइन करवा रहा है . बराबर में धोबी भी खड़ा है ....फॉर्म साइन करते करते धोबी  के प्रेस के एक रुपये से डेड रुपये  बढाने  पर शर्मा जी उसे डांट रहे है …..सरकारी  मुलाजिम है शर्मा जी.... .गजेटेड ऑफिसर…. सरकार अब भी मानती है के केवल सरकारी अफसर सच बोलते है..
.टूटे हत्थे वाली  आराम कुर्सी पे बैठे त्यागी अंकल बाहर वाले  आँगन में   अपने पोते  से अखबार सुन रहे  है ...दोनों पोतो को डयूटिया अलग अलग दिन है ....काले पानी का असर दोनों आँखों पर है ... बारीक अक्षर धुंधले दिखते है ... इस बदलती दुनिया में उनके पोते उम्मीद के सी ऍफ़ एल   बल्ब जलाते है...

2009-03-29

नेपथ्य का स्केच ??


उसके एक हाथ में किताब है ,दूसरे में चाय का डिसपोसेबल ग्लास ..रुकी ट्रेन में से वो परदे हटाकर बाहर देखता है प्लेटफोर्म पर बीडी फूंकते कुली के पीछे अर्धविक्षिप्त सा कोई बूढा है ...उसके बराबर में हांफता कुत्ता . ... वो बूढे को गौर से देखता है ओर उसकी दुनिया को .........जहाँ हर दिन एक दुस्हास है ....शीशे के पार गंध नहीं आती पर वो जानता है हर प्लेटफॉर्म की एक सी गंध होती है .... समाज का मेटामोरफोसिस नहीं होता ?,वो सोचता है .....
चाय का घूँट भरते हुए वो फिर किताब के पन्नो से होता हुआ इतिहास में विचरता है .इतिहास कभी कन्फेस नहीं करता .....पर उसके कुछ आरक्षित पन्ने मानो उससे जिरह करते है .अलिखित सा कुछ झांकता है ..... ये महज संयोग है ,किसी युग पुरूष या महान व्यक्ति के नेपथ्य में उसके किसी अपने का ही चेहरा दिखता है .गांधी के पीछे कस्तूरबा .राम के पीछे सीता .लक्ष्मण के पीछे उर्मिला ..बुद्ध . या . विज्ञान का कोई महान ज्ञाता .... ...ऐसे कितने चेहरे है ..जो बिना अपनी हिस्सेदारी मांगे खामोशी से हमें इतिहास का एक उजला पक्ष दे गये है ....क्या नेपथ्य अनिवार्य शर्त है विधान की ......इस नेपथ्य के बिना इतिहास का चेहरा कैसा होता ? वो सोचता है ......पर एक आहट उसे वापस खींचकर वर्तमान में लाती है ...बूढा शीशे पर हाथ टिकाये ट्रेन के भीतर झाकने की कोशिश कर रहा है ....अन्दर कोई उसे भगाने की कोशिश ......ट्रेन चल पड़ी है ...बूढे के हाथो ने जैसे कोई तस्वीर कांच पे छोडी है ...क्या ये भी वर्तमान के नेपथ्य के किसी हिस्से का स्केच है ?




"सूखा"

एक आहट ओर उम्मीद की कई आँखे जाग जाती है
फलक के रास्ते पर कब से बैठा है पूरा गाँव......

लगता है इस साल फिर "बेईमानी "कर गया बादल

2008-11-30

उन लम्हों का कर्ज ........

कुछ प्यादे है
जात के
कुछ प्यादे है
धर्म के
कब आगे बढ़ेगे
नही जानते
इस खेल के
नियम नही
कही भी खेलो
जैसे भी
कैसे भी खेलो
तय है
दोनो सूरतो मे
वे जीतेंगे
प्यादा ही हारेंगा
फिर भी
ये खेल है
व्यवस्था का
जिसमे खेलने वाले
बदलते है
प्यादे वही है
हम तुम
देश हारता है
हारने दो
धर्म तो जीतेंगा
जात भी
इंसान हारता है
हारने दो
घ्र्णा तो जीतेंगी
अविश्वास भी
कितने प्यादे है
क़तार मे
क़वायद जारी है
खेल की........



उन ४९ घंटो में हम आप नही ठहरे न ही देश के दूसरे हिस्से ...लोग रोज की तरह ऑफिस गये.बच्चे स्कूल गये ....कामकाज चलता रहा ....पर शायद कही एक हिस्सा रुका रहा .. ४९ घंटो तक......
जाबांज ओर देशभक्त सिर्फ़ जान न्योछावर करने के लिए नही होते ...वे देश की अमानत भी होते है ....हम कर्जदार है इन लोगो के ओर ऐसे तमाम गुमनाम लोगो के जो अपनी लडाई खामोशी से लड़ते है .इस देश की खातिर ,हमारी आपकी खातिर ..... दो दिन मोमबत्ती जलाकर उन्हें याद करने से हम ओर आप इस बलिदान से मुक्त नही हो पायेंगे ...हमें ओर आपको ओर ज्यादा अनुशासन लाना होगा अपने जीवन में .ओर कही न कही वही अनुशासन अपनी अगली पीडी में रोपना होगा .....हमें ओर आपको ओर बेहतर नागरिक ओर बेहतर भारतीय बनना होगा

2008-09-30

जिंदगी की गलियों से

सुबह सुबह जब उस हॉस्पिटल से एक रेफ़रन्स देखकर बाहर निकला तो कोरिडोर में ही कुछ भीड़ है ,भीड़ के बीच एक ३५ साल का गेहुये रंग का आदमी है ...मझोले सा कद ,बिखरे बाल ,हाथ में कुछ फाइल
तुम जानते नही मै कौन हूँ....मेनका गांधी की संस्था की कार्यकर्ता हूँ ..एक फोन घुमायूंगी तो मुश्किल में पड़ जायोगे तकरीबन ४० साल की औरत थी.....छोटे से बच्चे को रौंद देते तुम.....पूरी मोटरसाइकिल टूट गयी है
मेरा फोन बजता है ,मै उठाता हूँ पर मेरा ध्यान फोन में नही है ...वो आदमी अपने माथे का पसीना पोच रहा है..."देखिये बहन जी मै तो २५ की स्पीड से चल रहा था ,उसने पीछे से टक्कर मारी ...फ़िर रिक्शे से उलझ कर गिरा है '
भीड़ में करीब साथ -आठ लोग है ,इस भीड़ का कोई चेहरा नही है.... "अजी साहब गाड़ी चला रहे हो तो कोई अंधेर गर्दी है ...उनमे से एक बोला
"भैय्या गाड़ी में बैठकर तो हर आदमी यूँ सोच्चे की दूसरे की तो कोई कीमत नही ..हवा में उडे है ! एक ओर जुमला
मोटरसाइकिल का नुक्सान हो गया ,अस्पताल का बिल है ....वो औरत हाथ में मोबाइल से कोई नंबर डायल करते हुए बुदबदाती है
"अस्पताल वालो से मैंने कह दिया है .. बिल के लिए "मझोले कद वाला धीमे से कहता है....
अजी तो कोई अहसान कर दिया ?भीड़ से फ़िर एक जुमला निकलता है ....वो अपने माथे से पसीना पूछ रहा है ..की अचानक मेरे कंधे पर हाथ पड़ता है डॉ नवनीत है ",आ तुझे चाय पिलाता हूँ... मै कुछ हाँ या न का जवाब दूँ उससे पहले ही वे मेरा हाथ पकड़ कर डॉ रूम में ले चले ..तभी पीछे से आवाज आयी "डॉ साहब सी .टी .स्केन की जरुरत तो नही है ?
वही औरत है "अरे नही आपका बच्चा बिल्कुल ठीक है ,सर पे थोडी सी खरोच है ...हाथ में घिसट आयी है बस ..पट्टी कर दी है ,आप चाहे तो ले जा सकती है "
डॉ नवनीत मुझे पकड़ कर डॉ रूम में ले चले
क्या किस्सा है ?मैंने पूछा
कुछ नही ! एक एक्सीडेंट केस है ,एक लड़के को गाड़ी की साइड से हल्का सा धक्का लगा है ,मोटरसाइकिल स्लिप हो गई हालांकि लगता ऐसा है इस लड़के ने साइड से तेजी से निकलने की कोशिश की है...फ़िर एक रिक्शा वाले से टकरा गया .. . दोनों गिर पड़े ..गाड़ी वाला बेचारा उसे यहाँ ले आया भला मानसत में ...लड़के को मामूली सी चोट है
चाय के कुछ पल गुजरे ही थे की दरवाजे पर क्नोक हुआ ....वही मझोले कद वाला आदमी
चेहरे पर बैचेनी.... डॉ साहब ! आपको जो ठीक लगे करियेगा ..बिल का पेमेंट मुझसे ही कहियेगा अगर सी .टी .स्केन की जरुरत समझे तो ?
अरे नही ....निश्चित रहिये .सब ठीक है.........डॉ नवनीत उनसे कहते है ...
उसके चेहरे पर अब भी बैचेनी है.. डॉ नवनीत उसे बैठने को कहते है .कोई ओर दिक्कत है ?वे उससे पूछते है
"एक फेवर चाहिए आपसे "?वो हिचकिचाता है
कहिये ?
वो रिक्शे वाला मुझे नही मिल रहा है ,उसको भी थोडी चोट आयी थी यही कुछ पट्टी हुई है उसकी ,उसका एक टायर पूरा मुड गया था ..उसको अगर कुछ पैसे दे देता .... ?

