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2009-07-28

अपने अपने कैनवस पर


शुक्रवार .....रात नौ बजे ....
वे हमेशा की तरह किताबो में धंसे हुए है ...अपने चश्मे को ठीक करके मुझे देख मुस्कराते है ... वे पिता के उन मित्रो में से है जो मुझे बेहद पसंद हूँ...उसका एक कारण उनकी लाइब्रेरी का कलेक्शन भी है ..यूँ भी जब आप बचपन ओर किशोरावस्था की उस नाजुक सी बॉर्डरलाइन पे कन्फ्युस से खड़े होते हो....सवालो का एक बड़ा पुलंदा जेब में लिए .... ओर दूसरी ओर जैसे हर कोई पादरी का लिबास पहने होता है ...आपका आपका एक एक कन्फेशन सुनने को तैयार ..... किताबे आपके कई सवालों के जवाब देती है ....बिना कोई कन्फेशन सुने ...किताबे तबसे मेरे साथ है ....... उनकी लाइब्रेरी में खड़े होकर मुझे लगता है जैसे वक़्त दबे पाँव गुजर गया है बिना कोई आहट किये ... अपनी लाइब्रेरी के लिए वे खासे पोजेससिव है ..इसलिए शुरू के कुछ साल मेरी पहुँच उस लाइब्रेरी के दरवाजे तक रही.....कभी कभी आंटी की मदद से बेकडोर एंट्री मारी..ओफिसियल एंट्री तब मिली जब उन्हें लगा मै एक सीरियस रीडर हूँ ओर किताबे लौटाने में ईमानदार .....उसके छह महीने बाद ही मेरा एडमिशन मेडिकल में हो गया .....पर .कुछ पते ......कुछ गलिया ....उम्र के एक दौर में बड़े महत्वपूर्ण होते है ...छुट्टियों में .घर लौटने पर मेरे कुछ मकाम तय होते .उनमे से एक उनके घर का वो कोना था .....एक बार ऐसे ही एक छुट्टी में उनके घर के लॉन में बैठे कई लोगो की ऊँची ऊँची आवाजे सुनी थी...आधे घंटे बाद जब वहां से गुजरा तो वे अकेले थे ...हंसते हुए बोले थे " क्यों डॉ इगो मापने का भी कोई थर्मामीटर होना चाहिए ....नहीं ...
पिछले दो सालो से .उम्र के तकाजे से उनका मूवमेंट कम हो गया है ...इसलिए मुझसे ही अपने पसंद की किताबे मंगवा लेते है ....उनसे उनकी किसी पसंदीदा किताब का जिक्र करो तो उनकी आँखों में वैसी ही चमक उभरती है जैसे किसी बाप से उसके बेटे की तारीफ करने पर उभरती है ....उनकी बेटी विदेस में है ...बड़े बेटे की दस साल पहले एक्सीडेंट में म्रत्यु हुई है ....बहू की दूसरी शादी वे करवा चुके है ....अब सुना है ..बहू ओर भतीजे दोनों जायदाद में हिस्सा चाहते है....कोर्ट से नोटिस आया हुआ है .... ये वही भतीजे है ..जो अपने शराबी पिता से परेशान होकर गाँव से सर झुकाए उनके पास आये थे ....
उनकी किसी किताब को लेकर पहुंचा हूँ "अपने अंकल से कहो कुछ सामजिक भी हो जाये" .आंटी चाय का प्याला थमाते शिकायत करती है ..कोई मुसीबत आन पड़ी तो कोई खैर खबर लेने वाला तो हो.....आंटी की कई शिकायते मेरे बहाने जारी है .नयी भी ... पुरानी भी... जिसमे उनके कई पुराने फैसले भी. है...
वे खामोशी से सुनते है...फिर मुस्करा कर कहते है ..."जिंदगी एडिट नहीं होती डॉ ..यही मुश्किल है .. ...
बाहर निकलते वक़्त सोचता हूँ...की भगवान् ने अपनी एक बेहतरीन क्रियटीविटी गलत वक़्त में तो नहीं ......

मंगलवार सुबह ....साडे नौ बजे .......
एक रेफेरेंस देखकर लौटते वक़्त हॉस्पिटल के कोरिडोर में एक जानी पहचानी आवाज सुनकर मुड़ता हूँ ..जो डॉ अग्रवाल से जिरह कर रही . है .."अडसठ साल का आदमी खून नहीं दे सकता.... ये कहाँ का नियम है ...देखिये बिलकुल फिट हूँ .."वही है ...मै उन्हें एक कोने में ले जाता हूँ...वे हांफने लगे है ..नियम समझा कर उन्हें शांत करता हूँ.....आंटी ठीक है ....पहले तसल्ली करता हूँ .....फिर कौन है जिसके लिए वे खून देना चाहते है ....अन्दर कमरे में झांकता हूँ.....उनका छोटा भतीजा है....एक्सीडेंट हुआ है ...अगले कुछ पल खामोशी तय करती है.....
...कुछ देर ठहर कर उनसे विदा लेता हूँ....वे पीछे से आवाज देते है....चलकर नजदीक आये है ...."सुनो अपनी आंटी से कुछ मत कहना "....मै सिर्फ सर हिलाता हूँ.......".ओर अपने बाप से.भी ...."
सीडिया उतरते वक़्त बादल गरजे है .....बाहर बारिश है ......

2009-02-03

ज़िंदगी है एक मुकम्मल किताब ...आप क्यो धीरे -धीरे पन्ने पलटते है


सके पास उतनी ही खुद्दारी है जितनी जीने के लिए जरुरी है उसके घर में कोई किताबो की शेल्फ नही है .शायद ही .किसी लेखक का नाम उसने सुना हो , कोई शेर उसे मुह जबानी याद नही है .न उसे गिटार बजाना आता है न कविता लिखना . कभी कभी अपनी " नन्ही' को सुलाते वक़्त वो किसी गीत को लोरी में तब्दील कर लेता है ओर उनके बीच में अपनी तरफ से कुछ शब्द. यही उसकी रचनाधर्मिता है ,स्कूल की कम्पलसरी हाउस मीटिंग के अलावा शायद ही किसी मंच से उसने दो शब्द बोले हो . उसने कभी कोई व्रत नही रखा .ना किसी भगवान् की तस्वीर अपने ऑफिस की दीवार पे लगायी . हॉल में किसी भावुक सीन पर वो चुपचाप रोता है ..किसी बर्थडे पर वो शायद लेट पहुंचे . पर किसी मौत पे उसकी हाजिरी लाज़मी है . अक्सर शाम को बच्चो के साथ पार्क में फूटबाल खेलता दिख जाता है , कभी ऑफिस से लौटी अपनी पत्नी के लिए उसे चाय बनाने में कोई हिचक नही होती है . अपने बूढे माँ बाप की डांट वो अब भी सर झुका कर खाता है ,  दोस्तों के लिए वो अब भी अपनी "एफ.डी" तुड़वा देता है ..उसका चेहरा इतना आम है कि उसे याद करने के लिए आपको दिमाग पर जोर देना पड़ता है ..


अजीब बात है फ़िर भी पिछले कई सालो से चित्रगुप्त की रेटिंग में वो टॉप टेन में है .





त्रिवेणी -






चाँदनी रात मे भी ख्वाब नज़र नही आते
सोचता हूँ ब्रश लेकर फिर सफेदी भर दूं ..........


गर्द से कितना पीला पड़ गया है चाँद

2008-09-18

सर पे धूप मिली तो याद आया ,मेरे आँगन मे एक बरगद रहता था

बचपन ऐसी अलमारी की तरह है जिसके हर खाने मे ढेर सारी बाते जमा होती है ओर   कुछ बाते उम्र के एक मोड़ पे जाकर अपना रहस्य खोलती है.  तब हम एक ऐसे   मोहल्ले मे रहते थे जो लगता था की कभी सोता नही था सड़क के पास एक खिड़की होती थी जो रात भर जागती रहती.  रात भर स्कूटर, कार की आवाज आती रहती. बस अड्डो के पास के मोहल्ले उन परिंदों  की तरह होते है जो आँख खोल कर सोते है .मैं ओर  छोटा  दोनों भाई  पैदल स्कूल जाते  ,जो  घर  से  थोड़ी दूर  होता . तब मैं शायद पहली या दूसरी  क्लास मे  हूँगा  अक्सर हम स्कूल जाते जाते बीच- बीच मे कई जगह रुकते  

स्कूल जाने के लिए हम शोर्टकट लेते जिसके लिए हमें एक कच्ची गली से होकर गुजरना पड़ता  गली के मुहाने पे हलवाई की दूकान थी  ओर सुबह -सुबह उसकी भट्टी पर चढी कड़ाई से पूरियों की खुशबू आती ,उसके पास से गुजरते वक़्त मैं अक्सर सोचता की बड़े होने पर ढेर सारी पूरिया खाया करूँगा   (जैसे की बड़े होने से ही पैसे अपने आप आ जाते है ) 
उसी  टूटी  फूटी  गली  के  दूसरे  कोने मे एक कोयले का गोदाम था ,जिसके दरवाजे पे अक्सर आर्मी की वर्दी पहने एक  लंबे खुले बालो वाला सरदार जिसकी  बड़ी ओर घनी दाढ़ी थी ,अक्सर कोयले को तोड़ता मिलता .कुछ हाथ दूर उसकी बैसखिया पड़ी रहती ,उसके बारे मे तब हम बच्चो के बीच तरह -तरह की अफवाहे थी ओर शायद उनका असर भी हम पर था , उसके  पास  से  गुजरते  वक़्त  छोटा  अक्सर कस-के मेरा हाथ पकड़ लेता ओर  मैं  भी  तेज  कदमो  से  वो  दूरी  तय करता .  हमे  देखकर वो अक्सर मुस्करा देता .एक रोज स्कूल की छुट्टी हुई ,गली के उस मुहाने पे उसने हमे आवाज दी ,छोटे का हाथ  मेरे  हाथ  पे  कस  गया  ओर मेरा दिल जोर जोर से धड़कने लगा फ़िर  भी  भय  पर  जिज्ञासा  हावी  हुई ओर  मैं लगभग छोटे को घसीटता   हुआ उसके पास गया उसने हाथ से फर्श पे इशारा किया वहां कुछ अंग्रेजी मे लिखा था  
"तुम्हे अंग्रेजी भी आती है ? " मैंने उससे पूछा , मेरे लिए ये बहुत बड़ी बात थी .
फ़िर उसने मुझे बहुत कुछ लिख कर बताया . कुछ पलो मे मेरा सारा डर जाता रहा ,  फ़िर ये हमारी रोज की दिनचर्या मे शामिल हो गया , रोज मैं लौटते वक़्त उसके पास कुछ देर रुकता , रोज छोटा मुझे माँ को बताने की धमकी देता , रोज माँ पूछती की देर क्यों हुईन  छोटे  ने  कभी  बताया    मैंने  उसकी  धमकी  मानी.
 एक रोज उसने कुछ लिखा जो मेरी समझ नही आया पर आज लगता है शायद उसने कोई अंग्रेजी की कविता लिखी थी वो रोज  कोई  एक मन्त्र  मेरे कानो मे  फूंकता "अपनी शक्ल पे कभी गरूर मत करना क्यूंकि इसके ऐसा होने मे तेरा कोई हाथ नही है " ,बड़े होके भी छोटे का हाथ ऐसे ही पकड़ना ओर 
न जाने कितने!   
मैं नही जानता वो कौन था ? उसका परिवार कहाँ था? किस हादसे मे उसकी टाँगे गयी? मुझे याद है पापा का ट्रांसफर  देहरादून हुआ तो मैं उससे मिलने गया छोटे ने छुपा के रोटी सब्जी मुझे दी , जब मैंने उसे देनी चाही तो उसने मना कर  दिया  भरे गले से बोला " आदते ख़राब नही करनी ,वो भट्टी  ही  अपनी  रसोई  है "उसने हलवाई की ओर  इशारा किया  .फ़िर मेरे सर पे हाथ रख के बोला
"बड़ा होके भी ऐसे ही बने रहना "
.वो हमारी आखिरी मुलाकात थी ,उसके बाद वो कहाँ है ,नही जानता ? जिंदा भी है या नही ?
बड़ा तो हो गया  पर  शायद मन उतना बड़ा  नही  रहा  जरूरतों ओर ख्वाहिशों ने इसे मैला कर दिया है




२१ सितम्बर सन्डे सुबह .४० मिनट ...
पिछले दो दिन से सूरज जैसे छुट्टी पर है .,सारा आसमान बादलो के हवाले से है किसी को रोडवेज़ छोड़ने के बाद उसी गोल चक्कर से मुड़ना है उल्टे हाथ टर्न लेते ही कुछ कदम आगे कोने पे हलवाई की वही दूकान है ,अचार –आलू की वही खुशबू ..गाड़ी की खिड़की से ..एक नजर कोयले की गोदाम में झाँकने की कोशिश .. …..बारिश की बूंदे विंड-स्क्रीन पर गिरती है ….3 -5 सेकेंड .बमुश्किल गुजरते है की पिछली गाड़ी के हार्न . जैसे जोर से ऐतराज जताते है ……आगे बढ़ जाता हूँ , रेडियो FM पर रॉक ओन का गाना है. " आंखो में जिसके कोई .तो .ख्वाब है खुश है वही जो थोड़ा बेताब है "…….”ढेर सारी बूंदे फ़िर शीशे को ढक लेती है ..

2008-08-25

"आदमी मे मगर जिंदा शिकायते रही "


इस वक़्त हर आदमी के पास शिकायतों का एक पुलंदा है ....सिलेवार लगाई गयी तकलीफों सहेज कर रखी है ..ये तकलीफे मगर इस "टेक्नोलोजी सक्षम" समाज को धीरे धीरे अंधेरे गलियारे की ओर धकेल रही है ,ऐसा गलियारा जिसके दोनों ओर सजे गमलों में केक्टस लगे है ..नकारात्मकता के केक्टस .....




सोमवार अक्सर ओर दिनों की अपेक्षा ज्यादा मसरूफ रहता है .शायद इतवार की छुट्टी के कारण...एक हॉस्पिटल का राउंड लेकर जब क्लीनिक पहुँचता हूँ...तो फरजाना दिख जाती है ...उसके साथ उसी की एक हम उम्र लड़की है...१९ साल की फरजाना के हाथ में एक फार्म है... रोजाना डेढ़ किलोमीटर पैदल चलकर टेंपो पकड़ कर स्कूल जाना उसकी रोज की कवायद में शामिल है ,सुबह उठकर भैंस का दूध निकालना ओर रात को लालटेन की रौशनी में पढ़कर वो इंटर में 87 प्रतिशत नंबर लायी है ...उसे 20 हज़ार का वजीफा मिला है चेक के रूप में ,इन पैसो को वो पढ़ाई के लिये आगे इस्तेमाल करना चाहती है....पर दिक्कत ये है की .किसी बैंक में उसका अकाउंट नही है ओर नया खाता खोलने के लिये बैंक वाले किसी खातेदार का साइन मांगते है .....इस शहर में वो सिर्फ़ मुझे पहचानती है
आज से ७ साल पहले १२ साल की इस बच्ची को अपनी माँ के सिरहाने एक हस्पताल में देखा था ...उसकी माँ को connective tissue disorder है ,इसलिए वे हर महीने-दो महीने एक चक्कर मेरे क्लीनिक का लगाते है ..
अपने साथ आयी लड़की के लिए वो हिचकिचाते हुए पूछती है ..क्या मै उसके फार्म पर भी साइन कर दूँगा ..बिंदिया ..दूसरी लड़की का नाम है...
वो दोनों उस समाज का प्रतिनिधत्व करती है जहाँ पढने से कतराते लड़को को पुचकार कर धंधे में बिठा दिया जाता है ओर पढने की इच्छा रखने वाली लड़की की पढ़ाई जारी रखने के लिये बेहद चतुराई से रखे गये "तथाकथित नैतिक' ओर सामाजिक तानो बानो को फलांघने का उलहाना भी लंबे समय तक झेलना पड़ता है इस दोयम दर्जे के समाज की तमाम बाधायों से वे लड़ती है पर अपनी संघर्षो की कड़वाहट को सहेज कर नही रखती .....अपने सपनो को सहेजती है
मै अपने बैंक मेनेजर को फोन करके साइन कर देता हूँ.... जाते जाते वो मेरे लेप टॉप पर धोनी को देखकर पूछती है .आप धोनी के भी फैन है(दसवी क्लास मे उसकी फर्स्ट डिविसन आने पर मैंने उसे कलाम की किताब "विंग्स ऑफ़ फायर ".दी थी )....मै उससे कहना चाहता हूँ मै हर उस इंसान का फैन हूँ जो असल जिंदगी में हीरो है .......पर सिर्फ़ मुस्करा देता हूँ...


सोचता हूँ अब इन नेज़ो को तराश लूं
ओर घोप दूं आसमान के सीने मे.........

इल्म क़ी बारिश हो ओर वतन भीग जाये

 













नेल्सन मंडेला अपनी आत्मकथा मे लिखते है की किसी ने उनसे पूछा कि "आप २७ साल जेल मे बंद रहे आपको कही गुस्सा नही आया ?ओर आप उसी जेलर को अपने सम्मान समारोह मे बुलाना चाह कर सम्मानित कर रहे है क्यों ?वे कहते है मुझे बहुत गुस्सा आता है इसलिए मैं इन लोगो को अपने साथ जेल के बाहर नही ले जाना चाहता मैं इनसे आजाद होना चाहता हूँ....
-आहा जिंदगी से


2008-08-13

मेरे तजुर्बे बड़े है मेरी उम्र से



दोपहर एक हॉस्पिटल से कॉल आयी..रास्ते में भीड़ भरी सड़क पर अचानक आगे गाडियों में ब्रेक लगी ,उल्टे हाथ में मॉल पे लाल रंग से बड़ा सा मैकडावल लिखा हुआ ..उसके बाजू में "सिंह इस किंग" के पोस्टर पे अक्षय कुमार हँसता हुआ ...एक कोने पे बैनर टंगा हुआ ...केटमास पर ५०% की छूट ....दूसरा बैनर ......लिलिपुट पर ७०० रुपये की खरीदारी पे एक बैग....कार का शीशा खटका...ऐ साहब झंडा लो न....१० -१२ साल का लड़का .......बैनर को पढने की फ़िर एक कोशिश...साहेब लो न...मै .गाड़ी में लगायूँ ....कहते कहते उसने लगा दिया ....एक ओर दे ...मै उससे मांगता हूँ....पीछे गाडियों का हार्न बज रहा है...कितने का है एक ?मै पूछ रहा है ...एक रुपये का.....गाड़ी में चिल्लर ढूंढता हूँ ...एक पाँच का सिक्का हाथ में आता है....उसे दे देता हूँ....गाड़ी आगे बढाई है ...कुछ दूर चलने पर फ़िर गाड़ी रूकती है...शीशा खटक रहा है....साहेब ....बाकी के झंडे ....वो हांफता हुआ तीन झंडे मुझे देता है.....पिछले दो मिनट वो भागा है...... पीछे वाली गाड़ी का हार्न फ़िर बजने लगा है ..मै उसे कुछ कहना चाहता हूँ ..पर वो भीड़ में गुम हो गया है......
१० साल गुजर गये है आजादी ने बहुत कुछ बदल दिया है.....पर कुछ अब भी वैसा ही है......

रेलवे स्टेशन की ये पोस्ट कभी ब्लॉग शुरू किया था तब डाली थी...आज दुबारा वही दोहराने का मन किया ....जिन्होंने पहले पढ़ा उनसे गुजारिश की दुबारा पढ़े ....
13 august 2008 7.40pm




दिसम्बर की सर्द सर्दिया थी ओर कुहरा मुंह चिडा रहा था कुछ कुलियों ने अलाव जला लिए थे ओर हम गर्म जकेटो की  जेबों  मे  अपने  हाथो  दिए  ट्रेन का इंतज़ार कर रहे थे , समय काटने के लिए लगभग सारी "आउटलुक "पढ़ चुका था ,बावजूद इतनी सर्दी के नई दिल्ली  का  वो रेलवे स्टेशन अभी भी सोया नही था ,हम तीनो दोस्त छुट्टी बिताकर वापस कॉलेज सूरत जा रहे थे ओर रात १० बजे की जम्मू-तवी मे हम लोगो का रिज़र्वेशन था ,कोहरे की वजह से ट्रेन लेट थी ,घर सी लायी हुई आलू - पुरिया को हमने अखबार बिछाकर खाना तय किया ,वैसे भी पिछले दो घंटो से सिगरेट ओर चाय पी-पी कर फेफडे ओर पेट दोनों गाली देने लगे थे ,एक हफ्ते से घर मे रहने से उन्हें भी अब इस धुंये की आदत सी नही रही थी ,घर जाकर जैसे सिगरेट की तलब ख़त्म हो जाती थी ओर भूख बढ़ जाती थी ओर उस  एक  हफ्ते  मे  हॉस्टल  की  कभी एक कटिंग चाय ओर सुखी ब्रेड का वो butter toast,या सुखा पोह्वा या शेट्टी की कैंटीन का वो अजीब सा  संभार  का पानी छोड़ के आलू के ,गोभी के ओर तमाम परांठे  भी  माँ देसी घी मे तिरा कर खिलाती थी जैसे एक हफ्ते मे ही हमे गामा पहलवान बना के वापस भेजेगी ....
हमने एक suitcase को तिरछा किया ओर अखबार उसपे फैला कर अपने तीसरे दोस्त को आवाज दी जों रॉबर्ट  लुड्लाम के नोवेल मे घुसा हुआ था ,पुरी मे आलू -गोभी डाल के उसका रोल बनाके मैंने पहले को पकडाया ही था कि नीचे जमीन पे घिसट ता एक दस बारह साल का लड़का ठीक सामने आकर खड़ा हो गया .......मैले - कुचेले से कपड़ो मे उसने दो कमीजे ..........अपने बदन से ठंड को रोकने के लिए लिपटा रखी थी ......उसके हाथ मे ब्रुश था दूसरे मे बड़ा सा कपड़ा जों कई तहे बनाकर वो  शायद फर्श पे चलता था ,उसके कंधे पे एक खाकी रंग का स्कूल का बस्ता था पर उसमे किताबे नही जूते- पालिश करने का सामान था .......
उसने एक नजर हमारी आलू-पुरी पे डाली फ़िर अजीब से ढंग से हमारे जूतों को घूरता हुआ बोला "पोलिश करवाएंगे ? 
मेरे दोस्त ने उसे आलू-पुरी का एक रोल ऑफर किया तो उसने अजीब से अंदाज  में  उसे घूरा "पोलिश करवानी है "?  
उसने  हामी  भरी  ओर अपने जूते उतार दिए ,जब तक वो पोलिश करता रहा  उसने  एक टुकडा नही तोडा .....हम दोने ने स्पोर्ट्स   शूसपहने थे ....."कितने पैसे "  
मेरे दोस्त ने पूछा .तीन रुपया ?
मेरे दोस्त ने दस रुपये का नोट निकाला ...."छुट्टा नही है साहेब"
मेरे पास भी नही है ,अभी ट्रेन जाने मे वक़्त है तू इधर उधर घूम ले जब हो तब दे देना . '
वो लड़का एक टक मेरे दोस्त को देखता रहा ......उसके घुंघराले लंबे बाल माथे पे गिरे ........उन्हें हटाते हुए वो कुछ देर  तक  ठिठका  रहा  फ़िर आलू पुरी पे एक निगाह मार के घिसटता हुआ आगे चला गया ...हमने जल्दी जल्दी आलू पुरी ख़त्म की ,हमारा तीसरा दोस्त अब भी नोवेल मे दुबका हुआ था .............
"चाय पिएगा ? मैंने उससे पूछा उसने  हाँ  मे सर हिला दिया 
.हम दोनों उठकर आगे जा के एक चाय के स्टाल पे खड़े हुए वहां तीन चाय का आर्डर दिया ....एक सिगरेट फ़िर जल गयी .कितने पैसे "?मैंने पूछा . तीस रुपया . मैंने जेब से सौ का नोट निकाला ,साहेब छुट्टा दो . मैंने पर्स टटोला तो उसमे छुट्टा नही था ,मेरे दोस्त ने अपने पर्स मे से कुछ पैसे निकाले तो ढेर सरे सिक्के छन छन करके उसके पोलिश किये हुए जूतों के पास गिर गये . . मैंने उसे देखा तो उसके चेहरे पे मुस्कान आ गयी.....हम दोनों चाय के कुल्हड़ हाथ मे लिए लौटे तो वहां वही लड़का हमारे . दोस्त के पास उक्डू हो के बैठा था .....जो की अभी भी किताब मे मगन था ,
उसने हथेली मेरे दोस्त के आगे फैला दी "साहेब आपके बाकी पैसे "।



११ सल् पहले दिल्ली के रेलवे स्टेशन की एक रात

2008-07-08

अच्छा लिखने से कही बेहतर है अच्छा इन्सान होना

क्या आपने कभी उस रिक्शा वाले को " टिप" दी है जो ..आपको मंजिल पर पहुंचाकर अपना पसीना पोछ रहा हो ? ढेर सारे बच्चो को लेकर कही ढलान पर अटक कर रिक्शा वाले की मदद करने को जो बच्चे रिक्शा से उतर कर धक्का लगाते है …. बड़े होने पर वही बच्चे किसी ठेले पर भारी सामान ले जाते मजदूर के लिए अपनी गाड़ी धीमी नही करते ….ये जानते हुए की उनके पास गियर है …वे जब चाहे अपनी रफ़्तार कम या ज्यादा कर सकते है …..हम आप सब शायद वही बच्चे है जो बड़े हो गए है ।ऐसा क्यों है कि शिक्षा पाकर पढ़ लिख कर हम ओर ज्यादा आत्म - केंद्रित होते जाते है फ़िर उसे ‘यही दुनिया है ” के नारे के पीछे छिपा देते है .पढ़ लिख कर हम अपनी चालाकियों को ओर पैना करते है ओर अपनी कमियों को ज्यादा अच्छे तरीके से छिपाना सीख जाते है ….हम ढेरो आंसू किसी मूवी को देखकर बहा देते है ..पर अपनी संवेदना उसी हॉल कि सीट पर मूवी ख़तम होने के साथ छोड़ आते है . हर इन्सान अपने परिवार के लिए संवेद्नानायो से भरा है पर वही दिल एक अजनबी या मजलूम के लिये दर्द महसूस नही करता ?हो सकता है वो अच्छा पिता हो ?शायद अच्छा बेटा भी, पर क्या ये काफ़ी है ?
जिंदगी बहुत तेज रफ़्तार से भाग रही है ओर हम भी.... वक़्त के साथ शायद हमारे भीतर ढेरो भूले जमा हो जाती है ,ढेरो ऐसे शब्द जो कहे नही गये ,ढेरो ऐसे काम जो करे नही गये ..हमारे दिल का एक कोना ऐसी कई चीजो से भरा रहता है....कभी सोचा है आपने इन्हे उलीचना ?

चरित्र दो वस्तुयों से बनता है ,आप की विचारधारा से ओर आप के समय बिताने के ढंग से ..धारणाये बदल सकती है लेकिन चरित्र का केवल विकास होता है ।२१ साल के जो आप होते है 31 मे वही नही रहते …तजुर्बे सिर्फ़ गुजरने के लिये नही होते ,क्या क्या आपने उनमे से समेटा है ये महतवपूर्ण है .....जीना भी एक कला है कुछ लोग सारे भोग भोगकर भी उनसे मुक्त रहते है ओर कुछ लोग अध्यात्म की शरण मे जाकर भी इस संसार से मुक्त नही हो पाते ॥
मेरा एक सीनियर था कॉलेज मे जिससे मैं बहुत प्रभावित था ,वो दिखने मे अच्छा था ,पढने मे अच्छा था ,ढेरो लड़किया उसकी दोस्त थी ,अच्छा पहनता था ..एक दिन मैंने उससे पूछा ऐसा कैसे ?उसने कहा "आजकल की दुनिया मे "नोर्मल" रहना ही असाधारहण होना है,आप अपने वो काम वक़्त पर करते रहिये जिन्हें उसी वक़्त करना है ,सब चीजे अपने आप होती जायेगी ......
कई बार जब हम मेडिकल प्रोफेशन के दोमिलते है तो अपने पेशे के सुख दुःख भी बांटते है मेरा एक दोस्त ऐसे ही कई बार कहता है 'कई बार ऐसे ऐसे मरीज जिनके बचने की संभावना हम भी नही करते जाने किस चमत्कार से ठीक हो जाते है ओर वे हमें ढेरो आभार ओर आशीर्वाद देकर चले जाते है ,जानते हो कभी कभी जब मैं किसी मरीज के परिवार वालो I.C U मे कहता हूँ की चिंता मत करो सब ठीक हो जाएगा तो ऐसा लगता है की किसी खिड़की पे बैठा भगवान् हंस रहा है.....कही कोई ईश्वर है ......जिसके भय या श्रद्धा से हम अनुशासन मे रहते है
वक़्त बड़ा ही बलवान है इसके एक पन्ने पर जो मनुष्य आपको देवता सा दिख रहा है शायद अगले कुछ पन्नो मे वही आपको साधाहरण से भी गया गुजरे लगा...परिस्थितिया ओर हालात आपके मुताबिक नही चलते ...मेरी कालोनी में,मेरी गली में एक पति पत्नी पता नही कौन सी कुमारियों के बाबा से प्रभावित होकर अपने घर के ऊपर एक आश्रम सा बना लिया है कई बार इन पति को अपनी ऐ।सी गाड़ी में इन कुमारियों को उनके बाबा के साथ ढोते देखा है ॥सुबह उनके ७७ साल के पिता को रिक्शा के इंतज़ार में खड़े देखा॥वे दिल के मरीज़ है ।किसी डॉ को दिखाने जा रहे थे ..ऐसा भक्ति का क्या मूल्य जब आपने रोजमर्रा के कर्तव्य पूरा नही कर रहे ?
हो सकता है उसके घर में कोई किताबो की शेल्फ न हो ..किसी लेखक का नाम उसने न सुना हो , कोई शेर उसे मुह जबानी भी याद न हो ,..किसी मंच पर उसने दो शब्द न बोले हो लेकिन अक्सर शाम को वो बच्चो के साथ पार्क में फूटबाल खेलता दिख जाता है , कभी ऑफिस से लौटी अपनी पत्नी के लिए उसे चाय बनाने में कोई हिचक न होती है .....अपने बूढे माँ बाप की डांट वो अब भी सर झुका कर खाता है , दोस्तों के लिए वो अब भी अपनी ऍफ़ डी तुड़वा देता है ..उसका चेहरा इतना आम है कि उसे याद करने के लिए आपको दिमाग पर जोर देना पड़ता है ..पर यकीन जानिये वो हम आप से कही बेहतर इन्सान है

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