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2010-07-30

सुन जिंदगी!! किसी-किसी रोज तेरी बहुत तलब लगती है


आवारा !!

होठ  खुश्क रहते है..... तपा तपा सा चेहरा
जैसे कोई नशा किया हो
सुबह जल्द आकर .उन

 रिक्शा वालो ...खोमचे वालो ...की संगत में

.देर तक बैठा रहता   है

 इन गर्मियों में फिर 
दिन को
  उगने का सलीका नहीं  आया ...


 मेसेज की आमद.!!!.....

अच्छा हुआ

जो तुमने तोड़ दिया

उस इकरारनामे को

जिसके मुताबिक ना हमें मिलना था

ना बात करनी थी

पिछले आधे घंटे से

 दरअसल .......
मै तुमको ही सोच रहा था

पिछले आधे घंटे से
........
मेरे शहर में भी बारिश है

टचवुड !!!!





जुदाई ....

दिल किसी मुंशी सा......
 कब से

रोज दिन को ...पलट कर

उन पे मार्क लगा रहा है

पिछले शुक्रवार की  रात किसी ने एब्सेंट लगायी थी .....




  कारोबारी दुनिया में प्रेसेंट  .. रोज दर्ज करनी होती है ....जरूरी ....गैर-जरूरी  कितने मसले है .......कुछ  उलझाते है ...कुछ को फलांगता हूं  ..घडी   अपनी दोनों बांहे   आहिस्ता  आहिस्ता   फैलाती    है .......  .मोबाइल की . कोंटेक्ट लिस्ट में नाम को स्क्रोल करते  करते किसी  नाम पे रुक गया  हूं......

जिंदगी माने !

 .
अक्सर बांट कर या टुकडो में ही पी है
 
एक्स- रे दिल को धब्बो को कहां
  दिखाता है 
 किसी-किसी  रोज तेरी बहुत तलब लगती है जिंदगी!!







2010-03-09

के .....खुदगर्जी का सफ़र तो जारी रहेगा .....

स्टोर  भी बड़ी अजीब शै है .... ....सजायाफ्ता  मुजरिम सा  अलहदा   किसी कोने में  खामोश खड़ा रहता है ..... भीतर कई  अफ़साने छिपाये..... .हर सामान जैसे एक  रिश्ते का नाम लिए बैठा है.....यूं भी  जो चीज   ढूँढने जाओ वो  मिलती नहीं ... उधर  कुछ गिरा है ..... बायो  केमिस्ट्री की किताब  है    ..दो चार पर्चिया झाँक रही है ..किसी फ़ॉर्मूले  का पता देती  सी... एक साथ कितनी तस्वीरे.. फ्लेश  करती है  दिमाग में .....   वक्त  में जरा भी सेन्स नहीं है  .....कुछ भी फ्लेश कर देता है  दिमाग में .....   ..मोबाइल" व्हिसल" दे रहा  है ...किसी का जन्मदिन बताता है ...अब जन्मदिन याद रखने .की सहूलियत के वास्ते कई सिस्टम  है . साइंसदान  कहते है...साइंस   दिमाग  को ओवरलोड  से  बचाती   है ... पर दिल ….वो साला   साइंस  के इशारो को  नहीं समझता ...  ओवर टेक   करता   है.... कही अटका रहता है…….जिंदगी की  इन  तंग  गलियों  के  मोड़ो से ....इत्ते  सालो   बाद  भी वाकिफियत  नहीं है..........पता नहीं दिल के वास्ते कोई "पॉवर स्टेरिंग  "  कब ईजाद होगा .....


आओ दराजे  टटोले कुछ.....
कुछ सफ्हे पलटे ...
दीवार के पेंट को खुरचे थोडा सा
मुमकिन है
के
शायद सांस लेते
या ओंधे पड़े सुस्ताते
कोई नया पैरहन पहने
 वे कही ...
मिल जाये
अरसे  से ……
एक शुक्रिया  मुझ पर  बाकी है



अलमारी के दरवाजो पर इम्तिहान  के दौरान लिखे कोटेशन ......ढेरो .न्युमोनिक्स ओर पिछले गुजरे सालो  से मौजूद  कई  जुदा शक्लो में मौजूद  लफ्जों को .....जो कलेजे भर का हौसला देते थे .....गैर इम्तिहानो दिनों में भी...नाजुक मौको पे ......
 गोया खुदगर्जी का सफ़र तो जारी रहेगा

2010-01-02

एबस्ट्रेक्ट सा कुछ !!!!