2008-09-24

वो मिला तो याद आया हम कितने पेचीदा है


हम सबके भीतर एक ऐसा कमरा छिपा है ,जिसमे हमारी कमजोरियों ,झूठो ओर इंसानी दुर्बलतायो के पलो के ढेर को सावधानी से सकेर कर रखा गया है जिसकी चाभी हम किसी से नही बांटते ,उसकी खिड़की कभी नही खुलती ......अलबता गुजरते वक़्त के साथ वो ढेर जरूर बढ़ा हो रहा है.




आज आपके स्कूल चलना है एक सन्डे की सुबह मेरा पौने पाँच साल के बेटा उससे १०-१२ दिन पहले किए हुए एक वादे की याद दिलाता है ...पहले ही आलस में मै दिमाग में तयशुदा कई कामो की लिस्ट में छटनी कर चुका हूँ...गाड़ी की सर्विस भी मै अगले सन्डे पर धकेल देता हूँ. एक कप चाय ओर टाईम्स ऑफ़ इंडिया के पन्नो में मै इस उम्मीद में उतरता हूँ की कुछ समय बात छोटू अपने दूसरे खेलो में लग जायेगा ओर स्कूल की बात आयी गयी हो जायेगी ..पर कुछ मिनटों बाद मेरे सैंडिल मेरे सामने रख दिए जाते है ,अनमने मन से मै शहर के उस हिस्से में पहुँचता हूँ जहाँ नीचे आर्यसमाज मन्दिर है ऊपर मेरा स्कूल....."आज छुट्टी है इसलिए स्कूल बंद है "मै उसे बहलाने की कोशिश करता हूँ पर वो नन्हे पैरो से सीडिया चढ़ता हुआ ऊपर भाग जाता है...ऊपर एक कोने में बूढा चौकीदार है आवाज सुनकर बाहर आया है .सफ़ेद बढ़ी हुई दाढ़ी.मोतियेबिंध से ढकी हुई अधूरी आँखे ओर एक पुराने फ्रेम का चश्मा ....छुट्टी है पर वो अब भी वर्दी में है .....शायद ये वर्दी ही उसकी पहचान बन गयी है.
"ये मेरे पापा का स्कूल है'मेरा बेटा उससे कहता है ओर उसकी सुने बगैर गलियारे में दौड़ जाता है..बूढा चौकदार मेरे नजदीक आता है ...उसकी बातो का मै सिर्फ़ हां- हूँ में जवाब दे रहा हूँ...मेरा सारा ध्यान अपने बेटे पर है ..मेरे दिमाग में पहले से फिक्स कुछ appointment बैचेनी से चहलकदमी करने लगे है .असहजता के कुछ पल गुजरते है....फ़िर .मै अपने बेटे को बुलाता हूँ .. ....सीडियो के नजदीक खड़ा होकर वो उससे कहता है....
ये मेरे पापा का स्कूल है जब वो छोटे थे ....अब वो बड़े हो गये है ना!
"हाँ बड़े होने के बाद लोग कम बोलने लग जाते है.'....चौकीदार उसके सर पे हाथ फेर कर कहता है फ़िर अपने कमरे की ओर बढ़ जाता है..

