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2011-01-29

कभी चलना आसमानों पे ...मांजे की चरखी ले के ...


खांसते बच्चे . ओर  बूढ़े मोहल्ले एक से लगते है
मै जब बड़ा हो जाऊंगा....बस अड्डे के पास मकान नहीं बनाऊंगा ......मै रजाई से मुंह निकालकर  कर पापा से कहता हूँ...किसी फाइल में डूबे  पापा सिर्फ" हूँ "करते है ... सवेरे सवेरे  हमारे उठने से पहले  पापा रोज दिल्ली जाते है ......रात देर में  घर आते है ...मै अक्सर कोशिश करता हूँ उनके आने तक जगा रहूं...उन्हें पतंग पसंद नहीं है ... मां सुबह जल्दी उठ जाती है ...दिन भर काम करती रहती है. ...मुझे  पतंग उडानी बहुत अच्छी लगती है ..आज मैंने पहला  पेचा काटा है ....वो भी राजू भैय्या  का ..राजू भैय्या बहुत अच्छी पतंग उड़ाते है ..पापा को पतंग क्यों पसंद नहीं है ?...
मां से मंजे के लिए  पैसे मांगू तो कहती है सारे खर्च हो गए ...मेहमानों के बिस्किट लाने में ...मेहमान .रोज  आते है ..ढेर सारे!!  बस अड्डे के पास हम  रहते  है  …किराये  के  मकान  में  … थापर नगर गली नंबर चार में……बस अड्डे से मोहल्ले में खुलती  गली जिसकी एक  दीवार पर ना जाने कौन  फिल्मो के पोस्टर चिपका जाता है   ...थोडा आगे चलकर एक मंदिर....जिसका लाल आँखों वाला  पुजारी  मुझे  उछल  कर घंटा बजाने पे घूरता है ....मुझे मन्दिर आना पसंद नहीं है पर  स्वेटर वाली आंटी आम पापड़ का मीठा पेकेट देती है ..इसलिए उनके साथ आता हूँ……..गाँव से मेरठ  चले   किसी  भी  काम के वास्ते चले  शख्स   की    ..हमारे घर  हाजिरी   तय    है  ……..... मम्मी- पापा किसी ज़मीन की बात कर रहे   है ... ..मुझे   नींद ने घेरना  शुरू किया है ....मै जगे रहने की कोशिश  कर रहा हूँ...बीच बीच में कुछ आवाजे सुने देती है ...पैसा .लोन...ढाई सौ गज...आहिस्ता - आहिस्ता   सारी आवाजे खो  जाती  है  … … कोई मुझे  रजाई  उड़ाते  वक़्त  प्यार कर रहा है ..चुभती  दाढ़ी ...पापा है .....
उम्मीदों के आसमान  में यकीनो  के मांजे
सुबह  उठता  हूँ पापा  चले  गए  है  … मां  उन की केप   पहना  रही  है  ..मुझे  केप  पहनना पसंद नहीं ..बाल कैसे चिपके चिपके से हो जाते है 
"मुझे  मंजा  लाना  है  मम्मी " …….... मां जैसे सुनती नहीं ...सीधे केप से  कान ढँक देती है ....स्कूल   पास  ही  है .. मै  पैदल  चल कर जाता हूँ..... स्कूल के नीचे बायीं ओर एक पोस्ट ऑफिस है ..जिसमे काम करने  वाले सारे बूढ़े है ..सब के सफ़ेद बाल है  ...दाई ओर एक नाई की दूकान है जिसे चलाना वाला कोई रिटायर्ड फौजी है ... उसे  "कटोरा कट" काटने में बड़ा मजा आता है ..छोटे छोटे बाल...मां अक्सर उसकी धमकी देती है.......गेट   पर   देव  खड़ा  है .... ऊँचा   है ओर मोटा भी...आते जाते  मेरी केप उतार देता है .....मुझे  उससे  डर  लगता  है  ..ओर मुझे वो  पसंद नहीं .....मै  साइड  से  निकल  जाता   हूँ ...आजकल  विनीत  मेरा  नया  पार्टनर  है ....अपने हाथ में वो एक लाल रंग की गाड़ी मुट्ठी  में दबाये रखता है ..क्लास शुरू होते ही उसे बेग की जेब में रख देता है ....
...लंच  में  .. मै टिफिन खोलता हूँ....आलू ओर परांठा है .. मां.  रोज रोज  बस आलू ओर परांठे  देती  है .....जिस रोज आलू नहीं ..उस रोज अचार ...अचार का तेल टिफिन से निकलकर ..सब कुछ पीला कर देता है ..मेरा बेग भी.....विनीत ने अपना टिफिन खोला है ..उसका सफ़ेद परांठा है...प्याज ओर टमाटर बीच में ...".खायेगा '.विनीत मुझसे पूछता है ....वो  मेरा बहुत अच्छा  वाला दोस्त नहीं है ..पर उसका परांठा !!!......मै आधे  से  ज्यादा  खा  जाता  हूँ …....उसका   "सफ़ेद परांठा"  कितना  अच्छा  है  !
लंच  के  बाद   अगला  पीरियड   हिस्टरी  का  है ….मेरा  कुछ  होम  वर्क  बाकी  है  ..मै  विनीत  की  कॉपी   से   कर  रहा  हूँ ….देव  ने   मेरी  केप  उतार   ली  है ….मै  उससे  लेने  की  कोशिश  करता  हूँ उसने मेरी हिस्टरी  की कोपी  उठा ली है....वापस लेने में ….  हिस्ट्री की कोपी फट गयी है ...होमवर्क का चेप्टर भी......
 पीरियड में  . हिस्ट्री की मैडम  मुट्ठी बंद करवा के  स्केल को खड़ा करके मारती है ....बहुत जोर से लगती है...सीट पर जाकर आंसू पोछता  हुआ मै सोचता हूँ..टीचर बना तो बच्चो को नहीं मारूंगा !
स्कूल से लौटता हूँ तो सीडियो पर मुड़ी तुड़ी अधजली .बीड़िया देख मुझे गुस्सा आता है   .. मां रोज की तरह कुछ बनाने में जुटी है .. कितना बड़ा गाँव है ?

उन दिनों सब  लोग एक से  थे ...न ज्यादा अमीर .न ज्यादा गरीब...
 उस रोज  "स्वेटर वाली आंटी" ने ..मुझे ओर छोटे को  सुबह खाने पर  बुलाया है ..वो  सर्दियों में बहुत सारे स्वेटर   बुनती  है .....इसलिए उन्हें सब स्वेटर वाली आंटी  कहते है ....वे  बहुत अच्छी  है .. हमेशा प्यार करती है  .सुबह के स्कूल में अभी  टाइम है ...वहां  पहुँचता हूँ  तो देखता हूँ  बहुत सारे बच्चे है पूरी ..काले छोले..ओर हलवा ...काले छोले मुझे बहुत अच्छे  लगते  है कई दिनों से आंटी मंदिर नहीं गयी  .... आंटी का पेट फूला हुआ है .
"आप बीमार हो'.....मै पूछता हूँ...
वे हंसती है ...ओर मेरे सर पर हाथ फेरती है.ओर थोडा हलवा मेरी प्लेट में डाल देती है .
"आंटी   के  पेट  में  बेबी  है "बराबर में बैठी .रविंदर  कौर  मुझे  धीमे  से  बताती  है  ….रविंदर  कौर  गली  नंबर  तीन  में  रहती  है ...बड़ी होशियार है ..नेल कटर से नेल  काटती है .(   पापा अपने  ब्लेड से  नेल  काटते  है ) उसके  घर  में  एक  बड़ा  डौगी  है ….जब  कभी  "लंगड़ी - टांग"  में  उससे  लड़ो  तो  वो  बहुत  जोर  से  भौंकता  है  ….
पेट  भर गया है ...ऐसा  जैसे  फट जाएगा .... ..स्कूल पहुँचता हूँ तो देखता हूँ एक कोने में भीड़ जमा है ...विनीत के होठो पर खून है ....देव   ने उसे मारा है....देव के हाथ में उसकी गाडी है ...विनीत.  रो रहा है . .....किसी ने मुझे देव की ओर धक्का दिया है ...."तू लडेगा" ..देव मेरी ओर बढ़ा  है ...मेरी घिघ्घी  बंध आयी है ...देव ने हाथ घुमाया है...मै  पीछे हट गया  हूँ फिर  जाने  क्या  हुआ  है  के  मैंने  घूंसे  बरसाने  शुरू  किये  है  …लगतार  ….देव  गिर  गया  है  …..मुझे  लगता  है   काले  छोलो   ने  मुझमे  ताकत  भर  दी  है  .....
स्कूली ड्रेस में भी सारे बच्चे एक से लगते है
सुबह उठा  हूँ... वीर सिंह अंकल आये है ....चंडीगढ़ से ....मेरे लिए हमेशा  कोई  किताब लेकर आते है ..... पापा बताते है बचपन के दोस्त है …. एक ही गाँव से निकले चंडीगढ़  से वे जब भी सन्डे को  आते है ..पापा उनके साथ घंटो चेस खेलते है ..........रात को वीर सिंह अंकल मुझे कहानिया सुनाते है
.अगले  दिन  विनीत ने  मुझे घर पे बुलाया है....वो गली नंबर पांच में रहता है....उसके पास मांजे  की एक चरखी है ...बहुत सारी पतंगे ...हम उसकी छत   से पतंग   उड़ाते है ..उसकी मम्मी  नीचे   बुलाती है ...प्लेट में गरम गरम सफ़ेद परांठा है ...ब्रेड के साथ.......मै पूरा खा जाता हूँ..... ….ओर ऑमलेट  खायोगे बेटे? उसकी मम्मी पूछ रही है .... ऑमलेट !!!!!..मैंने अंडा खाया है ....मै डर गया हूँ.....नहीं ...मै कहता हूँ....वापस लौटते वक़्त मन में अजीब सा गिल्ट है ..... घर जाने से पहले गली नंबर  तीन के  अस्पताल के नल से मुंह धोता हूँ....  मम्मी को नहीं बतायूँगा..बहुत मार पड़ेगी  
रात को वीर सिंह अंकल मुझे एक कहानी सुनाते हैवे कहानिया लिखते भी है ..."मै भी बड़ा होकर कहानिया लिखूंगा" ....मै उनसे कहता हूँ....
सपने में उनकी कहानी के साथ ऑमलेट भी आया है !
दो रोज से   मै  विनीत  के घर नहीं गया हूँ... ...तीसरे दिन विनीत   मुझे बुलाने आया है....मै शर्त रखता हूँ ऑमलेट नहीं  खायूँगा .......फिर कई दिन .रंग बिरंगी पतंगों.में बीतते है ... हाथ की अंगुलिया काटने लगी है मंजो से .... उसकी मम्मी ब्रेड सेंडविच बनाने लगी है ....उनके यहाँ की  ब्रेड कितनी मुलायम होती है न ...साफ सुथरी  कोनो से कटी हुई.....आठ दिन बाद बसंत है ...पतंगों का त्यौहार ... हम ने  उस दिन के लिए  एक रुपये वाली बड़ी पतंग भी खरीदी  है....".सरदारा "….
वक़्त के कन्ने कटते है जब ..
अगले रोज  विनीत  स्कूल में नहीं आया है ....दोपहर को मै उसके घर जाता हूँ....उसके यहां सामान की पेकिंग हो रही है ....पापा का ट्रांसफर हो गया ..वो बताता है ...उस रोज हम छत  पर पतंग नहीं उड़ाते...न सेंडविच खाते ...दो दिन बाद उसे जाना है ...वापस लौटते वक़्त  मै सड़क के कई पथ्थरो पर ठोकर मारता हूँ...  घर आकर मां से झगड़ता  हूँ..बिना खाए सो जाता हूँ....
सुबह जल्दी आँख  खुली है .पापा तैयार  होकर चाय पी रहे है .ये ट्रांसफर क्या होता है पापा ....मै पापा से पूछता हूँ.....वे कुछ समझाते है .जो मेरी समझ नहीं आया है........
क्या आपका भी होगा
?..मै पूछता हूँ......वे हाँ कहते है ....जाते वक़्त मुझे प्यार करते है ......
मेरा स्कूल जाने का
  मन नहीं है ......मां गुस्सा होकर तैयार करके भेजती है .स्कूल में मन नहीं लगा है ...लौटा हूँ तो मां बताती है ... विनीत आया था..मुझे घर पे बुलाया है ...
मै उस रोज उसके घर नहीं गया हूँ...मां के कहने पर भी नहीं.... आज फिर मां से लड़ा हूँ कई बार
.. अगले दिन सुबह  मुझे ठण्ड  सी   लगती है ....स्कूल   में सब कुछ सुस्त सुस्त सा है ...मेरे सर में बहुत दर्द है....आज घर बहुत दूर  लगा है ......सीढियों पर चढ़ते चढ़ते  रुक गया हूँ... .मां दौड़ी आयी है ....कहती है मुझे बुखार है ...रोते हुए प्यार करती है ....मै जब भी बीमार होता हूँ..मां बहुत प्यार करती है .....दवाई के साथ वो  मुझे ग्लूकोज़ का बिस्किट भी देती  है..मै दवाई लेकर  सो गया हूँ.....  घंटो  सोया हूँ...उठता हूँ....तो कमरे  के बाहर में हवा के साथ अजीब सी आवाजे सुनाई  दी  है .जानी पहचानी ... क्या .पापा छुट्टी लेकर आये है.?... ...."..मां "मै आवाज देता हूँ.....मां के हाथ में ढेर सारी पतंगे है ओर हुचकी है .....बताती है विनीत आया था....छोड़ गया है... पापा कमरे के कोने में कोई कटोरी लेकर खड़े है ...गाजर का हलवा है ...मेरी फेवरेट डिश हवा से एक पतंग बाहर निकल कर गिरती है…."सरदारा" है….
 ... जनवरी महीने का एक मंगलवार   साल २०११ ..
नीचे अख़बार पढने उतरा हूँ तो मां चाय पीते पीते बताती
  है .वीर सिंह अंकल नहीं रहे . मन अजीब सा हो गया है ...... ...अखबार की तह बताती है ... ... पापा ने नहीं पढ़ा ....पापा चुप चुप से  है.... चाय में चीनी नहीं है ...पर वे चुपचाप पी रहे है ... उन्हें एक घंटे में चंडीगढ़ निकलना है  ...मुझे उनकी ख़ामोशी मुझे बैचेन करती है  . ड्राईवर  को हिदायत देकर   भेजता हूं……पापा को अगले दिन आना है.....
बुधवार की दोपहर....
.. क्लीनिक से लौटते  वक़्त  सोचा है ......अगले  आधे दिन की छुट्टी रखूंगा गाडी पार्क करते  देखता हूँ.......पापा दूर सड़क पे  से आर्यन के साथ आ रहे है ...उसके हाथ में ढेर सारी पतंगे है…. सबसे आगे "सरदारा "है

2010-02-19

एक चौरस खिड़की...वक़्त की उस डोर का सिरा अब भी थामे बैठी है .....

पैर के  नीचे तकिये को ठीक करके मैने उचककर  उस  खिड़की से नीचे झाँकने की कोशिश की है  .....एक पतंग  कटकर गिरी है ....बड़ी वाली.गिलासटा ..दो मिनट हो गए है कोई लेने नहीं आया ....पिछले दस दिन से वही खिड़की  मेरी बाहरी  दुनिया है ... प्लास्टर के नीचे खुजली बहुत लगती  है .मै स्केल लेकर  खुजाता हूं ...मां अभी भी काम से लगी है   .जब से  पैर  में प्लास्टर चढ़ा है वो मुझे ज्यादा प्यार करने लगी है ...ग्लूकोज़ के बिस्किट देती है.....नीचे बहादुर से कंचे वाली बोतल भी मंगा कर देती है ....मुझे कंचे वाली बोतल बहुत अच्छी लगती है . बड़ी साइकिल चलाते चलाते मुझे चोट लगी है ..दाये पैर  में फ्रेक्चर है ....सुनील भैय्या ने टेप चला दिया है ....
ली नंबर चार ...थापर नगर के उस बड़े मकान के वो चौथे किरायेदार है ..आमने सामने दो  मकान ऊपर .दो नीचे ...पापा मां को बताते है ...पकिस्तान   से   आये पंजाबी शरणार्थियो ने  ये मोहल्ला   आबाद किया है ....मै    पापा से  "शरणार्थी "का मतलब पूछता हूं .....वे कई बार बता चुके पर मेरी समझ नहीं आता.....
सुनील भैय्या   हमारे सामने रहते है ..........दस दिन पहले ही उनकी शादी हुई है ..मेरे प्लास्टर वाले दिन...शादी में उन्हें टेप मिला है .....पिछले छह दिन से वो सुबह से एक ही केसेट चला देते है ....सनम तेरी कसम .....मुझे गाने याद हो गए है ....नयी भाभी को मैंने दो बार देखा है. ...उन्हें दूसरा  कमरा  मिल गया है ....जब मां आँगन में मुझे नहलाती है ...तो वो भी  अपनी खिड़की से मुझे देख मुस्कराती है .. उनके .माथे पर बड़ी बड़ी बिंदी.है......हाथ में.ढेर सारी चूडिया  है  .....माँ तुम ऐसी बिंदी क्यों नहीं लगाती....मै मां से कहता हूं तो मां डांट कर चुप करा देती है..मै  रोज मां को  बाथरूम में  नहलाने को कहता हूं ...पर मां मानती नहीं ....
नीचे ब्लेकी पतंग से खेल रहा है ......फाड़ देगा ....मै खिड़की से" शै शै "करता हूं .......ब्लेकी सामने वाले होमियोपेथिक डॉ का कुत्ता है ...जब से  खुजली हुई   है  डाक्टरनी  उसे घर में घुसने नहीं देती है .पर ब्लेकी दिन रात यही रहता है.......रात को  घर में घुसने को  कूं कूं  करता है...पहले मुझे  उससे डर लगता था .... आजकल  वो मेरे  बिस्कुट का पार्टनर है .........डॉ अंकल को मैंने दो बार   चुपके  से उसे रोटी  डालते  देखा है ... .... दूसरा गाना शुरू हो गया है ....निशा आ हा आ हा .....
 बिट्टू आया है ...बिट्टू कभी मेरे घर पर अपना गेम लेकर  नहीं आता ...इन दिनों माँ कोई भी  चीज़ मांगने पर घर में सबको एक  ही बात कहती   है ....कहती है" मकान बन रहा है ."...मुझे समझ नहीं आता के मेरे गेम के आने से मकान का क्या सम्बन्ध है ...
  प्लास्टर उतरने का दिन है ...काटने वाले की मशीन से मुझे डर लगता है के कही वो मेरा पैर ही न काट दे ...कितना पतला पैर निकला  है .सूखा सा .माँ रोज पैर पे  तेल की मालिश करती है ....सर्दिया  आने लगी है ....एक महीना गुजर गया है....मुझे बड़ी  साइकिल से डर लगता है ...मुझे  बिट्टू जैसी छोटी   साइकिल  चाहिए  भले ही उसपे   घंटी न हो ....  . टोकरी न  बनी हो ....पर छोटी   हो......मकान फिर बीच में आ जाता है ...मेरी मां से लड़ाई हुई है ....
पापा  रोज दिल्ली से रात में आते है ..उनका ऑफिस  दिल्ली में जो है .....मै रजाई में दुबका हूँ .आंख मीच कर ..वो रोज  की तरह खाना खाकर .  कागजो में उलझे   है ..अपनी खाकी फाइल  लेकर .....वो फाइल  पापा हमेशा ताले में रखते है ...सन्डे को  सारा दिन उनके साथ रहती है ....उसमे अजीब से कागज है ...पोस्ट ऑफिस ...ऐसे  से  कुछ ....माँ कुछ मेरी साइकिल की बात कर रही है ....मेरे कान मुड गये है .....पापा सिर्फ हां -हूं में जवाब दे रहे है .थक कर .मै सो गया  हूं.....
उन सर्दियों  का रविवार ...दोपहर ढाई बजे ...
पापा ने मुझे आवाज दी है ..उनके पास एक नयी साइकिल  खड़ी  है ...घंटी वाली .लाल ....उसके आगे टोकरी भी है ..."...वे मुझे साइकिल पर बैठा कर  खड़े है ....ब्रेक लगायो....ब्रेक वे पीछे से चिल्ला रहे है .....मै ब्रेक लगानी हमेशा भूल जाता हूं .....
साल २०१० का एक  रविवार सुबह नौ    बजे ......
मै चाय का कप हाथ में लिए बाहर आया हूं ...नीचे गली में .पापा आर्यन के  साथ उसकी साइकिल में पिछले आधे घंटे से उलझे है ..प्लास ओर चाभी लेकर  ..उसकी टोकरी ओर कोई नट बोल्ट ठीक कर रहे है ..थोड़ी देर में . साईकिल  फिट घोषित होती है . .....आर्यन घंटी बजा कर निकला है "ब्रेक लगायो....ब्रेक" पापा चिल्ला रहे है ....

सफ्हे दर सफ्हे कुछ देर   ठहरती  है
.....
कुछ लफ्ज़ टटोलती है ..कुछ हर्फ़ पलटती है .….
हर शब एक नज्म अपनी शनाख्त करती है

2008-07-07

"आई ऍम सॉरी बेटा "


तुम्हे नही लगता तुमने ग़लत किया है ...wife मुझसे कहती है ..मन से जानता हूं कि शायद आज ग़लत कर दिया है फ़िर भी मुंह से कुछ नही बोलता हूँ ..मै उसे छोड़ने आया हूँ ..वो कार पूल कर कॉलेज जाती है..... मन अजीब सा हो उठा है .उसकी कार आज इतनी देर क्यों लगा रही है आने में ?खामोशी चुभ रही है आज....कुछ लम्हे ऐसी ही चुभन में गुजरते है .उसकी कार आ गई है ,गाड़ी का दरवाजा खोलकर वो मुझे देखती है .."उसके साथ थोड़ा वक़्त बिताना 'वो कहती है ,मै सर हिलाता हूं...घर पहुँचता हूं...ऊपर सीडिया चढ़ कर जाता हूं..इधर उधर कमरों में झांकता हूं....मम्मी की तरफ़ सवालिया निगाह उठती है..."तेरे पापा छोड़ने गये है...मै निढाल कदमो से वापस ऊपर आता हूं.....
वो सुबह भी ओर दिन जैसी ही थी....सुबह कभी उसके पेट पर फूंक मार के कभी कानो में कोई गाना गा के उसे उठाया था .. .बहला फुसला कर दूध पिलाने के लिये कुल ५ मिनट बचे थे ...घर से उसका स्कूल ५ मिनट के रस्ते पे है..मै अखबार पर एक सरसरी निगाह डालने के लिये नीचे चला गया ..ऊपर आया ..तो कार्टून चल रहा था ....
चलो आर्यन ..देर हो रही है फटाफट
पहले कार्टून....
नही बेटा .....स्कूल से आके देख लेना
तो ख़त्म हो जायेगा
नही पहले कार्टून.....वो नन्हा कहता है....
नही जानता क्या कारण था की मै उस ४ सल् के नन्हे बच्चे पर गुस्सा हो जाता हूं....टी.वी बंद करता हूं ,चलो उसका हाथ पकड़ कर खींचता हूं......नही पहले कार्टून....उसकी मासूम जिद बरकरार है......गुस्से में मै उसकी टाई उतारता हूं .एक दो थप्पड़ मारता हूं....पलंग पर धेकेल देता हूं ... .वो रोता है...नही जाना स्कूल,....बस कार्टून देख......वो लगातार रोता है....wife आती है...उसे बांहों में भर लेती है.....४ सालो में पहली बार मैंने उस पर इस तरह से हाथ उठाया है....wife का मोबाइल बजा है...यानि उसकी गाड़ी आने वाली है ,अमूमन उसका ओर आर्यन के जाने के समय में ५-१० मिनट का अन्तर रहता है...आज इसे स्कूल नही भेजना ..मै गुस्से में कहता हूं.....उसे घूर कर देखता हूं....पापा ऊपर आ गये है....मुझे डांटते है ,इतने छोटे बच्चो पर कोई हाथ उठाता है..वे आर्यन को गोद में उठाते है.......मै नीचे आकर wife को छोड़ने के लिये गाड़ी स्टार्ट करता हूं ...
मरे में जहाँ तहां उसके खिलोने बिखरे है..मन में अजीब सी ग्लानि है ..शेव करता हूं....एक दो फोन रिसीव करके हॉस्पिटल निकलता हूं...क्लिनिक जाने से पहले आज कुछ रेफेरेंस देखने है...मम्मी नाश्ते को कहती है...पापा आ गये है ....पापा से पूछना चाहता हूं की रो तो नही रहा था ?पर पूछ नही पाता.....
हॉस्पिटल से बाहर निकलने के बाद ..जब क्लीनिक के लिये रवाना होता हूं तो कुछ सोचकर उसकी टीचर को फोन करता हूं..

आया था तो सुबक रहा था .अब ठीक है ".
.वो कहती है. सुबह सुबह मैंने अपने बच्चे को.मैंने ....मै उदास हो जाता हूं.
.ब वो डेड महीने का था तबसे मेरी गोदी में गाने सुनसुन कर सोया है..ढाई साल का होने तक वो मेरी गोदी में ही सोता था ,अगर मुझे किस पार्टी में जाना होता तो मै देर रात तक लौट कर आता तो वो जगा मिलता ....बीच में कांफेरेंस के सिलसिले में पुणे या बॉम्बे जाना हुआ तो पूरे घर में मुझे तलाशता फिर था ...आज उसे लेने मै जायूँगा स्कूल से ....मै सोचता हूं...
जिस दिन आप वक़्त चाहते है ,उस दिन ही वक़्त नही मिलता .क्लीनिक में आकर व्यस्त हो जाता हूं...११.३० बजे उसके स्कूल की छुट्टी है पर मरीजो के बीच से मै निकल नही पाता ..सर आज आपके दो लेजर है....मेरा स्टाफ कहता है...मै कैसे भूल गया ...इसका मतलब दोपहर में भी लेट हो जायूँगा ..मना भी नहीकर सकता..दोनों patient बाहर के है ,एक देहरादून का दूसरा बुलंदशहर का..दोनों की शादी है....pre appointment है . बीच में १० मिनट का ब्रेक मिलता है तो चाय पीते पीते सोचता हूं....कुछ लेकर जायूँगा घर उसे गाड़ी पसंद है.....कोई भी कार ले लूँगा ,बीवी का फोन है...उसे सॉरी कहता हूं....मेरी wife को भी हर कामकाजी औरत की तरह guilt है ..वो अक्सर मुझसे सवाल पूछती है....नौकरी छोड़ दूँ क्या अनुराग ?
कितने सालो से मेरी कोशिश यही रहती है की २.३० बजे के बाद घर पहुँच जायूं ,वो अक्सर मेरी इन्तजार में रहता है की मै आयूँ तो वो भी मेरे साथ खाये,पापा मम्मी कोशिश तो करते है ...पर अक्सर वो आधी रोटी खाकर छोड़ देता है.. ... ,कुछ खिला कर फ़िर झूठ मूठ उसके साथ लेटता हूं ताकि वी भी सो जाये..अक्सर वो लेटते ही थोडी देर में सो जाता है....वैसे भी मेरा एक डॉ दोस्त कहता है डॉ के बच्चे दोपहर तक भूखे ही रहते है उसके बाद .....उनके सामने सब कुछ होता है.. ठीक २.३० बजे एक हॉस्पिटल से कॉल आती है......उसके बाद एक लेजर ..दूसरे सेंटर में.....घर लौटते लौटते ४ बज गये है...हाथ में एक नन्ही कार लिये मै घर में घुसा हूं...सो गया है..पापा कहते है.....कुछ खाया .मै पूछता हूं...नही वे सर हिलाते है....मै ऊपर कमरे में घुसता हूं...वो घुटने मोड़ कर सोया है......मेरी जेब में ढेर सारे पैसे है....पर किस काम के ? मेरा बच्चा तो भूखा सो रहा है ...मै ए.सी ओन करता हूं... उसका तकिया सीधा करके उसको धीमे से प्यार करता हूं....गाड़ी उसके पास रखता हूं.......उठने की कोशिश करता हूं तो देखता हूं उसकी आँख खुली है..वो मुझे देख कर पूछता है."आप अभी भी नाराज है पापा ?...मेरी आँखों से आंसू गिरते है "i am sorry बेटा '....मै कहता हूं ओर उससे लिपट जाता हूं.....



आज से ७ महीने पहले का वो दिन जिसे मै याद नही करना चाहता पर जिसे मै भूल नही पाता

2008-06-18

वो बरगद का पेड़ मुझे अब भी छाया देता है


१७ जून रात २ बजे मंगलवार
.......'GOD FATHER-१" ... अभी ख़त्म हुई है ..उसका नशा चढ़े चढ़े मै घड़ी को देखता हूँ...,२ बज गए है .नींद नही आ .बाहर हलकी हलकी बूंदा बांदी है ,चाय की तलब उठ गई है , चाय बनाने के लिये फ्रिज में दूध टटोलता हूँ.... मम्मी शायद सो गई है माइकल ,स्लो म्यूजिक ओर डार्क शेड में मूवी....
आज सुबह जब दिन को चाय की प्याली में डूबोया था तब मालूम नही था की रात भी इसी चाय की प्याली में डुबोनी पड़ेगी..दिन भर मसरूफ रहा ...सुबह पापा को बनारस जाना था छोटे भाई के पास तो उन्हें रेलवे स्टेशन छोडा था तो रात ९.३0 बजे घर में घुसा था . छोटू भी नानी के पास गया है सोचता था जाते ही नींद आ जायेगी
कई सालो बाद पापा ने कहा उन्हें पेंट लेनी है...वरना वो आज भी सिलवाना पसंद करते है ,तो उन्हें कल बाजार लेकर गया था ......
..यूँ तो वे क्लास-१ ऑफिसर की पोस्ट से रिटायर हुए थे ..पर बेहद सादा जीवन जीते आये है... घर में ज्यादातर सफ़ेद कुरता पजामा ही उन्हें भला लगता है , अपने ऑफिस में भी ऐ.सी बंद कर दिया करते थे ,अनुशासन प्रिया रहे हमेशा मुझे ओर छोटे को सुबह ५ बजे उठा दिया करते थे .... पैंट के दाम देखने को उसके टैग पर झुकते है..मुझ पर गुस्सा करेंगे इसलिए मै पेंट उनके हाथ से लेकर ट्रायल रूम की ओर चलने को कहता हूँ.... .वे सोचते है की दुनिया अभी भी उसी रुपये से चलती है..मै उन्हें टी शर्ट try करने को कहता हूँ...वे मना कर देते है ....एक बार try तो करो..वे हिचकिचाते है मै शोरूम वाले लड़के को सोबर से कलर निकालने को कहता हूँ..वे ट्रायल रूम में जाते है ..ओर शर्माते हुए बाहर आये है..मुझे बहुत अच्छा लगा है.. उन्हें जबरदस्ती एक ओर टी शर्ट दिलाता हूँ.....उन्हें एक व्हाइट टी शर्ट भी पसंद आई है.... कई दिनों बाद हम बाप बेटा अकेले बाहर निकले है...मै उन्हें वही टी शर्ट डाल कर चलने के लिए कहता हूँ....मम्मी उन्हें देखकर मुस्कराती है .......

चाय उबलने लगी है...मै कप में उडेलता हूँ...मोबाइल पर एक मेसेज . बिना पढ़े पड़ा है......आज दिन भर शायद मैंने इस मोबाइल से ढेरो बातें की होंगी....ओर अखबार बता रहा है radition के खतरे ......
चाय का एक घूँट भरता हूँ.........सोचता हूँ GOD FATHER -२ भी देख लूँ.....आज का दिन मसरूफ रहा दोपहर घर नही आ पाया .पता नही पापा सो रहे होंगे या नही ..?
सुबह जब रेलवे स्टेशन उन्हें छोड़ने आया हूँ..कई हिदायते दे रहा हूँ...मोबाइल का ध्यान रखना ..,चैन बाँध लेना ..ध्यान से उतरना वे सर झुकाकर चुपचाप सुनते है ..मै उन्हें गौर से देखता हूँ...अचानक बूढे से लगने लगे है... ट्रेन आ गयी है ...मै उन्हें अन्दर तक छोड़ के आता हूँ... मैंने कहना चाहता हूँ "पापा आई लव यू " पर कह नही पाता ..अंग्रेज अच्छे है ..जब जी चाहा बेबाकी से कह देते है.. पर हम... पता नही कौन सी हिचक है......मै पैर छूकर नीचे उतर जाता हूँ.....

वे ताउम्र
बोझ ढोते रहे
ताकि
मै सीधा चल सकूँ
वे ताउम्र
बोझ ढोते रहे
ताकि
मै अय्याशिया कर सकूँ
मै उनसे प्यार करता हूँ
वे मेरे पिता है ...

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