धूप पिछले दो दिनों से छुट्टी पे है ..परिंदे भी....सर्दियों का आफती धुंया नीचे उतर कर उंघती स्ट्रीट लाइटों  को दिन की शिफ्टों में काम करा रहा है   . ...  ... हर आधे घंटे  में अब भी कोई एस. एम् एस नए साल की बाबत इन-बॉक्स में दाखिल होता है ... मन करता है ..कोने में  खड़े उस आदमी से बस  दो कश मांग लूं....ऐसे मौसम में पोशीदा हुई कई छोटी छोटी ख्वाहिशो की  तलब बार बार  उठती है . .. .कुछ ख्याल किसी सफ्हे की तन्हाई को डिस्टर्ब करते है.... ..
(१)"अल्ट्रेशन "
उधेड़ के पुराने किस्सों को
रंग बिरंगे धागों से
मन माफिक जगह रख देता है .....
बड़ा हुनर है उसके हाथ में !!

(२)"इन्वर्सली पर्पोशनल"
मै उम्र का पैमाना
हाथ में लिए
जब भी
मापने बैठा हूँ
"आदमियत"....
हर बार पहले से छोटी मिली  है!!


(३)"औरत

पल्टो रवायतो के कुछ ओर सफ्हे
गिरायो इक ओर रूह
दफ़न कर दो एक ओर लाश
तहज़ीब के लबादे मे.........
ख़ामोश रहकर भी किस कदर डराती है.


ओर अब मोहब्बत !!
ग्यारह बजने में  दस मिनट थे

ट्रेन ने "व्हिसल" दी थी तब
प्लेटफोर्म नंबर एक पर
भरी भीड़ में
मेरे नजदीक आकर 
कानो पे  तुमने
"आई मिस यू" रखा  था ......
ग्यारह बजने में दस मिनट है
तुम्हे हिचकी  आयी होगी !!


टुकड़ा- ए -त्रिवेणी


घर लौटने से पहले उस रात जलाये थे  कागज के कुछ टुकड़े
वो डायरी का पन्ना भी लिपस्टिक लगाकर अपने होठ दिए थे जिसमे  तुमने .....

उस रात  मेरी  छत  ने  सुर्ख  लाल  रंग  से  होली  खेली  थी











2009-08-26

क़त्ल !!!!!!!

सुबह से छेनी हथौडे खोल रहे है
उसके जिस्म की तहे …।
जिद्दी है मगर रूह उसकी
ना कोई आह है ,ना दर्द की शिकन चेहरे पर
बस इक हवा है
जों दबी दबी सी सिसकिया भरती है
मायूस सी धूप भी
बेसबब चहलकदमी करती है
कोनो पे खामोश खड़े दो खंभे
कुछ गमजदा से लगते है
दूर उस बुत की आंखे भी
सुबह से इस जानिब तकती है
जख्मी बदन से
बेतरतीब सी कुछ दुनिया
बाहर निकली है
कितने वाकये ,कितने हादसे
शिरकत करने आये है
क़त्ल मे शामिल
कुछ लोग भी सर झुकाये है
मुफलिसी दोस्त थी उसकी ,
वो मुफलिसों का दोस्त था
आओं इस फुटपाथ को दफ़न कर आये !

वक़्त के उस लम्हे के बतोर गवाह कई थे .....एक मै , ....मेरी कार ..एक बूढा भिखारी .दो स्कूली बच्चे ..एक अधजली सिगरेट ओर दो बैचेन परिंदे ...जो अपनी जबान में शायद कुछ नाराजगी जाहिर कर रहे थे ... ...
सड़क की छाती अब पांच फीट चौडी है...किनारों पे उसने रंग बिरंगे नये लिबास पहने है ..दो नये खंभे... तिकोने लेम्प सर पे डाले इतराये हुए आते जाते मुसाफिरों को घूरा करते है ... वो मूरत ......वो मूरत मगर अब भी उस जानिब ही देखा किया करती है ...

2009-06-04

बैठे रहे देर तलक तसव्वुरे जानां किये हुए


dark_rain 079a
Originally uploaded by k3nt

वर्ल्ड कप पिछली दो रातो से दस्तक दे रहा है ........इन सुबहो में भी दोपहर की मिलावट है ...आने वाले दिन का मिजाज दे देती है ..... दिल है कि रोज सुबह 'एक ब्रेक 'की अर्जी रोज सामने रख जिरह करता है ...ओर बेख्याली यूँ इस अंदाज में आमद ले रही है कि गोया कई दिनों बतोर पेइंग गेस्ट रहेंगी ... कुछ किताबे खफा है कई रोज से .... आते जाते टोका करती है ... रोज वादा करता हूँ... .रोज तोड़ देता हूँ...
दोपहरे मुई कर्फ्यू सा लगाती है शहर में ....एक दो बागी छाते रिक्शो पे सूरज से ....बेअदबी सी जरूर करते नजर आते है .........

जब
किसी रोज
दोपहरी में
तीन चार बूंदे खिड़की से
छलांग लगाकर
इन कागजो पे
अचानक गिरती है,
हवा भी
खिड़की के दरवाजे से लटक
कोई शरारत करती है
खिड़की पे टंगा बादल
चिल्लाकर कहता है
"छोड़ो ये गमे- रोजगार के मसले,
छोड़ो ये रोजमर्रा के बेहिस फलसफे ,
छोड़ो ये खामोश मेज ओर कुर्सी
फेंको ये जहीनीयत का लिबास ......."
खिड़की से
...उफक की ओर अपना बस्ता थामे
भागते सूरज को देख
मैं भी सोचता हूँ ...........
क्यूँ ना
"उन्हें भी "एक मिस -कॉल" दे दी जाये



कुछ लोग इस ख्याल से पहले गुजर चुके है ....बेख्याली में पुरानी गठरी को ही खोलना मुनासिब समझा .....
.वैसे कित्ते दिन हुए आपको लॉन्ग ड्राइव पे गये हुए .....बेसबब उन्हें गुलाब की एक अदद डाली दिये हुए

2009-03-19

पहली बारिश !!!


बारिश की बूंदे जब किसी शाम को भिगोती है .. विंडस्क्रीन पर एक तलब उभरती है .. ... माजी की गलियों की इक तस्वीर.... ... कितने रंग है उसमे ..गिनने की कोशिश ... .. .. वाइपर खामोश रहता है...जैसे किसी की आमद का इंतज़ार हो... ......सिगरेट के धुंये की चादर में धुंधले से कुछ अक्स उभरते है ...ओर गुम हो जाते है....

इत्तेफ़ाकॉ के मोडो पे,
कुछ खवाहिशे छोड़ आया हूँ,
एक रिश्ता अब भी दरमियाँ है
उसके
ओर लफ्जो के बीच
बे-इरादा
कुछ कोरे कागज
छोड़ आया हूँ

बड़ी खुश्क हुआ करती थी वो आँखे,
बादल का इक टुकड़ा
काट के घर लाया हूँ
साल की पहली बारिश है आज .........

2008-11-25

मुझसे मुख्तलिख एक शख्स मेरे जेहन मे आवारा सा फिरता है


प्लेन की सीट पर बैठे बैठे मेरी ऊँघ को उस चार साल की बच्ची का सवाल तोड़ता है जो मेरे दांयी ओर की सीट पर बैठी है जिसके पास सवालों की बड़ी पोटली है ओर पिछले पन्द्रह मिनटों मे उसमे से कई सवाल निकले है ....उसका एक सवाल अपनी माँ से है...एरोप्लेन कहाँ पार्क् होगा ?माँ मजबूरी मे बाप को देखती है जो हेड फ़ोन लगाकर म्यूजिक सुन रहा है....बच्ची अपना सवाल दुहराती है...मेरे बराबर मे बैठे डॉ साहब अपने कान के दर्द को भगाने के लिए जोर जोर से अपना कान मल रहे है .....इंदोर से दिल्ली लौटते वक़्त इस प्लेन को कुछ वक़्त भोपाल हवाई अड्डे पर भी बिताना है ...........मै फ़िर अपनी आँखों पर चश्मा चढाकर एक मुस्कराहट जेट की उस खूबसूरत एयर होस्टेस को दे कर आँखे बंद करने की कोशिश करता हूँ ....कुछ मिनटों बाद मुझे वापस उसी दुनिया में लौटना है .....जहाँ मोबाइल स्विच ऑफ़ करना एक सामाजिक अपराध है ,उस दुनिया में ...... जहाँ ड्रग रिअक्शन के उस ३० साला मरीज को जिसे असल मे आई .सी यू में एडमिशन की दरकार है ...पर पैसे एक बहुत बड़ा सवाल बनकर उसके बूढे माँ बाप की खामोशी मे सुनाई देते है .....उस दुनिया में .....जहाँ तीमारदार आपसे इसलिए निगाह बचाते है की कही आपकी" विजिट" का बिल उन्हें अपनी जेब से न देना पड़ जाये .....उस दुनिया में....जहाँ ढाई साल के बच्चे की गरीब मां उस वक़्त भयभीत भरी निगाह से देखती है .. जब वो अपने जले पाँव पर ड्रेसिंग करवाते वक़्त आपकी महँगी टाई पर सू सू करता है......उस दुनिया में ....जहाँ बोटोक्स के इंजेक्शन में उम्र से लड़ने की कवायद है ...जहाँ लेजर के साथ सपनो की मार्केटिंग है .. उस दुनिया मे ......जहाँ शामिल होने से पहले आप ये भरम रखते है कि ये दुनिया इस देश की ईमानदारी का अस्सी प्रतिशत बोझा ढो रही है ......उस दुनिया में जहाँ जहाँ चीजो को तटस्थता से देखने की आपकी कुशलता आपकी योग्यता का पैमाना है .....मुझे अपने दोस्त रघु का फलसफा याद आता है जो उसने अपनी अलमारी पे स्केच पेन से कुछ शेरो के बीच लिखा हुआ था .....मुझे  उस दुनिया में  आगे जीना  है ...  जहाँ मुफलिसी के जीवाणु  हर साल  जादू  से  अपनी शक्ल  बदलते है.....
.प्लेन लैंड हो रहा है........फ़िर से वही जद्दोजेहद !


खीं देता है दलीलो की लकीर
हम दोनो के दरमियां
उलझता है मेरी ख्वाहिशो से,
टोकता है मेरी जुस्तजुओ को..
जुदा है मेरे रास्तो से
जिद्दी भी है ...मगरूर भी है थोडा
यादो के टीले पर अक्सर तन्हा खड़ा मिलता है
मुझसे मुख्तलिख ....एक शख्स


मेरे ज़ेहन मे आवारा सा फिरता है !










आज की त्रिवेणी -
सफ्हे डर सफ्हे कुछ देर रूकती है
कुछ लफ्ज़ टटोलती है ,कुछ हर्फ़ पलटती है ......

हर शब् एक नज़्म अपनी शनाख्त करती है


सफ्हे =कागज ,हर्फ़ =शब्द ,शब् =शाम शनाख्त= पहचान

2008-11-13

एक टुकडा नज़्म का मेरी साँस मे सरकता रहा

दोनों नज्मो का मिजाज अलग है....एक अक्सर किसी मोड़ से गुजरते वक़्त मिलती है दूसरी इस मसलसल भागती बेसबब जिंदगी में वक़्त- बेवक्त मुझे आइना दिखाती है .......


सुबह से छेनी हथौडे खोल रहे है
उसके जिस्म की तहे …
जिद्दी है मगर रूह उसकी
ना कोई आह है ,ना दर्द की शिकन है चेहरे पर
बस इक हवा है
जों कभी कभी दबी सी सिसकिया भरती है
खामोश खडी है धूप भी
गमजदा सी लगती है ।
जख्मी बदन से
बेतरतीब सी कुछ दुनिया
बाहर निकली है
कोनो पे खडी कुछ बेबस आंखो मे
थोडी नमी भी उभरी है
कितने वाकये ,कितने हादसे
शिरकत करने आये है
क़त्ल मे शामिल
कुछ लोग भी सर झुकाये है

मुफलिसी दोस्त थी उसकी ,
वो मुफलिसों का दोस्त था

आओं इस फुटपाथ को दफ़न कर आये .


(२)
रहने दो चन्द ख़ुशनुमा यादे
वक़्त क़ी तहो मे,
ज़िंदगी हमेशा मन- मुताबिक़ नही होती
अब जब ,
मिलते है बचपन के दोस्त,
ना वो फ़ुरसत होती
ना वो पहले सी ख़ुशी होती


आज की त्रिवेणी

कासिद बनकर आया है बादल
कुछ पुराने रिश्ते साथ लाया है .....

आसमान से आज कई यादे गिरेंगी

2008-10-17

छुट्टी ?

धूप जब किवाडो की दरारो से झाँककर
मेरे घर मे दख़ल देती है..
अलसायी सी मेरी नींद
उबासी लेकर उसको उलहाना देती है.
तुलसी का वो पोधा ,जो आँगन मे खड़ा है
धीमे लहज़ो मे
पानी ना मिलने की शिकायत करता है।
मेज़ पर रखी किताब के पन्ने हवा मे फडफ़ड़ाते है.......
पता नही.......
सबको कैसे मालूम है..
आज मेरी छुट्टी है.







चलते चलते एक त्रिवेणी -



जाने क्या निस्बत है कि शब जाते जाते
रोज याद का कासा छोड़ जाती है .....

हर सुबह एक लम्हा पड़ा मिलता है

2008-10-09

ये भी क्या कम इत्तेफाक हुआ है मेरे साथ ,हर शै मिल जाती है इत्तेफाक़न वो नही मिलता

वक़्त
के मोडो पर
कई बार
बेसबब ही रुका हूँ
ये सोचकर
क़ी शायद
मिल जायोगी तुम कही.....


तुम्हारे शहर के एरपोर्ट से जब भी गुज़रता हूँ
वेटिंग लाउंज मे ,बाहर चेहरो क़ी भीड़ को
देख कर सोचता हूँ
गर
तुम किसी को छोड़ने आ जाओ ……..

बीच शहर क़ी दुकानो पर झाँकते हुए गुज़रता हूँ
कि
शायद किसी गोल्गप्पे क़ी दुकान पर
'खट्टा मीठा पानी"पीती हुई तुम दिख जाओ
या सड़क किनारे किसी मेहंदी वाले से
किसी नये डिजाईन मे उलझी हुई….
या किसी होटेल के वेटर से "रेसीपी "पूछती हुई

क्या अब भी बारिशो मे
मोटरसाइकल के पीछे बैठकर शोर मचाती होगी तुम!
क्या अब भी सर्दियों में
काँपते हुए आइसक्रीम खाती होगी तुम !
क्या अब भी सिगरेट छीनकर
लंबे लंबे कश लेकर खांसती होगी तुम !
क्या अब भी
खुले बालो मे अच्छी दिखती होगी तुम!
कैसी होगी तुम?
साड़ी पहनने का बहाना ढूँढती थी उन दिनो,
तब ब्लेक साड़ी फ़ेवरेट थी तुम्हारी.......
आजकल मेरी है!
कभी किसी को छोड़ने आ जाओ ........













सिगरेट की डब्बी पर लिखे गये कुछ बेतरतीब से लफ्ज़ .....................कई बार ये सोचकर ही लिख लेता हूँ कि शायद पढ़ लोगी तुम कही ?

2008-09-05

जिंदगी........ जिंदगी..............जिंदगी


जिंदगी का मतलब...... जेब में चंद रुपये ... दो पुरानी यामहा ओर एक खुली सड़क है ,
जिंदगी का मतलब.... इम्तिहान से पहले की रात ,कभी समझ न आने वाली किताब ओर पाँच बेवकूफों के बीच बंटी एक सिगरेट है ,
जिंदगी का मतलब कुछ ग्रीटिंग्स कार्ड्स ,कुछ बेहूदा कविताये.....लड़किया ओर सिर्फ़ लड़किया है ,

जिंदगी का मतलब सुबह ३.३० बजे की भूख ......होस्टल के कमरे में रखा हिटर्स ओर एक मैगी नुडल्स है ,
जिंदगी का मतलब सर्दियों की एक शाम ,धीमी बारिश ,चार दोस्त ओर गर्म पानी में मिली व्हिस्की है ,
जिंदगी का मतलब ...आधी रात को बजे एक मोबाइल में बरसो से रूठे किसी दोस्त की नशे में रुंधी आवाज है

जिंदगी का मतलब ......................................दोस्ती है





सुबह एक दोस्त का मिला एस .ऍम. एस जिसे पढ़कर एक अधूरी नज़्म को अधूरा रहने दिया ...ओर यहाँ बेतरतीब सा कुछ उडेल रहा हूँ