आज का तजुर्बा :-
.२४ सेप्टेम्बर ..बुधवार ...
सवेदनाये फ्लैशलाइटों की चमक में चोंधिया रही है फ़िर रिमोट से कोने में धकेल दी जा रही है ,। बाजार वक़्त की पीठ पर बेताल की तरह बैठ गया है....हर ख्वाहिश की E.M.I है ओर उसे बदलने की सुविधा भी.... रिश्तो का एक स्केल है..जिसके नंबर बदलते रहते है......सच का भी बाजारीकरण हो गया है...कई किस्मों के सच अब मुहैय्या है... ..समाज फ़िर एक नये" म्यूटेंट संक्रमण " से गुजर रहा है .... बुद्दिजीवी फ़िर चुप है ..ओर अब सरोकार सिर्फ़ निजी है

2008-09-15

ऍफ़ .आई .आर


थाने में अन्दर घुसते ही एक ओर गाडियों का ढेर नजर आया ,बरामदे में अधेड़ तोंद वाला सिपाही आपकी परेशानी तौलता है स्कूटर चोरी की F I R सुनकर उसकी दिलचस्पी आपमें ख़त्म हो जाती है..वो आपको बायीं ओर के कमरे की ओर इशारा करके भेज देता है ,बिन बिजली के उत्तर प्रदेश में पसीने में डूबे तीन लोग बैठे है मेरे साथ ५० साल के मेरे दोस्त के पिता है ,जिनका स्कूटर मेरे क्लीनिक से कुछ दूरी पर चोरी कर लिया गया है उनके सुपुत्र भी डॉ है ..ओर मै ओर मेरा एक मित्र उनके साथ FIR लिखवाने आये है ,मेरा मित्र डेंटिस्ट है ....FIR के नाम पर एक कागज देने से पहले वे हैरान होते है की हम स्कूटर की चोरी क्यों लिखवाना चाहते है ...."अरे बाउजी चार पाँच हज़ार की कीमत होगी अब तो उसकी."... ..खैर एक कागज देकर हमें अपनी भाषा में FIR लिखने को कहा जाता है...कोई नही बता रहा की कैसे लिखना है...लिखे .कागज को लेकर वे रख लेते है...ठीक है कोई आ जायेगा मौके पर ....आप चलो.....गर्मी ओर उमस में मुझे एक डी .एस. पी साहब याद आते है ....उन्होंने कई बार मुझसे फ्री में इलाज़ करवाया है....आजकल गाजियाबाद पोस्टेड है पर शायद इस थाने में कोई जान पहचान निकल आये ...उन्होंने फोन मिलाता हूँ.. ५ मिनट बाद थानेदार साहब अन्दर बुलाते है वे दाई ओर के कमरे में बैठे है .दरवाजे पर एक चिक लगी है......
अरे डॉ साहब आपको सीधे यही आना था ना...उनके पीछे खड़ा हवलदार बेवजह खीसे निपोर देता है...मेहंदी ने उनके बालो में एक अजीब सी लाली भर रखी है ,खिड़की से आती धूप में उनके सावले चेहरे पर लाल बाल ओर चमक उठते है ...वे एक सिपाही को बुलाकर बाउजी को बाहर FIR लिखवाने को कहते है..बाउजी बाहर गए है इतने में वे अपनी शर्ट उठाकर मुझे कुछ दिखाने लगते है ...बाहर शोर मचता है...किसी लड़की की आवाज है ....मुझे मिलना है ....कोई सिपाही मना कर रहा है .एक दो मिनट ऐसे ही शोर शराबा होता है फ़िर दो लड़किया धडधडाती हुई अन्दर घुस आती है थानेदार साहब हडबडा कर शैर्ट नीचे करके बैठ जाते है .......,तकरीबन २६-२७ साल की उम्र की....गुस्से में है....किसी ने उन्हें छेडा है .पर कोई रिपोर्ट लिखने को तैयार नही ...फ़िर वही कहानी ....मन ही मन मै सोचता हूँ...देखो हमसे ज्यादा हिम्मत है इस लड़की में ..अपने अधिकारों के लिये ..कुछ देर बहस चलती है फ़िर एक सादे कागज पर वो रिपोर्ट लिखती है.....वही सादा कागज ...लाईट अभी तक नही आयी है ..."वैसे एक बात कहूँ तुम भी ना ऐसे कपड़े लत्ते पहनोगी तो छोरे तो छेडेगे ही " थानेदार साहब उनकी जींस ओर स्लीवलेस कुरते को देखकर कहते है .....पीछा खड़ा हवलदार फ़िर खीसे निपोर देता है.....उसके दांत खैनी खा- खा के बदरंग हो गए है ....मन करता है.....इतने में बाउजी दिखे है...मै ओर मेरा दोस्त उठ जाते है....उन्हें शुक्रिया कहकर निकल आते है.....

सोमवार शाम ६.३० बजे .....फोन बजता है ..वही थानेदार साहब है ....अपनी बिटिया को दिखाना है.....पूछते है की मै कब तक हूँ ?तकरीबन साढे सात बजे वे क्लीनिक में आते है...बस डॉ साहेब वक़्त नही मिलता ओर बिटिया को अकेले भेज नही सकता ज़माना बहुत ख़राब है....आओ बेटे .....
स्लीवेलेस ऊँची टी शर्ट ओर जींस पहने एक २३ साल की लड़की अन्दर आती है ..."हेल्लो डॉ "

2008-07-22

एक दिल जिसकी रगों में उम्मीद ओर हौसले दौड़ते है


सई को अपने बारे मे ज्यादा कहना पसंद नही है ,उससे मैं कभी रूबरू भी मिला नही हूँ ओर सच बतायूं कभी फोन पे भी बात नही की है ,सिर्फ़ sms ही इधर उधर
गये है हाल मे ही एक गुजारिश की थी उनसे कुछ लिखने की ....मुझे मान देते हुए
उन्होंने कुछ भेजा है .....

दुनिया से मेरा परिचय...इसने कराया....
कुछ किस्से कुछ कहानियाँ सब के पास होती है.मेरे पास भी है.थोड़ी बहुत दुनिया किताबों में...ज़्यादातर डॉक्टरों के यहा और इस अस्पताल में देखी है.अपोलो चेन्नई के बारे में कुछ लिख रही हू..मेरे नज़र में अपोलो चेन्नई क्या है...बस वही..और तो आप सब जानते ही है अस्पताल क्या और कैसे होते है.यहा अनजान लोग अपनी तक़लीफ़ ऐसे बाँट लेते है जैसे की पड़ोसी हो।एक महिला मेरे पापा को लिफ्ट के यहा मिलतीहै, बातों बातों में बताती है की उनके पति डायलयसिस पर है और बचने की उम्मीद कम है(तब इसका मतलब नही समझ पाई थी क्यूंकी आई वाज़ स्टिलडिसकवरिंग की मुझे क्या हुआ है)जाने क्यू उसने बताया..मुझे तब नही समझा पर अब लगता है..जहा सभी किसी बीमारी से जूझ रहे है वही सबसे ज़्यादा सहानुभूति समझने वाले मिल सकते है.पहले ऑपरेशन के वक़्त १ महीना लगा था सर्जरी फाइनलाइस होने को.फिर भी वही रह रही थी ताकि एकदम ठीक हो जाो (आइरॉनिकल इसन्त इट?) वहां की नर्सस से संवाद करना....अपने आप में एक कला थी॥उनकी अँग्रेज़ी ठीक ठाक और हमारी तमिल सुभान अल्लाह ! वैसे ही ऑपरेशन से थके हुएहोते है॥उसमे भी इशारों से बात करना ..उउफ्फ!पर नर्स ये माँ का ही एक रूप है इस पर मेरा पूरा विश्वास हो चुका है ( पर्सनल अनुभव ) किसी को कोईऔर अनुभव हुआ हो..तो सॉरी।
अस्पताल एंटर करते ही सामने एक छोटी सी गणेश जी की मूर्ति है ,वहां एक अखंड दीप जलाया हुआ है।हर कोई उसके सामने दो पल रुक कर अपने लिए अपने प्रियजन के लिए कुछ माँग लेता है (एक नमाज़ पढ़ने का कमरा और गिरिजाघर भी है पर दूसरी जगह है)।वह जगह मुझे पूर्णा विश्वा का दर्शन करवाती है. हर साल नयेलोगों से मिलवाती है। (सालाना चेक-उप और दो ऑपरेशन्स के बाद काफ़ी जानती हू उस जगह को अब) कोलकाता से सीधे अपना समान साथ रखे हुए लोगों को देखा है जो एक अन्जान डॉक्टर नामक देवता के हाथों अपने आप को सौंप देते हुए देखा है.एक ही आशा होती है की बस अपने दुखो का निवारण यही होने वाला है. वहां जाकर इस बात में कोई शंका नही रहती की दुनिया में भगवान है वरना हमारा विश्वास...बिन पैंदे का लोटा है..कभी यहा कभी वहां?
अब अंतरराष्ट्रिया मरीज़ भी होते है. पिछले ऑपरेशन के वक़्त (२१ जुलाइ २००६) एक अफ़गानी बूढ़ी औरत आई सी यू में मेरी पड़ोसन थी.उसे देख कर मुझे अपने नानी की याद आती थी. वही गोरा रंग, वही छोटी आँखें, वही झुर्रियाँ नज़र आती थी.हमेशा ऐसा लगता की उसे एक बार गले लगा लू (हम दोनो के ड्रेसिंग देखते हुए नामुमकिन था )वो सब चीज़ों के लिए मना करती थी..ना उसे खाना खाना होता ना दवाई लेना. एक दिन तो पूरा आई सी यू सिर पर उठा लिया..नर्सस ने मिन्नतें की..डॉक्टर्स आये..पर वो ना मानी. फिर उसके पोते को बुलाया गया..वो लड़का..उसके नज़दीक बैठा..दो प्यार के बोल बोले..हाथो से खाना खिलाया..और सुलाया..क्या चाहिए था उसे?एक जाना पहचाना चेहरा..अन्जाने देश में अजनबी चेहरो के बीच..
ऐसे कई किस्से है..यादें जुड़ी है अपोलो के साथ..और वो बस बढ़ती ही जाती है..हर बार इंसानियत का कोई पाठइंसानो की अच्छाई का एक उदाहरण देख आती हू..और मन ही मन दुआ करती हू...जब भी यहा आऊं कुछ सीख के जायूं जो मुझे एक बेहतर इंसान बनाता रहे..
-सई



सई को जुलाई महीने से खासा लगाव है यूँ कहे उनका दिल का नाता है . दो बार उनके दिल से छेड़ छाड़ इसी महीने मे हुई है (उनके दिल की सर्जरी हुई है 'मिट्रल वाल्व रिप्लेसमेंट "आम भाषा मे कहूँ तो उसके दिल मे छेद है) पहली सर्जरी जुलाई २००२ मे plaaned थी दूसरी सर्जरी २१ जुलाई २००६ मे इमर्जेंसी मे...क्यूंकि पहली सर्जरी कामयाब नही हो पायी ....उनके दिल मे ढेरो नज्मे ओर शेर भी जमा है ओर बावजूद चाकू छुरों ओर ढेरो ग्लोव्स का सामना किए हुए अब भी वही टिके है ..कभी फ़िर गुजारिश करूँगा उनसे भी.....

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails