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2011-12-20

....देवदास अब यहाँ नहीं रहते !

 वो  दिसंबर के आखिरी  हफ्तों वाली  सर्द रात थी ..आधी रात मोबाइल ने जगाया था
"दुनिया भर की  लडकिया एक सी होती है प्यार दिल से करती है ओर फैसले दिमाग से ".......उस ओर नशे में रुंधी  आवाज .....
"नीलाभ "??
   ......"तुम्हारी" डेस्टिनी" वाली  सुई अब  मुझपे  आकर रुकी है  " उदास हंसी !
"तू  कहाँ पे है"?  अकेला है या कोई साथ में है ? मै उनीदी आँखों से घडी देखी थी .. फोन के बैक ग्रायूंड में शोर  था  .वो बाहर  था ...यू एस  में  इतने  कडाके  की  ठण्ड  में  .
"मै उससे प्यार करता था यार ...."
इस सवाल का जवाब बरसो से जाने किस तहखाने में दफ़न है ! ! !
"मुझे  लगा उपर वाला मुझे   बाईपास  कर  जायेगा  .....पर उसके पास भी मार्कर है शायद !"
कोई  बात  नहीं  ,वक़्त  ही  है  साला  गुजर  जाएगा  ..नहीं  तो  धक्का  दे  देंगे  इसे .....मैंने  उसे   झूठा  दिलासा  दिया
"साले  खुदा  के  ओफ्फिस  में  घूस  नहीं  चलती तुझे तो मालूम ही है ."
बरसो बाद दुनिया  के  अपने  अपने  हिस्से  में  एक  दूसरे  को  बिना  बताये  हम  फोन  के  दूसरी  तरफ   रोये थे .!
बाज  वक्तो  में  कुछ  ग़म  कित्ते  बड़े  ग़म  मालूम  होते  है .....दिल   के  ग़म  !

 कोई डेड महीना गुजरा   मैंने  ऐहेतियातन  ख़ामोशी  ओढ़  ली ...वो वक़्त  ऐसा ही होता है" इम्तेहानी किस्म" का ....बड़ा तकलीफ देह .....मीलो  दूर तक फैली  ठंडी  सन्नाटो भरी सडको सा ..जो कहाँ ख़त्म होती है दिखता नहीं !
 वो  फिर  फ़ोन  पर  था  ......इस दफे संभला हुआ , थोडा संजीदा
."बैचैन  रहा यहाँ वहां भटका .....हॉस्पिटल  नहीं  गया  .....कुछ दिनों बाद   हॉस्पिटल  गया  तो  एक  16 साल की नीग्रो  लड़की  को  देखा   ....प्रेगनेंट....वो  भी  ट्विन्स  .....हॉस्पिटल स्टाफ ने .बहुत  समझाया  एबोरशन   के लिए ...नहीं  मानी  ...बोली  लड़  लूंगी  ...कर लूंगी .जी लूंगी ........16 साल  की  लड़की  यार  ! ओर  हम  साले   पढ़े  लिखे  आदमी !!....दुनिया  ख़त्म  करे  बैठे  है ! मै  किससे  खौफ जदा हूँ  यार  ...किससे भाग रहा हूँ .....खुद से ."

बीच में वही गैप  जो अक्सर सिगरेट के कश   लेने के दौरान होता है ...

कई  रोज से  अस्पताल में एक बूढ़ा बीमार हालत में था ,आया था तो  तीन दिन तक रोता रहा ..अपने बेटो को याद करके .वे उसे घर में नहीं रखना चाहते .........दो दिन पहले  उसके बेटो को बुलाया गया .कायूँसिलिंग की ...जब वे तैयार हो गए तो अचानक  उस रात  बूढ़े ने मना कर दिया मुझसे बोला  "डॉ वे  अपने भीतर से मेरे लौटने का वेलकम नहीं करते  .....प्रेशर में कर रहे है ,मै ऐसा रिश्ता नहीं चाहता .....

फिर वही गैप.....

" जानते हो उस रात घर लौटते वक़्त मुझे लगा मै भी तो ऐसा ही कर रहा हूँ ......".दूसरा शख्स उस रिश्ते को जारी नहीं रखना चाहता ..ओर मै उसे इस रिश्ते में  रोकना चाहता हूँ क्यों ? क्यूंकि मै उससे प्यार करता हूँ...पर मै ये क्यों नहीं एक्सेप्ट करना चाहता की अब वो मुझसे प्यार नहीं करता ...ये तो एकतरफा प्यार जैसी जिद हुई ना ."

इस बार दो कश वाला गैप ...
"तय कर लिया उसकी फीलिंग की रेस्पेक्ट करूँगा ओर "वी वाल्क लाइक एडल्ट "  !    (एक सांस ).....................मुश्किल था पर सच है ..."

.ऐसा लगा जैसे उसकी  सिगरेट भी ख़त्म हो गयी है ...या उसने खाली जलने  छोड़  दी है ...

"सुन ,डब्लू  .एच .ओ  में  अपलाइ   किया  है  ,,,कुछ  पोसिटिव  साइन  है  निकल  जायूँगा"
"ओर  अमेरिका  .....तेरा तो सपना था ....अब पूरा होने वाला है फिर ....."
"कुछ है जो सपनो से अलग है ....क्या है  ?एक्सप्लेन नहीं कर सकता ..टेम्परेरी है या परमानेंट ... नहीं जानता ..पर कुछ है "........
.वो संजीदा था  उसकी  संजीदगी  के बेकग्राउंड में गम की मिलावट  नहीं था ...एक अजीब सी मजबूती थी ....
"तू ठीक है ना ?
हाँ ....

 जिंदगी की तलबो में  फेरबदल लाजिमी  है ..
सके बाद  मेरे  मोबाइल  में  अजीब अजीब  से   नबर सेव होते फिर बदल जाते ! .अलग अलग देशो से अलग अलग वक्तो में   कई  देश   अफ्रीका नाम्बिया .इथोपिया .. ..इराक ओर न जाने कहाँ कहाँ ...साल दर साल गुजरे....
उसकी बाते   बदलनी  लगी "  जो  दुःख  "मेरे" के दायरे से बाहर हो वो   हमारे लिए   इंडिकेटर   है ....ओर हम सोचते है कोई दूसरा रुक जायेगा"
  पने पिता की खबर सुनकर  सिर्फ तीन दिन के लिए आया था वो...माँ उसकी पहले से नहीं थी....उसके शहर तक जाने में वक़्त लगता है .हम चार घंटे के लिए साथ थे उस दिन. पर बात सिर्फ कुछ मिनटों के लिए हो पायी थी ...उसके घर में कमरे की बालकोनी में .....   .मैंने सिगरेट छोड़ दी है पर मै उससे कहता नहीं . वो अपने हाथ की सिगरेट बात करते करते  आगे बढाता है तो ...पी लेता हूँ
" ये देश बीमार है ... मर रहा है....  डाइगनोस  सब  कर लेते है ...कारणों को भी  पहचान  लेते है पर  कमाल है इसे रोकने के लिए कोई कुछ करता दिखाई नहीं देता  .....उसके पास कहने को बहुत कुछ है ,वो बहुत से चीजों को दुरस्त करना चाहता है !

तरकीबन सात महीने  बाद
 उसके भाई फोन पर है ..मुझे लगा उसकी शादी की बाबत  या भारत  लौट कर आने के बारे में मुझसे कहेगे.......पर उनकी  नाराजगी दूसरी है ........ तुम्हारा  दोस्त पगला गया है ...करोडो की जमीन ट्रस्ट को दे रहा है ....स्कूल चलायेगे ... ज़माना अब वैसा नहीं रहा है....इंडिया के हालात उसे पता नहीं है "
वे ओर भी  बहुत कुछ कहते है ......पर मुझे सुनाई  नहीं देता   !
पिता से  वसीयत में मिली जायदाद .को वो......
 .दुनिया का एक्सपोज़र अपने आप में  एक अलहदा किस्म की किताब है !  तमाम  वक़्त  गुजर जाते है ,ऐसे वक़्त भी जो लगता है गुजरेगे नहीं....

2010-11-22

इत्तेफाको के रिचार्ज कूपन नहीं होते दोस्त !!!!


हैदराबाद का एयरपोर्ट शहर से काफी बाहर है ....पर जल्दी आना यहाँ खलता नहीं है...  ......…..वक़्त अपने आप गुजर जाता है .... सफ़र अपने आप के साथ वक़्त बिताने का एक बेहतर जरिया है ...इंट्रो स्पेक्शन का भी.....  बोर्डिंग पास लेने की  लाइन पर  एक कपल है आगे ....लड़के ने.. रीबोक के शूज़ पहने है ....ब्लू जींस .....टी शर्ट पर लिखा है....आई एम् बोर्न फ्रीसाथ में….सर से पैर किसी कपडे से लिपटा पूरा जिस्म.है........झांकती दो आँखे बस.... मुझे अभि  याद आता है .....कहता था....औरतो के पैदा होते ही  रवायते बर्थ सरटिफिकेट के साथ स्टेपल हो जाती है ...
.दुनिया भर में  घूमने का शौक है उसे ...  ऐसे लोग  गुल्लक की माफिक होते  है ...ढेरो तजुर्बे अपने भीतर जमा किये..........चेक इन के बाद किताबो की एक शॉप में कुछ वक़्त गुजार कर मै एक जगह तलाश कर बैठा हूँ ...हाथो में अखबार लेकर ....कोंफ्रेंस में अकेले आना ..सफ़र करते वक़्त  ज्यादा महसूस होता है ...एक नजर आस पास दौडाता हूँ...कानो में हेड फोन लगाये एक लड़का बराबर में बैठा है.....दूसरी ओर मोहतरमा मोबाइल में उलझी है .अंग्रेजी में बात करती...बीच में बीच में तेज तेज कुछ शब्द कान में  पड़ते है...   ...ओह आई मिस यू टू.बेबी......तकरीबन  हर पांच  मिनट बाद .....सामने बैठी गुजराती फॅमिली में से एक १२ -१३ साल की लड़की हर बार इस "मिस यू " को सुनकर अपने प्ले स्टेशन से आँख ऊपर उठाती है...एक मिनट देखती है ....फिर खेल में लग जाती है .....प्रति व्यक्ति आय दर २० रुपये से कम......केपरीकोन राशि वाले ज्यादा रोमांटिक होते है ....करन जोहर के मुताबिक हिन्दुस्तान में राइटर की कमी है .......सारे पेज पलटकर मै  अखबार से  बाहर  निकलता  हूं  
ख़ूबसूरती अपना स्पेस भीड़ में भी तलाश लेती है ... एक.गोरा  गोल चेहरा ...बड़ा सा जूडा  .माथे के ठीक बीचो बीच एक बड़ी सी गोल बिंदी.....काली साड़ी.जिसके  बोर्डर पे लाल रंग है ... चलता आ रहा है ..साथ चलने वाले जैसे बेक ग्रायूंड में है....कहते है खूबसूरत लोगो को अपनी ख़ूबसूरती  का इल्म होता है ......उसे  भी है .. मेरे  सामने  दायी  ओर तीसरी   सीट खाली है .....वे नजरे  इधर  उधर घूमतीमुझ पर रुकी है ....  ....आधा मिनट.....अभी भी रुकी है .....मै थोडा असहज होने लगा हूँ......हिम्मत   करके उन आँखों   का पीछा   करता हूँ.... वे ब्राउन आँखे है ..... ब्राउन ……..... एयरपोर्ट  ने मुझे फिर यकीन दिलाया है के दुनिया गोल है ..... उन  होठो पे मुस्कराहट आयी है….जानी पहचानी मुस्कराहट. ...
मै ब्राउन आँखों संग   कई साल पीछे दौड़ जाता हूँ......
 ब बी एस एस  ए लार की तारो वाली साइकिले हमारे लिए सिटी होंडा सी थी.....हमारे गेंग की आवश्यक शर्त भी....मूंछे बेतरतीब सी उग रही थी....रोज रेजर पे एक उम्मीद भरी निगाह दौड़ती थी .ओर कशमकश के  साफ़ करूँ या नहीं...... संजीव ओर मैंने लगभग साथ साथ साइकिले खरीदे थी ...फर्क इतना था उसकी मे गोल्डन लाइने थी .....स्कूल जाने से पहले उसके घर के बाहर..... १० मिनट खडा होना मेरा रोज का नियम था......दस मिनट इसलिए   के  वो टॉयलेट    में सबसे ज्यादा वक़्त लगता......फिर आधी कमीज पेंट में खोंस्ता हुआ सोरी -सोरी   कहता हुआ बाहर निकलता..उसी वक़्त .उसकी गली में  दो सहेलिया भी अपने स्कूल रवाना होती.. ब्लू ड्रेस  ओर स्कर्ट  पहने .रेड टाई के साथ.....लडकियों के  बेस्ट कोंवेंट स्कूल सोफिया की ड्रेस थी वो ..मेरे पास से से  गुजरते वक़्त पता नहीं  क्या बुदबदाती  ओर खी  खी करती . उनमे से. ब्राउन आँखे वाली  अक्सर  गली के किनारे  पहुंचकर  पीछे मुड़कर देखती फिर हंसती .... ..मै कई बार टाइमिंग  चेंज करता ..  पर उनकी खी खी रोज मेरी पीठ पे चिपक जाती .....झुंझला कर मै   संजीव पे गुस्सा  होता….. मुझे लगता वो  हमारे हिंदी मीडियम में होने पर हंसती है ...
घमंडी है ....कोंवेंट वाली है न ....

. वो रास्ते में मुझे  बताता
माँ   शहद मिला दूध देती है रात को.....इससे कब्ज नहीं होगा बताता ... जाने कौन सा  शहद था.... पिछले छह महीनो से बे असर था...... 
"साले फीते बाँध लिया करो .किसी दिन बड़े जोर से गिरोगे ...संजीव कहता है .पर मै फीतों को ठूंसकर जूतों में फंसा देता हूँ....मुझसे फीते बंधते नहीं
 र्दिया बहुत अच्छी लगती है ....बस सुबह के उस हिस्से को  छोड़कर जिसमे पापा की पहली आवाज को जानबूझ रजाई से  ओर ढका जाता ....गर्म रजाई को छोड़ना बड़ा तकलीफदेह  काम है  ...मां रोज पानी गर्म करती है ओर मै सिर्फ हाथ मुंह धोकर बाहर निकल आता हूँ....वे धीमे से रोज कहती है ...आज छोड़े दे रही हूँ...कल नहा लेना .शुक्र है पापा का बाथरूम दूसरा है.......
सर्दियों में वो रोज होमियोपेथिक की तीन चार दवाइया चलने से पहले गटकता ...कभी कभी उन सफ़ेद मीठी गोलियों को मै भी ले लेता..उस रोज आफती  धुंध है ..  ....हम मुंह से धुया निकाल कर धुंध से मिला रहे है ... हाथो में  ठण्ड लग रही है ...इसलिए   एक हाथ  जेब में है .......मां  के बुने  ग्लोव्स मुझे फेशनेबल  नहीं लगते .मुझे लेदर के ग्लोव्स चाहिए ...काले ....जैसे हमारी क्लास के नीरज के है ...पर पापा सुनते नहीं ... "तुम्हे  जिद सूट  नहीं करती ' वो अक्सर कहता है .....धुंध में ही हमें जानी पहचानी दो परछाईया दिखने लगी है .....ब्लू ब्लेज़र ....व्हाईट जुराबे ...घुटनों तक.....
आधी धुंध में वे दोनों साइकिल रोके खड़ी है..कुछ परेशां सी....फ़ौरन साइकिल
पर नजर आती है .चेन उतरी हुई है ....कुछ फंसी हुई सी..... 
तुझे कसम है.. गर तू रुका तो....मै पहले ही उसे चेतावनी
  देता हूँ......देखना मत....
पागल है यार .उनका इक्जाम है ...देख कितनी रुआंसी हो रही है ...वो नजदीक आते आते धीमे से फुसफुसाता है

सीधा चल
  .....मै फुसफुसाता   हूँ.....बेक ग्रायूड में उनकी हंसी अब भी मेरे सर में सवार है ...
एक्सयूज़ मी.......कानो में कुछ सुनाई दिया है ....या शायद मेरे मन का
वहम............पर मैंने साइकिल तेज भगा दी है ......ओर तेज........ओर तेज......सर्दियों में भी मेरे माथे पर प"तुने कुछ सुना ".वो कहता है "उन्होंने शायद रुकने को कहा था ....".
नहीं तो ....मै झूठ बोलता हूँ

अच्छा है अकड़ ढीली होगी आज .मै
  कहता हूँ.....पर... जाने क्यों मन थका थका सा ..खाली है..  एक अजीब सी गिल्ट  ब्लेज़र पर  जम गयी  है .....जाने क्यों भारी लगने लगा है
हमें रुकना चाहिए था यार  .”...स्कूल के साइकिल स्टेंड पर साइकिल खड़ा करते वक़्त वो कहता है ..... मेरा ब्लेज़र ओर भारी हो गया है..
करीबन १५ दिन बाद ...किशोर एक पर्पोज़ल लाया है ..सोफिया में फेयर है ...सिर्फ चुनिन्दा स्कूलों को इनविटेशन है ...कोट पेंट ओर टाई का जुगाड़ वो कर लेगा ...हम पांच लोग है .. थ्रिल ओर  डर के मिले जुले   परसेंटेज पर इच्छाये ओर लड़कपन हावी है सो... उस जोखिम  को. उठाने की सामूहिक हामी भरी जाती  .. है.
धडधडाते दिलो से हमने  फेयर के  अन्दर एंट्री कर ली है .सेंत जोन्स में किशोर के दो दोस्त है शुरूआती मोरल सपोर्ट के वास्ते वे कुछ देर साथ है ...मै ओर संजीव आहिस्ता -आहिस्ता एक चौकन्नी बेफिक्री के संग उस ग्रुप से   अलग होते है...ठेठ बोयस स्कूल से पोलिश कोंनवेंटी  लडकियों के बीच पहुंचना भला सा लग रहा है ..कुछ मिनटों के बाद एक स्टाल हमें अपनी ओर खींचता है ..बन्दूक से गुबारे फोड़ने  पर इनाम है  ... हम दोनों दोस्त से पहले दो लड़के ट्राई  कर रहे  है .. स्टाल  वाली लडकिय चीयर्स करती है ..ऐसे प्रोत्साहन कम्बखत ओर नर्वस करते है ...मेरा नंबर आने तक हाथ  पसीने से भर गया  है ... पहले चार  शोट ठीक लग गए है ...मुझे तीन ओर निशाने मारने है...पांच शोटो में से ..आँख  निशाने की ओर साधते वक़्त  जाने क्यों किसी जानी पहचानी नजर को दाई ओर महसूस करता हूँ ....शोट लगाते ही उस ओर देखता हूँ.....ब्राउन आँखे वहां खड़ी है .....शोर मचा है ...शोट ठीक लगा है ...
"चल "पीछे से वो मेरे कान में फुसफुसा रहा है ...पसीने को हाथो से पोंछ जाने  क्यों मै अगला शोट ले लेता हूँ...मन में भगवान् को याद करता हुआ ...भगवान् जी सुन लेते है ..
ब्राउन आँखे हिली नहीं है ...आखिरी शोट है ....आँखे बंद करके वो तुक्का सही बैठ गया है......
मैडम आयी है ..वहां फुसफुसाहट शुरू हो गयी है .....बन्दूक थामे मै किसी मैडम को नजदीक खड़ा देखता हूँ.....
"मैडम . आप प्राइज़ डिस्ट्रीबूट करेगी.."....स्टाल वाली दोनों लडकिया मैडम से रिक्वेस्ट कर रही है ....ब्राउन आँखे चलकर नजदीक आयी है .....तो स्टाल उसका भी है ....
मैडम मेरी ओर मुड़ी है ".वेल डन  माय बॉय" .चश्मा ठीक करके वो मेरे कोट से स्कूल का नाम पढने की कोशिश कर रही है .....
"कौन सी क्लास में हो ...."
मेरी पीठ पर पसीने की एक पूरी लहर पैदा हुई है ओर ऐसा लगता है जैसे मेरे दिल की धड़कन वहां सबको सुनाई दे रही है .....धक्.. धक्
 १२ डी मैडम ...मेरी आवाज ओरिजनल नहीं है ....
गुड मैडम मुझे एक पैकट पकड़ा रही है ....
 मै ब्राउन आँखों को देखता हूँ.....वे मुस्करा रही है ....
उस दिन पहली बार मैंने उसकी आँखों को इतनी देर तक देखा है ...नजदीक से .....वे कितनी सुन्दर है ! मै थैंक-यू कहना चाहता  हूँ ...पर वो मुझे घसीट कर ले जाने लगा है ..... किशोर की किसी से लड़ाई हो गयी है ...पोल खुले  उससे पहले हमें निकलना होगा ......हम निकल गए है!
 उसके बाद की दुनिया मसरूफ है ....१२ में हमारा आखिरी साल .बोर्ड का इक्जाम ...संजीव को सिविल सेवा में जाना है .ओर मुझे मेडिकल में ..हम जानते है ...हमारे रस्ते आगे जुदा होने है ........अगले दो सालो में  मेडिकल एंट्रेंस मेरी   प्राथमिकता  है ....सो उस दुनिया के सफ़र के वास्ते फिलहाल संजीव से उतनी फ्रीक्वेंट मुलाकाते नहीं है .....
 ब्रायून आँखे फिर कभी मिली नहीं.....
 इंदोर जाने वाले यात्री ....कुछ अनायूसमेंट हो रहा है .वो खड़ी हुई है ...एक छोटा बेग लिए वो आहिस्ता आहिस्ता .....चल रही है ...मेरे पास एक सेकण्ड के लिए रुकी है ...नीचे देखती है ....फिर मुस्कराती है .........जहाँ तक नजर जाती है मै  आँखों  से  उसका पीछा करता हूँ....... फिर वो भीड़ में गुम गयी है ...संजीव का नंबर   मोबाइल पर मिलाते   मेरी निगाह नीचे अपने जूतों पर गयी है......फीते अब भी खुले है

2010-10-03

तटस्थता की हिप्पोक्रेटिक ओथ ......




Thank you god for the world so sweet 


सार्दियो में शाम जैसे कम्पलीमेंटरी मिलती है, दिन का मूड हुआ तो दे दी. उस रोज शाम की अब्सेंट दर्ज है. जनवरी की कोई  रात है. रेफेरेंस देखकर लौटते वक़्त मोबाइल बजा है. मेडिकल कॉलेज के बाहर  अपनी  गाडी में मेरा दोस्त है .अमूमन एक शहर   में होकर भी  आप  कम  मिलते  है .अपने- अपने हिस्से  की  मसरूफियत के वास्ते .उस दिन  इत्तेफाक से मिले है . शायद वो भी कोई रेफरेंस देखकर लौट रहा है . उसकी गाडी में हमेशा एक सिगरेट रहती है .पिछले कुछ सालो से मेरी छूट गयी है .गाहे बगाहे होती है .गेट से थोडा हटकर  एक कोने में हम  दोनों किसी पेशेंट के मुताल्लिक गुफ्तगू में उलझे है.

सकी पीठ पीछे  मेडिकल  से  एक स्ट्रेचर  बाहर रहा है  .दो लोग हाथ में उठाने वाले स्ट्रेचर पर किसी शरीर को ला रहे है . पीछे वाला एक आंख से आंसू पोछता है. फिर स्ट्रेचर संभालता है  साथ में कम्बल लपेटे एक बूढ़ा. है  सर झुकाए  रोती बिलखती दो औरते ,पीछे  नंगे पैरो चलते  दो बच्चे  नज़दीक ,नज़दीक . आगे वाले की आंखे लाल है .कोई सूखा नशा है शायद ,स्वेटर के नीचे से झांकती .शर्ट अस्पताल का नुमाइंदा है .एक बैलगाड़ी में डली चारपाई शरीर को वहां लिटा दिया गया है  औरतो का रोना  जारी है.
 सड़क  पर कोई  बारात  है  .बाराते  आहिस्ता   -आहिस्ता चलती  है , लगभग एक सी शक्ल लिए . सूखे  नशे वाला रुक गया है ,जाने क्यों  शरीर को देखता है ,फिर  बूढ़े को फिर .एक  ओर कोने में  जाकर अपने हाथो में कुछ मलने लगा है . पीछे वाला  कुछ देर उसे देखता है  फिर खाली स्ट्रेचर धकेलता आंसू पोछता वापस अस्पताल की ओर जा रहा है.शायद जमा करने .बूढ़ा वही   घुटनों में सर डाले बैठ गया है  .बारात  ओर नजदीक आ गयी है. आहिस्ता -आहिस्ता सड़क  पर एक्सपेंड हो गयी है . हम दोनों  के बीच संवाद में जैसे पॉज़ आ गया है .उसने सिगरेट सुलगा ली है .साथ चलते जनरेटर के शोर में सिक्के हवा में उछालते है ,फिर छन्न से सड़क पे बिखर जाते है  ,अनजाने चेहरों का समूह उठाने के लिए टूट पड़ा  है उनकी नज़र बचाकर अपनी मस्त चाल से चलता हुआ एक सिक्का ठीक बुग्गी के पहिये के पास  कुछ  देर घूम कर ठहरा है. बुग्गी पे  बैठा  बच्चा एक नज़र बारात की ओर देखता है. दूसरी बूढ़े की ओर ,बूढ़े   का सर अब भी घुटनों में है ,कुछ  सेकण्ड ......
 वो नीचे झुक कर सिक्का उठाता है.
 
"सिगरेट पियेगा' ...मेरा दोस्त मुझसे पूछ रहा है .
बैंड का वाल्यूम  बढ़ गया है .....







2010-08-15

"चिरकुटाई की डेमोक्रेसी'

गुप्ता जी सुबह  सुबह अपनी नयी गाडी दिखाते है ..." सेक्सी" ....मै कहता हूँ ... उनका सत्रह साल का लड़का मुझे हैरानी से देखता है ...दस बारह साल हॉस्टल में रहने के बाद हर शानदार चीज़ को सेक्सी कहने का आदत को डीज़ोल्व  होने  में काफी  वक़्त लगता है .........सभ्य  समाज  की अपनी शिष्ट  भाषाये  है ... उन दिनों   ढाबे की तड़का दाल से लेकर ....  अलेन सोली की व्हाईट  शर्ट  सेक्सी होती थी.....
फिर तुम लोग "असल" से कैसे डिफरेनशियेट करते हो .... उन दिनों  लडकिया पूछती ...
हो जाता है..यार .....
सभ्य समाज की कई अजीब सी मुश्किलें भी है ....पुणे के उस पांच सितारा होटल में मेरे साथ ठहरे डॉ साहब फ्लाईट के  उतरने के बाद से  ही  परेशान है ...उम्र में मुझसे पंद्रह साल बढे वे कमरे में चहलकदमी कर रहे है ....क्या हुआ बॉस  ?मै पूछता हूँ......
यू पी में मेडिकल में सीनियर को बॉस कहा जाता है
इतना बड़ा होटल है  ...ओर एक भी इन्डियन टोइलेट नहीं... है.
आख़िरकार अगली सुबह
   कोंफ्रेस  हौल के ऑडीटोरियम के पीछे एक इन्डियन टोइलेट मिल जाता है   ओर उनकी जीवन में दिलचस्पी पुनः जाग जाती हैवे अक्सर कोंफ्रेस में मेरे रूम मेट रहते है ....इंदोर की उस यात्रा में भी वो मेरे साथ है. डॉ साहब इंदोर के  सियाजी होटल में रिसेप्शन पर इंडियन टोइलेट की बाबत सुझाव पुस्तिका में अपनी राय दर्ज करते है .... ...........इस देश के उन सभी होटले में जहाँ जहाँ वे ठहरे  सुझाव पुस्तिका  पर उनकी इस बाबत राय दर्ज है .....
ऊपर कमरे में पहुंचकर सूटकेस खोलते ही ..मै जान जाता हूँ एक बहुत आवश्यक चीज़ पेक करनी भूल गया हूँ .....अंडरवियर!!
...कांग्रेंस हौल से लौटते  वक़्त ..रास्ते में ले लेगे .वे सुझाव देते है .....
वापसी में वो ड्राइवर को
वेस्ट साइड के आगे रोकने पर मुझे  हैरानी से   कहते है .... यहाँ
डिजायनर  यही मिलते है ..
डिजायनर?

तो आपके ज़माने में भी तो होते थे ....अलग अलग पट्टियों वाले ....मै कंधे उचका  देता हूँ
पंद्रह मिनट  से ज्यादा वक़्त लगने पर वे हैरान होते है ...इसमें इतना क्या सोचना भाई?कोई भी  उठायो ओर चल दो …..
रचनात्मक दृष्टिकोण से देखे तो ये विचारो  में परिवर्तन है.......ओर आम भाषा में कहे .....जाने दे...हर चीज़ को कहना जरूरी  तो  नहीं है....
बिल की लाइन में  ठीक हमारे  आगे सफ़ेद शर्ट ओर जींस पहने एक  सेक्सी .कन्या खड़ी है .....कुछ सेकण्ड बीतते  ही  वे  इतनी  जोर  से  डकार लेती  है  के  हम थोडा पीछे हट जाते है ..सोचते है शायद "एक्सम्यूस-  मी कहेगी...पर लगता है किसी सरकारी स्कूल की पढ़ी हुई है .जहाँ ये कहना नहीं सिखाया जाता......

  सी कोंफ्रेंस के कुछ ओर संभावित खतरे भी है . …... .....साइड इफेक्ट्स .....ऐसे ही एक  बड़े खतरे हमें लिफ्ट  में टकराते है .... हमारे  एक सीनियर ... चिरकुटाई के भी वीर होते है ..... ये उन लोगो में से है…. जिनको सामने देख आप ऊपर वाले से कहते है ..".ये क्या . खुदा अब भी. बिना चेतावनी के फायर..." .... 
  उनके .मुंह में कुछ  है.. ..पिछले नौ सालो से  उनके मुंह को कभी  खाली नहीं देखा है.... उनका मानना है  के गाली एक तरह की अप्रत्यक्ष श्रदांजलि   है ......भरी भीड़ में भी वे आपको श्रदा के सुमन जोर से अर्पित करते है ..... लिफ्ट बड़ी जालिम  शै  है ...हमें उस दिन अहसास होता हैछिपाने की.तमाम कोशिशो के बावजूद हमारे हाथ में  किताब पर उनकी निगाह गयी है.
"#**साले अभी भी कविता लिखते हो.....
 गोया  कविता  लिखना  कितनी  फिजूल  बात  है .हाउ बोरिंग ! हम आत्म ग्लानि सी महसूस करते है
"#** 'इता टाइम कहाँ से निकाल लेते हो "...उनका अगला सवाल है  
जिसका  सीधा  सा  हिंदी  तजुर्मा  ये   है  के  आप   इत्ते  ठलुवे   है  .
"#** देखे कौन सी किताब है "....वे जबरिया किताब हथिया लेते है ....मोहन दास ए  ट्रू स्टोरी ऑफ़ ए मेन,हिज़ पीपुल एंड हिज़ एम्पायर -राजमोहन गांधी ......पीछे पलटकर प्राइस टेग देखते है .
". #**गांधी  पे साडे  छह  सौ रुपये  खर्च  करते हो...."
साथ में उनकी पत्नी यूँ हमें देखती है जैसे कृषि दर्शन देख रही  हो ..
. ये  पान आप लाये कहाँ से  ..इस एरिया में तो मिलता नहीं .हम पूछना  चाहते है.पर पूछते  नहीं .इससे  वार्तालाप आगे बढ़ने का खतरा है .. .....
१६ सालो .. ने उन्हें अब भी नहीं बदला है....चिरकुटई उम्र की पाबन्दी नहीं मानती है ...न लिंग भेद में विश्वास रखती है ....उनकी पत्नी को गौर से देख हम सोचते है के क्या ये कंटाजीयस भी होती है .... हम अब भी  सोच रहे के कौन से सूत्रों से इसके कंटाजीयस होने की तस्दीक की जाए ….यूँ भी इश्क के एक्सपर्ट  हमारे  शुक्ला जी कहते थे ..जब आपकी प्रेमिका आपकी नजरो से दुनिया को देखने लगे तो  प्यार की थ्योरी  को कन्फर्म मान कर नीचे हेंस प्रूव्ड लिखा जा सकता है.....वैसे  हिन्दुस्तान  एक ऐसा देश है  जिसमे ....शादी के बाद  प्यार का प्रतिशत सबसे ज्यादा है ....
मुफ्त की दारु को सूंघने की उनके भीतर विरल शक्ति थी....गोंड गिफ्टेड .. . सूंघते हुए पहुँच जाते  ...फिर इत्ती पीते  . के स्टोक कम पड़ जाता .. रायता फैलाने के कई अवार्ड लगातार उनकी झोली में थे .... कितने वाश बेसिन उनकी गंध से आज भी गंधा रहे है कई पार्टियों के  वे  निर्विवाद  ' क्यूरेटर' रहे ….उनका मानना  था के कोई भी पार्टी  उनकी गैरमौजूदगी में फीकी सी रहती है ...अपनी रचनात्मक भूमिका के लिए वे सदैव आश्वस्तकारी रहे .मुद्राये जुटाकर पार्टी में योगदान को उन्होंने गतिरोध का हिस्सा माना………सामूहिक  अनुभव में  आनंद लेने की इस प्रक्रिया को लेकर उनका मौलिक द्रष्टिकोण अब भी बचा हुआ है .....
किसी ने कहा था के हमें अपने सदगुणों का पता अपने दोस्तों से चलता है ओर दुर्गणों का अपने दुश्मनों से ...वक़्त के मुताबिक  इसे मोडिफाई करने की जरुरत  है 
"#**कहाँ ठहरे हो?" ....वे पूछते है
हम हालात को  तकाजे में तौल कर झूठ का दरवाजे को पकड़ते है ....झूठ  बोलने का सबस बड़ा फायदा ये है की   ये बड़ी स्ट्रेचेबल   चीज़ है ....कितना खीच लो ...बस नुकसान ये  है के  याद  रखना पड़ता है ..... कहाँ कितना खींचा था ……
लिफ्ट रुकी है ...
वे नजदीक आते है .......फिर
  धीरे से फुसफुसाते है ..."#**कोई प्रोग्राम  हो तो  बताना ...."
दरवाजे को पकड़ कर वे फिर मुड़े है
...वैसे ये#** राजमोहन गांधी कौन है..कोई रिलेटिव लगते है गांधी के
 उस रात   हमारे साथ वाले डॉ साहब  अगले दिन  वहां के रजवाड़ा बाज़ार में  कुछ चीज़े देखते है .....ओर मै नब्ज़ देखकर रोग बताने वाली दुकान को ...... सोचता हूँ जाकर ट्राई  कर आयूं पर वे डपट देते है….
ख्यालो  की डेमोक्रेसी देश में भले ही न हो पर  चिरकुटई की कई  दुकाने खुली हुई है ......


पुनश्च : १ ५ अगस्त की रात जब देशभक्ति का ओवर फ्लो हो रहा है मै ऐसा क्यों लिख रहा हूँ......कारण ...नयी तकनीक  के भी कुछ साइड इफेक्ट्स है ...  फेस बुक . ..  अपने मेसेज बॉक्स में  मुंह में मसाले भरी उनकी सूरत का दीदार कराती है .दाई ओर लिखा हुआ है." #**  साले फ्रेंड रिक्वेस्ट  भेजी  है ...एक्सेप्ट क्यों नहीं करते ! खुदा ने अपनी गन फिर लोड कर ली है ... डिशकयूं ...........

नोट- चिरकुट इस देश की नेशनल गाली का शिष्ट अनुवाद है

2010-07-18

'मोरल ऑफ़ दी स्टोरी "

 सुबह की चाय ख़त्म  ही की  है के मोबाइल ने आवाज देकर  बुलाया है ......अमित का  एस एम् एस  है ..... ‘डॉ श्रीवास्तव के यहाँ आज पगड़ी रस्म है …मीट एट हिज़ प्लेस एट . 3.30 “….भूल गया था ...वे शहर के जाने माने डॉ थे ..कुछ दिन पहले ही दिल के दौरे से उनका निधन हुआ था .आदतन   अखबार    के  पन्ने   पलटता हूँ ……सी बी एस सी बोर्ड का रिजल्ट आया है …एक लड़के ने स्कूल टॉप किया है …अपने माँ -बाप के साथ उसकी फोटो है … फोटो देखकर मैं पहचान जाता हूँ ..डॉ गुप्ता का बेटा है …सदर मे  जनरल  फिजियशन  है

दोपहर पौने चार बजे ……
मोबाइल 
ने फिर आवाज दी है …कहाँ है ?मेरा दोस्त पूछता है … ...'..रस्ते में हूँ '...डॉ श्रीवास्तव  साकेत में रहते थे ......पोश कालोनी ....घर  के बाहर गाडियों की लम्बी कतारे है ....गाड़ी पार्क करने के लिए कोई मुनासिब जगह ढूंढ रहा हूँ   की   अगर कोई कॉल आए तो आराम से निकल सकूं ….एक जगह पार्क करके उतरता हूँ. ..सामने डॉ अरोड़ा किसी को मोबाइल पर इन्सट्रकशन  दे रहे है …ड्रिप मे …### डाल देना.... .स्पीड कम रखना ....आधे घंटे मे पहुँच जायूँगा …..मैं उन्हें अभिवादन करता हूँ ....वे मुस्करा कर सर झुकाते है ....फ़िर मोबाइल मे ही घुस जाते है .."चार नंबर वाले का क्या हुआ ? उसे गैस पास हुई की नही ?....मैं आगे बढ़  गया हूँ ..डॉ श्रीवास्तव  की एक हज़ार गज की बड़ी कोठी....आगे  बड़ा लोन है.... उसी में सफ़ेद रंग का टेंट सीना तान के    खड़ा है …......गेट पर ही डॉ मित्तल मोबाइल पर है ….ऐसा करो डॉ त्यागी को  साडे चार  का टाइम बता देना ….…"तुम ओ. टी तैयार करो मैं पहुँचता हूँ "….वे नीचे झुक गए है .....मुझसे १५ साल सीनियर है …ये उनकी खानदानी आदत है .......दोनों भाई अक्सर ऐसे ही झुके हुए मिलते है ........आगे जाकर  जरूर पीठ की तकलीफ होगी …पूरे शहर मे उनकी विनम्रता मशहूर है.

मैं अन्दर घुसता हूँ …कई सफ़ेद कुरते पाजामे है ,मैं थोड़ा अटपटा सा महसूस करता हूँ.... टी शर्ट ओर जींस मे ही चला आया हूँ   एक  सफ़ेद कुरता पाजामा अब 
सिलवा ही लेना चाहिए   ....नजर दौडाता हूँ की अपने वाले बन्दे कहाँ है .. .आदमी की अजीब  फितरत है ... अब  हर जगह कम्पनी ढूंढता है ......अभी शहर मे   सात  साल ही हुए है प्रक्टिस करते हुए अपनी वेवलेन्थ वाले कुछ ही लोग है …..डॉ श्रीवास्तव से आज तक मेरी मुलाकात बस एक दो बार  आई. एम्. ए  की मीटिंग्स मे तकल्लुफाना अंदाज मे हुई थी ....कोई बता रहा है .......समीर यहाँ कुछ ही दिनों के लिए आया है ...समीर उनका बेटा है फिहाल अमेरिका मे शिफ्ट हो गया है शायद  सॉफ्टवेयर इंजिनियर है .. 
“तेरे पास  डिस्पोसेबल बायोप्सी पञ्च है   है  तीन मिलीमीटर वाला “?मेरा दोस्त  फुसफुसाता है ...  …
".हाँ .."मैं धीमे से कहता हूँ...... मंत्रों उच्चारण हो रहा है ….भीड़ बहुत है …कई लोग रुमाल निकलकर उमस ओर बदलते मौसम की चर्चा कर रहे है .......
..मेरे आगे दो तीन लोग है ….".अंदाजन एक करोड़ की होगी "..पहला दूसरे से उस कोठी की कीमत का अंदाजा ले रहा है ,दोनों शहर के प्रतिष्ठित सर्जन है …हाँ …दूसरा कहता है ….”बेटा तो बाहर है …पहला फ़िर बात अधूरी छोड़ता है ….”कोई फायदा नही ..दूसरा उससे कहता है ..डील हो चुकी है …समीर  चार दिन बाद वापस जा रहा ..आपने पहले जिक्र नही किया …पहला नाराजगी दिखाता है .”मुझे भी आज ही मालूम चला है ‘.. डॉ .शर्मा हमारे पास आकर खड़े हो गए है ,साकेत मे ही रहते है उम्र पेंतालिस से ज्यादा ओर पचास से कम है.....,लेकिन फिट रहते है .......उन्हें बतियाने का शौंक भी है ...हम भी कभी उनकी कंपनी मे बोर नही होते है ,…थोडी देर मे पगड़ी की रस्म पूरी  हो गयी है ....लोग हाथ जोड़कर निकलने की कवायद में है .....   ..
हम बाहर  आये है .......  कोई कह रह रहा है " श्रीवास्तव जी सज्जन आदमी थे" ..मैं उसे गौर से देखता हूँ..ये पहला आदमी है अब तक जो वाकई शोक मे है ..
...शर्मा जी बाहर तक हमारे साथ है..गाड़ी के पास खड़े होकर वो कहते है ...मोरल ऑफ़ दा स्टोरी क्या है समझे ?......आराम से जियो अपने लिए जियो एक छोटा सा फ्लेट लो ....वरना बच्चे बड़े होकर बाहर जायेंगे ..तुम्हारी मौत पर बीस दिन की छुट्टी लेकर आयेंगे ..फ़िर प्रोपर्टी बेचकर अमेरिकन डॉलर मे कन्वर्ट करके चले जायेंगे.......छह : महीने मे चौथा किस्सा है साकेत मे........
तेरा बेटा कितना बड़ा है .....मुझसे पूछते है .....
चार साल..... मैं कहता हूँ.......
रात को मीटिंग मे आ रहा है ना...... वहां एक पंच लेता आना" मेरा दोस्त मुझसे कहता है.
रात  दस बजे
 
आई एम् ए  की मीटिंग है...मैं लेट पहुँचा हूँ ,  टाक ख़त्म हो गई है ,मैं अपने दोस्त को पंच पकड़ा देता हूँ ....लोग गिलास पकड़ कर खड़े है .... कुछ नेपकिन में दबाये ........डॉ मलिक पास आये है  ....अपने हाथ की प्लेट मे से एक पकोडा मुझे उठाने को कहते है ....."सामने   देख रहे हो ..".........  डॉ गुप्ता सामने    है....... उनके आस पास दो तीन लोग है ...."ये आदमी खाली  एम् . बी. बी. एस है लेकिन  इसके चेहरे  पर एक अजीब सा तेज है ..इस पूरी महफ़िल पे किसी के मुंह पे नहीं मिलेगा .....  जानते हो क्यों.......क्यूंकि उसके बेटे ने स्कूल टॉप किया है....."वे एक बड़ा घूँट भरते है...कंधे पे हाथ धरते है......मोरल ऑफ़ दी स्टोरी .क्या है समझे ?.तुम्हारी औलाद ही असल पूंजी है ...बाकी . सब बकवास है .......समझे .....
मै सर हामी में हिला देता हूँ ......वे एक बड़ा घूँट लेकर ओर नजदीक आ गये है     "तेरा बेटा कितने साल का है ?"






पुनश्च : तकरीबन दो साल पहले  इस   तजुरबे  के बरक्स   चहलकदमी की थी.....उसी हलफनामे का दस्तावेज़ था...पिछले  हफ्ते  ऐसा ही एक मंजर फिर आँखों से गुजरा तो  ..अलमारी टटोली.... . वैसे .ज्यादा कुछ  नहीं बदला  है .जीने के  हुनर थोड़े ओर  रिफाइन हुए है ...थोड़ी  परते .रूह पे आयी है  ...थोड़ी जमीर पे ........मौत अब भी बिना नोटिस दिये दबे पाँव आती है .......बस सरनेम   चेंज होता है ......लोग अब भी कान पे मोबाइल रखे फुसफुसाते हुए   अफ़सोस   के रजिस्टर पे   अपनी हाजिरी   लगाने आते है ....दिन अब भी रुकता नहीं ... थोडा सा तेज चलने लगा है ...  ओर ....भीड़ में  अब भी कोई उदास नहीं दिखता .....ओर हां आर्यन अब छह साल का है 

हार्ट अटेक. .....
कोई दो महीने पहले महंगे रंगीन धागों से  रफू हुआ था
कहते है रफू करने वाला  शहर का सबसे काबिल रफूगर  है  .....
कल आधी रात   कोई एक जिद्दी धागा बगावत कर गया

2010-04-06

दिल ख्वाहिशो का कारखाना है

कहते है दोनों जुड़वाँ है ..अक्सर साथ चलती है .....मसरूफियत की आमद अगर है तो बेख्याली का आना भी तय है ...कहने वाले बेख्याली को "छोटी "कहती है .शायद इसलिए थोडा बागी  मिजाज है  .कभी कभी बेवजह ..बिना इत्तिला किये दरवाजे पर सुबह से दरवाजे पर आ बैठती है.....कुछ ख्याल कभी नज़र बचाकर  कुछ देर गुफ्तगू  करते भी है ...ठहरते नहीं...पर ...दिल ख्वाहिशो  का कारखाना है ..फ़िल्टर करके ...वक़्त के मुताबिक  उनका तर्जुमा करता है  ....ओर आसमान  फिर "डेस्टिनी " का बोर्ड ऊपर उठा देता है ....



मसलसल भागती ज़िंदगी मे....
अहसान -फ़रामोश सा दिन
तजुर्बो को जब,
शाम की ठंडी हथेली पर रखता है......
ज़ेहन की जेब से,
कुछ तसव्वुर फ़र्श पर बिछाता हूँ
फ़ुरसत की चादर खींचकर...
उसके तले पैर फैलाता हूँ
एक नज़्म गिरेबा पकड़ के मेरा....
पूछती है मुझसे
"बता तो तू कहाँ था?


किसी ने नज़्म मांगी थी ....हालात  मुताल्लिक नहीं थे ...पुरानी गठरी खोली ओर "रिफ्रेश "का बटन दबा दिया ....काश ऊपर वाला एक बार उस पहिये (कहते है दुनिया गोल है ) का  बटन  वाला  हिस्सा  मेरे  हाथ  की "रीच" में  करे.....ओर उसका रिफ्रेश बटन ......उफ्फ......दिल ख्वाहिशो  का कारखाना है






चूँकि त्रिवेणी की आदत इस सफ्हे को भी है.....ओर इन बदमाश  खयालो से इंतकाम भी लेना था



वे जो सड़क दर सड़क आवारा फिरते थे
कल सफ्हे पे मिले तो शक्ल   जुदा थी 

उर्दू पहनकर मुये  लफंगे भी  शरीफजादे हो  गये  


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