2008-09-01

उस शायर को जो रेडियो मे घुसकर लोरिया सुनाता था





गुलज़ार उन शख्सियतों में से एक है जिन्हें उम्र के सबसे रूमानी दौर हमने ओढा ओर बिछाया.....उनके लिखे ढेरो गीत लोरिया बन होस्टल में मीठी नींद लाते रहे ... वक़्त के सिरे को पकड़ने की भागदौड़ में ...कई चीजे आहिस्ता आहिस्ता छूट गई कई रिश्तो ने चेहरे बदले ....इश्क के समंदर डूब गये..फलसफो ने अपने मायने बदल दिये ... कुछ चीजे मगर अभी भी नही बदली है..दोस्ती आज भी फेरहिस्त में रिश्तो से ऊँची है.......ओर गुलज़ार आज भी वैसे ही है.....जिन दिनों नानावती हॉस्पिटल मुंबई में था किसी ने बताया की वे किसी को देखने आये है ....गलियारे में उन्हें देखा ... हाथ बढाकर उनके हाथ हाथो में लिए ....ओर वे निकल गये ....कुछ वक़्त बाद ध्यान आया की औटोग्राफ लेना तो भूल गया .....आज भी कभी जब मन बहुत उदास होता है उनकी कुछ नज्मे सुन लेता हूँ.... ये नज़्म उन्ही के लिए लिखी गयी है





जिंदगी जब अपने नाखूनों से
रूह के जिस्म पर
कई खराशे छोडती है
ऑर वक़्त किसी सुद्खोर की माफिक
हर शाम नुक्कड़ पर खडा
दिन के हर लम्हे का हिसाब मांगता है .........

लफ्जो के ढेर पर बैठा
एक शायर
आहिस्ता आहिस्ता
अपनी हथेलियों मे छिपे
कई तसव्वुर
छोड़ता है
कितनी रूहे मुस्करा उठती है

सोचता हूँ कभी मैं भी जाकर
उन हथेलियों को छू आऊँ
ऑर
उस "लम्स" को सूरज पर रख आऊँ





लम्स =स्पर्श

2008-08-09

एक ओर दिन खर्च हो गया जिंदगी का



रोज सुबह जिंदगी अपने झोले में से नया दिन निकालती है , ओर सूरज अखबार के साथ दिन भर का हिसाब आँगन में फेंक देता है अपनी अपनी जेबों में अपना अपना हिसाब लिए हम पूरा दिन खर्च कर देते है मायूस ओर थका सा चाँद भी जैसे कोई रस्म अदा करने फलक पे आता है ,उम्र इसी हिसाब किताब में गुजर रही है इक उम्मीद मगर रोज सिरहाने साँस लेती है की कल कोई मौजजा होगा .....




कई बार झंझोडा है
गुजरे वक़्त के सफ्हो को
कई बार झाँका है
दीवार के उस जानिब .......
अल्फाज़ फेंके है जोर से दूर तक
नाम लेकर गली गली घूमा हूँ
पिछले कई रोज से
सन्नाटा है जिस्म में
कोई आहट कही सुनाई नही देती
जिंदगी की पेचीदा गलियों में
गुम हो गयी है खुशी

सोचता हूँ थाने में रपट करवा आयूँ

2008-07-25

दस सालो मे कितना बदल गयी है शब ?


उसने जब सिगरेट बढाई तो दो कश मार कर मैंने वापस कर दी ...क्यों ?उसने पूछा ...बस यार अब आदत नही रही ..कभी कभी कोई मिल जाता है ख़ास तो कुछ सुट्टे मार लेते है .....मैंने कहा ....तू आ रहा था इसलिए खरीद ली ...मै उसे पैकेट पकडाता हूँ ...मै भी नही पीता आजकल ...वो मुस्कराया ..तो कहा क्यों नही ?....बेकार सुलगाई ..मै उससे कहता हूँ ....बस तूने जलायी तो मना नही कर पाया .वो कहता है .चाय पीयेगा अभी ट्रेन में वक़्त है ?मै उससे पूछता हूँ ....वो सर हिलाता है .चाय के कुल्हड़ को पकड़ हम वक़्त को समेटने की कोशिश करते है ...लोन ?बीवी ?बच्चे ?काम काज ?ओ पी डी?कोई मुश्किल केस ? हर घूँट के साथ हमारे सवाल बदलते है .....
ट्रेन की सीटी बजती है .....वो उठता है ...गले मिलता है "कितने साल हो गये हमें मिले ?१० साल मै याद करता हूँ ..वो ट्रेन की पटरी पर खड़ा होता है ....जाते जाते मेरे हाथ को छूता है....उसे दूर जाते देखता हूँ ..... हाथ हिलाता हूँ ....मेरे हाथ में गोल्ड फ्लेक का पैकेट है ...बाहर गाड़ी पार्किंग वाले से मै पूछता हूँ की वो सिगरेट पीता है फ़िर बिना उसका जवाब सुने मै पैकेट उसे पकड़ा देता हूँ....
M.B.B.S. करते ही उसने कॉलेज छोड़ दिया था .फ़िर मारीशस चला गया ..देहरादून अपनी मौसी के यहाँ आ रहा था ,मेरठ कुछ देर का स्टोपेज था ..गाड़ी को मोड़ता हूँ....शाम हो रही है.....मोबाइल बज रहा है ......क्लीनिक से फ़ोन है....दस साल ........दस सालो में ये शाम भी बदली सी लगती है ?.



अब
चाय की आधी प्यालियों मे
डूबे हुए ना वो नुकते है
ना बँटी सिगरेटो के साथ
जलते हुए
वो बेलगाम तस्सवुर
ना वो
मासूम उलझने है
ना
कहकहों के वो काफिले
बस
कुछ संजीदा मस्ले है
कुछ गमे -रोजगार के किस्से
ओर
जमा -खर्च के कुछ सफ्हे .........

"दस सालो मे कितना बदल गयी है शब "

2008-07-20

कौन समझाये इन नज्मो को कि अब वैसी बारिशे नही होती ..


जब किसी छुट्टी वाले दिन ढेरो बारिश गिरती है ,डायरी के सीले से सफ्हो पे कई पुरानी नज्मे बैचेनी से चहलकदमी करती है ,उचक कर आवाजे देती है ,११ साल पहले मसूरी की लायब्रेरी के सामने ठिठुरती सड़क पे मिली ये नज़्म अक्सर ऐसी बारिशो में "लॉन्ग-ड्राइव "पे चलने की जिद करती है ओर कभी कभी मेरी कार की विंडस्क्रीन पे बूंदों संग सोयी हुई मिलती है...



कुछ लफ्ज़ भेजे थे तुम्हे
जब लौटे तो,
भीगे-भीगे से थे
उन्हे रखकर
किसी किताब मे,
एक सिगरेट जलाकार तन्हाई से लड़ता हूँ
फिर खोलकर खिड़की
बाहर की दुनिया तकता हूँ
सर्दी का सूरज कितना भला लगता है ,
ठंड है,
लिहाफ़ ओड कर निकला लगता है

आते-जाते लोगो ने इस रस्ते को ज़िंदा रखा है
गोया हर शक्स ने अपने दिल मे
कोई क़िस्सा छुपा कर रखा है
कुछ चेहरे इस सड़क पर जाने-पहचाने लगते है
उन बच्चो के बस्ते अब पुराने लगते है

बंजारो की तरह भटका दिन
अब शाम खीच लाया है ........
उदासी के कुछ टुकड़े भी साथ लाया है
सड़क के कोनो पर
मूंगफ़लियो का ढेर उग आया है
काले बादलों से छेड़खानी करता
चाँद भी जगह बदल-बदल
नज़र आया है

मकई के दानो की गंध
सर्द हवा मे घुल गयी है
कुछ अलाव जल उठे है
उसके इर्द-गिर्द लोगो के
तजुर्बे पिघल रहे है

पहाड़ो की शाम
रात सरीखी लगती है
अपने साथ ढेर सारा
अंधेरा उठा लाती है

अपनी चाय की प्याली
मे कुछ यादे डूबोता हूँ
भरी हुई ऐश-ट्रेय को
पानी से भिगोता हूँ
सिगरेट की ख़ाली डीबी पर
तेरा नाम लिखता हूँ
कैसे कटेगी लंबी रात .........
तेरी तस्वीर देखता हूँ

2008-07-17

रिश्ता ??


एडीयो से उचककर
जब तुमने
उस रिश्ते के लबो पर
अपने होठ रखे थे,
उफक का सूरज
सुर्ख़ हो कर भभका था,
पिघली आग फैल गयी थी.
इक छोर से जिस्म के....
रूह के मुहाने तक

इक लौ सी फड्फडाती है वक़्त के सफ्हो मे कही.......

2008-07-16

बेघर ?


कभी कभी मन करता है सूरज को वापस बादलो में धकेल दूँ ओर रात को आसमान से खींचकर ओर लंबा कर दूँ.....ओर किसी दिन पर बड़ा बड़ा सा 'सन्डे " लिख दूँ......















रोज सुबह उठते है कई ख़्याल
दिन के साथ-साथ
कि
शायद कुछ लफ्ज़ मिले उन्हे
कि
शायद कुछ सफ्हो पर
अपना घर बसा ले वे भी.........
कि
शायद आज़ पूरा कर ले ये दिन
अपना वादा.........
सैकड़ो ज़रूरते अपने मुज्तरिब सर
उठा कर
झाँकती है उस दरीचे से
ओर
आवाज़ देती है दिन को
दिन मसलसल भागता है
शफक होने तक.......

ज़ेहन के फ़र्श पर
बैचन चहल-कदमी करते है
वे दिन के इंतज़ार मे....
थका-झुंझलाया सा दिन
जब लौटकर आता है
फिर
रात की बाँह पकड़ कर सो जाता है.

कितने ख़याल बेघर है यूँ ही कितने रोज़ से?

2008-07-09

वो एक लम्हा जो गिराया है तुमने ......


बारिशे नही बदली ..जिंदगी बदल रही है ,फलसफे भी ,रिश्ते भी पर ये अब भी वैसी है ,मुस्कराती ..बूँद दर बूँद ढेरो लम्हे गिराती यहाँ वहां ....
पोलियो के लिये हम दोनों की ड्यूटी लगायी गई थी intrenship में थे इसलिए अनमने मन से गये,सोचा की दोनों दोस्त साथ में है इसलिए वक़्त कट जायेगा,एक वोर्केर के साथ बच्चो को पोलियो ड्राप पिलवानी थी ,यदि किसी की कोई शंका हो तो उसे मोटिवेट करना था ,यानि की बड़ा बोरिंग काम था ..एक कालोनी के एक कोने में हमें जगह मिली ,दोनों दोस्तों ने अनमने ढंग से घड़ी देखकर काम शुरू किया एक प्यारा सा ७-८ साल का बच्चा साईकिल लेकर दवा पीने आया ...कुछ वक़्त गुजरा ..हलकी हलकी बूंदे शुरू हुई ... वही नन्हा अपनी छोटी सी साईकिल पर अपने प्यारे से छोटे भाई को पीछे वाले स्टेंड पर बिठाकर आया ...."डॉ साहेब इसको भी दवा पिलाईये ."..एक बादल बड़े जोर से गरजा ऐसा लगा जैसे इस खूबसूरत लम्हे की आसमान ने फोटो ली हो..... ,कल से बारिश खूब हो रही है ...पर ये बादल कभी कभी ये बेवफाई भी कर जाते है.....


उमस भरी दोपहरी में
बादल का एक टुकडा
पड़ोसी की छत भिगो गया .......

अजीब बेवफाई है.?


.

2008-07-03

शबे-फुरकत का जागा हूँ ....तुम आयो तो कुछ बात बने ......


दो ख़्याल चले थे साथ-साथ
इक नज्म के वास्ते
रास्ते मे मगर...... जुदा हो गये
अधूरी नज्म लिए बैठा हूँ कब-से.......

ना जाने कब हम-ख्यालात हो जाये

2008-06-30

मेरे सपनो को जमा करके किसी ने उछाल दिया है आसमां मे

सीधी साधी सपाट चलती जिंदगी के किसी मोड़ पर मिले कुछ इत्तेफाक बहुत खूबसूरत होते है ,इन इत्तेफाको से कई लम्हे उधार मिलते है .... ये लम्हे कभी बारिश की बूंदों से लिपटे होते है  .. कभी आसमान से झुककर नीचे झांकते है .......वो ना शायर था ना कोई दीवाना .......पर अक्सर होस्टल की छत की सबसे ऊँची मुंडेर पर लेटकर सिगरेट के कश भरता  ओर देर तक चाँद को निहारा करता  ...कई बार बारिशो में खींच कर ले जाता ....बदली वाले चाँद से उसे खासी मुहब्बत थी .......आज कल  अमेरिका मे है ....
 देर रात जब  मोबाइल बजा ....     छत  पर घूमते घूमते  नजर आसमान पर पड़ी....वही बदली वाला चाँद  वहां खड़ा था.....


 
रोज शब
खींच कर लाते है परिंदे
ओर उठाकर
टांग देते है
आसमान के सीने में
मुआ चाँद
फ़िर सारी रात सताता है

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