फकत फिलोसफी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
फकत फिलोसफी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

2009-03-24

कोई सिलवट नहीं ... इस चेहरे पे


वो चेहरा बिना मुस्कान का चेहरा है .. ...रिकंसट्रक्ट चेहरे ऐसे हो होते है बिना मुस्कान ओर गम के ...
९८ में श्रीनगर में किसी माइन पे उसकी बटालाइन में से किसी का पैर पड़ा था ...वो भी हवा में उडा नीचे आया तो एक पैर ,हाथ की दो अंगुलिया ओर अपना चेहरा खो चूका था ....कजिन का दोस्त है ..आपकी आवाज में जरा सी नरमी उसे चौकन्ना कर देती है ...आँखे एक्स रे की तरह आहिस्ता आहिस्ता आपकी चमड़ी के भीतर कही उतर कर जैसे तलाश करती है की सहानुभूति का कोई अंश तो नहीं..... एक कोने पे दो शराबी रेस्तरा वाले से लड़ रहे है ..उसकी निगाह उधर उठी है मेरी भी...क्या सोचता होगा ये ?....एक काफी पीकर वो विदा लेना चाहता है विदा लेते समय समय कुर्सी से उठना चाहता हूँ पर उस आवाज में अजीब सी ठंडक है की मै उठता नहीं ...........
धातु के छोटे छोटे टुकड़े इंसान की जिंदगी में कितना खलल डालते है ... इंसान को ख़त्म करने के नए नये नुस्खे ....उसको गये करीब दो घंटा हुआ है...पर मन में अभी भी धातु के टुकड़े फंसे हुए है ...अचानक दिल में ख़याल आता है उस आदमी का .. ..जिसने ६ अगस्त १९४५ हिरोशिमा पर बम गिराया ... क्या सात अगस्त से उसकी दुनिया में सूरज उसी तरह उगा होगा ...किसी नन्हे बच्चे को खिलखिलाते देख क्या उसके दिमाग में कुछ सवाल उठे होगे ... ...कम्पूटर पर अंगुली दबती है ......
छह अगस्त १९४५ को वारफील्ड तिब्बेट्स जूनियर .की उम्र महज़ ३० साल थी .. . .उस वक़्त ..उनका कहना था ..उन्हें अपने किये का कोई रिग्रेट्स नहीं है....६२ साल तक वे उसी बेफिक्री की नींद लेकर सोये ....

"there are no Marquess of Queensberry rules in war."
९२ साल की उम्र में उनकी मौत हुई .....क्या उनकी सोच उनकी ट्रेनिंग का नतीजा है ..... युद्ध में .सिपाही पूछता नहीं है....उसकी ट्रेनिंग का मकसद शायद उसके सवालो को ख़त्म करना है ... पर युद्ध के बाद .?क्या हर सिपाही के सवाल ख़त्म हो जाते है पर कुछ सवालो के जवाब कम्पूटर नहीं देता ...





चौबीस मार्च के लिए

किसी सफ्हे पे किसी नज़्म की जानिब ढूंढो
वक़्त की गलियों में आवारागी के निशान मिलेगे

कुछ सालो पे हमारा इख़्तियार आज भी नहीं


या यूँ कहिये (रिवर्स त्रिवेणी )

ज़िंदगी क़ी क्रिकेट यूँ चली

खुदा मेडन ओवर फेकता रहा
किस्मत क्लीन बोल्ड करती रही



इस उम्मीद में के अगले कुछ ओवर टी ट्वेंटी की माफिक साबित होगे ..

2009-03-16

कितनी नफ़ीस बुनावट थी....... इंसान ने उधेड़ दी दुनिया.

बनारस के उस रस्ते पे शुरुआत में सीधे हाथ पर में एक गुरुद्वारा है...थोडा आगे चलने पर चर्च .....सबके जुदा जुदा भगवान् है ..मै अपने वालो की राह पर हूँ...रास्ते में नंगे पैर चलते कई लोग दिखते है ....मालाओं ओर पूजा का सामान बेचती ढेरो दुकानों को नजर अंदाज करते हुए ..कोई साउथ इंडियन परिवार है ...कुछ बुदबुदाता हुआ ..लकडी के फ्रेम में बनी उस चौरस मशीन में मुझसे आगे ....एक पीठ पर लगभग बारह साल की लड़की है ...शायद उसका पिता है....तकलीफ को किसी अनुवाद की आवश्यकता नहीं होती .... उस लड़की के चेहरे से पढ़ी जा सकती है ...... मशीन की वही जानी पहचानी सी आवाज .... सीने में जमा दर्द मगर डिटेक्ट नहीं करती ....कतार में लोग है...यंत्रवत चलते हुए ...अजीब बात है मेरा मन भगवान् में नहीं है ....पांच या दस सेकंड में उसकी मूर्ति के सामने लगभग धेकेला गया हूँ... बंदूको के साये में हिफाजत से घिरे भगवान् से मै क्या मांगू ?फिर धकेल कर आगे कर दिया हूँ ...आगे .कोई पंडा एक सौ एक का दान मांगता है... एक रुपया नहीं है ...सौ के नोट को वो मुट्ठी में दबा लेता है...दाये बाये लोग झुके हुए है ....अजीब बात है अपने ही देश में अपने ही भगवान् को बंदूको के साये की जरुरत है .हम कहाँ जा रहे है ?
बाहर सूरज की रोशनी में घाट बेतरतीब सा नजर आता है नाव में एक ओर परिवार है...तीन साल की उनकी बिटिया को मेनिंगो -मायलोसिल की एक बीमारी है ..अपनी उम्र से ज्यादा अब तक उसके ओपरेशन हो चुके है ...उसकी दादी गंगा का पानी उसके मुंह में डाल रही है.. ...मै गंगा का पानी देखता हूँ......मटमैला सा.....नाव का माझी बताता है रविदास घाट का पुनः - निर्माण हुआ है इस सरकार के आने से ...वो क्या चीज है जो इन लोगो कों
बी एच .यू के मेडिकल से जुदा इस मंदिर ओर इस नदी की ओर खींच लाती है ....आस्था ....श्रद्धा ...या हालात की बेबसी में कोई उम्मीद की चाह? तुम कहाँ हो ईश्वर ????




उन्नीस साल की उम्र जाने की नहीं होती है ,इस तरह जाने की तो ...कोई उम्र नहीं होती है....हम ओर आप पैसो से बच्चो को मेडिकल ओर इंजीनियरिंग में दाखिला तो करवा सकते है पर इंसानी जज्बे ओर इंसानी जान की कीमत क्या होती है ये नहीं सिखा सकते....टेक्नीकल भाषा में कुछ लोग इसे रेगिंग कहे पर आम भाषा में पीट पीट कर मारे जाने को मर्डर कहते है ..ओर ये एक कच्ची उम्र का कत्ल ही है .....वैसे भी मै उन लोगो को इस पेशे के लायक नहीं समझता जिनमे इंसानी सवेदना नहीं है...मै शर्मसार हूँ की मै भी उस समाज का हिस्सा हूँ जहाँ एक निरीह निर्दोष बच्चा अपनी जान बचाने की गुहार लगातार लगाता है ओर हम इसे प्रोफेशनल कालेजो में होने वाली एक स्वाभाविक प्रक्रिया मान कर नजर अंदाज करते है....


-
अमन कचरू १९ सल् डॉ राजेंद्र प्रसाद मेडिकाल कॉलेज , टांडा , काँगड़ा हिमाचल जिसकी उसके सीनियरों ने शराब पीकर कई दिनों तक इतनी पिटाई की जिससे होली वाले दिन उसको असमय काल के ग्रास में जाना पड़ा .



2009-03-06

आप जो मेरी जानिब होते !!!!!!!

पहली हर चीज कितना थ्रिल देती है है ना......पहला किसी पतग को काटा हुआ पेचा........ मोहल्ले के खूंखार बोलर पर लगाया हुआ वो पहला चौका ..... . पहला स्कूल बंक.....स्कूल के माने हुए गुंडे को आँख मीच कर लगाया हुआ पहला घूँसा ....टूशन साथ पढने वाली काली स्कर्ट को पहला ख़त....वो पहली बार ऍ टी एम् से पैसे निकलना ..हाय कितना रोमांटिक है ना !
ग़लतफ़हमी मत पालिये..... अपने चारो ओर नजर डालिए ...आप कौन से फ्लोर पे खड़े है .तीसरे चौथे .....या .......किस्मत की लिफ्ट कभी खाली नहीं मिली आपको ....ओवरलोड का इशारा लिफ्टमेन करता ओर आप खिसियाये से बाहर निकल कर एक ओर खड़े हो जाते या अपने सामने बंद होते लिफ्ट के दरवाजे को देखते ..... फिर सीडिया दर सीडिया चढ़कर कर आप जिंदगी की बिल्डिंग में हर फ्लोर में हांफ हांफ कर चढ़ते ...आखिरी सीडी पर सफ़ेद कपड़ो में देवदूत मुस्कराते बोलते ..."यू आर लेट माय सन ...पर लिफ्ट ....आपके शब्द मुंह में रह जाते ..."नो आरगयुमेंट माय सन" .....
बरसो से आप उस मंदिर को ढूंढ रहे है .... जिसकी घंटी पकड़ कर (भले ही थोडा उचक कर )आप कह सके "आज खुश तो बहुत होगे तुम "....वैसी घंटी ओर वैसी एक मूर्ति देख एक दिन .आप पोज़ लेते है ..शर्ट को बाहर निकल कर गाँठ मारते ही है .कि ........ मंदिर का पुजारी ...यहाँ केवल क्रेडिट कार्ड चलता है बेटे .... .........
निराश हताश आप फ्लेश्बेक में चले जाते है....
जिस क्योशचन को छोड़ आपने रात भर सारी किताबे घोटी है .... अगली सुबह पेपर में सबसे पहले वही दिखता .. ..ओर हॉल में चित्रगुप्त का अट्हास गूंजता ......ओर फिर वो .....
आपकी पहली ऍ. सी यात्रा ...राजधानी ट्रेन चेयर कार ...दस घंटे का सफर .....एक कमसिन खूबसूरत हसीना कंधे पर बेग टाँगे दूर से आती दिखती है ..आपके दिल की धड़कन बढती है....धीरे धीरे अहिस्ता आहिस्ता वो आपकी बराबर वाली सीट पर बैठती है....आप का दिल अभी बाग़ बाग़ हुआ ही है ...की अचानक एक मोटे पसीने में गंधाये अंकल एंट्री मारते है मैडम ये मेरी सीट है.....बिजली कड़कने की वही चिरपरिचित आवाज ...कर्टसी रामानन्द सागर .... आप इधर उधर देखते है ..ट्रेन की खिड़की के बाहर मुस्कराते चित्रगुप्त ...अभी तुम्हारा टर्न नहीं है वत्स .
वो पहला ..नहीं चौथा या शायद पांचवा छोडिये प्यार कहाँ किसी गणित में बंधता है ...रात भर कागजो में उलझकर आप ग्रीटिंग कार्ड पर कुछ जुमले लिखने में सफल हुए है ..केवल आँखों पर चुनकर फ़िल्मी गीतों की एक केसेट तैयार कर .उलटी शेव खीचकर आप वही काली शर्ट पहन कर (जिसमे आपके दोस्त कहते है बड़ा स्मार्ट दिखता है )..लोकर रूम में एक गुलाब हाथ में लिए उसे "बर्थ डे विश" करने पहुँचते है .पर उन्हें किसी ओर से गले मिलता देख आपका दिल " रंगीला "के आमिर खान की तरह टूटा है बस..... फर्क इतना है की कोई बेक ग्राउंड म्यूजिक नहीं बजता ..निराश .टूटे हुए ..धीमे कदमो से आप बाहर निकलते है साइड में चित्र गुप्त खड़े है ..कभी कभी वो भी रियायत देते है इसलिए मुस्कराते नहीं ..आप उनसे लिपट कर रोना चाहते है...पर वे "अभी ड्यूटी पर हूँ" कहकर पीठ थपथपा देते है.....

ओर अब जब लगता है टॉप फ्लोर का सफ़र बस कुछ सालो में तय हो जायेगा .....


उमस भरी दोपहरी में
बादल का एक टुकडा आकर
पडोसी की छत भिगो गया
अजीब बेवफाई है !



ये शायर ओर कवि बड़े खतरनाक होते है ... साले ....सलीके से गाली देते है ..ओर हम शेर समझ कर ताली बजा देते है... फ्लाईट में ...एक पतले कम गंधाये इन्सान का बिन मांगे दिया फलसफा.

ओर ऊपर वाला फोटोग्राफ बेंगलोर के एअरपोर्ट से चलती गाडी से मोबाइल से ..

2009-02-16

जिंदगी की कोई स्क्रिप्ट नही होती


वो फ्लेट देखने आया है ,मै उसके साथ सलाहाकार के किरदार में हूँ ,बचपन का दोस्त है ,हम पेशा है ब्रांच अलग है ...५ फ्लोर की उस बिल्डिंग में घुसते ही पार्किंग में हमें अलग अलग नंबर बड़े बड़े लिखे दिखायी देते है .हमारे चेहरे पे उगे प्रशन वाचमेन जैसे पढ़ लेता है ...सब फ्लेट के नंबर से है ..वो जवाब देता है .मै घर आए मेहमानों के बारे में सोचता हूँ ,इतने में वो एक कोने पर बने ऑफिस की तरफ़ इशारा कर देता है ...दो बिल्डरों में से एक अपने आदमियों के साथ हमें फ्लेट दिखाने ले चलता है ...छोटी -छोटी बालकनियों में सूरज शायद तय समय पर हाजिरी देने आता है ...
आस पास कोई पार्क है ? अचानक मेरा दोस्त उससे प्रश्न पूछता है .
अच्छे घरो के बच्चे अब पार्क में कहाँ खेलते है ?फ़िर हो -हो करके हँसता है ...रंग बिरंगी दीवारों के बीच पान मसाले से रंगे उसके दांत मिल गये लगते है .स्कूल-घर -टूशन ...यही तो है .वो कह रहा है .
हम सीडिया उतर रहे है अच्छे घरो के बच्चे ?मै सोच रहा हूँ.... बाहर गाड़ी में बैठकर वो घड़ी देखता है
डॉ सक्सेना के वहां भी तो जाना है .वो कहता है ...डॉ सक्सेना का चेहरा मेरी आँखों के सामने आ जाता है .
८ साल पहले जब मुझे प्रेक्टिस शुरू करे कुछ साल ही हुए थे तब उन्होंने कहा था 'अमरोहा जायेगा ?हफ्ते में एक दिन ,मेरे समधी का हॉस्पिटल है ....जिंदगी में प्लानिंग जरूरी है बच्चे ..उनका पेट डाइलोग मिलने पर अक्सर यही होता ..आठ महीने पहले मिले थे नर्सिंग होम रिनोवेट कर रहा हूँ ... एक शानदार इन्फरटीलिटी सेंटर .शांतनु को भी बुला लूँगा .. ...छोटे की बहू गायनेक है ही .....शांतनु बड़ा बेटा ऑस्ट्रेलिया में ही है ...५ महीने पहले छोटा भी अपनी बहू के साथ यु एस शिफ्ट हो गया था ...सुना है उन्हें अपने साथ ले जाने की बहुत कोशिश करी थी उसने ...
शमशान के बाहर गाडियों की भीड़ है ..अन्दर एक कोने में हम दोनों जगह लेते है ..शांतनु आ नही पाया है...थोडी देर में किसी का मोबाइल बजता है ..५० -५१ साल के वे शहर के बड़े डॉ है ...मोबाइल पर उन्हें बात करते देख गुस्सा आता है .मन करता है हाथ से छीन लूँ ओर जोर से गाली दूँ "रस्स साले ये कोई जगह है ! पर सिर्फ़ बुदबुदाता हूँ ..उस भीड़ को देखकर सोचता हूँ कितने लोग इसमे है जो वाकई दुखी है ....खून के रिश्तेदार ?उनमे भी छटनी ! ३५ -३६ साल की उम्र में मैंने कितने लोग जुटाये है अब तक ?एक दो ...गिनतियों का जोड़ मुझमे सिरहन भर देता है.
डॉ सक्सेना लेटे हुए है .शांत ....छोटा पंडित के साथ मन्त्र का उच्चारण कर रहा है ....जिंदगी की कोई स्क्रिप्ट नही होती


आज की त्रिवेणी

कभी बग़ावत , कभी मुख़ालत , रोज़ का क़िस्सा था
अब ख़ामोशी सी है हम दोनो के दरमियाँ.......

एक मुद्दत हुई उस जमीर से मिले

2008-11-03

बीच सड़क से .......

सुबह गाड़ी बाहर निकालने के लिए गेट खोलता हूँ तो गली में साइकिल पर बैठा आदमी जोर जोर से चिल्ला रहा है जोडो के दर्द ,कमर दर्द ओर पैरो की सूजन के इलाज़ का मर्ज बेच रहा है ,उसके कंधे पर एक झोला है ..इस "मोबाइल डॉ "के दर्शन पर मै मुस्करा उठता हूँ ..किसी भी प्रकार की खुजली ....एक्जीमा ...उसका विज्ञापन जारी है...अरे साला ये तो मेरे पेट पर भी लात मार रहा है .... बीच सड़क पर आते ही आपकी आज़माइश शुरू हो जाती है अपने ठिकाने तक पहुँचते पहुँचते आपके धेर्य की अनेको परीक्षाये हो चुकी होती है. ट्राफ़िक सिग्नल पर कोई रुकने को तैयार नही है, क्रॉसिंग पर आप लाइन मे गाड़ी मे खड़े है, एक महाशय लंबी चौडी गाड़ी लेकर तिरछी कर खड़ी कर देती है, बाक़ी ट्राफ़िक गया भाड़ मे, कोई ट्रक सड़क पर मूड रहा है, उसका हेलपर हाथ देकर रुकने का इशारा कर रहा है की कुछ मोटर साइकल वाले उसकी साइड से निकल कर भागे जा रहे है, ...सड़क के कोने पर एक लड़की जींस ओर टी शर्ट पहन कर सिमटी सिमटी सी जा रही है .. कोने पर खड़ा पेटू पुलिस वाला भी ओर लोगो की तरह उसे घूर रहा है ...उसके ठीक पीछे बोर्ड लगा है .उत्तर प्रदेश सदैव आपकी सहायता के लिए तत्पर -सौजन्य से कविता साडी ...
सोचता हूँ चरित्र प्रमाण पत्र हर महीने में रिवीयू होना चाहिये..केवल नौकरी में दाखिले के वक़्त ही इस देश में चरित्र की जरुरत समझी जाती है ..... एक साहब गाड़ी बीच सड़क मे खड़ी करके अपने दोस्त से बतिया रहे है ओर हॉर्न देने पर ऐसे घूरते है जैसे मैग्राथ चोका पड़ने पर बेट्समेन को घूरता है. .....आगे बढ़ता हूँ ....पेट्रोल पम्प जाने के लिए एक गली से मूडना पड़ेगा तो पूरी गली मे तंबू तना हुआ है की आज जागरण है.उनकी भक्ति महान है.पेट्रोल पम्प पर पहुँच गया हूँ.....मेरे आगे एक मोटर साइकिल है ...दस रुपया का ? पेट्रोल पम्प का सेल्समेन इतनी हैरानी से बोलता है .की बेचारे लड़के शरमा जाते है .उनकी उम्र १९-२० साल है ...पेट्रोल भरवाते भरवाते भी दस रुपये मेरे दिमाग में घूम रहे है ...
जब चलते चलते अचानक जोरदार झटके लगने शुरू हो जाते....कुछ फासला खींच कर वो बीच सड़क में घोडे के हिनहिनाने जैसी आवाज के साथ बंद होती ...पीछे बैठने वाला सिर्फ़ एक सवाल पूछता जिसका जवाब उसे मालूम होता ,..पेट्रोल ?वो सर खुजाते हुए कहता भूल गया. .उसकी याददाश्त कई सालो तक ऐसी ही रही .....फ़िर पूरी मोटरसाइकिल को सड़क पर लिटाया जाता ,हिलाया डुलाया जाता फ़िर ,सीधी करने के बाद वो हिनहिना कर स्टार्ट हो जाती .. कुछ फासलों के बाद अगर पेट्रोल पम्प दूर तक नजर नही आता ....तो फेफडो में हवा भर कर पूरी ताकत से पेट्रोल की टंकी में हवा भरी जाती .बरसो ये सिलसिला चला , कही किसी पार्टी में जाना हो या मूवी देखने आप सड़क पर एक बार ज़रूर हिनहिना कर रुकेगे . सबसे कमाल की बात तो यह होती की आधी रात आप पेट्रोल पम्प वालो से मिन्नतें करके उन्हें नींद से उठाते फ़िर ये महाशय कहते “10 रुपये का डाल दो .उस पर ये चलते चलते कहते पेट्रोलमै सिविल हॉस्पिटल में हूँ कोई काम हो तो बताना . ….सिविल हॉस्पिटल का नाम इस तरह इन्होने कई बार रोशन किया .हम बाकी दोस्तों के पास बाद में यामहा आर एक्स १०० रही ,पर इस होंडा मोटरसाइकिल की वजह से हम सब इन्फीरियरटी काम्प्लेक्स में रहे ....होंडा वालो ने भी दुबारा ऐसी मोटरसाइकिल नही बनायी ...
पीछे हार्न बज रहा है...रेडियो ऍफ़ एम् खोलता हूँ .....बाबा रामदेव ने कैंसर के मरीजो को ठीक करने का दावा किया है...यश को संभालना भी बड़ा मुश्किल है जी.......




आज की त्रिवेणी

कई बार टोका है यूँ बेवक्त
नंगे हाथो माजी न कुरेदा करो.......

कुछ लम्हे बड़ी तेज चुभते है

ओर हाँ आज कुश का जन्मदिन है ...दुआ करे उनको अलादीन का चिराग अनलिमिटिड ख्वाहिशो के पैकेज में मिले ...

2008-10-13

एक ओर रात अपने हिसाब से घटायी होगी ......


सुबह तकरीबन साढे सात का वक़्त है ...शहर का ये छोर इस वक़्त मसरूफ रहता है ... पाँच सौ मीटर या एक किलोमीटर के उस दायरे में तीन-चार बड़े बड़े पबिलिक स्कूल है , वही एक सड़क पर -बड़ी -छोटी कई किस्मों की गाडिया ...कही ड्राईवर का खिड़की से झांकता उनीदा चेहरा ..कही ट्रेक सूट में बेटे के बालो को तरतीब से लगाता बाप .....कही स्कूल के गेट पर किन्ही नन्हे कदमो का दूर तक पीछा करती किसी मां की नजरे ...स्कूल बस से उतरते बच्चो का शोर .....इन सबके बीच सड़क के उस पार ...तमाम भीड़ से गुजरती एक साइकिल ...उसके डंडे पर बनी एक छोटी सी गद्दी पर दो चुटिया ओर आँखों में काजल लगाये.....वो बच्ची साइकिल के कोने पर लगी घंटी को जोर से बजाती है ...फ़िर सर उठाकर अपने कंधे पर उसका स्कूली बस्ता टाँगे उसके पिता को मुस्करा कर देखती है.....उसका पिता उसके कान में कुछ कहता है...फ़िर घंटी को बजाता है....
बड़ी बड़ी गाडियों के इंजन ओर हार्न के बीच उस घंटी की आवाज ........जैसे जिंदगी अपनी शिनाख्त करती है !












एक बूढे नायक के पेट दर्द की मेडिकल रिपोर्ट मीडिया देश को हर घंटे ख़बर दे रहा है .. इस दौरान सौ करोड़ की इस आबादी वाले उस देश में जिसमे अभी अभी परमाणु करार पर हस्ताक्षर अधिक्रत रूप से हो गये है ....७० फीट गहरे बोरवेल में गिरे दो साल का वो नन्हा बच्चा जिंदगी से अपनी जंग हार गया है .....

2008-10-06

यादो की गलियों से गुजरता आज

शनिवार २७ सितम्बर रात साढे सात बजे नॉएडा -

अट्टा मार्केट में करीम के रेस्टोरेंट के सामने हम दोनों सिगरेट का कश लेते है,मै कभी -कभी उस जैसे किसी पुराने यार के मिलने पर पीता हूँ ,पर हम दोनों में से किसी को भी रामदौस से नाराजगी नही है अजीम पिछले तीन साल से नॉएडा में है .....हर साल अलबत्ता उसकी कम्पनी बदल जाती है इस वक़्त वो एयरटेल में काम कर रहा है उसके चाचा जायसी साहब ढेड साल तक हमारे किरायेदार रहे ओर अजीम अक्सर उनके यहाँ आता रहता ,हम उम्र था इसलिए हम दोनों में छानने लगी ,जायसी साहब का बेटा इरफान जहाँ किताबो में घुसा रहता ,अजीम मुझे मेहंदी हसन की गजले सुनवाता ."रंजिश की सही "तीन वर्ज़न में सुनी ...स्लो ...फास्ट...मेहंदी हसन से मेरा तार्रुख उसी ने करवाया था ,मै सिर्फ़ दो वक्तों पर उसके लिए बददुआ मांगता एक जब वो बैटिंग कर रहा होता ओर दूसरे छोर पे मै बोलिंग ..(कमाल का बैट्समन था वो.)..दूसरा जब वो एक ख़ास लड़की से गुफ्तगुं कर रहा होता ..
जिस तरह मै गुजरात को होस्टल के उस छोटे से समूह से याद नही रखता जो मुझे या मेरे दोस्तों को 'नॉर्थ इंडियन "होने की वजह से परेशान करता था ,वो भी अपनी तकलीफों ओर कडवाहटो को अपनी पीठ पर लेकर नही घूमता वो पांचो वक़्त नमाज नही पढता ठीक वैसे ही जैसे मुझे मन्दिर गये ज़माना हुआ ,उसे भी इमाम बुखारी से उतनी ही नफरत है जितनी मुझे तोगडिया से ..वो भी सैयद शाहबुद्दीन या हाजी अख़लाक़ के बोलने पर उतना ही बैचैन होता है जितना मै राज ठाकरे के ,ना उसके चेहरे पर गज भर की दाढ़ी है ओर न मेरे सर पे चोटी ....
हफ्ते भर की मेहनत के बाद एक छुट्टी वाला दिन ....दो वक़्त की रोटी ... बस यही मेरी उसकी ख्वाहिशे है


जाने क्यों पंजाब के कवि हरभजन की एक कविता याद आ जाती है
तुम्हारे पास ताकत है लट्ठबाज है ,
बंदूके है ओर वक़्त की सरकार पीठ पर है
मेरे पास कागज है ,किताब है
कलम है ओर कविता



2008-08-10

रेड लाइट के बहाने कुछ गुफ्तगू ......


स्वर्ग की सड़क है पर कोई उस पर चलना नही चाहता ,नरक का कोई दरवाजा नही है पर लोग उसमे छेद करके घुस जाना चाहते है –
अजात



चौराहे पर रेड लाइट है पर पीछे गाड़ी में बैठे मह्शय को शायद मार्क्सवादी विचारधारा पसंद नही है ( लाल सलाम ) इसलिए लाल रंग देखकर भी वे हार्न दिये जा रहे है …उनके मुताबिक जब ट्रेफिक पुलिस वाला नही है तो मै क्यों खड़ा हूँ ..हार्न लगातार बज रहा है …साइड से वो मेरे पास से मुझे घूरते हुए निकल गए है ….जितनी बड़ी गाड़ी उतना बड़ा गुस्सा ……कोई रुकना नही चाहता है ... ऐसा लगता है पता नही कहाँ जाना है सबको ….जहाँ भी थोडी सी जगह दिखी …निकल लो ….क्रोध गाड़ी का एक्सीलेटर बन गया है ..लोग मोटरसाइकिल ओर ---स्कूटर की पिछली सीट पर क्रोध को बैठा कर बाहर निकलते है …उसकी आदत बिगड़ गई है वो हर जगह साथ चला आता है क्रोध ..अंहकार .. ?दोनों आपस में गुथ गये है ,मिल गये है .इतने की अलग –अलग शक्ल पहचानना मुश्किल है …सड़क पे आप हार्न बजाते है .. ऑफिस में मातहत को धकियाते है ओर ब्लॉग पे ?.किसी ने जरा सी वैचरिक असहमति हमसे दिखायी ….उसके गुण - दोषों पे माइक्रोस्कोप टिका दी …यही व्यक्ति जब आपकी प्रशंसा कर रहा था तब आप इस मुई माइक्रोस्कोप को धूल चटाते है ? हम उन्हें हमेशा सराहते है जो हमें पसंद करते है ..जिन्हें हम सरहाते है उन्हें हमेशा पसंद नही करते ….
एक सज्जन है जिन्होंने "लाफ्टर क्लब "बना रखा है ,वे कही भी मिल जाए आपके जीवन में खुशियों की महत्ता बताने लग जाते है .फ़िर एक फार्म निकालते है सामाजिक कार्यो के लिए आपसे चंदा मांगकर आपको उसका सदस्य बनाते है..सुबह सुबह उनके क्लब के सदस्य कालोनी के पार्क में जोर जोर से हँसते है .वे मुझसे खफा रहते है क्यूंकि कभी कभार मै अपने साडे चार साल के बेटे को पार्क में घुमाने ले जाता हूँ वो उन्हें हँसता देख मुफ्त में हँसता है......उनका बस चले तो खुशी का पेटेंट करा ले ..(जैसे पंडितो ने नर्क का भय दिखकर अपना बिसनेस चला रखा है .-फ़िर अजात )एक ओर मह्श्य है वे हमेशा ही खफा रहते है ,जब विजिलेंस में थे (अच्छी पोस्ट पे )तब इस बात पे खफा रहते थे की लोग काम इतना बड़ा कराते है ओर पैसे कम देते है .. ड्राईवर ओर मातहत को इत्ते जोर से सुबह सुबह डांटते थे की सारी कालोनी सहम जाती थी ...जो पैसे देता था उससे भी खफा जो नही देता उससे भी .....अब रिटायर हो गए है उन्हें सिस्टम से नाराजगी है ..समाज से नाराजगी है समाज भ्रष्ट है ...........क्रोध में पर एक खासियत है ये जाति धर्मं ,उम्र , लिंग - भेद जैसी सामान्य बातो से ऊपर उठ गया है भेदभाव नही करता .. मेरा १४ साल का भतीजा भी इंडियन क्रिकेट टीम से नाराज है
मेरा एक दोस्त कहा करता था की हम सब दौड़ रहे है...रेट रेस यू नो ....जो जितना जोर से दौड़ा उतना बड़ा चूहा ... इस रेस से परेशान भी है ओर इसे जीतना भी चाहते है ...इस भाग दौड़ में हम अपने आप को खो रहे है ....यही मै पिछली पोस्ट में कहना चाहता था .....के .....


साँस लेते है बिजली के तारो पे अब
रिश्ते कंप्यूटर के परदो पे बनते है

2008-07-12

एक लम्हा मेरे माज़ी का मुझे आइना दिखाता है

रोजमर्रा के दिन की तरह सर ने पूछा था कितने रेफेरेंस है? ओ पी डी के बाद अमूमन सर प्रोफेसर लेवल के या ए.पी लेवल के रफेरेंस दोपहर में ही देखते थे ओर बतोर सीनियर रेसिडेंट मै उनके साथ जाता था ,मेरे जूनियर ने लिस्ट मुझे दी....तीन रेफेरेंस थे ,एक फिमेल वार्ड का था चूँकि वो सेकंड फ्लोर पे था तो ये तय हुआ की उससे सबसे आख़िर में देखा जायेगा...फिमेल वार्ड तक पहुँचते पहुँचते आधा घंटा बीत गया वहां जब हम पहुंचे तो ...सिस्टर से पूछा ...
एक स्किन रेफेरेंस था सिस्टर ....'
एक मिनट आप बैठे साहेब ' सिस्टर बोली.
सिस्टर टाइम नही है
पेशेंट  किस बाजू है सर बोले...
.साहेब एक मिनट बैठिये  सिस्टर फ़िर बोली.
हेड सिस्टर ने भी कुर्सी खिसका ली .अमूमन ऐसा होता नही था.
कया नाम था उस patient का ?
सर ने मुझसे पूछा ओर वार्ड के दाहिने तरफ़ जहाँ बेड लगे हुए थे बढ़ गये 'दया ' मैंने जेब से में कागज निकाल कर कहा .
दया कौन है ?फ़िर मैंने जोर से पूछा .
साहेब साहेब कहती सिस्टर हमारे पीछे दौडी थी.
दया कौन है . एक मरीज ने कोने की तरफ़ इशारा किया १४ सल् की एक लड़की मैले कुचेले कपड़ो में सिमटी उकडू बैठी थी ,काँप रही थी
.दया ..मैंने उसे पुकारा .उसका शरीर जोर से हिलने लगा .आँखे उलट गयी ओर फ़िर वो बेहोश हो गयी.
"साहेब तभी तो मै आपको मना कर रही थी".सिस्टर बोली.
"आप एक मिनट बाहर जाइये .उसकी माँ जो शायद बाहर कुछ चाय लेने गयी थी दौड़ कर आ गयी थी.पता नही क्यों सर ओर मै बाहर आ गये थे .बाहर रखी कुर्सी पर सर बैठ गये मै खड़ा रहा .तीन मिनट बाद हेड सिस्टर आ गयी थी .
सॉरी साहेब, इस बच्ची के साथ दो दिन पहले ४ लोगो ने जबरदस्ती की है .किसी मर्द को पास आते देखती है तो दौरे पड़ने लगते है .हमने रेफेरेंस में भी लिखा था किसी फिमेल रेसिडेंट को या आपकी मैडम के लिए .शायद आपने पढ़ा नही.psychiatry डिपार्टमेन्ट में शिफ्ट की भी बात चल रही है साहेब....
"सॉरी सिस्टर" सर बोले ,धीमे से उठे ओर हम दोनों बाहर चल दिये ...मर्द होने का गुनाह भरा अहसास लिये .


2008-07-05

टुकडा- टुकडा जिंदगी


पहला टुकडा

इन अहसासों को जरा कसकर पकडो
बहुत मशहूर है इनकी बेवफाई के किस्से






दूसरा टुकडा

तुमसे जो होकर गुजरा है ,
मुझ तक पहले पहुँचा था
इन लम्हों का सफर बहुत लंबा है



तीसरा टुकडा

कई बार आधा प्याली चाय ,
ओर एक बंटी सिगरेट मे ही
आसान हो जाती है मुश्किलें


चौथा टुकडा

रोटी दाल की फ़िक्र में गुम गये
मुफलिसी ने कितने हुनर जाया किये



पांचवा टुकडा

कुछ कांटो से चुभते है
सब रिश्ते गुलाब नही होते

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails