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2010-07-18

'मोरल ऑफ़ दी स्टोरी "

 सुबह की चाय ख़त्म  ही की  है के मोबाइल ने आवाज देकर  बुलाया है ......अमित का  एस एम् एस  है ..... ‘डॉ श्रीवास्तव के यहाँ आज पगड़ी रस्म है …मीट एट हिज़ प्लेस एट . 3.30 “….भूल गया था ...वे शहर के जाने माने डॉ थे ..कुछ दिन पहले ही दिल के दौरे से उनका निधन हुआ था .आदतन   अखबार    के  पन्ने   पलटता हूँ ……सी बी एस सी बोर्ड का रिजल्ट आया है …एक लड़के ने स्कूल टॉप किया है …अपने माँ -बाप के साथ उसकी फोटो है … फोटो देखकर मैं पहचान जाता हूँ ..डॉ गुप्ता का बेटा है …सदर मे  जनरल  फिजियशन  है

दोपहर पौने चार बजे ……
मोबाइल 
ने फिर आवाज दी है …कहाँ है ?मेरा दोस्त पूछता है … ...'..रस्ते में हूँ '...डॉ श्रीवास्तव  साकेत में रहते थे ......पोश कालोनी ....घर  के बाहर गाडियों की लम्बी कतारे है ....गाड़ी पार्क करने के लिए कोई मुनासिब जगह ढूंढ रहा हूँ   की   अगर कोई कॉल आए तो आराम से निकल सकूं ….एक जगह पार्क करके उतरता हूँ. ..सामने डॉ अरोड़ा किसी को मोबाइल पर इन्सट्रकशन  दे रहे है …ड्रिप मे …### डाल देना.... .स्पीड कम रखना ....आधे घंटे मे पहुँच जायूँगा …..मैं उन्हें अभिवादन करता हूँ ....वे मुस्करा कर सर झुकाते है ....फ़िर मोबाइल मे ही घुस जाते है .."चार नंबर वाले का क्या हुआ ? उसे गैस पास हुई की नही ?....मैं आगे बढ़  गया हूँ ..डॉ श्रीवास्तव  की एक हज़ार गज की बड़ी कोठी....आगे  बड़ा लोन है.... उसी में सफ़ेद रंग का टेंट सीना तान के    खड़ा है …......गेट पर ही डॉ मित्तल मोबाइल पर है ….ऐसा करो डॉ त्यागी को  साडे चार  का टाइम बता देना ….…"तुम ओ. टी तैयार करो मैं पहुँचता हूँ "….वे नीचे झुक गए है .....मुझसे १५ साल सीनियर है …ये उनकी खानदानी आदत है .......दोनों भाई अक्सर ऐसे ही झुके हुए मिलते है ........आगे जाकर  जरूर पीठ की तकलीफ होगी …पूरे शहर मे उनकी विनम्रता मशहूर है.

मैं अन्दर घुसता हूँ …कई सफ़ेद कुरते पाजामे है ,मैं थोड़ा अटपटा सा महसूस करता हूँ.... टी शर्ट ओर जींस मे ही चला आया हूँ   एक  सफ़ेद कुरता पाजामा अब 
सिलवा ही लेना चाहिए   ....नजर दौडाता हूँ की अपने वाले बन्दे कहाँ है .. .आदमी की अजीब  फितरत है ... अब  हर जगह कम्पनी ढूंढता है ......अभी शहर मे   सात  साल ही हुए है प्रक्टिस करते हुए अपनी वेवलेन्थ वाले कुछ ही लोग है …..डॉ श्रीवास्तव से आज तक मेरी मुलाकात बस एक दो बार  आई. एम्. ए  की मीटिंग्स मे तकल्लुफाना अंदाज मे हुई थी ....कोई बता रहा है .......समीर यहाँ कुछ ही दिनों के लिए आया है ...समीर उनका बेटा है फिहाल अमेरिका मे शिफ्ट हो गया है शायद  सॉफ्टवेयर इंजिनियर है .. 
“तेरे पास  डिस्पोसेबल बायोप्सी पञ्च है   है  तीन मिलीमीटर वाला “?मेरा दोस्त  फुसफुसाता है ...  …
".हाँ .."मैं धीमे से कहता हूँ...... मंत्रों उच्चारण हो रहा है ….भीड़ बहुत है …कई लोग रुमाल निकलकर उमस ओर बदलते मौसम की चर्चा कर रहे है .......
..मेरे आगे दो तीन लोग है ….".अंदाजन एक करोड़ की होगी "..पहला दूसरे से उस कोठी की कीमत का अंदाजा ले रहा है ,दोनों शहर के प्रतिष्ठित सर्जन है …हाँ …दूसरा कहता है ….”बेटा तो बाहर है …पहला फ़िर बात अधूरी छोड़ता है ….”कोई फायदा नही ..दूसरा उससे कहता है ..डील हो चुकी है …समीर  चार दिन बाद वापस जा रहा ..आपने पहले जिक्र नही किया …पहला नाराजगी दिखाता है .”मुझे भी आज ही मालूम चला है ‘.. डॉ .शर्मा हमारे पास आकर खड़े हो गए है ,साकेत मे ही रहते है उम्र पेंतालिस से ज्यादा ओर पचास से कम है.....,लेकिन फिट रहते है .......उन्हें बतियाने का शौंक भी है ...हम भी कभी उनकी कंपनी मे बोर नही होते है ,…थोडी देर मे पगड़ी की रस्म पूरी  हो गयी है ....लोग हाथ जोड़कर निकलने की कवायद में है .....   ..
हम बाहर  आये है .......  कोई कह रह रहा है " श्रीवास्तव जी सज्जन आदमी थे" ..मैं उसे गौर से देखता हूँ..ये पहला आदमी है अब तक जो वाकई शोक मे है ..
...शर्मा जी बाहर तक हमारे साथ है..गाड़ी के पास खड़े होकर वो कहते है ...मोरल ऑफ़ दा स्टोरी क्या है समझे ?......आराम से जियो अपने लिए जियो एक छोटा सा फ्लेट लो ....वरना बच्चे बड़े होकर बाहर जायेंगे ..तुम्हारी मौत पर बीस दिन की छुट्टी लेकर आयेंगे ..फ़िर प्रोपर्टी बेचकर अमेरिकन डॉलर मे कन्वर्ट करके चले जायेंगे.......छह : महीने मे चौथा किस्सा है साकेत मे........
तेरा बेटा कितना बड़ा है .....मुझसे पूछते है .....
चार साल..... मैं कहता हूँ.......
रात को मीटिंग मे आ रहा है ना...... वहां एक पंच लेता आना" मेरा दोस्त मुझसे कहता है.
रात  दस बजे
 
आई एम् ए  की मीटिंग है...मैं लेट पहुँचा हूँ ,  टाक ख़त्म हो गई है ,मैं अपने दोस्त को पंच पकड़ा देता हूँ ....लोग गिलास पकड़ कर खड़े है .... कुछ नेपकिन में दबाये ........डॉ मलिक पास आये है  ....अपने हाथ की प्लेट मे से एक पकोडा मुझे उठाने को कहते है ....."सामने   देख रहे हो ..".........  डॉ गुप्ता सामने    है....... उनके आस पास दो तीन लोग है ...."ये आदमी खाली  एम् . बी. बी. एस है लेकिन  इसके चेहरे  पर एक अजीब सा तेज है ..इस पूरी महफ़िल पे किसी के मुंह पे नहीं मिलेगा .....  जानते हो क्यों.......क्यूंकि उसके बेटे ने स्कूल टॉप किया है....."वे एक बड़ा घूँट भरते है...कंधे पे हाथ धरते है......मोरल ऑफ़ दी स्टोरी .क्या है समझे ?.तुम्हारी औलाद ही असल पूंजी है ...बाकी . सब बकवास है .......समझे .....
मै सर हामी में हिला देता हूँ ......वे एक बड़ा घूँट लेकर ओर नजदीक आ गये है     "तेरा बेटा कितने साल का है ?"






पुनश्च : तकरीबन दो साल पहले  इस   तजुरबे  के बरक्स   चहलकदमी की थी.....उसी हलफनामे का दस्तावेज़ था...पिछले  हफ्ते  ऐसा ही एक मंजर फिर आँखों से गुजरा तो  ..अलमारी टटोली.... . वैसे .ज्यादा कुछ  नहीं बदला  है .जीने के  हुनर थोड़े ओर  रिफाइन हुए है ...थोड़ी  परते .रूह पे आयी है  ...थोड़ी जमीर पे ........मौत अब भी बिना नोटिस दिये दबे पाँव आती है .......बस सरनेम   चेंज होता है ......लोग अब भी कान पे मोबाइल रखे फुसफुसाते हुए   अफ़सोस   के रजिस्टर पे   अपनी हाजिरी   लगाने आते है ....दिन अब भी रुकता नहीं ... थोडा सा तेज चलने लगा है ...  ओर ....भीड़ में  अब भी कोई उदास नहीं दिखता .....ओर हां आर्यन अब छह साल का है 

हार्ट अटेक. .....
कोई दो महीने पहले महंगे रंगीन धागों से  रफू हुआ था
कहते है रफू करने वाला  शहर का सबसे काबिल रफूगर  है  .....
कल आधी रात   कोई एक जिद्दी धागा बगावत कर गया

2009-08-07

"मेरी तामीर में ही मुज्बिर है इक सूरत खराबी की "


हमारे घर के ठीक सामने रहने वाले प्रोफेसर साहब कहा करते थे ...आज के ज़माने में पैसा उड़ रहा है .बस उसे पकड़ने की तरकीब आनी चाहिए .....हर आदमी ने अपनी अपनी तरकीब निकाल रखी है ..रोज नयी नयी निकल रही है ...जिंदगी इसी तरकीब में गुजर रही है... आपकी जिंदगी का कुल निचोड़ एक टोटल है ...करके देखिये ... सारी पास बुक , पोलिसिया ऍफ़ डी ,सोना . जमीन के कागजात ...हम सबके पास एक आंकडा है ....किसी का ज्यादा तो किसी का कम ..... सारी भाग - दौड़ ...सारी .कवायद...इतने झूठ ...इसी आंकडे की खातिर ...पीछे क्या क्या छूटा. है .. कभी हिसाब किया है.....अंगुलियों पे गिनने की कोशिश करिये कितने इंसानों की जिंदगी में आपके किसी कदम से..सपोर्ट से ...सकरात्मक बदलाव आया है .....कभी आँख बंद कर दिल पर हाथ रख कर एक सवाल खुद से पूछिए ... आपके मरने के बाद कितने लोग आपको याद करेगे ..आपकी बीवी ...बेटा .ओर शायद एक आध दोस्त......कब तक ?आपकी जिंदगी में एक टोटल ये भी तो है.........
कभी यू ही सोचा है की ये ज्ञानी मुनि बड़े बूढे इतने सालो से आत्मा आत्मा चिल्ला रहे है ..आखिर है क्या बला ?ऐसी कौन सी चीज है जिसके शरीर से निकल जाने पर इस शरीर की कोई वक़्त नहीं रह जाती.......
हम डार्विन-लेमार्क को महान वैजानिक घोषित करते नहीं थकते ...पर अपनी आत्मा का इस्तेमाल कम उम्र से ही करना बंद कर देते है ... आत्मा की एट्रोपी भी तो होती होगी ....कोई तो सिस्टम होगा जो उसे भी डीटोक्सीफाई करता होगा ...
ऐसे सवाल बहुत डराते है .....पर ये भी सच है भरे पेट ही ऐसे सवाल उठते है ....ओर इनकी उम्र भी ज्यादा नहीं होती ....
दो साल पहले पुणे जाते वक़्त मै फ्लाईट में ..छत्तीस साल की उम्र के एक सॉफ्टवेयर इंजिनियर से मिला था जो लाखो रुपये महीना कमा रहा था ..पर पिछले दो सालो से सो नहीं पा रहा था ..काम की भाग दौड़ में उसे इन्सोमिनिया हो गया था ......
सड़क के बीच एक रेलवे क्रॉसिंग पर फाटक बंद है..आप पहले से खड़ी गाडी के ठीक पीछे लाइन में खड़े हो जाते है .पीछे से एक बड़ी गाडी आपके आगे से गुजर कर टेडी होकर खड़ी हो जाती है..उसके पीछे कई ओर ...फाटक खुलने में कुछ देर की मशक्कत के बाद वे आपसे पहले निकल जाती है ....आप सोचते है क्या फायदा मेरा डिसिप्लिन में रहने का ...जिंदगी भी एक फाटक है .. फर्क सिर्फ इतना है ...वक़्त के साथ आपकी गाड़ी की पोजीशन भी बदलती जाती है ..... ..वो कौन से कारण है की पहली क्लास से सच बोलना चाहिए पढ़ते पढ़ते आठवी क्लास तक पहुँचते पहुँचते हम जान जाते है की ये सेंटेंस सिर्फ पढने के लिए है....वक़्त को अगर फ्रेम में बंद करके लगाया जा सकता तो हर फ्रेम अलग अलग तस्वीर बयान करता ..
तो क्या सचमुच पैसा इतना बुरा है ...पर जिंदगी में बड़ा घालमेल है ....
२००६ का सर्दियों का कोई महीना -
लोयंस क्लब की ओर से एक हेल्थ केम्प है .मेरा एक दोस्त एक्टिव मेंबर है इसलिए विशेषगो की जमात में बतोर विशेषग मै भी वहां मौजूद हूँ....पास के गाँव के बच्चे है स्कूली ड्रेस में .नंगे पाँव ...डी एम् मुख्या अतिथि है .उनकी पत्नी भी साथ है .केम्प के बाद उन्हें कुछ कपडे दिए जा रहे है ,मैडम के हाथो ..मैडम मुस्करा कर एक दो बच्चो से सवाल भी पूछ लेती है ...क्या बनोगे बड़े होकर...डॉ ,इंजीनियर ..ऐसे जवाब इस पूरी प्रक्रिया के फोर्मेट को फिनिशिंग टच दे रहे है ...मै भी अपने मोबाइल से खेल रहा हूँ... "मै पैसे वाला बनूगा "उस लाइन के आखरी बच्चे का जवाब है .. ..निगाह उठाकर देखता हूँ... पतला दुबला सात साल का लगभग कुपोषित सा बच्चा है... समय ने .मैडम को भी पोलिश्ड कर दिया है .. वे उसके बालो को सहला कर आगे बढ़ गयी है ...पूरी भीड़ में शायद उसने ही सच बोला है......

साल २००५ महीना याद नहीं -
तीन दिन से एक एडमिट केस देख रहा हूँ ...एडमिट फिजिशियन दोस्त के अंडर है ..पेम्फिगस है ...तीस साल की जवान औरत ...एक इन्वेस्टिगेशन है .जो बाहर होना है ...शाम तक नहीं हुआ है ...अस्पताल वाले कहते है ..पति मना कर रहा है ...वो सामने पड़ता है...क्यों ?मै पूछता हूँ.....अभी ऍफ़ .डी तुड़वाई है साहब .पोस्ट ऑफिस वाले कहते है कल मिलेगे ...उसका छोटा बच्चा अपने बाप की अंगुली थामे मुझे देख रहा है....मेरी सारी अकड़ ढीली हो गयी है ....

जावेद अख्तर साहब ने एक बार कही लिखा था ...मुश्किल हालात में जीना भी एक आर्ट है ...वक़्त ने अच्छे समय के लिए भी ये डेफिनेशन मुक़र्रर कर दी है .. ...एंड लाइफ इज नौट फॉर बेड एक्टर्स यू नो !
खवाहिशे लाइन लगा कर खड़ी है ..इस जीवन को मै भरपूर जीना चाहता हूँ....ओर दुःख से मुझे घबराहट होती है ..तो क्या पैसा ही सुख है ....सुरक्षा है..... जमीर भी अपनी स्पेस चाहता है ..मै फिर कंफ्युस हूँ....पर आज की दुनिया में ...जब वारेन बुफेट नाम का आदमी अपनी कुल संपत्ति का ८३ प्रतिशत हिस्सा दान कर देता है तो हैरानी होती है ..ओर ये हैरानी ओर भी बढ़ जाती है जब हमें उस हिस्से की .कीमत मालूम पड़ती है ......... जानते है वो हिस्सा कितना है ...३७ अरब डालर ..यानी १६६६ ० अरब रुपये .....
आप ओर मै तीन जन्मो में भी इतना पैसा नहीं कमा सकते ...कम से कम मै तो नहीं ...क्या कारण रहे होगे उस इन्सान को इस निर्णय तक पहुचने के.......पर क्या हम उम्र के किसी मोड़ पर पहुंचकर कोई भी छोटा दान कर सकते है ?
यूँ भी इस दौर में भावनाये डिसपोजेबिल है.... ओर हर सुबह एक डस्ट बिन की माफिक ....






"मेरी तामीर में ही मुज्बिर है इक सूरत खराबी की "
मजाज़ की इस लाइन का मतलब है ....मेरे बनने में ही बिगड़ने की एक सूरत छिपी हुई है

2009-06-21

'मिडिल क्लास का कोकटेल युग "


'इस इश्तेहारी जमाने में जब तक आप अपने कारनामो के पम्पलेट छपवा कर नहीं बाँटेंगे .आप पिछडो की जमात में शामिल रहेगे ..."वे किसी को कह रहे है...गोल्डन फ्रेम ओर फ्रेंच कट दाढ़ी में दूर से पहचाने जाते है ..मुझे देख बगल वाली कुर्सी में बैठने का इशारा करते है .......बकोल उनके इस फ्रेंच कट से उनकी पर्सनेल्टी में सीरियसनेस का टच आया है .. बचपन से ही उनमे हर इंसान में छिपे संभावनाओं के दरवाजे देखने की इनोवेटिव प्रतिभा है.ऐसे कई सही दरवाजे सही वक़्त पे खटखटा के आज वे यहाँ पहुंचे है …उनकी क्वालिफिकेशन तो हमें ठीक ठाक नहीं पता पर हाँ इन दिनों एजुकेशन इंडस्ट्री में उन्होंने मखसूस जगह बनायीं है ,उम्र से मुझसे पंद्रह साल बढे है....पर बिना 'डॉ -साहब 'लगाये बात नहीं करते है .इन दिनों एक डोनेशन वाले कॉलेज में डायरेक्टर के पद पर है .....भीड़ में ..कई जाने पहचाने चेहरे है ..मंत्रो के उच्चारण के बीच तेरहवी की रस्म जारी है ...जोशी जी धोती पहनकर पंडित जी के साथ बैठे है...ऊपर कंधे पे सफ़ेद चादर .....पीछे सफ़ेद शामियाने पे उनके पिता की तस्वीर लटकी है ....एक ओर खाने का इंतजाम है ..कोई साहब लगातार दौड़ भाग कर रहे है.....सभी इंतजामात देखते..नंगे पैर सफ़ेद कुरते पजामे में .हाथ में काला मोबाइल ..उन्हें देख डायरेक्टर साहब कुछ बुदबुदाये है ...जिसका कुछ अपरिहार्य कारणों से मूल अनुवाद नहीं दे सकता .लिप मूवमेन्ट से अलबत्ता आप आईडिया लगा सकते है.....फिर वे फ्री होकर मुझसे मुखातिब हुए है ...बताते है बड़े जोशी का इंतज़ार है ..अमेरिका से आ रहे है ..एयरपोर्ट से निकले ढाई घंटा हो चूका है .फिलहाल रास्ते में कही है अब पहुंचे की तब पहुंचे .... एक ओर महिला है ....गहरी लिपस्टिक ओर डिजायनर सफ़ेद साडी में लिपटी आकर्षक देह यष्टि से पूरे माहोल को थ्री -डी इफेक्ट दे रही है ... सबसे छोटे जोशी छोटा मोटा बिसनेस सँभालते है ..... इसलिए सामने होते हुए भी कही बेकग्राउंड में है...
डायरेक्टर साहब मेरे कान में बुदबुदा रहे है . 'हर बाप अपने प्रतिभाहीन बेटे को सेट कराने की जुगाड़ में है ...कई भौंडे संस्करण मार्केट में उतरने को तैयार है.. ...अब जमाना इनपुट और आउट -पुट का है ....जितना डालोगे उतना मिलेगा ..मंत्रो के उच्चारण में मुझे फिजिक्स के टीचर भोपाल सिंह याद आते है .....वे कहते थे .." मिडिल क्लास लोगो के लिए दिमाग की एकमात्र सम्पदा है..'….अच्छी जिंदगी हासिल करना चाहते हो तो मेहनत करो…...मोर्डन वक़्त के व्यापारीकरण ने उनके इस फंडे को आउट डेटेड कर दिया है .... .अब लगता है मिडिल क्लास केवल अमेरिकी बेस्ट सेलर लिखने के लिए रह गयी है
… इतने में डॉ अवस्थी नजदीक आकर बैठ गये है ...डायरेक्टर साहब के मुंह में मुंह डालकर कुछ बतिया रहे है ... पिछले साल हार्ट ट्रबुल होने के बाद से प्रेक्टिस में कम टाइम देते है .सुबह केवल दस मरीज ही देखते है.....इसलिए फीस बढा दी है .बड़ा बेटा साउथ के किसी मेडिकल कॉलेज से आकर पहले ही कुनबे का गौरव बढा रहा है .फिलहाल यहाँ छोटे की पी. जी डील तय हो रही है.....उन्हें थोडा ओर स्पेस देने के लिए मै कुर्सी थोडा एक ओर खींच लेता हूँ.......अचानक चहल पहल बढ़ गयी है .....काले मोबाइल वाले जैसे रास्ता बना रहे है ....बड़े जोशी जी ने सपत्नीक एंट्री ली है.....
.पीछे बिसलेरी के बोतल पकडे दो बच्चे .....देवरानी -जिठानी का खामोशी से मिलन द्रश्य है.....हमें ननिहाल का गाँव याद आता है .ऐसे अवसरों पे दरवाजे से रोने की आवाज शुरू होती थी....फिर सामूहिक रुदन की फ्रीक्वेंसी अचानक बढती थी......दो चार मिनट बजकर एडजस्ट हो जाती थी...ऐसे कई रुदन ओर फ्रीक्वेंसी की सेटिंग आगंतुको की घर में इम्पोर्टेंस बताती थी........अगले आधे घंटे में सभी काम तुंरत फुरंत होते है.....बड़े जोशी जी की सुना है शाम को दिल्ली में कोई इम्पोटेंट मीटिंग है ......
जोशी भाइयो से भी हाथ जोड़कर विदा लेता हूँ ...डॉ अवस्थी अभी भी डायरेक्टर साहब के मुंह में घुसे हुए है ...मै दूर से ही उन्हें नमस्कार कर ...बाहर गाडियों की लम्बी कतार ने सड़क के ट्रेफिक को भी डिस्टर्ब कर रखा है .....गाडी बेक करता हूँ तो काले मोबाइल वाले साहब इशारा कर रहे है ....उन्हें बिठाता हूँ ..बताते है उनकी गाडी रास्ते में ही पंक्चर हो गयी थी ..... सोच रहा हूँ जोशी जी के कोई खास रिश्तेदार मालूम पड़ते है ...उस एक घंटे में काफी भाग दौड़ की है...इन्होने ...'बस -बस "वे एक जगह रुकने को कहते है ...स्टेपनी भी चेक करनी होगी .वो क्या है कि ..आजकल ईमानदारी बड़ी रेयर चीज है .....वे मुस्कराते हुए कहते है.....उतारते हुए वे शुक्रिया अदा करते है ....
कभी जरुरत हो हमें याद कीजियेगा डॉ साहब....वे कार्ड पकडा देते है .... तनेजा इवेंट ओर्गानाज़र ....कार्ड के ऊपर दाहिनी ओर शेरा वाली माता की तस्वीर बनी हुई है....



कहते है वक़्त अब बदल गया है , सारी मिडिल क्लास लड़किया अब सन्डे को राजमा मसाला छौंक कर बालो में मेहंदी लगाकर रविवारी संस्करण के मेट्रोमोनियल एड के पन्नो में सुन्द र सुशील गोरी ओर गृहकार्यो में दक्ष जैसो में अपनी प्रोफाइल सेट करके नहीं देखती …अब …शादी डॉट .कॉम ओर .जीवन साथी डॉट कॉम के एक क्लिक ने उनकी पहुँच बढा दी है .कोकटेल युग में जीने के फायदे भी है



2009-04-13

जिंदगी की आइस -पाइस

कुछ चीजे कभी नहीं बदलती ....व्हाइट शर्ट ओर जींस आज भी फेशन में है ....पूरी- छोले ओर जलेबी का नाश्ता भी...बच्चे आज भी सोते वक़्त चद्दर को लात मारके उतारते है ... .खूबसूरती आज भी अपील करती है .. संडे आज भी हफ्ते का शानदार दिन है …. अख़बार ओर सुबह के बीच अब भी मोहब्बत है
…….पर बहुत कुछ बदल रहा है लोग शर्ट के ऊपर टी शर्ट पहनकर नया स्टाइल स्टेटमेंट ला रहे है..... मेल अंडरवियर भी डिजाइनर ,ओर ब्रांडेड हो गये है … .देव डी की हिरोइन साईकिल पर बिस्तर टाँगे नदी किनारे प्रेमालाप करने की इच्छा जाहिर कर रही है …
नर्सिंग होम आ गया है. इमरजेंसी पिल के ऐसे ही एक बड़े इश्तिहारी बोर्ड के ठीक नीचे मै अपनी कार पार्क करता हूँ .…दिमाग की चिप में कितने जी. बी की केपेसिटी होगी....साला एक मिनट में क्या क्या सोच लेता है....??
...सुबह सुबह आप थोड़े से इन्सान ज्यादा होते है ऐसा मेरा तजुर्बा भी है .. पर डॉ गुप्ता रिक्शा वाले की लगातार दरख्वास्त के बाद भी उसके बेटे के डिस्चार्ज बिल में एक रूपया कम न करके मेरे तजुर्बे को गलत ठहरा रहे है .....एक रेफरेंस की बाबत मै वहां आया हूँ ..वे उसके कंधे पे हाथ रख के कुछ फुसफुसाते है जो मुझे सुनाई नहीं देता . ..वापसी में वे .नर्सिंग होम के बाहर किसी स्टाफ को बोर्ड के लिए 'गोल्ड मेडलिस्ट "को अलग कलर से लिखवाने के इंस्ट्रक्शन दे रहे है ... उम्र में मुझसे दस -पंद्रह साल बड़े डॉ गुप्ता मिलते ही ऐसे झुकते है की रशियन जिमनास्ट भी उनसे रश्क करे..चेहरे पे फेविकोल के जोड़ से चिपकायी मुस्कान . विनम्रता के म्युचुअल फंड में .इनका इनवेस्टमेंट तगड़ा होगा...
जमाना अब "पोलिशड- कमीनो " का है …ओर कमीनियत की भी लिगेसी होती है ..खानदानी ....मुझे वर्मा का डाइलोग याद आता है .... लाखो की प्रेक्टिस छोड़ वर्मा जी किसी अकेडमिक इंस्टीट्युट से जुड़ रहे है …कुछ ओर नया करने की बात औरो की तरह मेरे पल्ले भी नहीं पड़ती ... पैसो से अलग नया क्या ??????
" क्यों " के सवाल पे ...बस यूँ ही ....का जवाब देते है......पर जमी जमाई प्रेक्टिस .इस उम्र में ?.......
जिंदगी जीने की कोई उम्र नहीं होती ... कुछ फैसले गज फीते से नाप -जोख कर तय नहीं किये जाते….
शाम की विजिट में साइन बोर्ड पे 'गोल्ड मेडलिस्ट "अलग चमक रहा है ,बचपन में "नैतिक -शिक्षा " ऑप्शनल सब्जेक्ट होता था .. अब भी ऑप्शनल ही है... सोचता हूँ हर साइंस के ग्रेज्यूवेट को डिग्री मिलते वक़्त इसका क्रेश कोर्स कम्पलसरी कराना चाहिए ...फिर हर ५ साल बाद रिवाइज़ ...

2009-02-16

जिंदगी की कोई स्क्रिप्ट नही होती


वो फ्लेट देखने आया है ,मै उसके साथ सलाहाकार के किरदार में हूँ ,बचपन का दोस्त है ,हम पेशा है ब्रांच अलग है ...५ फ्लोर की उस बिल्डिंग में घुसते ही पार्किंग में हमें अलग अलग नंबर बड़े बड़े लिखे दिखायी देते है .हमारे चेहरे पे उगे प्रशन वाचमेन जैसे पढ़ लेता है ...सब फ्लेट के नंबर से है ..वो जवाब देता है .मै घर आए मेहमानों के बारे में सोचता हूँ ,इतने में वो एक कोने पर बने ऑफिस की तरफ़ इशारा कर देता है ...दो बिल्डरों में से एक अपने आदमियों के साथ हमें फ्लेट दिखाने ले चलता है ...छोटी -छोटी बालकनियों में सूरज शायद तय समय पर हाजिरी देने आता है ...
आस पास कोई पार्क है ? अचानक मेरा दोस्त उससे प्रश्न पूछता है .
अच्छे घरो के बच्चे अब पार्क में कहाँ खेलते है ?फ़िर हो -हो करके हँसता है ...रंग बिरंगी दीवारों के बीच पान मसाले से रंगे उसके दांत मिल गये लगते है .स्कूल-घर -टूशन ...यही तो है .वो कह रहा है .
हम सीडिया उतर रहे है अच्छे घरो के बच्चे ?मै सोच रहा हूँ.... बाहर गाड़ी में बैठकर वो घड़ी देखता है
डॉ सक्सेना के वहां भी तो जाना है .वो कहता है ...डॉ सक्सेना का चेहरा मेरी आँखों के सामने आ जाता है .
८ साल पहले जब मुझे प्रेक्टिस शुरू करे कुछ साल ही हुए थे तब उन्होंने कहा था 'अमरोहा जायेगा ?हफ्ते में एक दिन ,मेरे समधी का हॉस्पिटल है ....जिंदगी में प्लानिंग जरूरी है बच्चे ..उनका पेट डाइलोग मिलने पर अक्सर यही होता ..आठ महीने पहले मिले थे नर्सिंग होम रिनोवेट कर रहा हूँ ... एक शानदार इन्फरटीलिटी सेंटर .शांतनु को भी बुला लूँगा .. ...छोटे की बहू गायनेक है ही .....शांतनु बड़ा बेटा ऑस्ट्रेलिया में ही है ...५ महीने पहले छोटा भी अपनी बहू के साथ यु एस शिफ्ट हो गया था ...सुना है उन्हें अपने साथ ले जाने की बहुत कोशिश करी थी उसने ...
शमशान के बाहर गाडियों की भीड़ है ..अन्दर एक कोने में हम दोनों जगह लेते है ..शांतनु आ नही पाया है...थोडी देर में किसी का मोबाइल बजता है ..५० -५१ साल के वे शहर के बड़े डॉ है ...मोबाइल पर उन्हें बात करते देख गुस्सा आता है .मन करता है हाथ से छीन लूँ ओर जोर से गाली दूँ "रस्स साले ये कोई जगह है ! पर सिर्फ़ बुदबुदाता हूँ ..उस भीड़ को देखकर सोचता हूँ कितने लोग इसमे है जो वाकई दुखी है ....खून के रिश्तेदार ?उनमे भी छटनी ! ३५ -३६ साल की उम्र में मैंने कितने लोग जुटाये है अब तक ?एक दो ...गिनतियों का जोड़ मुझमे सिरहन भर देता है.
डॉ सक्सेना लेटे हुए है .शांत ....छोटा पंडित के साथ मन्त्र का उच्चारण कर रहा है ....जिंदगी की कोई स्क्रिप्ट नही होती


आज की त्रिवेणी

कभी बग़ावत , कभी मुख़ालत , रोज़ का क़िस्सा था
अब ख़ामोशी सी है हम दोनो के दरमियाँ.......

एक मुद्दत हुई उस जमीर से मिले

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