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2012-01-06

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वो डे स्कोलर  थी  घर से कोलेज .......कोलेज  से घर ....उस उम्र की  ज्यादातर लडकियों की तरह .जो अपनी  माँ को दिन भर की   सारी बात बताती.है ...उन  सहेलियो  के साथ उसका ज्यादा वक़्त बिताती   जो स्कूल टाइम से उसके साथ थी ...टोपर खानदान की टोपर बिटिया ... कुल जोड़ निकाले तो  एक आदर्श  लड़की  ......ओर  वो हॉस्टल वाला था ...उसका अपना बिगडैल  गैंग ...पढाई में साधारण ....दुनिया की ज्यादातर  बुरी आदते उसमे थी ... .वो हमेशा अगली बैंच पर बैठती ओर वो पिछली दो बैंचो के दरमियाँ रहता....... वो हमेशा  क्लास टॉप करती  वो बमुश्किल पास होता वो अपने में सिमटी ओर वो  दुनिया भर के लिए खुला ...... अक्सर हॉस्पिटल  के बाहर वाले कोने में सिगरेट पीते कभी कभी दिख जाता या अपनी "गर्ल फ्रेंड" के साथ किसी पिक्चर हौल में .....उसकी  गर्लफ्रेंड जूनियर  बैच में थी  ...जो ज्यादा वक़्त जींस में रहती ...कोलेज के  सारे लड़के जिस पर  लट्टू रहते ...उसकी क्लास के भी ...कुल मिलाकर उन दोनों ने  आपस में  पूरे तीन सालो में शायद छह दफे बात की हो ..गोया वे न बेहद अच्छे दोस्त थे न दुश्मन .ओर हाँ उसे कभी प्यार नहीं हुआ था ओर वो आठवी क्लास में ही   अपने टीचर के प्यार की  पहली कम्पलसरी शर्त पूरी कर चूका  था .
नकी पहली मुलाकात ........जिसे मुलाकात कहा जा सकता है कोलेज के फेस्टिवल दिनों में हुई थी ..उस दिन वो जब घर से कोलेज के लिए निकली थी तो रेडियो पर "ओ हँसनी" बज रहा था  ......उसकी "गर्लफ्रेंड "घर गयी हुई थी ....  ...वो शायद .कही से भागा आया था हांफ रहा था .....तभी उसने उससे पूछा था
तुम मेरी पार्टनर बनोगी ?
गेम था  मेल पार्टनर की शेव बनाकर दौड़कर दूसरे किनारे जाकर एक मेडिकल  पज़ल सोल्व करनी है जो पहले करेगा वो जीत जाएगा .
"मैंने कभी शेव नहीं बनायी"
उसमे करना क्या है ...लेदर बना कर शेव करना है फटाफट .....कम ऑन !!
वो उसके साथ आयी है .
वो शेव करते वक़्त उसका चेहरा छील देती है ...पर पज़ल सोल्व पांच सेकण्ड में कर देती है
वे दोनों जीत गये है....उसे .उसके चेहरे पर खून देखकर अफ़सोस है  वो रुमाल से  पोछ रहा है.पर जीत से खुश है.
 विनिंग गिफ्ट   है ...  शहर के  फेमस चाइनाइज़ रेसटरोनेंट में लंच के  दो कूपन अगले एक हफ्ते तक वेलिड है .
"सन्डे चलोगी .
"मम्मी से पूछना पड़ेगा सन्डे के लिए"
उसके दोस्त उसे आवाज दे रहे है,
"ये कूपन रखो ..अगर मम्मी हाँ बोले तो सन्डे मेरे साथ चलना नहीं तो अपनी किसी फेवरेट सहेली के साथ हो आना ...शनिवार को मेरा मैच है इंजीयरिंग कोलेज से ..
उसने सोच लिया था वो उसके साथ नहीं जायेगी ...कल ही उसे कूपन थमा देंगी .
अगले तीन दिन तक वो क्लास में नहीं आता .....अजीब अहमक है  उसे  गुस्सा आता है ....उसकी गर्लफ्रेंड दिखती है ..उससे पूछू क्या ? नहीं खामखाँ पता नहीं क्या सोचेगी ? पर ये है कहाँ ?
शनिवार सुबह वो अपना काइनेटिक कोलेज में पार्क कर रही है ....कोई  मोटरसाइकिल आकर रूकती है
क्या कहा मम्मी ने ? वही है
वो सर हिलाती है
गुड ....कैंटीन के सामने ठीक एक बजे .......फुर्र से मोटरसाइकिल से गायब .
अजीब आदमी है ! पता नहीं वो इसके साथ क्यों जा रही है .. अपनी गर्लफ्रेंड को क्यों नहीं ले जाता ! वो अपनी "बेस्ट फ्रेंड "की शरण लेती है . डिफेंसिव मत रहना ...."अटैक इस बेस्ट डिफेन्स " वो तुम्हारी आँखों की तारीफ़ करेगा ,तुम्हारे कपड़ो की ....तुम्हारी बात बात में तारीफ़ करेगा भाव मत देना .
सन्डे दोपहर एक बजे कोलेज कैंटीन के सामने
तुम्हारी गर्ल फ्रेंड शहर में नहीं है क्या
गर्लफ्रेंड ?
वो तुम्हारी गर्लफ्रेंड नहीं है ?
साथ घूमने से कोई गर्लफ्रेंड हो जाता है
वो उसे घूरती है ...आधा दिन तुम लोग साथ गुजारते हो .
हम्म .वो अपनी बाईक में झुककर नीचे कुछ चेक करता है
"साथ रहने से प्यार होने की प्रोबेबलिटी ज्यादा होती   है   ".....वो फिर कहती है
वो मुस्कराता है ."लडकियों में "
हाँ लडकियों में ...
जानती हो हम जिसके साथ वक़्त गुजारते है दिल के भीतरे हिस्से से उसके बारे में सब जानते है ."..सब !!
वैसे हम दोनों के बीच बहुत अच्छी अंडर स्टेंडिंग है वो किसी ओर को पसंद करती है ओर हम दोनों के बीच प्यार नहीं होने वाला
वो अब भी बाईक में नीचे झुक कर कुछ कर रहा है
तुम्हारे बारे में  ज्यादातर लोगो की राय अच्छी नहीं है
उसे लगा वो बाईक छोड़कर गुस्से में खड़ा होकर कुछ कहेगा .पर वो नीचे झुका हुआ कहता है
"ओपिनियन पोल" हाईवे के ट्रक ड्राइवर की तरह होते है ..उन पर एतबार नहीं करना चाहिए ...ओर  ये अच्छी  बुरी  चीज़े  बड़ी कमाल की होती है ... शायद पंद्रह साल बाद अच्छा" बुरा" हो जाए ओर बुरा "अच्छा "
फिर नजरे उठकर उसकी आँखों में देखता है ....कभी ड्राइव किया है हाई वे पर
फिर साथ क्यों घूमते हो
हम दोनों एक दूसरे की कम्पनी रेलिश करते है ....दैट्स ईट .
उसने रास्ते में कही ब्रेक नहीं मारे ...बाइक भी तेज नहीं चलायी...वो पिछला हिस्सा पकड़ कर  सेफ डिस्टेंस पर  बैठी रही .पर उसके ड्यू की खुशबु अच्छी है
उसकी बाईक   चाइनीज़ रेस्ट्रोरेन्ट  के बाहर आकर रुकी है
....तुम नॉन वेज खाती हो ?
आई  लव नॉन वेज .मम्मी के हाथ का खायोगे तो उंगलिया चाटते रह जाओगे
वो उसकी ओर देखता है " मैंने अभी अभी रेलिश करना  सीखा है ...एक सीनियर हाँ ओर ना के बीच था तो अपना दुःख बांटने के लिए यहाँ ले आता था.....मै सिर्फ सूप पीता ओर उसकी बात सुनता धीरे धीरे जब  टेस्ट डेवलप हुआ तो उसकी गर्लफ्रेंड ने हाँ बोल दी ओर .....आई ओ दिस टेस्ट टू देयर लव ...
"रेलिश "!! तुम चीजों को रेलिश बहुत करते हो
वो नोट  करती है ..... उसकी एक दिन की बड़ी दाढ़ी  है ग्रीन ग्रीन सी...... शेव बनाकर भी नहीं आया बेवकूफ ! वो होती तो ........
.रेस्तरा में "ओ हंसनी "का इंस्ट्रूमेंटल बज रहा है
मुझे ये गाना बहुत पसंद है वो कहती है
मुझे भी
वो बतलाना  चाहता है   वो अपनी  सो काल्ड  गर्लफ्रेंड के साथ दो बार आया है पर जाने क्यों रुक गया है .इस लड़की के अन्दर  एक अजीब सा इनोसेंस उसे पसंद है ...घर लौटते वक़्त वो याद करती है उसने उसकी तारीफ़ बिलकुल नहीं की वो अपने मैच , क्रिकेट ओर इन्जियार्निंग ओर मेडिकल कोलेज के फर्क की बात करता रहा.....ओर जगजीत सिंह के बारे में ......उसे गजले समझ नहीं आती .

ओ हंसनी मेरी हंसनी
उसके बाद ....उसके काइनेटिक के पास से कोई  तेजी से गुजरता  ओर जोर से   "हैलो"  कहकर डरा देता,
एक सन्डे वो सुबह सुबह  किसी गुरूद्वारे से निकालता  टकरा गया .....यहाँ  ?
 गुरूद्वारे का प्रसाद बहुत अच्छा होता है ...उसने आँख मारी थी .....एक रोज शोर मचाने पर  उसे   क्लास से बाहर निकला गया ...बाहर कैंटीन के सामने वाली दीवार पर उसके पास गुजरते हुए उसने उसे कहा था "क्यों करते हो ऐसा "? बड़े अजीब ढंग से देखता रहा था वो बिना बोले उसे ...देर तक उसकी उन  आंखो ने पीछा नहीं छोड़ा था लड़की का .......दिलवाले  दुलहिनिया ले जायेगे  के टिकट लायी थी  उसकी बेस्ट फ्रेंड ...कितना खुश थी वे तीन चार सहेलिय ....पर पिक्चर हौल में उसे उसकी गर्लफ्रेंड के साथ देखकर जाने क्यों फिल्म में मन नहीं लगा था उसका .
तय कर लिया था उसने आगे से कभी बात नहीं करेगी उससे .
फिर उस रोज  पीठ पर कोई बैग  लादे सड़क पर बाईक  घसीटता मिला था ...क्या हुआ ?
कुछ गड़बड़ है मुझे आगे तक ड्रॉप कर डौगी... मकेनिक तक
वही ड्यू की खुशबु .
उसका बैग उसके पास रह गया था .किसी का बैग खोलना गलत बात है पर  रात को खोल ही लिया उसने .......
.दो  नयी  कैसट ..किशोर कुमार ओर जगजीत  , एक रजिस्टर ...विवियन रिचर्ड्स की बायोग्राफी ओर एक सिगरेट लाइटर.....उस रात वो देर तक  अपने बिस्तर पर वाल्क्मैन लगाकर  सुनती रही......सोते वक़्त आखिरी गाना  उसने दो बार सुना ......." ओ हंसनी .मेरी हंसनी "

AIIMS NEW DELHI
...दो दिन से बुखार था पर उसने पेरासिटामोल खा खा कर उसे चढ़ने नहीं दिया है ...मलेरिया की गोली भी खा ली है ..उसे यहाँ आना था ....पहली बार घर से इतनी  दूर निकली  है .बेस्ट फ्रेंड साथ है शायद इसलिए मम्मी ने भेज दिया है
 देश भर के मेडिकल कोलेज  कल्चरल फेस्टिवल के लिए जुटते है ....उसकी गर्लफ्रेंड भी है पर उसकी  कोई रिलेटिव  है इसलिए रात को ही आती है...उस रोज सब कुतुबमीनार देखने निकले थे..... उसकी तबियत खराब हुई है ..वो उसे    छोड़ ने  आया है ऑटो से उतारते वक़्त वो चक्कर सा महसूस करती है इसलिए उसकी बांह पकड़ लेती है ....कोलेज में  आने के बाद भी वो उसे  गर्ल्स हॉस्टल नहीं ले जाता ग्रायूँड के ठीक सामने पड़ी पत्थर  की बेंचो पर दोनों बैठते है .बिना बात किये देर तलक ..वो  अपनी जेब में  हाथ डालकर अपनी हथेली फैलाता है .
"खाओगी "इन्हें हमारे यहाँ बूंदी कहते है
बूंदी ...वो पीले रंग के उन दानो को देखती है
जानती हो मै बचपन में एक वक़्त में हलवाई बनना चाहता था .....फिर पाइलट  ओर कभी टीचर .......बचपन के  हमारे मकान तक कुछ  आवाजे    .गुरूद्वारे से   आती थी ..कितने घरो को पार करके .गली से मुडके उसकी खिड़की तक ..."गुरुबानी " है  दार  जी  ने  बताया  था  दार जी सब उन्हें  दार जी कहते थे .उनका सब कुछ सफ़ेद था दाढ़ी ,भौंहे , मूंछे सर की पगड़ी .उसके घर से  चौथे मकान पर रहते थे ..
."प्रार्थना रब से बातचीत का जरिया है ".वे कहते
"पर रब से रोज एक ही बातचीत क्यों होती है "  मै  उनसे पूछता था  तो वो जोर जोर से हँसते थे  दार जी बहुत अच्छे  थे हर मंगलवार  मुट्ठी खोलते तो  हाथ में बूंदी के बड़े बड़े दाने निकलते..
वो महसूस करती है जैसे वो एक छोटा बच्चा है ....अपनी  आँखों  में चमक लेकर कुछ कुछ  बताता है  .....वो उसके पास ओर खिसक जाती है
"पहली  बार  दार  जी  के  साथ  मैंने  गली  का  दूसरा  कोना  पार  किया  था  गुरूद्वारे  के  वास्ते   ...., हर इतवार  जानी पहचानी गंधे  वहां होती ....गंध   का भी स्वाद होता है शायद ......आलू की गंध  ,हलवे की गंध ,रोटी  की गंध .हर इतवार वहां मेला सा लगता .बड़ी बड़ी भट्टिया बड़ी बड़ी कढाईया . चने हलवे से मिलकर कितना अच्छा स्वाद देती है .माँ ऐसे कभी नहीं बना पाती .एक रोज पतंग लूटते लूटते मै   गाड़ी के टायर के बीच आ गया  ....पैर की हड्डी गयी ..दार जी सीडिया नहीं चढ़ सकते थे...नीचे खिड़की से आवाजे देते ...एक रोज मेरे सोते सोते  अपने रब के पास चले गए"
वो उसके   नजदीक हो गयी  है इतने की  उसके बदन की खुशबु महसूस कर सकती है .एक अजीब सी गंध ...भली सी ..कभी कभी आप बरसो किसी शख्स के साथ एक तय समय गुजार कर उसे जान नहीं पाते ...हर शख्स के कितने हिस्से है उसका  कौन सा हिस्सा कब खुलता है...वो उसकी बांह पकड़ कर उसके काँधे पे सर रखकर इस धूप में बैठना चाहती है ....बिना लोगो की परवाह किये.....दिल्ली की उस रोज की ये  धूप उसके भीतर तक उतरती है .
पंद्रह दिन बाद का कोई एक बुधवार
वो कैंटीन में उसके पास आयी है
"कैसी हो" वो पूछता है .उसकी ग्रीन दाढ़ी ओर ग्रीन लगने लगी है
वो उसे  घूर कर देखती है .....वो सैंडविच खाने में बिजी है" चाय पियोगी " वो पूछता है
उसे  गुस्सा आता है .उसकी सैंडविच की प्लेट अपनी ओर खींचती है
. .".क्या हुआ ?"
तुम्हे वाकई कोई फर्क नहीं पड़ता ? वो गुस्से में है
किस बात का ?
मै पंद्रह दिनों से तुम्हे इग्नोर कर रही हूँ ...बात नहीं कर रही हूँ ..पूछोगे नहीं क्यों ?
वो उसकी ओर देखता है ...पर पूछता नहीं...... वो फिर भी बतलाती है
पंद्रह दिन पहले मै  गर्ल्स हॉस्टल में गयी थी वहां लडकियों ने कहा .वो रुक गयी है ....सर नीचे झुकाए.....".के तुम "..........तुम कई लडकियों ............
"के साथ सो चूका हूँ " वो चाय के घूँट पीता पीता उसकी बात पूरी करता है ..
वो हामी में सर हिलाती है
"बिना किसी की मर्जी के उसके साथ सोया जा सकता है ? वो चाय का आखिरी घूँट हुए पूछता है 
उसकी चाय आ गयी है .वो चाय में बेवजह चम्मच घुमा रही है .
तुम जिसे मेरी "गर्लफ्रेंड "कहती हो उसमे ओर तुममे यही अंतर है वो कभी मुझसे ये सवाल नहीं पूछती के मै तुमसे क्या बात करता हूँ  ....क्यों करता हूँ
" गर्लफ्रेंड "का बेवाज़िब जिक्र जाने क्यों उसमे गुस्सा भरता है .....तुम उसे हर बार  बीच में क्यों लाते हो ? वो घर से दूर हॉस्टल में है ....मै यहाँ लोकालाईट हूँ....मेरे अपने संस्कार है ....मेरी अपनी घर की कुछ वैल्यू .... मेरी अपनी इनहिबिशन ....मेरा अपना  नजरिया  है अच्छा ओर बुरा ....उसकी आवाज तेज हो गयी है ....कैंटीन में कुछ सर उनकी ओर मुड गये है
एक ख़ामोशी फिर उनके दरमियाँ पसर जाती है
इमोशन हमें "रिड्यूस" करते है....वो कहता है ...फिर उठ गया है ..
.वो  परेशां हो गयी है .वो यहाँ लड़ने नहीं आई थी
वो बाईक स्टार्ट कर रहा है ...वो कैंटीन से बाहर  निकल उसके पीछे पीछे आयी है .उसे "सोरी "कहना चाहती है
पर वो गुस्से में है
"हो सकता है वो  बुरी हो ,पर उसमे एक अच्छी बात है उसने कभी तुम्हे" बुरा "नहीं कहा ......उसके  पास अच्छे बुरे की कोई लिस्ट नहीं है जिसके साइड बार में राईट  का ऑप्शन हो .........ओर हाँ मै "वर्जिन" नहीं हूँ !
वो बाईक स्टार्ट करके चला गया है ओर वो रो पड़ी है
ये प्यार भीतर से बीहड़ ओर खुरदुरा जंगल है जहाँ कई जगह अकेलापन है !
गर याद रहे
इक्जाम ख़त्म हुए है . इंटर्नशिप के पहले छह  महीने इधर उधर की पोस्टिंग में निकल गए है ....अगले तीन महीने की
पोस्टिंग  उसने   दिल्ली ली है कहता है पापा का ओपरेशन होना है .इसलिए उसे तीन महीने वही रहना पड़ेगा इधर वो अपने लिए आये सब रिश्ते वो मना करती है ...एक...दो...तीन !
एक रिश्ता बाहर का है ,माँ के मन में वही अटका है
कही  तुम उससे प्यार  तो करने नहीं लगी ?
नहीं ! वो अपनी माँ से कहती है
शायद ! वो अपनी  बुआ से कहती है
"हाँ" वो अपनी बेस्ट फ्रेंड से कहती है
"उसे मालूम है "?उसकी बेस्ट फ्रेंड पूछती है
शायद !
ओर वो तुझे प्यार करता है ?
शायद ?
"शब्बा खैर " उसकी बेस्ट फ्रेंड सांस लेती है
वो तुम्हारे लिए राईट चोयेस नहीं है ....उसकी बेस्ट फ्रेंड उसे कहती है ....उसकी बुआ भी ......बिना पूछे उसकी माँ भी .....उसका दिमाग भी !
बस उसका दिल अलग बाते कहता है
कुछ दो  महीने अट्ठाईस दिन  कितने अलग होते है
"वो मेरे ज़ज्बात के आधे हिस्से पर  एक वक़्त से  काबिज़  है  बिना मेरी मर्जी के ."वो ट्रेन में अपनी गर्लफ्रेंड से  उसके बारे में कहता है
तुम उससे कह क्यों नहीं देते
मै उसे डिज़र्व नहीं करता ...वो बहुत अच्छी है . मै उसे खराब नहीं करना चाहता
" ओर तुम बहुत बुरे " .पागल ! दिक्कत ये है के उसके दोस्तों की तरह तुमने भी उसे  अच्छा होने का टैग लगा दिया  है ..सब वक़्त को वही पॉज़ कर रहे है  .वो  उसे  उसी तरह से देखना चाहते है जिस तरह से  बरसो से देखते आये है ...सब भूल गए है  उसके पास भी इमोशन है...... नोर्मल इमोशन
वो अपनी दोस्त की बात सुनता है ....ट्रेन के दरवाजे पर खड़े सिगरेट पीते पीते सोचता है   कॉलेज पहुँचते ही उसे कह देगा !!
दो दिन से उसे ढूंढता है.....
वो लॉकर रूम के बाहर दिखती है .अपनी बेस्ट फ्रेंड के साथ
  हाय ....कहाँ हो यार तुम
वो जवाब नहीं देती .उसकी बेस्ट फ्रेंड जवाब देती  है
एक गुड न्यूज़ है ...... इसकी शादी तय हो गयी है ....अगले  तीन महीने  में अमेरिका जा रही है अभी सारे सरटीफिकेट इकठ्ठा करने है ओर तैयारी भी
.वो  सर झुकाए  खड़ी है
 वो कोंग्रेट्स  नहीं कहता
उसकी बेस्ट फ्रेंड आगे बढ़ गयी है ... आवाज दे रही है ....वो उसे देखना भी चाहती है पर अपनी आँखे दिखाना नहीं चाहती .आहिस्ता आहिस्ता चल देती है ......डरती है..  वो  अभी पीछे से आवाज देगा ....रोकेगा ...पर .वो कुछ कहता नहीं .पार्किंग में अपने काइनेटिक के पास आकर वो रोती है .

हते है उसके बाद उस लड़के ने  कभी प्यार नहीं किया ,वो कोलेज की  किसी लड़की के साथ नहीं सोया ,  कोई मैच नहीं खेला ... हॉस्टल  वाले  कहते थे  अगले तीन साल हर सुबह उसके रूम में सबसे   पहला  गाना बजता "ओ हंसनी "!

विलुप्त नहीं होता प्यार ...न बंद होता किसी पैराग्राफ की आखिरी लाइनों में ......फुलस्टॉप लगाकर ,
बचा रह जाता है मेरे तुम्हारे भीतर थोडा थोडा .!!

(.ओर हाँ किसी भी कथा के पात्र काल्पनिक नहीं होते प्रेम कथाओ के तो बिलकुल नहीं)

2011-12-20

....देवदास अब यहाँ नहीं रहते !

 वो  दिसंबर के आखिरी  हफ्तों वाली  सर्द रात थी ..आधी रात मोबाइल ने जगाया था
"दुनिया भर की  लडकिया एक सी होती है प्यार दिल से करती है ओर फैसले दिमाग से ".......उस ओर नशे में रुंधी  आवाज .....
"नीलाभ "??
   ......"तुम्हारी" डेस्टिनी" वाली  सुई अब  मुझपे  आकर रुकी है  " उदास हंसी !
"तू  कहाँ पे है"?  अकेला है या कोई साथ में है ? मै उनीदी आँखों से घडी देखी थी .. फोन के बैक ग्रायूंड में शोर  था  .वो बाहर  था ...यू एस  में  इतने  कडाके  की  ठण्ड  में  .
"मै उससे प्यार करता था यार ...."
इस सवाल का जवाब बरसो से जाने किस तहखाने में दफ़न है ! ! !
"मुझे  लगा उपर वाला मुझे   बाईपास  कर  जायेगा  .....पर उसके पास भी मार्कर है शायद !"
कोई  बात  नहीं  ,वक़्त  ही  है  साला  गुजर  जाएगा  ..नहीं  तो  धक्का  दे  देंगे  इसे .....मैंने  उसे   झूठा  दिलासा  दिया
"साले  खुदा  के  ओफ्फिस  में  घूस  नहीं  चलती तुझे तो मालूम ही है ."
बरसो बाद दुनिया  के  अपने  अपने  हिस्से  में  एक  दूसरे  को  बिना  बताये  हम  फोन  के  दूसरी  तरफ   रोये थे .!
बाज  वक्तो  में  कुछ  ग़म  कित्ते  बड़े  ग़म  मालूम  होते  है .....दिल   के  ग़म  !

 कोई डेड महीना गुजरा   मैंने  ऐहेतियातन  ख़ामोशी  ओढ़  ली ...वो वक़्त  ऐसा ही होता है" इम्तेहानी किस्म" का ....बड़ा तकलीफ देह .....मीलो  दूर तक फैली  ठंडी  सन्नाटो भरी सडको सा ..जो कहाँ ख़त्म होती है दिखता नहीं !
 वो  फिर  फ़ोन  पर  था  ......इस दफे संभला हुआ , थोडा संजीदा
."बैचैन  रहा यहाँ वहां भटका .....हॉस्पिटल  नहीं  गया  .....कुछ दिनों बाद   हॉस्पिटल  गया  तो  एक  16 साल की नीग्रो  लड़की  को  देखा   ....प्रेगनेंट....वो  भी  ट्विन्स  .....हॉस्पिटल स्टाफ ने .बहुत  समझाया  एबोरशन   के लिए ...नहीं  मानी  ...बोली  लड़  लूंगी  ...कर लूंगी .जी लूंगी ........16 साल  की  लड़की  यार  ! ओर  हम  साले   पढ़े  लिखे  आदमी !!....दुनिया  ख़त्म  करे  बैठे  है ! मै  किससे  खौफ जदा हूँ  यार  ...किससे भाग रहा हूँ .....खुद से ."

बीच में वही गैप  जो अक्सर सिगरेट के कश   लेने के दौरान होता है ...

कई  रोज से  अस्पताल में एक बूढ़ा बीमार हालत में था ,आया था तो  तीन दिन तक रोता रहा ..अपने बेटो को याद करके .वे उसे घर में नहीं रखना चाहते .........दो दिन पहले  उसके बेटो को बुलाया गया .कायूँसिलिंग की ...जब वे तैयार हो गए तो अचानक  उस रात  बूढ़े ने मना कर दिया मुझसे बोला  "डॉ वे  अपने भीतर से मेरे लौटने का वेलकम नहीं करते  .....प्रेशर में कर रहे है ,मै ऐसा रिश्ता नहीं चाहता .....

फिर वही गैप.....

" जानते हो उस रात घर लौटते वक़्त मुझे लगा मै भी तो ऐसा ही कर रहा हूँ ......".दूसरा शख्स उस रिश्ते को जारी नहीं रखना चाहता ..ओर मै उसे इस रिश्ते में  रोकना चाहता हूँ क्यों ? क्यूंकि मै उससे प्यार करता हूँ...पर मै ये क्यों नहीं एक्सेप्ट करना चाहता की अब वो मुझसे प्यार नहीं करता ...ये तो एकतरफा प्यार जैसी जिद हुई ना ."

इस बार दो कश वाला गैप ...
"तय कर लिया उसकी फीलिंग की रेस्पेक्ट करूँगा ओर "वी वाल्क लाइक एडल्ट "  !    (एक सांस ).....................मुश्किल था पर सच है ..."

.ऐसा लगा जैसे उसकी  सिगरेट भी ख़त्म हो गयी है ...या उसने खाली जलने  छोड़  दी है ...

"सुन ,डब्लू  .एच .ओ  में  अपलाइ   किया  है  ,,,कुछ  पोसिटिव  साइन  है  निकल  जायूँगा"
"ओर  अमेरिका  .....तेरा तो सपना था ....अब पूरा होने वाला है फिर ....."
"कुछ है जो सपनो से अलग है ....क्या है  ?एक्सप्लेन नहीं कर सकता ..टेम्परेरी है या परमानेंट ... नहीं जानता ..पर कुछ है "........
.वो संजीदा था  उसकी  संजीदगी  के बेकग्राउंड में गम की मिलावट  नहीं था ...एक अजीब सी मजबूती थी ....
"तू ठीक है ना ?
हाँ ....

 जिंदगी की तलबो में  फेरबदल लाजिमी  है ..
सके बाद  मेरे  मोबाइल  में  अजीब अजीब  से   नबर सेव होते फिर बदल जाते ! .अलग अलग देशो से अलग अलग वक्तो में   कई  देश   अफ्रीका नाम्बिया .इथोपिया .. ..इराक ओर न जाने कहाँ कहाँ ...साल दर साल गुजरे....
उसकी बाते   बदलनी  लगी "  जो  दुःख  "मेरे" के दायरे से बाहर हो वो   हमारे लिए   इंडिकेटर   है ....ओर हम सोचते है कोई दूसरा रुक जायेगा"
  पने पिता की खबर सुनकर  सिर्फ तीन दिन के लिए आया था वो...माँ उसकी पहले से नहीं थी....उसके शहर तक जाने में वक़्त लगता है .हम चार घंटे के लिए साथ थे उस दिन. पर बात सिर्फ कुछ मिनटों के लिए हो पायी थी ...उसके घर में कमरे की बालकोनी में .....   .मैंने सिगरेट छोड़ दी है पर मै उससे कहता नहीं . वो अपने हाथ की सिगरेट बात करते करते  आगे बढाता है तो ...पी लेता हूँ
" ये देश बीमार है ... मर रहा है....  डाइगनोस  सब  कर लेते है ...कारणों को भी  पहचान  लेते है पर  कमाल है इसे रोकने के लिए कोई कुछ करता दिखाई नहीं देता  .....उसके पास कहने को बहुत कुछ है ,वो बहुत से चीजों को दुरस्त करना चाहता है !

तरकीबन सात महीने  बाद
 उसके भाई फोन पर है ..मुझे लगा उसकी शादी की बाबत  या भारत  लौट कर आने के बारे में मुझसे कहेगे.......पर उनकी  नाराजगी दूसरी है ........ तुम्हारा  दोस्त पगला गया है ...करोडो की जमीन ट्रस्ट को दे रहा है ....स्कूल चलायेगे ... ज़माना अब वैसा नहीं रहा है....इंडिया के हालात उसे पता नहीं है "
वे ओर भी  बहुत कुछ कहते है ......पर मुझे सुनाई  नहीं देता   !
पिता से  वसीयत में मिली जायदाद .को वो......
 .दुनिया का एक्सपोज़र अपने आप में  एक अलहदा किस्म की किताब है !  तमाम  वक़्त  गुजर जाते है ,ऐसे वक़्त भी जो लगता है गुजरेगे नहीं....

2011-05-25

वो क्या कहते थे तुम जिसे .....प्यार !

"अ" का प्यार-
मेर बाप अब भी मुझे उंगुली पकड़ के चलाना चाहता है ..वो समझता है मुझमे अक्ल नहीं है ....ये मेरी जिंदगी है यार
"....वो पूरे कमरे में   चहलकदमी कर रहा है ..वो जब भी परेशां होता है ..बहुत चलता है ..यहां वहां .बेवजह .सन्डे की सुबह सुबह उसकी एंट्री हुई है ..घडी में आठ बजे है..वार्ड का रायूंड भी है ...
मै मेज पर पड़ी आखिरी सिगरेट को देखता हूँ ..फिर.अलमारी पर टंगे उस ब्लेक बोर्ड को जिस पर रात में मैंने बड़ा बड़ा चोक से लिखा था ..."क्विट स्मोकिंग "
  .तेरा अच्छा है साला ब्रेक अप हो गया इन लफ़डो  से छूट गया ..मै उसे याद दिलाना चाहता हूँ के मेरा ब्रेक अप नहीं हुआ मुझे लड़की ने छोड़ा है ..पर मै सिर्फ सिगरेट सुलगाता हूँ
तू साला मेरी बात भी सुन रहा हूँ या सिर्फ सिगरेट पी रहा है
 
मै उसकी ओर देखने लगा हूँ....

"तुम कवि शायरों का पता नहीं साला कब क्या सोचते रहते हो'.. !  तुम लोगो के  क्या कहते है उसे ....' ज़मीर" को   बेवक्त आने की आदत है ...... !.उसके हाथ में जावेद की तरकश " है ..ये डाइलोग उसने उसके पन्ने  पलटते  हुए बोला है...फिर उसे पलंग पे उछाल दिया है ..पूयर जावेद!
उसका मोबाइल बज उठा है...वो बिना कुछ कहे बात करता बाहर निकल गया है..ठीक वैसे ही जैसे आया था .
पता नहीं मेरा  ज़मीर अब कितने  टके का होगा   !!!!
 "ब ""का प्यार ...
मुझे हाल्फ फ्राई खाने की तलब लगी है
.झोपड़ा केन्टीन पे बाइक खड़ी करता हूं .इस केन्टीन में सिर्फ शोहदे आते है ओर सिगरेट पीने वाले सारे शोहदे होते है! हॉस्टल ओर हॉस्पिटल के बीचो बीच एक टीन  का शेड है...जिसे झोपड़ा केन्टीन कहते है .....ऑर्डर देने की जरुरत नहीं है..उसे मालूम है  मुझे क्या चाहिए ... मै  गुजराती अखबार उठाकर पढने की कोशिश करता हूं .ऐसा नहीं है के गुजराती मुश्किल है पर मैंने कभी सीरयसली सीखने की कोशिश नहीं की ."ब " की मोटर साइकल आकर रुकी है..उसने चाय का ऑर्डर देकर सिगरेट सुलगाई है ..अपने म्यूजिक लाइटर से ...
"रायूंड   हो गया " मै उससे पूछता हूं
हूम..म...उसने लम्बा कश लेकर सिगरेट मेरी ओर बढाई है ...

"नहीं  अभी पी है " मै कहता हूं...
"**** कैसी है" मै उसकी गर्लफ्रेंड के बारे में पूछता हूँ....जो आजकल बरोदा में है .उससे एक साल सीनियर
'ठीक है'
तू गया नहीं ..अमूमन सन्डे वो ट्रेन से बरोदा निकल जाता था ...
साला छुट्टी मिले तो फिर  इमरजेंसी ... एक्जाम टर्म  ..घर जाना चाहता  हूँ.. एक ब्रेक ..थक  गया हूँ
"क्या हुआ "..मै जान गया हूँ वो डिस्टर्ब है ..ये लाइने उसकी नहीं है . 
गुलाब कविताएं रोमांस ..उसी मुझमे वही चाहिए ..वो कम्फर्ट ज़ोन में है यार ..पर  मेरा स्ट्रगलिंग पीरियड है... ..वो अब भी मुझमे  चार साल पुराना  मै ढूंढती  है ....सब कुछ उस के सामने तो है . ऐसे में रोमांस ....एक लम्बा कश....
.केन्टीन वाला हाल्फ फ्राई रख के गया है .समझदार है सिर्फ चुपचाप सुनता है ..मुझे भूख बहुत लगी है ..मै कहना चाहता हूं  ये पाव बासी है पर  सामने वाले की सूरत देखकर पता नहीं क्यों नहीं कहता! ..वो क्यों नहीं समझती....चार  साल का रिश्ता है हमारा पर........उसकी आवाज धीमी हुई है.....कंधे झुक से  गये है .... जानते हो अन्दर से मै डरा हुआ हूँ...पिछले एक महीने से  उसकी बातो में एक ओर बन्दे की तारीफ होती है ...उसकी आवाज की टोन   बदल गयी है या मेरा भ्रम है के  जैसे भर्रा  गयी हो.....मै जानबूझ कर उसके सामने नहीं देखता ...."क्विट स्मोकिंग" को एक दिन ओर आगे बढाकर मै सिगरेट  उसके म्यूजिक लाइटर से जलाता हूँ...खाते खाते .
.मेरा" मेल एगो " इस डर को  उसके आगे............ वो रुक गया है .सिगरेट जल रही है पर वो कश नहीं लेता ......
पर
  प्यार का मतलब समझना भी तो होता है न यार "
 मै  सिगरेट का  बड़ा कश  लेता हूँ.....फिर दूसरा .......लाइटर को  उलट पुलट के देखता हूँ ...ये लाइटर उसकी गर्लेफ्रेंड सिंगापूर से लायी थी ....स्लीक !
 तू  सुन रहा है  ना या सिर्फ सिगरेट पी रहा है .मै उसकी ओर देखता हूं.... पर उसने कवि- शायर के मुताल्लिक कुछ नहीं कहा है !
ब्रेक में "क" की गर्लफ्रेंड
 ...हॉस्पिटल केन्टीन में मै चाय पीते वक़्त अंग्रेजी का अखबार पढने की सोचता हूं ..सूरत में अंग्रेजी अखबार लेट आता है ..चाय के पहला  घूँट भरता हूं....तुम सिगरेट क्यों पीते हो यार ? ‘-“वाली है ....मेरे सामने बैठ गयी है ... मेरी शर्ट के जेब से झांकते पैकेट को देख कुड जाती है.. कहना चाहता हूं  .तुम्हारे बॉय फ्रेंड के वास्ते है उसे वार्ड में देने जाना  है .महँगी  सिगरेट है .साले ने मोबाइल पर फोन करके मंगाई है ..इनकमिंग काल ४ रुपये की है ...सिगरेट २२ की....पर कहता नहीं... जानते हुए भी की ये पैसे कभी वापस नहीं मिलेगे ..उन हालातो में जब आपकी जेब में केवल चालीस रुपये हो.....यूँ भी के ....लोग कहेगे कितने कमीने आदमी हो दोस्ती बड़ी के २६ रुपये !
केन्टीन बॉय उसके लिए चाय रखकर गया है .उसकी टी शर्ट पे "प्ले बॉय ' लिखा है ..! केन्टीन में "वो "आयी है अपने डिपार्टमेंट के साथ ...उससे  आंखे  मिलती है ...उन आंखो में अजीब सा कुछ है ..मै अफ़सोस मनाता हूं के मैंने शेव नहीं बनायीं ..वो हमारे बाए तरफ वाली सीट पर  बैठ  गयी है..उन आँखों में मै फिर देखता हूँ ...वे अब भी मुझे देख रही है 
उधर देखने का कोई फायदा नहीं ..वो फिक्स है "क" वाली ने जैसे मेरी मूवमेंट  को पकड़ लिया है
(फिक्स ! पर उसकी आँखे तो कुछ ओर बोलती है .)
 "हमारी शादी की डेट भी नक्की  हो गयी है ."क वाली  बोले जा रही है .नक्की गुजराती वर्ड है ...मै उन आँखों से फिर टकराता हूं...बड़ी बड़ी  आँखे ... .(ऐ खुदा  फिक्स वालो की आँखे इतनी स्टेयरनिंग तो नहीं होती.)
वैसे तुम क्या सजेस्ट करते हो..मैरून कलर का लहंगा ठीक रहेगा ...क वाली शादी में इन्वोल्व है....पर '.वे आँखे ' सीट से उठ गयी है ....उसने सीट से उठते उठते मुझे फिर देखा है ....मै भी उठ गया हूं .बाय कहकर ...सोच रहा हूं" क" को सिगरेट का पैकेट देते वक़्त कहूँगा "अब भी वक़्त है सोच ले '...पर बिना कहे ही सिगरेट का पैकेट दे आया हूं ..जेब में अब केवल १८ रुपये है .
"स" का प्यार जैसा कुछ  -
पूरा कोलेज मानता था  के वो पिछले दो सालो से कोलेज की सबसे सेक्सी लड़की  के साथ है ! मै  भी ! पर मेरी उसकी दोस्ती उससे कही पहले  थी . वो बहुत खूबसूरत तो नहीं था पर उसे  भीड़ में  भी इग्नोर नहीं किया जा  सकता था . ...झूठ बोलने का भी एक सलीका होता है ...कोंफिड़ेंस..."स " उसमे माहिर है ..पर वो ये आर्ट सिर्फ लडकियों ओर टीचरों के आगे दिखता है दोस्तों के आगे नहीं...... पीकर तो बिलकुल नहीं! ...वो रूम में शिवास लेकर आया है ..सूरत में ..शिवास मिलना एक लक्ज़री है ..ट्रेन में सूटकेस में कई कपड़ो के  नीचे दबा कर लाया है ..कहता है पापा ने गिफ्ट की है ..मुझे अपने याद आते है .सिगरेट का पता चलेगा तो बन्दूक निकाल लेगे ...

उसका तीसरा है ..ओर मेरा दूसरा ..मै  अपने ग्लास में आइस डालता हूं....मेरी औकात  दो तक की है ओर मुझे मालूम है ..कमरे में छोटा  फ्रिज भी एक लोकालाईट ने रखा है इसी वास्ते ...
"रिलेशन शिप में कभी कभी आप उबने लगते हो '..अचानक उसकी   बातो  का दायरा  बदलने  लगा है ..अपना स्पेस ढूँढने की छटपटाहट सी होती है ..तुझे कभी ऐसा नहीं लगा ..वो मुझसे पूछता है मै जवाब नहीं देता सिर्फ मुस्कराता हूँ..
"साली दुनिया सोचती है मै कोलेज की सबसे सेक्सी लड़की के साथ घूम रहा हूँ...पर कोई मुझसे पूछे ..'
मै उसकी ओर देखता हूँ ...
गर कोई मुझसे पूछे उसके साथ जिंदगी गुजार लेगा ..तो ईमानदारी से कहूँ डर लगता है यार
मुझे सिगरेट जलाने पड़ेगी ....ऐसे  फिलोस्फिकल माहोल में वो बड़ा सहारा देती है !
मुझसे उसपे यकीन नहीं है यार !
 "उसने तुझसे शादी के लिए कहा .क्या" मै पूछता हूं .
नहीं 
गर पूछेगी तो ....उसका डर है !
गर न पूछे तो
?
वो भी हर्ट  करेगा ..
..ब्लेक बोर्ड हवा से हिला है ..सोचता हूं उसके जाने के बाद  क्विट स्मोकिंग मिटा दूंगा ..पिछले तीन हफ्ते में चौथी बार मिटाया है .केसेट ख़त्म हो गयी है ...मै उठकर पलटता हूं उसका पैग ख़त्म हो गया है .वो आगे कुछ नहीं बताना चाहता .न मै उससे पूछना .

लिखा था जिस किताब में इश्क तो हराम है ...

सुबह मोबाइल के अलार्म ने आँख खोली है ..फोन उठाकर बंद करता हूं..उनीदी आँखों से  एक मेसेज दिखता है ... ....मेरी एक्स  का मेसेज है ..."
  मिलना चाहती हूं..मिलोगे"
मै फिर से तकिये में मुंह छिपाकर सो जाता हूं .


 ये तसल्ली है की इसे वो नहीं पढेगी.....जो कभी पढ़कर  "किसी" से कहा करती थी "तुम्हारे दोस्त की कहानियो में इतनी सिगरेटे क्यों आती है !

2010-08-15

"चिरकुटाई की डेमोक्रेसी'

गुप्ता जी सुबह  सुबह अपनी नयी गाडी दिखाते है ..." सेक्सी" ....मै कहता हूँ ... उनका सत्रह साल का लड़का मुझे हैरानी से देखता है ...दस बारह साल हॉस्टल में रहने के बाद हर शानदार चीज़ को सेक्सी कहने का आदत को डीज़ोल्व  होने  में काफी  वक़्त लगता है .........सभ्य  समाज  की अपनी शिष्ट  भाषाये  है ... उन दिनों   ढाबे की तड़का दाल से लेकर ....  अलेन सोली की व्हाईट  शर्ट  सेक्सी होती थी.....
फिर तुम लोग "असल" से कैसे डिफरेनशियेट करते हो .... उन दिनों  लडकिया पूछती ...
हो जाता है..यार .....
सभ्य समाज की कई अजीब सी मुश्किलें भी है ....पुणे के उस पांच सितारा होटल में मेरे साथ ठहरे डॉ साहब फ्लाईट के  उतरने के बाद से  ही  परेशान है ...उम्र में मुझसे पंद्रह साल बढे वे कमरे में चहलकदमी कर रहे है ....क्या हुआ बॉस  ?मै पूछता हूँ......
यू पी में मेडिकल में सीनियर को बॉस कहा जाता है
इतना बड़ा होटल है  ...ओर एक भी इन्डियन टोइलेट नहीं... है.
आख़िरकार अगली सुबह
   कोंफ्रेस  हौल के ऑडीटोरियम के पीछे एक इन्डियन टोइलेट मिल जाता है   ओर उनकी जीवन में दिलचस्पी पुनः जाग जाती हैवे अक्सर कोंफ्रेस में मेरे रूम मेट रहते है ....इंदोर की उस यात्रा में भी वो मेरे साथ है. डॉ साहब इंदोर के  सियाजी होटल में रिसेप्शन पर इंडियन टोइलेट की बाबत सुझाव पुस्तिका में अपनी राय दर्ज करते है .... ...........इस देश के उन सभी होटले में जहाँ जहाँ वे ठहरे  सुझाव पुस्तिका  पर उनकी इस बाबत राय दर्ज है .....
ऊपर कमरे में पहुंचकर सूटकेस खोलते ही ..मै जान जाता हूँ एक बहुत आवश्यक चीज़ पेक करनी भूल गया हूँ .....अंडरवियर!!
...कांग्रेंस हौल से लौटते  वक़्त ..रास्ते में ले लेगे .वे सुझाव देते है .....
वापसी में वो ड्राइवर को
वेस्ट साइड के आगे रोकने पर मुझे  हैरानी से   कहते है .... यहाँ
डिजायनर  यही मिलते है ..
डिजायनर?

तो आपके ज़माने में भी तो होते थे ....अलग अलग पट्टियों वाले ....मै कंधे उचका  देता हूँ
पंद्रह मिनट  से ज्यादा वक़्त लगने पर वे हैरान होते है ...इसमें इतना क्या सोचना भाई?कोई भी  उठायो ओर चल दो …..
रचनात्मक दृष्टिकोण से देखे तो ये विचारो  में परिवर्तन है.......ओर आम भाषा में कहे .....जाने दे...हर चीज़ को कहना जरूरी  तो  नहीं है....
बिल की लाइन में  ठीक हमारे  आगे सफ़ेद शर्ट ओर जींस पहने एक  सेक्सी .कन्या खड़ी है .....कुछ सेकण्ड बीतते  ही  वे  इतनी  जोर  से  डकार लेती  है  के  हम थोडा पीछे हट जाते है ..सोचते है शायद "एक्सम्यूस-  मी कहेगी...पर लगता है किसी सरकारी स्कूल की पढ़ी हुई है .जहाँ ये कहना नहीं सिखाया जाता......

  सी कोंफ्रेंस के कुछ ओर संभावित खतरे भी है . …... .....साइड इफेक्ट्स .....ऐसे ही एक  बड़े खतरे हमें लिफ्ट  में टकराते है .... हमारे  एक सीनियर ... चिरकुटाई के भी वीर होते है ..... ये उन लोगो में से है…. जिनको सामने देख आप ऊपर वाले से कहते है ..".ये क्या . खुदा अब भी. बिना चेतावनी के फायर..." .... 
  उनके .मुंह में कुछ  है.. ..पिछले नौ सालो से  उनके मुंह को कभी  खाली नहीं देखा है.... उनका मानना है  के गाली एक तरह की अप्रत्यक्ष श्रदांजलि   है ......भरी भीड़ में भी वे आपको श्रदा के सुमन जोर से अर्पित करते है ..... लिफ्ट बड़ी जालिम  शै  है ...हमें उस दिन अहसास होता हैछिपाने की.तमाम कोशिशो के बावजूद हमारे हाथ में  किताब पर उनकी निगाह गयी है.
"#**साले अभी भी कविता लिखते हो.....
 गोया  कविता  लिखना  कितनी  फिजूल  बात  है .हाउ बोरिंग ! हम आत्म ग्लानि सी महसूस करते है
"#** 'इता टाइम कहाँ से निकाल लेते हो "...उनका अगला सवाल है  
जिसका  सीधा  सा  हिंदी  तजुर्मा  ये   है  के  आप   इत्ते  ठलुवे   है  .
"#** देखे कौन सी किताब है "....वे जबरिया किताब हथिया लेते है ....मोहन दास ए  ट्रू स्टोरी ऑफ़ ए मेन,हिज़ पीपुल एंड हिज़ एम्पायर -राजमोहन गांधी ......पीछे पलटकर प्राइस टेग देखते है .
". #**गांधी  पे साडे  छह  सौ रुपये  खर्च  करते हो...."
साथ में उनकी पत्नी यूँ हमें देखती है जैसे कृषि दर्शन देख रही  हो ..
. ये  पान आप लाये कहाँ से  ..इस एरिया में तो मिलता नहीं .हम पूछना  चाहते है.पर पूछते  नहीं .इससे  वार्तालाप आगे बढ़ने का खतरा है .. .....
१६ सालो .. ने उन्हें अब भी नहीं बदला है....चिरकुटई उम्र की पाबन्दी नहीं मानती है ...न लिंग भेद में विश्वास रखती है ....उनकी पत्नी को गौर से देख हम सोचते है के क्या ये कंटाजीयस भी होती है .... हम अब भी  सोच रहे के कौन से सूत्रों से इसके कंटाजीयस होने की तस्दीक की जाए ….यूँ भी इश्क के एक्सपर्ट  हमारे  शुक्ला जी कहते थे ..जब आपकी प्रेमिका आपकी नजरो से दुनिया को देखने लगे तो  प्यार की थ्योरी  को कन्फर्म मान कर नीचे हेंस प्रूव्ड लिखा जा सकता है.....वैसे  हिन्दुस्तान  एक ऐसा देश है  जिसमे ....शादी के बाद  प्यार का प्रतिशत सबसे ज्यादा है ....
मुफ्त की दारु को सूंघने की उनके भीतर विरल शक्ति थी....गोंड गिफ्टेड .. . सूंघते हुए पहुँच जाते  ...फिर इत्ती पीते  . के स्टोक कम पड़ जाता .. रायता फैलाने के कई अवार्ड लगातार उनकी झोली में थे .... कितने वाश बेसिन उनकी गंध से आज भी गंधा रहे है कई पार्टियों के  वे  निर्विवाद  ' क्यूरेटर' रहे ….उनका मानना  था के कोई भी पार्टी  उनकी गैरमौजूदगी में फीकी सी रहती है ...अपनी रचनात्मक भूमिका के लिए वे सदैव आश्वस्तकारी रहे .मुद्राये जुटाकर पार्टी में योगदान को उन्होंने गतिरोध का हिस्सा माना………सामूहिक  अनुभव में  आनंद लेने की इस प्रक्रिया को लेकर उनका मौलिक द्रष्टिकोण अब भी बचा हुआ है .....
किसी ने कहा था के हमें अपने सदगुणों का पता अपने दोस्तों से चलता है ओर दुर्गणों का अपने दुश्मनों से ...वक़्त के मुताबिक  इसे मोडिफाई करने की जरुरत  है 
"#**कहाँ ठहरे हो?" ....वे पूछते है
हम हालात को  तकाजे में तौल कर झूठ का दरवाजे को पकड़ते है ....झूठ  बोलने का सबस बड़ा फायदा ये है की   ये बड़ी स्ट्रेचेबल   चीज़ है ....कितना खीच लो ...बस नुकसान ये  है के  याद  रखना पड़ता है ..... कहाँ कितना खींचा था ……
लिफ्ट रुकी है ...
वे नजदीक आते है .......फिर
  धीरे से फुसफुसाते है ..."#**कोई प्रोग्राम  हो तो  बताना ...."
दरवाजे को पकड़ कर वे फिर मुड़े है
...वैसे ये#** राजमोहन गांधी कौन है..कोई रिलेटिव लगते है गांधी के
 उस रात   हमारे साथ वाले डॉ साहब  अगले दिन  वहां के रजवाड़ा बाज़ार में  कुछ चीज़े देखते है .....ओर मै नब्ज़ देखकर रोग बताने वाली दुकान को ...... सोचता हूँ जाकर ट्राई  कर आयूं पर वे डपट देते है….
ख्यालो  की डेमोक्रेसी देश में भले ही न हो पर  चिरकुटई की कई  दुकाने खुली हुई है ......


पुनश्च : १ ५ अगस्त की रात जब देशभक्ति का ओवर फ्लो हो रहा है मै ऐसा क्यों लिख रहा हूँ......कारण ...नयी तकनीक  के भी कुछ साइड इफेक्ट्स है ...  फेस बुक . ..  अपने मेसेज बॉक्स में  मुंह में मसाले भरी उनकी सूरत का दीदार कराती है .दाई ओर लिखा हुआ है." #**  साले फ्रेंड रिक्वेस्ट  भेजी  है ...एक्सेप्ट क्यों नहीं करते ! खुदा ने अपनी गन फिर लोड कर ली है ... डिशकयूं ...........

नोट- चिरकुट इस देश की नेशनल गाली का शिष्ट अनुवाद है

2010-02-05

पिछली तारीख के आइनों का डीप फ्रीजर

चिरकुट" दरअसल हमारे देश की एक नेशनल गाली का शिष्ट अनुवाद है ...हम इसके अविष्कारक को रोज मन ही मन सैल्यूट ठोक देते है ..कितना आसान है न गला फाड़ कर चिल्लाकर कहना ..."अबे चिरकुट"....कोई बुरा मानने से पहले पडोसी से पूछेगा "चिरकुट माने "?
कल रात हम उंघियाये से  हम वैसे ही  सिल्वेस्टर इस्टालिन  की एक मूवी देख रहे थे ..."डिमोलीशन मेन"  कई सालो बाद फ्रीज करके रखा पोलिस वाला ओपन किया  जाता है ..उस नए युग में  .जहां गाली देना अपराध है ......एक ठो गाली. पे फ़ौरन मशीन हरकत में आ जाती है .ओर आप पे जुर्माने की पर्ची कट जाती है ....सोचता हूं  गर हमारे यू. पी में वो मशीन आ जाये .तो ओवर लोड  से कुछ ही घंटे में क्रेश हो जायेगी...जहां दिन की शुरुआत ही...भेन ###...से होती है .....अगर पेशेंस  का  भी  कोई  नोबेल  प्राइज़  होता  तो यक़ीनन   हिन्दुस्तान के बस  ड्राईवरो  के पास कई ट्रोफी  जमा  होती ... ..कोई भी कही से निकल जाता है ...
एक ओर हाई -वे होता है ...दुनिया दारी का .....जिस  पे  चलने   के  लिए वैसे भी  जमीर को   स्टेपनी के टायर सा लटका  कर चलना पड़ता   है ..खुदा  भी  कोई  इंडिकेटर नहीं   देता ......कम ही लोग होते है ...जो अपनी  गड्डी  के पीछे लिखते  है "आपां तो ऐसे ही चलेगे "....
.खैर ......यूँ भी  साला  आदमी इच्छायो का डिवाइस है ....एक अभी ख़त्म नहीं होती के दूसरी सर उठाने लगती है .....शुक्र है ..यादो  का हैंगओवर  हेडेक  नहीं  करता ....पर  जल्दी नहीं उतरता .... 
आज वही है...... मारी लोबी के  ठीक बीचों बीच मुस्कराती हुई  बड़ी मेहनत से पैंट की हुई एक रिंग बेल थी .... , जिस पर ये लिखा था.... ‘.
keep your finger here and say loudly “ding-dong”…
मैं  अब भी  अक्सर उसे  दबा देता हूँ…....

ससे पहले मुलाकात कब हुई थी याद नही ,दोस्ती कैसी हुई .....ये भी याद नही वो मुझसे ४ साल सीनियर थे  उसके मुताबिक हम मे दो चीजे कॉमन थी एक तो नॉर्थ इंडियन होना दूसरा एरियन  होना ,मैं मार्च के आखिरी हफ्ते की पैदाइश हूँ ओर वो अप्रिल के पहले हफ्ते की.... बाकी हम दोनों में ओर कई बड़े अंतर थे मसलन के iq मे ….वो १४४ का लेकर पैदा हुए थे ओर हम सामान्य …खैर हमारी दोस्ती हुई ओर हमने उनसे उधार मांग कर खूब अंग्रेजी नोवल पढे ओर अंग्रेजी की जुदा -जुदा किस्मों की गालिया सीखी ....जब कभी हमारा फोरेन की सिगरेट पीने का मन होता हम उनके उपरी मंजिल के  कमरे में जा धमकते ..वे न केवल हमें एक ठो विदेसी सिगरेट पिलाते बल्कि हमारी बेहूदा कविताएं भी बड़ी तसल्ली से सुनते .....कहते है वक़्त ने सबकी स्क्रिप्ट लिख रखी है....हम  खामखाँ ही इतराते फिरते  है ...एक ही होस्टल की एक ही कॉलेज की अपनी अपनी जुदा दुनिया  होती है ..फिर उसकी .जुदा गलिया..अपनी अपनी गलियों में रुकते -गिरते- भागते -दौड़ते कुछ साल गुजर गये..........


उन्होंने उन हालात ओर उन वक्तों मे “ओर्थोपेडिक “ मे पी. जी मे ज्वाइन लिया ......जब इस ब्रांच मे जाना इराक मे युद्ध पर जाने जैसा ही था ,काम का बोझ ,सीनियरों की मार ,मानसिक प्रताड़ना ......नींद की कमी ,ओर तमाम अनगिनत दूसरे कारण थे जिसके मद्देनजर बहुत से लोग बीच मे ही डिपार्टमेंट छोड़ भाग जाते थे या अगले साल किसी दूसरी ब्रांच मे एडमिशन लेते थे । हम सब को लगा की ये दुबला पतला लड़का दम तोड़ देगा या भाग जायेगा.....कुछ महीनो की खामोशी के बाद ... अब आधी रात को होस्टल का फोन बजता (तब हॉस्पिटल ओर होस्टल के दरमियाँ इंटर कनेक्टेड फोन हुआ करता था..........

फोन पर उनकी फुसफुसाती हुई आवाज होती “ ,बहुत भूख लगी है ..... इतनी रातो को सूरत शहर मे दो ही जगह कुछ खाने को मिल सकता था या तो शहर के 5 सितारा होटल मे या रेलवे स्टेशन मे ...... तो  औकात के मुताबिक ५ किलोमीटर दूर रेलवे स्टेशन चुना जाता ..मेनू में सिर्फ अंडे की वेरायटी होती ......कोई भी दो जने कुछ लेकर आते , हॉस्पिटल की चोथी मंजिल पे सुनसान से गलियारे मे या किसी कोने मे वो पाव ओर ओम्लेट ठूस ठूस के खाते ओर गोल्ड -फ्लेक के इतने लंबे कश लेकर पीते.....जैसे फांसी पे चढ़े किसी कैदी को आखिरी सिगरेट दी जा राही हो....... तब उनके बदन से एक अजीब सी गंध आती.....यूँ भी हर वार्ड की अपनी एक गंध होती है उसके जिस्म मे भी वही होती ,...... ,उस दौरान भी उसका सेंस ऑफ़ ह्यूमर जिंदा रहता । “कोई शेर है इस मौके पे आर्या ? उन्होंने मुझे कभी अनुराग नही कहा आज भी नही बुलाते ..... फ़िर वे अंधेरे मे तेजी से घूम हो जाते.................


होस्टल के कमरों की चभिया या तो बाथरूम की दीवारों  पे ओंधी पड़ी मिलती है ..  .या खास कोनो  मे उंघती ...... दोस्तो को ठियो की ख़बर रहती.है .. ......कई बार जब हम कोई लेट मूवी देखकर लौटते तो फर्श पे एक गंधाई शर्ट मुंह चिडाती मिलती ...ओर अलमारी  से  कोई खाली हेंगर बिस्तर पर ...  ....ये वर्मा जी की आमद का साइन होता.......ओर ..मुश्किलों के ऐसे कई दौर  पी जी के जो  से गुजरने के बाद ....वे सीनियर हुए ...... फ़िर पास भी...हो गये ...... ओर नजदीक के कम आबादी  वाले उस शहर दमन के एक  हॉस्पिटल से जुड़ गये  … "ड्राई  -स्टेट" में रहने  के कारण   हम दोस्तों ने   उसे   "वेट सिटी "का  तक्खलुस  भी  दिया था ..... दिलजले ओर प्यार  में टूटे  आशिक वहां के दरिया में अक्सर अपना गम उड़ेल आते ..अलबत्ता गम में  अपनी अपनी केपिसिटी के मुताबिक किसी ओर चीज को भी मिक्स करते ......खैर

क़्त ने  फिर  पहिया  घुमाया .... ओर हमने पी .जी ज्वाइन की , इधर पिताश्री रोज हमे कोई नया रिश्ता बताते ओर हम रोज उसमे कोई नुक्स निकालकर मना कर देते ,  जब हम में ओर पिताश्री मे  फोनिया कोल्ड- वार शुरू होकर लम्बी खिंची तो एज यूजवल माताश्री ने  संधि दूत के  अपने रोल  में एंट्री ली ... .....ओर हमने उस शान्ति -प्रक्रिया के तहत एक लड़की से मिलने की हामी भर दी.....पता लगा लड़की दमन में है....... …. …..हमें लड़की से ज्यादा वर्मा जी से मिलने की उत्सुकता थी.....वर्मा जी होटल की उस औपचारिक मुलाकात में हमारे साथ रहे .....  ...  
वापसी में हम दोनों डगमगाते हुए उनकी फटफटिया पे उनके नए नए खरीदे फ्लेट पे पहुंचे....चूंकि भाभी श्री अपनी पी. जी के सिलसिले मे कही ओर  थी , तो वर्मा जी भी" बेचुलराई- जीवन" का आनंद ले रहे थे ..  ,उन्होंने महँगी वाइन खोली ....फर्श पे गद्दा डाला..ओर होस्टल की पुरानी रवायत के मुताबिक .जगजीत सिंह  भी महफ़िल में शरीक हुए ....कुछ पुरानी ओर नयी यादो के कोकटेल बना....गोल्ड फ्लेक  की फेक्ट्री से निकले  धुंए फेफड़ो में भीतर  गये ...  ...फ़िर अचानक हमारे वर्मा जी उठे ओर बोले “चल “.....वे आगे आगे हम उनके पीछे -पीछे .....वे दूसरे कमरे के दरवाजे पे खड़े हुए..एक बड़ा ताला हमारे ओर  कमरे के दरमियां था ...कुछ देर ताले से जूझने के बाद  दरवाजा खुला  ..पूरा कमरा खाली ..  बीचों-बीच एक काले रंग का बड़ा सा सूटकेस.......उन्होंने उसे खोला ..वही हरे कागज जो  दुनिया चलाते है .....
"आर्या जितने चाहिए ले ले "मैं हंस पड़ा था ,...वर्मा जी सेंटिया गये थे .....
.बकोल उनके  "सेंटियाना" एरियन  के   जींस  में  होता  है ...ओर उसके जन्म प्रमाण पत्र में बोल्ड अक्षरों से लिखा हुआ ...... 
ब्रेकेट  में .कहूं तो  .....हम दोनों   एरियन  है  
वो किसी फ़िल्मी शोट के माफिक था ....पर बिलकुल सच्चा ....खालिस सच्चा .....
वर्मा जी मेहनती थे ,अपनी काबिलयत के कारण जल्दी ही ख्याति पा गए ओर अच्छी खासी प्रक्टिस भी अर्जित कर ली...पर जैसा की अक्सर होता है
यरपोर्ट से फोन करना उनकी फितरत है ....खास तौर से तब जब वे देश छोड़कर परदेस जा रहे होते है ..
एक  दिन  मोबाइल बज उठा
“यार बाहर जा रहा हूँ
“क्यों ?इतनी अच्छी प्रक्टिस छोड़ कर ?
बस कुछ ओर करना  है
कुछ लोग  लोग मूडी होते है ओर बैचेन भी....   ."आपां तो ऐसे ही चलेगे " .वाले .ओर वर्मा जी उड़ लिए ...“,........कुछ साल वहां बिताकर अहमदाबाद के अपोलो मे ज्वाइन किया ही था की ...
फिर एक रोज उनका फोन आया “जा रहा हूँ”
कहाँ पूछना.. सवाल को पूरा करने की रस्म भर  होता है ....
ओर वर्मा जी ब्रिटेन उड़ लिए .अब सुना है  ..... परमानेंटली वही बसने जा रहे है ...
 
न हाल -चाल पूछा ना सलाम किया
जाने क्या बदल गया मेरी सूरत मे ......


पिछली तारीख के आइने बेखबर हो गये

2009-07-16

वही ....इशक की बाइलोजी


इश्क एक ऐसा गुनाह है जिसकी " ग्लोबल स्वीक्रति" है ...पुरानी फाइलों को अगर तरतीब से टटोला जाये तो हर आदमी का हलफनामा कही न कही किसी कोने में पड़ा जरूर मिलेगा ..... कितने साल बीत गये पर आज भी इश्क ओर शराब ये दो ऐसे नशे है जिसमे "हाई" होने के बाद के कुछ डाइलोग आज भी बरसो बाद वैसे ही है ... ओर" हैंग ओवर" के बाद के भी ..
मोहब्बत ही ऐसी शै है जिसे करने की कोई वजह नहीं होती....यूँ भी हर पेचीदा इश्क की बुनियाद में वही सादा दिल होता है … सपोटिंग रोल में कुछ हमदर्द दोस्त ….…..सिगरेटों के ठूंठे .. जगजीत सिंह ओर एक हेंड्ससम सा रकीब …...कोई साहब पहले कह गये है की " जिंदगी बीस से तीस साल तक किसी रोमंटिक फिल्म की माफिक होती है .....उसके बाद एक आर्ट फिल्म.....यथार्थ सिनेमा.....
क्रिकेट की तरह इश्क भी अनिश्चितताओं से भरा है… कॉलेज के दस सालो मे हमने कई ऐसे जोडो को बनते देखा ....जो एक दूसरे के नाम पे तलवार निकाल लिया करते थे .. ओर वो लड़किया जिसके पास से गुज़रते हुए …हम अक्सर सोचते थे की कितनी गंभीर लड़की है,……पता नही हँसती भी होंगी या नही, ……बाद में घर वालो से विद्रोह कर ऐसी क्रान्तिकारना शादी करती की ....आप लाइफ की थ्योरी में फिर एक संशोधन करते .
"अब ओर नहीं " वाली कसम ..ठीक वैसी सी होती ...… जैसे नया नया पीने वाला अक्सर हैंग ओवर की अगली सुबह में कहता है …., वैसे भी कसमो की उम्र कभी लम्बी नहीं रहती फिर ..इश्क की सबसे बड़ी खासियत है की आप इसमें दकियानूस नहीं होते …कसमे टूटने से कोई आसमान गिरता है भला.....
.. मैथ्स के आलावा कुछ चीजे ओर भी हमें जिंदगी में कभी समझ नहीं आयी ..मसलन की फिल्मो में विलेन रेप से पहले हँसता क्यों है …? मसलन विनोद मेहरा हमेशा अपनी कमीज के चार बटन खुले ..क्यों रखते थे ….मसलन .सचिन स्ट्राइक लेने से पहले अक्सर एल गार्ड की पोजीशन काहे ठीक करते है...मसलन . परपोज़ करना इतना मुश्किल क्यों है ? आप कितने ही बड़े तीसमार खान हो …आप कितनी भी रिहर्सल कर ले ....स्टेज पे रहकर आपने हजारो दर्शको का सामना किया हो... …कॉलेज में आपके नाम पे आत्मविश्वास की कसमे खायी जाती हो.. ..वहां जाकर आप मै मै करके मिमियागे ही …आपका दिल पसलियों से बाहर आएगा ही ….. .वो फराज साहब कहते है न ..
"उससे मिले तो जोमे -तक्काल्लुम के बावजूद
जों सोचकर गये थे वही अक्सर न कहा".....
जोमे -तकल्लुम का मतलब है संवाद की आतुरता यानि की बातचीत की तगड़ी ख्वाहिश …..इश्क में आप अक्सर वही नहीं कहते जो आपको कहना होता है.....पर हर कोई फराज साहब से इत्तेफाक रखे ऐसा जरूरी नहीं ..
मसलन हमसे दो साल सीनियर ....पटेल...भावुकता के अन्यतम विरोधी ...वक़्त की कीमत को भारी तवज्जो देते थे ..सीधे सीधे जाकर .....खल्लास ....
मसलन पटेल साहब के लोबी मेट सांकला जी .....ठीक उनके कमरे के सामने उनका कमरा था..... "मुझे हो गया है प्यार" गर उस वक़्त रिलीज हुआ होता यकीनन उनकी लाइफ में कई बार बेक ग्रायुंड में बजा होता ...धुर इमोशनल आदमी....सेंटीयाना उनकी फितरत में था...हर छह महीने बाद सेंटीया जाते.....ओर हर बार ...मकाम पूछने पे ... वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन .......उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा .....ठंडी आह भरकर गुनगुना देते ..साहिर के "इस मोड़" पे वे करीब आधा दर्जन बार पहुंचे .....ओर इसी मुख्तसर सी ख्वाहिश .सीने में ...लिए कॉलेज से विदा हुए ...
या अपने बंगाली बाबू जो "यूनिक इंटेलिजेंस "की तलाश में आठ साल भटकते रहे.....जब भी पटेल साहब ओर उनका सामना होता पटेल साहब उन्हें धकिया देते ...साले मोहब्बत भी मार्क शीट देखकर करोगे........
किस्सा कोताह ये के ....तफसील से सुनाने बैठे तो एक अदद "वार एंड पीस" ठो मोटा उपन्यास तैयार हो जाए ...
सुनते है अब वक़्त बहुत बदल गया है.....कागज की पर्चियों के बदले बेगारी .एस एम् एस ने ले ली है...उन दिनों इजहारे -मोहब्बत के बाद अमूमन एक डाइलोग यूँ होता था ....
मैंने तुम्हे कभी इस नजर से नहीं देखा......क्या हम अच्छे दोस्त नहीं रह सकते......पता नहीं आजकल कौन सा जुमला पैट्रन में है.....
इधर मौसम भी ..... रोमानटीकाना है पिछले दो दिनों से ..बारिश का..मेनिफेस्टो जैसा कुछ है............काम करने का मन नहीं है... " कमीने" का सोंग वैसे ही दो दिनों से बज रहा है कानो में.....टेन टेंड.....टेन ...टेड .... ......

कासिद बनकर आया है बादल
कुछ पुराने रिश्ते साथ लाया है …….

आसमान से आज कई यादे गिरेंगी



इसी मुए इश्क के कुछ किस्से यहाँ भी है...

2009-06-16

अबे सुन बे गुलाब !


जब रोज़ कमेटी में हमारा नाम शुमार हुआ ... जाट गंभीर से दिखे ..हम चिंतित हो गये .उनके गंभीर होने का मतलब किसी घटना के होने का आसार था..पिछली बार जब वे गंभीर हुये थे तब डॉ देसाई की लड़की को प्रपोज़ कर आये थे .वो तो शुक्र था की की उनकी ठेठ हरयाणवी उसकी समझ नहीं आयी थी .ओर वो उसे कोई लोक-गीत समझ सारु छे .... सारु छे ...करती रह गयी थी ....
उन्होंने गंभीरता से रोज़ डे के पोस्टर के आगे खड़े होकर अलग अलग एंगल से पोज़ दिये....हमारी छठी सेंस का एंटीना सिग्नल देने लगा ...शाम को जब हम कमेटी के चार मेंबर काम करने की रणनीति को लेकर डिस्कस कर रहे थे .जाट उसी गंभीर मुद्रा में अवतरित हुये ....
डिसकाऊंट कित्ता है .... उन्होंने पूछा .
ओह कम ओन प्रदीप ये रोज है मेरे साथ रोज कमेटी में शामिल लड़की बोली.....
.कोई स्कीम ....दो पे एक फ्री जैसी ....जाट
रोज में डिसकाऊंट ??? कितने अनरोमांटिक हो ... लड़की ने मुंह बनाया .....
तुम्हे कितने रोज चाहिए ......दूसरी थोडा नर्म पड़ी....हम चूँकि उनके रूम पार्टनर थे .इसलिए न्यूट्रल के किरदार में खामोश खड़े थे ...जाट ने एक लम्बी सी लिस्ट निकाल कर सामने रख दी .... कॉलेज की सारी जूनियर -सीनियर खूबसूरत लड़किया किब्ला सभी शामिल थी ...........फिक्स या " हाँ या ना" में अटकी पड़ी ...सबको पिंक रोज ...प्यार से पहले दोस्ती में जाट का अटूट विशवास था .....उसके बाद दोनों कई सारी गुलाबी पर्चिया निकाली जिनमे ऑटोग्राफ के साथ कोई सन्देश भी था ...किब्ला कोई अंग्रेजी कविता का हिस्सा ..मोर्डन दर्जे के रोमानटीजिम की ये नई थ्योरी थी .जिसके आखिर में "हेंस प्रूव्ड ' की जगह जाट के ऑटोग्राफ थे ....
पर एक नाम देखकर हम गश खा गये... वे न केवल फिक्स ओर खासी रौबीली थी ओर उस पे तुर्रा ये की उसका बॉय फ्रेंड भी हट्टा कट्टा गबरू जवान ......ओर सीनियर .......ओर हम दूसरे साल में ....
"अबे जाट वहां रहने दे ' हमने उसे अकेले में समझाया ..
.क्यों पिंक रोज देने में के है ? लाल थोड़े ही ना दे रहा हूँ ?जाट अंगद के पाँव की माफिक अडिग था ......
कल्चरल फेस्टिवल पांच दिन चलता था ....चौथे दिन रोज बाँटने थे ...आखिरी दिन हमने फिर उन्हें टटोला ....पर उन्होंने अपना फैसला रिज़र्व रख छोडा था ..
हमने डरते पड़ते बाकी रोज के साथ उसके रोज भी बाँट दिये ,.....रात को कल्चरल एवेनिंग थी ,गजल का प्रोग्राम था ...कोई साहब गुलाम अली की ऐसी तैसी फेर रहे थे ....लड़किया साडीयो ओर खूबसूरत लहंगों में ऑडिटोरियम में नुमाया होती ......हम एक जगह जाट के साथ बैठे हुए 'कोई उम्मीद बर नजर नहीं आती ' ग़ालिब के इस शेर को याद कर रहे थे ..... ..अचानक वही रौबीली मोहतरमा अपने गबरू बॉय फ्रेंड के साथ दिखी ..हम थोड़ा सिमट गये...
.हे प्रदीप तुम्हारा रोज मिला ..थैंक्यू ..वे बोली ......
"तो आज से अपां दोस्त."..जाट बोला था ......



weaker sex is stronger than stronger sex
because
weaker sex is weakness of stronger sex

अहमदाबाद के सिविल हॉस्पिटल में रेडियोलोजी डिपार्टमेन्ट के रिपोर्टिंग रूम में अगर कोई सबसे दिलचस्प चीज थी तो वो था एक ब्लेक बोर्ड जिसका ईजाद वहां के पी जी ने आपसी तफरीह के लिया किया था ....उस पर 10 साल पहले लिखा एक फिमेल रेसिडेंट की लिखी एक सूक्ति .. ... जाट ने अपनी रेसीडेंसी वही की थी ....

2009-04-28

"देयर इस नो रूल इन इश्क " मेरी जान !!


इंटेलिजेंस की अपनी लिमिटेशंस है लेकिन बेवकूफी उसकी तरह मजबूर नहीं है....शुक्ला जी की दीवार पे लिखे इस जुमले का कापी राइट किसके पास था ये तो याद नहीं पर ...पर इस जुमले ने हॉस्टल के इन्टेलेकचुवलो में उनकी "एंट्री "करा दी थी ....
कुछ दिनों बाद उनके हिस्से की अलमारी पे लाल रंग से एक ओर नये जुमले ने उन्हें बतोर "विद्रोही" हिट करा दिया ..."जीनियस डोंट फाल इन लव "अलबत्ता इस जुमले से नाइत्तिफाकी रखने में हम भी शामिल थे ...फिर भी चूँकि शुक्ला जी हमारे सीनियर थे उस पे यू . पी के तो हमने कभी खुले आम नाइत्तेफाकी जाहिर नहीं की ....हमें यकीन था जिंदगी के किसी मोड़ पे इश्क अपनी एंट्री मारेगा ही......शुक्ला जी की जिंदगी में एक ऐसा मोड़ आया जिसने उनके जीवन में जबरदस्त ट्रांस-फोरमेशन कर दी .. अलबत्ता उसे खूबसूरत कहने पे कई यारो में कंट्रोवर्सी है.

.हुआ यूँ के हर साल AIIMS में दिनों का कल्चरल फेस्ट होता है जिसमे देश भर के मेडिकल कॉलेज शिरकत करते ...रात को खुले मैदान में "करोके कम्पीटीशन "होता जिसमे खासे रोमांटिक अंग्रेजी गाने स्क्रीन पे चलाये जाते ...ओर कोई एक बेचारा इस मजलिस में तन मन से गाता . .लोग यहाँ वहां किसी की गोद में लेटे होते ...कुछ माहोल से इंस्पायर हुए सिर्फ हाथो में हाथ डाले बैठे ...जिनके पास ना कोई गोद होती न ऐसा इंस्पायर्ड साथी ...वे आहे भरते ....कुछ बियर पीकर इश्क को गाली देते ...शुक्ला जी ने एक रात बियर पीकर इश्क को खूब कोसा ...गुजरात की मिलावटी शराब पीने का आदी उनके ब्लेडर ने दिल्ली की असली बियर से विद्रोह कर दिया .. ...आलस ओर परेशां शुक्ला जी ने रात के अँधेरे में दूर की झाडियों को फारिग होने के लिए मुनासिब समझा ..चैन खोलकर वे रिलेक्स होने की पहली मुद्रा में ही थे की अचानक झाडियों में एक लम्बा चौडा सरदार निकला ओर माँ बहन की गलिया देता इनके पीछे दौड़ लिया..एक .प्रेमी जोड़े .के प्रेमालाप में असमय पड़ी इस फुहार ने जो विघ्न डाला ....सरदार ने उसका क्लाइमेक्स बड़ी बेरहमी से किया .....
इस अपमान से आहत हॉस्टल वापस लौटे शुक्ला जी एक महीने के लिए कुछ किलोमीटर के दायरे के अज्ञातवास में बिना औपचारिक घोषणा के चले गये .. फिर वे अंग्रेजी के मोटे मोटे नोवल थामे सीडियो पे प्रकट हुए ...उनके अधखुले दरवाजे से अक्सर केनेजी की कैसट बजती सुनायी देती .इस दौरान कोई नया जुमला भी उनकी अलमारी पे आकर नहीं गिरा ... एक दिन "ब्रेकिंग- न्यूज़ "आयी शुक्ला जी ने "अंग्रेजी मेजर "को परपोज कर दिया है ...इश्क से उनके असहयोग आन्दोलन की अचानक मौत ....वो भी अंग्रेजी दा किस्म की लड़की से...बुजुर्वा किस्म के छोटे से क्रन्तिकारी तबके को अपने इस युवा संभावित नेता के इस कदम से गहरा धक्का लगा .... होस्टल में हंगामा बरपा हो गया... लड़को की एक अच्छी खासी परसेंटेज इन .अंग्रेजी दा लड़कियों को "आउट ऑफ़ कोर्स "मानती थी .जिसका सीधा ओर देसी अनुवाद था "औकात से बाहर ".....
हमेशा जींस ओर टीशर्ट में दिखाई देने वाली इन लड़कियों को प्रेम में लिखी हिंदी कविताये " वल्गर "लगती ओर "सेंटीमेंट्स " छिछोरे... .ओर ये थी मेजर की औलाद .....
उस रोज रात को शुक्ला जी ने अपने जुमले में संशोधन किया .."जीनियस डोंट फाल इन लव -इट हेप्पंस " .२ महीनो में ये वाकई हेप्पंस हो गया ....शुक्ला जी हॉस्टल के तमाम नाकाम प्रेमियों के लिए उम्मीद की एक साडे पॉँच फूटी लौ बन के उभरे ओर एक घटना ने इस लौ को ओर जगमगा दिया .....
कॉलेज की ऐसी मोहतरमा जिन्हें हर लड़के को भाई बनाने का शौंक था ..ओर कुल जमा उनके पास साडे छब्बीस भाई थे ...(एक अभी डिस्पोसल पे था )...पे एक साहब मर मिटे ...तीन ठो असफल प्रयास के बाद उन्होंने शुक्ला जी की शरण ली...शुक्ला जी ने उनके गिरे हुए मोरल को जाने कौन सी क्रेन से उठाया .की उनकी भी नैय्या पार हो गयी....... इश्क वालो के लिए शुक्ला जी पीर पैगम्बर हो गये . ...
इश्क के तमाम नाकाम , "हाँ ओर ना " के दोराहे पे खड़े प्रेमी उनके दर पे आते ....बिगडे हुए केस संभल जाते ..
यारो का बस चलता तो उन्हें पदमश्री दिलवा देते ......

शुक्ला जी अपनी प्रतिभा ओर अंग्रेजी मेजर के साथ विदेस में पलायन कर गये ...



किसी भी हॉस्टल के पिछले दस -पंद्रह सालो को गर फ्रेम दर फ्रेम केप्चर किया जाये ओर मेग्निफाइंग ग्लास से सूक्ष्म निरीक्षण .. तो इश्क हर साल किसी किसी फ्रेम में एक उपस्थित पात्र है ....कहते है इश्क का जींस हर हॉस्टल में दस साल में म्युटेट होता है और शुक्ला जी जैसे लोग हर पीढ़ी में जुदा - जुदा शक्लो जुदा -जुदा नामो से उस पीढ़ी का मार्ग दर्शन करते है जब भी आने वाली पीढिया इश्क लिखकर गूगल में खोजेंगी शुक्ला जी जैसे वहां कोई लौ थामे मिलेगे ...

इश्क में एक स्टेज ऐसी आती है जब हाँ ओर ना के बीच बालिश्त भर का फासला होता है जरा सा बेलेंस बिगडा नहीं के ........-कर्टसी शुकला

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